शोध आलेख : हिंदी आंदोलन के पुरोधा राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ के अवदानों को याद करते हुए / सौरभ सिंह

हिंदी आंदोलन के पुरोधा राजा शिवप्रसादसितारेहिन्दके अवदानों को याद करते हुए
- सौरभ सिंह

शोध सार : राजा शिवप्रसाद उन्नीसवीं सदी के एक अत्यंत लोकप्रिय प्रशासक, शिक्षाविद तथा साहित्यकार थे।अंग्रेजी राज के दौरान वे 'स्कूल इंस्पेक्टर' के पद पर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गये उत्कृष्ट सेवाओं के परिणामस्वरूप अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें 'सितारेहिंद' की उपाधि से नवाजा। उन्नीसवीं सदी के आरम्भिक वर्षों में वे पश्चिमी प्रतिमान पर शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करने वाले चंद भारतीयों में से एक थे। उत्तर भारतीयों, विशेषतः तत्कालीन पश्चिमोत्तर प्रांत एवं बिहार-क्षेत्र में, के बीच पश्चिमी प्रतिमान पर आधारित 'शिक्षा व्यवस्था' को लोकप्रिय बनाने में भी इनका योगदान अविस्मरणीय है। एक कुशल प्रशासक होने के साथ ही वह एक अत्यंत लोकप्रिय लेखक, प्रभावी राजनेता एवं प्रबुद्ध समाज सुधारक भी थे। यह लेख राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' के जीवन के तीन अहम पहलूओं जिनमें उत्तर भारत के जनसाधारण के बीच शिक्षा के प्रचार-प्रसार में इनके योगदान, उनके इतिहास एवं भूगोल सम्बन्धी पुस्तकों के लेखन तथा हिंदी-उर्दू के प्रसिद्ध भाषा विवाद में उनके योगदान को विश्लेषित करती है।


बीज शब्द : आधुनिकीकरण, विद्यालय, संघर्ष, इतिहास-लेखन, प्रशासक, शिक्षाविद, अभिजात्य, आंदोलन, राष्ट्रभाषा, सम्पर्क भाषा, सूचना-प्रदाता, विवाद


मूल आलेख : राजनैतिक दृष्टिकोण से उन्नीसवीं सदी के भारत में मुख्यतः दो तरह के परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। एक ओर जहां भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का प्रसार हो रहा था तो वहीं दूसरी ओर उसके प्रतिद्वंद्वियों की स्थिति निरंतर दयनीय होती जा रहा थी। अंग्रेजों ने अपने प्रतिस्पर्धी यूरोपीय शक्तियों तथा स्थानीय शासकों को हराकर खुद को भारत के शासक के रूप में प्रतिस्थापित किया। परन्तु भारत में शासन करना उनके लिए उतना आसान नहीं था। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण उनके द्वारा भारतीय समाज के बारें में इकठ्ठा की जाने वाली सूचनाओं पर बहुत हद तक निर्भर करता था।[1] भारत में अंग्रेजी साम्राज्य तब तक स्थायी नहीं हो सकता था जब तक कि उन्हें भारत के सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक तथा सांस्कृतिक पहलूओं के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो जाता। अतः उन्होंने इन सूचनाओं के संग्रह हेतु विविध प्रकार के सर्वेक्षण कराए।[2]

 

सूचनाओं के संग्रह में प्राच्यवादी विद्वानों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। प्राच्यवादियों नें देशज तथा क्लासिकल भाषाओं में मौजूद भारतीय धर्म ग्रंथों तथा साहित्यिक कृतियों का अध्ययन किया तथा उनका अनुवाद संकलन विभिन्न भाषाओं में किया।[3]लेकिन हमें यह बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि प्राच्यवादियों के ज्ञान कार्यक्षेत्र की भी एक सीमा थी। भारतीय समाज के ऐसे कई पक्ष थे जहां तक उनका पहुंच संभव नहीं हो सकता था। अतः धीरे-धीरे अंग्रेज अधिकारियों की निर्भरता भारतीयों पर बढ़ने लगी। अपनी प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ही वे भारतीय समाज में से ही ऐसे लोगों का चुनाव करने लगे जो उनके शासन के लिए अत्यंत आवश्यक थे। ये भारतीय मुख्यतः भारतीय समाज व्यवस्था के श्रेणीक्रम में उच्च तबके से संबंधित थे।


पहले पीढ़ी के भारतीय सहायक प्रायः क्लासिकल एवं देशज साहित्य के जानकार होते थे। जैसे-जैसे अंग्रेजों की स्थिति भारत में मजबूत हुई उनकी जरूरतें बदलने लगी। अब उनको ऐसे मातहतों की आवश्यकता महसूस हुई जिनको देशी भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा में भी महारत हासिल हो। शिवप्रसाद इसी (द्वितीय पीढ़ी) के 'स्थानीय सूचना-प्रदाताओं' में से एक थे।[4] ये बनारस के एक महत्वपूर्ण हस्ती थे। सी.. बेइली ने इन्हें एक स्वनिर्मित लोक-प्रसिद्ध व्यक्तिके रूप में चित्रित किया है।[5]एक 'सूचना प्रदाता' (मुखबिर) और अभिमत निर्माता के रूप में शिवप्रसाद का विशेष स्थान प्रतिष्ठा उनके असाधारण एवं व्यापक कार्यों का ही परिणाम था।


राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' (1823-1895 .) का जन्म में बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके पिता गोपीचंद अठारहवीं सदी में बंगाल के प्रसिद्ध 'जगतसेठ' के परिवार से थे। पिता की असमय मृत्यु के उपरांत इनका लालन-पालन इनकी दादी 'बीबी रतनकौर' ने किया। संस्कृत तथा फारसी भाषा में आरंभिक शिक्षा के उपरांत इन्होंने अंग्रेजी शिक्षा के लिए ' बनारस इंग्लिश सेमेनरी' में प्रवेश लिया।[6] अपने युवावस्था में शिवप्रसाद अंग्रेजों से घृणा करते थे। जिस कारण उन्होंने अंग्रेजी शासन के लिए काम (सेवा) करने की अपेक्षा देशी राजाओं के दरबार में काम करना बेहतर समझा। परन्तु थोड़े ही समय में उनका मोह भंग हो गया। भरतपुर के राज-दरबार में हुई बेज्जती और दरबारी कलह के कारण उन्होंने तय किया कि अब वो कभी देशी राजाओं के लिए काम नहीं करेंगे वर्ष 1845-1848 . तक शिवप्रसाद पश्चिमोत्तर प्रांत तथा पंजाब सरकार के अधीन विभिन्न पदों पर तैनात रहे। तदोपरांत वे हर्बर्ट एडवर्ड के नेतृत्व वाली शिमला एजेंसी में 'मीर मुंशी' के पद पर तैनात हुए। वे 1856 में पश्चिमोत्तर प्रांत के बनारस सर्किल में 'ज्वांइट स्कूल इंस्पेक्टर' के पद पर नियुक्त हुए। उनकी योग्यता को देखते हुए थोड़े ही वर्षों में उन्हें 'स्कूल-इंस्पेक्टर' के पद पर तैनात कर दिया गया। स्कूल इंस्पेक्टर बनने वाले वे पहले भारतीय थे।[7]


एक सरकारी अधिकारी, लेखक एवं राजनीतिक बुद्धिजीवी के रूप में अपने विभिन्न योजनाओं एजेंडों के प्रचार प्रसार हेतु शिवप्रसाद ने 'आधुनिक प्रिंट संस्थाओं का उपयोग बहुत ही सजगता से किया।[8] राजनीतिक रूप से वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे प्रखर विरोधियों में से एक थे। सर सैय्यद के साथ अपने तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद (चाहे वह भाषा का प्रश्न हो या मुस्लिम शासकों अभिजनों की आलोचना का) उन्होंने कांग्रेस के प्रचार प्रसार को रोकने तथा ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए सर सैय्यद के साथ मिलकर 'दी यूनाइटेड इण्डियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन' (1888 .)  की स्थापना की।


शिक्षा के क्षेत्र में शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' का योगदान


भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ होने के उपरांत अंग्रेजों ने भारतीय समाज को 'अनैतिहासिक एवं रूढ़' समाज के रूप में प्रस्तुत किया। अपने शासन को वैधता प्रदान करने के लिए उन्होंने पश्चिम शिक्षा (तथाकथित आधुनिक) अंग्रेजी भाषा का भरपूर सहारा लिया। भारत की शिक्षा व्यवस्था में पहला महत्वपूर्ण बदलाव 1813 चार्टर एक्ट के माध्यम से होता है। लेकिन यहां ' सामान्य शिक्षा ' जैसे आधुनिक विचार का पदार्पण 1850 के दशक से ही शुरू होता है। पॉपुलर एजुकेशन की दृष्टि से 'वुड डिस्पैच' (1854 .) मील का पत्थर साबित होता है। इसी कानून में सर्वप्रथम आम जनमानस के लिए पहली बार 'उपयोगी ज्ञान के निर्माण' की बात को स्वीकार किया गया।


शिवप्रसाद पश्चिमोत्तर प्रांत के शिक्षा विभाग से जुड़े एक अहम व्यक्ति थे। औपनिवेशिक सरकार ने 1856 . में उन्हें बनारस डिवीजन में 'ज्वांइट इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल' के पद पर नियुक्त किया गया। वे रॉल्फ ग्रिफिथ के अधीन कार्यरत थे जो उन दिनों सर्किल क्षेत्र के 'स्कूल इंस्पेक्टर' के पद पर तैनात थे। इलाहाबाद सर्किल के कुछ जिलों को भी 1857 . में अस्थायी रूप इनके कार्यक्षेत्र में जोड़ दिया गया। विलियम मूर (पश्चिमोत्तर प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर) के शासनकाल में वह 'स्कूल इंस्पेक्टर' के पद पर नियुक्त हुए और अपने सेवानिवृत्ति की अवधि तक वो इसी पद तैनात रहे।[9]


शिक्षा विभाग में अपनी नियुक्ति के समय से ही 'सितारेहिंद' ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विस्तार तथा विद्यालयों की स्थापना जैसे महत्वाकांक्षी योजनाओं से जुड़े हुए थे। उनको अपने इस कार्य में औपनिवेशिक सरकार से कोई विशेष लाभ नहीं प्राप्त हो सका।[10] परंतु बनारस के राजा तथा कुछ स्थानीय जमींदारों के सहयोग से ही उनकी योजना कुछ हद तक सफल रही। वर्ष 1872 . तक उन्होंने इस क्षेत्र में लगभग 1400 स्कूलों की स्थापना की। विद्यालयों में विद्यार्थियों की कम उपस्थिति तथा विद्यालय छोड़ने की उच्च दर उस समय की शिक्षा व्यवस्था की मुख्य समस्या थी। अतः शिवप्रसाद ने औपनिवेशिक सरकार से 'लोकप्रिय शिक्षा' को प्राप्त करने के लिए लोगों को आर्थिक सहायता भी प्रदान करने का आह्वान किया।[11] उनका मानना था कि लोगों को सबसे पहले भोजन की आवश्यकता है उसके बाद शिक्षा की। विद्यालयों की फीस को लेकर भी वे सरकार का विरोध करते नजर आए।


जिस समय शिवप्रसाद स्कूल इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हुए समय उस समय प्रांत में बालिकाओं के लिए एक भी विद्यालय (पृथक)नहीं था। उनके अथक प्रयासों से ही 1864 . में बनारस सर्किल में प्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना हुई। पहले वर्ष में इस विद्यालय में विद्यार्थियों की कुल संख्या 7 थी। यह संख्या अगले कुछ ही वर्षों में बढ़कर 89 हो गई। 1860 के दशक में जब उन्होंने लड़कियों के लिए विद्यालयों की स्थापना के मिशन की शुरुआत की तो उनको अपने समकालीनों के द्वारा कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा लेकिन वे मैदान में डंटे रहे। 1870 आते आते प्रांत के शिक्षा विभाग द्वारा संचालित/सहायता प्राप्त विद्यालयों में अध्ययनरत बालिकाओं की कुल संख्या 12000 हजार के करीब पहुंच गई[12]


शिवप्रसाद केवल शिक्षा से जुड़े अच्छे प्रशासक ही थे अपितु वह एक अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने प्राकृतिक दर्शन, इतिहास, भूगोल, व्याकरण, नैतिक शिक्षा जैसे विषयों पर लगभग 32 पुस्तकों (मुख्यतः स्कूली) की रचना की।[13] उन्होंने जनसामान्य के बीच उच्च शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार से समतावादी अवसर के एक सुचारू व्यवस्था को विकसित करने का भी आह्वान किया। उनके लिए निरीक्षण, जवाबदेही, शिक्षकों का प्रशिक्षण, मानक पुस्तकें एवं वैज्ञानिक प्रशिक्षण आदि लोकप्रिय शिक्षा के आधुनिकीकरण के प्रमुख तत्व हैं। वैज्ञानिक प्रयोग पर आधारित शिक्षा उनके शिक्षाशास्त्र का अभिन्न अंग था। ग्रामीण अंचल के विद्यालयों में आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा को लागू करने के प्रति उनका उत्साह, विज्ञान के क्षेत्र में पश्चिम के श्रेष्ठता संबंधी दावों में अभिजात वर्ग के लोगों की आस्था को भी दर्शाता है।


छात्रों को 'विज्ञान के चमत्कारों' से परिचित कराने तथा उनके अनुभव में सुधार के लिए उन्होंने लंदन से कुछ शैक्षणिक सामग्री को खरीद कर बनारस मंगवाया। लेकिन विज्ञान की शिक्षा के प्रति उनकी पुस्तक केन्द्रित परियोजना ज्यादा सफल हो सका।[14] इस असफलता का मुख्य कारण ग्रामीण शिक्षकों में प्रशिक्षण संबंधी योग्यता एवं शैक्षणिक कौशल की कमी थी। शिवप्रसाद के अनुसार गांवों में शिक्षा के निष्क्रियता का मुख्य कारण शिक्षकों की कमी तथा उनका अप्रभावी होना था। अतः शिक्षा में सुधार के लिए उन्होंने कुछ शिक्षकों के वेतन में कटौती, बनारस में शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय की स्थापना तथा शिक्षकों के स्थानांतरण जैसे महत्वपूर्ण अनुशासनात्मक कार्य किए।[15] लेकिन ये कार्य ज्यादातर असफल ही रहे।


शिवप्रसाद का इतिहास एवं भूगोल लेखन


पश्चिमोत्तर प्रांत में मुद्रण संस्कृति का आरंभिक विकास बनारस, कानपुर तथा इलाहाबाद में दृष्टिगोचर होता हैं। इसके आरम्भिक विकास में ईसाई मिशनरियों तथा अंग्रेजी प्रशासकों का बहुमूल्य योगदान था। दफ्तरों तक केन्द्रित इस मुद्रण संस्कृति का विस्तार बाजारों तक करने में यहां के स्थानीय निवासियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। बनारस में प्राच्यवादियों, मिशनरियों तथा काशी नरेश के द्वारा 1820 -1840 के दशक में प्रिंटिंग प्रेसों की स्थापना की गई है।[16] धीरे-धीरे बनारस संस्कृतनिष्ठ हिंदी में निकलने वाली पत्र-पत्रिकाओं का केंद्रस्थल बन गया।


पश्चिमोत्तर प्रांत से हिंदी भाषा में निकलने वाले प्रथम समाचार पत्र 'बनारस अखबार ' (1845 .) का संपादन राजा शिवप्रसाद ने ही किया।[17] इतिहास तथा भूगोल के विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों ने इनको लेखन के क्षेत्र में खूब प्रसिद्धी दिलाई। इन पाठ्यपुस्तकों की लेखन में उन्होंने पश्चिमी अनुभववाद तथा वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक लेखन की परम्परा को अपनाया जिसे इनके समकालीन स्थानीय लेखकों के द्वारा बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया गया था।
इतिहास तथा भूगोल जैसे विषयों पर उनका लेखन , वैभवपूर्ण प्राचीन कालीन हिंदू संस्कृति एवं सभ्यता के प्रदर्शन का ही एक माध्यम था जो उस समय के राष्ट्रवादी लेखन का ही अभिन्न हिस्सा था। शिवप्रसाद की विद्यालयी पुस्तकें वैश्विक इतिहास तथावैश्विक भूगोल के आधुनिक विचार की प्रेरणा पर आधारित था।


एशिया के भूगोल पर केंद्रित अपने पुस्तक 'भूगोल हस्तमालक'(1855 .) में उन्होंने भारत के परंपरागत पौराणिक ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) को नकार कर , अनुभववादी वाक्यांशों का प्रयोग किया। इस ग्रंथ में उन्होंने पारंपरिक तथा आधुनिक प्रक्रियाओं /तौर-तरीकों (Modalities) को एकत्रित करते हुए भूगोल के विषयवस्तु के रूप में भौतिक, वानस्पतिक, ऐतिहासिक, संख्यिकीय, राजस्व तथा जनगणना संबंधी आंकड़ों को शामिल किया।[18] इस पुस्तक में एशिया की प्राचीन कालीन श्रैष्ठता के लिए उन्होंने इस भूमि को मानव जाति और सभ्यता के पालने के रूप में चित्रित किया।[19] इस ग्रंथ में उन्होंने विज्ञान के अंग्रेजी शब्दावलियों का देशीकरण (Vernacularisation) भी किया। अर्थात् उन्होंने अक्षांश, देमांश जैसे शब्दों का प्रयोग किया।[20]


'इतिहासतिमिरनाशक' (1864/73)उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस ग्रंथ के लेखन में उन्होंने फारसी तथा अंग्रेजी स्रोतों का भरपूर उपयोग किया। अंग्रेजी पुस्तकों में उन्होंने मुख्यतः मार्शमैन एलफिंस्टन के लेखन का सहारा लिया।[21] राष्ट्रवादी इतिहास लेखन की शैली की जगह शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' ने औपनिवेशिक इतिहास लेखन की परंपरा को स्वीकार किया।[22] अपने इस पुस्तक में राजा शिवप्रसाद ने भारतीय इतिहास का काल विभाजन साम्राज्यवादी लेखकों के अनुरूप ही किया। पुस्तक का प्रथम भाग हिंदू तथा मुसलमान काल, द्वितीय भाग भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का उदय एवं विकास तथा तीसरा भाग वर्तमान समय में वैदिक शिष्टाचारों परम्पराओं में हो रहे बदलाव पर लिखा गया था।


हिंदी भाषा में किये जाने वाले भारतीय इतिहास लेखन में प्राचीन काल की श्रेष्ठता की पहली अभिव्यक्ति हमेंइतिहासतिमिरनाशकमें ही देखने को मिलती है। राजा शिवप्रसाद अपने इस पुस्तक के कई वाक्यांशों में मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के तथाकथित अत्याचारों का विवरण प्रस्तुत करते है। अपने इस ग्रंथ में उन्होंने भारत में मुस्लिम शासकों के शासन को नकारात्मक अर्थों में प्रकाश में लाया। इस पुस्तक के कई गद्यांशों में उन्होंने मुसलमानों पर आघात किया। जिस कारण उन्हें सर सैय्यद तथा उनके समर्थक की आलोचना का शिकार होना पड़ता है।[23] वीर भारत तलवार ने इस ग्रंथ की मुख्यतः दो विशेषताएं बताई है ; पहला , यह ग्रंथ इतिहास लेखन से धार्मिक विश्वास और पौराणिक कहानियों को अलग करते हुए ऐतिहासिक साक्ष्यों तथा पुरातात्विक स्रोतों के प्रयोग पर जोर देता है तथा दूसरा, आधुनिक इतिहास लेखन की परम्परा पर आधारित यह हिंदी भाषा का पहला ऐतिहासिक ग्रंथ था।[24]


इतिहास विषय से जुड़ी उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक 'सिक्खों का उदय एवं अस्त' अत्यंत महत्वपूर्ण है। सी. . बेइली के अनुसार उनकी यह पुस्तक समकालीन इतिहास पर वर्नाक्यूलर भाषा देवनागरी हिंदी में लिखी जाने वाली पहली आरम्भिक रचनाओं में से एक थी।[25] इस ग्रंथ का लेखन उन्होंने प्रमाणित सरकारी आंकड़ों के आधार पर किया। इसकी भाषा कठिन उर्दू थी, जो बोलचाल की उर्दू से उतनी ही दूर थी, जितना कि हिंदी से। शिवप्रसाद अपने जीवन काल में उपरोक्त पुस्तकों के अतिरिक्त वामामनरंजन, गुटका, विद्यांकुर, वर्णमाला सहित हिंदी तथा उर्दू की कुल 32 पुस्तकों को लिखा।[26] इनमें 'वामामनरंजन' उनकी एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक हैं जिसका लेखन उन्होंने विद्यालयी बालिकाओं के लिए किया। यह पुस्तक बालिकाओं के लिए नीतिपरक कहानियों का संग्रह थी।


हिंदी-उर्दू संघर्ष और राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद'


 अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में आधुनिकीकरण तथा पश्चिमीकरण को जन्म दिया। आधुनिकीकरण एवं पश्चिमीकरण के परिणामस्वरूप ही भारत में एक नये मध्यम वर्ग की उत्पत्ति हुईं। इस नवोदित मध्यमवर्ग ने एक ऐसे 'पब्लिक स्फेयर' का निर्माण किया जहां वे अपनी बातों को स्वतंत्रता पूर्वक रख सकते थे।[27] कोर्ट भाषा भाषाई शुध्दता सम्बन्धी उनकी मांग हिंदी - उर्दू संघर्ष के रूप में प्रकट हुई, जो बाद में भारत के विभाजन का एक मुख्य कारण बनता है।[28] इस आन्दोलन को उत्तर भारत के शिक्षित एवं सम्भ्रांत हिंन्दू मुसलमानों के द्वारा चलाया गया। यह आंदोलन हिन्दुओं मुसलमानों को बांटने वाले एक प्रमुख विभाजनकारी कारक के रूप में ऊभरा।[29] कुछ ही वर्षों में यह भाषाई संघर्ष धार्मिक रूप लेने लगा है। जहां एक ओर हिंदू धर्म के पुनरूत्थान से जुड़े समाज सुधारकों एवं बुद्धिजीवियों ने देवनागरी हिंदी के पक्ष में आंदोलन शुरु किया तो वहीं दूसरी ओर सर सैय्यद के नेतृत्व में संभ्रांत मुसलमानों का समूह उर्दू भाषा फारसी लिपि के संरक्षण हेतु एकजुट हो रहे थे।[30] राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' उत्तर भारत के एक प्रमुख साहित्यिक तथा प्रशासनिक हस्ती थे।हिंदी-उर्दू संघर्षमें उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी।


     उन्नीसवीं सदी के हिंदी आंदोलन की संस्थागत शुरुआत राजा शिवप्रसाद के द्वारा पश्चिमोत्तर प्रांत की सरकार को दिए गए एक मेमोरेंडम के माध्यम से होता है। इसका शीर्षक 'कोर्ट कैरेक्टर इन अपर प्रोविंसेज ऑफ इंडिया" था।[31] इस मेमोरेंडम के माध्यम से उन्होंने हिंदी भाषा को प्राचीनता तथा सर्वव्यापकता प्रदान करने का प्रयास किया। अर्थात् उन्होंने देवनागरी हिंदी को संस्कृत का प्रत्यक्ष वंशज घोषित करते हुए इसे सम्पूर्ण हिंदुस्तान में प्रचलित सर्वव्यापक भाषा के रूप में चित्रित किया।


     इसी मेमोरेंडम में फारसी एवं उर्दू (अरबी-फारसी लिपि में लिखे जाने वाली भाषा) को विदेशी भाषा घोषित करते हुए वे कहते हैं कि  ‘फारसी पढ़ने से कारण हम फारसीनिष्ठ होते चले जा रहे हैं। यह हमारे विचारों को विकृत तथा हमारी राष्ट्रीयता को खत्म कर रही है। केवल हिंदी ही है जो हिंदू राष्ट्रीयता तथा उत्तर भारतीयों को एक 'सम्पर्क भाषा' (Lingua Franca) के माध्यम से संगठित कर सकती है।'[32] शिवप्रसाद का मानना था कि 'किसी देश में समृद्धि, प्रबोधन तथा समाज-सुधार के लिए वहां एक भाषा और एक लिपि का होना अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार फारसी भाषा देश की प्रगति का मुख्य अवरोधक है। देवनागरी हिंदी भारत के लोगों के सशक्तिकरण का एक मुख्य साधन है।'[33] शिवप्रसाद को लगता था कि भाषा लिपि के सम्बंध में बंगाल हम सब का उदाहरण बन सकता है। क्योंकि वहां केवल एक भाषा और एक लिपि है। उनके लिए हिंदी देशभाषा होने के साथ ही जनसामान्य की भी भाषा थी।


     देवनागरी हिंदी उर्दू की पृथकता सम्बन्धी उनके विचारों में धीरे-धीरे उदारता आने लगा। वे हिंदी भाषा में उन शब्दों को बनायें रखने की वकालत करते हैं जो जनसामान्य की बोलचाल के भाषा में प्रमुखता से पायी जाती है। उनके इसी अपील के कारण उन्हें हिंदी आंदोलन के समर्थकों कीआलोचना का शिकार होना पड़ता है। उनके विचारों में आये इस नरमी का मुख्य कारण भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा दयानंद सरस्वती जैसे बुद्धिजीवियों से उनके वैचारिक द्वंद्वों के कारण उनके संम्बंधो में आईं कड़वाहट जिम्मेदार था।[34] वर्ष 1880 आते-आते पश्चिमोत्तर प्रांत के जनसामान्य के बीच इस मिश्रित हिंदी को शिक्षा के भाषा के रुप में लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी शिवप्रसाद 'सितारेहिंद' को ही जाता है।


 इस परिवर्तन के पश्चात शिवप्रसाद ने यह कहना शुरू कर दिया किहिंदी-उर्दू को दो पृथक भाषा मानना पूर्णतया अर्थहीन है। उनके मतानुसार हिंदी-उर्दू का विभाजन 'फोर्ट विलियम कॉलेज' (1800.) के हिंदू पंडितों तथा मुसलमान मौलवियों के