आलेख : स्मृति और वर्तमान का अद्भुत संयोजन / मुकेश कुमार मिरोठा

स्मृति और वर्तमान का अद्भुत संयोजन
मुकेश कुमार मिरोठा

समकालीन हिन्दी कविता में एक नए दौर का आगाज़ मिलता है। भूमण्डलीकरण, आधुनिकता और उत्तरआधुनिकता वे प्रस्थान बिन्दु हैं जिन पर समकालीन कविता का आधार निर्मित होता है। कविता नए रूप में ढलते दिखती है। हालांकि कविता में इनकी वजह से सब कुछ परिवर्तित या एकदम नया, अभूतपूर्व कुछ हो गया हो, यह कहना भी ठीक नहीं है। अगर मैं इसे नए दौर का आग़ाज़ कह रहा हूँ तो मेरा तात्पर्य नए भावबोध, परिस्थितियों, विमर्शजन्य वैचारिकी और संवेदना के अस्मितामूलक बोध से है। पाठक एवं उसके बोध का परम्परागत ढाँचा भी टूटता दिखाई देता है। पाठक अब केवल पाठक नहीं, वह आपका फॉलोवर(अनुकरणकर्ता) भी हो सकता है। यह तकनीक आधारित लेखक-पाठक सम्बन्ध है। हाशिए के समाज की चिन्ताओं का दौर है। शालीनता के साथ आवश्यक तीखेपन का दौर है। बाज़ार, परिवार और पारिस्थितिकी तंत्र के व्यूह में उलझे मनुष्य की सूक्ष्म वेदना को समझने का दौर है। कार्पोरेट संस्कृति की वजह से निर्मित ख़ास तरह की आर्थिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार का दौर है। मनुष्यता के ख़त्म होने और जातीय बोध की श्रेष्ठता को प्रस्थापित करने का दौर है। मरती हुई संवेदनाओं का दौर है। इस संदर्भ में आनन्द प्रकाश लिखते हैं- ‘‘अन्तरराष्ट्रीय पूँजी के बढ़ते नियंत्रण, बाज़ार के वर्चस्व, संचार माध्यमों के अभूतपूर्व विस्तार और साम्राज्यवादी देशों की आक्रामक राजनीति ने सामान्य नागरिक की  विवेकशीलता लगभग छीन ली है।’’  इतनी नकारात्मक स्थितियों के मध्य कविता अभी भी उम्मीद है। रोशनी है। नए एवं जटिल समाजार्थिक परिदृश्य में वह अपनी चेतना से लगातार धार देने का कार्य कर रही है। सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमानों से विलग वर्तमान कविता अपने जीवंत मुहावरों से ख़ास रिश्ता तय कर रही है। मनुष्य की सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावना इससे छिपी हुई नहीं है। इस पृष्ठभूमि के साथ कवियों की एक नई पीढ़ी सृजनरत है जो अपने रचनात्मक अवदान से समकालीन कविता को नया रूप दे रही है। नए भावबोध के साथ भाषिक अभिव्यक्ति को भी बदल रही है। ये कवि मिलकर कविता के नए दौर का आग़ाज़ कर रहे हैं।

अपने सृजन-कर्म की नवीनता को लकर पहचान रखने वालों में एक नाम मनीष का है। जिन्दगी के उत्स के कवि के तौर पर उनका रचनाकर्म विशिष्ट माना जा सकता है। कविता की जानी-पहचानी ज़मीन में उनका योगदान कुछ अलग और विशेष दिखता है। कविता की लम्बी एवं सुदीर्घ परम्परा में उनकी कविताएँ उन बदलावों को इंगित करती है जो इस दौर में हुए है। मनीष अपने अनुभवों की सघनता के बूते पर ताज़गी से परिपूर्ण काव्य-संसार हमारे सामने लाते हैं। परिवर्तित समाज और उसमें हो रहे बदलावों को वे शिद्दत से महसूस करते हैं और उनसे अपनी रचनाभूमि का निर्माण करते हैं। उनके अनुभव के कुछ क्षेत्र नए हैं। प्रसिद्ध कथाकार, कवि एवं आलोचक रामदरश मिश्र उनकी कविताओं पर बात करते हुए लिखते हैं- ‘‘इन कविताओं की द्वन्द्वात्मक भाव-छवियाँ इन्हें संश्लिष्टता प्रदान करती हैं। संश्लिष्टता दुरूहता में भी होती हैं और सादगी में भी।’’  कवि मनीष की भाव-प्रस्तुति भी मानीखेज़ है। समकालीन सूक्ष्म भावनाओं को लेकर प्रतिक्रिया (शाब्दिक) करने का उनका अपना ढंग है।इस बार तुम्हारे शहर मेंकाव्य-संग्रह की लोकप्रियता इसकी बानगी है। कुछ नया करते रहना उनके व्यक्तित्व का भी अभिन्न हिस्सा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उनका नवीनतम काव्य संग्रहअक्टूबर उस सालहै। काव्य संग्रह में कवि एक जगह कहते हैं- ‘‘फिर बचाने हैं/ आँखों में बसे सपने/ जिनके दम पर ही/ बच सकती है/ दुनिया की/ सुन्दरतम होने की उम्मीद।’’ कवि का मन्तव्य स्पष्ट है, साफ़ है। विसंगतियों से भरे समाज में सुन्दरता की तलाश, उसे बचाए रखने की जद्दोजहद। उस सुन्दरतम दुनिया को बनाए रखने की उम्मीद। पाठक कवि के सरल-सहज भाव-प्रवाह से तादात्म्य स्थापित कर लेता है वो भी अनावश्यक बाधा आए बिना। यह कवि की सफलता है कि पूरा संग्रह जिस सहज भाषा में लिखा गया है, प्रतिमानों की अनिवार्यता के बावजूद उन्होंने कविता को सुरक्षित बचा लिया है। मनीष अपनी सहज काव्य-प्रस्तुतियों से दुनिया को सुन्दरतम होने की उम्मीद को साबित करते हैं। इस तलाश में वे पाठक को निराश नहीं करते।

आलोच्य कविताएँ मनीष का आत्मकथ्य है तो वर्तमान दौर के सम्बन्धों की उड़ान को प्रत्यक्ष लाने का प्रयास भी है। वे आत्मीयता और उसके छद्म आवरण को बख़ूबी पहचानते हैं। पहली ही कविता में वे इसका परिचय अपने पाठकों से करा देते हैं। अपने अन्तः की बातों को वे सामने रखते हैं। यह उनका आत्मसाक्षात्कार है। आत्मीयता और षड्यंत्र के मध्य वे स्वयं को चुनौती देते हैं- ‘‘तो आइए/ अपने आत्मीय हथियारों के साथ/ और/ लहूलुहान करके मुझे/ आनन्दित हो जाइए/ और मुझे/ एक और अवसर दीजिए/ आपको/ आनन्द में सराबोर करने/ और ख़ुद को थोड़ा और/ जाँचने-परखने का/ आत्मीयता से भरे आत्मीय मित्रों/ स्वागत है आपका। ‘‘आत्मीय मित्रों के विश्वासघात के बरक्स वे स्वयं को चुनौती देना पसंद करते हैं। मनीष जिन परिस्थितियों को अपनी कविता में अन्तर्युक्त कर रहे हैं, वे वर्तमान समय का आईना है। हर तरफ़ अलगाव, विडम्बना, संदेह का समय। स्वार्थ आधारित रिश्तों का समय। कवि अन्यत्र लिखता है- ‘‘मुझे पहचानती हो ना?/ मैं वही हूँ/ जिसे तुमने/ बनाया अपनी सुविधा/ बिना किसी दुविधा के।’’ समकालीन मानवीय रिश्तों की सच्चाई वे खुलकर सामने लाते हैं। बिना किसी दुराव या रोक-टोक के। यह उनकी भावगत विशेषता ही है कि रिश्तों की स्वार्थपरता को वे बेबाकी से उद्घाटित करते हैं। वे किसी आलौकिक या आदर्श मानक सम्बन्धों को अपना शरण्य नहीं बनाते। इस प्रकार वे तमाम तरह के छद्म और छल से दूर हैं। वे, कविता की ठोस ज़मीन के कवि हैं।   

मनीष का यह काव्य संग्रह अपनी विशिष्ट प्रेम संवेदनाओं की वजह से हमारे भीतर उम्मीद जगाता है। आर्थिक संस्कृति की विभीषिका नेप्रेमकी सूक्ष्म संवेदना पर खतरे उत्पन्न किए हैं। व्यक्ति के मनोजगत का स्फूर्त भाव धीरे-धीरे व्यस्तता का शिकार हो मरता चला जा रहा है। कवि इस झिलमिलाते भाव को रोशनी देते हैं। अवसाद और नाउम्मीदी को प्रेम की शक्ति में रूपांतरित कर देते हैं। यह उनके कवि स्वभाव की भी ख़ास पहचान मानी जा सकती है। प्रेम के सूक्ष्म भावों की प्रस्तुति में उनकी कविताअक्टूबर उस साल’, बेहतरीन है। इसमें ताज़ा सोच है। देवदार के पीले चटक रंगों के पराग को नायिका के गालों पर सजाने का चाक्षुष बिम्ब प्रेम के एहसास और प्यार में जीते हृदयों की स्थिति को पुरअसर रूप में व्यक्त करता है। प्रेम एवं उससे सम्बद्ध मनुष्य भावों के संकट के दौर में इस तरह की कविताएँ शीतल समीर है। भावों के साधारणीकरण की बात है। इस आत्मपरक कविता में वाचक प्रेम-परम्परा का सिलसिला बनाए रखना चाहता है- ‘‘इस साल का/ यह अक्टूबर/ याद रहेगा साल-दर-साल/ यादों का/ एक सिलसिला बनकर।’’ कवि का निश्चय गौरतलब है। यादों का मुखर एहसास वह रीतने नहीं देगा। संकोच बस इतना कि प्रेमिका की स्वीकारोक्ति बिन यह व्यर्थ है। दूर तक साथ निभा पाने की बात करता कवि प्रत्युत्तर चाहता है- ‘‘तुम बोलोगी/ तो ये उमस भरा मौसम/ बदल जाएगा/ कुछ खिल जाएगा/ पिघल जाएगा/ किसी डरी सहमी/ अधूरी कहानी को/ थोड़ा/ हौसला मिल जाएगा।’’ कविता पढ़ते वक़्त पाठक रोमानी दुनिया में खो जाता है। उसके मन में प्रेम के सूक्ष्म कणों की बारिश होने लगती है। कवि की यह भिन्न रचना-प्रणाली और भावों की सूक्ष्म अभिव्यंजना कौशल पद्धति उन्हें विशिष्ट बना देती है।

मनीष के काव्य संग्रह में स्मृतियाँ एक शक्ति के रूप में उपस्थित है। पीड़ा का घोषित अवकाश होने पर भी जिजीविषा और स्नेह-प्रेम सिंचित क्षीण धारा को बरकरार रखती है। उनके यहाँ स्मृतियों का बीज रूप अनुभवों का रूप धरकर आया है। वर्तमान इसमें जुड़ता-सा चला जाता है। इस लिहाज़ से उनकी कई कविताएँ उल्लेखनीय हैं। एक कविता में वे लिखते हैं- ‘भूली-भूली जनश्रुतियों ने/ सुलगाया पीड़ा का/ घोषित अवकाश/ फिर धीमे-धीमे/ सधी हुई झिझकी सिसकियाँ।/ घोषित करती हैं/ दिन, महीना, साल।’’ ऐसा लगता है मानों जीवन का राग महसूस होने लगा है। कवि उसे जी रहा है और वो भी काल की सीमाओं से परे। सभ्यता और सामाजिक खूँटी वाली इस दुनिया में मन टाँगने की जगह कम होती जा रही है। कवि इससे चिन्तित है। सहज स्मृतियाँ कैसे भिगोती हैं, इसकी बानगी उनकी कविता में दिखती है-’’ लेकिन/ वह साँवली उदास लड़की/ धैर्य की पराकाष्ठा करती है/ और/ जैसे ही दरकने लगती हैं/ समय की शिलाएँ/ वह सुनती है/ टिप-टिप बारिश फिर उसकी कनखियों में/ टिमटिमाते हैं सितारे/ और प्रवाहित हो उठता है/ उसके संकल्पों का संगीत।’’ कवि अपनी स्मृतियों में भी संसार की जटिलता ध्यान रखता है। समय और संकल्प का सम्मिश्रण संगीत बनकर प्रवाहित हो रहा है। इस तरह की कई नयी युक्तियों का प्रयोग कवि ने किया है।माँकविता स्मृति और समय के लम्बे अंतराल की कविता है। स्मृतियों का पर्यवसान इस लम्बी कविता में हृदयविदारक स्थितियों में हुआ है। माँ का असमय जाना वक़्त के ठहरने जैसा है। एक दुनिया के खत्म होने समान है। कवि कहता है- ‘‘एक सिर्फ़ एक बार/ तुमसे लिपटकर/ बहुत रोना चाहता था/ और सुनना चाहता हूँ/ वह सब/ जो तुम बताना चाहती थी।’’ माँ को समर्पित यह कविता टूटते सम्बन्धों की दास्तान भी है। शहरीकरण के दौर में दूर होती ममता को चित्रित करने का प्रयास है। यहाँ कवि की स्मृति व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाती है। कवि की अभिव्यक्ति हम सबकी अभिव्यक्ति बन सामने आती है।

संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ समकाल की चिन्ताओं को उजागर करती है। सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का कवि ने आकलन किया है। यह विपरीत समय है जहाँ प्रेम और संवेदना के ख़िलाफ़ साजिशें चल रही हैं। इन भावों को मारा जा रहा है। कवि ऐसे वक़्त में प्रेम संवेदना को बचाने की कोशिश करने वाले को तपस्वी की संज्ञा देते हैं।स्थगित संवेदनाएँशीर्षक कविता की बुनियाद यही भाव है। यह हमें उन तक ले जाती हैं, जिनके भीतर अभी प्रेम और संवेदना शेष है- ‘‘ऐसे समय में/ संवेदना और प्रेम/ सच में/ बड़ी तपस्या के बाद ही / बची हुई हैं/ जितनी भी बची हों/ जिस किसी भी में/ बची हों/ वह निश्चित रूप से/ तपस्या रत है।’’ इन भावनाओं का रक्षण एवं बचाव हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। इसे हम किसी व्यक्ति विशेष वर्ग या सम्प्रदाय पर थोप नहीं सकते। इन्हें बचाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए। प्रो. पवन माथुर भाषा के ऐसे यथार्थ रूप पर बल देते हैं। वे लिखते हैं- ‘‘जब वह ऐसी भाषा में तब्दील होने लगती है जो सिर्फ समाज में नहीं यथार्थ में आबद्ध होती है। भाषा में कल्पना तो होती है किन्तु उसकी अतिरंजना नहीं।’’ प्रो. माथुर की बात से सहमत होते हुए कहा जा सकता है कि यह समकालीन यथार्थ को हमारे अंदर उत्पन्न करने का कवि का ख़ास तरीका है। वे हमें हमारी जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं। पीड़ा से सब द्रवित हो उठते हैं और मनुष्यत्व के भाव अनुभूत होने लगते हैं। मानवता से भरे संसार का रास्ता खुलने लगता है। हमारी दृढ़ता ही इस राह को प्रशस्त करेगी- ‘‘उसकी दृढ़ता/ उसका आवेग/ तोड़ देगी वह सभी कुछ/ जो/ मार्ग में/ अवरोध का कारण होगा।’’ जनपक्षीय राजनीति से इतर उनकी काव्य संवेदना सामाजिक सरोकारों के ज़्यादा नज़दीक है। यह कवि की संवेदनशीलता का उत्कृष्ट रूप है। उनका कैनवास विस्तृत है। इसमें अतीत से लेकर वर्तमान तक के अनेक रूप नुमायां हैं। यह कवि की अपनी पक्षधरता को भी तय करती है। उनकी वैचारिक सम्बद्धता को समझने का यह जरिया है। आवेग, स्नेह, मसृण भाव, रोमांस, स्मृति एवं उद्वेग उनकी कविताओं की भाषा की जान है। उनकी चेतना हमें सोचने और झकझोरने का कार्य करती है। मनीष की कविताएँ हमारे समय का दस्तावेज़ मानी जा सकती हैं। मनुष्यता से जुड़े सवालों पर हस्तक्षेप की कविताएँ हैं। अपने समय के जागरुक, चेतनासम्पन्न कवि हैं। कह सकते हैं कि उनकी कविताएँ समाज के विविध रूपों से युक्त विडम्बना से हमारा सामना कराती हैं। साथ ही जीवन की उपस्थिति का भी बोध कराती हैं।  

सम्प्रेषणीयता कविता की बुनियादी ज़रूरत है। मनीष की कविताएँ इस निकष पर भी खरी उतरती हैं। प्रतीकात्मक भाषा एवं बिम्बों की सघनता के बावजूद कविताएँ अपने में सहज प्रवाहमयी है। सम्प्रेषण की विकट समस्या नहीं पाती।पिघलती चेतना और तापमान से कविता इस रूप में सजीव है। घटनाओं से प्रभावित उनका मन नयी उम्मीद की ओर देख रहा है। वे हमारा सामना ऐसी विडम्बना से कराते हैं जो आज के समाज पर तारी है। कवि जो कहता है, हम उसकी उम्मीद को बल देते हैं। हालांकि वह प्रश्नातुर है और संशय में भी हैं- ऐसे समय में/ अपने डैने को/ अपनी कॉंख में दबाये/ माँस के लोथड़ों के टीले पर/ मैं रोमांचित हूँ/ प्रेम की उत्तेजक उड़ान/ और आप की/ शुभकामनाओं के लिए/ ताकि एक उड़ान/ क्षितिज के/ उस पार हो जहाँ/ परिदृश्य बदला हो/ या फिर/ इसकी उम्मीद हो।’’ कवि का यह उम्मीद और अनिश्चितता का भाव ही इस कविता में संवेदना निर्मित करते हैं। इसका एहसास हमें सीधा-सीधा सम्प्रेषित हो जाता है। यह अलग तरह की दृश्यता है, जो हमें पीछे अपील करती है। इस प्रकार का चित्रण कवि को अलग पहचान देती है। अपने वक़्त के सन्दर्भ से कवि ने व्यापक सच्चाईयों को प्राथमिकता दी है।

मनीष का भाव-लोक बहुत विस्तृत है। इसके अनेक रंग उनकी कविताओं में मौजूद हैं।मतवाला करुणामय पावससदृश कविताएँ बताती हैं कि वे प्रकृति को लकर कितने संवेदनशील हैं। कवि प्रकृति का सम्मान करता है। ध्यान देने की बात यह है कि विचारों के बहुजाल में प्रकृति लगभग ग़ायब कर दी गई है। मनीष का यह संग्रह प्रकृति पर कुछ सुन्दर कविताओं के लिए भी जाना जा सकता हे। उनकी कविताएँ हमें प्राकृतिक सौंदर्य के भीतर धड़कते जीवन का एहसास करती है। इंतजार करते मन को मतवाला पावस आल्हादित कर देता है- ‘‘चौमासा इशारे करता है/ तरुणाई के/ गर्जन-तर्जन से/ निधियों की/ खिड़की खुलती/ अलमस्त हठीले झोंको से/ मतवाला करुणामय प्रवास/ मेघों का/ आगार खोलकर/ बूँदों की देता धार।’’ पावस के आगमन से विभ्रम की स्थितियाँ बह जाएगी। सौंधी उठती महक धरा को अवर्णनीय सौंदर्य से आच्छादित कर देगी। तदुपरान्त ही प्रेम का बौर पाएगा-’’ पलाश/ कहे दहकने को/ और बेला कहे बहकने को/ कोयल कहे चहकने को/ पर/ चकवी कहे ठहरने को/ उलझन में जब मन बौराये/ तभी/ प्रेम का बौर भी आए।’’ प्रकृति का यह सौन्दर्य-भाव आजकल दुर्लभ है। कवि तन्मयता के साथ प्रकृति-चित्रों का सृजन करता है। प्रकृति का रंग ही तो मनुष्य जीवन के रंग का भी निर्धारण करता है। कवि इस निर्धारण को सम्बन्ध सूत्र बनाकर पाठकों के सामने लाता है। प्रकृति और मानव के मध्य का बना हुआ अजनबीपन और परायापन कवि दूर करने का प्रयास करता है। हमारे मन में व्याप्त नैराश्य और उदासी को परे धकेल प्रकृति से आत्मीय रिश्ता बनाने का भाव प्रकट करते हैं।  

उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की चपेट में फँसी भारतीय जनता की स्थिति चिन्तनीय है। पूँजीवादी मानसिक व्यवस्था ने मानवीय मूल्यों का क्षरण किया है। बनावटी जीवन-शैली ने एक ख़ास वर्ग को धनी बना दिया है। वहीं देश के असली निर्मातामज़दूर-किसानअभी भी जीवन की आधारभूत व्यवस्थाओं से कोसों दूर हैं। शोषण की अवधारणा ने मज़दूरों के हिस्से का दोहन किया है और नव-सामन्तों की एक नई शृंखला तैयार की है। किसान-मजदूरों के हक का हिस्सा मारकर नव धनाढ्य वर्ग बाहर भागा जा रहा है। आर्थिक स्तर पर कवि की चिन्ता जायज़ है- ‘‘उन मज़दूरों के/ हिस्से में क्यों कुछ भी नहीं/ जो मेहनत से एक/ धरा और गगन कर रहे हैं/ भगौड़े/ भाग रहे हैं विदेश/ देश को लूटकर/ हमारे रहनुमा हैं कि/ भाषण भाजन कर रहे हैं।’’ श्रम के पर्याय लोगों का आर्थिक मानसिक दोहन लगातार जारी है। विश्वव्यापी बाज़ारवाद में ऐसे इनसान मात्र पुर्जे समान हैं। उन्हें मूलभूत सुविधाएँ भी सुलभ नहीं हैं। कवि मनीष ऐसे लोगों की आवाज़ बनते हैं। वेभगौड़ोंपर अपनी चिन्तना को ज़ोरदार ढंग से उठाते हुए आर्थिक तंत्र के दोगलेपन पर तल्ख टिप्पणी करते हैं। वे ऐसे लोगों कारणों से सीधे मुखातिब होते हैं। मज़दूरों के प्रति बनी हुई आर्थिक शोषण की परम्परा से टकराते हैं। वे केवल ऐसे हालात से टकराते हैं बल्कि वर्तमान आर्थिक जगत की विसंगतियों और विडम्बनापूर्ण स्थितियों को उजागर करने की भरसक कोशिश करते हैं। आर्थिक उदारीकरण से वंचितों के लाभांवित होने की बात कहते हैं। उनके हिस्से केवल आश्वासन क्यों है- ‘‘सरोकारों के/ तरानों का/ बेतरतीब पुलिन्दा/ वंचितों की पीठ पर/ अब भी लदा है/ जाने क्यों।’’ वैश्विक कम्पनियॉ एवं उसकी लाभार्थी संस्थाएँ वंचितों के पेट और पीठ दोनों पर लात मर रही हैं। परम्परागत शोषण का तरीका अब ग्लैमर का रूप धर निर्बाध शोषण करने में लगा हुआ है। मनीष की कविताएँ भूमण्डलीकरण की पूँजी-पोषक सभ्यता-संस्कृति को झिंझोड़ती है। वंचितों के मौलिक अधिकार अभी भी कागज़ी हैं। उनकी पीठ अभी भी ग़ुलामी की जंजीरों से जकड़ी हुई है। इस थीम की कविताओं में कवि ने अपना आक्रोश और विरोध दर्ज किया हे। सामाजिक सन्दर्भों से जोड़ने पर यह उनकी अभिव्यक्ति में एक आह्वान माना जा सकता हे। कवि पूँजीवादी व्यवस्था एवं सरोकारों से तीखा प्रश्न करते हैं। उनकी लेखनी में अपना मिजाज और तेवर हैं। व्यक्ति की अस्मिता के सम्मान के लिए उनकी कविताएँ उद्वेलित करती हैं।  

मनीष ने अपनी कविताओं में भारतीय परिवार, उनके रहन-सहन, खान-पान सहित घर के वातावरण की वास्तविक स्थिति का भी आकलन किया है।अदरख वाली चायजैसी कविता हमारे परिवारों में प्रेम और चाय के सम्बन्धों की पड़ताल करती है। घर के परम्परित छवि के नए रूपांतर को कवि ने चाय के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है। इस कविता में जो चाय की खुशबू है, वह आधुनिक समाज में परिवारों की वास्तविकता है। चाय की स्मृति में प्रेम को देखने की प्रक्रिया के माध्यम से कवि साधारण चाय-पान को सघन अर्थों से भर देते हैं। कवि का आत्मकथन चाय पीते समय मूर्त रूप धर लेता हैं। मुझे समकालीन कविता में ऐसी कविता अन्यत्र देखने को नहीं मिली। चाय पीते वक़्त रोमानी स्मृतियों का पुंज उनके मन-मस्तिष्क में घूम रहा है- ‘‘मुझे यकीन है/ तुम बनाओगी/ सालों बाद भी/ वैसी ही/ अदरक वाली चाय/ फिर एक बार/ मिलने पर/ और शायद/ बिना मेरे कहे।’’ चाय पीने में भी उम्मीद चाय के साथ हृदय को तप्त कर रही है। इस तप्त अवस्था में मिलने की फुहारें शीतलता प्रदान कर रही हैं। यह उम्मीद, प्रतीक्षा की लम्बी अवधि को कम कर रही है। आशाओं का ज्वार विरह पर भारी है। चाय प्रासंगिक वक़्त में उससे मिलने का जरिया है। कवि इसमें भी सन्तुष्टि महसूस कर रहा है। उसमें भावों का विरेचन हो रहा है। कवि का दाय इससे ज़्यादा क्या होगा। इस तरह की कविताओं में कवि की अर्थ-व्यंजना भी ज़्यादा सघन होती है। वे अपनी रोमानियत से पाठक के शांत मानस मेंपत्थर स्मृति काफेंकने में कामयाब रहते हैं। जीवन-उत्सव को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए इस तरह की कविताएँ और उनका मन्तव्य ज़्यादा कारगर है।  

स्मृतियों एवं वर्तमान के अद्भुत संयोजन से मनीष की कविताएँ अपने समय के यथार्थ को प्रस्तुत करती हैं। इसमें उनकी भाषा पूरी तरह से उनकी सहायता करती है। वे ज़ोर-जबरदस्ती और बुद्धिमत्ता के भाषिक आतंक की भाषा में बात नहीं करते। वे तो संवाद एवं सहज बहस के अनुकूल साधारण जनों की व्यंजनात्मक भाषा के हिमायती हैं। वो संतरा, जब थाम लेता हूँ, अवसाद, जो लौटकर गया, तुमसे प्रेम, चाँदनी पीते हुए, उसका मन, कब होता है प्रेम, जैसे होती है, गाँवों की गठरी आदि कविताएँ उनकी जीवंत भाषा का प्रमाण हैं। कवि-आलोचक भाषा के सरल सहज रूप को खारिज करने की कोशिश भले ही करें लेकिन उनमें व्याप्त अर्थव्याप्ति, संवेदना की सघनता और प्रतीक एवं बिम्बों की नवीन सादृश्य शृंखला को विस्मृत नहीं कर सकते। इस प्रसंग में सुमन राजे ने महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है। वे लिखती है - ‘‘प्रत्येक कला की तरह कविता की एक भाषा होती है जो सामान्य भाषा पर आधारित होते हुए अपने प्रयोग के कारण रचनात्मक होती है।’’  सामान्य किन्तु विशिष्ट भाव एवं सौन्दर्य द्वारा कवि मनीष अपनी भाषा के माध्यम से मानवीय अर्थ की तलाश करते हैं। त्रासजनक समय में साहित्य का संश्लिष्ट दायित्व पूरा करते हैं। इसके लिए वे स्पष्टता और सरलता को अपनी कविता में जगह देते हैं। अपने काव्य कौशल को नियंत्रित करते हुए वे सुगठित कविता पर ज़ोर देते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं को किसी विचारधारा विशेष का प्रतिमुख नहीं बनने दिया है। तमाम विमर्श उनकी कविताओं में स्थान पाते हैं। कविता और उसके उद्देश्य की कसौटी पर वे खरे उतरते हैं।

कवि मनीष स्मृतियों के संयोजन से कविता को एकायामी नहीं रहने देते हैं। यह उनके कवि-कर्म को कलात्मक रूप देता है। नए प्रतीक, बिम्ब, उपमानों, भाषा, स्मृति और वर्तमान के उचित तालमेल से उन्होंने समकालीन कविता के नए स्वर-संरचना में बदलाव किया है। काव्य-संचार में उनका यह योगदान ताजा हवा का झोंका है। संकलन जितना पठनीय है, उतना ही संग्रहनीय भी। वस्तुतः वे अनुभवों को नएलुकदेने वाले कवि हैं। यह संकलन पाठकों को एक नए अनुभव संसार से जोड़ता है और समकालीन समय के यथार्थ से बख़ूबी परिचित कराता है। अभिव्यक्ति और सहज भाषा की जीवन्तता भी इस संकलन की विशेषता है।

संदर्भ :

  1.  समकालीन कविता: प्रश्न एवं जिज्ञासाएँ, आनन्द प्रकाश, लोकमित्र प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2011, पृ.सं. 24
  2.  इस बार तुम्हारे शहर में, मनीष शब्द सृष्टि प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2019, पृ.सं. 01
  3.   इन्द्रप्रस्थ भारती, हिन्दी अकादमी, दिल्ली, वर्ष-4 अंक अक्टूबर-दिसम्बर, 2014, पृ.सं. 47
  4.  अकार (पत्रिका) (सं.) गिरीराज किशोर, अकार प्रकाशन, कानपुर (.प्र.) अंक-13, मार्च-2015 पृ.सं. 83
  5.  कवितांश पुस्तकअक्टूबर उस साल’, मनीष, शब्द सृष्टि प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2019
 
मुकेश कुमार मिरोठा
सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली-110025
mmirotha@jmi.ac.in, 9312809766

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक कुमार

4 टिप्पणियाँ

  1. डॉ रविन्द्र सिंहमई 18, 2024 11:52 am

    लेखक ने नए दौर की मानवीय संवेदनाओं की उलझनों और आधुनिकता से उपजे नए विमर्शों को बड़े ही सहजता से सामने रखा है। लेखक ने बड़ी ही साफ़गोई से उजागर किया कि कैसे पूंजीवाद और बाज़ारीकरण के जाल में उलझकर मनुष्य के प्रेम, करुणा और स्नेह जैसे भाव दम तोड़ रहे हैं।
    किसान-मजदूर की पीड़ा को खासकर जब सत्ताधीशों को पसंद न हो उठाना लेखक के साहस का परिचायक है। ऐसे लेखक अक्सर सत्ता को अपने जूते की नोंक से ठुकरा देते हैं। मैं लेखक को बधाई देता हूं और इच्छा व्यक्त करता हूँ कि इस तरह के लेख हमें पढ़ने को आगे भी मिलते रहेंगे।

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  2. बेनामीमई 18, 2024 2:00 pm

    इस आलेख में एक समग्र दृष्टि है जो बेहद शानदार है। निश्चित ही युवा पाठक लाभान्वित होंगे। ऐसे आलेखों का आना बेहद जरूरी है।

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    1. लेखक ने लगभग उन सभी बिंदुओं का समाहार किया है जो एक समग्र दृष्टि विकसित करने के लिए आवश्यक हैं।

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  3. मुकेश कुमार मिरोठा जी का लेख बहुत वर्तमान जीवन शैली के जीवन दर्शन के चित्र उकेरता है, कवि मनीष की कविताओं को इस संदर्भ से जोड़ते हुए मुकेश जी ने शब्दों का तारतम्य बांध दिया। वास्तव में सुंदर अभिव्यक्ति है, यही सच्ची साहित्य साधना है।

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