शोध आलेख : मेवाड़ और मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन / शेरिल गुप्ता

मेवाड़ और मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन
- शेरिल गुप्ता

शोध सार : भारतीय कला इतिहास में लघु चित्रकला की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। राजस्थानी कलम से ही मेवाड़ शैली के लघुचित्रों का कलात्मक विकास हुआ था इसलिए मेवाड़ शैली का राजस्थान में सर्वोपरि स्थान है तथा मध्यप्रदेश में लघुचित्र शैली का प्रारम्भ मालवा से हुआ। इस प्रकार एक कलाकार के सृजन क्षणों में जो मानस चित्र उभरते हैं उसमें काव्य, अनुभव और संस्कारों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता इसलिए रीतिकाल काव्य भारतीय चित्रकला का प्रमुख आधार स्तम्भ बना। रीतिकालीन कवि केशवदास कीरसिकप्रिया’ इस दृष्टि से प्रथम महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है जिसे मेवाड़ और मालवा के चित्रकारों ने आधार बनाकर बहुलता से चित्रित किया। मेवाड़ तथा मालवा लघुचित्र शैलियों ने सदैव ही एक- दूसरे को प्रभावित किया है परन्तु इन दोनों शैली के मध्य समानता होने के बावजूद भी अनेक भिन्नता है जिस कारण कला जगत में ये शैलियाँ अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखती हैं।

बीज शब्द : रसिकप्रिया, लघुचित्र, काव्य, रीतिकाल, ग्रन्थ-चित्रण, कलात्मक, शृंगार रस, तुलनात्मक, शैलीगत विशेषताएँ।  

शोध प्रविधि : यह शोध पत्र सैद्धान्तिक तथा वैज्ञानिक शोध विधियों पर आधारित है जिसके अन्तर्गत ऐतिहासिक, विश्लेषणात्मक और तुलनात्मक अनुसंधान पद्धति की सहायता से शोध के निष्कर्षो को प्राप्त किया गया है। तथ्यों का संकलन-इस शोध पत्र में प्राथमिक तथा द्वितीय दोनों स्रोतों द्वारा तथ्यों का संकलन किया गया है। प्राथमिक स्रोत-इसमें सर्वेक्षण विधि द्वारा सम्बन्धित कला विद्वानों से जानकारी प्राप्त की गई है। द्वितीय स्रोत-इस शोध पत्र को पूर्ण करने के लिए द्वितीय स्रोत का भी प्रयोग किया गया है जिसमें पुस्तकालयों, पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, शोध आलेख, पेपर, वेबसाइट आदि की सहायता से सम्बन्धित सामग्री का अध्ययन किया है।

प्रस्तावना : रसिकप्रिया शृंगार रस का प्रतीकात्मक काव्य है। इस रीतिकालीन काव्य ने चित्रकारों को सदैव ही प्रभावित किया है इसलिए यह काव्य अनेक रियासतों के शासकों का भी प्रिय विषय रहा है। इस प्रकार काव्य आधारित लघु चित्रकला की भारतीय परम्परा का सीधा अर्थ यह है कि जो स्थिति और भाव-व्यंजना कवि शब्दों के माध्यम से प्रकट करता है चित्रकार उसी को रंगों और तूलिका के माध्यम से जीवंत रूप प्रदान करता है। ‘‘ओरछा नरेश परम प्रतापी राजा इन्द्रजीत एक महान, गुण सम्पन्न, काव्य प्रेमी एवं कवि थे, इनके आग्रह पर 1591 . में कवि केशवदास कृत रसिकप्रिया ग्रंथ समस्त रसिकजनों के लिए नायक-नायिका भेद सम्बन्धी रस निर्णय पर रचित उत्तम काव्य है।1 भारतीय लघु चित्रकला एवं हिन्दी काव्य के क्षेत्र में 15वीं-16वीं शताब्दी कलात्मक पुनरुत्थान का काल रहा है  इसलिए इस काल में ललित कलाओं के क्षेत्र में सभी जगह एक नई चेतना जागृत हुई जिसका प्रभाव मेवाड़ तथा मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में स्पष्ट दिखाई देता है। ‘‘इस प्रकार लघुचित्रों की निर्माण प्रक्रिया का प्रारम्भ विशेषकर मध्यकाल से हुआ और मेवाड़ तथा मालवा शैली में रसिकप्रिया काव्य आधारित चित्रण 17वीं-19वीं शताब्दी तक चरम पर रहा।2

अध्ययन का उद्देश्य : प्रस्तुत शोध पत्र में आचार्य केशवदास कृत रसिकप्रिया काव्य के आधार पर मेवाड़ और मालवा शैली में बने इन लघुचित्रों की ओर कला मर्मज्ञों एवं जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करने हेतु इस विषय का चयन किया गया है जिसमें इन दोनों शैलियों में निर्मित रसिकप्रिया लघुचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

मूल आलेख :राजस्थानी चित्रकला के इतिहास में मेवाड़ शैली के चित्रकारों की देन सर्वथा अतुलनीय है। अपनी कलापूर्ण सुन्दरता और मनमोहक वातावरण के लिए सदैव ही मेवाड़ शैली प्रसिद्ध रही है इसलिए प्रारम्भिक राजस्थानी चित्रकला का विकास मेवाड़ शैली से ही माना जाता है।3 इसी प्रकार मध्य भारत के हृदयस्थलीय क्षेत्र में विराजमान मालवा शैली भी अपनी सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों के लिए सुविख्यात है क्योंकि राजस्थान से भौगोलिक निकटता होने के कारण मालवा क्षेत्र की आरम्भिक कला पर राजपूत चित्रकला की मेवाड़ शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है किन्तु इसके पश्चात् मालवा शैली ने धीरे-धीरे अपनी मौलिक परम्पराओं को आधार बनाकर चित्रण किया यही कारण है कि इन दोनों शैलियों के रसिकप्रिया लघुचित्रों में अनेक क्षेत्रीय विशेषताएँ पाई जाती है।

आचार्य केशवदास (1555-1617.) हिन्दी रीति-परम्परा के अन्तर्गत नवरस निरूपक आचार्य के रूप में अभिहित किये गये हैं। यह रीति परम्परा की नींव के ऐसे पत्थर हैं जिनके आधार पर रीति काव्य के विशाल भवन की दीवारें खड़ी हैं। उनके आचार्यत्व एवं काव्यों को जितनी लोकप्रियता रीतियुगीन समाज एवं सामन्तशाही दरबार में मिली उतनी शायद ही किसी अन्य कवि को प्राप्त हुई हो। कवि केशव की लोकप्रियता का दूसरा प्रमुख कारण उनके रसिकप्रिया ग्रन्थ का बहुचित्रण भी है।4 रसिकप्रिया ग्रन्थ नायक-नायिका काव्य आधारित रीतिकालीन वासना की गन्ध से परिपूर्ण है इस काव्य की परिकल्पनाओं के आधार पर ही मेवाड़ तथा मालवा शैली के चितेरों ने राधा-कृष्ण की प्रणय लीलाओं को अपने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से लौकिक सामन्ती जीवन के रूप में निरूपित किया है।

रसिकप्रिया ग्रन्थ में नवरसों का विवेचन होने पर भी शृगार रस की प्रधानता है क्योंकि शृंगार रस के स्वरूप-विधान में मानो केशव की चित्तवृत्ति अधिक रमी है।5राधा-कृष्ण की रति-क्रीड़ा में नवरसो की सृष्टि कर कवि केशव ने रसिकों के हृदय में रस का संचार कर दिया इसलिए काव्यात्मक गुणों से भरपूर इस ग्रन्थ के चित्रण में सम्पूर्ण रूप से उष्मा युक्त प्रेम का जीवंत दृश्य परिलक्षित होता है जो दिव्य एवं उत्तेजना पूर्ण धरातल पर होने के कारण अत्यन्त ही मधुर उत्कृष्ट हो गए हैं।6 इस प्रकार रसिकप्रिया काव्य रस की भावधारा से प्रेरित होकर मेवाड़ तथा मालवा शैली के चित्रकारों ने सौन्दर्य की खोज में प्रकृति की आत्मा से ऐक्य स्थापित कर अपनी रंगीन रसमयी तूलिका के माध्यम से सर्वत्र सौन्दर्य ही सौन्दर्य बिखेरा। इन चित्रकारों ने मनुष्य के विभिन्न भावों का सरलीकरण कर रस निष्पत्ति की थी, यही कारण है कि इन दोनो शैलियों के रसिकप्रिया लघुचित्रों में अपरिमित सौन्दर्य, प्रेम की आन्तरिक अनुभूति तथा लौकिक चेतना के दिव्य दर्शन होते हैं। वस्तुतः सौन्दर्य एवं प्रेम के मध्य का आवरण रसिक व्यक्ति के लिए अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण होता है इसलिए रसिकजन जो कुछ भी ग्रहण करता है उससे वह हर्षातिरेक (परमानन्द) सरोबार हो जाता है। इस प्रकार दृश्यात्मक रूप में प्रेम का प्रवाह सौन्दर्य बनकर नेत्रों में उमड़ता है यही कारण है कि इस अपरिमित सौन्दर्य के चित्रण में कवि से कहीं आगे चित्रकार पहुँच गया है। इन कवियों ने कुछ शब्दों में जो विषय चित्रांकन के लिए दिए उसे चित्रकार स्वयं की सजग परिकल्पना एवं बहुमुखी प्रतिभा से चित्रित कर उस लोक में पहुँचा देते हैं जहाँ अपरिमित सौन्दर्य के आलोक में रस का सागर हिलोरे लेता है।

रसिकप्रिया लघुचित्रों की तुलनात्मक विशेषताएँ : मेवाड़ तथा मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में विभिन्न प्रकार की शैलीगत विशेषताएँ अपना-अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं तथा इनकी मौलिक विशेषताओं के अध्ययन उपरान्त ही इनके भीतर छिपे सूक्ष्म अन्तर का वर्णन किया जा सकता है जैसे

1. रेखाओं का स्वरूप : चित्रकार जब अपनी कल्पना से भी चित्र बनाता है तो सर्वप्रथम रेखांकन कर अपनी कल्पना को रूपायित करता है इसलिए रेखांकन को चित्रकारी का आभूषण माना गया है।7 रसिकप्रिया काव्य शब्दों को चित्रात्मक रूपों में व्यक्त करने के लिए मेवाड़ तथा मालवा शैली के चितेरों ने उत्तम रेखांकन द्वारा अपनी बौद्धिकता का अद्भुत परिचय दिया। इन दोनों शैली के चितेरों ने मुक्त हाथों से जो रेखांकन किया है उसमें निश्चित ही भाव प्रवणता एवं गति विराजमान है। मेवाड़ शैली में चित्रित रसिकप्रिया शृंखला के चित्र फलक में रेखा उसकी आत्मा है जो दो बिन्दुओं को जोड़ने पर दृष्टि में लयबद्धता का संचार करती है। इन लघुचित्रों में रेखाएँ कहीं गहरी और कहीं हल्की बनाई गई हैं। इसके अलावा कहीं-कहीं मोटी रेखाएँ भी छाया-प्रकाश को व्यक्त करती हैं तथा बारीक रेखाएँ आकर्ष लिए अपनी गति के साथ हर्ष, दुख, उल्लास, आशा-निराशा, विरह- मिलन, मन्दता एवं तीव्रता की तेज चुभन को स्थापित करती हैं। इन रेखाओं के द्वारा ही चित्रकारों ने इन लघुचित्रों में अनेक मौलिक आकारों की रचना की है इसी भाँति ‘‘मालवा शैली के चितेरों ने रसिकप्रिया लघुचित्रों में रेखाओं को मोटी, सरल, आदेशात्मक दृढ़ता युक्त लोककला से प्रभावित दर्शायी है।8

2. वर्ण योजना : रसिकप्रिया लघुचित्रों में वर्ण बोध का दृश्यात्मक सिद्धान्त अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। इन चित्रों के संयोजन में प्रत्येक रंग का उचित स्थान है जैसे मेवाड़ शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में चितेरों ने रंग संयोजन के सभी सिद्धान्तों का विशेष ध्यान रखकर केवल अपनी रूचि और खिलते हुए रंगों का ही विशेष ध्यान रखा है इसी प्रकार मालवा शैली की वर्ण योजना में मनोवैज्ञानिक प्रभाव, हल्के- गहरे बलों का महत्त्व, रंगों का आपसी तालमेल तथा दूरी निकटता आदि समस्त गुणों को ध्यान में रखा गया है इसलिए मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में लोकतत्त्वों का प्रभाव भी दृष्टिगत है।इस प्रकार मेवाड़ और मालवा शैली में अनुरूप और विरोधी दोनों प्रकार के वर्ण संयोजन द्रष्टव्य हैं। विरोधी रंग योजना के प्रतीक स्वरूप कृष्ण को श्याम(नीलवर्ण) तथा राधा को गौरवर्णी दिखाया गया है।9 अधिकतर इन शैलियों के चित्रों में प्राथमिक रंगों का अत्यधिक प्रयोग हुआ है तथा भवन अंकन में विशेष रूप से श्वेत वर्ण का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार इन लघुचित्रों में सम्पूर्ण वर्ण योजना की अलौकिकता का आभास होता है।

3. वस्त्राभूषण : मेवाड़ शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में नायक-नायिका और सखियों की वेशभूषा का अंकन अत्यन्त ही कलात्मक है जिसमें चितेरों ने कृष्ण को पारम्परिक वेशभूषा के साथ उनके अलंकृत आभूषणों का भी चित्रण किया है तथा नायिका को घाघरा-चोली पारदर्शी ओढ़नी के साथ गहनों का अंकन भी बेजोड़ है। सामन्ती प्रभाव के कारण इन रसिकप्रिया लघुचित्रों में कृष्ण, राधा, गोप, गोपी आदि की वेशभूषा में राजा-रानियों, सामन्तों, जागीदारों आदि के वैभवपूर्ण अमूल्य वस्त्राभूषणों का प्रभाव अधिक है। इन चित्रों में अंकित नायक (कृष्ण) और नायिका (राधा) किसी राजा और रानी से कम प्रतीत नहीं होते क्योंकि नायक-नायिका सोने-चांदी के अनेक प्रकार के आभूषणों से भी समृद्ध हैं। मुगल कालीन वैभव का प्रभाव भी इन वस्त्राभूषण के अंकन में दर्शनीय है। इसके विपरीत मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में चितेरों ने वस्त्रों के कई प्रकार चित्रित किये हैं जैसे नायक (कृष्ण) को अधोवस्त्र पहने चित्रित किया है तो कहीं राजसी वेशभूषा में चित्रित किया है, कुछ चित्रों में नायक (कृष्ण) को मोर मुकुट धारण किए पूर्णतः कृष्ण रूप में चित्रित किया है। इस प्रकार वस्त्रों के कई निश्चित रूप नारी चित्रों में भी मिलते हैं जैसे दुपट्टा, ओढ़नी, चोली, अंगिया, घाघरा आदि। स्त्री आकृतियों में पारदर्शी ओढ़नी का अंकन भी किया गया है। इन चित्रों में नारियों की वेणियों (चोटियों) एवं लहंगे की चुन्नटों में लटकते हुए फुँदने तथा आभूषणों के अलंकरण में मालवा चित्रकार ने पूर्ण रूप से सजीवता एवं स्वाभाविकता लाने का प्रयत्न किया है जो मालवा शैली के विशिष्ट प्रभाव को इंगित करता है।  

4. प्रतीकात्मक अभिव्यंजना : रसिकप्रिया काव्य में प्रतीकात्मक अभिव्यंजना का बाहुल्य है। ये प्रतीक मुख्य रूप से शृंगार रस के उद्दीपन विभाव है इनमें परम्परा से चले रहे प्रतीकों का रूढ़ प्रयोग भी हुआ है और साथ ही युग संस्कृति से प्रेरित होकर नये प्रतीक भी सृजित हुए हैं। मेवाड़ शैली के चितेरों ने भी रसिकप्रिया लघुचित्रों में इन प्रतीकों का बहुलता से चित्रण किया है जैसे वृक्षों के अंतर्गत कदली के वृक्ष, पुष्पित पल्लवित आम्र वृक्ष, कदम्ब के वृक्ष, लताओं की भाँति लटकते हुए शमी वृक्ष, केवड़ा, खजूर एवं बरगद आदि। पशुओं के चित्रण में प्रतीक स्वरूप हाथी, हिरन, घोड़ा, बन्दर, साँप आदि जन्तुओं को विशेष रूप से यथार्थ के साथ चित्रित किया गया है इसके साथ ही मेवाड़ शैली के इन चित्रों में शृंगारिक मयूर के अतिरिक्त शुक, कोयल, सरोवर में क्रीड़ा करती बत्तखे, तालाब किनारे खड़े सारस तथा प्रेम प्रतीक स्वरूप कबूतर आदि भी प्रमुखता से चित्रित हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण मेवाड़ शैली के चित्रों में चट्टानें भी द्रष्टव्य हैं तथा स्थापत्य का अंकन भी प्रतीक स्वरूप सौन्दर्यपूर्ण ढंग से हुआ है। ‘‘इसी प्रकार मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्रों में भी इन प्रतीकों को कलात्मक रूप से अंकित करने की चेष्टा की गयी है जिसमें लोक तत्त्वों का प्रभाव भी समाहित है।10 इन चित्रों में लंकारिक वृक्षों का अंकन मुख्य रूप से अण्डाकृत आकृति में दर्शनीय है विशेष रूप से कदली, अशोक और आम्र वृक्ष के साथ-साथ घास, झाड़ियाँ, लताएँ एवं पुष्पों का अंकन भी प्रमुख है। मालवा शैली के इन चित्रों में पशु-पक्षियों के अन्तर्गत विचरण करते मृग, उछलते-कूदते बन्दर तथा सौन्दर्य, उल्लास एवं प्रेम के प्रतीक स्वरूप मयूर आदि का चित्रण बहुलता से किया गया है। ‘‘मालवा शैली के लघुचित्रों की विशेषता है कि श्वेत रंग से निर्मित स्थापत्य अंकन में गुम्बज, ऊँची मीनार मेहराब आदि दर्शनीय हैं जिनमें बेल-बुटों, पुष्पों का चित्रांकन अत्यधिक रूप से किया गया है इसलिए इन चित्रों में लोक तत्त्वों का आभास होता है।11

5. रूप चित्रण : रूप चित्रण रसिकप्रिया लघुचित्रों का अत्यधिक प्रभावशाली कला उपकरण है जिसके द्वारा नायक-नायिका तथा अन्य पात्रों के अंग-प्रत्यंगों के अंकन को आधार प्राप्त होता है। रसिकप्रिया काव्य को आधार बनाकर मेवाड़ शैली के चितेरों ने राधा-कृष्ण की पारम्परिक परिकल्पना को साकार किया है इनके चरित्रों के अंग-प्रत्यंगों के अंकन में कृष्ण को गठीले तथा मेवाड़ी पुरूषों की शारीरिक बनावट के अनुकूल चित्रित किया है और राधा गोपियों के कलेवर में राजसी रूप की पुष्टता का पूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर है।इसके विपरीत मालवा कलम की नायिका की देहयष्टि सुघड़़ और सुदृढ़ है उसका मस्तक प्रशस्त है तथा कलाईयाँ कोमल किन्तु दृढ़ हैं। मालवा शैली में रची गई रसिकप्रिया काव्य आधारित नायिका अन्य शैली में रची गई नायिकाओं की तरह सुकोमल नहीं है इसलिए मालवा शैली में चित्रित नायिकाओं की देहयष्टि तथा भावभंगिमा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वह आम जनजीवन के अनुरूप हैं।12

रसिकप्रिया लघुचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन :

1. प्रस्तुत चित्र संख्या-1 और 2 रसिकप्रिया के श्री राधिकाजू का प्रकाश प्रलाप, यथा (सवैया): पर आधारित है-

आलिनि माँझ मिली हुती खेलति
जानै को कान्ह धौं आए कहाँ तैं।
डीठिहि डीठि परयो कछू
सठ ढीठ गही हठि पीठि की घातैं।
गई गड़ि लाजनहीं हिय हौं तौ
उठी जरि केसव काँपति यातैं।
इती रिस मैं कबहूँ बची पै
रही पचि हौं अँखियान के नातैं।।13

भावार्थ : नायिका सखियों से कहती है, सखियों के कारण (यहाँ सखियां दो प्रेमियों को मिलाने का माध्यम है) कान्हा खेलने के प्रयोजन से बहाना लेकर आए हैं मुझे आँखो की दृष्टि से कुछ दिखायी ना पड़ा कि यह दुष्ट, ढीठ नायक पीठ के पीछे से कैसे आए। मैं लज्जा के मारे शर्म से गड़ी जा रही हूँ उसकी इस ढिठाई को देखकर ऐसा जान पड़ता है कि मैं जली जा रही हूँ जिसके कारण मैं काँप रही हूँ इतना रोष तो मैंने कभी भी नही सहा है केवल आँखो के कारण इतनी परेशानी सह रही हूँ।


चित्र वर्णन : रसिकप्रिया के उपर्युक्त सवैये के अनुसार मेवाड़ और मालवा शैली के चित्रकारों ने अपनी-अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर स्वयं की प्रखर कल्पना को साकार कर सुसज्जित कर दिया है। मेवाड़ शैली के चित्रकार ने रसिकप्रिया चित्र संख्या-1 को दो भागों में संयोजित कर प्रत्येक दृश्य को क्रमबद्ध रूप से चित्रित किया है। चित्र के ऊपर की ओर छन्द युक्त कलेवर लिखा गया है तथा चित्र के प्रथम भाग में नायिका के शारीरिक सौन्दर्य, कोमल सुगठित देहयष्टि, मुखमंडल की ज्योति व प्रेम की उदात्तता आदि का चित्रण अत्यन्त ही मनोवेग से किया गया है और नायिका के पीछे की ओर से नीलवर्णी कृष्ण को नायक के रूप में नायिका के नेत्रों के ऊपर प्रेमपूर्वक हाथ रखे हुए दर्शाया गया है साथ में अन्य सखियों का चित्रण भी कलात्मक रूप से हुआ है। चित्र की पृष्ठ भूमि में वृक्षों के साथ हरे रंग का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार चित्र के दूसरे भाग में उसी सौन्दर्य के साथ नायिका को सखी से वार्तालाप की मुद्रा में तथा नायक को दूर जाते हुए चित्रित किया गया है। इसके विपरीत मालवा शैली के चित्रकार ने रसिकप्रिया चित्र संख्या-2 में उसी काव्य रस के अनुसार नायिका की सुदृढ़ आकृति का अंकन किया है तथा नायक को प्रेम से लिप्त नायिका के पीछे की ओर से पकड़ते हुए दर्शाया गया है जिसमें से नायक का एक हाथ नायिका के मुख पर और दूसरा हाथ कमर पर है। चित्र में दो अन्य सखियों का चित्रण भी किया गया है। नायिका के लहंगे में रंगों की आड़ी पट्टी तथा वेणी में काले वर्ण के फुँदने चित्रित किए गए हैं इसके साथ ही वृक्षों को अंडाकार रूप में अंकित किया है और प्रतीक स्वरूप बन्दर का अंकन भी किया गया है यह सभी मालवा शैली की मूल विशेषताएँ हैं जिसमें लोककला के तत्त्वों का भी आभास होता है। इस प्रकार इन दोनों चित्रों के दृश्यात्मक अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि एक ही सवैया होते हुए भी इन चित्रों में शैलीगत विशेषताओं का प्रभाव दर्शनीय है।

  

निष्कर्ष : मेवाड़ और मालवा शैली में निर्मित रसिकप्रिया लघुचित्रों के मौलिक स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन करने के पश्चात् यह ज्ञात होता है कि विभिन्न समयांतरों में भिन्न-भिन्न शैलियों एवं चित्रकारों द्वारा रचित ये लघुचित्र रसिकप्रिया काव्य के एक ही पद्य पर आधारित होते हुए भी दृश्यात्मक संयोजन, अलौकिक परिपेक्ष्य, वर्ण वैज्ञानिकता, प्रतीकात्मक अलंकरण तथा दीप्ति पूर्ण आभा आदि में एक-दूसरे से भिन्न है जिससे स्पष्ट होता है कि चित्रकारों ने एक-दूसरे की नकल करते हुए स्वयं की कल्पना शक्ति से रसिकप्रिया की कविताओं के भावों की पूर्ण आत्मा को चित्र फलक पर संयोजित करने का अद्भुत प्रयास किया है। इस प्रकार काव्यगत भाव धारा से युक्त मेवाड़ और मालवा शैली के रसिकप्रिया लघुचित्र भारतीय कला जगत की अमूल्य धरोहर है जो संसार के विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं तथा वर्तमान में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं।

संदर्भ :
1. नीरज, जयसिंह. राजस्थानी चित्रकला और हिन्दी कृष्ण काव्य. प्रकाशक: महाराजा मानसिंह पुस्तक, जोधपुर, 2009, पृष्ठ सं. 87.
2. अग्रवाल, श्याम बिहारी. भारतीय चित्रकला काव्य एवं संगीत. प्रकाशक: डॉ. ज्योति अग्रवाल, ’रूपशिल्प’, इलाहाबाद, 2020, पृष्ठ सं.77.
3. अग्रवाल, श्याम बिहारी और अग्रवाल ज्योति. भारतीय चित्रकला का इतिहास, मध्यकालीन भाग-2. प्रकाशक एवं लेखकडॉ. श्याम बिहारी अग्रवाल और डॉ. ज्योति अग्रवाल रूपशिल्प’, प्रयागराज, 2022, पृष्ठ सं. 40.
4. अग्रवाल, श्याम बिहारी, भारतीय चित्रकला काव्य एवं संगीत, प्रकाशक: डॉ. ज्योति अग्रवालरूपशिल्प’, इलाहाबाद, 2020, पृष्ठ सं. 76.
5. अग्रवाल, राका. कांगड़ा शैली के लघुचित्रों में शृंगा-रस निरूपण. पब्लिकेशन्स: कविता मित्तल, अनुबुक्स, मेरठ, 2022 पृष्ठ सं. 43.
6. नीरज, जयसिंह. राजस्थानी चित्रकला और हिन्दी कृष्ण काव्य. प्रकाशक: महाराजा मानसिंह पुस्तक, जोधपुर, 2009, पृष्ठ सं. 88.
7. अग्रवाल, गिर्राज किशोर. रूपांकन रूप चित्रण के तत्व और सिद्धान्त. प्रकाशक: संजय पब्लिकेशन, आगरा, 2020, पृष्ठ सं. 28.
8. कुमारी, कंचन. मालवा लघु चित्रण शैली में आध्यात्मिक आनन्द, शोध कोश, जर्नल ऑफ विजुअल एण्ड परफॉर्मिंग आर्ट्स, जुलाई-दिसम्बर 2(2), 2021, पृष्ठ सं. 34.
9. नीरज, जयसिंह. राजस्थानी चित्रकला. प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर, 2022, पृष्ठ सं. 103.
10. उपाध्याय, नर्मदा प्रसाद. मालवा के भित्ती चित्र, प्रकाशकः निदेशक आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, मध्यप्रदेश जनजाति संग्रहालय, भोपाल, 2018, पृष्ठ सं. 328.
11. कुमारी, कंचन. मालवा घु चित्रण शैली में आध्यात्मिक आनन्द, शोध कोश, जर्नल ऑफ विजुअल एण्ड परफॉर्मिंग आर्ट्स, जुलाई-दिसम्बर, 2(2) , 2021, पृष्ठ सं. 34.
12. उपाध्यायनर्मदा प्रसाद. मालवा के भित्ती चित्र. प्रकाशकः निदेशक आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, मध्यप्रदेश जनजाति संग्रहालय, भोपाल, 2018, पृष्ठ सं. 325.
13. तिलक, प्रियाप्रसाद, आचार्य केशवदास कृत रसिकप्रिया. प्रकाशक: कल्याणदास एण्ड ब्रदर्स ज्ञानवापी, वाराणसीप्रथम संस्करण, 2015, पृष्ठ सं. 176.
चित्र स्रोत :
1. चित्र संख्या-1: राजकीय संग्रहालय, उदयपुर.
2. चित्र संख्या-2: देहजिया, वी हर्षा, रसिकप्रिया: एर्टलियर्स ऑफ लव में केशवदास का रीतिकाव्य.प्रकाशक: डी.के.प्रिन्टवर्ल्ड लिमिटेड,नई दिल्ली, 2013.

 

शेरिल गुप्ता
शोध छात्रा, चित्रकला विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
sherilgupta03@gmail.com

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक कुमार

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