सम्पादकीय : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि(विशेषांक)

सम्पादकीय

सुप्रसिद्ध समाजवादी चिन्तक राममनोहर लोहिया ने राम, कृष्ण और शिव की लोकव्याप्ति को भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक वृत्त के पारंपरिक एवं ऐतिहासिक नैरन्तर्य के प्रतीक के रुप में देखा था। उनके राम नेपाल से लेकर श्रीलंका की अपनी संघर्षमय यात्रा के ज़रिए भारत को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ते हैं। श्रीकृष्ण इसी तरह सुदूर उत्तर–पूर्व से लेकर द्वारका की यात्रा के द्वारा भारत को पश्चिम से पूर्व तक जोड़ते हैं। भगवान शंकर अपने  कैलास मानसरोवर धाम से श्रीलंका स्थित अपने परम भक्त रावण द्वारा राम परिपथ का विस्तार नेपाल से आगे तिब्बत तक करते हैं। भगवान विष्णु के अवतार मान लिए गए  भगवान बुद्ध भक्ति की जिस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं उसका विस्तार भी श्रीलंका से लेकर चीन और उसके आगे तक है। राम-परिपथ, कृष्ण-परिपथ, शिव-परिपथ और  बुद्ध  -परिपथ दरअसल भक्ति आन्दोलन के व्यापक वृत्त के व्यास भी हैं, जिसकी परिधि देश की भौगोलिक सीमा के पार जाने की इच्छा और आकांक्षा से प्रेरित है। इस विशेषांक की संकल्पना के पीछे भक्ति आन्दोलन की इसी आकांक्षा से जुड़ने की कोशिश थी। वह  कोशिश जो कभी गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर के यहाँ  ‘भारतवर्ष की इतिहासधारा’ में  बुद्ध और कबीर की ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका के रूप में दिखाई पड़ती है। सूफी काव्यधारा में भारत के सांस्कृतिक भूगोल का विस्तार जिस सिंघलद्वीप तक दिखाई पड़ता है वह भी इस बात का प्रमाण है कि भक्ति आन्दोलन की समस्त धाराएँ भारतीय चित्तवृत्ति में जिस महामानव समुद्र का बिंब निर्मित कर रही थीं उसकी परिधि व्यापक है।


इस अंक के पहले आलेख में ही हमारे समय के प्रख्यात आलोचक एवं चिन्तक प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने ‘श्रीलंका में संस्कृत और पालि भाषा के संवर्द्धन’ शीर्षक आलेख में  नेपाल, थाईलैंड और श्रीलंका में संस्कृत और पालि के विस्तार पर विचार करते हुए भारत की सांस्कृतिक विरासत के व्यापक क्षितिज का जो विद्वतापूर्ण उद्घाटन किया है उससे यह प्रमाणित होता है कि राहुल सांकृत्यायन ने ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ में या फिर गुलेरी जी ने ‘कछुआ धर्म’ में हमारी जिस पराजयमुखी, ह्रासोन्मुखी वृत्ति का उल्लेख किया है वह निराधार नहीं है। समुद्र-यात्राओं से भयभीत होकर समुद्र को अपवित्र मानकर अपने आप में सिमट जाना एक आत्मघाती कदम था। आकस्मिक नहीं कि ‘पद्मावत’ और ‘रामचरितमानस’ समुद्र की लहरों का सामना करने का साहस करने वाले प्रबंध काव्य हैं। दोनों महाकाव्यों के महानायकों की समुद्र-यात्रा, समुद्र के अनुभव से वंचित हिंदी प्रदेश के लिए एक बड़ी चुनौती है। जायसी और तुलसीदास जानते थे कि तीन दिशाओं से समुद्र से घिरे देश का साहित्यिक-सांस्कृतिक बोध समुद्र  के अनुभव से दूर रहकर अधूरा और अप्रामाणिक होगा।


दूसरे आलेख में वर्णाश्रम की परिधि पर सदियों से किनारे रखे गए संत रविदास हैं -“जाकै कुटुंब सब ढोर ढोवत फिरहिं, अजहूँ बनारसी आसपासा” - मरे हुए जानवर का मांस खाने को लाचार जाति जिसे ‘ओछी’, ‘कमीनी’, ‘खलास चमार’ और ‘चमरिया’ जैसे  विशेषणों से नवाजा गया हो, ऊपर से तुर्रा यह कि रैदास और कबीर जैसे चिन्तक कवि इन ओछी जातियों में सिर्फ़ जैविक दुर्घटना की वजह से हैं। वास्तव में ये पूर्व जन्म के ब्राह्मण हैं  या फिर किसी ब्राह्मणी विधवा की संतान  हैं। सुपरिचित चिन्तक प्रो .अवधेश प्रधान ने डॉ. धर्मवीर का उल्लेख करते हुए उस मानसिकता को रेखांकित किया जिसके अनुसार संत -महात्मा का पूज्य होने के लिए ब्राह्मण जाति से प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध आवश्यक है। रैदास पर केन्द्रित एक दूसरे आलेख में प्रो. सुमन जैन ने उनकी विनम्रता और सदाशयता  को रेखांकित किया है। जन्मजात पवित्रता के अहंकार के खिलाफ़ जन्मजात अपवित्रता के बीच ज़ारी जंग में कर्म प्रधान विनम्रता के जिस मार्ग पर भक्ति आन्दोलन का विकास हुआ उसके अगुआ कवि संत रविदास हैं। 


तीसरे आलेख में मीराबाई के समर्थ आलोचक प्रो. माधव हाड़ा ने भक्ति कविता की पहचान पर पुनर्विचार के ज़रिये उस बुनियादी संकट पर विचार किया है जो भक्ति आन्दोलन को समझने की राह में  सबसे बड़ी बाधा है, “पारम्परिक वर्गीकरण और विभाजन बहुत सारे पारंपरिक वर्गीकरण, विभाजन, प्रवृत्तिगत विभाजन हमारे पास पहले से मौजूद हैं।  राम, कृष्ण, सगुण-निर्गुण, प्रेममार्गी, ज्ञानमार्गी, सूफीधारा, प्रेमाख्यान…बहुत सारे वर्गीकरण हमारे पास मौजूद हैं। एक अकादमिक की मुश्किल भी होती है कि वो सारे डिस्कोर्स को, आन्दोलन को एक वर्गीकरण में समझे। ये हमारी मजबूरी है, हम ऐसा देखते हैं, करते ही हैं लेकिन कभी-कभी वर्गीकरण एक आन्दोलन की आत्मा को समझने में बहुत बड़ा अवरोध ,बहुत बड़ी बाधा बन जाते हैं।” कबीर और मीरा निर्गुण भी हैं, लेकिन निर्गुण और सगुण का सुविधाजनक वर्गीकरण एक ऐसी ग्रंथि की तरह मन में  बैठा है कि हम चाह कर भी इस वर्गीकरण की परिधि से बाहर नहीं निकल पाते,  - “सबसे अधिक जो ज़ोर दिया गया है वह प्रपत्ति पर है। महत्त्व प्रपत्ति का ही है बाकी विभाजनों का कोई औचित्य नहीं.” भक्ति आन्दोलन की सार्वदेशिक और सार्वकालिक पहचान को समर्पित यह आलेख इस अंक की केन्द्रीय चिंता भी  है। 


प्रो. शशि मुदिराज ने लुसिये गोल्डमान की विश्व दृष्टि के सन्दर्भ में ‘पद्मावत’ के  स्मारक स्वरूप कालजयी विधान पर गंभीर विवेचन प्रस्तुत करते हुए इस निष्कर्ष की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि,- “पद्मावत के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध के द्वंद्व और दरार को इतिहास और मिथक, यथार्थ और फंतासी आदि अनेक रूपों में व्याख्यायित करने की चेष्टाएँ की गई हैं। वास्तव में यह उस भक्तिकालीन विश्व -दृष्टि और ट्रैजिक विज़न की साधना और प्राप्ति का संघर्ष है जिसमें अध्यात्म और मिथक के कुहासे को चीर कर जीवन -यथार्थ अपनी पूरी प्रखरता में व्यक्त हुआ है ट्रेजेडी का प्रायः समापन होता है मृत्यु में। ‘पद्मावत’ का अंत भी तीनों मानवीय सत्ताओं का अंत है।”


संत-साहित्य के सुधी मर्मज्ञ प्रो. नंद किशोर पाण्डेय ने दादू पंथ के ऐतिहासिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा है कि- “इनके शिष्यों-प्रशिष्यों ने अकादमिक दुनिया को सजाया-सँवारा .स्वयं की रचनाएँ तो निर्गुण मतानुसार लिखीं ही, संकलन-संपादन का महत् कार्य किया। वाणियों को लिखने की पद्धति विकसित की तथा उसके लिए काग़ज़-स्याही की व्यवस्था को सुलभ बनाया। इस कार्य को करते रहने के लिए अनेक प्रकार के यत्न किये, गुरु की वाणी के लेखन को पूजा भाव माना तथा  इसी कार्य को अपना जीवन लक्ष्य मानकर उसे करते रहे, करते चले गए … एक के बाद दूसरी, तीसरी, चौथी पीढ़ी आती चली गई। यह क्रम टूटा नहीं, फिर तो अनेक संतों द्वारा लिखी हुई वाणियों की भी प्रतियाँ तैयार हुईं। हिंदी संत-साहित्य में अनेक संप्रदाय हैं लेकिन वाणियों की प्रति तैयार कर उसके संरक्षण की व्यवस्था का जैसा उपक्रम दादूपंथ ने किया, वैसा किसी पंथ ने नहीं। काशी और उसके आस-पास के संतों-आचार्यों की वाणियाँ भी दादूपंथी संग्रह-ग्रंथों में सुरक्षित की गईं। आज जब प्रामाणिकता की चर्चा की जाती है तब दादूपंथी संग्रह ग्रंथों को ही स्वीकार किया जाता है|” दादू पंथ का यह योगदान भक्तिकाव्य को कालजयी बनाने में कितना बड़ा है इसपर अलग से कुछ कहने की ज़रुरत नहीं है।


सुपरिचित आलोचक प्रो. कृष्ण कुमार सिंह ने कबीर की उस घोषणा को प्रस्थान बिन्दु माना है जो यह कहने का साहस रखती है कि, “पंडित मुल्ला जो लिखि दिया, छाड़ी चले हम कछु न लिया।” कबीर की सबसे बड़ा वैशिष्ट्य उनके अनुसार, “स्मरण रखना चाहिए कि कबीर मध्यकाल के सर्वाधिक संवादधर्मी कवि हैं। उनका सारा काव्य मानव-समाज के साथ गंभीर संवाद की चेष्टा का काव्य है।” कबीर निर्गुनिया संतों की जाति पूछने वाले से चिढ़ते थे लेकिन उन्हें पता था कि माया के वश में वही लोग हैं जो जाति के आधार पर अपनी श्रेष्ठता के गुमान में श्रमिक जातियों को कमीनी जाति मानते हैं। काम करने वाली जातियाँ, कर्म के आधार पर बने विशेषणों से होते हुए गालियों की संज्ञा में कब तब्दील हो गईं, पता ही नहीं चला। संत रविदास को अपनी जाति को कमीनी कहे जाने का जितना दंश है उतना ही कबीर को भी -

 “तहाँ  जाहु जहाँ पाट पटंबर,
अगर चंदन घसि लीना
आइ हमारे कहाँ करौगी
हम तौ जाति कमीना”


आचार्य शुक्ल ने सिद्धों और नाथों के साथ-साथ बौद्ध और जैन साहित्य पर सहानुभूति पूर्वक विचार नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि वे सरहपा और गोरखनाथ जैसी महान विभूतियों के ऐतिहासिक और कालजयी महत्त्व को रेखांकित नहीं कर पाए। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि वे भक्ति-आन्दोलन की वास्तविकता और कबीर जैसी काव्य-प्रतिभा को पहचानने में चूक गए। भक्ति-आन्दोलन के लिए पूरब में जिस योग के खेत की चर्चा द्विवेदी जी ने की वह योग का खेत सरहपा और गोरखनाथ के सम्मिलित  प्रयास से निर्मित हुआ था। कबीर के यहाँ वे दोनों मौजूद हैं। गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर भारत की इतिहास धारा में बुद्ध और कबीर के द्वारा जिस ऐतिहासिक मोड़ की बात करते हैं उसके बीच सरहपा और गोरखनाथ की उपस्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।  वर्णाश्रम व्यवस्था में पददलित जातियों ने सरहपा और गोरखनाथ की वाणियों में जो उम्मीद  की किरण देखी, रविदास और कबीर उसी उम्मीद के विस्तार हैं…कमीनी समझी जानेवाली जातियों को मनुष्य समझने का विनम्र और आक्रोशपूर्ण प्रतिवेदन।


कबीर नई पीढ़ी के लिए आकर्षण के केंद्र में हैं| आकस्मिक नही कि इस अंक में कबीर केन्द्रित आलेखों की संख्या पर्याप्त  है| डॉ. सुजीत कुमार सिंह ने ‘कबीर मेला के बहाने अस्पृश्यता और साम्प्रदायिकता से जंग’ आलेख में वर्तमान समय में कबीर की प्रासंगिकता पर विचार किया है| वहीं धनंजय कुमार ने ‘कबीर और भगताही पंथ’ पर कबीर के मठों की वर्त्तमान स्थिति और राजनीति को उद्घाटित किया है


 प्रो. कमलानंद झा ने अपने आलेख में वैष्णव भक्ति आन्दोलन की मुख्यधारा के प्रसंग में शिवभक्ति के विलोपन के कारणों और निहितार्थ पर विचार किया है। इतिहास साक्षी है कि तमिल में भक्ति-आन्दोलन के विकास और विस्तार में वैष्णव आलवारों के साथ साथ शैवपंथ के नायनारों का योगदान किसी भी मायने में कमतर नहीं था। इन्हीं की एक शाखा का विस्तार कन्नड़ में संत बसवेश्वर के लिंगायत संप्रदाय के रूप में हुआ। उत्तर भारत में विद्यापति के यहाँ शैव-भक्ति आन्दोलन के उन्नायक के रूप में पर्याप्त संभावना थी। विद्यापति को मुख्यधारा से अलग रखकर हिंदी आलोचना ने उस संभावना पर विचार और शोध की संभावना पर भी विराम लगा दिया।


प्रो. अधीर कुमार ने अपने समय और समाज के परिप्रेक्ष्य में तुलसी के मानुष सत्य का मार्मिक साक्षात्कार प्रस्तुत किया है। प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने तुलसी दास को समर्पित एक अचर्चित आलोचना कृति के जरिये हिंदी आलोचना के उस मर्मी स्वरूप का उद्घाटन किया है जिसका इंतज़ार एक सुधी पाठक को सदैव रहता है।  


  प्रो. निरंजन सहाय ने कृष्ण काव्य के अद्वितीय रचनाकार रसखान को जिस तरह याद किया है वह अपने देश की उस समृद्ध विरासत का परिचय है जिसे टुकड़ों में बाँटकर समझना नामुमकिन है। 


प्रो. सुनील तिवारी ने अपेक्षाकृत उपेक्षित दरिया साहब  पर  लिखा है। दरिया साहब भी मुसलमान थे, पेशे से दर्जी। दरिया साहब ने अपने पुरखे संतकवि कबीर सहित नामदेव आदि को जिस तरह अपने काव्य में आदर सहितयाद  किया है वह भी भक्ति आन्दोलन की समृद्ध सांस्कृतिक परिधि का जीवंत प्रमाण है। 


प्रो. मुदिता तिवारी ने मन के परिष्करण और उन्नयन में संत रैदास के योगदान का आत्मीय अवलोकन किया है। प्रो. प्रभाकर सिंह ने उत्तर औपनिवेशिक विमर्श में भक्ति कविता के पुनर्पाठ जैसे नए विषय पर लिखकर भक्ति काव्य की प्रासंगिकता को पुनर्परिभाषित  किया है। 


प्रो. प्रदीप के. शर्मा ने असम में भक्ति  कविता पर लिख कर ब्रजबोली काव्य परम्परा की व्यापक परिधि का प्रामाणिक मूल्यांकन किया है। प्रो. नीलम राठी का आलेख भक्ति कविता के सांस्कृतिक परिधि और स्त्री दृष्टि इस विशेषांक की मूल अवधारणा के अनुरूप  है| प्रो. सी. अन्नपूर्णा ने भक्ति काव्य की दार्शनिक पूर्वपीठिका पर विचार किया है। प्रो. भुवन झा ने महामना मालवीय के धर्म और भक्ति चिंतन पर स्वाधीनता आन्दोलन के विशेष संदर्भ में विचार किया है। डॉ. भीम सिंह ने भक्ति काव्य और भक्ति आन्दोलन के अध्ययन की बहु-आयामी एवं अंतर-अनुशासनिक दिशाओं पर विचार की प्रस्तावना की है। डॉ. जितेन्द्र थदानी और प्रिया आडवानी ने मीरा के पदों में नवधा भक्ति की  भावभूमि पर लिखा है।   प्रो .प्रभाकरन हेब्बार इल्लत ने केरल के भक्ति आन्दोलन के पुरोधा कवि चेरुश्शेरी पर लिखा है। भक्ति आन्दोलन का एक दूसरा सिरा जो पूर्वोत्तर भारत के कवि शंकरदेव से जुड़ता है, उनके काव्य को केंद्र में रखकर अलग-अलग दृष्टिकोण से आलेख लिखे गए हैं।   डॉ.अंजू लता ने उनके काव्य का स्त्रीपक्ष के नज़रिये से मूल्यांकन किया है तो दिगंत बोरा ने उनके समकालीन हिंदी कवियों से तुलनात्मक अध्ययन किया है, वहीं बिभूति बिक्रम नाथ ने शंकरदेव कृत शास्त्रीय राग और ताल पर आधारित ग्रंथ ‘बरगीत’ और ‘भटिमा’ पर आलेख लिखा है। इसके अलावा प्रेम कुमार साव ने शंकरदेव के भक्तिकालीन साहित्य में अवदान पर लेख लिखा है। विद्यापति के साहित्य, समय और समाज को केंद्र में रखकर डॉ. प्रभात मिश्र और अंकित कुमार ने  गंभीर मूल्यांकन किया हैसंत रज्जब पर कीनाराम त्रिपाठी का आलेख  भी इस परिधि के विस्तार  को रेखांकित करता  है


  फादर कामिल बुल्के  तथा अन्य पश्चिमी विचारकों के किये शोध-कार्य पर डॉ. जे. आत्माराम ने शोधपरक आलेख लिखा है। वहीं, अजीत आर्या ने अपने आलेख में पश्चिमी विद्वानों द्वारा लिखे साहित्येतिहास ग्रंथों में कबीर के मूल्यांकन का आलोचनात्मक अध्ययन किया है। बिश्नोई पंथ के संस्थापक जम्भेश्वर द्वारा प्रतिपादित जाम्भाणी दर्शन में पर्यावरण, प्रकृति और जीवों के संरक्षण के संदर्भ में व्यक्त विचारों पर  प्रो. ओम प्रकाश सैनी ने सार्थक हस्तक्षेप किया  है


           भक्ति-आंदोलन में स्त्री  की उपस्थिति और अनुपस्थिति विचार का विषय भी है और चिंता का भी । स्त्री-संदर्भ में  डॉ.प्रियंका सोनकर का मध्यकालीन दलित संत कवयित्रियों पर लिखा आलेख,  डॉ.रेखा पाण्डेय और डॉ. घनश्याम कुशवाहा का मीराबाई के काव्य और जीवन पर, रानी रूपमती पर विनोद मिश्र ,मध्यकालीन स्त्री चेतना के प्रतिरोधी स्वर पर निम्मी सलोमी और उमंग बहाल का देवदासी जैसे लेख इस दिशा में एक नयी दृष्टि से साक्षात्कार कराते हैं


सुपरिचित कथाकार डॉ. प्रवीण कुमार का ‘रामचरितमानस में प्रेम और मर्यादा’ शीर्षक आलेख इस अंक में शामिल है| इसके अतिरिक्त   डॉ.राखी,  डॉ.दिपांशु पाठक और शेषांक चौधरी रामकाव्य परम्परा के अलग-अलग स्वरूपों  पर विचार करते हुए इस विशेषांक में शामिल हैं।


गुजरात, पंजाब, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के भक्ति-आन्दोलन को समर्पित विनीत कुमार पाण्डेय, मंजना कुमारी, पीयूष कुमार द्विवेदी, कैलाश पधान और पुष्कर बंधु के आलेख इस अंक की बुनियादी चेतना के अनुरूप भक्ति आन्दोलन के अखिल भारतीय स्वरूप   पर प्रकाश डालते हैं। द्रविड़ भक्ति आन्दोलन पर डॉ. धनंजय सिंह, डॉ. मृदुला पंडित, डॉ.पूजा गुप्ता, राहुल वर्मा और प्रशांत कुमार के आलेख  दक्षिण के भक्ति आन्दोलन के पुनर्पाठ की तरह देखे जा सकते हैं | 

आचार्य विनयमोहन शर्मा ने ‘हिंदी को मराठी संतों की देन’ नामक किताब में ब्रज-भाषा काव्य परम्परा का सदियों पुराना संबंध महाराष्ट्र से दिखाया था । महाराष्ट्र ने सदियों से हिंदी प्रदेशों का मार्गदर्शन किया है। भक्ति आन्दोलन में मराठी  संतों का मराठी के साथ साथ ब्रजभाषा में लिखना इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में भाषाई एकता  की पृष्ठभूमि मराठी संत कवि  निर्मित कर रहे थे। डॉ. प्रकाश कोपर्ड, डॉ. मुदनर दत्ता सर्जेराव, डॉ.पंकज सिंह यादव, प्रज्ञा शाकल्य ने अपने आलेखों में मराठी संत काव्य की इसी ऐतिहासिक भूमिका  का उद्घाटन किया है। 


भक्ति-आन्दोलन के जिस व्यापक परिधि की बात हो रही है, उसके केंद्र में ब्रज-भाषा काव्य की केंद्रीयता असंदिग्ध है। विकास शुक्ल, रूचि झा, नितेश यादव, चारुचंद्र मिश्र अपने-अपने शोधालेखों में ब्रज-भाषा काव्य के विभिन्न पक्षों पर हमारा ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं| 

 

भक्ति आंदोलन हिन्दी इतिहास लेखन के लिए एक चुनौतीपूर्ण विषय रहा है। हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की परम्परा में भक्ति-आन्दोलन से टकराये बगैर आप आगे बढ़ ही नहीं सकते। इस्लाम की प्रतिक्रिया का प्रश्न हो चाहे बारह आना बनाम चार आने की बात हो या फिर लोक बनाम शास्त्र का द्वंद्व हो। प्रो. बच्चन सिंह का यह कहना ठीक लगता है कि आचार्य शुक्ल की बात आधी  सच है और द्विवेदी जी की राय भी आधा सच ही है। जहाँ तक लोक बनाम शास्त्र की बात है वहाँ भी कई बार शास्त्र और लोक के जटिल रिश्तों की उपेक्षा  दिखाई देती है।गोस्वामी जी ने तो यह समाधान दे ही दिया था कि वेद और पुराण भी लोक की ओर देखने की बात करते हैं। भक्ति आन्दोलन के ईश्वर और शास्त्र खिन्न और गरीब लोगों से अलग रहकर कोई अर्थ नहीं रखते। भक्ति-आन्दोलन जिस व्यापक जनधर्मी  लोक-वृत्त का हिस्सा है, उस पर कई आलेख इस अंक में शामिल हैं। भक्ति आन्दोलन की परम्परा, इतिहास और आलोचना की समझ पर पुनर्विचार करती हुए नई पीढ़ी  इस आयोजन में शामिल है।  डॉ.संगीता मौर्य,  डॉ.अखिल मिश्र,  डॉ.शशिकला जयसवाल,  डॉ.दिवाकर दिव्यांशु,  डॉ.वर्षा कुमारी, डॉ. गुड्डू कुमार, कुमुद रंजन मिश्र,  डॉ.आराधना चौधरी , मनीष कुमार, सूरज रंजन,  प्रियंका प्रियदर्शिनी, मनीष कुमार यादव, अमित कुमार, विवेक कुमार तिवारी, सुरेश कुमार जिनागल, संगीता कुमारी और  निधिलता तिवारी  के आलेख इस कड़ी में इस बात के प्रमाण हैं भक्ति काव्य का आकर्षण समय के साथ कम होने की जगह बढ़ रहा है


 लोहिया जी अवध के किसान आन्दोलन में राम काव्य की ऐतिहासिक भूमिका से परिचित थे। रामायण मेले की संकल्पना के पीछे उनके मन में यही भाव रहा  कि राजनीति और संस्कृति के बीच एक अनिवार्य सम्बन्ध होता है। संस्कृति को इसीलिए वे दीर्घकालीन राजनीति मानते थे ।गांधी जी की   राजनीतिक संस्कृति  भक्ति आन्दोलन की देन थी। लोक आस्था को नकारकर जो राजनीतिक संस्कृति विकसित होगी उसका हश्र क्या होगा इसका इलहाम गांधी को भी था और लोहिया को भी। लोक में व्याप्त भक्ति, पर्व- त्यौहारों के मध्य देवी-देवताओं की मुख्य धारा से भिन्न जो छवियाँ हैं, उनपर रामजीवन भील और योगेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने शोधपूर्ण आलेख में विचार किया है। ये दोनों विद्यार्थी अभी एम .ए . में हैं। राधावल्लभ जी से  होते हुए इनकी उम्र के बीच जो फासला है वह लगभग तीन पीढ़ियों का है . लगभग अस्सी वर्ष के आयु वृत्त में विस्तृत  अस्सी से भी अधिक लेखों के विशेषांक के साथ मैं इस पत्रिका में शामिल सबके प्रति आभार प्रकट करता हूँ .  इस विशेषांक के लिए तीन सौ से भी अधिक आलेख प्राप्त हुए। यह संख्या उस उत्साह का परिचायक है जो अपने पुरखे भक्त कवियों के प्रति सम्मान और स्नेह के रसायन से निर्मित हुई है। जिनके लेख शामिल नहीं कर पाए उनसे क्षमा याचना के साथ इस पत्रिका के सूत्रधार भाई  माणिक और जितेन्द्र को धन्यवाद देता हूँ ।अपने पुरखों के प्रति शब्द पुष्प अर्पित करने के इस सहयोगी आयोजन में शामिल होने का अवसर उन्होंने दिया . किसान, प्रतिबंधित साहित्य के बाद इस तीसरे विशेषांक के लिए अतिथि संपादन का जो अवसर उन्होंने दिया है उसके प्रति धन्यवाद और आभार शब्द बहुत हल्के हैं


 अजीत आर्या , गौरव सिंह और श्वेता यादव ने सह -संपादक के रूप में  इस अंक के लिए जो परिश्रम किया उसी का सुफल इस अंक के रूप में आपके पास है


पुनश्च : प्रो .गोपेश्वर सिंह का साक्षात्कार इस अंक की एक विशिष्ट उपलब्धि है। गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी और  प्रो .नित्यानंद तिवारी सहित कुछ अन्य साक्षात्कार अभी प्रक्रिया में हैं । तकनीकी विलंब के कारण इस अंक के साथ प्रकाशित नहीं हो पा रहे हैं . इस अंक की मुद्रित  प्रति के साथ अवश्य उपलब्ध होंगे


भवदीय 

गजेंद्र पाठक

अतिथि संपादक


संपादकीय-2


मनुष्य का संज्ञान विस्मृति और स्मृति के मध्य में होता है। उसे किसी एक समय में कुछ याद रहता है तो कुछ भूल जाता है। आज के समय में भक्ति कविता के रूप में हमारे सामने मॉडर्न सजे–धजे कथावाचक, डीजे के साथ कान फोड़ने वाले भजन और दिव्य दरबार हैं, जो तत्काल भूत, वर्तमान और भविष्य को जान लेने का दावा करते हैं। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन जिस काव्य प्रवृत्ति के कारण पूरे मध्यकालीन साहित्य को ‘स्वर्णकाल’ कहते हैं उसके वर्तमान मायने ‘मनचीती राजनीति’ के कारण पूर्ण रूप से बदल गए हैं।


तुलसी, सूर, जायसी, कबीर, मीरा, शंकरदेव तथा नानक की कविता का स्वर आज के कोलाहल में खो-सा गया है। इसी विस्मृत होते जा रहे स्वर को फिर से पिरोकर एक संगीतमय धुन तैयार करने का काम ‘अपनी माटी ’ के इस अंक के माध्यम से किया गया है। माणिक जी पत्रिका के माध्यम से हमेशा साहित्य और शोध की थाती को समृद्ध करने के लिए अथक प्रयास करते हैं।


भक्ति कविता की सांस्कृतिक परिधि के अंतर्गत संपादक गजेंद्र पाठक  ने समस्त भारतीय भक्ति साहित्य की उस नब्ज़ को पुनः टटोलने का उपक्रम किया है। इसी सांस्कृतिक और भाषाई एकता की तलाश राधावल्लभ त्रिपाठी  ने अपने आलेख में की है। कलिंग विजय के बाद संसार की असारता का भाव जब अशोक के मन में आया तो उसने अपने पुत्र–पुत्री को श्रीलंका धम्म प्रचार करने के लिए भेजा। रामायण काल की कथा के बाद यह दूसरा बड़ा प्रयास था जब श्रीलंका से सीधा और सांस्कृतिक संबंध मज़बूत किया गया। जिस समय भारत में बौद्ध धर्म के केंद्र नष्ट होने लगे तो श्रीलंका में यह संस्कृत और पालि के ग्रंथ सुरक्षित रहे। भारतीय भक्ति आंदोलन की यही परिधि है। यहाॅं बनारस के रैदास और कबीर राजस्थान के लोकगायन में सुरक्षित मिलते हैं तो हरियाणा के गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ में। पैदल चलकर दुनिया नाप देने वाले संतों ने मौखिक परंपराओं में खुद को इतना रचा–बसा दिया कि आलोचना की दुनिया को एक शब्द गढ़ना पड़ा ‘प्रक्षिप्तता’ के नाम से। 


इसीलिए इस कविता की वर्तमान में पहचान करने, अध्ययन करते हुए उस पर पुनर्विचार करने के क्या टूल्स हो सकते हैं? उस पर माधव हाड़ा जी ने विचार व्यक्त किए हैं। वास्तव में हाड़ा जी की यह परिचर्चा एक बार विश्वविद्यालय में आयोजित एक व्याख्यान का लिप्यांतरित रूप है। इन्हीं प्रश्नों के साथ डॉ. भीम सिंह जी ने अपने आलेख में अध्ययन की उन दिशाओं की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है जिनमें भक्ति कविता के अध्ययन क्षेत्रों का  विस्तार करने की गुंजाइश है। देखा जाए तो  भक्तिकाव्य की देशज परंपराओं के आलोक में आज के शोध जिज्ञासुओं को अपनी दृष्टि विस्तार करने का अवसर यह आलेख देता है।


निर्गुण संतों में रैदास, दादू, नानक, कबीर आदि के मानवता, लोकप्रियता, श्रम-सौंदर्य के माध्यम से कई अन्य ज़रूरी सवालों के साथ विशेषकर स्वाधीनता आंदोलन में इस निर्गुण साहित्य की क्या भूमिका रही? इसमें कबीर को केंद्र में रखकर मनीष कुमार का विश्लेषण प्रभावी और उल्लेखनीय है। 


यह अंक भक्ति के अखिल भारतीय स्वरूप को समेटते हुए श्रीलंका, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, असम, बंगाल आदि के भक्ति साहित्य को अपने में स्थान देता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह अंक अखिल भारतीय स्वर को स्थान देते हुए गंभीरता से विश्लेषण और विवेचन करता है।


शोधार्थियों और विद्यार्थियों द्वारा विमर्शीय दृष्टि से प्रश्न उठाए जाते हैं, इन प्रश्नों को भी इस अंक में प्रमुखता से स्थान दिया गया है। प्रियंका सोनकर का ’दलित भक्त महिला रचनाकारों’ पर शोधपूर्ण आलेख भक्तिकाल की एक मात्र कवयित्री  मीरबाई के मिथ को तोड़कर उसका दायरा और व्यापक करने का काम करता है। इतिहासकारों की नज़रों से ओझल स्त्रीप्रश्नों के आलोक में भी देवदासी, पितृसत्ता के माध्यम से उस युग के शोषण की विभिन्न परतों की पड़ताल की गई है। इस युग में  एक ओर कृष्णभक्त मुसलमान कवि हैं जो मध्यकाल में किए जा रहे बाइनरी संदर्भों को तोड़कर एक सामाजिक समाज के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। तो दूसरी ओर विकास शुक्ल का आलेख उसमें पौराणिकता और अनुवाद के बाद आए तब्दीलियों की गहन जाॅंच करते हुए उसमें आए बदलावों को रेखांकित करते चलता है।


जायसी जैसे सूफी कवि कन्हावत की रचना कर कृष्ण का चरित रच रहे हैं, जिस कारण भक्ति साहित्य के विभाजन की राजनीति अपने आप कमज़ोर पड़ती दिखाई देती है। गोरख और कबीर के व्यक्तित्व की वह कौन सी विशेषता है? आज उसकी खोज की जानी चाहिए की जाति खोज लेने वाले समाज में इन दोनो की जाति तो छोड़िए धर्म को निर्धारित करने में आज भी इतिहासकारों/ आलोचकों को पसीना आ जाता है। गोरख–कबीर की इस निर्मित में भारत के बहुरंगी अतीत और वर्तमान को देखा जाना चाहिए। धार्मिक कट्टरता और उन्मादी नारों की गूॅंज के इस समय में यह अंक हमारी आधुनिक चेतना को अधिक आधुनिक बनाने में सहायक है। तुलसीदास, रहीम के कहने पर ‘बरवै छंद’ में रामायण लिखते हैं तो हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि तुलसी अपनी मानस पूरी कर देने के बाद एक मुसलमान को सबसे पहले सुनाते हैं। यह भक्ति काव्यान्दोलन की वह परिधि है जिसके अंतर्गत हम एकता को खोज सकते हैं और सामंजस्य को खोजकर वर्तमान को बेहतर बना सकते हैं। संत रज्जब की चिंताधारा आलेख में इसी एक्य की पड़ताल की गई है।


लोक ने आज ‘कबीर मेले’ के माध्यम से कबीर की शिक्षाओं को प्रत्यक्ष रूप से जीवित रखा है, सुजीत कुमार सिंह अपने आलेख में ‘कबीर मेले के बहाने अस्पृश्यता और साम्प्रदायिकता से जंग’ में इस प्रश्न को दोहराते हैं। कबीर को ‘राष्ट्रीय एकता के ब्रांड एंबेसडर’ के रूप में प्रस्तुत करने का जो काम ‘हौली’ ने किया है। यह मेला इसका जीवंत उदाहरण है।


अंक में वरिष्ठ और ख्यातिलब्ध आलोचकों/ अध्येताओं के मध्य में नये विद्यार्थियों को स्थान देकर प्रोफेसर गजेंद्र पाठक ने सबके प्रतिनिधित्व की पहल की है, जो कि एक सराहनीय प्रयास है। निश्चित ही हमारा ये साझा प्रयास भक्ति काव्य के अध्येताओं को पसंद आएगा।


सहसंपादक

अजीत आर्या

हिन्दी विभाग, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, तेलंगाना


संपादकीय-3 


भक्ति कविता के व्यापक वितान और उसके अखिल भारतीय स्वरूप के सन्दर्भ में साहित्य-अध्ययन के आरम्भिक दिनों से ही सुनता-पढ़ता रहा हूँ। बड़े से बड़े सिद्धांत एवं अवधारणा की पुनरावृत्ति एक तरह की स्वाभाविक उदासीनता को जन्म देती है। भक्ति कविता के सन्दर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी की अवधारणाओं की शताधिक पुनरावृत्तियों ने मेरे साथ यही किया। समय के साथ भक्ति आंदोलन की कुछ नई मार्क्सवादी एवं अस्मितावादी व्याख्याओं से परिचित होने के बाद बुद्धि को सोचने की कुछ नई सामग्री मिली। लेकिन कुछ समय के बाद भक्ति-कविता को लेकर अपनी समझ पर संशय होना शुरू हुआ।


 मैं अक्सर सोचता हूँ कि भक्ति कविता में ऐसा क्या है कि सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी यह कविता नहीं बीतती! इसने भारतीय समाज को इतने आदर्श नायक, संप्रदाय, मुहावरे, सूक्त-वाक्य और जीवन-मूल्य दिए कि यह लोकचित्त में रच-बस गयी। इस कविता ने अपनी अभिजात अहम्मन्यता में चूर होकर कभी आम जनता से यह नहीं कहा कि मेरे आस्वादान के लिये तुम्हें शास्त्रों का ज्ञान होना चाहिए या तुम्हें अपने बौद्धिक स्तर को ऊपर उठाना होगा। भक्तकवि अपनी विनम्र-शैली में तर्क, आस्था, मनुष्यता, सहानुभूति और विवेक का प्रसार आमजन के बीच करते रहे। उनके पास कविता का जो अथाह सागर है उसमें सभी के लिए मोती हैं। भक्ति कविता के आस्वादन के लिए किसी विशेषाधिकार या ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि जाति-वर्ग की सीमाओं को तोड़कर यह पूरे समाज में स्वीकृत हुई और काल की सीमाओं के पार जाकर सार्वकालिक बनी।


भक्ति-कविता के संदर्भ में विभिन्न आलोचकों-चिंतकों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। विभिन्न इतिहासकारों ने भी इस आंदोलन के उदय के आर्थिक-सामाजिक कारणों पर विचार किया है। इन सबके बावजूद भक्ति-कविता के संदर्भ में विचार करने की आवश्यकता बनी हुई है। ये ज़रूरी नहीं है कि किसी आंदोलन के उदय और विकास के आर्थिक-सामाजिक कारणों की समझ रखकर आप उस कविता को भी आत्मसात् कर सकें।


कविता का आत्मसातीकरण केवल दार्शनिक अवधारणाओं और आंदोलन की ऐतिहासिक व्याख्याओं की समझ से संभव नहीं है। आवश्यक है कि मूल कविता पर लौटकर ही कोई राय बनायी जाये। भक्त कवियों की ऐसी अनेक रचनाएँ अभी तक बची हुई हैं जिनपर शोध और पुनर्पाठ की आवश्यकता है। ‘अपनी माटी’ पत्रिका का यह अंक इसी दिशा में एक प्रयास है। इस अंक में अखिल भारतीय स्तर पर सभी भाषाओं तमिल, बाॅंग्ला, असमिया, पंजाबी, मलयालम, उड़िया आदि के भक्त-कवियों पर आलेख रखने का प्रयास किया गया है। साथ ही आधुनिक भारतीय साहित्य में भक्ति-कविता की विरासत के सूत्रों को समझने का प्रयास किया गया है। इस अंक के अतिथि  संपादक श्री गजेन्द्र पाठक जी का मैं हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ कि उन्होंने मुझे इस परियोजना का हिस्सा बनाया। इस अंक की संपादन-प्रक्रिया का हिस्सा बनना मेरे लिये भक्ति-कविता से साक्षात्कार का एक सुखद अवसर बना। 


गौरव सिंह

हिन्दी विभाग, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, तेलंगाना


संपादकीय-4


वास्तव में भक्तियुग के कवियों ने कविता के लिए कविता नहीं लिखी। उनमें से कई कवि ऐसे भी थे जिन्हें कविता के मानदण्ड आदि का तनिक भी ज्ञान न था। परन्तु उनकी कविता जीवन की अनुभूति मालूम हुई, जहाॅं अनुभूति का ढोंग नहीं, साक्षात् जीवन विद्यमान है। कवि जो कह रहा है वह केवल कविता की तरह नहीं आया है बल्कि उन कवियों ने अपने समय को स्पर्श करते हुए  जीवन के समाहार को रचा, जिसमें ‘मनुष्यता को बचाए रखना' सबसे ऊपर था। उन भक्त कवियों ने प्रेम का नमूना न पेश करके प्रेम को ही व्याप्त किया। सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि जहाॅं भक्ति, तमाम सख़्त विधि-विधानों से बद्ध थी वह अब लोक में प्रवेश करती है। साथ ही इस भक्तिकाल में चारणकाव्य भी अवरुद्ध होता है और यह भी सम्भव हुआ कि कविता जनसमाज के बीच से निकलना शुरू करती है। या कह लें कि ज़मीनी स्तर पर ऐसा पहली बार हुआ कि कविता जीवन की राह चली। लोकरंग और भारतीय संस्कृति की स्वाभाविक पहचान इन कवियों के यहां उपस्थित है। भक्तिकाल के लगभग सभी कवियों ने संस्कृति निर्माण की इस प्रक्रिया में भारतीयता के असली ढाॅंचे में ऊपरी मिलावट नहीं की। वह उनके यहाॅं बिलकुल वैसी ही मिलेगी जैसे समाज में गतिशील रही।


       भक्ति आन्दोलन में भारतीय संस्कृति की साझी विरासत का सबसे उन्नत रूप दिखाई देता है। यहीं आकर स्थायी रूप से कविता का उद्देश्य भी निश्चित होता है। इसके पहले प्रशस्ति-गान ही अधिक हैं। आप देखिए….कबीर का यह कहना कि - ‘सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोवै/ दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै।।’(कबीर) वहीं तुलसी कहते हैं ‘मांग कै खैबो, मसीत में सोइबो/ लैबों को एकु न दैबे को दोऊ।’ (तुलसी) भक्तिकाल में कवियों ने ऐसे रचा जैसे वे किसी अभियान की तैयारी में लगे हों। उन्होंने रुक रुककर चेताने का काम ख़ूब किया। अतः हम पाते हैं कि इस भक्ति आन्दोलन के कई रंग है। वहाॅं वेदना और संघर्ष के बीच जीवन का उल्लास है। किसी एक रंग में इसे देखना उसके वितान को संकुचित करेगा। किसी निश्चित खेमे में बाॅंधकर भी इसे नहीं देखा जा सकता। क्योंकि किसी का निर्गुण, कहीं सगुण, तो किसी का सगुण कहीं निर्गुण हो जाता है। तो यहाॅं कहने का अर्थ है कि सही मायने में भक्ति-आंदोलन के वास्तविक मर्म की समझ का निर्धारण, विभाजन से हटकर ही सम्भव है। इसी समझ की प्रक्रिया में आज यह विशेषांक महत्त्वपूर्ण बन सका है।


भक्ति आंदोलन लगभग नामदेव के पहले से शुरू होकर रीतिकाल के आने तक प्रभावी ढंग से चला। वहीं हम देखते हैं कि भक्तिकाल का प्रत्येक कवि किसी न किसी समस्या पर सवाल उठाता है। कबीर, जायसी हों या रैदास मीरा हों या फिर तुलसी, रहीम ही क्यों न हों। रैदास ने जाति भेद को तो मीरा स्त्री से जुड़े प्रश्न लेकर आती हैं। भक्तिकाल के इन कवियों के तेवरों में असहमतियाॅं मौजूद हैं और लहजे में आत्मविश्वास की पराकाष्ठा। भक्तिकालीन कवियों के काव्य में अपने समय की गवाही अधिक है। कबीर के यहाॅं तो यह सबसे अधिक आया है जिसके कारण उन्हें समाज-सुधारक की संज्ञा दी गई। इसी तरह मध्यकाल में स्त्री को वस्तु मात्र से अधिक नहीं माना गया, वैसे समय में मीरा का काव्य स्त्रीवाद के पहले ठोस आधार की स्थापना करता है।


           भक्तिकाल, बदलते हुए दौर या विषम परिस्थितियों का दस्तावेज़ है। जहाॅं इसके आरम्भ के १०० - २०० साल पहले से ही प्रमाण मिलने लगते हैं। जिसके सन्दर्भ में मतभेद भी बहुत हुए। लेकिन मुख्य बात जो सिद्ध है कि उन सभी परिस्थितियों को दरकिनार करते हुए भक्ति, दक्षिण से उत्तर में स्थापित हुई। हाॅं, यह ज़रूर कहा जा सकता है कि भक्तिकाल और मुगलकाल लगभग एक ही दौर में दिखाई दिए जहाॅं उत्तर भारत में सत्ता का हस्तांतरण हुआ, जिसका प्रभाव पूरे भारतीय समाज पर पड़ा जबकि यह बहुत पहले से ही होने लगा था। तथापि ऐसे कठिन समय में भक्तिकाल के कवियों ने साहस के साथ तमाम सामाजिक विसंगतियों का प्रतिरोध किया। जिसने भारतीय चेतना के निर्माण और इसके स्वरूप को अधिक व्यापक रूप दिया।


इस प्रकार अपने समय-विशेष की नब्ज़ को पहचानते हुए इन कवियों ने सही दिशानिर्देश किया। लेकिन इसी काल में ऐसे भी कवि हुए जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती है। जिन्होंने भक्तिकालीन प्रभाव को भारत के दूरदराज़ के कोने से देखा परखा। उन सबके बारे में स्थापित तौर पर एक दृष्टि इस विशेषांक की उपलब्धि है। दक्षिण-उत्तर से अलग इस भक्ति के रूप को पूर्व व पश्चिम ने कैसे पहचाना, इसमें यह शामिल है। भक्ति आंदोलन के कई अनछुए पहलुओं और उसके इतिहास को लेकर आज कई नए आयाम खुलते हैं। उन सभी बातों के संदर्भ में यह नया नज़रिया कैसा रुख़ अपनाता है, यह इस विशेषांक में दृष्टिगोचर है।


अतः इस अंक में यह कोशिश है कि भक्तियुगीन कवियों ने जिस संस्कृति को क्षण-क्षण सॅंजोया, उसका प्रत्यक्ष आज के दौर में हम कैसे देखते हैं। ख़ास बात ये है कि इस प्रत्यक्ष दर्शन की समझ में आज की युवा पीढ़ी और उसकी नई दृष्टि भी शामिल है। इस विशेषांक के मुख्य संपादक प्रो. गजेन्द्र पाठक जी के प्रति हार्दिक आभार अभिव्यक्त करती हूँ जिन्होंने भक्तिकालीन आंदोलन की यात्रा पर केंद्रित इस अंक का मुझे हिस्सा बनाया। उन सबके प्रति भी हार्दिक आभार जिन्होंने ‘अपनी माटी' पत्रिका के इस अंक हेतु अपने लेख भेजे। इस विशेषांक में लगभग ८५ से ऊपर लेख शामिल हैं, जिसमें भक्ति-आंदोलन को समझने का बेहतर और सारगर्भित विश्लेषण है।


श्वेता यादव

हिन्दी विभाग, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, तेलंगाना



चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

1 टिप्पणियाँ

  1. ऐतिहासिक, अनिवार्य और सार्थक विशेषांक के लिए गजेन्द्र जी, अजीत, गौरव और श्वेता को हार्दिक बधाई | संपादकीय, व्यापक चिंताओं और सांस्कृतिक बोध की गहनता लिए हुए है | 'अपनी माटी' की टीम का भी विशेष आभार |

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