शोध आलेख :कठगुलाब उपन्यास के माध्यम से स्त्री मुक्ति के प्रश्न / किशोर कुमार

कठगुलाब उपन्यास के माध्यम से स्त्री मुक्ति के प्रश्न
- किशोर कुमार

शोध सार : प्रस्तुत शोध पत्र कठगुलाब उपन्यास में पितृसत्तात्मक वर्चस्ववाद का विरोध करते हुए स्त्री मुक्ति सेजुड़े प्रश्न को उठाता है। स्त्री की राजनीतिक चेतना को सशक्त बनाना स्त्रीवाद की बुनियादी चिंता है। स्त्री मुक्ति के प्रयासों का समग्र सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूपांतरण में बदलने की चिंता इसका मुख्य सरोकार है। आज स्त्री मुक्ति के स्वर पुरुषों का विरोध नहीं करती है बल्कि उनकी स्त्रियों के प्रति विकृत मानसिकता का प्रतिवाद करती है। प्रस्तुत शोध पत्र में कठगुलाब उपन्यास के माध्यम से स्त्री मुक्ति के प्रश्न को उठाया गया है। समाज में स्त्रियों को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है? आर्थिक रूप से सशक्त होने की वजह से किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? कठगुलाब उपन्यास में मृदुला गर्ग ने उस नब्ज को पकड़ने की कोशिश की है। जिसके ज़रिये स्त्री मुक्ति के द्वार खुलते हैं। उपन्यास में सशक्त पात्रों को गढ़ कर लेखिका ने वर्षों से छटपटाती स्त्रियों को पितृसत्ता के खिलाफ या उसके सामानांतर अपनी सत्ता स्थापित करते हुए स्त्री मुक्ति के नये द्वार खोलती है।   

बीज शब्द : पितृसत्ता, नारीवाद, अस्मिता, स्त्री मुक्ति, प्रतिशोध, विद्रोह, शोषणतंत्र, उत्पीड़ित, हक़, सामाजिक, राजनैतिक, जैविक

मूल आलेख : समाज में स्त्री से जुड़े कई मुद्दे हैं जिन पर बातचीत करना जरुरी है यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चाहे घर हो या बाहर हर जगह स्त्री शोषण का शिकार होती चली आई है वर्तमान समय की खूबसूरती यह है कि आज स्त्री पर हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठ रही है फिर चाहे वह मंच हो अथवा साहित्य जगत। नारी के अधिकारों के लिए आवाज उठाना बेहद जरुरी और अहम है। स्त्री उत्थान और पतन के  कितने दौरों से गुजरती हुई आज ऐसी स्थिति में पहुंची है, जहाँ पितृसत्तात्मक समाज में वह मां, पत्नी और भोग्या तो हो सकती है, व्यक्ति नहीं

     व्यक्ति (पर्सन) के रूप में स्वीकारे जाने का प्रश्न ही नारीवाद का केन्द्रीय प्रश्न है। नारी विमर्श से जुड़े सभी प्रश्न स्त्री अस्मिता, स्त्री की स्वतंत्रता अथवा स्त्री मुक्ति इसी केंद्र बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमते हैं। दरअसल नारी विमर्श में जिस समस्या को उठाया गया है वह एकांगी होकर बहुआयामी है। वह युगीन शोषणतंत्रों, सामाजिक राजनीतिक ढांचों, आर्थिक परिस्थितियों तथा इनसे उपजे सांस्कृतिक, धार्मिक मूल्यों का एक अंग है अंत: किसी भी देशकाल में इनके रूप में भिन्नता आना स्वाभाविक ही है चूँकि यह विमर्श है जो वर्ग, नस्ल, राष्ट्र  आदि संकुचित सीमाओं को लांघ कर हर उस स्थान तक पहुँचता है, जहाँ स्त्री दमन, शोषण और उत्पीड़न से त्रस्त है। इस प्रकार यह एक ही समय में  देशकाल की सीमाएं  लांघकर राष्ट्रीय ही नहीं वैश्विक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ता प्रतीत होता है।

 जब सिमोन बाउआर अपनी पुस्तक सेकंड सेक्समें यह कहती हैं किस्त्री पैदा नहीं होती बल्कि गढ़ी जाती हैतो उनका आशय है कि परिवार में जन्म के बाद ही बालिका पर बंधनों का अंकुश शुरू हो जाता है। जिससे उसका जीवन और विकास दोनों प्रभावित होता है। औरतों के गुण हर समय परिवार के सदस्यों के द्वारा याद दिलाया जाता है। जिसका एक ही मकसद होता है। सब कुछ आत्मसात करके एक स्त्री बनना। समाज में जहाँ पुरुषों को हर प्रकार की छूट है वही स्त्रियों के लिए बंधन है। समाज के  दोहरे  दृष्टि को रेखांकित करते हुए क्षमा शर्मा लिखती हैं – “पचास औरतों के साथ सम्बन्ध रखकर पुरुष अच्छा कहला सकता है, अपने घर लौट सकता है। स्त्री एक प्रेम करके चरित्रहीन कही जा सकती है और अफ़सोस यह है कि स्त्री की छवि को बनाने में धर्मशास्त्र पीछे है साहित्य[i]

समाज में स्त्रियों की आधी आबादी के बावजूद उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। बड़े शहरों में भले ही उनकी स्थिति कुछ बेहतर हो लेकिन गाँव अथवा छोटे शहरों में हर स्तर पर उनके साथ अन्याय होता है। घरेलू  जिम्मेदारियों के साथ-साथ वह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में सक्षम है फिर भी वह शोषण और उत्पीड़न सहने को विवश है। स्त्री जीवन की इन्हीं दमन, शोषण और संघर्ष को वर्तमान हिन्दी साहित्य अभिव्यक्ति प्रदान कर रहा है। स्त्री जीवन की मुक्ति के गहन प्रश्न उसके चिंतन केंद्र में स्थित है। स्त्री लेखन के माध्यम से कथा साहित्य में महती योगदान करने वाली समकालीन कथाकारों में मृदुला गर्ग का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वह एक बोल्ड, साहसी और सशक्त कथाकार हैं। उन्होंने अबतक सात उपन्यासों की सृष्टि की है। जिनमेंउसके हिस्से की धूप’, ‘वंशज’, ‘चित्तकोबरा’, ‘अनित्य’, ‘मैं और मैंतथाकठगुलाबआदि प्रमुख है। इनके अधिकांश उपन्यास आज की नारी के अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में दृढ़तापूर्वक स्वीकार करते हैं। जीवन के वास्तविकताओं और समस्याओं से इनके उपन्यास जुड़े हुए हैं।उसके हिस्से की धूप’(1975), ‘चित्तकोबरा’(1979) तथामैं और मैं’(1984) इन तीनों उपन्यासों में विवाहेत्तर संबंधों में नारी का स्वरूप तथा नारी का आधुनिक युग में बदला हुआ सशक्त रूप दिखाई देता है। उसके हिस्से की धूप तथा चित्तकोबरा में ऐसी सशक्त निर्भीक नारियां हैं जो प्रेम और सेक्स में पाप-पुण्य के सम्मोहन से ऊपर उठ चुकी हैं, जो विवाह को मानसिक संतुष्टि का साधन मानती हैं। वहीँ 1976 में प्रकाशितवंशजउपन्यास एक नई दिशा की खोज है। स्वतंत्रता के बाद जिस नौकरशाही  को अंग्रेज अपनी विरासत के तौर पर छोड़ गए थे उसके प्रति विद्रोह करती नई पीढ़ी का चित्रण है हुआ है। सामान्य शब्दों में कहें तो उपन्यास में पिता-पुत्र के बीच का वैचारिक संघर्ष उद्घाटित हुआ है। जबकिमैं और मैं’(1984) उपन्यास में एक स्त्री लेखिका के दोहन, शोषण और संघर्ष की कहानी दर्ज है। प्रस्तुत उपन्यास में कैसे अपने अहम की तुष्टि हेतु एक लेखिका आर्थिक और नैतिक शोषण का शिकार होती है उसका मार्मिक चित्रण किया है। उपन्यास में उच्चवर्गीय लेखिका और निम्नवर्गीय लेखक के अपराधबोध की टकराहट से उपजी अंतर्द्वंद को दिखाया गया है। उपन्यास में माधवी और कौशल दोनों लेखक हैं लेकिन वैचारिक धरातल पर दोनों में टकराहट है। उपन्यास में माधवी को अबला और भोली समझकर कौशल कुमार द्वारा ब्लैकमेल करने की कथा का सूक्ष्म चित्रण किया गया है। मृदुला जी के उपन्यासों के सभी स्त्री पात्र अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेती है। वे किसी और के सहारे या प्रतीक्षा में नहीं रहती है। लेखिका ने अपने उपन्यासों के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग की स्त्री के संघर्षों का चित्रण कर उसकी दशा और दिशा से पाठक वर्ग को परिचित करवाया है। वे अपने उपन्यासों के माध्यम से समाज में स्त्री को वस्तु नहीं मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित करने को तत्पर है। वे नारी के संघर्ष, प्रेम की तलाश, आत्मसंतुष्टि और मुक्ति के प्रश्नों को सिर्फ उठाती है बल्कि उसके समाधान हेतु हल को भी तलाशती हैं।

ऐसा ही उपन्यास कठगुलाब है जिसमें चित्रित नारियां स्त्री मुक्ति के प्रश्न से टकराती हैं और पुरुषों से हटकर अपनी एक अलग लीक खींचती हैं। जो पुरुष सत्ता के समान्तर स्त्री सत्ता निर्मित करने के लिए स्त्री पात्रों को संघर्ष और जद्दोजहद करते हुए दिखाती है।

          कठगुलाब उपन्यास अनेक औरतों की जिंदगी का जायजा लेता हुआ जीवन के तमाम संगत-असंगत तत्वों की खोज करता है। जो कभी व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ता है और कभी तोड़कर एक सतत गतिशील समाज को जन्म देता है। मृदुला गर्ग का यह छठा उपन्यास है जो 1986 में भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी। उत्तर आधुनिक काल का यह उपन्यास मशीन में तब्दील होते आदमी को इन्सान बनने की राह पर वापस लाने की कवायद के लिए लिखा गया है। लेखिका ने कठगुलाब लिखने के उद्देश्य को  स्पष्ट करते हुए कहा है कि – “सब तरह की ऐतिहासिक, राजनीतिक और व्यवसायिक उठा-पटक से उत्पन्न वैश्वीकरण, मंडीकरण और यंत्रीकरण का मूल प्रभाव हम पर यह हुआ की हमारी भूमि और भावभूमि दोनों बंजर होती जा रही है इसी सच की चुनौती ने मुझ से कठगुलाब लिखवाया है[ii]  मृदुला गर्ग अपने परिवेश से बखूबी परिचित हैं। उन्होंने समाज को बड़े करीब से देखा है। आज के समय में मनुष्य के जीवन में जो अस्थिरता की स्थिति बनी हुई है। उसको हमारे सामने खोल कर रख देती हैं और हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं और उसमें स्त्री कहाँ है ?

यह उपन्यास पांच भागों में विभक्त हैस्मिता, मारियान, नर्मदा, असीमा और विपिन।  प्रथम प्रकरण में नमिता स्मिता दो बहनों की विवशता भरी जीवन की कथा अंकित है। पिता की मृत्यु के बाद स्मिता अपने बहन के घर में रहने को विवश है जहाँ उसका जीजा उसके साथ दुर्व्यवहार करता है। घर से झूठ बोल कर कलकत्ता जाने की बात कह कर निकलता है  लेकिन चुपके से रात में उसके कमरे में घुस का मुंह में कपड़ा ठूंस कर उसके साथ बलात्कार करता है। यह घटना स्मिता को अंदर तक झकझोड़ देती है। उसे विश्वास नहीं होता है उसका जीजा उसके साथ ऐसा भी कर सकते हैं। जीजा से बदला लेने के लिए अमेरिका जाती है। वहां उसकी शादी जिम से होती है लेकिन वैवाहिक जीवन सफल नहीं हो पाता है। उसके बाद रॉ की नौकरी ज्वाइन करती है जहाँ उसे अपने अधिकार और अस्तित्व को समझने का अवसर प्राप्त होता है। स्मिता में प्रतिशोध की भावना जबरदस्त है वह अपने जीजा से बदला लेना चाहती है जब उसके  जीजा की मरने की खबर आती है तो वह सोचती है –“ वह मर गया इससे मेरा प्रतिशोध कहाँ पूरा हुआ ? बल्कि भयानक छल हुआ मेरे साथ[iii]  स्मिता के साथ उसके जीजा का व्यवहार बेहद शर्मनाक और घिनौना रहा। आर्थिक स्थिति बेहतर होने की वजह से अपने बहन की घर रहने आई स्मिता अपने जीजा की शिकार हो जाती है। दैहिक शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना भी भारी पड़ता है। स्मिता अपने साथ हुए शोषण के खिलाफ प्रतिशोध की भावना में जलती रहती है। अंत तक वह अपने प्रतिशोध का बदला नहीं ले पाती है। जीवन भर उसके साथ यह कसक बनी रहती है। बहन नमिता का व्यवहार भी उदासीन ही रहा। एक तरफ जहाँ बहन है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है तो वही दूसरी ओर पति जो रोटी, कपड़ा और छत मुहैया करवा रहा है।  आर्थिक रूप के परिवार चलाने में सक्षम है। एक स्त्री के लिए आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना अति आवश्यक है अन्यथा वह स्वछंद होकर अपने जीवन के निर्णय नहीं ले पाती। यह तक कि अपने शोषण के खिलाफ भी। जैसे स्मिता और कहीं कहीं नमिता भी इन्ही आर्थिक कारणों के चलते चुप है।  ''मुक्ति की पहली शर्त स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता है। यदि इस शर्त को कोई औरत पूरा कर लेती है तो वह अपने ज़िन्दगी की आधी लड़ाई जीत जाती है।''[iv] उपन्यास में यह लड़ाई नमिता कभी जीत सकी। नमिता पितृसत्ता के एजेंट के रूप में उभरती है साथ ही बहन के विरुद्ध खड़ी होकर स्त्री शक्ति को निरंतर कमजोर करने में सहयोग देती हैइसीलिए "परिवार निजी संपत्ति' 'राज्य की उत्पत्ति' में एंगेल्स लिखते हैं- "पति पर महिला की आर्थिक निर्भरता का अर्थ यह है कि परिवार के दायरे में पति बुर्जुवा होता है तथा पत्नी सर्वहारा। नारी की मुक्ति की पहली शर्त है कि सभी नारियों को सार्वजनिक उद्यम में आना होगा।"[v]

       मारियान नामक दूसरे प्रकरण में स्मिता के साथ रॉ में काम करने वाली अमेरिकन स्त्री मारियान के शोषण की दास्ताँ दर्ज है। स्त्री जीवन की पूर्णता को मातृत्व से जोड़कर देखा गया है और स्त्री की इतनी कंडीशनिंग होती रही है कि स्त्री ने मातृत्व के बिना जीवन को व्यर्थ समझ लिया है।  मारियन अपने पति इर्विंग से शारीरिक और बौद्धिक शोषण का शिकार होती है। दस वर्षों की मेहनत से जुटाई रचना के लिए सामग्री इर्विंग को देती है और उसका पति एक झटके में मारियान को दरकिनार कर अपने नाम से उपन्यास प्रकाशित करवा लेता है। इस घटना से मारियान को बेहद झटका लगता है। लेकिन दृढ़ संकल्पित मारियान शोषण से मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ती है लेकिन सफलता नहीं मिलती है। वह फिर भी हार नहीं मानती है और स्मिता के पीड़ा को कथ्य बनाकर कई उपन्यास रच डालती है और तब उसका आत्मविश्वास फिर से जग उठता है। कठगुलाब के मारियान जैसे जीवंत पात्र जो प्रतिशोध और विद्रोह की आवाज़ को बुलंद करती है उनके लिए चंद्रकांता कहती हैं - “मृदुला गर्ग के कठगुलाब की देश-विदेश में बसी नारियां है। जो भिन्न सन्दर्भों-स्थितियों के बावजूद पुरुष की सामंती मानसिकता के विरोध में अड़ी-डटी हैं। बार-बार तोड़े जाने पर भी हार मानने वाली स्त्रियाँ मौजूद है[vi] स्त्री अपनी मुक्ति के लिए पुरुष वर्चस्व वाले इस समाज में स्वयं को मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष करती है। उसकी चेतना अब जागृत हो चुकी है। वह बंधन की दीवार को लांघना चाहती है। अब की नारी शिक्षित और अपने धुन की पक्की है। घर की जिम्मेदारी से लेकर बाहर के दायित्वों को भलीभांति निर्वहन करना जानती है।

          तीसरा प्रकरण नर्मदा है जो स्मिता का निम्नवर्गीय रूपांतरण है। स्मिता की तुलना में नर्मदा अधिक ठोस और जानी पहचानी है। मध्यवर्ग की नारी अपने स्थितियों के प्रति सजग तो होती है लेकिन व्यवहारिक  स्तर पर कमजोर होती है। शोषण हो रहा है, इस बात को जानकर भी उसका विरोध नहीं कर पाती है। जबकि निम्न वर्ग की स्त्रियाँ आत्मनिर्भर भी है और तेवर भी दिखाती है इसकी वजह है वर्गीय मानसिकता। बचपन से चूड़ियों के कारखाने में बड़ी होने पर लोगों के घरों में तथा बाद में सिले कपड़े का व्यापार करने वाली नर्मदा अपने जीजा से आर्थिक रूप से शोषण का शिकार होती है। जीजा उसे मार गालियाँ देता है उसके भाई की पिटाई करता है। जवान होने पर उसी जीजा से अनमेल विवाह करवा दिया जाता है। इस तरीके से स्त्रियाँ किसी भी वर्ग की हो वह पितृसत्तात्मक  व्यवस्था की मार सहती ही है। आज स्त्री शिक्षित हुई है, वह पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर काम कर रही है। यदि अपनी अस्मिता के पहचान के लिए तत्पर हो उठी है तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। यही कारण है कि स्त्री अस्मिता आधुनिक युग में अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न बन गया है। रेखा कस्तवार लिखती हैं – “साहित्य जगत में विगत दस वर्षों में स्त्री समाज का केंद्र में आना और उससे आगे बढ़कर विचार के केंद्र आना हमारे आर्थिक सामाजिक विकास का परिणाम है। इन दस वर्षों में स्त्री मुक्ति के सभी प्रश्न उठे, आयोग बनें, कानून बदले, नये कानून बनें। जनसंचार, पत्रकारिता, शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र, व्यापार