शोध आलेख : भक्ति आंदोलन का क्षितिज : अंतर्दृष्टि और विमर्श / डॉ. प्रदीप त्रिपाठी

भक्ति आंदोलन का क्षितिज : अंतर्दृष्टि और विमर्श  
- डॉ. प्रदीप त्रिपाठी

शोध सार : भक्ति आंदोलन मूलतः जन-आंदोलन था। समय और समाज के सापेक्ष प्रत्येक क्षेत्रों में इसकी भाषा का स्वरूप जनोन्मुखी रहा। इस आंदोलन का मूल ध्येय सामाजिक संघर्ष और विषमता के मध्य समन्वय को स्थापित करना रहा है। यद्यपि इस आंदोलन की प्रकृति धार्मिक थी, किंतु इसका मूल स्वभाव और विस्तार मानवतावादी था।  भक्ति आंदोलन से जुड़े सभी संत मनुष्यता के पक्षधर थे। इस क्रम में रामानुजाचार्य से लेकर निम्बार्काचार्य, माधवाचार्य, रामानन्द, कबीर, रैदास, शंकरदेव, गुरुनानक, दादूदयाल, बल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, ज्ञानेश्वर, मीराबाई, तुलसी, सूरदास, नामदेव एवं तुकाराम आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। साहित्य के इतिहास को देखें तो भक्ति-आंदोलन पर केंद्रित कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी गई हैं, इस संदर्भ में अलग-अलग आलोचकों की अपनी स्वतंत्र धारणाएँ हैं। प्रस्तुत शोध-आलेख में भक्ति-आंदोलन पर केंद्रित पुस्तकों के कुछ महत्वपूर्ण सूत्रों से गुजरते हुए उनकी अंतर्दृष्टियों का निर्वचन करने का प्रयास किया गया है। इस कड़ी में मुख्य रूप से आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, शिवकुमार मिश्र, रामस्वरूप चतुर्वेदी, मैनेजर पाण्डेय एवं गोपेश्वर सिंह आदि की पुस्तकों के माध्यम से भक्ति आंदोलन विषयक विभिन्न मान्यताओं एवं दृष्टियों का विवेचन एवं विश्लेषण किया गया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध-पद्धति का प्रयोग किया गया है।

बीज शब्द : भक्ति-आंदोलन, सामाजिक संघर्ष, मानवतावाद, जन-चेतना, जागरण

मूल आलेख : भक्ति आंदोलन का लोकवृत्त बहुआयामी एवं बहुसांस्कृतिक है। समग्रता में देखें तो समन्वय की स्थापना ही इस आंदोलन का मूल ध्येय रहा है। इस आंदोलन ने अपनी व्यापकता के साथ सिर्फ जनमानस को प्रभावित किया बल्कि चिंतन के क्षेत्र कई नए दृष्टिकोण भी विकसित किए। भक्ति आंदोलन से संबंधित साहित्य-दृष्टियों में कई तरह के मतभेद सामने आए। यह मतभेद एकांगी नहीं हैं, जिसे किसी एक खाके में बांधकर देखा जा सके। ग्रियर्सन, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी की भक्ति के उदय के संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएँ हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तकभक्ति काव्य यात्रामें इसका सम्यक विवेचन किया है- “ग्रियर्सन के लिए भक्ति एक बाह्य प्रभाव है, रामचन्द्र शुक्ल के लिए बाहरी आक्रमण की प्रतिक्रिया है और हजारी प्रसाद द्विवेदी उसे महज भारतीय परंपरा का स्वतः स्फूर्त मानते हैं।” (रामस्वरूप चतुर्वेदी, भक्ति काव्य यात्रा, 2002) यद्यपि ग्रियर्सन कीईसाइयत की देनसंबंधी मान्यता आज उतनी प्रासंगिक नहीं रह गई है, फिर भी यह धारणा बहस की मांग करती है। भक्ति आंदोलन पर केन्द्रित आलोचनात्मक ग्रन्थों से गुजरते हुए यह कहा जा सकता है कि ग्रियर्सन की भक्ति आंदोलन के उदय संबंधी मान्यताईसाइयत की देनकी पुष्टि हेतु कोई ठोस और तार्किक आधार नहीं मिलता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तकहिंदी साहित्य उद्भव और विकासमें इसके अन्वेषण के संदर्भ में एक तथ्य जरूर मिलता है, किन्तु वह पूर्णतः विश्वसनीय नहीं जान पड़ता। हजारीप्रसाद द्विवेदी इस संदर्भ में लिखते हैं- “ग्रियर्सन का अनुमान है कि वह ईसाइयत की देन है। ईस्वी सन् दूसरी या तीसरी शताब्दी में नेस्टोरियन ईसाई मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों में बसे थे और रामानुजाचार्य को इन्हीं ईसाई भक्तों से भावावेश और प्रेमोल्लास के धर्म का संदेश मिला। यह बात एकदम गलत है। अब इस अटकल के सहारे स्थिर किए हुए मत पर कोई विश्वास नहीं करता। इसलिए इसका उत्तर देना बेकार है।” (हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य उद्भव और विकास, पृ. 58-59)

            आचार्य शुक्ल ने इस्लामी आक्रमण की प्रतिक्रिया पर विशेष ज़ोर दिया, साथ ही इस बात का भी समर्थन किया कि भक्ति आंदोलन की जो लहर दक्षिण से आई, उसी ने उत्तर भारत की परिस्थिति के अनुरूप हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्तिमार्ग की भावना भी कुछ लोगों में जगाई। ऐसे में आचार्य शुक्ल कीजनता की चित्तवृत्तिऔर हजारीप्रसाद द्विवेदी कीलोक-चिंताकी भावना एक ही है, इसे एकीकृत करते हुए समावेशी भाव से देखा जा सकता है। इन दोनों बहसों की धारणाएँ भले ही भिन्न हों, किन्तु रामविलास शर्मा का भक्ति आंदोलन विषयक मंतव्य दोनों मान्यताओं को एक सेतु के रूप में जोड़ता है। उनका मानना है किभक्ति आंदोलन एक जातीय और जनवादी आंदोलन है।इस संदर्भ में गोपेश्वर सिंह ने अपनी पुस्तकभक्ति आंदोलन और काव्यमें इसकी विस्तृत समीक्षा की है- “भक्तिकाल के बारे मेंइस्लामवालीटिप्पणी को रामविलास शर्मा उनकी अंतिम राय नहीं मानते। उनके अनुसार शुक्ल जी के जिस उद्धरण के आधार पर आचार्य द्विवेदी तथा बाद के उनके अनुयायियों ने यह स्थापित किया कि भक्ति साहित्य शुक्ल जी के अनुसार, इस्लाम की प्रतिक्रिया है, उसमें इस्लाम शब्द कहीं आया ही नहीं है। उसमेंमुसलमानतथामुस्लिम साम्राज्यजैसे शब्द आए हैं। जबकि द्विवेदी जी इसका खंडन करते हुए बड़े आत्मविश्वासपूर्वक यह कहते हैं- अगर इस्लाम भी आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता, जैसा कि आज है।” (गोपेश्वर सिंह, भक्ति आंदोलन और काव्य, पृ. 18)

            भक्ति आंदोलन विषयक बहस को समझने के लिए 1955 में प्रकाशित दो लेख जिसमें रामविलास शर्मा कासंत साहित्य के अध्ययन की समस्याएँऔर मुक्तिबोध कामध्ययुगीन भक्ति आंदोलन का एक पहलूको समझना जरूरी है। इसमें रामविलास शर्मा ने संत साहित्य के आधारों को लेकर भक्ति संबंधी पूर्ववर्ती मान्यताओं को परिष्कृत और उसमें कुछ जोड़ते हुए लिखा है कि- “इसका सामाजिक आधार जुलाहों, कारीगरों, किसानों और व्यापारियों का भौतिक जीवन है। संत साहित्य भारतीय साहित्य की आकस्मिक धारा नहीं है।मुक्तिबोध भी इस संदर्भ में काफी हद तक सहमत दिखाई देते हैं, जब वह भक्ति के उदय को ऐतिहासिक सामाजिक शक्तियों के रूप में जनता के दु: और कष्टों से उपजा हुआ स्वीकार करते हैं। इस तथ्य को मैनेजर पाण्डेय ने भी अपने ढंग से स्वीकार किया है। उनका मानना है कि- “भक्ति आंदोलन और उसके साहित्य का लगभग बारहवीं सदी से आरंभ होने वाले आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों से घनिष्ठ संबंध है। ... किसानों, शिल्पकारों आदि का समाज में प्रभाव बढ़ने के कारण ही दलित जातियों में विद्रोह की भावना जगी, जिसकी अभिव्यक्ति संत साहित्य में हुई।” (गोपेश्वर सिंह, भक्ति आंदोलन और काव्य, पृ. 29)

            मैनेजर पाण्डेय की पुस्तकभक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्ययद्यपि सूरदास और कृष्ण-काव्य पर केंद्रित है, किंतु भक्ति आंदोलन के आलोचनात्मक पक्ष को समझने के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण सूत्र है। इस पुस्तक में मैनेजर पाण्डेय ने प्रथम खंड के अंतर्गत भक्तिकाव्य: व्याख्या की समस्याएँ, स्त्री संबंधी दृष्टिकोण, भक्तिकाव्य और लोकधर्म एवं भक्तिकाव्य की विफलता के संदर्भ में कई महत्वपूर्ण संकेत दिये हैं। भक्ति काव्य की व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं- “भक्तिकाव्य के व्याख्याकारों के सामने एक कठिनाई और भी है। वह एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन की देन है, जिसकी जड़ें अपने समय के समाज और उसके इतिहास में बहुत दूर तक फैली हुई हैं। भक्तिकाव्य में उस समय के भारतीय समाज की वास्तविकताएँ हैं और उनकी आलोचना भी है, सामाजिक व्यवस्थाओं के चित्र हैं और व्यवस्था के बंधनों को तोड़ने की आकांक्षा भी है। सामंती सत्ता के अनेक रूप हैं और उनके आतंक के विरुद्ध निर्द्वंद्व निर्भयता भी है। उसमें कहीं शास्त्र की रूढ़ियों के अस्वीकार की घोषणा है, कहीं लोक के बंधनों की उपेक्षा का साहस है तो कहीं शास्त्र और लोक के बीच समन्वय का प्रयास भी है।” (मैनेजर पाण्डेय, भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, पृ. 23) इस व्याख्या के परिप्रेक्ष्य में देखें तो सभी भक्त कवियों की रचनाशीलता की प्रकृति भले ही अलग है, किंतु उनके मूल में सामाजिक परिवर्तन की छटपटाहट है। इन कवियों में कहीं धार्मिक कट्टरता और पाखंड का विरोध है तो कहीं जाति प्रथा के प्रति विद्रोह। इस कड़ी में नामदेव, एकनाथ तुकाराम, कबीर, सूर, तुलसी, एवं मीरा आदि का नाम उल्लेखनीय है।

            महत्वपूर्ण बात यह है कि मैनेजर पाण्डेय ने भी भक्ति आंदोलन के संदर्भ में इस्लाम के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव को अस्वीकार नहीं किया है। वह लिखते हैं कि- “कुछ लोग भक्ति आंदोलन को इस्लाम और मुसलमानी शासन की प्रतिक्रिया समझते हैं तो कुछ दूसरे उस पर इस्लाम का अत्यंत सीमित प्रभाव मानते हैं। जो लोग भक्ति आंदोलन को लोक जागरण का आंदोलन और जन संस्कृति की अभिव्यक्ति कहते हैं वे भी लोकजीवन और जनसंस्कृति के भीतर इस्लाम के सामाजिक सांस्कृतिक प्रभावों को अस्वीकार नहीं करते। लेकिन आश्चर्य की बात है कि ऐसे सभी आलोचक भक्तिकाव्य में उन प्रभावों की अभिव्यक्ति की उपेक्षा करते हैं। यह एक ऐतिहासिक वास्तविकता है कि भक्ति आंदोलन के काल में इस देश में इस्लाम मौजूद था और भारतीय समाज में मुसलमान केवल मौजूद ही नहीं थे, बल्कि शासक भी थे।” (मैनेजर पाण्डेय, भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य, पृ. 23-24) मैनेजर पाण्डेय की धारणा से आचार्य शुक्ल की मान्यता को विशेष बल मिलता है। समग्रतः यह बात पूर्णतः स्वीकृत है कि भक्ति आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में इस्लामी प्रभाव/ मुसलमानी आक्रांत को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

            भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण भारत और इसके अंतिम पड़ाव के रूप में उत्तर पूर्व के साथ इसका नैरंतर्य बहुत ही सामरिक रहा है। आज साहित्य के केंद्र में पूर्वोत्तर भारत की उपस्थिति भले ही हाशिये पर है, किंतु मध्यकाल की ऐतिहासिक साहित्य-यात्रा में पूर्वोत्तर भारत को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। वैष्णव भक्ति के सेतु के रूप में श्रीमंत शंकरदेव ने इस अलख को उत्तर-पूर्व के गाँव-गाँव तक पहुंचाने का कार्य किया। धर्म के साथ साहित्य एवं संस्कृति को जोड़कर शंकरदेव ने इस जन सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को बहुआयामी बनाया। कृष्णगोपाल के शब्दों में कहें तो श्रीमंत शंकरदेव ने साहित्य और कला के माध्यम से असमीया समाज को जिस तरह संगठित किया, वह अद्वितीय है।    

            आज भक्ति आंदोलन की बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही प्रासंगिक भी। एक ओर कई तथ्य समय-सापेक्ष धूमिल होते जा रहे हैं, दूसरी ओर नए तथ्य एक स्थिर बहस की मांग भी करते हैं। इस बहस को मैनेजर पाण्डेय सांस्कृतिक एवं सामाजिक दायित्व मानते हैं। समग्रतः एक बात स्पष्ट है कि सभी मान्यताओं के केंद्र मेंलोक की चिंताही सर्वोपरि है। यही कारण है कि लगभग विद्वानों ने इस कालावधि कोलोक धर्म की अभिव्यक्ति’, ‘लोक जागरण काल’, ‘लोकोन्मुख’, एवंजागरणकालजैसी संज्ञाएं दी। यहाँलोकऔरलोकधर्मकी धारणाएं भी एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के लोकधर्म का आधार तुलसीदास की सांस्कृतिक दृष्टि है और हजारीप्रसाद द्विवेदी का लोकधर्म कबीर की सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टि से संबद्ध है। इससे इतर हटकर नामवर सिंह ने लोकधर्म को जनसाधारण के विद्रोह की विचारधारा माना है। 

            भक्ति आंदोलन के संदर्भ में शिवकुमार मिश्र का चिंतन बहुत ही महत्वपूर्ण है।भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्यपुस्तक में शिवकुमार मिश्र ने भक्ति आंदोलन विषयक मान्यताओं में अंतर्विरोध और उसकी सीमाओं का सम्यक मूल्यांकन किया है। यह पुस्तक भक्ति काव्य पर केंद्रित अलग-अलग निबंधों का संग्रह है। भक्ति साहित्य को शिवकुमार मिश्र ने मार्क्सवादी दृष्टि से देखने की कोशिश की है, अपनी पुस्तक में वह इस बात को स्वीकार भी करते हैं। पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में वे लिखते हैं कि- “मार्क्सवाद ने मुझे भक्ति के इस काव्य को देखने की नई दृष्टि दी, और सच पूछा जाय तो भक्ति काव्य के प्रति मेरी अपनी आत्मीयता जिन आयामों पर है, उसे बरकरार और विकसित करने में मार्क्सवादी दृष्टि का ही प्रधान योग है।” (शिवकुमार मिश्र, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य, पृ. 09) अपनी पुस्तक में वह धर्म के संदर्भ में मार्क्स के कथन को उद्धृत करते हुए लिखते हैं- “धर्म पीड़ित प्राणी की कराह है, वह इस जगतहीन हृदय का हृदय है, ठीक उसी प्रकार जैसे वह आत्माहीन परिस्थितियों की आत्मा है। यह जनता के लिए अफीम है।धर्म के संदर्भों को लेकर मार्क्स का हमेशा अधूरा उल्लेख किया जाता है। भक्ति आंदोलन के संदर्भ में पीड़ित जनता के लिए धर्म और भक्ति एक जन सांस्कृतिक शक्ति थी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। धर्म के संदर्भ में मार्क्स का दृष्टिकोण भले ही अंतर्विरोधी हो, किंतु कहीं कहीं मार्क्स इस बात को स्वीकारते भी हैं कि धर्म सामूहिकता का एक पर्याय भी है। इस बात की पुष्टि मार्क्स के ही एक कथन से की जा सकती है- “धर्म वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति और वास्तविक पीड़ा के विरुद्ध प्रतिरोध की भी अभिव्यक्ति है।” (शिवकुमार मिश्र, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य, पृ. 18)

            भक्ति आंदोलन की परिणति और उसकी विफलता के संदर्भ में भी विद्वानों के अलग-अलग मंतव्य हैं। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए मुक्तिबोध की भक्ति विषयक तीनों स्थापनाओं को समझना नितांत आवश्यक है। शिवकुमार मिश्र लिखते हैं कि- “गजानन माधव मुक्तिबोध ने भक्ति आंदोलन को मूलतः ऊंची कही जाने वाली जातियों के खिलाफ़ निम्न वर्गों तथा जतियों के आवश्यक विद्रोह के रूप में देखा है, गोकि समय के अपने तकाजे से भक्ति आंदोलन में ऊंची जातियों के भक्तों तथा संतों का भी योग रहा और उन्हें निम्न वर्ग के लोगों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देनी पड़ी। मुक्तिबोध की दूसरी स्थापना यह है कि भक्ति आंदोलन में ऊंच और नीच दो प्रकार के संतों और भक्तों का योग रहा, जहां तक सामाजिक भेदभाव तथा मानव एकता की मूलवर्ती आस्था का सवाल है, निम्न कहे जाने वाले संतों का योगदान अधिक भास्वर है। मुक्तिबोध की तीसरी और महत्वपूर्ण स्थापना यह है कि भक्ति आंदोलन में उच्च वर्गों का प्रभाव शनैः शनैः मजबूत होता गया और भक्ति आंदोलन के बिखरने तथा अपना वास्तविक ताप खो देने का यह एक महत्वपूर्ण कारण है।” (शिवकुमार मिश्र, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य, पृ. 22)  निश्चित रूप से भक्ति विषयक मुक्तिबोध की तीनों स्थापनाएँ उल्लेखनीय हैं, किंतु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस आंदोलन ने सिर्फ भारत में विभिन्न राष्ट्रीय इकाइयों के उदय को संबल प्रदान किया बल्कि राष्ट्रीय भाषाओं और साहित्य के उत्थान में भी नए मार्ग प्रशस्त किए।

            भक्ति आंदोलन पर केंद्रित साहित्य-चिंतन बहुत ही समृद्ध है। इसका फ़लक बहुआयामी है। चन्दन कुमार द्वारा सद्य: संपादित पुस्तकश्रीमंत शंकरदेव : जीवन और दर्शनमें भक्ति आंदोलन की प्रासंगिकता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। कृष्णगोपाल जी के हवाले से अपनी पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं- “हमारा बौद्धिक दायित्व है कि हम देश के विभिन्न प्रान्तों एवं उनमें बोली जाने वाली भाषाओं और मान्यताओं में निहित भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक एकता के उन मूल्यों से संवाद करें, जो भारत भाव के हेतु हैं। इस उद्देश्य से भक्ति आंदोलन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है क्योंकि भक्ति आंदोलन एक अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण करता है, जिसमें देश में पहली बार प्रांत-भेद, भाषा-भेद, संप्रदाय-भेद आदि से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और मानवता की बात की गई है। सभी संतों और भक्तों के चिंतन में अखंड भारत की सोच है, सांस्कृतिक एकता की भावना है। आज हम पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चतुर्दिक जिस भारत भाव को जीते हैं तो उसके पीछे भक्तों और संतों का योगदान है।” (चन्दन कुमार, श्रीमंत शंकरदेव : जीवन और दर्शन, संपादकीय से उद्धृत) भक्ति आंदोलन ने संगठन एवं समन्वय की भावना को जागृत किया। आज के परिप्रेक्ष्य में किसी भी जन आंदोलन की यह सद्भावना अनुकरणीय है।

            भक्ति आंदोलन की बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही नवीन भी। इसकी सभी मान्यताएं समय-सापेक्ष पुनर्मूल्यांकन की मांग करती हैं। समता, समानता एवं समन्वय की स्थापना ही इस आंदोलन का मूल ध्येय रहा है, और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी है। मुक्तिबोध के हवाले से कहें तो- “किसी भी साहित्य का ठीक-ठीक विश्लेषण तब तक नहीं हो सकता, जब तक हम उस युग की मूल गतिमान सामाजिक शक्तियों से बनने वाले सांस्कृतिक इतिहास को ठीक-ठीक जान लें.... मुश्किल यह है कि भारत के सामाजिक आर्थिक विकास के सुसंबद्ध इतिहास के लिए आवश्यक सामग्री का बड़ा अभाव है।” (गोपेश्वर सिंह, भक्ति आंदोलन और काव्य, पृ. 25) प्रस्तुत लेख इस विषय के विवेचन एवं मूल्यांकन का महज एक अंश है, इस पर और अधिक चिंतन एवं लेखन की संभावनाएं शेष हैं।    


संदर्भ :
 
मिश्र, शिवकुमार. (2010). भक्ति आंदोलन और काव्य. नई दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन.
सिंह, गोपेश्वर. (2017). भक्ति आंदोलन और काव्य. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन.
पाण्डेय, मैनेजर. (2012). भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन.
चतुर्वेदी, रामस्वरूप. (2011). भक्ति काव्य यात्रा. नई दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन.
शर्मा, रामविलास (संपा.) (2013). लोकजागरण और हिंदी साहित्य. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन.
जैन, निर्मला (संपा.). (2009). साहित्य का समाजशास्त्रीय चिंतन. नई दिल्ली: हिंदी माध्यम कार्यान्वय      
     निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय.  
दास, श्यामसुंदर. (2016). कबीर ग्रंथावली. नई दिल्ली: प्रकाशन संस्थान.
श्रीनिवास, एम. एन. (2011). आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
बेलिंस्की, हर्जन, चेर्नीशेव्स्की एवं दोब्रोल्युबोव. (2004). दर्शन, साहित्य और आलोचना (अनु. : नरोत्तम
    नागर). लखनऊ: परिकल्पना प्रकाशन
पांडेय, मैनेजर. (2014). साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका. हरियाणा: हरियाणा ग्रंथ अकादमी.
पांडेय, मैनेजर. (2008). सूरदास. नई दिल्ली: साहित्य अकादेमी.
द्विवेदी, हजारी प्रसाद. (2014). हिंदी साहित्य उद्भव और विकास. नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.
कुमार, चन्दन (संपा.). (2022). श्रीमंत शंकरदेव : जीवन और दर्शन. दिल्ली: प्रभाकर प्रकाशन.

 

डॉ. प्रदीप त्रिपाठी
संपादक, कंचनजंघा पत्रिका, सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक 
ptripathi@cus.ac.in, 6294913900


चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

Post a Comment

और नया पुराने