गुलमोहर के फूल : तन्नु, रेखा कँवर, राधिका बैरागी, टीना सेन और किरण सेन

गुलमोहर के फूल : तन्नु, रेखा कँवर, राधिका बैरागी, टीना सेन और किरण सेन

बाल उमंगों के समान जल्दी ही फलने फूलने वाला गुलमोहर रस से खूब भरा हुआ एक ऐसा फूल है जिसपर शहद के लिए मधुमक्खियाँ मकरंद के लिए लगातार मंडराती रहती है। इतना फलने-फूलने के बावजूद गुलमोहर के फूल को जनमानस में ज्यादा स्वीकृति नहीं मिल पाती है। इसके पीछे परंपरागत फूलों का आधिपत्य होने के साथ-साथ तथाकथित रसिक नागर का भी पूर्वाग्रह रहा है। स्कूली जीवन के दौरान विद्यार्थी भी कुछ इसी तरह से रस, उमंग और सौंदर्य से भरा हुआ होता है। उनके विचारों और कार्यों को स्वघोषित साहित्यकार अपने आसपास नहीं भटकने नहीं देते हैं जिसके चलते गुलमोहर के फूलों के समान उनकी रचनाएँ यत्र-तत्र बिखर जाती है या फिर भरी भरकम पैरों के नीचे कुचल दी जाती हैं। कुछ समय बाद अपने आप को रसिक कहलाने वाला वर्ग  इन बाल रचनाओं को अपने पैरों तले रौंद देता है। इस कॉलम द्वारा ऐसे ही फूलों को एकत्र कर उसके रस को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया गया है।

इस कॉलम में लिखने का कोई नियम नहीं हैं। स्कुली विद्यार्थी किसी भी प्रकार की बात यहाँ रख सकता है, चाहे वह निज पीड़ा हो, सामाजिक-राजनीतिक चिंतन हो, डायरी हो, संस्मरण हो या फिर किसी कोई कविता-कहानी। आज भी यह सच है कि हमारा समाज अपना चेहरा नहीं देखना चाहता। अगर कोई उसे चेहरा दिखाने का प्रयास करता है तो अपनी हिंसक प्रतिक्रिया द्वारा उसे कुचलना का प्रयास करता है। इन्हीं संभावनाओं के चलते कुछ घटनाओं के पात्र, जगह और समय में या तो बदलाव कर दिया गया है या फिर छुपा दिया गया है। इस बार चार विद्यार्थियों द्वारा लिखी कुल पाँच रचनाओं कोगुलमोहर के फूलकॉलम में जगह दी गई है।

मानसी का ढसता ढावा
तन्नु

मेरा जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ। मैं जिस घर में पैदा हुई, उस घर में शायद लड़की पैदा होना भी एक पाप है। बचपन में माँ-बाप को छोड़ कर ननिहाल में रहना पड़ा। बहुत कम उम्र में बड़ा होना पड़ा। बचपन में  घर की रोटियां बनाना सीखा और घरवालों के ताने सुने वो अलग। खेलना कूदना क्या होता है कभी सीखा ही नहीं। मैंने अपना बचपन पिंजरे में बंद चिड़िया की तरह बिताया। मुझे माँ-बाप ने अपनाया ही नहीं और ननीहाल वालों ने कभी अपना समझा ही नहीं। उन्हें बस घर में काम करने के लिए कोई चाहिए था और मुझे अपने सिर पर एक छत। सात साल की उम्र तक विद्यालय नहीं देखा। जब रिश्तेदारों और गाँव वालों के ताने ननिहाल वालों पर भारी पड़ने लगे, तब समाज के डर से मुझे स्कूल भेजा। बहुत बार मैंने गलतियाँ की और मुझे उसके बदले सजा भी मिली, पर उन गलतियों को सुधरवाने वाला कोई नहीं था। मेरे दोस्तों ने और भाई बहनों ने बोला कि तू अपने घर चली जा, पर उनको कौन बताए कि मेरे माँ-बाप को ही मेरी जरूरत नहीं है। जैसे- जैसे वक्त गुजरता गया, वैसे-वैसे इन सब की आदत होगी और अब इन सब बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

मेरे हिस्से का आकाश
- रेखा कंवर (27 मार्च, 2024)

आज फिर वही महिला मिली जिसका चेहरा एकदम मेरी माँ की तरह ही दिखता है। उस महिला को मैंने दो-चार बार पहले भी इसी तरह ऑटो में जाते हुए देखा है। आज वह काफी दिनों बाद दिखाई दी। जब भी मैं उसे महिला को देखतीहूँ। तो उन्हें देखकर मुझे अच्छा लगता है क्योंकि वह महिला मुझे माँ की याद दिलाती है। कुछ पल के लिए मन किया मानो बस.. यूं ही उन्हें देखती रहूं। उस स्त्री की आंखें, होठ, और नाक बिल्कुल माँ की तरह ही थी। बस.. उनके चेहरे पर थोड़ी झुर्रियां पड़ी हुई है जो कि उन्हें माँ के चेहरे से थोड़ा अलग करती थी। मन किया कि उनसे पूछ लूं। पर पूछती भी क्या? वो तो मुझे जानती तक नहीं!  जैसे-तैसे अपने आप को संभाला और उन्हें कुछ वक्त तक ऐसे ही घूरती रही।

जैसे ही मैं उन्हें देखती तो वो महिला भी मुझे एकदम से देखने लगती। जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ती मैं वापस दूसरी और देखने लगती, ताकि उन्हें पता चले कि मैं बार-बार उन्हें देख रही हूँ। बस.. कुछ वक्त तक यही चलता रहा तो अबकी बार मैंने तिरछी निगाहों से देखना शुरू किया ताकि उन्हें पता ना लगे कि मैं बार-बार उन्हें देख रही हूँ। थोड़ी देर बाद उनके पास ही बैठी एक महिला और वह दोनों बातें करने लगीं। उनकी बातों से मुझे मालूम हुआ कि वह औरत विधवा है। महिला ने उनके पति के बारे में बातें करना शुरू की तो मैंने देखा कि उनकी आंखों में आँसू आने लगे हैं। कुछ देर के लिए वो महिला बातें करते-करते ही अचानक से खिड़की के बाहर देखने लगी। शायद अब तक वह महिला अपने पति के जाने के गम से नहीं उभरी। कुछ देर तक मैं यूं ही उन्हें देखती रही, तभी एकदम से उस महिला ने मेरी तरफ देखा .. थोड़ी देर तक वह महिला इसी तरह मुझे देखती रही। जान उसने मुझे क्यों इस तरह देखा?

उनकी बातों से पता चला कि उनके एक बेटा भी है जो कि अपनी पत्नी के साथ अलग रहता है। यह बात सुनकर मुझे बहुत दु: हुआ। एक माँ दुनिया भर के दु: अपने सिर पर उठाकर अपने बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करती है और बड़ा होने के बाद वही बेटा अपने बूढ़े माँ-बाप को अकेला छोड़ देता है। वो शायद यह भूल जाता है कि माँ-बाप ने उसे बड़ा करने के लिए, अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए जाने कितनी तकलीफें सही है। खैर छोड़ो.. ये हमारा बनाया हुआ ही सामाज है। वो महिला जाने कितने दु:खों को अपने अंदर समेटे हुई है। लेकिन वो अब तक हारी नहीं जिंदगी से! वो महिला अपना पेट भरने के लिए बाज़ार में सब्जियां बेचने का काम करती है। एक पल के लिए मैं उसे महिला की स्थिति को देखकर गहरी सोच में पड़ गई कि तभी हमारा स्कूल गया और मैं ऑटो से नीचे उतर गई। ऑटो से उतरने के बाद जब मुड़कर देखा तो महिला मुझे खिड़की से देख रही थी। बस .. फिर वो ऑटो वहाँ से चला गया और मैं अपने स्कूल।

घर पर आने के बाद घर का सारा काम करने के बाद जब मन नहीं लगा तो  खिड़की के सामने जाकर बैठ गई। आजकल शाम घर पर मैं बिल्कुल अकेली महसूस करती हूँ, क्योंकि दादी अपने गाँव गए हुए हैं, भाई अपने दोस्तों के घर पर और पापा देर रात घर आते हैं। मैं घर की खिड़की में बैठकर खुद से ही बड़बड़ाने लगती हूँ। थोड़ी देर आसमान को देखने लगती हूँ। सब बोलते हैं कि मरने के बाद इंसान वहाँ ऊपर से सबको देखता है। मैं सोचती हूँ कि माँ भी शायद मुझे वहाँ से देख रही होगी और मैं अपने आप से बातें करने लगती हूँ। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि मरने के बाद इंसान को दूसरा जन्म मिल जाता है। और वह अपने पिछले वाले परिवार को भूल जाता है। जब ये सोचती हूँ तो मुझे डर लगता है। अगर माँ को दूसरा जन्म मिल गया होगा तो वो भी मुझे भूल गई होगी? फिर सोचती हूँ ऐसा थोड़ी होता है। भला एक माँ अपने बच्चों को भूल सकती है! फिर खुद से ही कहती हूँ तो क्या हुआ कि बहुत कम समय में ही माँ मुझे छोड़ कर चली गई है। जितना प्यार उसने किया है वो ही मेरे लिए जीवन भर के लिए काफी है।


जाति
- रेखा कंवर (2 अप्रैल, 2024)

कहने को तो इतना कुछ है। मगर अभी यह बात ही मुझे ज्यादा सही लगी कहने को। हमारे घर के बाहर एक सरकारीमोटर’  लगी हुई है। जहाँ से सब पानी भरते हैं। और हमारे घर के पास ही में रैगर समाज के लोगों भी रहते हैं। यह लोग भी यही से पानी भरते हैं। हमारे घर के बिल्कुल पड़ोस में  एक बुजुर्ग पुरुष रहते हैं। जो मुझे कहीं अच्छी-अच्छी बातें भी बताते हैं। क्योंकि वे हमारे घर के पड़ोस में ही रहते हैं इसलिए उनके घर में मेरा आना-जाना लगा रहता है।

उनका व्यवहार भी काफी अच्छा है मेरे साथ। लेकिन उनकी एक बात मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। कई बार जब मैं उनके घर जाती हूँ तब वह मुझे कहते हैं,  “या  रैगर  (रैगर जातिने थारा घर का बाने घाबा मत धोवा दिया कर”!  “हूगला है साला”! उन्होंने मुझे कितनी ही बार ऐसा कहा है। पर मैं कभी कुछ नहीं बोलती हूँ उन्हें। चुप हो जाती हूँ। मेरे घर के बाहर तो सब कपड़े धोते हैं। फिर मैं उन्हें ही क्यों कहूँ? आखिरकार क्यों मना करूं मैं उन्हें? इसलिए तो नहीं क्योंकि उनकी जाति हमसे अलग हैं?.... पर मैं क्यों उनकी जाति देखु? जब उनके भी हमारी ही तरह दो आँख, दो नाक, दो कान हैं और उनके भी हमारी तरह दो ही हाथ है। और तो और! वो कपड़े भी हमारी ही तरह धोते हैं। वो भी उन्हीं भगवान की पूजा करते हैं जिनकी हम पूजा करते हैं। तो वे हमसे किस प्रकार भिन्न हुए भला? आखिरकार क्यों मैं देखूं उनकी जातिभगवान ने तो सबको इंसान ही बनाया। उन्होंने कोई जाति नहीं बनाई। भगवान पर बहुत ज्यादा विश्वास करते हैं लोग, तो फिर क्यों मानते है जाति को? वैसे सब कहते हैं, अब ज़माना बदल गया है। अब तो सब पढ़े लिखे हैं। भला अब कौन किसकी जाति देखता है?

रेखा कंवर
कक्षा11
रा..मा.वि. सामरी (चित्तौड़गढ़)
 
गंभीरी के तीरे-1
राधिका बैरागी

मेरे घर एक गाय थी जो कि गर्भावस्था में थी, उसे हम ननिहाल से लाए थे। कुछ दिन तो वो हमसे डरी डरी-सी रहती थी.. पर फिर समय के साथ धीरे-धीरे हम सब से गुलमिल गई।  दिन में हम सभी पशु को बाहर बांधते हैं और रात के वक्त घर के अंदर ले आते हैं। कुछ दिन अच्छे गुज़रे कि उसे पता नहीं क्या हो गया था।  वो एक दिन ज़मीं पर बैठी पर उठ नहीं पाई। घर में सभी ने खूब प्रयास किया उठाने का तो थोड़ी देर बाद वो उठी।  उठने के बाद हम उसे अंदर ले आए। उसके उठने के बाद घर में सब की चिंता कम हो गई थी। जब सुबह हुई तो फिर उसका वही हाल हुआ। उस दिन के बाद वो उठ नहीं पाई थी। डॉक्टर से खूब इलाज करवाया, दवाइयाँ खिलाई पर कुछ नहीं हो पाया। वो खा-पी सब रही थी, बस उठ नहीं पा रही थी। अब बस उसकी सेवा करने के सिवा और कुछ नहीं हो सकता था।  दवाइयाँ देते रहे और अब दिन आया बछड़ा होने का। सुबह का वक्त था तो घर पर कोई नहीं था। सब अफिम के खेत गए हुए थे। मैं अकेली घर थी। मैं सुबह जब उठी तो सीधे गाय के पास गई। देखा तो उसकी हालत सही नहीं थी। थोड़ी देर तो मैंने उसे अकेला छोड़ दिया। फिर से जाकर देखा तो उसकी हालत और बिगड़ती हुई दिखी। मैं फटाक से अंदर गई और पापा को फोन करने लगी, पर पापा का फोन घर पर ही था। अब क्या करूं? थोड़ी देर अपने भगवान को याद किया। 

फिर.. पापा के फोन से मैंने उन अंकल को फोन किया जिनके खेत पर पापा गए थे। बात होने के बाद पापा तुरंत घर गए। कुछ देर हमने गाय पर सब छोड़ दिया पर कुछ नहीं हो पाया और अंत में डॉक्टर को ही बुलाना पड़ा। उस बेचारी पर एक के बाद एक पीड़ा उसे घेरती रही। उसने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था। .... बहुत कुछ देखने के बाद जब बछड़ा हुआ तो मैं उसे देख कर बहुत-बहुत खुश हुई। बछड़े को जब गाय के सामने रखा तो गाय ने उसे खूब लाड़ किया। (ये देखकर आँखों के सामने माँ का प्रतिबिंब बन गया) उस दिन बछड़े को उसी के पास रखा। अब गई एक और समस्या। बछड़े को माँ का दूध कैसे पिलाएंक्योंकि गाय तो उठ नहीं पा रही थी। फिर मम्मी... हमारे घर के पीछे जो भील समाज का परिवार रहता है, उनके वहाँ से बकरी का दूध लेकर आए। अब दूध तो ले आए पर अब पिलाएं कैसे? छोटा-सा है वो। फिर पापा ने भैया को मेडिकल से छोटे बच्चे को दूध पिलाने की बोतल मंगवाई। खूब जतनकरके दूध पिलाया। वो दिन जैसे-तैसे गुज़रा। अगला दिन हुआ, मैं स्कूल गई थी। उस दिन पापा ने गाय को खड़ी करने का प्रयास किया। उससे वो खड़ी तो हो गई और थोड़ी-बहुत घास खाई, पानी लिया। कुछ घंटों बाद ही उसकी सांस तेज-तेज चलने लगी तो फिर से उसे नीचे बैठा दिया। वो तब बैठी नहीं बल्कि पैरों को फैलाकर लेट गई। घर आते ही मैं झट से उसके पास गई। उसकी हालत बहुत खराब थी। मैंने ज्यादा कुछ नहीं सोचा और बछड़े को उसके पास लेकर बैठी रही। डॉक्टर को फोन लगाने के लिए पापा को कहा...पर डॉक्टर ने शाम तक आने को कहा। डॉक्टर का फोन कटते ही... गाय की सांस रुक गई और वह चल बसी। गाय को देखकर ऐसा लगा जैसे परिवार का कोई चल बसा। घर पर मैं, भैया और पापा ही थे। हम तीनों खूब रोए। 

उस दिन भी मम्मी अफीम चीरने गए थी। शाम को मम्मी के आने का समय भी हो गया था। जैसे ही मम्मी आई.. गाय को और हमारी हालत देखकर वह भी रोने लग गई। सभी ने एक-दूसरे को सहानुभूति दी.. और गाय को सिंदूर लगाकर, ओढ़नी ओढ़ाकर विदा किया।

उस समय की दशा को याद करके आज भी शरीर ठंडा पड़ जाता है। अब उस बछड़े को पालने की जिम्मेदारी हमारी हो गई थी। इस बछड़े का जीवन देख-देखकर बहुत बुरा लगता है। किसी बच्चे के जन्म लेते ही उसकी माँ की मृत्यु हो जाना और उसे माँ का दूध भी नसीब होना देखकर बहुत दु: होता है। ये सब देख के ऐसा लगता है कि माँ के बिना जीवन जीना असंभव है, क्योंकि माँ है तो सब है। खैर होनी को हम नहीं टाल सकते हैं।  हमने बछड़े का नाम शिवा रखा है और इसे हम माँ की कमी महसूस नहीं होने देंगे।

राधिका बैरागी
कक्षा11
रा...मा.वि. सामरी (चित्तौड़गढ़)

जिंदगी इन दिनों 
- टीना सेन

‘.....मन का नगर था खाली, सूखी पड़ी थी डाली।
आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बनके ‘ 

        गाने की पंक्ति ने एकदम से ध्यान अपनी ओर खींच लिया। घर के बाहर से गुजरते ट्रैक्टर में तेज आवाज में बज रहा था जो गेहूं का भूसा भरकर जा रहा है। कहाँ? किसके यहाँ? नहीं मालूम, पर बजते हुए गाने ने ऐसा मोह लिया कि चाहते हुए भी जब़ान पर झलक रहा

        बीते दो माह ने किसानी जीवन को अलग ही उत्साह से भर दिया। सब एकदम से व्यस्त। किसी के पास व्यर्थ का समय नहीं। सब अपनेअपने काम में मग्न, हाव-भाव, बोल-चाल, अपना काम पहले करवाने में शब्दों का लह़जा अलग ही चमक में चमचमा रहा था। और होड़ हो भी क्यों ना? आखिर छः महीने की मेहनत पक कर आँखों में छाई हुई है। कितनी ही उम्मीदें आशाएं बंधी हुई है फसलों से। किसी को कर्ज चुकाना है, किसी को किस्तें भरना है। पहले के लोग केवल कर्ज और गिरवी की भाषा समझते थे। अपना गेहूँ, चना दिखाकर उधारी ले लेते थे। अभी के दशकों में किस्तों का नया चंगुल उभर कर आया। हर तीसरे की जबान पर छाया रहता है किश्त वार।

        उन्हीं में उलझने बढ़ने लगी। कहीं से भी और किसी भी तरीके से बस गांधी जेब में बैठ जाए, काम से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। शिक्षा को किनारे रख रखा है। पहले काम पर ध्यान दो, बचे समय में पढ़ लो दो चार अक्षर। चौकिए नहीं, गाँव और देहात में यही चलन में होता है। हम उनकी नजरों में ज्यादा किसी काम के नहीं। बीते सालों में थोड़ा रूप बदला है, जागरूक हुए हैं नागरिक, अच्छी लगती है बातें उन्हें बस नौकरी की। अगर लगे तो हीन नजरों में गिर जाते हैं। अरे सरकार क्या ही करें, किसान बेचारा पढ़ाना तो चाहता है पर हालातो के बोझ तले काम पकड़ा ही देता है। इस साल नहीं तो अगले साल देख लेंगे बोलकर युवा लग जाता है काम में हाथ बटाने। कुछ समय में ऐसा ढल जाता है कि गाने बज रहे हैं, वह काम कर रहा है। बोल समझने की जरूरत नहीं, बस बज तो रहे हैं हालातो के विपक्षी रूप में ..,

मन का नगर था खाली, सूखी पड़ी थी डालीहाँ महीना तो व्यस्त ही था हर वर्ग के लिए, चाहे किसान हो व्यापारी, युवा, अध्यापक ,विद्यार्थी सब अपने अपने काम में लगे हुए थे। इसी महीने मेरे भी सेमेस्टर से जान छूटी। पता नहीं पहले वाला उत्साह कहाँ गया परीक्षा को लेकर, लेकिन सेमेस्टर में तो सभी के यही हाल थे इसलिए थोड़ी तसल्ली है कि सब अपने जैसे ही है। सब टाइम को लेकर एक ही ताल में ताल मिला रहे थे सोचा था सर के द्वारा भेजी गई किताब को बहुत अच्छे से पढ़ना शुरू करूंगी परीक्षा खत्म होते ही। पर घर वाले भी इंतजार में थे खत्म होने की कि काम में हाथ बटाएं और मैंने भी वही ठीक समझा। पढ़ लेती हूँ अभी थोड़ा-थोड़ा। नजर वही जा टिकती है जो पहले पढ़ रखा है और घर में सबसे छोटी हूँ। सबकी जुबां पर काम के लिए मेरा ही नाम आता है। बहुत छोटे-छोटे लेकिन दिन कहाँ ढलता है पता ही नहीं चलता। शाम होते होते थकान जैसा लगने लगता है लेकिन बच्चों की शैतानियाँ और उनकी बातें उतार देती है।

        शाम मोबाइल के नाम सब ऐप के चक्कर लगा लेती हूँ और कभीकभी टीवी में पसंद की मूवी देख लेती हूँ। सिरियल अब इतने नहीं लुभाते और दूसरी बात कि बचपन से ही लड़कों की संगत मिली। भाई और मामा के साथ मूवी का ही अभ्यास हैं। टीवी से अलग ही सुकून मिलता हैं। मेरा मोबाइल मेरी टीवी नहीं बन पाया अभी तक तो। बहुत सारे विचार आंधी की तरह आते हैं लेकिन तूफान की तरह उड़ जाते हैं, बहुत कम टिक पाते हैं। कभी-कभी ख्याल आता है कि जब रोग बट रहे थे, तब मैं कटोरा लेकर सबसे आगे खड़ी थी। महीने में 15 दिन अच्छे निकलते हैं और 15 में कुछ कुछ रोग होता ही रहता है। अब बताना ही छोड़ दिया। सब अपना है। ज्यादा ध्यान नहीं देती। किसी रोग पर, किसी की बातों। पर सब हँस के टाल देती हूँ।

        हाँ, अभी ना मेरे अक्ल ढाढ़ रही हैं। अब मुझमें अक्ल आएगी ऐसा सब बोल रहे, लेकिन मैं सोच रही हूँ कितनी आएगीदर्द भी है और खुशी भी। बहुत कुछ लिखना छूट रहा हैं अभी, लेकिन समय नहीं ज्यादा।किसानों की फसलें बिकेगी बहुत अच्छे दाम में, फिलहाल इसी भ्रम में गाने की आवाज़ अब दूर होती जा रही हैं

मुझे छोड़ के ना जाना वादे हज़ार करके
मेरे दिल में यूँ ही रहना, हाय------- 

टीना सेन
स्नातकोत्तर विद्यार्थी 
बसेड़ा 

वर्तमान का जीवन
- किरण सेन (21 अप्रैल, 2024)
'आना - भरा पानी का मन से,
कौन करे सहसा विश्वास!
कैसे बतलाऊं, दुनियां में,
कितना महंगा है उल्लास।'

श्यामानंद किशोर की इन पंक्तियों ने मन मोह लिया। दुनिया में सब कुछ आसानी से मिल सकता है, सिवाय मन की शांति, प्रेम और अपनेपन का भाव। अभी याद कर पाना थोड़ा मुश्किल है कि मैं कब एक ऐसी बड़ी जाजम पर बैठी थी जिसमें बहुत से लोग हो और सभी एक साथ बैठकर बतियां रहे हों। सब को अपनी-अपनी बात कहने की उत्सुकता हो और किसी बात पर सब एक साथ ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा रहे हो। सभी के चेहरे पर एक साथ बैठने की प्यारी सी मुस्कुराहट हो पर साथ बैठने का रिवाज अब थोड़ा कम होता जा रहा है। अब तो वॉट्सएपका ज़माना है जिसमें शब्दों की सीमा का कोई रूल नहीं है। हजारों बातें आप चैट पर करवा लो पर देखे, बिठा लो सामने तो चार बातें सही से हो पाए। मेरी तो यही हालत है, आपकी क्या है? जो मुझे बताइएगा।

व्हाट्सएप, स्नैपचैट,और फेसबुक पर तीन सौ से अधिक लोगों को फ्रेंड्स बना रखा है पर घर में पड़ोस में और रिश्तेदारों से बोलचाल बहुत कम है। ऑनलाइन रिश्ते स्टोरी पर लाइकऔर रीलभेज कर अपनी जिम्मेदारी बखूभी निभा रहे है। आज कल यही रिश्ते है बस। आप कुछ एक को छोड़कर बाकी को दिखावा कह सकते हो। फॉलोअर बढ़ाकर इतराना आज कल का ट्रेंड है। खैर यह बात मैं और ज्यादा नहीं कर सकती क्योंकि मैं ख़ुद इसी दौर में हूं, और मेरे जैसे और भी कई भाई बहन होंगे जो यही सब करते जा रहे है, इतना तो मुझे विश्वास है ही।

इन दिनों सब ठीक है। रीट लेवल फर्स्ट की तैयारी के लिए किताबें मंगवाई हैधीरे-धीरे फिर से पढ़ने की आदत डालना चाहती हूं जो एक साल पहले पूरी तरह तीतर बितर हो गईं। सभी विषय को पूरा-पूरा समय नहीं दे पाती हूं। थोड़ा काम घर का होता है। कभी-कभी थोड़ा आलस्य होता। मोबाइल फोन के चलते एक विद्यार्थी कैसे विद्यार्थी बना रह सकता है, कोई बता सके तो बताएगा ज़रा। अभी की स्थिति कुछ इस प्रकार है कब चाहते हुए भी अवसाद की स्थिति बन ही जाती है। पर अब उससे पार पा लेने का थोड़ा सलीका सीख लिया।

घर का माहौल अभी ठीक है। सब काम निपट गया। फसल का काम अच्छे से हो गया और गेंहू को बेच भी दिए। इन दिनों सब गर्मी की नींद का आनंद ले रहे हैं। सुबह ग्यारह बजे तक घर का सब काम निपटाकर 12 बजे तक फिर से नींद में समा जाते है। इसी बीच लाइट का जाना मतलब सभी के मुंह से गालियों की बौछार होना। (लाइटा वारो मशाना में गयो पारो) ये वाक्य सब के मुंह से निकलता है ही। नींद भी गज़ब कहर ढहाती है। बस वो कहर दीदी पर ही असर नहीं करता। पिता जी अभी शादी ब्याह में लगे है रोज़ कहीं कहीं आना जाना लगा है। इसी बीच कभी-कभी हमारी शादी की बात भी होती है तो मन में थोड़ी घबराहट सी लगती है। जिम्मेदारियों से अभी डर लगता है बस। पर यह बात पिताजी को समझाना थोड़ा कठिन है उनकी नज़र में हम बड़े हो गए है। भाई जीवन के लिए अब हॉस्टल देखना है जिसमें वह दसवीं कक्षा की पढ़ाई करेगा। बहन पूजा का लास्ट पेपर 26 तारीख को है जिसके बाद वह बारहवीं कक्षा में जाएगी। फुल सिलेबस, होमवर्क से दबे विद्यार्थी कब असलियत में बोझ मुक्त पढ़ाई कर पाएंगे।

मेरे मित्र......मेरे पास कुछ गिने चुने दोस्त हैं जो मेरे दिल के बहुत ज्यादा क़रीब हैं, जो मुझे कंसेशन नहीं देते,मेरी सिर्फ अपने मतलब के लिए झूठी तारीफ़ नहीं करते। जो मेरी गलती होने पर कान भी खींचते हैं और जो दोस्त की कोई चीज़ पसंद नही आने पर 'सभ्यतावश' चुप्पी नहीं मारते। निकिताएकमात्र मेरी ऐसी दोस्त है जो मुझे कम लिखने की सलाह देती है और जिसकी दिलचस्पी मेरे काम में होती है.... एक हमसफ़र की तरह, नहीं गार्जियन की तरह। जिसके पास ऐसा दोस्त हो वो बड़ा रईस होता है। कभी-कभी में कल्पना करती हूं कि हम दोनों कहीं पहाड़ों वाली किसी सुंदर जगह पर बिल्कुल एक जैसे कपड़े पहने एक दूसरे के कमर में हाथ डाले, यथाक्षमता नाचने जैसा कुछ करने की कोशिश करते हुए किसी टीवी शो में गाना गा रहे है.....

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है.......

 वाकई दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जिसमें कुंडली नहीं मिलाओ तो भी मित्रता हमेशा बनी रहती है। डायरी की समाप्ति एक शेर के साथ करूंगी जो मैंने कहीं पढ़ा था याद गया...

हिम्मत हमारी थीं कि हंसे हम तमाम उम्र।
वरना हँसी इस दौर में कोई हँसी थीं।।
किरण सेन
बी.ए. बीएड. विद्यार्थी 
बसेड़ा 
 
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक चंदवानी

1 टिप्पणियाँ

  1. बेनामीमई 04, 2024 4:00 pm

    अपनी माटी पत्रिका का यह बेहतरीन प्रयोग है। किशोर जीवन मुश्किलों भरा होता है। किशोर नहीं जानते क्या हमारे लिए ठीक है और क्या नहीं। न वो अपने मन की बात कह पाते हैं। उन्हें अपनी मन की कह पाने के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने के लिए भाई माणिक को साधुवाद।

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