शोध आलेख : प्रतिरोध की परंपरा और भक्ति आंदोलन का स्वरूप / सुरेश कुमार जिनागल

प्रतिरोध की परंपरा और भक्ति आंदोलन का स्वरूप
सुरेश कुमार जिनागल


शोध सार : भक्ति आंदोलन को लेकर विद्वानों में अनके अन्तर्विरोध रहे हैं और इसके उद्भव के कारणों पर अभी एकमत नहीं हो पाए हैं। प्रस्तुत आलेख में भक्ति आंदोलन के उद्भव के कारकों पर प्रकाश डालते हुए दक्षिण भारत में इसको उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों की जांच- पड़ताल की गई है। भक्ति-आंदोलन को दक्षिण भारत में उत्पन्न मान तो लिया जाता है परंतु संपूर्ण भारत में उसके फैलने की प्रक्रिया के स्वरूप के बारे में नहीं बताया जाता है। प्रस्तुत आलेख में भक्ति आंदोलन के तीन केंद्र- दक्षिणी भारत, पूर्वी भारत और उत्तर भारत को मानते हुए वहाँ की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के संदर्भ में उसकी गतिशीलता को देखा-परखा और समझा गया है। 

बीज शब्द भक्ति आंदोलन, भक्ति, भक्ति संप्रदाय, ब्रह्मणवाद, कैवर्त, अद्वैतवाद

मूल आलेख : कोई भी  इतिहासकार और साहित्यकार अपने समय, समाज, राजनीति और अर्थ से तो प्रभावित होता ही है साथ ही अपने विवेच्य समाज, राजनीति और अर्थ को उनकी गठित परिस्थितियों में भी देखता है। इन दोनों दृष्टियों में उचित सामंजस्य से ही सत्य तक पहुंचने की संभावना संभावित होती है। भारतीय इतिहास के मध्यकाल के बारे में प्रायः इतिहासकारों की दृष्टि एक पक्षीय रही है। उसको या तो वे आधुनिक संदर्भों से काट कर देखना चाहते हैं या फिर उसकी तात्कालिकता से। उनके इस दृष्टिकोण ने मध्यकालीन इतिहास के सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास को उलझा दिया है। इसमें तथाकथित 'भक्ति आंदोलन' के प्रति उनका नजरिया इसी दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द घूमता है। इसी कारण भक्ति के उद्भवों के संदर्भों पर हम अभी तक एकमत नहीं हो पाए हैं। रामचंद्र शुक्ल अपना हिंदी साहित्य का इतिहास भारत के अंग्रेजों की गुलामी के समय लिख रहे थे इसलिए उनका इतिहास लेखन औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से प्रभावित है। इसी दृष्टिकोण के चलते उन्होंने भक्ति को मुस्लिम आक्रमण की प्रतिक्रिया कहा।1  यह रामचंद्र शुक्ल के  विचारों के साथ-साथ उनके समय की भी सीमा थी। आगे चलकर हिंदी साहित्येतिहासकारों ने अपनी - अपनी विचारधारा और युग के परिप्रेक्ष्य में भक्ति को देखने का प्रयास किया। विशुद्ध इतिहासकारों ने भी इस पर अपना स्पष्ट मत व्यक्त करके उलझन को बढ़ाया ही किसी ने इसे भक्ति आंदोलन कहा तो किसी ने भक्ति संप्रदाय।2

भक्ति आंदोलन के उलझन पूर्ण बिंदु -

        जैसा कि ऊपर कहा भी गया कि- भक्ति आंदोलन को दृष्टिकोण-विशेष और युग परिस्थितियों के संदर्भ में व्याख्यित करने से उलझने बढीं हैं। इन उलझनों के बीच एक जो सर्व-सम्मति बनी वह यह कि-भक्ति-आंदोलन का प्रादुर्भाव दक्षिण भारत में हुआ और इसको उत्तर में लाने का कार्य रामानंद ने किया। दक्षिण में इस के उद्भव के कारकों में आलवारों और नयनारों को प्रमुख माना जाता है। परन्तु इसके उद्भव के पीछे ठोस कारणों का ज़िक्र नहीं किया जाता। जो कारण बताये भी जाते हैं वे तथ्याश्रित होने की बजाय अवधारणात्मक-अनुमान ही अधिक होते हैं। 'दक्षिण भारत की वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिसमें भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ' का स्पष्ट उत्तर इतिहासकारों के पास नहीं है। दूसरी बात - कहा जाता है कि दक्षिण से प्रभावित भक्ति का सोता संपूर्ण भारत में प्रवाहित हो गया। इतिहासकारों और हिंदी - साहित्येतिहासकारों के पास इस बात का कोई निश्चित उत्तर नहीं है कि भक्ति के संपूर्ण भारत में फैलने की प्रक्रिया क्या रही। भारत उस समय एक उपमहाद्वीप था और एक निश्चित सीमा रेखा में आबद्ध भी नहीं था। उस समय तो और भी नहीं  जब तथाकथित भक्ति आंदोलन का प्रादुर्भाव माना जाता है। बकौल रोमिला थापर उत्तर भारत की स्थिति - "गुप्तों के उपरांत उत्तर भारत चार प्रमुख भागों में बंटा हुआ था। ये राज्य- थे मगध में गुप्त राज्य, मौखरियों और पुष्यभूतियों का राज्य तथा मैत्रिकों का राज्य "दक्षिण भारत की स्थिति के बारे में थापर कहती हैं- "दक्षिण में इस समय बादामी के चालुक्य कांचीपुरम में पल्लव और मदुरई में पांड्या शासनरत थे" पूर्वी भारत की स्थिति भी कमोबेश यही थी। इस प्रकार हर राज्य की अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां थीं। भारत में सल्तनत के आगमन से पूर्व तक उपरोक्त परिस्थितियाँ बनी रही। ऐसे में संपूर्ण भारत में एक जैसे आंदोलन की कल्पना कैसे की जा सकती है?

            पद्म पुराण में तथाकथित भक्ति आंदोलन के उद्भव के बारे में कहा गया है कि- "भक्ति द्रविड़ देश में उत्पन्न हुई कर्नाटक में बड़ी-चढ़ी, महाराष्ट्र में कुछ-कुछ फैली और गुजरात में अवनति को प्राप्त हुई5 इस कथन को आधार बनाया भी जाए तो भी हमें अनुमान पर ही अधिक आश्रित रहना पड़ेगा क्योंकि इसमें मात्र संकेत है। वह संकेत भी भक्ति के बारे में है कि भक्ति -आन्दोलन के बारे में। इन प्रदेशों की वास्तविक परिस्थितियों पर कहीं प्रकाश नहीं डाला गया है। दूसरी बात कि जब भक्ति गुजरात तक आते-आते अवनति को प्राप्त हुई तो ऐसे में फिर उत्तर भारत में उसका प्रचार-प्रसार कैसे हुआ? पूर्वी भारत में इसके  प्रचार की प्रक्रिया क्या रही? एक जिज्ञासु के मन में उपर्युक्त प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं।  इस संदर्भ में पद्म पुराण में एक और श्लोक प्राप्त होता है- “बंगाल में जन्म लिया मिथिला में प्रबलता प्राप्त की महाराष्ट्र में कुछ-कुछ प्रचलित हुआ और गुजरात में इसका अंत हो गया"6  प्रो. रामशरण शर्मा ने इसके अनुवाद के संदर्भ में तंत्र को अपस्थित किया है। उनका मानना है कि तंत्र का जन्म उपर्युक्त प्रक्रिया से हुआ। परंतु श्लोक के प्रारंभ में(स्वतंत्र) कहीं भी तंत्र शब्द का उल्लेख नहीं है। ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि यह श्लोक तंत्र के बारे में ही है? भक्ति वाले श्लोक में भी कहीं भक्ति का नामोल्लेख नहीं है। ऐसे में क्या नीचे वाले श्लोक को आधार बनाकर नहीं कहा जा सकता है कि भक्ति का प्रादुर्भाव पूर्व भारत में हुआ और फिर वह पूरे देश में फैली? पर यह भी अनुमान ही है।

            तीसरी बात कि भक्ति आंदोलन के उद्भावकों, प्रचारकों और संरक्षकों में परस्पर वैचारिक और सामाजिक भिन्नता दिखाई देती है। दक्षिण भारत में ही शंकराचार्य और अन्य वैष्णवाचार्यों के विचारों में परस्पर मतवैभिन्नय चरम पर था। उनको देखकर यह लगता है कि विभिन्न संप्रदायों का प्रादुर्भाव किसी सामाजिक, राजनीतिक पृष्ठभूमि में होने की बजाय आपसी प्रतिरोध के द्वारा अपने मत की पुष्टि के लिए हो रहा था। शंकर जहां अद्वैतवाद को लेकर चल रहे थे वहीं रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैतवाद को लेकर चलना चाहते थे। उत्तर भारत में भी सगुण और निर्गुण का आपसी द्वंद्व हमारे सामने उभर कर आता है। ऐसे में उन सभी को एक ही आंदोलन की धाराएं या विचार-सरणियां कैसे कहा जा सकता है? कबीर और तुलसी को एक ही धारा  में कैसे रखा जा सकता है और अगर कोई इस प्रकार का दु:साहस करता भी है तो यह कबीर की जनता के साथ घोर अन्याय है।

            चौथी बात यह है कि किसी ने इसे भक्ति आंदोलन कहा तो  किसी ने धार्मिक आंदोलन। किसी ने प्रतिरोध कहा तो किसी ने व्यवस्था की पुनर्स्थापना। इन उलझे हुए धागों के बीच सही बिंदु तक पहुंचना  मुश्किल काम है।

 भक्ति आंदोलन या पौराणिक धर्म की पुनर्स्थापना -

            उपर्युक्त तमाम उलझनों के बीच जब हम उस काल में पहुंचते हैं और साथ ही इतिहासकारों के मतों पर दृष्टिपात करते हैं तो अनेक प्रश्न सामने खड़े हुए दिखाई देते हैं। उनको नज़रंदाज़ किये बग़ैर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। जैसा कि पहले भी कहा गया है कि सभी ने माना कि भक्ति का उद्भव दक्षिण में हुआ। वहां अनेक संप्रदायों का उद्भव और विकास हुआ तदोपरांत भक्ति का प्रचार पूरे भारत में हुआ। उत्तर भारत में इसको कबीर, सूर, तुलसी, जायसी और मीरा ने  जन-जन तक पहुंचाया। पूर्वोत्तर में शंकर ने उसको विकसित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे में इस व्यापक भक्ति आंदोलन के स्वरूप को कैसे नकारा जा सकता है। कुछ तो ऐसा था तभी तो इतने संप्रदाय, उनके निर्माता और संत उस काल में हो रहे थे। अगर वह भक्ति आंदोलन नहीं था तो इन सभी की भूमिका को क्या निरर्थक समझा जाए? मध्यकाल में कबीर जैसे विचारक के योगदान को क्या नकार दिया जाए? इन सभी प्रश्नों के संदर्भ में तत्कालीन परिस्थितियों को समझते हुए विचार किया जा सकता है।

            छठी-सातवीं शती भारत में केंद्रीय सत्ता के विखंडन और आर्थिक विपन्नता का काल है। उत्तर और दक्षिण भारत छोटे-छोटे राज्य में बंट गया था। अपनी सत्ता को बचाने और दूसरे की सत्ता को हड़पने के लिए युद्ध अनिवार्य होते जा रहे थे। ऐसे में अर्थव्यवस्था में गिरावट स्वाभाविक है। प्रोफेसर रामशरण शर्मा स्थिति को चित्रित करते हुए कहते हैं कि "लगभग 650 से लेकर 1000 तक भारतीय उपमहाद्वीप के भागों  में सोने के सिक्कों का अभाव ही अभाव दिखाई देता है। सिक्कों के अभाव मे विदेशी व्यापार में बाधा पड़ी और गांव अलग-अलग रूप से अपनी जरूरतें पूरी करने को मजबूर  हो गए। अनेक छोटे-छोटे राज्यों की उपस्थिति के कारण व्यापारियों के लिए असंख्य चुंगी चौकियों पर शुल्क अदा करने की लाचारी खड़ी हुई जिससे व्यापार में और भी अड़चनें पैदा हुईं।"7  रुपयों की कमी ने भूमि अनुदान को बढ़ावा दिया। राजा अपने किसी सामंत को उसकी सेवा के बदले भूमि अनुदान देता था। अधिकांशतः यह भूमि अनुदान ब्राह्मणों को दिए जाते थे। ब्राह्मण उस पर मंदिर बना कर पूजा उपासना शुरू कर देते थे और मंदिर के अधीन आने वाली जमीन लगान पर दे देते थे। इससे उपसामंतीकरण की प्रवृत्ति का जन्म हुआ। चूंकि किसान ही सब की इच्छाओं की पूर्ति साधन था परंतु इस सामंती और उपसामंती व्यवस्था ने किसान का कचूमर निकाल दिया। ऐसी स्थिति में उसके पास विद्रोह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता था परंतु ब्राह्मण बहुत चालाक थे उनको लगता था कि कोई शिल्पी अगर इस कार्य को छोड़कर चला जाएगा तो उसके वापस आने की संभावना नहीं रहेगी। इसके लिए उन्होंने समुद्री यात्राओं पर ही रोक लगा दी। ब्राह्मणों को लगता था कि वे समुद्री यात्राएं करेंगे तो उनको कोई अधिक लाभ देकर अपने साथ भी मिला सकता है। दूसरे शिल्पी मिलना कठिन समझा जाता रहा होगा। ऐसे में शिल्पी अपने गांव से ही बन्धकर रह गये- "किसानों, दस्तकारों और व्यापारियों के अपने-अपने गांव से बंद जाने के कारण बंद अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला और स्थानीयता की भावना का जन्म हुआ जमीन से बंधे श्रमिकों, शिल्पियों, किसानों आदि के मालिक बदल सकते थे लेकिन हालत में बदलाव आने के सारे रास्ते बंद थे।"8 इन तमाम कारणों ने ही दक्षिण में कलभ्र किसान आंदोलन को खड़ा किया। कलभ्रों ने विद्रोह कर के दक्षिण में सत्ता हथिया ली और 75 वर्षों तक तमिल भूमि पर शासन किया। यह विद्रोह तत्कालीन आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का परिणाम था। इस समय एक तरफ तो किसानों और दलितों के शोषण हो रहे थे और दूसरी और भूमि अनुदान से दक्षिण में आर्यकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही थी बकौल रामशरण शर्मा "भूमि दानों के कारण कबायली क्षेत्रों का ब्राह्मणीकरण हुआ।"9  इस शोषण से मुक्ति का एक ही रास्ता था विद्रोह जो उन्होंने किया और सत्ता पर अधिकार जमाया। कलभ्रों ने ब्राह्मणों को भूमि अनुदान बंद कर दिया फलस्वरूप उनको-"मानवता का अभिशाप और सभ्यता का शत्रु कहा गया है और उन पर दान भोगियों के दखल की ब्रह्मदेय भूमि छीन कर वापस ले लेने का आरोप लगाया गया है। आठवीं-नवीं सदी के पांड्य अभिलेखों के अनुसार कलभ्र आक्रमणों के फलस्वरूप भोक्ताओं से दान में दी गई जमीन छीन ली और शूद्र लोग भी दान की जमीन पर दखल जमाने लगे।"10  कलभ्र विद्रोह ने निश्चित रूप से दक्षिण की पिछड़ी जातियों को प्रोत्साहित किया होगा अलवारों और नयनारों का ब्राह्मणवाद विरोध इसी विद्रोह का परिणाम कहा जा सकता है। यद्यपि आलवारों और नयनारों ने भक्ति के लिए क्रमशः विष्णु और शिव को चुना। इसके लिए कहा जा सकता है कि एक तरह से चली आती हुई व्यवस्था की पुनर्स्थापना ही थी फिर भी यह कहा जा सकता है उनमें से कुछ ऐसे थे जिन्होंने सीधे-सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती दी।

            दक्षिण में जो वैदिक विचारों को चुनौती मिलनी शुरू हुई तो वैदिक विचारकों के सामने अपने विचारों को पुनर्स्थापित करने की चुनौती आन पड़ी। अब उनको लगता था कि पहले की तरह सीधे-सीधे भक्ति संप्रदाय से टक्कर नहीं ली जा सकती। अपने विचारों को संशोधित करना पड़ेगा। इसी का परिणाम शंकराचार्य का अद्वैतवाद था। शंकर ने उपनिषदों से प्रेरणा ग्रहण की। वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना हेतु उन्होंने चारों दिशाओं में चार आश्रमों को स्थापित किया बकौल गणपति चंद्रगुप्त - "शंकराचार्य ने पुनः वैदिक धर्म के अभ्युत्थान तथा ज्ञान या चिंतन प्रधान धर्म की प्रतिष्ठा का प्रयास किया। उन्होंने उपनिषदों की परंपरागत विचारधारा की ओर अधिक स्पष्ट और नवीन रूप से व्याख्या करते हुए उस अद्वैतवाद का प्रचार किया जो भक्ति के अनुकूल पड़ता है।"11 "इस प्रकार एक ऐसे आंदोलन का प्रारंभ हुआ जो वैदिक दर्शन को उसकी अस्पष्टताओं और संगठनों से निकल निकाल कर उसे स्पष्ट तथा सर्वसाधारण के लिए स्वीकार्य बनाना चाहता था इसका सूत्रपात एक उच्च कोटि के दृष्टा ब्राह्मण शंकराचार्य के प्रयत्न से संगठित ब्राह्मण धर्म को नास्तिक मतों तथा लोकप्रिय भक्ति संप्रदाय द्वारा अधिकाधिक दी जाने वाली चुनौती का सामना करने के लिए हुआ था। केरल निवासी शंकराचार्य ने वेदांत शैली के एक नये व्याख्याता तथा अद्वैत दर्शन के प्रचारक के रूप में ख्याति प्राप्त की।"12 इस कथन से स्पष्ट है कि भक्ति का प्रादुर्भाव वैदिक धर्म को अस्पष्टताओं से निकालने के लिए नहीं बल्कि उस वैदिक  और ब्राह्मण धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था।

            किसी भी काल में जब एक विचार स्थापित हो जाता है तो उसके समानांतर अन्य विचार भी या तो उसके समर्थन में आते हैं या उसकी विरोध में। तत्कालीन समय में शंकर के अद्वैतवाद ने धूम मचाई। जिसकी प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक थी। इसकी प्रतिक्रिया में रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद को खड़ा किया। उनको लगा कि शंकर का मत पौराणिक धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है अतः वे शूद्रों को थोड़ी छूट देने के लिए तैयार हो गए। उनके मत में अब शूद्र जातियां भी हरी भजन कर सकती हैं परंतु व्यावहारिक स्तर पर वर्ण व्यवस्था ज्यों की त्यों  वर्तमान थी। स्वयं रामानुजाचार्य भी उसके समर्थक थे- "रामानुजाचार्य सारे विद्रोह विरोध के बावजूद वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था, सामाजिक मर्यादा, खानपान में भेदभाव के विरोधी नहीं थे समर्थक थे।"13  भक्ति संप्रदाय के प्रभाव से रामानुज ने शूद्रों के मंदिर प्रवेश का समर्थन किया परंतु शूद्रों का मंदिर में प्रवेश असंभव ही रहा।

            रामानुज के विचारों में हमें विरोधाभास दिखाई देते हैं। कहीं वे शूद्रों की मंदिर प्रवेश की वकालत करते हैं तो कहीं वर्ण व्यवस्था का कट्टरता से समर्थन करते जान पड़ते हैं। इस अंतर्विरोध का प्रमुख कारण तत्कालीन परिस्थितियों में प्राप्त होता है। दरअसल उस समय भूमि अनुदान की प्रथा अपने व्यापक स्तर पर प्रचलित थी, ब्राह्मणों को भी दान में भूमि ही प्राप्त होती थी उस पर काम करने वाली जातियां अधिकांशत: शूद्र ही थीं। वे जातियां ब्राह्मण की भूमि पर काम करती थीं। तब निश्चित ही उनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ होगा। शूद्रों की सामाजिक स्थिति के ऊपर नीचे होने के उस काल में अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसे में जिन जातियों का स्तर ऊपर उठ गया था उनके लिए मंदिर प्रवेश की वकालत करना कोई क्रांतिकारी कार्य नहीं था। इसमें अछूतों की स्थिति वही बनी रही। उस समय के शूद्रों में स्तर भेद थे। इसका का वर्णन करती हुई रोमिला थापर कहती हैं- "इस काल (900 से 1320 ) में शूद्रों का विभाजन शुद्ध- शूद्र जिनके स्पर्श से मनुष्य अपवित्र हो नहीं होता था एवं मलीन शूद्र जिनके मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी कि रूप में किया गया था।"14

            पौराणिक धर्म की पुनर्स्थापना के नाम पर आगे चलकर अनेक संप्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ भक्ति संप्रदाय जिसमें थोड़े बहुत प्रगतिशीलता के तत्त्व थे को भी इन पुनर्व्यवस्थापकों ने अपनी ज़द में ले कर उसका ब्राह्मणवादीकरण कर दिया, जिसके चलते दक्षिण के भक्ति संप्रदाय में वही पाखंड गएजिसका वे विरोध कर रहे थे। इस समय दक्षिण में अनेक मंदिरों की स्थापना हुई, भक्ति को भी राज्य का संरक्षण मिलने लगा और उस पर  ब्राह्मणवाद हावी हो गया। आगे चलकर इसी प्रक्रिया को विद्वानों ने भक्ति आंदोलन माना और उसको रामानंद द्वारा उत्तर में लाने की उक्तियां बार-बार कही गईं। दक्षिण में हावी हुए ब्राह्मणवाद को रामानंद उत्तर में लाए इससे भक्ति आंदोलन के स्वरूप का अनुमान लगाया जा सकता है।

            हिंदी के साहित्येतिहासकार भक्ति आंदोलन के उद्भव और प्रसार की प्रक्रिया को ठीक से नहीं समझ पाए। इसलिए अनेक विरोधाभासी मत प्रस्तुत किये गये। एक ओर वे भक्ति आंदोलन का उद्भव दक्षिण से मानते हैं और उसको उत्तर में लाने का श्रेय रामानंद को देते हैं तथा कबीर आदि को रामानंद का शिष्य बतलाते हैं तो दूसरी ओर कबीर पर सिद्धों और नाथों का प्रभाव भी दिखाते हैं। एक विचार जो दक्षिण से आता है उसको भक्ति आंदोलन का मूल माना जा रहा है तो दूसरी ओर कबीर को पूर्वी भारत में उत्पन्न सिद्धों-नाथों के विचारों से  प्रभावित भी बतलाते हैं। दरअसल ये तथाकथित विद्वान नामधारी मध्यकाल को सही तरीके से समझ ही नहीं पाए हैं। 

           पूर्वी भारत ने प्रगतिशीलता का हमेशा से नेतृत्व किया है। यहां ब्राह्मणवाद से सीधे-सीधे टक्कर लेने का कार्य बुद्ध और महावीर ने किया। आगे चलकर इन दोनों संप्रदायों के विचार पूरे विश्व में फैले भी परंतु ब्राह्मणवाद ने इन दोनों में प्रवेश कर उसी पाखंड को प्रश्रय दिया जिसका विरोध करते थे। आगे चलकर  पाल शासकों के समय यहां कैवर्त(केवट) विद्रोह भी हुआ। माना जाता है कि कैवर्त वहां की मल्लाह जाति है- “पूर्वी भारत में कैवर्त विद्रोह का उल्लेख किया जा सकता है। ये लोग पेशे से मछुआरे और कृषक थे। इस कबीले को ब्राह्मणीय  समाज ने निम्नस्थ वर्णसंकर जाति के रूप में स्थान दिया गया था। मनु  के अनुसार कैवर्त मल्लाह थे।"15  मल्लाहों के इस विद्रोह को ब्राह्मणवाद के विरुद्ध माना गया है इसके साथ ही मत्स्येंद्रनाथ को भी मछुआरा माना जाता है। हो सकता है इसी विद्रोह से प्रभावित होकर पूर्वी भारत की निम्न समझे जाने वाली जातियों ने ब्राह्मणवाद के विरोध में अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया। मत्स्येंद्रनाथ को 84 सिद्धों में से एक माना जाता है। सिद्ध सहरपा द्वारा ब्राह्मणवाद का विरोध तो प्रसिद्धि ही है। इस काल में दक्षिण की बजाय पूर्वी भारत में पाखंडों का विरोध अधिक हो रहा था। दक्षिण में जहां पौराणिक धर्म की पुनर्स्थापना का कार्य हो रहा था वहीं पूर्वी भारत में विरोधी तेवर अधिक थे। इसी कारण आगे चलकर रामचंद्र शुक्ल ने सिद्धों को अपने इतिहास में महत्त्व नहीं दिया। विद्वानों ने इनके विचारों को जनता से कटा हुआ, रहस्यमय, संध्या-भाषा पता नहीं क्या-क्या कहा- "कुछ विद्वानों में तंत्र संप्रदाय के प्रतीकात्मक तथा दार्शनिक पहलुओं पर जोर देने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जिसका मतलब यह होगा कि यह संप्रदाय सिद्ध साधकों के संकुचित दायरे तक सीमित था किंतु प्रकाशित ग्रंथों की विषय वस्तु से मालूम होता है की इन के अधिकतर हिस्से का संबंध लोगों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े आचार विचारों से है।16

            आगे चलकर गोरखनाथ ने सिद्धों और नाथों के विचारों को आगे बढ़ाया और संपूर्ण भारत भर में अपने विचारों को फैलाया। राजस्थान तक उनका प्रभाव आज तक देखा जा सकता है। यद्यपि संत जहां भी हो रहे थे उस क्षेत्र की अपनी परिस्थितियां थी फिर भी कबीर ने गोरख के विचारों से प्रेरणा अवश्य ली थी। वर्ण व्यवस्था की चक्की में पिसती जनता के लिए गोरख के विचार मुक्ति दायक प्रतीत होते थे अत: कबीर का उनसे प्रभावित होना स्वाभाविक था।

            सिद्धों-नाथों के इन विचारों में प्रतिरोध के स्वर अधिक समय तक नहीं रहे। कलभ्रों के विद्रोह से घबराकर ब्राह्मणों ने उन्हें अछूत से सछूत कर दिया। अब उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार आया जिसका परिणाम था उनके प्रतिरोध की स्वर में कमी होना बकौल राम शरण शर्मा - "इस विद्रोह के फलस्वरूप कैवर्त जाति की कर्मकांडी स्थिति में सुधार हुआ। पहले ब्राह्मण कैवर्त का छुआ भोजन ग्रहण नहीं करता था और उसे अंत्यज कहा जाता था। लेकिन बाद में क्षत्रिय पिता तथा वैश्य माता से उनके उद्भव की कथा को काफी लोकप्रियता प्राप्त हुई और वह सत् शुद्र माना जाने लगा और कुछ ब्राह्मण संस्कार संपादित कर सकता था और जिसका छुआ भोजन स्वीकार किया जा सकता था।"17

            मानव स्वभाव की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि उसको जिस कार्य को करने से रोका जाता है उसी को करने का प्रयास करता है। निम्न समझी जाने वाली जातियों को जब ब्राह्मणीय कर्मकांड से रोका गया तो मुक्त होते ही वे उसकी तरफ शीघ्र ही आकर्षित होती थीं। कैवर्तों के साथ भी ऐसा ही हुआ उन्होंने भी ब्राह्मणीय कर्मकांडों को सीमित मात्रा में भी अपनाकर वैचारिक और कार्यात्मक प्रतिरोध के स्वर को धीमा कर दिया। जिसका प्रभाव सिद्धों और नाथों के वैचारिक प्रतिरोध पर भी अवश्य ही पड़ा होगा। इस प्रकार ब्राह्मणवाद ने धीरे-धीरे इनको भी हड़प लिया।

            उत्तर भारत में परिस्थितियां अलग थीं। यहां मुस्लिम शासकों की सत्ता स्थापित होने के बाद हुए परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप निम्न जातियों में प्रतिरोध के तेवर उभरे यद्यपि यहां पौराणिक धर्म को पुनर्स्थापित करने के प्रयास भी उसी तेजी से हो रहे थे फिर भी प्रतिरोध के स्वर भी उभर रहे थे। मुस्लिम शासकों ने दास प्रथा को प्रश्रय दिया। युद्ध में हारे हुए सैनिकों  या अन्य किसी भी तरीके से लोगों को गुलाम बना लिया जाता था। गुलाम होने वालों में अधिकांश जातियां निम्न होती थीं। गुलामों से कई प्रकार के कार्य करवाए जाते थे। जिनके पुश्तैनी कार्य जो थे उनको छोड़कर दासों को अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। इससे उनमें अतिरिक्त दक्षता को विकसित करने का मौका दिया। जब भी उनको मुक्ति का मौका मिलता था वे पुश्तैनी कार्य के साथ-साथ अपने नये कार्य को भी जारी रखते थे। धर्म परिवर्तन भी मुक्ति का सरल रास्ता था। धर्म परिवर्तन करके नए तरह के कार्य कर सकते थे। कुछ मुस्लिम शासक जबरदस्ती धर्म परिवर्तन भी करवाते थे पर यह कदम दस्तकारी के कार्य के लिए घातक होता था क्योंकि वह मन से उसको नहीं अपना सकता था। प्रो. इरफ़ान हबीब कहते हैं- "अल्पकालिक परिप्रेक्ष्य में विशेष क्षेत्रों में हस्तशिल्पी श्रम के अभाव को दूर करना आवश्यक था।  इसका एक संभावित उपाय यह पाया गया है- कि आजादी के साथ शहरों में रहने के लिए भारतीय दस्तकारों ने इस्लाम की दीक्षा ले ली। पर इसके बारे में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया हैं। इसके कहीं बहुत अधिक विश्वसनीय प्रक्रिया इसकी ठीक उल्टी थी अर्थात बहुत बड़ी तादात में लोगों को गुलाम बनाने की प्रक्रिया ताकि श्रमिकों को सस्ते रिजर्व बनाया जा सके और उनमें से नये दस्तकार निकाले जा सकें।"18  

            उत्तर भारत की इन दस्तकार जातियों ने ही ब्राह्मणवाद को चुनौती दी। इसके पीछे मुस्लिम सत्ता का प्रमुख योगदान था। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का मुस्लिम आक्रमण के परिणाम को नकारने के पीछे मुख्य कारण उत्तर भारत की प्रतिरोधी चेतना को हड़प लेने का प्रयास है। कबीर आदि के विचारों को स्वभाविक परंपरा का विकास कहकर पूरी ब्राह्मणवादी चेतना को निर्दोष साबित कर देना है।

          मुस्लिम सत्ता की स्थापना से ऐसा नहीं है कि सब कुछ अच्छा ही हुआ। इन परिवर्तनों से किसानों की कठिनाइयों में वृद्धि भी हुई। इस काल में बहुत सारे नए नगरों का विकास हुआ। नगरों में बैठे लोग किसानों की फसल पर ही आश्रित रहते थे बकौल इरफान हबीब- "सल्तनत ने जो चीज पैदा कि वह आधुनिक अर्थों में कोई सामाजिक क्रांति नहीं थी बल्कि खेतीहर शोषण की एक नई व्यवस्था की रचना थी जो नगरों के परजीवी विकास का आधार थी।"19  नगरीय लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नए-नए कर लगाने से किसानों की आर्थिक स्थिति में गिरावट आई- "खेतिहर परिवर्तनों ने किसानों को भी दबाव में कोई राहत नहीं पहुंचाई। भारी और अवरोही होने के कारण नए-नए भू कर निचले स्तर के किसानों को पीस कर दिया।"20  शोषण में पिसते किसानों के पास अपनी आवाज बुलंद करना स्वाभाविक ही था। इन परिवर्तनों ने यहां की जनता के विचारों में परिवर्तन उपस्थित किए। संतों द्वारा ब्राह्मणवाद और सामंतवाद का विरोध इसी का परिणाम था। कबीर एक जुलाहा होते हुए उनके विरोध में आवाज उठा रहे थे तो रैदास चमड़े का काम करते हुए अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। दूसरी तरफ पौराणिक धर्म के व्यवस्थापक अपने कार्य में लगे हुए थे। अपने धर्म की हानि होती देख संतों का विरोध कर रहे थे। सूरदास द्वारा भ्रमरगीत सार में निर्गुण का विरोध इसी का परिणाम है तो तुलसी द्वारा रामचरितमानस को अवधि में लिखना जनता तक पौराणिक विचारों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना था। इस काल में उपजिव्य काव्य अधिक लिखे गए इसका मुख्य कारण जनता को सरल भाषा में या उन्हीं की भाषा में पुराने विचारों को उपलब्ध करना था। इधर संत लोग संस्कृत जानते नहीं थे इसलिए उन्होंने जन भाषा का ही सहारा लिया इसलिए पौराणिकों के लिए जन भाषा का इस्तेमाल अनिवार्य हो गया- "पूर्ववर्ती उस धार्मिक साहित्य का अनुवाद करने की ओर भी रुचि बढ़ी जो पहले केवल संस्कृत में ही उपलब्ध था और जिसे अधिकांश व्यक्ति नहीं समझ सकते थे। इन ग्रंथों में सर्वाधिक प्रिय ग्रंथ महाकाव्य और पुराण थे और इसका कारण उनका वर्णनात्मक रूप था।"21   इस पूरी प्रक्रिया द्वारा तुलसी अपनी रणनीति में सफल हो गए। उन्होंने रामचरितमानस के माध्यम से संतों के विचारों को दबाने में सफलता हासिल की। भक्ति आंदोलन ने संतों की विचारधारा को दबा दिया। इसी के परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य को रीतिकाल जैसे साहित्य के दर्शन हुए। राम-भक्ति और कृष्ण-भक्ति के राधावाद का सहारा लेकर साहित्य के नाम पर व्याभिचार परोसा जाने लगा। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि- "राम रसिक शाखा के एक आचार्य बालअली ने तो यहां तक दावा किया है कि कृष्ण भक्ति में माधुर्य है ही कहां! वास्तविक माधुर्य भावना तो राम भक्ति में ही है क्योंकि कृष्ण को नायिकायें प्राप्त करने के लिए यत्न करना पड़ता था जबकि राजा होने के कारण राम को अनेक नायिकाओं तथा अन्य सुविधाएं स्वत: प्राप्त थीं।"22  इस प्रकार तुलसी के  ब्राह्मणवाद ने साहित्य की धारा को संतों से छीनकर एक बार फिर दरबारियों को सौंप दी।

          अलग-अलग क्षेत्रों की तात्कालिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुए परिवर्तनों को देखते हुए समस्याएं अभी भी सुलझी नहीं हैं। दक्षिण में आलवारों और नयनारों के विचारों में प्रतिरोध का स्वर दिखाई देता है तो उन्हीं के समानांतर शंकराचार्य और रामानुजाचार्य पौराणिक धर्म के समर्थक जान पड़ते हैं।सभी विद्वान दोनों विचारधाराओं के लोगों को 'भक्ति आंदोलन' के संत घोषित करते हैं। ऊपर कही गई बातों से यह तो निश्चित है कि दोनों को एक ही विचार-सरणी नहीं कहा जा सकता। तो फिर असली 'भक्ति आंदोलन' किसे माना जाए? पौराणिकों को या उनके विरोधियों को? उत्तर भारत में भी  दोनों तरह के विचारक दिखाई पड़ते हैं। हमारे विचार से 'भक्ति आंदोलन' उस प्रतिरोधी परंपरा का प्रतिरोध है  जिसने हमेशा से अपने अस्तित्व और अस्मिता को बचाए रखने के लिए प्रतिरोध की संस्कृति को विकसित किया।

 

संदर्भ :

  1. रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, संस्करण 2015 पृष्ठ 61
  2. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 28 वां संस्करण 2016, नई दिल्ली पृष्ठ-278
  3. वही, पृष्ठ 129
  4. वही, पृष्ठ 153
  5. उत्पन्ना द्रविड़ सहं वृद्धिं कर्णाटक गता। क्वचितक्वचिन्महाराष्टट्र गुर्जर जीर्णताम् गता।। (पद्म पुराण, अध्याय- 193 श्लोक-5), प्रोफेसर रामशरण शर्मा कृत 'पूर्व मध्यकालीन सामंती समाज और संस्कृति'(पृष्ठ-204)में आर. पी. चंद्रा कृत 'इंडो आर्यन रेसेज, राजशाही 1916, पृष्ठ 153, पाटलिपुत्र का उद्धरण
  6. गौडे प्रकाशित विद्या मैथिलैः प्रबलीकृता    क्वचितक्वचिन्महाराष्टट्र गुर्जरे प्रलयं गता।। वही.
  7. प्रोफेसर राम शरण शर्मा, पूर्व मध्यकालीन भारत का सामंती समाज और संस्कृति, राजकमल प्रकाशन,पहला संस्करण 1996,छठा संस्करण 2018 पृष्ठ 164
  8.  वही,पृष्ठ 165
  9.  वही, पृष्ठ 205
  10. वही, पृष्ठ 154
  11. गणपति चंद्र गुप्त, हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास ,प्रथम खंड (1154 से 1857), लोकभारती प्रकाशन दिल्ली, 2007,पृ.181
  12. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 28 वां संस्करण 2016, पृष्ठ 168
  13. विश्वनाथ त्रिपाठी,मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2015,पृ.31
  14.  रोमिला थापर, भारत का इतिहास, पृष्ठ 192
  15. प्रो. रामशरण शर्मा, पूर्व मध्यकालीन भारत का सामंती समाज और संस्कृति, पृष्ठ 154
  16.  वही, पृष्ठ 190
  17.  वही, पृष्ठ 156
  18. प्रो. इरफ़ान हबीब, मध्यकालीन भारत का आर्थिक इतिहास एक सर्वेक्षण, (हि. अनु नरेश नदीम) पांचवां संस्करण, राजकमल प्रकाशन 2017, पृष्ठ 21
  19.  वही, पृष्ठ 29
  20.  वही
  21. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, पृष्ठ 252
  22. गणपति चंद्र गुप्त, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, पृष्ठ 188


सुरेश कुमार जिनागल
शोधार्थी हिन्दी विभाग, काशी  हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
+91 81049 06286

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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