शोध आलेख : लोकजागरण और नवजागरण / विवेक कुमार तिवारी

लोकजागरण और नवजागरण 
विवेक कुमार तिवारी

शोध सार : भारतीय इतिहास और ख़ास तौर पर हिंदी साहित्य के इतिहास में दो ऐतिहासिक घटनाओं का युगांतरकारी महत्त्व है। ये घटनाएँ हमेशा चिन्तन और चर्चा के केंद्र में रहीं। इनमें पहले का सम्बन्ध मध्यकाल से है और दूसरे का सम्बन्ध आधुनिक काल से है। सर्वमान्य रूप से मध्यकाल से सम्बन्धित घटना कोलोकजागरणऔर आधुनिक काल से सम्बन्धित घटना कोनवजागरणकहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से इन घटनाओं की ख़ास बात यह थी कि इनकी व्याप्ति अखिल भारतीय थी। लेकिन जब हम हिंदी भाषा-भाषी समाज में जागरण की बात करते हैं, तब हमारे सामने भारत के हिंदी प्रदेश का जीवंत भूगोल ही उपस्थित होता है। सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि भारत की विविध भौगोलिक और भाषाई इकाईयों के अंतर के बावजूद भी एक अंत: सम्बन्ध इनके बीच मौजूद है। भले काल-प्रवाह की दृष्टि से विविध इकाईयों में ये घटनाएँ थोड़ा आगे-पीछे घटती रहीं, पर संवाद की दृष्टि से इनके मध्य कोई विशेष अंतर या दुराव नहीं है। अपने युग को आन्दोलित कर भारतीय समाज, संस्कृति और ज्ञान परम्परा के विकास तथा स्वत्व की पहचान को निश्चित करने के क्रम में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। पर इस सम्बन्ध में कुछ सवाल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। जैसे- लोकजागरण और नवजागरण की संज्ञाएँ क्या इनके चरित्र के अनुरूप ठीक हैं? वह कौन से तत्व थे, जो इन दोनों के बीच अंतर को स्पष्ट करते हैं? वह कौन से अंत: सूत्र थे, जो दोनों के मध्य समान रूप से काम कर रहे थे? किस प्रकार भक्तिकालीन लोकजागरण आगे चलकर नवजागरण के रूप में विकसित होता है? एक जागृत आन्दोलन के रूप में उन्हें सफलता मिली या असफलता? यह सब अध्ययन और विश्लेषण का विषय है। इस शोध आलेख में यथासम्भव इन सवालों को हल करने का प्रयास किया गया है।

बीज शब्द : लोकजागरण, नवजागरण, जनजागरण, मध्यकाल, आधुनिक काल, सामंतवाद, साम्राज्यवाद, राज्य-क्रान्ति, एनलाइटेंमेंट, रेनेसां, भद्रलोक, आन्दोलन, लोकधर्म, लोकभाषा, लोकजीवन आदि।

मूल आलेख : हिंदी साहित्येतिहास के मध्यकाल अर्थात् चौदहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी के कालखण्ड को भक्तिकाल और दो शताब्दियों के अन्तराल के बाद उन्नीसवीं शताब्दी से शुरू होने वाले कालखण्ड को आधुनिक काल के रूप में जाना-समझा जाता है। इन दोनों कालखण्डों के अन्तर्गत तद्युगीन परिस्थितियों के सापेक्ष भारतीय समाज में एक ख़ास किस्म की जागृति और स्वत्व विकास की प्रेरणा दिखाई देती है। इनकी अपनी कुछ जातीय विशेषताएँ थीं, जिन्हें लक्ष्य करते हुए डॉ० रामविलास शर्मा ने इन्हें लोकजागरण और नवजागरण की संज्ञाओं से अभिहित किया। लेकिन प्रथमतया तो प्रश्न यही उठता है कि लोकजागरण को लोकजागरण और नवजागरण को नवजागरण कहना क्या ठीक है? तात्विक रूप से देखा जाए तो मध्यकाल का जागरण केवल लोक का जागरण भर नहीं है। आचार्य शुक्ल जिसजनतापर इस्लाम के प्रभाव द्वारा भक्ति आन्दोलन के उद्भव की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं, उस जनता में लोक के साथ अन्य सभी वर्गों के जनमानस की चितवृत्ति शामिल है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जिसलोककी प्रधानता को स्वीकार करते हैं, वहाँ वे अन्य वर्गों को सीधे-सीधे खारिज़ कर देते हैं। भक्ति आन्दोलन के उद्भव की जो उनकी व्याख्या है, वह लोक और शास्त्र के संघर्ष को सूत्र रूप में व्याख्यायित करने का प्रयास है। दूसरी बात उन्नीसवीं शताब्दी का नवजागरण तो अधिकांश रूप में यूरोप केएनलाइटेंमेंटअथवाज्ञानोदयसे प्रेरित दिखाई देता है और जिसरेनेसांके आलोक में आधुनिक काल को नवजागरण कहा गया, उसकी असल प्रेरणा तो मध्यकाल के भक्ति आन्दोलन में लक्षित होती है।

            नामवर सिंह के अनुसार- “डॉ० रामविलास शर्मा ने पंद्रहवीं शताब्दी के भक्ति आन्दोलनलोकजागरणऔर उन्नीसवीं शताब्दी के सांस्कृतिक जागरण के लिएनवजागरणशब्द का प्रयोग किया है। इन शब्दों के बदले और नए शब्दों को गढ़ने की अपेक्षा इन्हीं शब्दों को प्रचलित करना बेहतर है और सुविधाजनक भी। लोकजागरण और नवजागरण से पंद्रहवीं शताब्दी और उन्नीसवीं शताब्दी की सांस्कृतिक प्रतिक्रियाओं के बीच परम्परा का सम्बन्ध भी बना रहता है और अंतर भी स्पष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त यूरोपीय इतिहास के अनावश्यक अनुषंग से मुक्ति भी मिल जाती है।[1] उपर्युक्त विचार में नामवर जी कोई ठीक-ठीक समस्या का समाधान नहीं बताते। पहली बात तो यह है कि लोक और नव शब्दों के मार्फ़त वे मध्यकाल और आधुनिक जागरण में सम्बन्ध तथा अंतर दोनों को व्याख्यायित कर देते हैं। दूसरी बात इन शब्दों के आलोक में यूरोपीय अनुषंग से दोनों जागरण को मुक्त भी बताते हैं, जबकि इसी लेख में लोकजागरण और नवजागरण सम्बन्धी उनके विश्लेषण एनलाइटेंमेंट और रेनेसां जैसे यूरोपीय प्रत्ययों से ही अंत: सम्बन्धित हैं।

            भक्ति आन्दोलन को यदिमध्यकालीन जागरणऔर आधुनिक आन्दोलन कोआधुनिक जागरणकहा जाए तो इसमें कोई विशेष समस्या नहीं दिखाई देती। साथ ही चौदहवीं शताब्दी और उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिक्रियाओं के बीच परम्परा का सम्बन्ध भी बना रहता है और अंतर भी स्पष्ट हो जाता है। बिना यूरोपीय प्रत्ययों के इनकी व्याख्या करने पर किसी विदेशी सन्दर्भ का प्रभाव भी नहीं रह जाता। आखिरकार भक्तियुगीन जागरण के समय यूरोप का समाज भारतीय समाज की तुलना में कम सभ्य और पिछड़ा था। आधुनिक जागरण भी पूरी तरह यूरोपीय प्रत्ययों से प्रभावित था, वह कुछ अंशों में प्रेरित भले था। ध्यान देने वाली बात यह है कि आधुनिक जागरण साम्राज्यवाद के प्रतिरोध में उपजा था, प्रभाव में नहीं। साथ ही अपने आन्तरिक सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताओं को हल करने के लिए भारतीय समाज स्वत: और अंत: प्रेरित हुआ था। हाल की कुछ मनगढंत स्थापनाओं ने इस तरह की वैचारिकी को पैदा किया है, जिसमें सब कुछ का श्रेय यूरोप को दे दिया जाता है। जैसे- वीरभारत तलवार पूरी स्पष्टताबोध के साथ यह स्थापना करते हैं कि- “भारतीय नवजागरण की खासियत यूरोपीय सम्पर्क से हासिल आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात् करके, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मुआफिक एक आधुनिक समाज बनाने की आत्म निर्भर कोशिशों में थी। नवजागरण की यह विशेषता 19वीं सदी के हिंदी-उर्दू प्रदेश में अपने सबसे कमज़ोर रूप में दिखाई देती है।[2] दरअसल वीरभारत तलवार की दृष्टि हिंदी प्रदेश के प्रति एक बनी बनाई सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पाती। जाहिर है इस स्थापना से उनका पहला मंतव्य है कि भारतीय नवजागरण यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान से प्रभावित और परिचालित था, दूसरा नवजागरण का असल रूप उन्हें बांग्ला नवजागरण में ही दिखाई देता है। ऐसा करते समय वो नवजागरण की अखिल भारतीय व्याप्ति को सिरे से खारिज़ कर देते हैं। तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात वे भूल जाते हैं कि हिंदी प्रदेश का नवजागरण भक्तिकालीन लोकजागरण के सबसे निकट और एक परम्परा के विकास के रूप में दिखाई देता है। भक्तिकालीन आन्दोलन के नायक निम्न वर्ग के किसान और मजदूर तबके के लोग थे। सत्तावन की राज्य-क्रांति करने वाले हिंदी प्रदेश के नायक भी इसी वर्ग से थे। जबकि बांग्ला नवजागरण के अग्रदूतों और नायकों का उद्गम वहाँ के भद्र और शिक्षित वर्ग से था। ध्यान देने वाली बात है कि बंगाल के भद्रवर्ग का लोक के साथ कोई सीधा सरोकार था।

            लोकजागरण और नवजागरण को एकदम अलग-अलग मानकर देखने से हम इन दोनों के असल चरित्र को स्पष्ट नहीं कर पाते। साथ ही मध्यकाल और आधुनिक काल के बीच जो अंतर्निहित जुड़ाव है, उसकी परम्परा से भी हम दूर भटक जाते हैं। इस विषय पर शंभुनाथ जी का कहना ठीक है- “भक्ति आन्दोलन और नवजागरण को एक दूसरे से विच्छिन्न करके नहीं, बल्कि निरंतरता में देखा जाना चाहिए। दोनों की समझ आपस में जुड़ी हुई है।[3] दरअसल दोनों जागरण कई स्तरों पर गहरे में जुड़ते हैं तो कई स्तरों पर इनके चरित्र में भिन्नताएँ भी स्पष्ट होती हैं। जुड़ाव की बात करें तो दोनों ही आन्दोलनों की व्याप्ति अखिल भारतीय थी। भक्ति आन्दोलन का मूल्यांकन करते हुए बच्चन सिंह ने लिखा है कि- “यह पहला भारतीय नवजागरण था जो कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से असम तक फैला हुआ था।[4] दोनों में समान बात यह थी कि दोनों में धर्म की अहम भूमिका रही। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीहिंदी साहित्य की भूमिकामें लिखते हैं- “जिन दिनों बौद्ध धर्म उत्तरोत्तर लोक-धर्म में घुल-मिल रहा था, उन्हीं दिनों ब्राह्मण-धर्म उत्तरोत्तर अलग होता जा रहा था।[5] द्विवेदी जी ने यहाँ लोक की शक्ति को रेखांकित किया है, जिसके आगे धर्म और पंथ भी झुकने को विवश हैं। लेकिन बौद्धों के घुलने-मिलने और ब्राह्मणों के अलग होने का कारण क्या था? ध्यान से देखा जाए तो बौद्ध मत की उत्पत्ति ही शास्त्र के विरुद्ध लोक के आवरण में हुई थी। आगे चलकर नागार्जुन आदि ब्राह्मणों के प्रवेश ने बौद्ध मत को भी एक जटिल धर्म बना दिया और उसे शास्त्रीय अनुशासनों में इस कदर बांधना शुरू किया कि भक्तिकाल की पूर्व पीठिका तक आते-आते वह खुद को पुन: लोक की ओर ले जाने को विवश होता है। इधर अधिकांश ब्राह्मण बौद्ध धर्म से निकलकर अपने सनातन धर्म के आधार ग्रंथों की टिकाएँ और भाष्य लिखना शुरू करते हैं। इसमें उनका केंद्रीय ध्येय इस्लाम और अन्य मतों के सामने खुद को श्रेष्ठ और सही सिद्ध करना था। शास्त्रीय ब्राह्मणों के बाहर निकलने पर बौद्ध मत का लोक की ओर झुकना बेहद स्वाभाविक बात थी।

            धर्म की प्रधानता भक्तिकाल के उदय के सन्दर्भ में भी है और यह सबसे महत्त्वपूर्ण है। आचार्य शुक्ल सीधे इस्लाम जैसे अन्य मज़हब के सापेक्ष भक्ति आन्दोलन को रखते हैं। आचार्य द्विवेदी जी शुक्ल जी के मतों का खण्डन करते हुए भी कहीं कहीं उनकी बातों से पूरी तरह इंकार नहीं कर पाते। सोलह आने में चार आने का स्वीकार दिलचस्प है। अपने विवेचन-विश्लेषण में आचार्य द्विवेदी, कई जगहों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस्लाम के प्रभाव को भी स्वीकार करते हैं। अपनी पुस्तकहिंदी साहित्य : उद्भव और विकासमें भक्तिकाल को सांस्कृतिक द्वन्द्व का काल घोषित करते हुए वे लिखते हैं कि- “जिस काल से हिंदी साहित्य बनना शुरू हुआ, वह काल भारतीय इतिहास का बहुत ही उथल-पुथल और परिवर्तन का काल है। इस समय देश की केंद्रीय शक्ति क्षीण हो गई थी और पश्चिम सीमांत से मुसलमानों का आक्रमण हो रहा था।..इस बार का आक्रमण एक विशिष्ट धर्ममत और संस्कृति का भी आक्रमण था।[6] कुल मिलाकर भक्तिकाल के उदय और भक्तिकालीन लोकजागरण में धर्म एक अहम भूमिका निभा रहा था। इस सन्दर्भ में शिवकुमार मिश्र जी लिखते हैं कि- “जहाँ तक मध्यकालीन आन्दोलन का सवाल है, वह मूलत: एक धार्मिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के रूप में सामने आता है, सच पूछा जाए तो, अधिकांशत: एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में ही उसकी पहचान हमें होती है।[7]

            आधुनिक युग के नवजागरण में भी धर्म की अहम भूमिका रही। इस युग के नायक और साहित्यकार धर्म से गहरे में जुड़े थे। भक्तिकाल में सनातन धर्म इस्लाम के सामने खड़ा हुआ था तो आधुनिक काल में ईसाई मत के। हिंदी प्रदेश के नवजागरण में तो ईसाई धर्म के विरोध का स्वर सहज सुना जा सकता है। सत्तावन की राज्य क्रान्ति ही धर्म की अवमानना को लेकर शुरू हुई। भले बाद मेंधर्म हिंसा तथैव के अलोक में क्रान्ति के दौरान उन्हीं कारतूसों का प्रयोग विदेशी शासन के खिलाफ़ किया गया यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि धर्म अहम भूमिका में अवश्य था, लेकिन वही क्रान्ति का मात्र और मात्र कारण बिल्कुल नहीं था। बहरहाल भारतेन्दु युग और आधुनिक काल के लगभग साहित्यकार धर्म से जुड़े थे और उसपर लिख रहे थे। नवजागरण के अग्रदूत माने जाने वाले भारतेन्दु तो वैष्णव धर्म को भारत का राष्ट्रीय धर्म सिद्ध कर ही रहे थे। लेकिन बंगाल का अति शिक्षित भद्रलोक भी पीछे था, वह भी धर्म को अपनी भारतीयता और स्वत्व का प्रतीक मान चुका था। सन् 1840 ई० में ब्राह्मों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए अक्षय कुमार दत्त ने कहा था- “हम विदेशी शासन के अधीन हैं, एक विदेशी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, और विदेशी दमन झेल रहे हैं, जबकि ईसाई धर्म इतना प्रभावशाली हो गया है गोया वह देश का राष्ट्रीय धर्म हो। मेरा हृदय यह सोचकर फटने लगता है।[8] इस तरह धर्म लोकजागरण और नवजागरण दोनों में एक आधारभूत और महत्त्वपूर्ण प्रेरक तत्व था। शंभुनाथ जी के अनुसार- “इसमें संदेह नहीं कि भारत में नवजागरण धर्म के परिसर से बाहर नहीं निकल पाया। इस देश के लोग शुरू से धार्मिक थे।[9] असल अर्थों में जनजागरण की इन दोनों परिधियों में धर्म जनता के स्वत्व की पहचान बन चुका था। धर्म अब कर्मकाण्ड और बाह्याचार से ऊपर उठकर विरोधी शक्तियों के खिलाफ़ अखिल भारतीय आन्दोलन के सशक्त हथियार के रूप में काम कर रहा था।

            लोकजागरण और नवजागरण की एक बड़ी और ध्यान देने वाली समानता है, आन्दोलन के रूप में इसको चरितार्थ करने वाले नायक किसान और मजदूर वर्ग के लोग थे। अक्सर मूल्यांकन करते हुए लोग गलती कर बैठते हैं और किसान तथा मजदूर का अर्थ निम्न वर्ग की दलित जातियों से ही लेते हैं। जबकि किसान और मजदूर में उच्च तथा निम्न दोनों वर्गों के वे लोग थे, जिनका आर्थिक आधार कमजोर था और जो सामंती व्यवस्था द्वारा समान रूप से शोषित थे। भक्ति आन्दोलन में क्या तुलसी, मीरा, सूर के स्वरों को भुला दिया जाना चाहिए? ये तो उच्च वर्ण से सम्बद्ध थे। क्या भक्ति आन्दोलन की सारी लड़ाई अकेले कबीर और रैदास आदि संतों ने लड़ी थी? जो निम्न वर्ण से सम्बद्ध थे। समस्या यह है कि भक्ति आन्दोलन और नवजागरण का जो वैचारिक मूल्यांकन किया जाता रहा है, वह आज भी स्वस्थ और तटस्थ भाव से नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के खाँचे में ही किया जाता है। समग्रता में इनकी आलोचना प्रस्तुत नहीं की जाती। कहीं ऐसा जानबूझकर किया जाता है और कहीं इसके पीछे कुछ कारण भी होते है। जिसकी ओर संकेत करते हुए मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है कि- “भक्तिकाव्य की व्याख्या हिंदी आलोचना के लिए आज भी चुनौती है। इसका एक कारण है भक्तिकाल की अपार सृजनात्मक समृद्धि। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा की कविता एक व्यापक आन्दोलन से जुड़ी हुई है, लेकिन उन सबकी कविता एक सी नहीं है। उनमें से हरेक की कविता का अपना विशिष्ट रूप, रंग और स्वर है। एक की कविता से निकलकर दूसरे की कविता में प्रवेश करना लगभग कविता की दूसरी दुनिया में पहुँचना है।[10] आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ही विचारों के विकास के रूप में मैनेजर पाण्डेय भक्ति आन्दोलन को शास्त्र के विरुद्ध लोक के उत्थान की प्रक्रिया सिद्ध करते हुए लिखते हैं- “भक्ति आन्दोलन शास्त्रीय धर्म का विरोध करने वाले लोकधर्म के उत्थान का आन्दोलन है। उस लोकधर्म में उस युग के किसानों और दस्तकारों के विविध वर्गों-उपवर्गों की मिली-जुली भावनाओं की अभिव्यक्ति और दमनकारी सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध विद्रोह की चेतना है।[11] वे यह स्वीकार करते हैं कि यह आन्दोलन किसान और दस्तकारों के विविध वर्गों और उपवर्गों का था। जिसमें सभी वर्ण और वर्ग के लोग थे, जिनका सम्मिलित रूप से एक ही वर्ग था- शोषित का। उन्होंने सूर के काव्य में कृषक जीवन की विस्तार से चर्चा की है, जिसे ध्यानपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए। डॉ० रामविलास शर्मा नवजागरण की शुरुआत करने वाले सन् सत्तावन की राज्य क्रान्ति के नायकों के सन्दर्भ में लिखते हैं- “इस संग्राम की चौथी विशेषता यह है कि इसका नेतृत्व उन किसानों ने किया जो फौज में सिपाहियों और सूबेदार के रूप में काम कर रहे थे।..लड़ने वाले किसानों में केवल उच्च वर्ण के हिन्दू नहीं थे, उनके साथ निम्न वर्ण के सैकड़ों आदमी थे। हिन्दुओं के