पुस्तक समीक्षा : जयप्रकाश कर्दम का कविता संसार और ‘विषाक्त हवाओं के बीच’ / अंकिता सिंह

जयप्रकाश कर्दम का कविता संसार और विषाक्त हवाओं के बीच
- अंकिता सिंह

हिन्दी साहित्य में विमर्शों के उभार के बाद कविता की ज़मीन व्यापक हुई है। पहले जहाँ कविताएं एक खास वर्ग,जाति और समुदाय की होती थीं, वहीं अब कविताएं ज्यादा लोकतांत्रिक हुई हैं। अगर किसी देश के साहित्य में उस देश के हर व्यक्ति का चेहरा/अक्स देखने को नहीं मिलता है, तो वह साहित्य भले ही कितना लोकप्रिय क्यों हो वह सर्वजन साहित्य नहीं है। दलित विमर्श ने हिन्दी साहित्य को लोकप्रिय साहित्य के सांचे से बाहर निकालकर उसे सर्वजन का साहित्य बनाने का उपक्रम किया है। दलित कविता अपने वर्तमान से मुठभेड़ करती है। वर्तमान की जमी़न पर ही खड़ी होकर अतीत का सही-सही मूल्यांकन संभव है। इसलिए दलित कवि इसी ज़मीन पर खड़ा होकर अपने अतीत का मूल्यांकन करके उससे मुक्ति का रास्ता तलाशता है|”1 अतीत का मूल्याकंन करके वर्तमान ज़मीन को समतल कर सर्वजन साहित्य रचने की दृष्टि से जयप्रकाश कर्दम के साहित्य को भी देखा जा सकता है। वैसे जयप्रकाश कर्दम की पहचान छप्परउपन्यास से शुरू होती है, लेकिन कर्दम को मुख्यत: कवि के रूप में भी देखा सुना जाता है। अपनी कविताओं के बारे में बात करते हुए कर्दम कहते हैं- ये कविताएँ मेरे आज के चिंतन का प्रतिबिंब हैं। कविताओं में अभाव, शोषण, उत्पीड़न से लेकर समानता, प्रेम और संघर्ष आदि सामाजिक संवेदनाओं, समस्याओं, प्रश्नों और चुनौतियों की अभिव्यक्ति है।2 इस अभिव्यक्ति की ही बात करें तो पाते हैं कि जयप्रकाश कर्दम का काव्य रचना संसार सन् 1997 से प्रारंभ होकर अब तक अनवरत रूप से चल रहा है। इनका पहला कविता संग्रह सन् 1997 में अमन प्रकाशन से गूंगा नहीं था मैंनाम से प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा इनके अब तक कुल 8 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। तिनका तिनका आग(2004) बस्तियों से बाहर(2013), ‘दुनिया के बाज़ार में (2021) लाशों के शहर में (2022) जिंदा रहने की जिद (2022), ‘बेवजह नहीं कुछ भी (2023) तथा विषाक्त हवाओं के बीच (2023) से अब तक के प्रकाशित काव्य संग्रह हैं। इसके अलावा जयप्रकाश कर्दम ने राहुलनाम से एक खण्ड काव्य की भी रचना की है।

विषाक्त हवाओं के बीच जयप्रकाश कर्दम का नवीनतम या यूं कहें सद्य:प्रकाशित काव्य संग्रह है जो कि अमन प्रकाशन कानपुर से 2023 में प्रकाशित हुआ है। संकलन में कुल 78 कविताएं हैं, जिन्हें अलग-अलग भावबोध की कविताओं के रूप में देखा जा सकता है| भारतीय समाज के विभिन्न आयामों को लिए इस काव्य संग्रह की कविताओं में कवि ने बहुत सारे विषय और संवेदनाओं को छुआ है| वस्तुतः कवि के पास एक जागरूक दृष्टि और संवेदनशील मन है, इसलिए समाज की विसंगति और विकारों तथा उसमें घटित होने वाली घटनाओं और परिवर्तनों से वह बचकर नहीं निकल सका है| इसी कारण इन कविताओं में कवि ने जहां दलितों के प्रति होने वाले जातिगत अन्याय और शोषण के प्रतिकार में स्वर बुलंद किया है, वहीं कवि ने सरकारी तंत्र, राजनीति, सत्ता, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, निजीकरण, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, मनुष्यता आदि से जुड़े समसामयिक मुद्दों को भी अपनी कविताओं का वर्ण्य विषय बनाया है|

 इस संग्रह की पहली कविता मनुष्यता के साम्राज्य का नागरिकहै, जबकि अंतिम कविता आपदाहै। कहना होगा कि दलित कविताएं अब तक झेली गयी आपदाओंके बाद भी इस समय समाज में मनुष्यता का नागरिक बने होने की बात अनवरत रूप से करती रही हैं। इनकी कविताओं में जीवन की विविधता है और परिवेश अपनी सम्पूर्णता में है। दलित कविता सजीव बिम्बों और प्रतीकों को नया अर्थ देने की वजह से अपनी अलग पहचान कराती है। यह कविता अपनेऔर परायेकी भी ठीक-ठीक पहचान कराती है और यह पहचान दलित चेतना के बिना अंसभव है|”3 इस संग्रह की कविताओं को देखें तो पाते हैं कि इस संग्रह में मिथकीय पात्रों पर आधारित कविताएं भी एक नया वितान खड़ा करती हैं।

इस संग्रह की कविताओं में अपने निजी अनुभव और संवेदनाओं के द्वारा सामाजिक समस्याओं को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है। ये कविताएं कोरोना काल के दौरान लिखी गई थीं, इसलिए कई कविताओं में उस दौर की स्थिति और अनुभूतियों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है|”4 चूंकि दलित साहित्य की वैचारिकी असमानता के तमाम बिंदुओं को रेखांकित करती है, इसलिए इस संग्रह में कुछ कविताओं के शीर्षक ही इन कविताओं के तेवर को स्पष्ट कर देते हैं। मसलन अपराध मनुवाद का’, ‘मनुष्यता की परिभाषा’, ‘भिन्न हैं हम’, ‘ब्राहमण देवता’,‘जाति एक दर्द हैइत्यादि।

ब्रह्मकविता में कवि ब्रहम के मिथक के बहाने वर्णव्यवस्था की कुटिलता को पोषने वाले तथाकथित उच्चवर्णीय मानसिकता के लोगों को कटघरे में खड़ा करता है-

तुमने ही बनायी थी वर्ण-व्यवस्था
वेदों में ब्रह्म के नाम से
थोपे निषेध और वर्जनाएं
शूद्रों और अत्यंजों पर5

 

इसलिए भी शायद कवि अपने इस संकलन की पहली कविता 'मनुष्यता के साम्राज्य का नागरिक' में ही ईश्वर और उसकी ईश्वरीय सत्ता को नकार देता है-


मैं नास्तिक हूँ
नहीं है किसी ईश्वर, अल्लाह
या गॉड से मेरा कोई रिश्ता6

कवि के आक्रोशी तेवर का परिचय कराती इस कविता में ईश्वर और धर्म की आड़ में सामाजिक विषमता, शोषण, अन्याय के पोषक तथाकथित ब्राह्मण वर्ग के छद्म उद्घाटित करते हुए कवि बता देना चाहता है कि जिस ईश्वर के साम्राज्य में मैनें हज़ारों साल से शोषण, दमन, उत्पीड़न की जिंदगी को जिया है, मैं उस ईश्वर का त्याग करता हूं, बहिष्कृत करता हूँ

 

ईश्वर के साम्राज्य में
उपेक्षा, दमन और वर्जनाओं का
दंश सहता आया मैं
घोषणा करता हूँ आज
अपने पूरे वजूद के साथ
ईश्वर के साम्राज्य का नागरिक नहीं हूँ मैं....
त्याज्य है मेरे लिए ईश्वर और उसकी दुनिया7

 

कवि जानता है कि जब तक देश में मनुवाद आधारित वर्ण, जातिव्यवस्था, धर्म, पांखड कायम है, तब तक मनुष्यता नहीं पनप सकती। इसलिए कवि मनुवादी मूल्यों को नकारते हुए मनुष्यता के मूल्य को सबसे बड़ा मूल्य मानते हुए मनुष्यता के साम्राज्य का नागरिक होना चाहता है-

 

मनुष्यता है मेरे लिए सबसे बड़ा मूल्य
नागरिक हूँ मैं
मनुष्यता के साम्राज्य का|”8

 

दलित कविता का मूल स्वर मनुष्यता है। और कवि कर्दम जानते हैं कि मनुष्यता के निर्माण और विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए अपनी कविताओं के माध्यम से वह मंदिरों की जगह स्कूलों को बनाने की बात करते हैं, क्योंकि सही शिक्षा मनुष्य के अंदर मानवीय मूल्यों का विकास करती है, उसे मानवीय बनाती है। देश के निर्माण और विकास में महती भूमिका निभाती है। तभी तो कवि इंसान कविता में कहता है :-

 

तुम्हें बनाने हैं मंदिर
मुझे बनाने हैं स्कूल...
मैं चाहता हूँ
संविधान का सम्मान
तुम्हें बनाने है हिंदू-मुसलमान
मुझे बनाने हैं इंसान।9

 

आज के सत्तालोलुप राजनीतिक समाज में सत्ता प्राप्ति के लिए ज्ञान और तर्क के सभी दरवाजों को बंद कर मंदिर, मस्जिद, तंत्र-मंत्र का जाल बिछाकर मनुष्य की चेतना को कुंद करने की कोशिश हर तरह से जारी है। ऐसे समय में चेतना को कुंद करती ऐसी साम्प्रदायिक ताकतों को कमज़ोर कर कवि एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई की भावना से परे सबसे पहले इंसान को एक इंसान समझा जाए। एक ऐसा इंसान जो ज्ञान, तर्क, प्रेम, करूणा, समता, न्याय, बंधुत्व की भावना से भरा हो।

 

बाबा साहब आंबेडकर का मूल मन्त्र  शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो का स्वर भी इस संग्रह में मुखरित होता रहता है। कर्दम इस संग्रह की भूमिका में लिखते हैं- "मुक्त वातावरण और ताज़ी हवा जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है, चाहे वह प्राकृतिक वातावरण हो अथवा सामाजिक वातावरण।"10 दलित कविता सामाजिक जातिगत मुक्ति की ही तो बात करती है, क्योंकि "प्रदूषित वातावरण खिले हुए जीवन को भी बुझा देता है। विषाक्त हवाओं के बीच जीना वास्तव में जीना नहीं जीने का संघर्ष है।"11 कहना होगा कि विषाक्त हवाओं से कर्दम का तात्पर्य राजनीतिक, सामाजिक जीवन में व्याप्त जाति-भेद, भेदभाव, असमानता की व्यवस्था से है, जिसे वह खुद आगे स्पष्ट करते हैं। "जातिगत भेद, साम्प्रदायिक द्वेष और आर्थिक शोषण सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है। साम्प्रदायिकता और जातिवाद के कारण समाज का वातावरण विषाक्त बना हुआ है।"12 कवि इन दो मुख्य समस्याओं को चिन्हित करता है एवं इसके पीछे के निहित सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक कारणों की भी व्यापक जांच पड़ताल करता है। आज के समय में अस्मिता की राजनीतिके साथ अस्मिताओं के पहचान के संकट को भी देखा जा रहा है।

बदलते हुए आज में उदारीकरण, वैश्वीकरण, निजीकरण के इस अर्थ प्रधान दौर में डा. कर्दम की ये कविताएं दलितों के समक्ष उपस्थित नए खतरों की शिनाख्त करती हैं तथा दलितों के अस्तित्व के संकट को लेकर उभरी नई चुनौतियों को समाज के सामने रखती हैं। अभी जीवित हूँ मैंकविता की यह पंक्तियाँ देखिए:-

तुमने निजीकरण की आंधी चलाकर
सरकारी नौकरियां खत्म की
मैनें निंरतर उसका विरोध किया
तुमने सरकारी संपत्तियां कारपोरेट घरानों को
औनेपौने दामों पर बेचा
मैनें उसका भी पुरज़ोर प्रतिकार किया
आज तुम शिक्षा को महंगा कर रहे हो
व्यापार के केन्द्र बनाने पर तुले हो
तुम्हारे इस कदम को कभी
स्वीकार नहीं करूंगा मैं13
 

आर्थिक शोषण की चक्की में पिस रहे दलित समाज के समक्ष उत्पन्न इन नयी चुनौतियों को रेखांकित करते कवि की चिंता इस बात की है कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों  से शिक्षा तथा आरक्षण की व्यवस्था और औद्योगीकरण के विकास से दलितों की स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ। वे भी अपने बच्चों को मध्यम दर्जे की शिक्षा दिलाने में समर्थ हुए, किन्तु उदारीकरण, निजीकरण से उत्पन्न शिक्षा के द्विस्तरीकरण तथा सरकारी सेवाओं में संकुचन के चलते आज दलित समाज के सामने पहले से कहीं अधिक आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है। इन्हीं चुनौतियों और अस्मितागत संकटों के प्रति आगाह करते हुए कवि दलित, शोषित समाज के रास्ते में मुँह बाए खड़ी इन समस्याओं को हटाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं।

कवि कर्दम की यह कविताएं इन सब मुद्दों पर केवल बात करती हैं, बल्कि विमर्श की धार को तेज़ भी करती हैं। दलित कविता में सिर्फ जातिभेद  के खिलाफ ही नहीं वरन आर्थिक स्तर पर पूंजीवाद के खिलाफ भी संघर्ष का स्वर है|”14

 किसी भी विचारधारा का साहित्य तब तक जिंदा है, जब तक वे विचार सबको आंदोलित करते रहें। हाल-फिलहाल में विचारों की बात करने वाले बहुत दिखते हैं, लेकिन विचार को मानने वाले कम। ऐसे ही लोगों पर कर्दम लिखते हैं-

मैं क्या कहना चाहता हूँ
उसे सुनों और मानों
तस्वीरों और मूर्तियों में नहीं हूँ मैं
मैं हूँ मेरी लिखी किताबों में
उनमें व्यक्त विचारों में15

 

कवि का मानना है कि जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियों के खिलाफ लड़ाई को जीतने के लिए शिक्षा ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली अस्त्र है। डॉ. आंबेडकर राष्ट्र और समाज के हित के लिए शिक्षा को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे |शिक्षा के अभाव में सामाजिक और राजनीतिक चेतना का विकास असंभव है, इसलिए शिक्षा केवल साक्षरता ही नहीं बल्कि शिक्षा शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का एक अस्त्र है| शिक्षा ही संगठन और संघर्ष का आधार है| इसलिए डॉ. आंबेडकर ने दलितों को आह्वान करते हुए शिक्षित बनो संगठित रहो संघर्ष करो में शिक्षा को सबसे पहले रखा था,और अपने अनुयायियों से कहा था, हजार तलवारों से ज्यादा ताकत एक कलम में होती है|”16 डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारधारा से प्रेरित डॉ. कर्दम शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के लिए हथियार के रूप में पेश किया है| बाबा साहब आंबेडकर के विचारों शिक्षा शेरनी का दूध है,जो पियेगा वह दहाड़ेगाका प्रतिफलन इस संग्रह की कविता 'हमको पढ़ना है' में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है-

शिक्षा है वह दूध जिसे जो पीता बनता शेर
आओं पीवें हम भी इसको नहीं करें अब देर
जीवन के संघर्षों से अब हमको लड़ना है।
हमको पढ़ना, हमको लिखना, हमको पढ़ना-लिखना है|”

 

किताबें ही अर्थात शिक्षा ही बदलाव की मूल वाहक हैं। इसे कर्दम ने नोट किया है और यह आस्था और तर्क के लिए कैसे जरूरी है इस पर बात करते हैं-

 

किताबों से निकलती है वैज्ञानिकता

गिराती है आस्था के किले

ध्वस्त करती है धर्मांधता

किताबें हैं तो दुनिया है

किताबें हैं तो समाज है

किताबें हैं हमारा वजूद|”18

 

जीवन संघर्षों से लड़ने और जीवन में किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जागरूकता का होना आवश्यक है और जागरूकता शिक्षा से आती है, किताबों से आती है। इस संग्रह की कवितायेँ दलित शोषित समाज को शिक्षा के प्रति जागरूक करती हैं, उनमे जीवन संघर्षों से लड़ने के लिए चेतना का भाव भरती हैं। यही चेतना इस संग्रह की "हमको पढ़ना है", “लिखो”, “अस्मिता आदि कविताओं में भी देखने को मिलती है।

कवि का जीवनानुभव वैचारिकी के साथ मिलकर तार्किक सवाल करता है। यह तर्क शिक्षा से पैदा होता है, जिसकी बात फुले, आंबेडकर की विचारों के मूल में है। कवि कहता है-

मुझे सरस्वती पुत्र कहने वालों बताओ
ऐसा क्यों किया सरस्वती ने
क्या सरस्वती भी जातिवादी है।
देती है ज्ञान वर्ण और जाति देखकर
धन्य है बाबा साहब आंबेडकर
जिन्होनें दिला दिया संविधान द्वारा
सबको शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार।19

 

कहना होगा कि धार्मिक सत्ता केवल शोषण के औजार तैयार करती है, विभेदकारी समाज गढ़ती है, जबकि संविधान समता, समानता, भाईचारा और बंधुत्व के साथ शिक्षा के अधिकार की भी बात करता है।

बहुत लंबे समय तक किसी भी व्यक्ति या समाज की स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। एक दिन वह अपनी मानसिक गुलामी को त्याग ब्राह्मणवाद की दीवारों को जरुर ध्वस्त करेगा। इस संग्रह की वह दिनकविता में अन्याय, असमानता, वर्णवाद, जातिवाद, ब्राह्मणवादी, कुटिलता के चंगुल से मुक्त होने के प्रति आशावादी दृष्टिकोण मिलता है।

कितनी भी गहरी नींद से सोया हो आदमी
नींद से जागता जरुर है...
नींद में डूबे दलितों की आँखे खुलेंगी
देखेगी सारी दुनिया
देखेंगे उनका दमन करने वाले भी की देर-सवेर
दलितों में चेतना का वह दिन आएगा जरुर20

 

कवि भविष्य को लेकर आशावान है। यही आशावादी स्वर कविता की सार्थकता को सिद्ध करता है। डा. कर्दम जानते हैं कि सोये हुए दलितों को आजादी और सामाजिक सम्मान के लिए जागना जरुरी है। इसीलिए कवि कविताओं के माध्यम से बताते हैं कि कोई भी बाहरी व्यक्ति, भाग्य, भगवान, चमत्कार, अवतार उनको नहीं उबारेगा, बल्कि उन्हें शिक्षा की रोशनी तले अपनी आँखें खोलनी होंगीं। अपने शोषण के जाल को समझना होगा और अपना दीपक स्वयं बनना होगा। वह दिन दूर नहीं जब वह इन शोषणवादी ताक़तों के खिलाफ उठ खड़े होंगें बगावत करने के लिए|”21


बाबा साहब आंबेडकर ने दलितों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए जीवन भर लड़ाई लड़ी, तब जाकर दलित समाज कि स्थिति में कुछ सुधार आया। संविधान द्वारा उनको समान नागरिक अधिकार प्रदान किए गए। कवि खुद के ख़िलाफकविता में भी दिखाई देता है। जहाँ कवि इस बात को लेकर चिंतित है कि आंबेडकर के प्रयासों से आज दलित, पिछड़ा समाज अपेक्षित रुप से पहले से अधिक शिक्षित हुआ है। आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ है। लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि ईश्वर, धर्म, परम्पराओं के नाम पर किये जाने वाले भेदभाव, पाखण्ड, अंधविश्वास जिससे अब तक दलित, पिछड़े समाज को बहुत हद तक मुक्त हो जाना चाहिए था। वह आज पहले से अधिक इनकी गिरफ्त में है। जिन शोषकपरक हथियारों का प्रतिकार करना चाहिए था, आज शिक्षित दलित पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग उन्हीं शक्तियों का पोषण क्यों कर रहा है। यही चिंता उनकी कविता 'खुद के खिलाफ' में स्पष्ट रुप से देखी जा सकती है:-

दमन किया जा रहा है तुम्हारा
तुम्हारे ही द्वारा...
मूर्ख हो तुम हद दर्जे के
यदि नहीं समझ पा रहे हो यह सच
और बने हुए हो
उनके हाथों की कठपुतली
हो रहे हो इस्तेमाल अपने ही ख़िलाफ़22

 

कर्दम जी अपने मूलनिवासी होने का सबूत अपनी कविता मूलनिवासी भारत केमें पेश करते हैं। एक-एक कर ऐतिहासिक तथ्यों को चिन्हित करते हुए चलते हैं। और अपना हक मांगते हैं। मांगते ही नहीं बल्कि शौर्यवान होकर छीन लेना चाहते हैं। समतामूलक समाज की स्थापना के खातिर पूरे गर्व के साथ। कविता की अंतिम पंक्तियाँ देखिए :-

 

कुचल सकेगा अब कोई
हम समता के दीवानों को
हम भी मानव इस धरती के
यह दुनियाँ को बतलाएँगे23

 

सामाजिक विषमता, शोषण, विसंगतियों के प्रति कवि को जबरदस्त आक्रोश है, इसलिए सामाजिक विसंगतियों के खात्मे के लिए कवि `विद्रोही तेवर को अख्तियार करता है| सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ कवि कर्दम` के विद्रोही तेवर को देखते हुए डॉक्टर महीप सिंह की यह पंक्तियां सार्थक प्रतीत होती हैं|

 

 दलित कविता में सभी प्रकार की सामाजिक, राजनीतिक संस्थाओं के रूप में स्थापित विषम व्यवस्था को उखाड़ने की, उसके खिलाफ संघर्ष करने की चेतना बड़ी तीव्र है| नवशिक्षित दलित पीढ़ी में समता और स्वाधीनता की भूख सामाजिक सुधारवाद में संतृप्त नहीं होती| दलित कवि उनका प्रतिनिधि बनकर विद्रोह के लिए सक्रिय होता है|”24

कवि को यह बखूबी मालुम है कि इस जड़ हो गए तथाकथित समाज में अपने अधिकारों के लिए लड़ना जरुरी है। बिना लड़े कुछ नहीं मिलता। जाहिर सी बात है कि दलित समाज अपने अधिकारों के लिए सदियों से लड़ता रहा है और आज भी लड़ रहा है। वह लेखन से लेकर सड़क तक यह बोलना और लड़ना जारी रखा हुआ है। वह किसी भी उन्माद या तानाशाह के खिलाफ तन कर खड़ा हो जाता है। क्योंकि वह