शोध आलेख : मध्यकालीन आत्मकथात्मक स्त्री अभिव्यक्तियाँ और बहिणाबाई का काव्य / पंकज सिंह यादव

मध्यकालीन आत्मकथात्मक स्त्री अभिव्यक्तियाँ और बहिणाबाई का काव्य 
पंकज सिंह यादव

भारतीय समाज और विशेषतौर पर हिंदीभाषी समाज पितृसत्तात्मक और पुरूषवर्चस्ववादी समाज रहा है। सामंती भारतीय समाज में जहाँ निजता के लिए कोई स्थान नहीं, वहाँ आत्मकथा लिखना और अपने जीवनानुभवों की ईमानदार अभिव्यक्ति करना बहुत ही मुश्किल का काम है। ऐसे समाज में जहाँ पुरुषों की आत्मकथाएँ ही अंगुली पर गिनने लायक हो, वहाँ पर एक स्त्री द्वारा अपनी आत्मकथा लिखना और अपने जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति करना बहुत ही मुश्किल का काम होता है। इस सन्दर्भ में मैनेजर पाण्डेय ने ठीक ही लिखा है, “स्त्रियों की आत्मकथाएँ तो इसलिए नहीं हैं कि उन्हें हमारे सामाजिक ढ़ाँचे में सच बोलने की स्वतंत्रता नहीं है; लेकिन पुरूषों की आत्मकथाएँ इसलिए बहुत नहीं है कि स्वतंत्रता तो हैं, लेकिन आदत नहीं है।[1]

ऐसे सामाजिक परिवेश में बहिणाबाई द्वारा अपनी आत्मकथा लिखना बहुत ही साहसिक कार्य है। हम यहाँ मध्यकालीन भारतीय साहित्य में जो आत्मकथात्मक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं उनका मूल्यांकन करते हुए उसी परम्परा में बहिणाबाई के आत्मकथात्मक लेखन के महत्व का प्रतिपादन करते हुए आत्मकथा विधा के वैशिष्ट्य को रेखांकित करने का प्रयास करेंगे। इस परिप्रेक्ष्य में हम मध्ययुगीन भारतीय साहित्य में स्त्रियों की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति और उन पर लगी हुई सेंसरशिप की अवधारणाओं की पहचान करेंगें जो उनकी अभिव्यक्ति के लिए बाधक थीं।

मध्यकालीन भारतीय साहित्य में आत्मकथा या आत्मकथात्मक लेखन की कोई विशिष्ट और दीर्घ परम्परा नहीं मिलती है। भक्ति आन्दोलन के तमाम कवियों ने घोषित रूप से अपने जीवन के बारे में कुछ भी नहीं कहा है, जबकि लोक जनमानस में उनके बारे में अनेक तरह की किंवदंती और प्रवाद प्रचलित रहे हैं। चाहे वह कालिदास और बाणभट्ट के संदर्भ में हो, या वह तुलसीदास का रत्नावली से संबंधित प्रसंग हो, या उनके समाज के साथ संघर्ष, या कबीर के जीवन और सत्ता से संघर्ष हो, या मीरा का अपने परिवार, समाज और राजसत्ता से संघर्ष ये तमाम कवि अपने जीवन के बारे में कुछ भी कहने को लेकर बहुत ही आत्मसंकोच की स्थिति में हैं। तुलसीदास जैसा महाकवि इसी आत्मसंकोच में है कि संसारी मनुष्यों की गाथा कहने से ज्ञान की देवी सरस्वती सिर धुनकर पछताने लगती है (कीन्हें प्राकृत जन गुण गाना सिर धुनि गिरा लगत पछिताना)

मध्यकालीन भारतीय साहित्य में भक्त-कवियों की कुछ आत्मपरक कविताओं में आत्मकथा का स्वरुपअर्द्ध-आत्मकथात्मक’ (quasi-autobiographical) के रूप में मिलता है, जिन्हें हम भारतीय साहित्य में आत्मकथा विधा के प्रारंभिक सूत्र के रूप में मान सकते हैं। इस संदर्भ में कबीर, सूरदास, तुलसी, मीरा, जायसी, नरसी मेहता, बसवन्ना, अक्क महादेवी, ललद्य और बहिणाबाई आदि की आत्मपरक कविताओं को देखा जा सकता है। इन कविताओं में कवियों ने अपने व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयों, पारिवारिक गृह क्लेश, घरेलू हिंसा, जीवन संघर्ष और सगे-संबंधियों आदि के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त किए हैं। इन आत्मपरक कविताओं में कवियों ने जिस तरह से अपना निर्मम और मार्मिक आत्ममूल्यांकन किया है; वह भारतीय साहित्य में विकसित हो रही आत्मकथा विधा के कलागत सौंदर्य का प्रमाण है। पर इस आत्ममूल्यांकन में आत्मसंकोच और आत्मदया की स्थिति अधिक प्रबल है, इसके बावजूद भी उसमें एक निर्मम आत्मस्वीकार का साहस भी है। सूरदास जब अपने अब तक के जीवन का आत्ममूल्यांकन करते हैं तो इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि-

मो सम कौन कुटिल खल कामी

जेहि तन दियो ताही बिसरायो ऐसो नोनहरामी[2]

वहीं तुलसीदास जब विनयपत्रिका और कवितावली में अपने बाल्यकाल के जीवन को याद करते हैं तो मालूम पड़ता है कि उनका कितना कठिन और संघर्षमय जीवन था। रामबोला से तुलसीदास बनने की कथा कितनी कठिन रही होगी उसका अंदाजा कवितावली के इस पद से लगाया जा सकता है, देखिये-

मातु-पिता जग जाय तज्यो

विधिहू लिखी कछु भाल भलाई

नीच निरादर भाजन कादर

कूकर टूकन लागि ललाई[3]

अर्थात माता-पिता ने तो मुझे जन्मते ही मेरा परित्याग कर दिया था और विधाता ने भी मस्तक पर भाग्य की एक रेखा तक लिखी। इस कारण मैं नीच और अपमानित होकर कुत्तों की तरह कुछ टुकड़ों के लालच में इधर-उधर फिरता रहा।

विनयपत्रिकाका यह एक पद देखिये-

द्वार-द्वार दीनता कही काढि रद  परि पाहूं

हैं दयालु दुनि दस दिसा दुखदोष दलन छम कियो संभाषण काहूं

तनु जन्य कुटिल कीट ज्यों तज्यो मातु-पिताहूं

काहे को रोस दोस काहि धौं मेरे ही अभाग

मोसों सकुचत छुइ सब छाहूं[4]

            अर्थात मैंने द्वार-द्वार जाकर और अपने दांतों को दिखाकर अपनी दीनता की दशा कही और लोगों के पैरों पर पड़ता रहा। इस संसार के दसों दिशाओं में ऐसे दयालु लोग हैं जो मेरी पीड़ा को हर सकते थे पर किसी ने भी मुझसे सीधे मुंह बात तक नहीं की। जिस प्रकार कुटिल कीड़ा अपने जीव को जन्मते ही छोड़ देता है उसी तरह मुझे भी मेरे माता-पिता जन्मते ही त्याग दिया। ऐसी स्थिति में मैं किसी पर रोष (क्रोध) भला क्यों करूं,और किसी पर दोष क्यों दूं। यह सब मेरे अभाग के ही कारण हुआ है। लोग तो मेरी छाया तक को छूने से सकुचाते हैं।

            इसी तरह कुछ कविताओं में कबीर अपनी जीवन-यात्रा के बारे में बताते हैं कि मेरा तो जीवन मरघट में ही बीत गया, कोई मेरी ज़िंदगी की सुध लेने वाला नहीं था, देखिये-कबीर मरि मरहट रहा तब कोऊ पूछे सार

        इन मार्मिक अंतःसाक्ष्यों से पता चलता है कि इन भक्त कवियों का जीवन कितना संघर्षमय था, पर ये अभिव्यक्तियाँ बहुत ही अप्लमात्रा में हैं। इससे इनके संपूर्ण जीवन की कोई मकुम्मल जानकारी नहीं मिलती है। भक्ति-आन्दोलन के तमाम कवि अपने जीवन के एक क्षण विशेष के सन्दर्भ में आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति तो करते हैं लेकिन अपने बारे में व्यवस्थित और विस्तृत रूप में कुछ भी कहने से बचते हैं।

मध्यकालीन भारतीय साहित्य में अपवाद के रूप सिर्फ़ दो नाम मिलते हैं जिन्होंने घोषित रूप से अपनी आत्मकथा लिखी है, एक बनारसीदास जैन और दूसरा बहिणाबाई। बनारसीदस जैन नेअर्धकथानक’ (1641) शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी, जिसे हिंदी की पहली पद्य-बद्ध आत्मकथा माना जाता है। ज्ञानचंद जैन ने तो इसे हिंदी ही नहीं, बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं में भी पहली आत्मकथा माना है। बनारसीदास जैन ने इस आत्मकथा के माध्यम से आत्मकथा लेखन के क्षेत्र में जो प्रतिमान रचे हैं, वह अद्वितीय है। उन्होंने अपने तमाम गुण-दोषों को बिना किसी संकोच के ईमानदारीपूर्वक लिखा और ख़ुद के जीवन का आत्मालोचन किया है। ख़ुद के बिगड़ने की कथा को बहुत ही सहज ढंग से लिखा है। अपने युवावस्था के प्रेम संबंधों, पढ़ाई-लिखाई और व्यापार धंधे को छोड़कर इश्क़बाजी करने और उससे उत्पन्न व्याधियों को भी बहुत ही सहज भाव से लिखा है। कुछ उद्धरण देखिये-

कै पढ़ना कै आसिकी मगन दुहु रसमाहि

                                    खान पान की सुध नहीं रोजगार किछु नाहिं[5]

                                    ‘तब घर में बैठे रहे नाहिंन हाट बाजार

                                    मधुमालती मृगावती पोथी दोय उचार[6]

            हालाँकि उन्होंने अपनी आत्मकथा में सत्य के प्रति निष्ठा रखने के बावजूद भी जो भारतीय समाज की परम्परागत और जड़ प्रवृतियाँ हैं वह उनको अपना आत्म-सत्य कहने से सेंसर करती हैं। उनका मानना है कि ये नौ चीज़ें अनकही होनी चाहिए-

आउ वित्त निज गृहचरित दान मान अपमान

                                    औषध मैथुन मंत्र निज, ये नव अकह कहान[7]

इस तरह हम देखते हैं मध्यकालीन भारतीय साहित्य में आत्मकथा/आत्मकथात्मक लेखन की कलागत सौंदर्य की विशेषता होने के बावजूद भी आत्मकथा की विधा विकसित नहीं हो पाई। बनारसीदास जैन और बहिणाबाई के लेखन के बाद लगभग दो से भी अधिक शताब्दियों तक भारतीय साहित्य में आत्मकथा लेखन साहित्य के दायरे से बाहर रहा।

अब हम स्त्री अभिव्यक्ति की बात करें तो उसका सबसे प्राचीनतम रूप भारतीय साहित्य का पहला काव्यबद्ध ग्रन्थ ऋग्वेद में मिलता है, जिसमें कुल 10 मंडल और 1028 ऋचाएं हैं। इसमें लगभग बीस ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने ऋग्वेद के कई सूक्तों की रचना में अपना योगदान दिया। इन ऋषिकाओं कोब्रह्मवादिनीकहा जाता था, जिसका उपयोग उस समय के धर्मशास्त्र और दर्शनशास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली स्त्रियों के संदर्भ में किया जाता था। रोमशा, लोपामुद्रा, विश्वारा, सिकता, निवारी, घोषा, यमी, शची, अपाला आदि कई ऋग्वेद की महत्वपूर्ण ऋषिकायें हैं। इसके अलावा मैत्रेयी, प्राची, गार्गी, सुलभा आदि कई महत्वपूर्ण ऋषिकाएं भी रही हैं जिन्होंने अपने समय में धर्म और दर्शन में अपनी विद्वता का उच्च मापदंड रखा, लेकिन आज हम सिर्फ़ उनके नामों के अलावा उनके किये गये कामों के बारे में कुछ नहीं जानते।

ऋग्वेद के बाद स्त्री लेखन का स्वरूप बौद्ध साहित्य के अन्तर्गत खुद्दक-निकाय में संकलित थेरीगाथा में मिलता है। थेरीगाथा, जिसमें लगभग 73 थेरियों की आत्माभिव्यक्ति 522 गाथाओं में संकलित है।  इन थेरीगाथाओं में विभिन्न वर्गों और वर्णों से आने वाली थेरियां अपने पूर्व के जीवन (अर्थात भिक्षुणी बनने के पहले), अपनी वंश परम्परा, परिवार और जीवन के प्रति गहरा विराग और उससे मुक्त होने की तड़प को व्यक्त किया है। इन थेरीगाथाओं में अपने बुरे कर्मों के प्रति सहज आत्मस्वीकृति है तो उसका गहरा आत्म-पश्चाताप भी। लैंगिक विभेद और पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था द्वारा स्त्रियों की सीमित भूमिकाओं की गहरी समझ भी उनकी आत्माभिव्यक्ति में नुमायां हुई है। जीवन का हर एक रंग आध्यात्मिक और खूबसूरत रूपकों के रूप में इन  थेरीगाथाओं में अभिव्यक्त हुआ है। थेरीगाथाओं के संदर्भ में भरत सिंह उपाध्याय ने ठीक ही लिखा है- “अत्यंत संगीतात्मक भाषा में आत्माभिव्यंजनात्मक गीतिकाव्य की शैली के आधार पर अपने जीवनानुभव को व्यक्त करते हुए यहाँ बौद्ध भिक्षुणियों ने अपने जीवन का गीत गाया है। नैतिक सच्चाई, भावनाओं की गहनता सबसे बढ़कर एक अपराजित वैयक्तिक ध्वनि इन गीतों की मुख्य विशेषताएं हैं।[8]

मिसाल के तौर इन थेरीगाथाओं की कुछ अभिव्यक्तियाँ देखते हैंसुमंगलमाता, एक थेरी है जिनका विवाह किसी छाता बनाने वाले से हुआ था। जिनसे एक पुत्र सुमंगल उत्पन्न हुआ जो आगे चलकर प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु बना। इसी सुमंगल की माता के रूप में इनका परिचय दिया जाता रहा है। भिक्षुणी बनने के पूर्व का जीवन और उसके बाद की स्थिति (पति से मुक्ति और घरेलू दायरे में सीमित भूमिका) से मुक्ति का बहुत ही उल्लासपूर्वक अपनी एक गाथा में आधुनिक और सजीव वर्णन किया है

अहो ! मैं मुक्तनारी

मेरी मुक्ति कितनी धन्य है।

पहले मैं मूसल लेकर धान कूटा करती थी,

आज उससे मुक्त हुई।

मेरी दरिद्रावस्था के वे छोटे-छोटे बर्तन।

जिनके बीच मैं मैली-कुचली बैठती थी;

और मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था

जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था

अब, उस जीवन की आसक्तियों और मलों को मैंने छोड़ दिया।

मैं आज वृक्ष-मूल में ध्यान करती हुई

 जीवन यापन करती हूँ।

अहो ! मैं कितनी सुखी हूँ

मैं कितने सुख से ध्यान करती हूँ [9]

            पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था द्वारा स्थापित स्त्रियों की सीमित भूमिकाओं की गहरी समझ थेरी मुक्ता की गाथा में मिलती है। जाति और लिंग आधारित असमानता से तथा पति के व्यवहार से मुक्त होने का वर्णन थेरी मुक्ता किस उल्लास के साथ करती हैं, देखिये

            ‘मैं अच्छी तरह से विमुक्त हो गई

            तीन टेढ़ी चीजों से मुक्त हुई

         ओखली से, मूसल से और अपने कूबड़ पति से

          मैं आज जाति और मरण से भी मुक्त हो गयी हूँ

मेरी संसार तृष्णा ही समाप्त हो गयी है।[10]

 इसके अलावा ईसा की पहली शताब्दी में प्राकृत और संस्कृत में कुछ स्त्री अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं। हाल कीगाथासप्तशतीमें रोहा, रेवा, माधवी, अनुलक्ष्मी, शशिप्रभा आदि के कुछ मुक्तक मिलते हैं। इन गाथाओं में ग्राम्य जीवन का सौन्दर्य, विन्ध्य और पर्वतीय अंचल का मनोहारी रूपों का वर्णन, प्रवासी प्रिय का इंतज़ार करती विरहिणियाँ और उनकी मनोदशाओं और प्रेम के भावों विभिन्न दशाओं (रतिमूलक और श्रृंगारपरक) अवस्था का जिस अकुंठ भाव से वर्णन किया गया है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज व्यवस्था में व्याप्त पितृसत्ता की जकड़ को भी प्रश्नांकित करती हैं।

इसी क्रम में देखा जाए तोगाथासप्तशतीके ही समानान्तर संस्कृत साहित्य में भी कवयित्रियों की उपस्थिति मिलती है। दसवीं शताब्दी के आचार्य राजशेखर नेकाव्यमीमांसामें सैंतीस कवि प्रशस्तियों में पाँच महिला कवियों (शीला भट्टारिका, विज्यांका, विकटनितम्बा, प्रभुदेवी और सुभद्रा) का ज़िक्र किया है और उसके साथ-साथ उनकी काव्यगत विशेषताओं और विलक्षणता की प्रशंसा भी की है। शीला भट्टारिका को तो उन्होंने बाणभट्ट के समकक्ष रखा और कहा कि शब्द और अर्थ का समान गुम्फन पांचाली रीति है और वो शीला भट्टारिका वाणी में है या बाणभट्ट की वाणी में|

बाणभट्ट का  समय लगभग सातवीं शताब्दी का है जो राजा हर्ष के समकालीन थे। वहीं शीला भट्टारिका बाणभट्ट से पहले की हैंइससे यह कहा जा सकता है कि उनका रचना समय लगभग छठवीं या सातवीं शताब्दी का रहा होगा। इनके कुछ पद्य मम्मट आदि काव्यशास्त्रियों ने अपने ग्रंथों में श्रृंगार के लक्षण के रूप में उद्धृत किया है। इसके अलावा इनके बहुत से पद्य सुभाषित रत्नाकर आदि सुभाषित संग्रहों में संकलित हैं। प्रेम, रूप-सौन्दर्य और सुरति का जैसा चित्रण शीला भट्टारिका ने किया वैसा विरल ही है। एक ऐसे ही पद्य को देखिये जिसे मम्मट नेकाव्यप्रकाशमें उत्तम काव्य के रूप में उद्धृत किया है, जिसमें देह-संसर्ग की आत्मानुभूति और पुनर्मिलन की भावना का जिस अकुंठ भाव से वर्णन किया है वह स्त्री विमर्श की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है, देखिये-

यथा यः कौमारहरः एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा

स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ा कदम्बानिलाः|

सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ

रेवारोधिसी वेतसीतरुतले चेतः समुत्कणठते [11]

(वही मेरा वर (दूल्हा) है, जिसने मेरे कौमार्य का हरण किया, वे ही चैत की रातें हैं, वे ही कदंब की सुगंध से भरपूर हवाएँ हैं, वह मैं हूँ, फिर भी सुरत (मिलन) के व्यापार की लीलाविधि के लिए रेवा के किनारे वेतस के कुंज में जाने के लिए जी मचल रहा है)

इस तरह हम देखते है कि शीलाभट्टारिका एक निपुण कवि के रूप आती हैं जिनकी रचनाओं में परम्परागत सामाजिक मर्यादाएँ और पितृसत्तात्मक संरचनाएं खंडित हो गई है। ऐसी कवयित्री की मात्र कुछ गिनती की कविताएँ ही बची रह गई है जो काव्यशास्त्रियों द्वारा अपने ग्रंथों में श्रृंगार के लक्षण के रूप में उद्धृत की गई थी।

            दूसरा मशहूर नाम विज्यांका या विज्जिका का है, जिनका रचना समय सातवीं या आठवीं शताब्दी का माना जाता है। जिनके बारे में संस्कृत के महान आचार्य राजशेखर ने अपने ग्रंथकाव्यमीमांसामें उन्हें कालिदास के बाद दूसरा बड़ा कवि माना और उनकी तुलना ज्ञान की देवी सरस्वती से की।

सरस्वती कर्णाटी विज्यांका जमत्यसै।

या वैदर्भगिरां वास, कालिदासदनन्तरम्।[12]

(सरस्वती की तरह कर्नाटक की विज्यांका की जय हो, जो कालिदास के बाद वैदर्भी रीति की वाणी वास बनीं)

            संस्कृत काव्य की परम्परा में विज्यांका जिसके लिए मशहूर हैं वो उनकी गर्वोक्तियाँ हैं, जिससे उनके स्त्री स्वाभिमान और अपने कवित्व पर भरोसा का परिचय मिलता है। अपने एक पद में विज्यांका ने संस्कृत के आचार्य दण्डी के उस मत का खंडन किया जिसमें उन्होंने कहा था कि ज्ञान की देवी सरस्वती उज्ज्वल है। जिसके जवाब में विज्यांका ने कहा था

नीलोत्पलदल श्यामां विज्यांकामजानता।

वृथैव दण्डिनाप्युक्तं सर्वशुक्ला सरस्वती।।[13]

(नीलकमल के पत्तों जैसी साँवली, मुझ विज्जिका को जाने बिना दण्डी ने व्यर्थ ही कह दिया कि ज्ञान की देवी सरस्वती श्वेतावर्णा है|)

हिन्दी में स्त्री-अभिव्यक्ति का सबसे मुखर रूप मीरा की कविताओं में देखने को मिलता है, जहाँ वे अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयों, सामंती-समाज व्यवस्था से संघर्ष और कृष्ण के प्रति अपने रूहानी प्रेम का इज़हार किया है। स्त्री-लेखन की शुरुआत ही पितृसत्तात्मक वर्चस्व के प्रतिरोध में हुई है। भक्ति आन्दोलन की तमाम स्त्री कवयित्रियाँ और मीरा की कविताएँ इसका प्रमाण हैं, एक पद देखिए

लोकलाज कुल कानि जगत की, दई बहाय जस पानी

अपने घर का परदा कर ले, मैं अबला बौरानी

स्त्री आत्माभिव्यक्ति के लिए क्षेत्र में बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बसवन्ना के नेतृत्व मेंवीरशैववादआंदोलन का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। इस आन्दोलन से जुड़े तमाम भक्त कवियों ने सभी तरह के असमानता और जाति, वर्ग, वर्ण के बंधनों को नकार कर सभी को एक समान माना और स्त्रियों को आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया, जिसके फलस्वरूप कन्नड़ साहित्य में अक्क महादेवी (Akka Mahadevi), सूले सनकावा (Sule Sankava), सूजी कयावड़ा  रेम्माव्वा (Suji Kergeticucda Remmawa) और कोट्टाडा सोमव्वा (Kottanaola Samava) जैसी कई महत्वपूर्ण कवयित्रियाँ हुई, जिन्होंने पितृसत्ता और विवाह संस्था की आलोचना की, जिसमें अक्क महादेवी का नाम महत्वपूर्ण है।

कन्नड़ साहित्य में अक्क महादेवी का वही स्थान है, जो हिन्दी साहित्य में मीरा का। मीरा जैसा ही इनका भी जीवन संघर्ष था। सामाजिक बंधनों और विवाह संस्था की आलोचना करने की वजह से इन्हें अपने समय में तमाम तरह के कष्टों, प्रतिबंधों और उपहासों को झेलना पड़ा, फिर भी उन्होंने इन कठिन परिस्थितियों का सामना किया और संघर्ष का दामन नहीं छोड़ा। चन्द्रा सदायत ने अपने एक आलेखमीरा और अन्य भारतीय कवयित्रियाँमें अक्क महादेवी के जीवन-संघर्ष और काव्य सौन्दर्य के बारे में ठीक ही लिखा है, “मीरा जैसी विद्रोही चेतना और निर्द्वन्द्व प्रेम भावना यदि भारत की किसी अन्य भक्त कवयित्री में है तो वह बारहवीं सदी की कन्नड़ की अक्क महादेवी में मिलती है। अक्क महादेवी ने लोकलाज और कुल-कानि को ही नहीं छोड़ा था बल्कि अपने वस्त्रों को भी उतार फेंका था।... यद्यपि मीरा ने भी स्वप्न में कृष्ण से अपने विवाह का चित्रण किया है, परन्तु उनकी कविता में शरीर के वर्णन में वैसी ऐन्द्रिकता नहीं है जैसी अक्क महादेवी में, आत्माभिव्यक्ति का ऐसा साहस स्त्री-काव्य में आज भी दुर्लभ है, जो 12वीं सदी में अक्क महादेवी में मिलता है।[14]

अक्क महादेवी की कविताओं में उनके जीवन की झलक मिलती है, मिसाल के तौर पर यह कविता देखिए

“Don't fear, my mind, don't be afraid, my mind;

Having found out what is true, do not worry,

Millions of people will throw stones at the tree that bear fruit, 

In order to get the fruit;

I see no one throwing stones at the silk cotton tree

Millions of people will abuse those who possess devotion

It is the words of our devotees that for me are a ladder to the goal

Oh lord who is as white as Jasmine.”[15]


(मेरे मन, मत डरो, मेरे मन, भयभीत हो;

यह जानने के बाद कि क्या सच है, चिंता मत करो,

जिस पेड़ पर फल लगते हैं उस पर लाखों लोग पत्थर फेंकेंगे,

फल पाने के लिए;

मैंने किसी को भी रेशम कपास के पेड़ पर पत्थर फेंकते नहीं देखा

जिनके पास भक्ति है उनसे लाखों लोग दुर्व्यवहार करेंगे

ये हमारे भक्तों के शब्द हैं जो मेरे लक्ष्य तक की सीढ़ी हैं

हे भगवान जो चमेली की तरह सफेद है।)

मराठी साहित्य में स्त्री लेखन की बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है, जिसका विकास तेरहवीं सदी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य महाराष्ट्र के विभिन्न जाति और सम्प्रदाय से आने वाले संतों ने भक्ति आन्दोलन के माध्यम से किया। इन्होंने अलग-अलग सम्प्रदायों के माध्यम से भक्ति आन्दोलन का प्रसार किया, जिनमें महानुभाव सम्प्रदाय और वारकरी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।

महानुभाव सम्प्रदाय की स्थापना तेरहवीं शताब्दी में विदर्भ में चक्रधर स्वामी द्वारा की गयी थी। इसी सम्प्रदाय से संबंध रखने वाली महादम्बा (1233-1308) थी, जिन्हें मराठी साहित्य में पहली महिला कवयित्री माना जाता है। दूसरा महत्वपूर्ण संप्रदाय वारकरी संप्रदाय था, जिसकी स्थापना तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और चौदहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में नामदेव द्वारा किया गया। इस सम्प्रदाय ने व्यापक स्तर पर समाज के हर वर्ग और वर्ण के लोगों को बिना भेदभाव के जोड़ा। चोखामेला, सवारता, एकनाथ, तुकाराम जैसे प्रसिद्ध संत इसी सम्प्रदाय से थे। इस संप्रदाय से बड़ी संख्या में स्त्रियाँ भी जुड़ी हुई थीं। मुक्ताबाई, जनाबाई, बहिणाबाई, दयाबाई आदि कई महत्वपूर्ण मराठी साहित्य में भक्त कवयित्रियाँ हुई हैं। इसमें बहिणाबाई का साहित्यिक योगदान बेहद महत्वपूर्ण है।

बहिणाबाई पूरे भक्ति आन्दोलन की एकमात्र कवयित्री हैं, जिन्होंने विस्तार से अपनी आत्मकथा लिखी है। जहाँ भक्ति आन्दोलन के अन्य कवि अपने जीवन के बारे में कुछ भी लिखने या कहने को लेकर चुप हैं या कहीं-कहीं उनके कुछेक आत्मकथात्मक पदों में उनके जीवन के एक क्षण-विशेष की झलक मिल जाती है, पर विस्तार से कुछ भी कहने में भक्ति आन्दोलन के कवि संकोच की स्थिति में हैं, वहीं बहिणाबाई ने अपने अभंगों के माध्यम से अपनी जीवन-कथा कही हैं। 432 अभंगों के संकलन में प्रारम्भ के 78 अभंगआत्मनिवेदनके रूप में हैं, जिनमें उन्होंने अपने बचपन, बालविवाह और फिर पुनर्विवाह तथा पति और घरवालों द्वारा लगातार प्रताड़ना और ज्ञान की प्राप्ति के लिए संघर्ष आदि का बहुत ही मार्मिक चित्र उकेरा है। बहिणाबाई ने आत्मनिवेदन के प्रारंभिक अभंगों में अपने जीवन के बारे में विस्तार से बात की है। उनके अभंगों से मालूम चलता है कि उनका जन्म महाराष्ट्र के जलगांव में एक कुलकर्णी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके माता का नाम जानकी और पिता का नाम आऊजी था। प्रारम्भ में इनके माता पिता की कोई संतान नहीं थी पर एक लोक प्रचलित मान्यता के अनुसार उनके माता-पिता ने शिवजी का अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप बहिणाबाई का जन्म हुआ। बहिणाबाई बताती हैं कि जब वह मात्र तीन साल की ही थी तभी उनका विवाह तीस साल के एक व्यक्ति से कर दी गई। इसके उपरांत जलगांव छोड़कर कोल्हापुर बसने की मार्मिक घटना के भी बारे में बताती हैं। इसके अलावा भक्ति के लिए संघर्ष और अपने साथ पति द्वारा की जा रही घरेलू हिंसा का भी ज़िक्र किया है।  

मिसाल के तौर पर बहिणाबाई का यह एक अभंग काबिलेगौर है, जिसमें उन्होंने उन परम्पराओं और मान्यताओं को प्रश्नांकित करती है जिसमें  बताया है कि मात्र स्त्री-शरीर होने के कारण मुक्ति की कामना करने के लिए वह स्वतंत्र नहीं हैं। इस प्रकार के बंधनों के सन्दर्भ में वह सवाल करती हैं

“The Vedas cry aloud, the Puranas shout

No good way comes to woman

I was born with a women's body

How am I to attain truth?

They are foolish, seductive, deceptive

Any connection with a woman is disastrous

Bahina Says, “If a women's body is so harmful

How in this world will I reach truth?”[16]

वहीं उनके कुछ अन्य अभंगों के माध्यम से उन अनगिनत स्त्रियों के सदियों से झेलती रहीं घरेलू हिंसा और लिंग आधारित असमानता की भी जानकारी मिलती है। अपने एक अभंग में बहिणाबाई ने घरेलू हिंसा, पति द्वारा प्रताड़ना और ईश्वर की भक्ति के लिए उनके दृढ़ निश्चय का ज़िक्र कुछ इस तरह उन्होंने किया है-

पति के हाथों मेरी देह को प्रताड़ित किया जा रहा है,

किन्तु मैंने भी मन में निश्चय कर लिया है ।।

भले ही मेरे प्राण चले जाएँ किन्तु हें देवराय, हें दीनबंधु मैं अब भजन नहीं छोडूंगी।।

हे ईश्वर क्या तुम मेरी परीक्षा ले रहे हो और पति के हाथों मेरी मृत्यु देखना चाहते हो?

इस संकट में मैं क्या करूँ, इस शरीर के प्रति अब मेरा कोई मोह नहीं रह गया है।।

भले ही मेरा शरीर गिर (नष्ट) हो जाए फिर भी ज्ञानदृष्टि से अनंत ईश्वर को देखने की मेरी इच्छा बनी रहेगी

मैं अपने धर्म का पालन करते हुए आपकी भक्ति करूँगी और ज्ञान के द्वारा आपको पहचानूंगी

इस तरह की पीड़ाओं को सहकर कब तक मेरा शरीर बचा रहेगा, फिर भी तुम (ईश्वर) मेरी बात क्यों नहीं सुनते हो?

मैंने सुना है कि वेदों में कहा गया है कि यदि कोई इच्छा पूर्ण नहीं होती तो पुनर्जन्म होता है

इस संकट में मैं आत्महत्या करती हूँ तो इसका पाप तुम्हारे सर लगेगा, इसलिए अपने बच्चे की रक्षा कीजिए।

बहिणाबाई कहती हैं कि विश्व के पालनकर्ता ईश्वर तुम क्यों बहरे और अंधे हो गये हो?”[17]

            सामंती और पितृसत्तात्मक बंधनों के जकड़ के प्रति बहिणाबाई के काव्य में कोई मुखर प्रतिरोध की भावना नहीं दिखाई पड़ती है। अपने साथ हो रहे अन्याय को अपनी नियति मानकर चुपचाप सहन करती हैं। अपने कुछ और अभंगों के इस तरह की हिंसा का उल्लेख किया है, देखिये-

वो मेरी चोटी पकड़कर तब तक मारते रहे जब तक उनका पेट नहीं भरा, ये देखकर हिरम्भट को बहुत कष्ट हुआ

मेरे शरीर ने इस पिटाई को चुपचाप स्वीकार किया क्योंकि भाग्य के सामने किसकी चलती है?’[18]

जब भी उनके मन में आया उन्होंने जमकर मेरी पिटाई की और मेरे हाथ पांव बांधकर मुझे फेंक दिया[19]

            अगर हम भारतीय साहित्य में आत्मकथा/आत्मकथात्मक लेखन के विकास पर विचार करें तो यह पाते हैं कि आत्मकथात्मक लेखन सिर्फ़ आत्मचरित या आत्मकहानी ही नहीं है बल्कि उसका एक सामाजिक और वैचारिक सरोकार भी है। शोषण, अपमान, सदियों की घरेलू हिंसा लैंगिक असमानता, पराधीनता का बोध और स्वाधीनता की चाह इन आत्मकथात्मक लेखन के मूल में शामिल है जो कि आत्मकथा विधा का मुख्य सरोकार है। भारतीय समाज की सामाजिक संरचना में सामाजिक बहिष्कार का शिकार हर वर्ग की स्त्री रही है और जब भी कभी इस बहिष्कृत समाज को अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करने का मौक़ा मिला है उसने आत्मकथा विधा को अपनाया है। बहिणाबाई का काव्य और उन्नीसवीं शताब्दी के बाद से विभिन्न भारतीय भाषाओं में स्त्रियों की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति इस बात का प्रमाण है। आत्मकथा लेखन व्यक्तिगत जीवनानुभवों पर आधारित व्यथा-कथा होने के बावजूद भी, वह उस व्यक्ति के पूरे परिवेश और समाज का एक सामुदायिक साक्ष्य (Testimonial) के रूप में है। बहिणाबाई के अभंगों और मध्यकालीन आत्मकथात्मक स्त्री अभिव्यक्तियों से यह मालूम चलता है कि मध्ययुगीन भारतीय स्त्री का जीवन वर्ण, वर्ग, धर्म और पितृसत्ता द्वारा संचालित अवधारणाओं से होता रहा है, जिसमें स्त्री की स्थिति अधीनस्थ के रूप में ही थी। इस तरह से हम कह सकते है कि बहिणाबाई का काव्य मध्ययुगीन भारतीय स्त्री के जीवन की उन अनसुनी और अनकही ही रह गई आवाज़ को जानने और समझने का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें उनका सदियों का जीवन संघर्ष और परंपरागत मान्यताओं और व्यवस्था से प्रतिकार का साहस अभिव्यक्त हुआ है।

इस तरह हम अब तक के अध्ययन से पाते हैं कि भारतीय साहित्य में जो भाषिक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं, उसमें स्त्री लेखन यत्र-तत्र बिखरा हुआ है। इन स्त्री लेखिकाओं के बारे में जो ज्यादातर जानकारी मिलती है वह सुभाषित ग्रंथों के अनुक्रमणिकाओं में संकलित उनके नामों से या संस्कृत के प्रमुख आचार्यों द्वारा उनके काव्य विशेषताओं के संदर्भ में की गई प्रशंसात्मक टिप्पणियों या लक्षण के रूप उदाहरण स्वरुप उद्धृत की गई उनके पद्यों से मिलती है। पर यह साहित्य या ज्ञान के अन्य क्षेत्र में किये गये योगदान का एक अंश मात्र है, उनके सम्पूर्ण योगदान की कोई जानकारी नहीं मिलती है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जो वैदिककालीन ब्रह्मवादिनियाँ थीं, जिन्होंने अपने दौर में धर्म, दर्शन, और ज्ञान के क्षेत्र में अपनी विद्वता का उच्च मापदंड रखा था अपने दौर के सबसे बड़े ब्रह्मज्ञानियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें अपनी विद्वता का लोहा मनवाया था, अब हम सिर्फ़ उनके नाम से ही परिचित हैं। गार्गी, मैत्रेयी सरीखी तमाम अनाम-सनाम विदुषियों का ज्ञान, धर्म, दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में और क्या योगदान रहा इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती है।तब ये सवाल उठता है कि क्या ये संभव है कि विद्वता का इतना ऊँचा स्तर रखने वाली ये वैदिककालीन विदुषियाँ इन क्षेत्रों में अपना कोई मौलिक कार्य किया होगा? शायद इसका उत्तर, नहीं होगा।

इसके अलावा संस्कृत साहित्य में स्त्रियों की जो भाषिक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं, जिसमें विज्यांका, शीलाभट्टारिका, प्रभुदेवी, आदि कवयित्रियों की कविताओं की प्रशंसा राजशेखर और मम्मट जैसे काव्यशास्त्रियों ने की और अपने ग्रंथों में श्रृंगार के लक्षण के रूप में उनकी कविताओं को उद्धृत किया और उनके लेखन को महान कवि और नाटककार बाणभट्ट और कालिदास सरीखे रचनाकारों के समक्ष रखा। लेकिन आज हम उनके कुछ पदों या नामों के ही बारे में जानते हैं जो सुभाषित ग्रंथों में बची रह गईं  या संस्कृत के आचार्यों द्वारा अपने ग्रंथों में उनकी रचनाशीलता पर जो कुछ प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ की गई हैं उनसे जानकारी मिलती है। इससे यह मालूम पड़ता है कि भारतीय साहित्य में स्त्री लेखन का एक समृद्ध संसार था जिसे भाषा और लिपि पर आधिपत्य रखने वाला वर्ग संरक्षित नहीं कर सका। इन महिला कवयित्रियों का जो मौलिक चिंतन और सृजन है वह हमेशा के लिए खो गया है। एक तरह से कह सकते हैं कि स्त्री लेखन ने जहाँ कहीं भी यथास्थिति वाली सामाजिक व्यवस्था के प्रति प्रतिकार और उन सामाजिक संस्थानिक संरचनाओं को अपने लेखन के माध्यम से प्रश्नांकित किया जो उनकी दोयम स्थिति का मुख्य बाइस थी, या ज्ञान के क्षेत्र में पुरुष आधिपत्य को चुनौती दी; उसको भाषा और लिपि पर आधिपत्य रखने वाला वर्ग उन स्त्री लेखिकाओं की अभिव्यक्ति को भाषाई रूप में लिपिबद्ध नहीं किया या उपेक्षा के गर्त में हमेशा के लिए छोड़ दिया, जहाँ से वे हमेशा के लिए खो गईं।


संर्दभ :

 [1] पाण्डेय, मैनेजर; आत्मा का आईना, हंस, 2008, पृष्ठ-30 
[2] http://kavitakosh.org/kk/मो_सम_कौन_कुटिल_खल_कामी_/_सूरदास    
[3] तुलसीदास, कवितावली; गीताप्रेस गोरखपुर, आठवां संस्करण, 1950, पृष्ठ- 136 
[4] तुलसीदास, विनयपत्रिका; संपादन, देवनारायण द्विवेदी, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, द्वितीय संस्करण, 1962, पृष्ठ- 448
[5] कवि बनारसीदास की आत्मकथा, (2006), ज्ञानचन्द जैन, विश्वविद्यालय प्रकाशन, आवरण पृष्ठ 108
[6] वही, पृ-72
[7] कवि बनारसीदास की आत्मकथा, (2006), ज्ञानचन्द जैन, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
[8] उपाध्याय, भरत सिंह; थेरीगाथा, पृष्ठ- 18
[9] राजे, सुमन; हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, पृष्ठ- 95
[10] वही, पृष्ठ- 90
[11] त्रिपाठी, राधावल्लभ; संस्कृत साहित्य का समग्र इतिहास, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन वाराणसी, प्रथम संस्करण, 2020, पृष्ठ- 456
[12] राजे, सुमन; हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ- 79
[13] वही, पृष्ठ- 103
[14] पल्लव (सं०); मीरा:एक पुनर्मूल्यांकन; आधार प्रकाशन, पंचकूला हरियाणा; प्रथम संस्करण, 2015, पृ.103
[15] Manushi (Editor); Madhu Kishwar January-June, 1989 Page- 42
[16] Tharu, Susie & K. Lalita; Women Writing in India; Pages- 107
[17] पडवल, डॉ. प्रमोद भगवान; और राजकुमार, बहिणाबाई के अभंग, तद्भव, अंक-2, मई, 2017, पृष्ठ- 140-14
[18] वही, पृष्ठ- 138-39
[19]
वही, पृष्ठ- 139 


पंकज सिंह यादव
अतिथि प्रवक्ता, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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