चीकू के बीज : ग्रामीण ओलम्पिक : मेरे जीवन का नया अभ्युदय / सावित्री

चीकू के बीज
ग्रामीण ओलम्पिक : मेरे जीवन का नया अभ्युदय
- सावित्री


ग्रामीण ओलम्पिक खेल मेरे लिए देखने व खेलने के रूप में पहला खेल था, क्योंकि मैंने पहले कभी किसी खेल में न
 तो फॉर्म भरा और न ही कभी खेला। जब ओलंपिक खेल के लिए छः खेलों में फॉर्म भरे जा रहे थे, तब मैं ग्यारहवीं में पढ़ती थी। मैंने मेरा फॉर्म कबड्डी में भरवाया। साल-छः महीने बाद यह घोषणा हुई कि हमारे ओलंपिक अगस्त में होने वाले हैं। मैंने न तो कभी कबड्डी का मैच देखा और न ही कभी खेला। खेल के शुरू होने के दो या तीन दिन पहले पूरी छुट्टी लगने से आधे घंटे पहले हम खेलने की थोड़ी बहुत प्रैक्टिस का लेते। हमें कबड्डी के नियम तक पता नहीं थें। हमारे पीटीआई सर लड़कों को ही खेलाते हैं, लड़कियों को नहीं। जब हमने बार-बार कहा तो एक-आध बार खेलाया। हमारे कबीर जी सर जो क्लास टीचर भी हैं, ने लड़कियों तथा लड़कों दोनों को ब्लैक बोर्ड पर खेल के नियम बताएं और खेलना भी, अर्थात व्याख्याता होकर भी पीटीआई की भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से तीन दिन में कबड्डी की तैयारी हो सकी और थोड़ा कुछ सीख भी गए।

ओलम्पिक खेल शुरू होने के एक दिन पहले प्रार्थना सभा में प्रधानाचार्य जी ने फरमान जारी किया कि लड़कियाँ कबड्डी नहीं खेलेंगी। लड़कियों के लिए खो–खो का खेल है और कबड्डी लड़कों के लिए। लड़कियों को गुस्सा आया। हम लड़कियों ने तय कर लिया कि खेलेंगे तो कबड्डी वरना खेलेंगे ही नहीं। कुछ समय बाद पीटीआई सर ने कहा कि हमें लड़कियों की खो-खो और कबड्डी दोनों की टीम चाहिए जो अच्छा खेलेगी उसे मेच के लिए चुना जाएगा। हमारी उम्मीद फिर जगी। हम सोच रहे थें कि इतने लोगों के सामने कबड्डी के मैदान में कैसे उतरेंगे? मैं ग्रामीण ओलंपिक के दिन विद्यालय में पूरी तैयारी के साथ गई थी। मुझमें जोश आ रहा था कि हम ही जीतेंगे। विद्यालय में देखा कि सभी विद्यार्थी लोवर टी शर्ट पहने थे और कुछ विद्यार्थी स्कूल यूनिफॉर्म में भी थे। आज पहली बार मैंने लोवर टी शर्ट पहने थे। शर्म भी आ रही थी और खुशी भी हो रही थी। इस दिन पूरी ग्राम पंचायत के विद्यार्थी और अध्यापक हमारे विद्यालय में एकत्रित हुए। ग्राम हरिगढ़ की खिलाड़ी लड़कियों को देखकर हम घबरा गए। हमें लगने लगा कि हम इनसे हार जाएंगे।

आने वाले सभी अतिथि गणों का नृत्य से स्वागत किया। मुझे समझ नहीं आता कि आखिर स्वागत में हमेशा लड़कियों को ही क्यों नचाया जाता है? शपथ और उ‌द्घाटन हुआ। अब नाश्ता था। सर ने कहा नाश्ता लेकर वापस यही आए। आदेश के बाद का नज़ारा देखने लायक था। जिस प्रकार भेड़ों के पिंजरे को खोलते ही भेड़ें दौड़ पड़ती हैं, उसी प्रकार तरह छोरा-छोरी दौड़ पड़े, ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने पहले कभी नाश्ता देखा ही नहीं। परन्तु क्या करें भूख भी तो लग रही थी। किसी ने दो तीन बार ले लिया तो किसी को एक बार ही नहीं मिला। व्यवस्था भंग हो गयी। मास्टर हो या विद्यार्थी, नाश्ता कर प्लेटों को इधर उधर फेंककर चल दिए। इन प्लेटों को आरती और मैंने इकट्ठी की। कबड्डी का पहला मैच कमलपुरा आदर्श नगर के लड़कों के साथ हुआ। कमलपुरा की टीम में दो चार खिलाड़ी जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी वो भी मैच खेलने के लिए आ गए थे और इधर छोटे-छोटे खिलाड़ी थे। हमने अपनी टीम आदर्श नगर का हौसला बढ़ाया, पर चिटी भला हाथी को कैसे हरा सकती है। आदर्श नगर के लोग तो खेलने तो क्या देखने भी नहीं आए। जो आए थे वो कमलपुरा टीम की ताकत को देख पहले ही घबरा गए। आदर्श नगर वालों को खेलना तो आता है नहीं, खेलने के बजाय इधर-उधर रोते फिरते हैं। ऐसी स्थिति के कारण आदर्श नगर टीम हार जाती है। मुझे इस मैच में एक बात देखने को मिली, चाहे कितना ही खास दोस्त क्यों न हो, वह अपने दोस्त की नहीं, बल्कि अपनी टीम की सोचता है। कबड्डी में आदर्श नगर वाले लड़के मैच हार गए तो क्या हुआ, खो-खो में तो टीम आदर्श नगर ने  कमलपुरा को बहुत नचाया। हमारी टीम जीत गई। पीटीआई सर को तो पता ही नहीं चला कि आखिर लड़कियाँ जीत कैसे गयी। इनकों तो प्रैक्टिस तक नहीं करायी। पर हम जानते हैं कि यह सब कबीर सर ने जो जोश लड़कियों में भरा, उसका कमाल था। कमलपुरा की लड़कियों को हार जाने के कारण उनके अध्यापकों ने हौसला बढ़ाने के बजाए बहुत डांटा। हमारे कबीर सर ऐसे नहीं है। हार जाने पर भी कहते है, ‘हिम्मत मत हारना।’

टीम हरिगढ़ की लड़कियों का मैच देखकर डर रहे थे। हम तो क्या हमारी मेडमें भी डर रही थी, “ये कितनी अच्छी लग रही है, सभी खिलाड़ी एक जैसी। तुम्हें हरा देगी ये लड़कियाँ।”  पर जब उनका मैच  कमलपुरा के साथ हुआ तो हमने देखा कि हरिगढ़ की लड़कियों को ऐसा ऊँचा ऊँचा कर पटका कि दूसरे दिन वापस उनका मैच ही नहीं खेला गया। हम बहुत हँसे। हमने कहा,

‘एक हरि का गाबा फेर भागी अई खेलबा न,  खेलता तो आवे ह कोने (रूपाल्या ) ।”

इस दिन मैच का इंतजार करते करते शाम की पाँच बज गए लेकिन हमारा मैच नहीं हुआ। सब घर चले गए। अगले दिन हमारा मैच होना था, लेकिन कमलपुरा की किस टीम के साथ होगा ये हमें पता नहीं चला। कमलपुरा की बड़ी लड़कियाँ कह रही थी,

“थाको मैच मा का हंडे येय। माके और अ छोरियाँ के बीच जोरदार खाचा ताणी चाल बा लाग गी।”

हमारा मैच कमलपुरा की बड़ी लड़कियों के साथ न होकर छोटी लडकियों के साथ हुआ। हम छोटी लड़कियों को देख कर ढीले पड़ गए और हमें लगा हम तो आसानी से मैच जीत जाएंगे। जब एक छोटी सी लड़की सोनम का खेल देखा तो हम घबरा गए, क्योंकि उसने हम सबको खूब नचाया। इतनी छोटी उम्र में भी बहुत अच्छा कैसे खेल लेती है? जब मैं इस उम्र की थीं तब शायद कबड्डी का खेल क्या होता हैं, जानती तक नहीं थी। कड़ी टक्कर के बाद हम ये मैच जीत गए। लड़कियों द्वारा ये मैच जीतने पर गाँव वालों को खुशी हुई, क्योंकि लड़के पहले मैच में हार गए थे। जब लड़कों का अगला मैच हुआ तो हरिगढ़ वाले मैदान छोड़कर चले गए। क्योंकि कमलपुरा वाले चीटिंग करने में नंबर वन थे। लड़ाई का माहौल बनते बनते रुक गया।

इसी दिन सांस्कृतिक प्रोग्राम था। मैं भी डांस में थी। इस सांस्कृतिक प्रोग्राम में बताया गया कि जो अच्छा गाएगी और जो अच्छा नृत्य करेंगी, उसे इनाम दिया जाएगा। हमें बारी बारी से सबको बुलाया। यहाँ अच्छी प्रस्तुति दे या न दे, पर उस पर सभी हँसते ही है। जब परिणाम घोषित किए तब मैं भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि मेरा भी प्रथम या द्वितीय स्थान आए, परंतु मेरा नाम नहीं आया। मुझे दुख हुआ फिर मैंने सोचा अगली बार अच्छा प्रयास करेंगे। व्यवस्था को समेट कर सभी घर चले गए।

चारों दिन खूब मज़ा लिया। मज़ा इस बात का आया कि चारों दिन हमारी पढ़ाई नहीं चली। इन चार दिनों में होने वाले मैचों में कबीर सर ने हमारी बहुत मदद की। हमे ऐसा लग रहा था कि वो भी एक खिलाड़ी की तरह हमारे साथ है। उनके इशारे पर हम खेलते थे। इन्हीं के कारण हम फाइनल मैच तक पहुंचे। चारों दिन दिलावर सर, कबीर सर और पीटीआई सर के अलावा कोई मैदान के आसपास नहीं दिखा। मेडमें तो एक कमरे के अंदर सभी सत्संग करती रही। गहलोत सर के तो नाश्ता है और वो। चार दिन तक नाश्ता चला, लेकिन नाश्ते से बिल्कुल भी ध्यान नहीं हटाया। मैच से उनका कुछ लेना देना नहीं था।

फाइनल मैच के दिन कबीर सर ने गोपनीय तरीके से कबड्डी के बारे में चर्चा की। सभी को गार्डन में ले जाकर अपनी जगह बदलकर प्रेक्टिस करवाई। सर ने लड़कियों को आत्मविश्वास से भर दिया है। वे हमें बार बार एक ही बात कह रहे थे, “बेटा, हर जगह मैं नहीं आऊंगा आप को बचाने। यह लड़ाई आपकी है आप ही को लड़नी हैं।” हमारे गाँव वाले लोग बोल रहे थे, “लड़के हार गए, तुम कौनसी जीतने वाली हो। कभी नहीं जीत सकती इन लड़कियों से।”

हम मैच के शुरू होने का इंतजार कर ही रहे थे कि तभी एक झटका लगा। पीटीआई सर ने कहा, जो अभी खेल रही थी उसका नाम खो-खो में है और जो लड़कियों खो-खो खेल रही थी, उसका नाम कबड्डी में। सर ने कहा जिसका नाम होगा वही खोलेगी। मेरा नाम न तो कबड्डी में और न ही खो-खो में आया। मुझे बहुत गुस्सा आया। मेरा नाम क्यों नहीं आया? जबकि मैंने मेरा रजिस्ट्रेशन करवाया था। कुछ जोड़तोड़ करके पुरानी टीमों के बीच ही फाइनल होने की घोषणा हुई। इस मैच में खिलाड़ी खतरनाक थे, हमें पहले ही डर लग रहा था। उन्होंने हमको धमकी दी (आँखें नीची कर)। मेच में हम पहले तो उनसे आगे थे, परंतु कुछ समय बाद हमारी टीम में एकता नहीं रही, सब की सब घबरा गई। सर बार-बार आकर कह रहे थे कि घबराना नहीं, हिम्मत मत हारो, अभी भी टाइम बाकी है। पर लोग इतना ‘हा हु हा हु’ कर रहे थे कि हमें कुछ पता ही नहीं चल रहा था। मैंने भी जोश में होश ही खो दिए। सब की बैटरी लो होने लगी। रेफरी को उसके नियम के पालन करने चाहिए। उसके लिए तो दोनों टीमें बराबर है, परंतु रेफरी उस टीम को इशारे करके समझा रहा था कि कब क्या करना है और कब नहीं। कमलपुरा की गैंग अपनी इच्छा अनुसार सेकेंड बोल रही थी, परन्तु आदर्श नगर वाले चुप थे। अकेले कबीर सर की कौन सुनता है? फिर भी हम बराबर चल रहे थे। बस अंतिम रेड में मै दो पॉइंट लेकर वापस आ जाती तो हम जीत जाते। इस तरह हम हार गए। हम नहीं हमारा गाँव, सर की तैयारी जिसने यहाँ तक पहुंचाया, वे हार गए। कबीर सर ने कहा, “अगली बार अच्छा खेलेंगे” ऐसा कहकर चले गए।

पर गाँव वाले बोल रहे थे, “हमने तो पहले ही कह दिया, थेणा न जीत सको।” हमारे लिए यह मैच जीतना बहुत जरूरी था। हमें ब्लॉक स्तर पर ले जाएं या न ले जाएं, परंतु गाँव वालों को पता चल जाता कि लड़कियाँ भी कुछ कर सकती है। जिन्होंने फाइनल मैच जीता उसे मोमेंटो दिया जा रहा था सांस्कृतिक प्रोग्राम में प्रथम आने वालों को मोमेंटो दिया। चार दिन की रही व्यवस्था पर बहुत भजन सुनाए, जिसने खाने व नाश्ते की व्यवस्था की उसका स्वागत किया। कबड्डी में जीतने वाली लड़कियों को इनाम और सर्टिफिकेट दिया गया। पर मुझे कुछ नहीं मिला। एक मोमेंटो मुझे भी दे देते तो क्या बिगड़ जाता?

अगले दिन हमें कहा गया कि दोनों टीमों में से जिस खिलाड़ी ने अच्छा खेला, उसे ब्लॉक स्तर पर भेजा जाएगा। मुझे बुलाया गया, परंतु मेरा फ़ार्म ऑनलाइन नहीं चढ़ पाया था इस कारण मेरा नहीं था। मेरी दोस्त अनिला और सुनीता का फ़ार्म ऑनलाइन चढ़ गया। मैं सोच रही थी कि आखिर मेरा नाम क्यों नहीं आया। मुझे इस बात का दुख नहीं था कि मेरा नाम नहीं आया, मुझे इस बात का दुख था कि अनिला और सुनीता का नाम आ गया। मुझे ऐसा लगने लगा कि शायद मैंने कबड्डी नहीं खेली। इस कारण मैंने सोच लिया आज के बाद कभी किसी प्रोग्राम या खेल में भाग नहीं लूंगी। पहली बार में ही यह परिणाम निकला। ऐसी स्थिति होने पर मेरे ‘गरग्ला’(गला भर आना) आ गया। मैं किसी से नहीं बोली। चुप-चाप घर चली गयी।

घर पर सभी ने कहा, “अतरा दिन उई गोड्डा फोड्या, नाम तो होई न हो थारो। परा बळबा दे अबे आपणे न खलणो।” जब अगले दिन स्कूल गई तो मैं उदास थी। कबीर सर ने कहा, “क्या तुमने पहली बार में ही हार मान ली? अगली बार अच्छी प्रैक्टिस करेंगें।” इसके बाद तीन-चार दिन काफी अच्छे निकलें। ओलंपिक खेल खत्म हुए। बीच में थोड़े दिन पढ़ाई चली फिर ब्लॉक स्तर पर जाने का आदेश आया। ब्लॉक स्तर पर जाने वाली लड़कियों ने बीच में एक भी दिन प्रैक्टिस नहीं की थी।  कबीर सर तो सरकारी काम से तीन दिन बाहर थे। बेचारी लडकियाँ तैयारी की आस में डोलती रही। जिसका ऑनलाइन चढ़ा उसे चौथे दिन कबीर सर के नेतृत्व में ब्लॉक स्तर ले जाया गया। पर मैं स्कूल ही रही। मैं प्रार्थना सभा में बैठी थी पर मेरा मन यहाँ नहीं था। मेरा मन कर रहा था कि मैं भी ब्लॉक स्तर पर जाऊं। शायद मुझे कोई एक सर भी आकर चलने को कह देते तो मैं चली जाती। सर तो क्या मेरी किसी सहेली ने भी नहीं कहा। पूरे दिन मेरा मन स्कूल में नहीं था, चुपचाप बैठी रही। मेरी किस्मत ही खराब थी। खिलाड़ी शाम को बहुत लेट आए, खबर मिली कि खो-खो और वालीबॉल दोनों टीमें हार गई है।

कबड्डी टीम अगले दिन फिर ब्लॉक स्तर जाने के लिए तैयार हो रही थी तो मैं कबीर सर के पास गई और कहा, “सर में भी चलना चाहती हूँ।” सर ने कहा, “प्रधानाचार्य जी से पूछ, अगर वो अनुमति दे देंगे तो मैं ले जाने के लिए तैयार हूँ।” पापा को फोन लगाकर जाने की अनुमति ले ली, पर सर ने कहा, साहब से पूछो। साहब ने कहा तेरा नाम नहीं है तो तुम नहीं जा सकती। साहब ने कहा, “कबीर साहब, इसे यहीं रहने दो। पढ़ाई को डिस्टर्ब मत करो। ये वहाँ जाकर क्या करेगी।” साहब द्वारा मना करने पर मैं कक्षा में चली गई थोड़ी देर बाद अनिला बुलाने आई। मुझे लगा सर ने हाँ कर दी इसीलिए मुझे बुलाने आयी। जब मैं पिकअप के पास गई तो कबीर सर ने इशारा किया और मैं चुपके से बैठ गई। पिकअप के अंदर सबके पीछे छुप गयी। साहब को पता ही नहीं चला और पिकअप रवाना हो गई। थोड़ा दूर जाने पर मैं पिकअप के ऊपर छत बैठ गई। मेरा बड़ा भाई पीछे पीछे आ रहा था। उससे डरकर मैं वापस कोने में छुप गई। जैसे ही वह आगे निकला, मैं वापस गाडी की छत पर बैठ गई। आपको मैं यहाँ यह बताते चलूं कि स्कूल के इतिहास में यह पहली बार था जब लड़कियाँ किसी टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए किसी और गाँव में खेलने के लिए गई। इससे पहले हमारे स्कूल के इतिहास में कोई लड़कियों की टीम खेलने के लिए गई हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता है।

हम ब्लॉक स्तर के मैदान में उतरे। इतना बड़ा मैदान और इतने सारे खिलाड़ी मैंने पहले कभी नहीं देखे। जैसे ही पिकअप से उतरे सर ने सभी के सामने मुझे डांटा, “किसकी इजाजत से आई?” मैं देख रही थी कि अमन और प्रिन्स भी बिना अनुमति के आए थे, पर उन्हें कुछ नहीं कहा। वे लड़के थे इस कारण? सर ने प्रधानाचार्य जी को फोन लगाकर कहा कि सावित्री बिना बताए आ गई है, मुझे तो अब पता चला। आप इसे डांटना। मुझे डर लगने लगा अब क्या होगा? मैं नहीं आती तो अच्छा होता। सभी आगे चले गए फिर सर ने एक तरफ बुलाकर समझाया, “बेटा सभी के सामने इसलिए डांटा कि किसी को पता न चले कि मैंने तुझे बैठने के लिए कहा। जिम्मेदारी मुझपे न आ जाएं इसलिए।” साहब को पता चलने के कारण मुझे डर लग रहा था कि कल क्या होगा मेरा।

कबड्डी, खो-खो और क्रिकेट के मैच हो रहे थे। हम कबड्डी का मैच देख रहे थे। इतना जबरदस्त खेल पहली बार देखा। ऐसे माहौल में लड़ाईयाँ बहुत होती है, इस कारण चारों तरफ बांस बांध रखे थे। सर ने सरिता से पूछा कि सावित्री तेरी जगह खेले तो कोई दिक्कत है? उसने कहा, नहीं। सर ने सभी से कहा कि इसको सरिता नाम से पुकारना। ऐसा करने से थोड़ी गड़बड़ी लगने लगी। सरिता बेचारी भोली थी। उसकी जगह मैं होती तो मेरी जगह किसी को नहीं खेलने देती। मेरे चेहरे पर चमक आई। हमारा मैच होने वाला था। सभी लड़कियों ने चड्डा-टी शर्ट पहना हुआ था। मैडम ने कहा किसी से चड्ढा टी शर्ट मंगवाकर पहन और जल्दी मैदान में पहुँचों। मुझे शर्म आ रही थी, मैंने मना कर दिया कि मैं नहीं पहनूंगी। मैडम ने कहा, अगर नहीं पहनेगी तो मैदान में नहीं उतरने देंगे। ऐसा मौका बार बार नहीं मिलेंगा ऐसा सोचकर मैंने पहन लिया।

सामने वाली टीम में खिलाड़ी छोटे थे, लेकिन टक्कर बराबर की थी। अंतिम रेड मेरी थी, इसी रेड मैं पांच पॉइंट ले आई और हमारी टीम विजेता बनी। प्रिन्सिपल साहब से जो डर लग रहा था, वह इस जीत से दूर हो गया। मैंने देखा यहाँ के रेफरी चीटिंग बहुत करते है वो अपनी मनमानी करते हैं, खिलाड़ी की सुनते ही नहीं। फिर भी हम यह मैच जीत गए।

हमें सूचना मिली कि अभी एक मैच और होगा। मैच का इंतज़ार कर ही रहे थे कि रेफरी ने आवाज दी, “मैदान में आ जाइए।” मैच शुरू हो गया है। हम सामने वाली लड़कियों को देखकर घबरा गये। सर ने कहा, घबराना नहीं। एकता रखो। इस मैच में एक मासी थी जो नेशनल स्तर पर खेलकर आई हुई थी। हमें तो बोनस तक लेना नहीं आता था। फिर भी हमें कब अटैक करना है और कब टाइम पास करना, हमारे साथी हमें लगातार बता रहे थे। कमजोर पड़ जाने पर भी हमने हिम्मत नहीं हारी। आखिर हम मैच जीत गये। हम बहुत नाचे। मेरा डर कहा गया पता ही नहीं चला। प्रधान साहब आये। उन्होंने हमारे साथ फोटो ली। मेरे ख्याल से उन सभी लड़कियों से ज्यादा खुश मैं थी।  घर वापस लौटते समय जैसे ही मेरे भाई की दुकान आई मैं छुपने के बजाय और ऊँची हो हो कर देख रही थी। असली आज़ादी क्या होती हैं इसका सच्चा अहसास मुझे आज हो रहा था।

अगले दिन मैदान में पहुँचते ही हमारा मैच शुरू हो गया था। इस टीम के खिलाड़ी मजबूत थे। इस बार हमसे खेला नहीं जा रहा था। एक बार हम उनसे आगे भी निकले, लेकिन फिर पीछे रह गए। सामने वाली टीम में उनके टीचर मैदान के अंदर थे। हमारे सर आ गए तो लोगों से रहा नहीं गया, उन्हें तुरंत बाहर निकाल दिया। आपस में बोलने लगे।

रेफरी इतना निक्कम था कि पूछो ही मत। खिलाड़ी की तो सुनता ही नहीं। अपनी इच्छा अनुसार हमें बाहर निकाल देता। बार-बार एक ही टीम की तरफ बोलता रहा। स्कूल से हम यहाँ तक पहुँच गए, परन्तु रेफरी वैसा का वैसा मिला। सर हमें बार बार बोल रहे थे कि एकता रखो, हर जगह मैं नहीं आ सकता आप को बचाने के लिए, आप यह कर सकती हो, सेमी फाइनल जीत गई तो समझो फाइनल मैच की जीत पक्की। परन्तु हम ये मैच हार गए। बहुत दुःख हुआ। असल पीड़ा इस बात कि थी कि हम साहब को पूरा गलत साबित नहीं कर पाए क्यों कि वे कब से प्रार्थना कर रहे थे, जल्दी हार जाए तो अच्छा रहे, कल नहीं जाना पड़े। साहब तो कबड्डी को जंगली खेल के रूप में देखते हैं। यही नहीं, यहाँ तक भी सुनने में आया कि जब हमारी टीम सेमीफाइनल में पहुँच गई थी तो इससे प्रिंसिपल साहब खुश नहीं थे, उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि लड़कियाँ जीत क्यों गई? उन्हें हारना चाहिए था। खेलने से पढ़ाई भी डिस्टर्ब होती है और मर्यादा भी। लड़कियाँ तो चार दिवारी के भीतर ही अच्छी लगती है, चाहे वह चारदीवारी घर की हो या स्कूल की। समझ में नहीं आता लोग ऐसा क्यों सोचते हैं। क्या केवल किताबें चाटना ही पढ़ना होता है? पढ़ने लिखने और ऊँचे पद पर पहुँचने के बाद भी अगर लोगों की ऐसी सोच है तो फिर क्या फायदा पढाई का? जिस गाँव में मैं रहती हूँ, वहाँ लड़कियों को खेल के लिए भेजना तो दूर, पढ़ने के लिए भी बाहर नहीं भेजते। हाँ, बाल विवाह कर के स्कूल से ही ससुराल जरूर भेज देते हैं खुशी-खुशी।

इस खेल ने भले ही हमें कोई इनाम नहीं दिलवाया, पर इतना तो है कि हमें लड़ना, भिड़ना और आगे बढ़ना जरूर सिखाया। पहले मैं दब्बू और केवल किताबी कीड़ा थी, खेल ने मुझे हालातों से टक्कर लेना और मैदान में डटे रहना सिखा दिया। साथ ही यह भी समझाया कि सीखने के लिए किसी क्लास रूम की जरूरत जरूरी नहीं है। इन सब के बीच कबीर सर की ये पंक्तियाँ सतत नई ताकत देने का काम करती हैं, "हर एक जीत घमण्ड देके जाती है और हर एक हार कुछ सिखा के जाती है।" सच कहूँ तो दुनिया को सीखने और समझने के प्रति मेरे जीवन का यह नया अभ्युदय था।

सावित्री (छद्म नाम)
राजस्थान की सरकारी स्कूल में पढने वाली एक 12वीं की छात्रा
 
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक चंदवानी

6 टिप्पणियाँ

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  2. जब तक कबीर सर है। कोई सावित्री कभी जिंदगी की जंग नही हार सकती।

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  3. अद्भुद! इस तरह अपने संघर्ष की कहानी द्वारा अभिभूत करने की ताकत! 'अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी' की धारणा को तोड़ने वाली कहानी। हर सावित्री की अपनी कहानी है। अगर उन्हें इस तरह कबीर सर की तरह बंधन की कारा तोड़ने के लिए कोई प्रोत्साहित करें, तो वह कितने ही बड़े पक्षपाती रेफरी से आंख से आंख मिलाकर भीड़ सकेगी।

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  4. बेहतरीन, संघर्ष की कहानी..... नॉस्टेल्जिया में पहुंचा दिया।

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  5. बेनामीमई 16, 2024 10:32 am

    अनुभव को सहज तरीके से व्यक्त करने के लिए लेखिका को बहुत बधाई!
    चीकू के बीज अच्छे लगे

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  6. बेनामीजून 29, 2024 3:41 pm

    बहुत ही उत्कृष्ट लेख। इस लेख के माध्यम से ग्रामीण नारी के संघर्ष व उसमें आने वाली सामाजिक बांधाओ को अच्छे ढंग से रेखाचित्रित
    किया गया है। लेखिका व सहयोगी शिक्षक (कबीर सर )को बहुत-बहुत बधाई।

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