अध्यापकी के अनुभव : भइया यह दीवार बनती क्यों नहीं? / डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर

भइया यह दीवार बनती क्यों नहीं?
- डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर


यह आम धारणा है कि कोई भी कार्य हम तभी करते हैं जब इसका इनाम हमें मिले या फिर लोगों की शाबाशी मिलती रहे। इसके लिए व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्यों का मीडिया के मुख्य साधनों में प्रचार-प्रसार चाहता है। पर अब तक जो भी मेरे हाथों से थोडें-बहुत में कार्य हुए हैं,उसके लिए न तो किसीइनाम की कोई लालसा रखी और नही किसी भी प्रकार के प्रचार-प्रसार की। इसके पीछे का एक मूल कारण है, डॉ. मानिक और अभिनव सरोवर की मान्यता का अनुसरण करना। डॉ. मानिक अपना काम चुपचाप करने में विश्वास रखते हैं। ठीक इसी तरह से अभिनव सरोवर काम खूब करते हैं, पर किसी भी तरह के राजकीय सम्मान की लालसा मन में नहीं रखते हैं। इसी के चलते उन्होंने अब तक किसी भी प्रकार के पुरस्कार के लिए अपना नाम आगे नहीं भेजा है। इनके जितना सब्र मुझसे नहीं हो पाता। इनाम के लिए तो नहीं, लेकिन अपने कार्य का प्रचार-प्रसार जरूर सोशल मीडिया पर करता रहता हूं। इन सब के सुखद और दुखद परिणाम आपको इस संस्मरण में देखने को मिलेंगे।


सरकारी भवनों के निर्माण के दौरान बुनियादी सुविधाओं से जुड़े भाग कभी-कभी उपेक्षित रह जाते हैं। जहां नए सिरे से निर्माण हो रहा है, वहां तो फिर भी किसी न किसी तरह से काम चल ही जाता है, पर जिस संस्था में अकादमी एवं प्रशासनिक गतिविधियां जारी है और इस पुरानी बिल्डिंग के निर्माण में कुछ बदलाव की जरूरत पड़ती है तो कई बार बुनियादी सुविधाओं को लेकर के वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जाती है जिससे समस्या विकराल हो जाती है। जहां पर यह व्यवस्था मौजूद है वहां के भीतर का हाल भी किसी से छुपा हुआ नहीं है। पानी की समस्या, संख्यात्मक अनुपात में सुविधा उपलब्ध न होना, भीतर की टूट-फूट एवं इसके रखरखाव को लेकर के जो उदासीनता देखने को मिलती है, उन सब से हम अच्छी तरह से परिचित है। बड़े से बड़े सरकारी कार्यालय में शौचालय की स्थिति कई बार सड़ांध मारती चारदीवारी के रूप में दिखाई देती है।

अंबुजा सीमेंट का वह विज्ञापन तो आपको खूब याद होगा जिसमे अंबुजा सीमेंट से बनी दीवार को तोड़ने के लिए दोनों भाई मशक्कत करते है, पर वह टूटती नहीं है।इस विज्ञापन से यह बात समझ में आयी की किसी भी प्रकार की दीवार इतनी मजबूत न करो कि उसे तोड़ना असंभव हो जाएगा। अंबुजा सीमेंट से बनी दीवारें भी मनुष्य के प्रभाव से टूट जाती है, पर जब किसी व्यक्ति के मानस पर अकर्मण्यता की दीवार बन जाती है तो वह इतनी मजबूत होती है कि बड़ी से बड़ी परिवर्तनकारी शक्ति भी उसे तोड़ने में कई बार असमर्थ नजर आती है। जब तक मानस नहीं बदलता तब तक वह दीवार भी बरकरार रहती है। ऐसे मेंसृजन समाप्त हो जाता है।

पर यहाँ दीवार तोड़ने के बारे में नहीं, बल्कि दीवार बनाने के संबंध में इस बार बात करूँगा। कई बार ज़रूरी हो जाता है कि बुनियादी सुविधाओं के लिए हमें दीवारें बनाए। सरकारी महकमों में किसी भी प्रकार के निर्माण के लिये सरकारी व्यवस्थाएँ हमेशा तत्पर रहती है, पर कई बार लालफीताशाही के चलते यह निर्माण लंबे इंतजार के चक्रव्यूह में फंस जाता है।हर व्यक्ति अपने चूल्हे में आग जलाना चाहता है। ऐसे में अपने ऑफिस में फैली अव्यवस्थाओं को लेकर सरकारी अनुदान का इंतज़ार करते हुएआंखें मूंदे अपने काम में लगा रहता है।क्या करे, उसको तनख्वाह भी तो घर चलाने के लिए ही मिलती है।

प्रतापगढ़ में पोस्टिंग के समय जो पुरानी बिल्डिंग थी, वहाँ पर भी 300 लड़कों और स्टाफ साथियों के लिए केवल दो जनों के पेशाबघर वएकजने के लिए टॉयलेट था। 400 से ज्यादा लड़कियों वाले इस स्कूल में पेशाबघर नाममात्र था। आधे-अधूरे और जर्जर स्थिति वाले बाथरूम में जाना मज़बूरी थी। अनुपात से कम संख्या में मौजूद इस बुनियादी सुविधा के चलते विद्यार्थी स्कूल कैंपस से बाहर जाते रहते थे।जब नई बिल्डिंग बनी, तब भी लंबे समय तक ऐसी ही स्थिति रही। पेशाबघर की समस्या को लेकर के जब साथियों से बात करता तो जवाब मिलता,

“डायर साहब, आप क्यों चिंता करते हैं? आदिवासी है ये तो। सदियों से जंगल ही इनके लिए पेशाब घर रहा है। अभी भी जंगल में जाते हैं तो क्या हो गया?”

मैं मुस्कुराने के अलावा क्या कर सकता था। कुछ प्रयास किए और थोड़े समय बाद यह बुनियादी सुविधा कुछ ‘ठीक-ठाक’ हो पायी। अब सुनने में आता है कि मनोहरगढ़ में इसकी समस्या का निवारण स्थायी रूप से हो गया।

पहली बार जब स्कूल बाउन्ड्री में घुसा था तब स्कूल की दीवार फांदकर ही भीतर गया था। क्या करता, दीवार मात्र डेढ़ फिट की थी, सो थोड़ी देर उस पर बैठकर दूसरी ओर चला गया। स्कूल का मुआयना करने के बाद सबसे बड़ी कमी जो प्रतापगढ़ में भी मुझे लगी थी, वहीं यहाँ पर भी लगी यानी कि वहाँ पर भी चारदीवारी मुक्त विद्यालय था और यहाँ पर भी लगभग कुछ वैसा ही स्थित। यहाँ चारदीवारी तो है, पर नाममात्र की। स्टाफ साथियों से बातचीत द्वारा पता चला कि बुनियादी विकास के मामले में विद्यालय में कई काम अधूरे है।खैर अपने को क्या, दूसरों की तरह मैंने भी यह मान लिया कि स्कूल की दीवार छ: फुट ऊंची है। शुतुरमुर्ग बनकर बहुत दिनों तक आनंददायक जीवन जीता रहा।‘शुतुरमुर्गासन’ चिंतामुक्त जीवन हेतु सबसे उत्तम आसन है। गार्डन बन जाने के बाद भी दीवार को ऊंची उठाने का ख्याल मन में नहीं आया, क्योंकि जैसा कि मैंने पहले बताया कि यहाँ के लोग इतने भले है कि स्कूल संपत्ति को बिल्कुल नुकसान नहीं पहुंचाते। सो,स्कूल का गार्डन छोटी दीवार होने के बावजूद लंबे समय तक सुरक्षित रहा। पर लम्बे समय तकशुतुरमुर्ग अगर मुंडी रेत में दबाये रखेगा तो उसका दम घुटेगा ही।

एक घटना ने आंखें खोलने के लिए मजबूर कर दिया। आलमास प्रयोगशाला में लड़कियों के लिए अभी जो पेशाब घर बना हुआ है, वह बिलकुल बाहरी रास्ते के निकट है। उस पर आते-जाते लोगों की नजर पड़ना आम बात है।बाथरूम के लिए जाने वाली लड़कियां जब तक दीवार नहीं बनी थी, तब तक उसी डेढ़ फिट की दीवार पर बैठ कर अपनी बारी का इंतजार करती। मात्र दो जनों के लिए ही पेशाबघर हैं।एक दिन गार्डन को पानी पिलाते वक्त मेरी नज़र दीवार पर बैठी लड़कियों पर पड़ी जो अपने आप को कुछ असहज महसूस कर रही थी। स्कूल की बाउंड्री से बाहर की तरफ खड़े कुछ बाहरी मनचले उन परफब्तियां कस रहे थे।उस समयलड़कों को डांट-फटकार कर भगा दिया। जब क्लास के भीतर गया तो लड़कियों ने शिकायत की,“सर यह तो रोज़ का मामला है, क्या करे सड़क और पेशाबघर दोनों इतने नजदीक है कि इन मनचलों की नजर हम पर पड़ ही जाती है। तरह तरह की बातें हमें रोज़ सुनने को मिलती है। बेहतर ये होगा कि आप दीवार को ऊंची करवा दीजिए।” लड़कियों की बात मुझे जच गई।

प्रिन्सिपल साहब के सामने जब यह बात रखी तो उन्होंने बताया कि यह कार्य सरकारी है और मैं व्यक्तिगत रूप से सरपंच साहब से इस मसले पर बात करूँगा। अगले ही दिन प्रिन्सिपल साहब ने सरपंच साहब द्वारा दिए गए आश्वासन से रूबरू करवा दिया। 15 अगस्त को सरपंच साहब ने इस उत्सव पर भी बाउंड्री को ऊंचा उठाने की घोषणा कर दी। और इसके बाद शुरू हुआ इंतज़ार का दौर। एक के बाद एक करके तीन राष्ट्रीय प्रोग्राम में दीवार को ऊंचा करने की घोषणा हुई, पर यह दीवार है कि बनती ही नहीं। बजट स्वीकृति एवं अन्य पेचीदगियों के चलते शायद ये काम लंबा खिंचता जा रहा था।


तीसरी घोषणा के बाद भी जब काम शुरू नहीं हुआ तो विद्यार्थी मुझसे कहने लगे की हम अपने खर्चे पर इस दीवार को ऊंचा करेंगे। उनके इस फैसले को वेट एंड वॉच आश्वासन देकर थोड़े समय तक टाला क्योंकि अपने स्तर पर जब दीवार ऊंची उठेगी तो स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं नाराजगी भी पैदा होगी।आपसी सहयोग द्वारा दीवार को ऊपर उठाने का प्रस्ताव साथियों के सामने भी रखा। कुछ स्टाफ साथियों ने कहा,“यह सरकारी काम है, हमारा काम थोड़े ही है। हम कहाँ-कहाँ पर क्या-क्या बनाते रहेंगे?” उनका कहना भी अपनी जगह पर ठीक था, पर समस्या का समाधान भी तो नहीं हो रहा था। अनिर्णय की इस धुंध में कुछ सूझ नहीं रहा था किक्या करूँ? इस धुंध में जोश बनाने का काम स्कूल के पीटीआई साहब शमीम अंसारी ने किया और सहयोगी के रूप में भूमिका निभाई राजनीति विज्ञान के व्याख्याता प्रकाशचंद खोईवाल ने। शमीम साहब नेमुझे ऊंचा चढ़ाते हुए कहा, “डायर साहब आपके होते हुए यह दीवार बन जाएगी वरना और भी लंबा समय खिंचने के आसार हैं।”

दीवार के सिलसिले में अब बात कक्षा के विद्यार्थियों से होने लगी। कक्षा 12 में पढ़ने वाली विद्यार्थी मनीषा कुमावत के प्रस्ताव ने इस क्षेत्र में एक नई राह सुझाई। उसने कहा सर मेरे पिता जी तीन दिन तक राजमिस्त्री के रूप में इस दीवार के लिए काम करने के लिए तैयार हैं। यह एक तरह का अनोखा प्रस्तावथा। ठीक इसी तरह से कक्षा 11 और 12 के कई विद्यार्थी अपनी पॉकेट मनी इस दीवार के लिए खर्च करने के लिए आगे आए। ऐसे में अब हाथ पर हाथ धरे रखकर बैठना मुझे अनुचित लगा। थोड़ा मस्का प्रकाश जी के लगाया, थोड़ा पीटीआई जी और सुरेश जी को लगाया। पर जितना पैसा इकट्ठा हुआ वह अभी भी बहुत कम था। अब जरूरतों के लिए जुगाड़ी दिमाग लगाना शुरू किया। ईंटे नई और आखी (पूरी) लाने की क्या जरूरत है? पुरानी औरईंटों के टुकड़ों से भी तो काम हो सकता है।रेत पास की नदी से आ सकती है। यह लोड गांव के व्यापारी मदन जी के माथे। चारमज़दूरों का पैसा प्रकाश जी उठाएंगे। सीमेंट और अन्य खर्चा डायर बैंक के माथे। अगर ज्यादा जरूरत पड़ी तो विद्यार्थी की फौज जिंदाबाद।

दीवार का काम शुरू हुआ और जरूरत के अनुसार सामग्री लायी गयी। जब विद्यार्थियों, ग्रामीणों और स्टाफ साथियों के सहयोग से दीवार तैयार हो गई और उसके प्लास्टर करने की बारी आई तो बजट की कमी के चलते एक तरफ ही प्लास्टर कर के काम खत्म किया। हमें केवल बच्चियों की सुरक्षा के लिए आड़ चाहिए थी,सो तैयार हो चुकी थी। जब कुछ गांव वाले इस कमी के बारे में सवाल करने लगे हैं तो हमने स्थिति बताई। ग्रामीणों ने कहा कि अब इसे पूरा करने की जिम्मेदारी हमारी है गुरूजी। बाकी का सीमेंट और मजदूरी दीवार को बनाने वाले मज़दूरों ने ही अपनी तरफ से पूरी कर दी। तो कुछ इस तरह से यह दीवार कई आश्वासनों लंबे इंतज़ार के बाद तैयार हुई। रंग रोगन के लिए अब साथियों के सामने हाथ फैलाना मुझे उचित नहीं लगा। कहावत भी तो है कि ऊँट का गला अगर लंबा है तो वह काटने के लिए थोड़े ही है। सो अब इसके लिए दोस्तों के आगे हाथ फैलाया। कॉलेज जीवन में रूम पार्टनर रहे शब्बीर जो अभी मेहसाणा में एक कॉन्ट्रेक्टर है, उन्होंने इसकी जिम्मेदारी उठाई। पुताई की मजदूरी के लिए कक्षा 11 की लड़कियां आगे आयी।आड़े-टेढ़े तरीके से ही सही लेकिन इस जिम्मेदारी को कड़ी मेहनत के साथ निभा कर दिखाया। दूसरी बार पुताई विद्यालय के पूर्व विद्यार्थियों ने करके दीवार को वर्तमान रूप में ला पहुंचाया।तमाम चुनौतियों एवं लंबे इंतजार के कुचक्र को पार करते हुए यह दीवार सभी के सहयोग से तैयार हो पाई।

कहते हैं कि अंत भला तो सब भला। पर कई बार कुछ बातें होती हैं जो दिल पर पर बहुत गहरा निशान कर जाती है।मेरा मानना है कि जनहित के जो कार्य है वे बिना किसी ढोल-ढमाके के हो जाए तो अच्छा है। इसी कारण मनोहरगढ़ हो या अलमास, अब तक जो भी कार्य किये हैं, उनकों समाचार पत्रों में प्रकाशित करने का रिवाज शुरू नहीं कर पाया। हाँ, सोशल मीडिया पर जरूर इससे जुड़ी हुई पोस्ट कभी-कभी डालता रहता हूँ। खैर मैं आपको विषय की तरह ले चलता हूँ।

जब दीवार पूरी बनकर रंग-रोगन होने के बाद तैयार हो गई, उसके तीन-चार महीने बाद स्कूल प्रशासन ने सरकारी फंड सेबेकार पड़ी जमीन पर एक चबूतरा बनाकर टिनशेड की योजना बनाई और उसे पूरा किया। सरकारी फंड के साथ-साथ स्कूल के कार्मिकों से भी सहयोग लिया गया। यह कार्य पूरा होने के बाद एक दिन स्कूल ग्रुप मेंदैनिक भास्कर के पन्ने का स्क्रीनशॉट दिखा जिसमे भीतर हमारी स्कूल की खबर छपी थी। ग्रुप में बधाईयाँ देने का दौर चल रहा था। इस खबर के लिए जो विवरण और फोटोग्राफ्स प्रयोग में लिए गए थे वे स्कूल प्रशासन के द्वारा किए गए कार्यों का उल्लेख कर रहे थें। न तो विद्यार्थियों द्वारा तैयार किए गए गार्डन से जुड़ी कोई सामग्री थी और न ही विद्यार्थियों ने अपनी पॉकेट मनी काटकर जो दीवार बनवाई, उसकी कोई सूचना थी। फोटोग्राफ्स इस तरह से लिए गए कि बच्चों के द्वारा बनाई गई दीवार और गार्डन नहीं आ पाए। स्कूल प्रशासन के द्वारा तीन पूर्व में किए गए कार्यों का भी इसमें उल्लेख था।बहुत समय पहले विद्यालय प्रशासन द्वारा बनाया गया साईकल स्टैंड का भी फोटो और विवरण था, पर इसीके अगल-बगल में बच्चों द्वारा तैयार किए गए गार्डन और दीवार इसमें न आ पाए, इसके लिए तीन साल पुराना फोटो काम में ले लिया गया। केवल विद्यार्थियों के काम को चुन-चुनकर उसे बड़ी सफाई से हटाया गया था।

अच्छा नहीं लगा। प्रश्न उठना लाजमी था कि आखिर विद्यार्थियों के काम को खबर में जगह क्यों नहीं मिल पाई? स्कूल प्रशासन केतमाम तरह के नए और पुराने आंकड़ों के साथ पुराने फोटो को अखबार में जगह होने के बावजूद विद्यार्थियों के योगदान की गयी इस उपेक्षा के बारे में जब साथियों से बात की तो जवाब मिला “पत्रकार न जाने कब आया और अपने हिसाब से फोटो खींच करके ले गया।”“तो फिर आंकड़ें उसे कहाँ से मिल गए?” इस पूरकप्रश्न का जवाब किसी के पास नहीं था।

तमाम तरह की उठापटक के बाद यह काम अंजाम तक पहुंचा और लड़कियों के लिए बाथरूम के पास एक सुरक्षित माहौल मिल पाया। यह निर्माण इस सच्चाई पर अपनी मुहर लगाता है किकोई भी कार्य अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता, खासकर तब जब वह किसी संस्था से संबंधित भी हो। साझा प्रयास तब और ज्यादा मजबूत हो जाता है जब उस संस्था का हर एक व्यक्ति आपस में जुड़ कर काम करता हैं। विद्यार्थियों की पॉकेट मनी, उनकी मेहनत, ग्रामीणों और स्टाफ साथियों के सहयोग से तैयार इस दीवार के बादलड़कियां अपने आप को ज्यादा सुरक्षित महसूस करती है।


डॉ.मोहम्मद हुसैन डायर
व्याख्याता, हिंदी रा. उ. मा. वि. आलमास, भीलवाड़ा

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक चंदवानी

1 टिप्पणियाँ

  1. बेनामीमई 05, 2024 6:40 pm

    बहुत शानदार सर अत्यंत प्रेरणादायक कार्य

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