शोध आलेख : प्रगतिशील साहित्य और रामविलास शर्मा / रूपेश कुमार

प्रगतिशील साहित्य और रामविलास शर्मा
- रूपेश कुमार

शोध-सार : प्रगतिशील साहित्य को लेकर रामविलास शर्मा की मान्यता अन्य आलोचकों से भिन्न और व्यापक है।हिंदी के अधिकतर आलोचक प्रगतिशील साहित्य को जहाँ मार्क्सवादी यथार्थ से जोड़ने के साथ उसे प्रगतिशील आन्दोलन की देन के रूप में स्वीकार करते हैं, वहीं रामविलास शर्मा इसकी स्वतंत्र व्याख्या करते हैं। रामविलास शर्मा की दृष्टि में केवल मार्क्सवादी प्रभाव या प्रगतिशील आन्दोलन के कारण हिंदी साहित्य में यथार्थ की अभिव्यक्ति नहीं हुई बल्कि उससे पहले जनता का दुःख, दर्द और सामजिक विसंगतियों के रूप में यथार्थ प्रकट होता रहा है। यह अलग बात है कि मार्क्सवादी प्रभाव के बाद यथार्थ की अभिव्यक्ति में बदलाव आया और वह सामंतवादी, पूँजीवादी प्रवृत्तियों के साथ सामाजिक रूढ़ियों पर खुलकर प्रहार के रूप में अधिक प्रकट हुआ रामविलास शर्मा प्रगतिशील आन्दोलन के पहले और बाद के यथार्थ को निरंतरता में देखते हैं और समय के साथ उसमें आये बदलाव को रेखांकित करने के साथ यह भी घोषित करते हैं कि प्रगतिशील साहित्य वही नहीं है जिसमें मार्क्सवादी यथार्थ प्रकट हुआ है बल्कि वह साहित्य भी प्रगतिशील है जिसमें मार्क्सवाद के पहले या अलग यथार्थ का चित्रण हुआ है। शायद यही कारण है कि रामविलास शर्मा हिंदी में प्रगतिशील साहित्य की खोज करते हुए आदिकाल तक जाते हैं और उसकी एक परम्परा निर्मित करते हैं।   

बीज शब्द : प्रगतिशील, परम्परा, विचारधारा, मार्क्सवाद, यथार्थ, सामन्तवाद, पूँजीवाद, सामाजिक रूढ़ियाँ, आदिकाल, छायावाद, प्रगतिवाद।

मूल आलेख : हिंदी साहित्य में छायावाद के बाद जिस नवीन चेतना का विकास हुआ उसे प्रगतिवाद की संज्ञा देते हैं। अधिकतर विद्वान् प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य को एक मानते हैं। यह ऐसा साहित्य है, जिसके लेखन से पहले साहित्यकार लखनऊ मेंप्रगतिशील लेखक संघके आह्वान पर एकत्र होकर बाक़ायदा मंथन करते हैं। 1936 . में आयोजित इस अधिवेशन में हुए मंथन के बाद प्रेमचंद अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्य को नई दिशा देने के उद्देश्य से अपने भाषण में कहते हैं किसाहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दरजा इतना गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।1 स्पष्ट है कि प्रेमचंद समाज में साहित्यकार के दायित्व को सबसे बड़ा मानते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि वह सामाजिक परिवर्तन का साधन है। यही कारण है कि वे अपने लेखन में यथार्थ का चित्रण ही नहीं करते हैं बल्कि उसे साहित्य की कसौटी भी मानते हैं, इसीलिए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में दिए गये भाषण के अंत में घोषित करते हैं किहमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो- जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।2 माना जाता है कि प्रेमचंद के इस विचार का साहित्यकारों पर गहरा असर हुआ और कविता के क्षेत्र में छायावाद का अंत और प्रगतिवाद की शुरुआत हुई। यद्यपि गद्य में यह लक्षण पहले से ही दिखाई पड़ने लगता है क्योंकि वह औपनिवेशिक पूँजीवादी शक्तियों और सामंतवाद के साथ संघर्ष करते हुए विकसित होता है लेकिन कविता में यह स्पष्ट रूप से प्रेमचंद के इस आह्वान के बाद देखने को मिलता है।

          रामविलास शर्मा प्रगतिशील साहित्य का मूल्यांकन करते हुए गद्य और पद्य को एक साथ रखकर देखते हैं इसीलिए साहित्य में यथार्थ के आग्रह से आये परिवर्तन को किसी व्यक्ति अथवा संगठन के निर्देश पर संचालित होने के बजाय उसके स्वाभाविक विकास पर बल देते हैं। वहप्रगतिशील लेखक संघके अधिवेशन से पूर्व 1930 . से ही साहित्य में आये परिवर्तन को रेखांकित करते हुए लिखते हैं किसन् 30 के बाद के साहित्य में व्यापक और बुनियादी परिवर्तन हुआ। यह परिवर्तन अपने आप में हुआ था, किसी संगठन के निर्देश देने पर या उससे संचालित होकर यह परिवर्तन नहीं हुआ। उन सभी लोगों के लिए जो हिंदी साहित्य का विकास चाहते हैं, यह परिवर्तन ध्यान देने योग्य है।3 प्रेमचंद के साहित्य में परिवर्तन का यह लक्षण सबसे पहले और स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। प्रगतिशील साहित्य के विकास में रामविलास शर्मा प्रेमचंद के अलावा पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा, बलभद्र दीक्षितपढ़ीसके साथ रामचन्द्र शुक्ल के योगदान को भी स्वीकार करते हैं, उनकी दृष्टि में ये सभी अपनी-अपनी तरह से सहयोग दे रहे थे। वे लिखते हैं किसन् 34 में जयशंकर प्रसाद कातितलीउपन्यास प्रकाशित हुआ जो प्रेमचंद परम्परा में एक आगे बढ़ा हुआ कदम है। सन् 33 में निराला नेदेवी’, ‘चतुरी चमारआदि रेखाचित्र लिखे जो हिंदी के यथार्थवाद की नयी देन है। सन् 33 में बलभद्र दीक्षितपढ़ीसने अवधी में अपनी कविताएँ प्रकशित कीं जिनका किसानों के जीवन से गहरा संबंध था। आगे चलकर महादेवी वर्मा ने अपने रेखाचित्र और सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कहानियाँ तथाग्राम्यकी कविताएँ प्रकाशित कीं जो यथार्थवाद की ओर इस व्यापक रुझान का बहुत बड़ा प्रमाण है।4 स्पष्ट है कि रामविलास शर्मा प्रगतिशील साहित्य चिंतन को प्रगतिवाद के सीमित दायरे से बहार निकालते हैं और उसमें केवल मार्क्सवादी प्रभाव की खोज की बजाय यथार्थ चित्रण को महत्त्व देते हैं। यही कारण है कि वह प्रगतिशील साहित्य की परम्परा में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे गैरमार्क्सवादी लेखक को शामिल ही नहीं करते बल्कि उन्हें प्रेमचंद और अपने प्रिय कवि निराला के बराबर महत्त्व देते हैं। वे लिखते हैं किहिंदी साहित्य में शुक्ल जी का वही महत्त्व है जो उपन्यासकार प्रेमचंद या निराला का। उन्होंने आलोचना के माध्यम से उसी सामन्ती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचंद और निराला ने। शुक्ल ने तो भारत के रुढ़िवाद को स्वीकार किया, पश्चिम के व्यक्तिवाद को। उन्होंने बाह्य जगत् और मानव-जीवन की वास्तविकता के आधार पर सामन्ती साहित्य का विरोध किया और देशभक्ति और जनतन्त्र की साहित्यिक परम्परा का समर्थन किया।5 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के संबंध में रामविलास शर्मा की यह स्थापना अन्य मार्क्सवादी आलोचकों से उलट है। वह जानते थे कि इस बात को सबके लिए स्वीकारना आसान नहीं होगा इसलिए उन्होंने प्रेमचंद और निराला की तरह रामचन्द्र शुक्ल पर भी स्वतंत्र किताब लिखी, जिसमें मार्क्सवादी दृष्टिकोण से विस्तृत मूल्यांकन किया। वे लिखते हैं किप्रेमचंद के बाद कथा साहित्य में किसानों और मजदूरों का जैसा भरा-पूरा चित्रण होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। कविता को जिस तरह से कंठ में बस जाना चाहिए था, शुक्ल जी के बाद आलोचना को जिस तरह सामंती संस्कार ख़त्म करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर आगे बढ़ना चाहिए था, वह सब नहीं हुआ।6 स्पष्ट है कि रामविलास शर्मा आगे के साहित्य का विकास प्रेमचंद, निराला और रामचन्द्र शुक्ल की विरासत पर चाहते थे, उनकी दृष्टि में यह प्रगतिशील साहित्य की समृद्ध विरासत थी।

          रामविलास शर्मा प्रगतिशील साहित्य और प्रगतिवाद में अंतर करते हैं, उनकी दृष्टि में प्रगतिशील साहित्य का जहाँ यथार्थ चिंतन से संबंधित है, वहीं प्रगतिवाद का संबंध मार्क्सवादी यथार्थ से है। यद्यपि दूसरे मार्क्सवादी आलोचक इस प्रकार के विभाजन को स्वीकार्य नहीं करते हैं। जैसा कि डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं किकुछ लोग प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य में भेद करते हैं। उनके अनुसार मार्क्सीय सौन्दर्य-शास्त्र का नाम प्रगतिवाद है और आदिकाल से लेकर अब तक की समस्त साहित्य-परम्परा प्रगतिशील साहित्य है। इस तरह वे केवल छायावाद के बाद की साहित्यिक प्रवृत्ति के लिएप्रगतिशील साहित्यनाम का प्रयोग अनुचित मानते हैं।... लेकिन जिस तरह छायावाद और छायावादी कविता भिन्न नहीं है उसी तरह प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य भिन्न नहीं है।वादकी अपेक्षाशीलको अधिक अच्छा और उदार समझकर इन दोनों में भेद करना कोरा बुद्ध-विलास है और कुछ लोगों की इस मान्यता के पीछे प्रगतिशील साहित्य का प्रछन्न विरोध भाव छिपा है।7 एक ही विचारधारा के दो बड़े आलोचकों में प्रगतिशील साहित्य के संबंध में यह मतभेद उद्देश्य और दृष्टि में भिन्नता के कारण है। नामवर सिंह मार्क्सवादी विचारधारा को उसके मूल रूप में स्वीकार करते हुए उसको विस्तार देने का प्रयास करते हैं इसीलिए प्रगतिशील साहित्य को अंग्रेजी केप्रोग्रेसिव लिट्रेचरसे प्रभावित मानकर मार्क्सवाद के सीमित दायरे में उसकी व्याख्या करते हैं, जबकि रामविलास शर्मा मार्क्सवाद से वही ग्रहण करते हैं जो भारतीय चिंतन परम्परा के अनुकूल है, उनका उद्देश्य मार्क्सवाद के विस्तार से अधिक उसका भारतीय ढाँचा तैयार करना था इसलिए वे प्रगतिशील साहित्य को स्वाभाविक विकास मानते हुए उसके समान साहित्य की खोज करते हुए आदिकाल तक जाते हैं और उसकी परम्परा में बहुत से गैर-मार्क्वादियों को भी शामिल करते हैं।

          रामविलास शर्मा 1936 . मेंप्रगतिशील लेखक संघकी स्थापना और उसके पहले अधिवेशन से हिंदी साहित्य में आए बदलाव को नये प्रगतिशील साहित्यिक आन्दोलन के रूप में देखते हैं। वे लिखते हैं किप्रेमचंद ने अप्रैल 1936 . में प्रगतिशील लेखकों के प्रथम अखिल भारतीय सम्मेलन का सभापतित्व करके इस नये युगांतकारी आन्दोलन का सूत्रपात किया।8 हिंदी के बहुत से लेखक उस समय इस प्रकार के आन्दोलन की आवश्यकता भी अनुभव कर रहे थे इसलिए शीघ्र ही इसका असर दिखाई पड़ने लगा। हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कविता पर इसका प्रभाव अधिक दिखाई दिया, क्योंकि जैसा पहले कहा जा चुका है कि गद्य साहित्य में पहले से ही यथार्थवादी लेखन आरम्भ हो चुका था। कविता में एक नये युग का जन्म हुआ, जिसे प्रगतिवाद की संज्ञा दी गई। नामवर सिंह लिखते हैं किअपने यहाँ हिन्दुस्तान में सन् 36 के आस-पास एकदम यूरोप का-सा गतिरोध तो नहीं था; लेकिन कविता में छायावाद का विकास लगभग रुक-सा गया था और कवि कुछ नये विचारों और व्यंजना के माध्यमों की खोज में थे। ऐसे ही समय यूरोप से लौटे हुए हिन्दुस्तानी लेखकों नेप्रगतिकी आवाज लगाई और सुमित्रानंदन पन्त ने छायावाद कायुगांतघोषित करके प्रगतिवाद कोयुगवाणीके रूप में तुरंत अपना लिया। देर-सवेर निराला और महादेवी ने भी अपनी-अपनी सीमाओं में इसे स्वीकार किया।9 इससे प्रगतिशील साहित्य तेज़ी से समृद्ध होने लगा। लेखक एकांत साधना के बजाय जन सामान्य से जुड़ा और उसकी समस्याओं को साहित्य के केंद्र में लेकर आया।

प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन का हिंदी साहित्य पर व्यापक असर हुआ रामविलास शर्मा के अनुसारप्रगतिशील साहित्यिक आन्दोलन अखिल भारतीय आन्दोलन था। इस तरह का कोई भी साहित्यिक आन्दोलन उस समय देश में था।10 स्पष्ट है कि यह आन्दोलन हिंदी साहित्य तक सीमित रहा है लेकिन यह महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उस समय देश के किसी दूसरे हिस्से में इस तरह का कोई अन्य साहित्यिक आन्दोलन नही चल रहा था। प्रगतिशील साहित्यिक आन्दोलन ने असीम संभावनाओं को जन्म दिया था किन्तु शीघ्र ही विवादग्रस्त भी हो गया और इसकी कई तरह से आलोचना की जाने लगी। कुछ आलोचनाएँ तो ऐसी हैं जो आन्दोलन के जन्म के साथ ही आरम्भ हो गई थीं और आलोचना के लिए जो तर्क उस समय दिए जा रहे थे वही तर्क आज भी दिए जा रहे हैं, जिनमें कुछ खास बल नहीं है। ऐसी आलोचनाओं के संबंध में रामविलास शर्मा लिखते हैं किउस समय भी प्रगतिशील आन्दोलन का विरोध करने वालों की कमी नही थी। वे कहते थे, युद्धवाद का विरोध करना लेखकों को रुस की वैदेशिक नीति पर चलना है। देश की स्वाधीनता का उद्देश्य सामने रखना साहित्य को राजनीतिक प्रचार मंत्र बना देना है। ग़रीब जनता का साथ देना साहित्य में वर्ग-संघर्ष, हिंसा और घृणा को जन्म देना है। प्राचीन रूढ़िवाद का विरोध भारतीय संस्कृति का नाश करना है। समाजवादी आदर्शवाद से प्रेरित होना पश्चिम की नक़ल करना है। ये सब आरोप आज भी दोहराए जाते हैं। इससे प्रगतिशील साहित्य की उपयोगिता तब खत्म हुई थी आज खत्म हुई है।11 स्पष्ट है कि प्रगतिशील साहित्य को ऐसी आलोचनाओं से कोई नुकसान नहीं पहुँचा लेकिन ऐसा नहीं है कि इस आन्दोलन में कोई कमज़ोरी नहीं थी। रामविलास शर्मा स्वयं एक तरफ़ प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन की निरर्थक आलोचना का खंडन करते हैं तो दूसरी तरफ़ उसके भीतर की कमज़ोरियों को भी उजागर करते हैं, जिससे वास्तव में आन्दोलन को क्षति पहुँची।

रामविलास शर्मा प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन की पहली और मुख्य कमज़ोरी के संबंध में लिखते हैं किइस आन्दोलन की सबसे बड़ी समस्या मार्क्सवाद से प्रभावित लेखकों तथा अन्य राष्ट्रवादी और जनवादी लेखकों की एकता की समस्या रही है।12 इस बात से इनकार नहीं किया सकता है क्योंकि आगे चलकर इन्हीं लेखकों ने मार्क्सवाद का विरोध आरम्भ किया। रामविलास शर्मा की दृष्टि में यह अलगाव कुछ लेखकों द्वारा प्रगतिशीलता के नाम परपुराने इतिहास और संस्कृति को भौंडे और ग़लत ढंग से प्रस्तुत करने करने के कारण हुआ।13 प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन की इस कमज़ोरी का उद्घाटन केवल रामविलास शर्मा ने ही नहीं किया बल्कि कई गैर-मार्क्सवादी लेखकों ने भी किया है। जैसा कि बच्चन सिंह लिखते हैंइस आन्दोलन और साहित्य सर्जना की मुख्य त्रुटि यह रही है कि यह गहरे अर्थ में अपनी ज़मीन से नहीं जुड़ पाई। अपनी परम्परा और भावधारा के प्रति अनादर का भाव रखने के कारण भी यह आंदोलन भी देश की मुख्यधारा से कटकर अलग हो गया।14 निश्चय ही प्रगतिशील साहित्य के संबंध में यह महत्त्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न है, जिसकी ओर रामविलास शर्मा ध्यान ही नहीं दिलाते बल्कि अपने सम्पूर्ण लेखन में भारतीय इतिहास, संस्कृति और परम्परा को ध्यान में भी रखते हैं। लेखकों के बीच अलगाव का एक अन्य कारण रामविलास शर्मा नेगैर-मार्क्सवादी लेखकों के मूल्य को आंकना15 भी माना है। शायद यही कारण है कि रामविलास शर्मा मार्क्सवादी दृष्टिकोण से गैर-मार्क्सवादी लेखकों का मूल्यांकन भी करते हैं, जिसके कारण उन्हें मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी दोनों विचारधारा के लेखकों का विरोध झेलना पड़ा। रामविलास शर्मा प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन के संबंध में यशपाल, राहुल सांकृत्यायन और सुमित्रानंदन पंत के उचित मूल्यांकन किए जाने को लेकर कुछ ऐसी कमज़ोरियों की चर्चा भी करते हैं जो उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। यद्यपि इस पर ध्यान दिया जाता तो निश्चय ही प्रगतिशील साहित्य की धारा को और मजबूती मिलती।

          संक्षेप में कह सकते हैं कि प्रगतिशील साहित्य के संबंध में रामविलास शर्मा की दृष्टि प्रगतिवाद तक सीमित नहीं थी। वे प्रगतिशील साहित्य को केवल मार्क्सवाद से जोड़ने के बजाय यथार्थ की अभिव्यक्ति से जोड़कर देखते हैं। यही कारण है कि साहित्य में उसके विकास को स्वाभाविक ही नहीं मानते हैं बल्किप्रगतिशील साहित्य की परम्पराकी खोज करते हुए आदिकाल तक जाते हैं और उसमें बहुत-से ऐसे लेखकों को जोड़ते हैं जो मार्क्सवादी नहीं थे। रामविलास शर्मा का यह कार्य मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी दोनों प्रकार के चिंतकों से उन्हें भिन्न और महत्त्वपूर्ण बनाता है साथ ही प्रगतिशील साहित्य को देखने की अलग दृष्टि प्रदान करता है।

संदर्भ :
1.     प्रेमचंद. कुछ विचार राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली (2013),  पृष्ठ-20
2.     वही-पृष्ठ-25
3.     रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, वाणी प्रकशन, नई दिल्ली (1984), पृष्ठ-60
4.     वही, पृष्ठ-240
5.     रामविलास शर्मा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली (2003),  पहले संस्करण की भूमिका
6.     रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, वाणी प्रकशन, नई दिल्ली (1984), पृष्ठ-62
7.     नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, लोकभारती प्रकशन, इलाहबाद, (1998.),  पृष्ठ-59
8.     रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, वाणी प्रकशन, नई दिल्ली (1984), पृष्ठ-240
9.     नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, लोकभारती प्रकशन, इलाहबाद (1998.),  पृष्ठ-60
10.  रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, वाणी प्रकशन, नई दिल्ली  (1984), पृष्ठ-244
11.  वही, पृष्ठ-244
12.  वही, पृष्ठ-245
13.  वही, पृष्ठ-250
14.  बच्चन सिंह, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकशन, इलाहबाद (2007), पृष्ठ-247                                                                       
15.  वही, पृष्ठ-250
                                                                                                                                                                      
रूपेश कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी साहित्य विभाग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
 

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक कुमार

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