अफ़लातून की डायरी (10)
गोवा यात्रा
- विष्णु कुमार शर्मा

अफ़लातून की डायरी 183
03.12.2025
बलदेव जी ने जुलाई की शुरुआत में बताया कि गोवा विश्वविद्यालय नवम्बर में एक बहुभाषी रिफ्रेशर कोर्स करा रहा है सो हमने उसी समय इसके लिए एप्लाई कर दिया। अब हुआ ये कि पहले बलदेव जी का कन्फर्मेशन लैटर आया, फिर मेरा। दीपक जी का किसी तकनीकी कारण से अटक गया। हमने कुछ प्रयास किए। हालाँकि एक वक्त लगा कि दीपक जी का नहीं हो पाएगा तब हमने तय किया कि गर उनका नहीं होता है तो हम भी गोवा नहीं जाएँगे। जहाँ से भी करेंगे, साथ ही करेंगे। आख़िरकार दीपक जी का भी कन्फर्मेशन आ गया। अब आगे का काम दीपक जी को करना था यानी टिकट वगैरह, यात्रा की पूरी प्लानिंग। वे हमारे टूर मैनेजर हैं। दिल्ली से फ्लाइट की टिकटें की गईं। इस कोर्स में जयपुर से हमारे बैच के एक साथी राजेश बेनीवाल और जुड़ गए। मैंने और बलदेव ने पहले फ्लाइट से यात्रा नहीं कि थी तो ये हमारे लिए एक नया अनुभव था। हम उत्साहित थे। 17 नवंबर को हमने दिल्ली के इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एअरपोर्ट टर्मिनल एक से गोवा के लिए उड़ान भरी। दीपक जी ने टिकट्स के साथ कुछ स्नैक्स एड किए थे। दो पनीर रोल और दो सैंडविच, हम चारों ने वे आधे-आधे खाए। दोनों बेस्वाद। जो लोग नियमित फ्लाइट से यात्रा करते हैं और पर्याप्त समझदार थे, वे घर से खाना लेकर आए थे। हालाँकि किसी ने बताया था कि घर का खाना ले जाना फ्लाइट वाले अलाउ नहीं करते। फ्लाइट में युवाओं की संख्या ज्यादा थी। वे रील बनाने में मशगूल थे। करीब नौ बजे हम गोवा के डाबोलिम एअरपोर्ट पर उतरे। देशभर से करीब 50 प्रतिभागी इस कोर्स में आ रहे थे। इसके लिए एक व्हाट्सअप ग्रुप बनाया गया था। कोर्स कोर्डिनेटर ने ग्रुप में लिखा कि खाना 8 से 9 बजे के बीच ही मिलेगा, इसके बाद गर आप आते हैं तो डिनर नहीं मिलेगा। “अरे ! ये कोई बात है? इतनी दूर से लोग आ रहे हैं और आप उनका पहला स्वागत इस तरह कर रहे हैं”। खैर, दीपक जी ने कोर्स कोर्डिनेटर से बात की और वे हमारे लिए फूड पैकेट रखने को राजी हो गए। एअरपोर्ट से टैक्सी के द्वारा हम ओल्ड गेस्टहाउस पहुँच गए। हमें जो कमरा आवंटित किया उसमें टॉयलेट का हाल ख़राब था। हमने रिसेप्शन पर कहा तो उन्होंने कहा कि “सर, ऐसा ही है। हम लोग भी सबकी कंप्लेंट सुन-सुनकर परेशां हो गए हैं, आप यहाँ के मैनेजर से बात करें”। मैनेजर से बात की तो उन्होंने कोई ख़ास रेस्पोंस नहीं दिया। ओढ़ने को दी गई चादरें गंदी थीं, कमरे में जाले लगे थे, मच्छर अलग से, भुतहा-सा सब कुछ। जैसे-तैसे हमने रात बिताई। असली परीक्षा अब सुबह थी। टॉयलेट में वेस्टर्न कमोड लगा था लेकिन जेट स्प्रे नहीं था, फ्लश ख़राब था। हमने फिर रिसेप्शन पर जाकर कंप्लेंट की तो उन्होंने हमें एक और रूम दूसरी विंग में दे दिया। ये कमरा अच्छा था, साफ़-सुथरा लेकिन टॉयलेट में तो वही समस्या। हम फिर रिसेप्शन पर पहुँचे।
मैं : “भाई, कहीं कोई कॉमन इंडियन टॉयलेट हो तो बता दो?”
“नहीं है सर।”
राजेश : “तुम लोग जिस टॉयलेट को यूज करते हो, वो बता दो। हम वहाँ जा आएँगे।”
“वो भी ऐसा ही है, उसमें भी जेट स्प्रे नहीं है सर।”
राजेश (झल्लाकर) : “फिर तुम लोग कैसे धोते हो भाई, वो तरीका बता दो।”
“डब्बे से ही सर।”
हहाहहा... मैंने कहा चल भई, प्रेशर आ रहा है ज़ोर से। आज का तो निपटाते हैं बाकी का दिन में देखेंगे। अब वेस्टर्न टॉयलेट में हमें इंडियन स्टाइल से धोनी थी। असली परीक्षा तो उनकी थी जिनके शरीर भारी थे हहाहहा... नहा-धोकर तैयार हुए, कुछ प्रतिभागी साथियों से मुलाकात हुई सबकी यही शिकायत थी कि गर बेसिक फेसिलिटीज नहीं है तो ऑफलाइन कोर्स क्यूँ करा रहे हैं ये लोग?
हम लोग MMTTC गोवा (मदनमोहन मालवीय टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर, गोवा) पहुँचे, नाश्ता किया, रजिस्ट्रेशन कराया। कोर्स कोर्डिनेटर हनुमंत चोपड़ेकर जी से कुछ प्रतिभागियों ने शिकायत करनी चाही तो वे बोले कि उद्घाटन सत्र के बाद बात करते हैं। फिर अपने स्वागत भाषण में उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि इस संबंध में जो भी बात करनी है MMTTC के डायरेक्टर राजेंद्र एन. शिरसत यहाँ मौजूद हैं, इनसे कहें। अज़ीब बात है, कोर्स कोर्डिनेटर होकर कोई ज़िम्मेदारी नहीं ले रहे ! खैर, डायरेक्टर साब और भी गुरु निकले। बोले कि हमारे पास जो है यही है, किसी को तकलीफ़ है तो बाहर होटल या कहीं और रह सकता है। न्यू गेस्टहाउस या इंटरनेशनल गेस्टहाउस केवल विदेशी विद्यार्थियों के लिए है। हम सबको लगा कि भई ये तो धोखा हो गया। छह महीने से गोवा के सपने देख रहे थे और यहाँ आए तो ये हाल? उस पर भी इनका एटीट्यूड माशाल्लाह ! उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि और उसके बाद के सेशन के वक्ता थे- श्री दामोदर माउज़ो। आप ज्ञानपीठ व साहित्य अकादमी से सम्मानित कोंकणी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार हैं, गोवा मुक्ति संग्राम के सेनानी हैं। पेशे से दामोदर जी एक दुकानदार हैं और गाँव में अपनी दुकान चलाते हैं। प्रतिभागियों ने जब उनसे कुछ सवाल पूछे तो वे बोले कि “आप लोग मुझे ‘सर’ न कहें; मुझे यहाँ सब लोग ‘भाई’ कहकर बुलाते हैं, आप लोग भी भाई या दामोदर भाई कहकर संबोधित करेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा”। दामोदर भाई अपने प्रगतिशील लेखन के लिए जाने जाते हैं। उनकी ख्याति का मूल आधार उनका उपन्यास ‘कार्मेलिन’ है। यह उपन्यास खाड़ी देशों में काम करने वाली महिला प्रवासी कामगारों के शोषण को उजागर करता है। कहानी की नायिका कार्मेलिन अपने शराबी पति की मारपीट से तंग आकर अपनी बेटी के बेहतर भविष्य के लिए पैसा कमाने कुवैत चली जाती है। वहाँ मालिकों द्वारा कार्मेलिन जैसी घरेलू सहायिकाओं का यौन-शोषण किया जाता है। पैसे के लिए वह ये सब सहती है। ठीक-ठाक पैसा कमा लेने के बाद वह गोवा लौटती है। अब यहाँ दूसरी मुश्किल शुरू होती है कि खाड़ी देशों से लौटने वाली महिलाओं को समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। इस तरह यह एक महिला के संघर्ष और साहस की कहानी है। इसका भारत और दुनिया की कई भाषाओँ में अनुवाद हुआ है... जैसे फल आने पर पेड़ झुक जाता है, वैसे ही हमने दामोदर भाई को पाया, बेहद विनम्र और शांत। दामोदर भाई सच्चे अर्थों में साहित्यकार हैं, वे एक्टिविस्ट हैं। गोवा की भाषा, साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण के सजग प्रहरी हैं। उन्होंने विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है। ओपिनियन पोल हो या कोंकणी भाषा को संवैधानिक दर्ज़ा दिलाने की बात या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और एकल संस्कृतिवाद के खिलाफ़ मुखरता... हर जगह दामोदर भाई पहली कतार में थे। गौरी लंकेश और कलबुर्गी की हत्या का भी उन्होंने जमकर विरोध किया। इसके लिए उन्हें भी जान से मरने की धमकी भी मिली लेकिन वे अपनी सत्य और न्याय की पक्षधरता से नहीं डिगे। ऐसा हम हिंदी के साहित्यकारों में कम देखते हैं। हिंदी के अधिकांश साहित्यकार जमीं की लड़ाई में नहीं दीखते। और हम अधिक अचंभित इस बात से हुए कि गोवा विश्वविद्यालय ने उनको आमंत्रित किया। हमें बताया गया कि विश्वविद्यालय उन्हें अक्सर अपने कार्यक्रमों में बुलाता है। क्या यह उत्तर भारत में संभव है?
लंच के बाद सचिन मोरे सर आए। उन्होंने गोवा की संस्कृति की झलक दिखाई। गोवा के लोगों के खानपान, रहन-सहन, पहनावे और वहाँ के गाँवों से परिचय कराया। उनका कहना था कि “गोवा की जैसी छवि देशभर में बनी हुई है, गोवा वैसा बिल्कुल नहीं है। गोवा की बहुलता और संस्कृति आदिकाल से बहुत समृद्ध रही है। शराब कैथोलिक ईसाई समुदाय की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है लेकिन यहाँ के लोग बेवड़े नहीं हैं”। साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में गोवा की भारत को देन अद्भुत है। यहाँ की राज्य सरकार लगातार इसको बढ़ावा दे रही है। विभिन्न अकादमियाँ नई पीढ़ी को इससे जोड़ रही हैं। गोवा की इलियाना डिक्रूज़, भूमि पेडनेकर, वरशा उसगाओंकर जैसी अभिनेत्रियाँ बॉलीवुड में काम कर रही हैं। मिली-जुली संस्कृति को यहाँ के लोग बखूबी निभाते हैं। पुर्तगाली प्रभाव से विकसित संगीत ने देश और दुनिया को झुमने पर मजबूर किया है। एंथोनी गोंसाल्विस, सेबेस्टियन डिसूज़ा, फ्रैंक फर्नाड और रेमो फर्नांडिस को कैसे भुलाया जा सकता है? “माय नेम इज एंथोनी गोंसाल्विस, मैं दुनिया में अकेला हूँ...” अमिताभ बच्चन की दो अहम फिल्में- ‘सात हिन्दुस्तानी’ और ‘पुकार’ गोवा की पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पर हैं हालाँकि इन्हें अपेक्षित व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। ज़ीनत अमान और अमिताभ बच्चन का गाना ‘समंदर में नहाके और भी नमकीन हो गई हो’ हम सबके ज़ेहन में बसा ही है। शाम सवा पाँच बजे क्लास ख़त्म हुई। हम हॉस्टल आए, चेंज किया और निकल पड़े। चौराहे से सिटी बस पकड़ी और हम मीरामार बीच गए। मीरामार पुर्तगाली भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है- ‘समुद्र को देखना’। मीरामार गोवा की राजधानी पणजी से सटा हुआ है। पणजी को स्थानीय भाषा में पंजी, पंजिम या पेंजिम भी उचारा जाता है। समुद्र तट पर चलते-चलते हम पणजी चले गए और बाद में वहाँ से सिटी बस पकड़कर लौट आए।
गूगल सर्च करने और कुछ साथियों से बात होने पर पता चला कि हॉस्टल के ठीक पीछे cacra बीच है। सुबह-सवेरे हम पैदल-पैदल वहाँ चले गए। ये एक शांत समुद्री तट था। वहाँ कुछ घर बने हुए थे। वे शायद मछुआरे थे। एक आदमी और औरत मिलकर जाल को ठीक कर रहे थे। एक जगह दो पुरुष नाव में जाल में फँसी मछलियों को निकाल रहे थे। मैंने पास जाकर देखा। एक बड़ी प्लास्टिक बाल्टी में रंगीन मछलियाँ रबर के खिलौने जैसी दिख रही थीं। जाल से निकालकर बाल्टी में फेंके जाने पर आने वाली धप-धप की आवाज से भी लग रहा था कि ये निर्जीव खिलौने सरीखी हैं। यहाँ नारियल के पेड़ों पर असंख्य कौए और चील थीं। इतने कौए मैंने बहुत दिनों बाद देखे थे। हमारे यहाँ कौए लगभग ख़त्म से हो गए हैं। हम भी बस उन्हें पितृ-पक्ष में याद करते हैं। हम उनकी चिरौरी करते हैं कि कौए राजा, दादाजी के निमित्त का ये खीर-पुए का कौर खा लो प्लीज। उस समय कौए भी भाव खाते हैं और हमें मुँह चिढ़ाते हैं कि जाओ नहीं खाते। ऐसे तो अपने घर की मुंडेर पर बैठने भी नहीं देते और आज चिरौरी करते हो। हुँह ! जाओ, नहीं खाते, नहीं खाते, नहीं खाते... और आख़िर में हम इंतजार कर लौट आते हैं कि बाद में खा लेंगे। देर हो रही है। घर में बच्चे भूखे हैं, ब्राह्मण को भोजन कराएँ और काम निपटे तो ऑफिस जाएँ। कौओं का क्या है खा ही लेंगे। कई बार देखा भी है कि जैसे ही हम वहाँ से हटे और कौआ फट से आता है और कौर उठा ले जाता है। बदमाश कहीं का ! कौआ बदमाश जरूर है लेकिन आदमी की तरह दोगला नहीं जो चाय में मक्खी गिरे तो चाय फेंक देता है और घी में मक्खी गिरे तो मक्खी को निकालकर फेंक देता है। दूसरे दिन का पहला सेशन ज्यादा प्रभावी नहीं था। दूसरा और लंच के बाद का तीसरा सेशन डॉ. ग्लेनिस मेंडोसा ने अनुवाद पर लिया। मेंडोसा सर की सबसे खूबसूरत बात ये लगी कि लेक्चर देते वक्त वे फ़ुल ऑफ एक्सप्रेसेन थे। ये बात पिछली साल जामिया में भी कुछ शिक्षकों में देखी। इससे विद्यार्थियों का ध्यान कक्षा में केन्द्रित रहता है और वे बेहतर सीखते हैं। शाम में हम Dona Poula बीच पर गए। डिनर के बाद हॉस्टल के आगे वाले गार्डन में बैठ दीपक जी और बलदेव ने गाना शुरू किया। धीरे-धीरे साथी लोग जुटते गए और कारवाँ बन गया। अमोल ने खूब डांस किया। दरमियाने कद का अमोल महाराष्ट्र से है। उसके शरीर में लचक देखते ही बनती है। यहीं हमने रिफ्रेशर का एक अनऑफिसियल व्हाट्सअप ग्रुप बनाया ताकि सबसे परिचित हो सकें। वैसे ये काम MMTTC को पहले दिन कराना चाहिए था।
बाकी साथियों की तरह हमने भी दो स्कूटी 400 रुपए प्रतिदिन किराए पर लीं। जल्द नहा-धोकर हम ओल्ड गोवा स्थित से कैथेड्रल चर्च गए। यह एशिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक है जो पुर्तगाली वास्तुकला का शानदार नमूना है। चर्च अभी खुला नहीं था। हमने बाहर ही कुछ फोटो खिंचवाए। सामने बेसिलिका थी। पीछे की ओर एक चैपल था। निर्मल वर्मा की कहानियों में हम चर्च की बेंच और चैपल की घंटी की आवाज का ज़िक्र अक्सर पढ़ते हैं। हमें क्लास के लिए लौटना था, हम चर्च के खुलने का इंतजार नहीं कर सकते थे। और हम लौट आए। ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में यहाँ वही कुछ मिल रहा है जो सब जगह मिलता है। स्थानीय कुछ नहीं। नाश्ते में पोहा, इडली, आलू का पराठा, पूड़ी-सब्जी, छोले-पाव आदि। लंच-डिनर में चावल, दाल, चपाती, पनीर की सब्जी, एक कोई और सब्जी, दही, पापड़, अचार, सलाद, मछली या चिकन। रोज बस एक सब्जी बदलती है बाकी वही रहता है। स्थानीयता के नाम पर बस फिश-करी या कोकम कहा जा सकता है बस। ग्लोबलाइजेशन ने स्थानीयता को लील लिया है। एक जैसा भोजन, एक जैसा पहनावा, एक जैसे घर, एक जैसी... सारे शहर एक जैसे दीख पड़ते हैं। शाम में उत्तरी गोवा के लोकप्रिय तट कळीगुंट और बागा गए। कळीगुंट खुला और चौड़ा तट है। समुद्र की लहरें आ-जा रही थीं। लोग परिवार सहित आनंद ले रहे थे। लगभग साढ़े छह बज चुके थे। हम कळीगुंट से बागा तक तकरीबन दो किमी पैदल गए और वापिस लौटे। वापसी में अँधेरा घिर आया था। तट कृत्रिम रौशनियों से रौशन होने लगे। छतरियों के नीचे लेटे मुटियाए भारतीय स्त्री-पुरुष मसाज कराते और शराब-कबाब में डूबे वितृष्णा से भर रहे थे। लाउड म्यूजिक का शोर समुद्र के शोर से ज्यादा था। मार्किट में आकर हमने वड़ा-पाव और पानी-पूरी खाई। मैंने पहली बार वड़ा-पाव खाया था और मुझे अच्छा लगा। अब हमारे लौटने का वक्त हो चला था। हॉस्टल में डिनर सवा नौ बजे बंद हो जाता है। बलदेव जी का मन था कि और सैर की जाए, खाना भी बाहर खाया जा सकता है लेकिन प्रधान जी (दीपक जी) का आदेश था। राजेश और मैं भी इससे सहमत थे कि लौटा जाए और हम लौट आए। रात को संगीत की महफ़िल फिर जमी।
चौथे दिन के पहले दो सेशन बहुत बोरिंग थे। लंच के बाद डॉ. कॉस्मा फ़र्नांडिस आए। शानदार और ज़िंदादिल आदमी। उन्होंने कैथोलिक-कोंकणी डांस आर्ट फॉर्म तियात्र, खेळ और मांडो के बारे में बताया। वे ख़ुद तियात्र के आर्टिस्ट हैं। उन्होंने बताया कि गोवा में कैथोलिक ईसाईयों में भी जाति-व्यवस्था है। मैं मुस्कराया धर्म भले ही बदल ले आदमी तो हिन्दुस्तानी ही है न ! जाति वह है जो (कभी आदमी के खोपड़े से) कभी नहीं जाती। यहाँ तक कि मरने के बाद भी जाति बची रहे इसका प्रबंध भी हमने कर रखा है। हमारे श्मसान भी जाति के हिसाब से होते हैं। श्रेष्ठता बोध का यह अहं भाव भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में है। कहीं जाति के रूप में तो कहीं रंग और नस्ल भेद के रूप में। भेद तो प्रकृति में हैं ही लेकिन भेद का भाव (भेदभाव) मनुष्य जनित है।
रोज सुबह उठकर cacra बीच जाना हमारा नित्यकर्म बन चुका है। इस बीच पर चट्टानें हैं, रेतीला तट नहीं है; शायद इसीलिए यहाँ टूरिस्ट नहीं आते। मैंने लवी और पुरु के लिए शंख, सीपियाँ और कुछ रंगीन पत्थर बटोरे. मेरी देखादेखी बलदेव ने भी अपनी बिटिया के लिए इकट्ठे करने लगा। यहाँ एकांत है। कुछ मछुआरों के घर हैं। इन्हीं घरों के बीच से निकलकर बीच पर जाना होता है। यहाँ रोज बिल्लियों से हमारी मुलाकात होती है। एक बिल्ली की दीपक जी ने कुछ तस्वीरें उतारी। एक छोटे-से मरियल बिलौटे को चेन से बाँधा हुआ था। शायद पालतू बनाने के उद्देश्य से। कुछ दिनों में इस चेन के ब्लू-प्रिंट की स्थायी छाप उसके मस्तिष्क पर अंकित हो जाएगी और वह मान बैठेगा कि वह इस बंधन को कभी नहीं तोड़ सकता। और बाद में संभवतः यही बंधन उसे प्रीतिकर लगने लगे। हाथी जैसे विशाल जानवर को भी इसी तरह पालतू बनाया जाता है। बड़ा होने पर विशालकाय हाथी को मामूली रस्सी से बाँध दिया जाता है लेकिन उसमें उसे तोड़ने का साहस नहीं आता। मनुष्य भी प्रकृति-प्रदत्त ऐसे ही कुछ बंधनों में जकड़ा हुआ है। ये बंधन जन्मजात हैं- श्रेष्ठता-बोध, अस्पृश्यता, भेदभाव, ममत्व-परत्व, अजरता-अमरता, अनंत कामनाएँ और असीमित भोग। ये बंधन ही दुःख का कारण हैं। इनसे मुक्ति ही दुःख से मुक्ति है। यही मोक्ष है।
रविवार का दिन था। सुबह तकरीबन आठ बजे हम हॉस्टल से निकले। ट्रेफिक के दौरान मैंने एक बात नोट की कि यहाँ के लोगों में बहुत धैर्य है। गर किसी मोड़ या चौराहे पर आपने अपनी गाड़ी से आगे बढ़ने की मंशा जता दी तो सामने वाला, तुरंत रुक जाता है और जाने देता है। हॉर्न की आवाज नहीं सुनाई देती करीब डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद मोरजिम बीच पहुँचे। कहीं कोई कचरा नहीं दिखा। इतने टूरिस्ट आते हैं यहाँ तब भी साफ़-सफाई एकदम चकाचक। करीब डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद मोरजिम बीच पहुँचे। धूप हो चुकी थी। चौड़ा खुला समुद्री तट। पानी कभी हरा तो कभी नीला दिखाई पड़ रहा था। यहाँ लगभग विदेशी टूरिस्ट थे। धूप सेंक रहे थे। अधिकतर स्त्री-पुरुष जोड़े में थे। कुछ बच्चों सहित। एक छोटी लड़की मिट्टी का घर बना रही है। क्या दुनिया में सब जगह लड़कियाँ घर ही बनाती हैं? लड़का अपने पैर पर मिट्टी चढ़ाए जा रहा है। खूब ऊँचे मिट्टी चढ़ने पर उसने पैर बाहर निकाल लिया। अब वह उस गुफानुमा घर या महल को देख रहा है। अचानक उसने पैर से उसे तोड़ दिया और हँसा। ये आदमी की हँसी है। कुछ बच्चे खिलौनों से खेल रहे हैं। एक माँ अपने सालभर के बच्चे को नहला रही है। एक अधेड़ स्त्री एक वृद्धा को पानी में लिए जा रही है। वृद्धा की उम्र कोई अस्सी पार होगी। एक पैर वाला एक अधेड़ पुरुष बैसाखियों के सहारे वहाँ तक चला जा रहा है जहाँ पानी कमर से ऊपर है। दो-चार को छोड़कर किसी के शरीर पर चर्बी नहीं। सब स्वस्थ और तरोताजा दिख रहे हैं। इक्के-दुक्के भारतीय पर्यटकों को छोड़कर सब विदेशी हैं। एक बलिष्ठ युवा समुद्र से निकलकर आया और अपनी साथी का चुंबन लेने लगा। वे बहुत देर तक एक-दूसरे को चूमते रहे। वहीं पास में चटाई बिछाए बुर्के में बैठी एक महिला उन्हें एकटक देखे जा रही थी। दूसरी दिशा में मुँह किए बैठा उसका (संभवतः) शौहर दो अंतः वस्त्रों वाली विदेशी महिलाओं को निहारने में मगन था। यहाँ हमने कोन वाली आइसक्रीम खाई। बेचंने वाला लड़का नागौर, राजस्थान का निकला। हमने कहा कि भाई, आइसक्रीम बड़ी महँगी लगा रहे हो, प्रिंट रेट से ज्यादा पैसा माँग रहे हो। तब उसने बताया कि “भाईजी, हर शनिवार-रविवार पुलिस और म्युनिसिपल कॉर्परेशन के अधिकारियों को हफ़्ता देना पड़ता है। उसके बिना आप धंधा नहीं कर सकते। अब वो पैसा तो ग्राहक से ही वसूलना पड़ेगा ना?” हमने उसे पूरे पैसे दिए लेकिन उसने बीस रुपए लौटा दिए। मुस्कराकर बोला- “भाईजी, राजस्थान से आए हो इतना तो बनता है।” जैसे ही हमने आइसक्रीम का रैपर फाड़ा उसने तुरंत अपने हाथ में लेकर डस्टबिन में डाल दिया. ऐसे ही कल शाम नारियल पानी पिया तो ठेले वाले ने खाली नारियल तुरंत लेकर प्लास्टिक बैग में डाल दिया. गोवा में हमें कहीं कोई कूड़ा-कचरा नहीं दिखा. यह सरकार के अनुशासन और यहाँ के बाशिंदों के नागरिकता-बोध की मिलीजुली सहभागिता से ही संभव है। गोवा में भी नारियल उसी रेट पर मिला जितना राजस्थान के जयपुर या दौसा में मिलता है. पूछने पर ठेले वाले ने बताया कि यहाँ का नारियल ज्यादा पानी वाला नहीं होता इसलिए यहाँ भी नारियल कर्नाटक से आता है और ये सारा वेस्ट भी वापिस कर्नाटक जाता है और रिसाइकल होता है।
इसके बाद हम चापोरा किला गए। यहाँ फ़िल्म ‘दिल चाहता है’ की शूटिंग हुई थी। हमने भी उस जगह एक फोटो लिया। अब डेढ़ बज गया था और हमें रिफ्रेशर कोर्स के हमारे स्थानीय साथी मित्र दुर्गेश माजिक से तीन बजे गाँधी सर्किल, ओल्ड गोवा में मिलना था। दुर्गेश हमें कोटितीर्थ सहित कुछ गाँवों में ले जाने वाले थे। गाँधी सर्किल पर गाँधी एक बच्चे की उंगली थामे खड़े हैं या कहें कि चलने की मुद्रा में हैं। बच्चे के हाथ में किताब है। सुंदर और सांकेतिक दृश्य है। हम गाँधी के मार्ग पर नहीं चल सके इसलिए हमने हर शहर में एक सड़क का नाम गाँधी-मार्ग रख दिया। सुंदर हरे-भरे गाँवों के बीच होते हुए हम कोटितीर्थ पहुँचे। यह एक शिव मंदिर था जिसे कई बार आक्रान्ताओं ने तोड़ा। बाद में पुजारी इस शिवलिंग को यहाँ से बचाकर ले गए और दूसरी जगह स्थापित किया। यहाँ उसके भग्नावशेष मात्र हैं। इसके जीर्णोद्धार की योजना है। फिर दुर्गेश हमें उस मंदिर में ले गए जहाँ वह शिवलिंग स्थापित था। बहुत सुंदर और भव्य मंदिर बना हुआ था। शिवलिंग के आगे जटाजूटधारी शिव का चित्र भी था। दुर्गेश बताने लगा कि बढ़ते आर्य प्रभाव से यहाँ घरों और मंदिरों में देवताओं के चित्र और मूर्तियाँ प्रतिष्ठित होने लगे हैं, नहीं तो हमारे यहाँ या तो शिव का लिंग पूजा जाता है या हमारे स्थानीय देवता हैं। हमारे देवताओं को मांस का भोग लगाया जाता रहा है। अब चीजें बदल रही हैं। दीपक जी द्वारा पूछे जाने पर कि क्या यहाँ जमीन खरीदी जा सकती है, दुर्गेश बोला कि “सर, दिल्ली व राजस्थान वालों ने कॉमर्शियल एरिया में प्रोपर्टी के दाम आसमां तक पहुँचा दिए हैं जबकि गाँवों में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते”। आते-जाते समय हमने दो बार फेयरी से स्कूटी पार की। फेयरी बड़ी नाव है जिसमें तीन-चार कारें, दस-पंद्रह बाइक और कई आदमी आ जाते हैं। इससे बड़ी और छोटी फेयरीज भी होती हैं। ये सार्वजानिक परिवहन का साधन हैं। स्थानीय लोगों के लिए निःशुल्क हैं। दुर्गेश बताते हैं कि इस पार के कुछ गाँवों ने ब्रिज बनाने से मना कर दिया। उनका कहना है कि ब्रिज बनाने से शहरी लोगों और बाहरी यात्रियों की आवाजाही बढ़ेगी। इससे स्थानिकता और प्रकृति को ख़तरा बढ़ेगा, हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए। सुनकर अच्छा लगा कि ऐसे लोग भी हैं दुनिया में जो कहते हैं हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए।
इन दिनों यहाँ इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया चल रहा है। पणजी के मुख्य बाजार को शादी के घर जैसा सजाया गया है। इफ्फी का इस बार (शायद पहले भी कुछ सालों में) शुभंकर मोर है। मोर की बहुत सारी सुंदर छवियाँ जगह-जगह अंकित की गई हैं। लोग वहाँ फोटो ले रहे हैं। देशभर से सिने-प्रेमी यहाँ इकठ्ठा हुए हैं। फिल्मों की स्क्रीनिंग दिन में होती है, तब हम क्लास में होते हैं इसलिए शाम में हमने म्यूजिक कॉन्सर्ट देखे। सवा पाँच बजे क्लास ख़त्म होते ही हम कमरे पर दौड़े, चेंज किया और स्कूटी उठाकर पहले हम बम्बोलिम बीच गए। हम सनसेट को मिस नहीं करना चाहते थे। यह अच्छा समुद्री तट है, शांत, भीड़भाड़ नहीं। यहाँ की रेत काली है। यहाँ किनारे पर ही सी-व्यू कुछ होटेल्स बने हैं। एक होटल के पिछवाड़े में बने सुंदर लॉन में एक शादी चल रही थी। गोवा डेस्टिनेशन वेडिंग में बहुत लोकप्रिय है। दीपक जी ने यहाँ डूबते सूरज के कई शानदार फोटो लिए। इसके बाद हम स्टेडियम गए। वहाँ म्यूजिक कॉन्सर्ट चल रहा था। एक कोलम्बो के बैंड ने बहुत बढ़िया परफॉर्म किया।
आज गोवा में आठवाँ दिन है। अब हम एक-दूसरे से परिचित होने लगे हैं। दीपक जी ने अपनी फोटोग्राफी के हुनर से लोगों के दिल भी जगह बना ली है। शाम में क्लास ख़त्म होते ही लोग सब अपने-अपने प्लान के मुताबिक गोवा एक्सप्लोर करने निकल पड़ते हैं। दिन में डेढ़-डेढ़ घंटे की चार क्लासेज होती हैं। सुबह का वक्त किसी के लिए सोने का होता है तो कुछ घुमक्कड़ सुबह-सवेरे भी घूमने निकल जाते हैं। सुबह नाश्ते, दोपहर में लंच और बीच में दो हाई-टी का वक्त, वह वक्त है जब हम एक-दूसरे को जानते-समझते हैं। कर्नाटक के पाँच लोगों का समूह आया है, गुजरात से आठ लोग हैं, राजस्थान से हम सात हैं। बाकी अन्य राज्यों से कहीं से एक तो कहीं से दो। एक विषय वाले लोग स्वाभाविक रूप से आपस में जुड़ते हैं, बतियाते हैं। तमिलनाडु के कन्नन और कविता को छोड़ सबको हिंदी आती है, चाहे कामचलाऊ। हम लोग भी टूटी-फूटी अंग्रेजी में वार्तालाप कर लेते हैं। बाकी एक सामान्य भाषा है जो सबको समझ आती है- प्रेम की भाषा। पश्चिम बंगाल से दिलबर, सुशांत और कृशानु हैं। उनसे बंगाल की राजनीति को लेकर बात करनी है लेकिन वक्त ही नहीं मिलता। दिलबर, कृशानु, मिलिंद भाई, जिम्मी भाई, पाटिल सर हमारे कोर्स के आल टाइम बेक-बेंचर हैं। क्लास में रोज आखिरी पंक्ति में बैठते हैं। मैं बलदेव, दीपक जी और राजेश अक्सर सेकंड लास्ट में।
अभिलाषा बीएचयू में अंग्रेजी पढ़ाती हैं। मूलतः झारखंड से हैं। अपनी आदिवासी आइडेंटिटी को लेकर बेहद सजग और मुखर। बीएचयू में पढ़ाई के वातावरण के बारे में पूछे जाने पर बताती हैं कि सीयूईटी होने के बाद से बीएचयू का वातावरण बेहतर हुआ है। देशभर से बच्चे आ रहे हैं। स्थानीय छात्रों की मेजोरिटी कम होने से राजनीति कम हुई है, पढ़ाई का माहौल बेहतर हुआ है। अभिलाषा बहुत प्यारी हैं, गोलूमोलू-सी। उसे देखकर मुझे बहुत लाड़ आता है। छोटी बहन जैसा स्नेह उमड़ता है। कमला मध्यप्रदेश से हैं जो पहली बार घर से बहुत दूर निकली हैं। एक-दो दिन असहज रहीं लेकिन अब खूब घूमघाम रही हैं। पद्मश्री शिमोगा, कर्नाटक से हैं। उसके चेहरे पर मुस्कान ठीक वैसे ही खेलती रहती है जैसे उसकी बेटी मोबाइल के वाल-पेपर पर खेलती दिखाई देती है। पद्मश्री एक सौ बीस की स्पीड से अंग्रेजी में बोलती हैं, मैं तो नहीं पकड़ पाता हूँ। लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता इलाहबाद विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं, शायर हैं। कमाल की बात ये है कि शायर जैसे दिखते भी हैं। हहाहहा... हम उन्हें प्यार से कविराज कहते हैं। हॉस्टल में रात की महफ़िल में उन्होंने कल अपनी शायरी सुनाई। हिंदी भाषा और साहित्य की गहरी समझ रखते हैं। हँसमुख और ज़िंदादिल राधेश्याम शर्मा चंडीगढ़ में अंग्रेजी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। उनका सेंस ऑफ़ ह्यूमर कमाल का है। एक शाम उनके झंडे के नीचे हम सत्रह लोग डिनर के लिए क्रूज़ पर गए। गुजरात के चिराग शर्मा सुदर्शन युवा हैं। रोज नए स्टाइल के कुर्ते, शर्ट और जैकेट पहनते हैं। ख़ुद को हैप्पिली अनमैरिड कहते हैं। गोवा के विनय सर और रमा मैम हमारे क्लास मॉनिटर हैं। दोनों बेहद संजीदा। लगता है दोनों ही मॉनिटर बनने के लिए ही दुनिया में अवतरित हुए हैं। मेधा मैम और तारिका डीयू से हैं। बेबाक, बिंदास, बेझिझक, बेफ़िक्र... भानुप्रिया उदयपुर से हैं। उनके ठीक विपरीत सेंटीमीटर में नापकर मुस्कराने वाली निकिता राजस्थान के निवाई, टोंक में अंग्रेजी पढ़ाती हैं। हमारी बैचमेट हैं। बेपरवाह, लापरवाह, वर्तमानजीवी, लोक व देशजता के पर्याय बलदेव के प्रति महिलाओं के आकर्षण से मुझे सदा से ईर्ष्या होती आई ही है। कर्नाटक की आसमां से कल रात को बात हुई. उनका चेहरा-मोहरा और आवाज बिल्कुल हमारी छोटी बहू ममता जैसी है. आसमां बहुत प्यारी हिंदी बोलती हैं। पूछने पर बताया कि उनके घर में मम्मी और ताई-चाची सब हिंदी टीवी सीरियल्स देखती हैं, वहीं से सीखी। हालाँकि उनके परिवार व आसपास के बुजुर्ग पुरुष इससे नाराज़ रहते हैं। उनका कहना है कि ग़र हिंदी बोलनी ही है तो दक्कनी हिंदी बोलो. यह उत्तरी हिंदी (संभवतः उनका इशारा हिन्दुओं की बोली की तरफ़ है) नहीं। हिंदी फ़िल्मों और गानों ने हिंदी को दूर-दूर पहुँचाया है। हिंदी मनोरंजन की भाषा तो बन गई है लेकिन उसमें रोजगार की संभावनाएँ कम हैं। यही कारण है कि लोग अपने बच्चों के कैरियर और रोजगार की चिंता में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की तरफ़ दौड़ रहे हैं। हिंदी उपभोक्ता वर्ग की भाषा है और अंग्रेजी विक्रेता वर्ग की। उच्च शिक्षा और न्यायालयों की भाषा भी अंग्रेजी ही है। इस कोर्स में देशभर के विभिन्न प्रान्तों से आए अपने देशवासियों से मिलने के बाद मैं इस बात से भी मुतमईन हूँ कि अंग्रेजी भारत की संपर्क भाषा भी है. इसलिए अंग्रेजी सीखनी ही होगी और बच्चों को सिखाना तो बहुत जरूरी है। साथ ही अंग्रेजी मुश्किल भाषा कतई नहीं है।
मेरी आँखों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है, यह कहकर उद्घाटन सत्र के बाद गायब हुए डायरेक्टर साब आज फिर अवतरित हो गए। डेढ़ घंटे क्लास में बैठे। आख़िर में दस मिनट बोले जिसका लब्बोलुआब यह था कि गोवा के लोकल प्रतिभागियों को भी हॉस्टल में रहना होगा, जो लोग होटल या किसी दोस्त के यहाँ रह रहे हैं वे भी आज से भुतहा हॉस्टल में रहना शुरू कर दें, नियमानुसार आप संडे को गेस्टहाउस में रह नहीं सकते लेकिन साब हमें रहने दे रहें हैं इसके लिए हमें उनका आभारी होना चाहिए। डिनर का पैसा यूजीसी नहीं देती लेकिन वे हमें डिनर दे रहे हैं इसके लिए भी बहुमत से हमें उनका आभार प्रकट करना चाहिए। टॉयलेट कमोड में जेट स्प्रे नहीं होने को लेकर कोई शिकायत नहीं सुनी जाएगी। क्लास बंक कर कोई नहीं जाएगा, मेडिकल रीजन से कोई जाता है तो गेट पर गार्ड के पास रजिस्टर में एंट्री करनी होगी। कोर्स के आख़िरी दिन शाम आठ बजे से पहले ट्रेन या फ्लाइट की टाइमिंग को लेकर कोई जल्दी छोड़ने की सिफरिश लेकर न आए। इनकी अवहेलना पर आपको कोर्स में बी या उससे नीचे ग्रेड मिल सकती है, फेल भी किया जा सकता है जिसकी समस्त जिम्मेदारी आपकी स्वयं की होगी। उनके जाते ही समवेत स्वर गूँजा- “क्या आदमी है? प्रोफेसर्स को कैसे बच्चों की तरह ट्रीट कर रहा है?”
उर्दू के उपन्यासकार रहमान अब्बास का सेशन था। उन्होंने मिलान कुंदेरा के हवाले से उपन्यास के स्ट्रक्चर पर बात की। शानदार लेक्चर था। ऐसे ही एक और लेक्चर मुझे बेहद पसंद आया वह प्रो. प्रशांती तलपनेकर मैम का था। वे अभिनेत्री हैं। कैंसर सर्वाइवर हैं। उन्होंने अपनी एक्ट की हुई दो फ़िल्में दिखाकर बातचीत की। ‘अंससाओ’ नाम की पहली फ़िल्म में उन्होंने गोवा के किसी गाँव में रहने वाली एक बुजुर्ग कैथोलिक महिला का किरदार निभाया है जो विदेश में बस चुके अपने बेटे का इंतजार करती है। यह फ़िल्म अकेलेपन, बुढ़ापे और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को बुजुर्ग महिला के किरदार के रोजमर्रा के जीवन के द्वारा व्यक्त करती है। असल में उसका बेटा मर चुका है। वह लोगों से अक्सर कहती है कि उसका बेटा क्रिसमस पर आएगा। कई जगह से वह उधार सामान भी खरीदती है, यह कहते हुए कि उसका बेटा आएगा तब वह चुका देगी। लोग उधार दे भही देते हैं। लोग उसे यकीं को बनाए रखते हैं, कभी उसे यह अहसास नहीं दिलाते कि उसका बेटा तो मर चुका है। वे उसकी झूठी उम्मीद का सहारा बनते हैं। वह औरतों के साथ गॉसिप करती है तो सभी उसकी बातों में शरीक होते हैं। एकल बुजुर्ग सब जगह मिलेंगे। बहुतों के बच्चे जीविका के लिए घर से दूर बड़े शहरों या विदेश में जा बसे हैं। माँ-बाप अकेले हैं। तब हमारी यह सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि हम समुदाय के रूप में, समाज के रूप में उनके जीने में सहायक बनें। इस फ़िल्म के लिए प्रशांती मैम को 14 वें दक्षिण एशियाई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाज़ा गया। वे कोंकणी भाषा की लेखिका और अनुवादक भी हैं। उनका मानना है कि भाषा संस्कृति की संवाहिका है।
एक समय जब यूरोप एक-एक कर पूरे एशिया और अफ़्रीका को अपना उपनिवेश बनाने में लगा था तब इस काम में उनका पहला टूल भाषा ही था। पुर्तगालियों ने भी गोवा पर जब अपना अधिकार जमाया तो यहाँ कोंकणी को बैन कर दिया और तीन साल के अंदर सबके लिए पुर्तगाली भाषा सीखना अनिवार्य कर दिया। सूत्र है कि किसी भी देश को गुलाम बनाना है तो सबसे पहले उन पर अपनी भाषा थोप दो। औपनिवेशिक शासन से तो दुनिया बाहर निकल आई लेकिन भारत सहित दुनिया के अनेक देश अभी भी उस औपनिवेशिक मानसिकता से नहीं उबरे हैं। यद्यपि ग्लोबलाइजेशन के अनेक फ़ायदे हुए हैं तथापि यह औपनिवेशीकरण का दूसरा दौर भी बना। इस दूसरे दौर के बाद उपनिवेशित देशों के लोग अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति अधिक जागरूक हुए हैं। इन देशों के लोगों का एक वर्ग अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रतिबद्ध होकर काम कर रहा है। वहाँ की शिक्षा, भाषा, चिकित्सा पद्धति, कला, संगीत, साहित्य में मूल संस्कृति प्रतिबिंबित हो रही है। गोवा इसका जीता-जागता उदाहरण है। कोंकणी भाषा और साहित्य में महूब काम हो रहा है। गोवा आधुनिकता और परंपरा के समन्वय का अनूठा उदाहरण है।
प्रशांती मैम ने एक कहानी सुनाई कि पारसी समुदाय जब ईरान से विस्थापित होकर गुजरात के समुद्री तट पर उतरे और वहाँ के राजा से बसने की अनुमति माँगी तब राजा ने उनके सामने दूध से भरा हुआ गिलास प्रस्तुत किया। इसका अर्थ था कि यहाँ आपके लिए कोई जगह नहीं है। पारसी समुदाय के मुखिया ने उस एक गिलास दूध में एक चम्मच शक्कर डालकर घोलकर दिखाया। इस पर प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें वहाँ बसने की अनुमति दे दी। आज भारत ही नहीं दुनिया के जिस भी हिस्से में पारसी रहते हैं, वे ऐसे ही रहते हैं दूध में शक्कर की तरह।
साथी राजेश की पत्नी 27 नवंबर को रात में जयपुर से फ्लाइट से गोवा आ गई थी तब से वह उनके साथ है। दीपक जी ने भाभीजी व बच्चों को कल बुला लिया था। एक दिसंबर को कोर्स ख़त्म होने के बाद वे दो-तीन और रुकेंगे। संडे है और आज हम निकले हैं दूधसागर वाटर फॉल देखने। स्कूटियाँ हमने लौटा दी हैं। दीपक जी ने परिवार के हिसाब से एक कार किराए पर ले ली है, उसी में हम यानी मैं और बलदेव भी उनके साथ घूमने निकले हैं। रिफ्रेशर कोर्स के लगभग आधे लोग यहाँ आए हैं। छह सौ रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से टिकट है जिसमें बोलेरो गाड़ी आपको क़रीब दस किमी के कच्चे रास्ते को पार कराकर वाटर फॉल के नजदीक छोड़ेगी। आप वहाँ डेढ़ घंटा रुक सकते हैं। इससे ज्यादा समय लगने पर प्रति सात व्यक्तियों (एक बोलेरो की सवारियाँ) पर पाँच सौ रुपए फाइन लगता है। यह ग्राम पंचायत की व्यवस्था है। एक किमी घुसते ही वन विभाग की चौकी आई। दरअसल यह झरना वन अभयारण्य के बीच स्थित है। उन्होंने दो सौ रुपए प्रति व्यक्ति चार्ज लिया। यहाँ आपकी गाड़ी चेक होती है, सिंगल यूज प्लास्टिक ले जाने की अनुमति नहीं है। गर ले जाते हैं तो चिप्स के पैकेट, पानी की बोतल आदि की संख्या वे रसीद पर अंकित कर देते हैं। लौटते वक्त उस संख्या का मिलान किया जाता है। यदि आप कुछ भी भीतर छोड़कर आते हैं तो प्रति सिंगल यूज प्लास्टिक दो सौ रुपए फाइन वसूल जाता है। हम कोई प्लास्टिक भीतर नहीं ले गए। पानी की एक बोतल थी उसे भी हमने चौकी पर ही छोड़ दिया। ख़ूब भीड़भाड़ थी। पानी एकदम ठंडा। चट्टानें फ़िसलन भरी। झरने की बीच से ट्रेन गुजरती है, हमारे सामने भी एक ट्रेन गुजरी। ऐसा सुना कि ट्रेन से ये नज़ारा अद्भुत लगता है। हम तय समय में लौट आए।
विनय सर और दुर्गेश भाई दोनों ने ताम्बड़ी सुरला महादेव मंदिर जाने की सलाह दी। मंदिर तक जाने का मार्ग बहुत सुरम्य है। बारिश के दिनों में यह और भी आनंददायक हो जाता होगा। मंदिर के नीचे से सुरला नदी प्रवाहित होती है। काले बेसाल्ट पत्थरों से बना कदंब शैली का यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर के बाहर नंदी है जिसका सिर टूटा हुआ है। स्तंभों पर अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की छोटी-छोटी प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। मंदिर के चारों ओर बागीचा है। यह भारतीय पुरात्तव विभाग द्वारा संरक्षित है। यहाँ से लौटते वक्त हमारा दक्षिणी गोवा का कोई तट देखने का प्लान था। समय और दूरी को ध्यान में रखते हुए गूगल मैप से सर्चिंग के बाद हम Colva बीच गए। यह अपनी सफ़ेद रेत और खुले चौड़े तट के कारण पर्यटकों में खूब लोकप्रिय है। वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों का भी आप आनंद ले सकते हैं। हम उत्तरी गोवा के कई बीच घूम चुके थे इसलिए मैं और बलदेव एक तरफ बैठकर अपनी पत्नियों से बात करने लगे। दीपक जी को सपरिवार गोवा के समुद्री तट का आनंद लेने के लिए हमने फ्री छोड़ दिया। उनकी बेटी ध्वनि इन्स्टा सेलिब्रिटीज की तरह खूब भाव-भंगिमाएँ बनाकर फोटोग्राफर पिता में ख़ुशी भर रही थी। दीपक जी ने क़रीब साढ़े आठ बजे हमें हॉस्टल छोड़ा और वे अपने होटेल चले गए। कल हमारा आख़िरी दिन था कोर्स का। खाना खाकर हम सो गए।
आज कोर्स के अंतिम दिन पहले दो सेशन रोहित पालगाँवकर ने लिए। वे गोवा विश्वविद्यालय से संबद्ध किसी राजकीय महाविद्यालय में हिस्ट्री के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने अपने कॉलेज में म्यूजियम तैयार किया है जिसमें गोवा की ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित कर रहे हैं। उन्होंने पीपीटी के द्वारा अपनी इस पूरी यात्रा को साझा किया। टी-ब्रेक के दौरान हमारा ग्रुप फोटो हुआ। लंच के बाद एग्जाम। यहाँ की असिस्टेंट डायरेक्टर इन्ग्रिड एने मंत्रालयिक कर्मचारियों के साथ ऐसे परीक्षा लेने लगी जैसे हम बच्चों की लेते हैं। हुँह... और अंत में समापन समारोह। अब डायरेक्टर साब बड़ा मीठा-मीठा बोले। आज सुबह से ही सबसे मित्रवत बातचीत कर रहे हैं। कोर्स के कोर्डिनेटर हनुमंत चोपड़ेकर ने गोवा जैसी जगह में बेहतरीन फैकल्टी जुटाने का प्रयास किया। प्रतिभागियों की समस्याओं को सार्वजनिक रूप से तो नहीं लेकिन अकेले में जो भी उनसे मिलने गया तो सुना, समझा और मदद की। आज भी जिन प्रतिभागियों की फ्लाइट या ट्रेन सात-आठ बजे के आसपास थी उन्हें रिलीविंग लैटर जल्दी दिला दिए। सब एक-दूसरे से विदा ले रहे थे। अपने यहाँ आने का आमंत्रण दे रहे थे। खुश थे। कोर्स पूरा हुआ। अब घर लौटेंगे। मिनी इंडिया अपने-अपने राज्यों में लौटेगा आज या कल में। ढेर सारी यादों के साथ। कुछ लोग यहाँ जो सीखा उसे कार्यरूप में परिणत करेंगे शेष लौट जाएँगे उसी यंत्रवत जीवन में। गोवा के मित्रों दुर्गेश, रमा, विनय, एरोन और नफ़ीसा का मार्गदर्शन, सहयोग, प्यार और यहाँ की मिठाइयों बिबिंका व दोदोल के लिए ख़ूब आभार।
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| विष्णु कुमार शर्मा |
रिफ्रेशर कोर्स में आने वाले अधिकांश रिसोर्स पर्सन्स ने यहाँ की भाषा, साहित्य और संस्कृति से हमें रूबरू कराते हुए इस बात को पुरजोर तरीके से रखा कि गोवा की जैसी इमेज प्रदेश से बाहर है, गोवा वैसा नहीं है। गोवा में पंद्रह दिन के इस प्रवास के बाद मैं इस बात से मुतमईन था। मेरा स्पष्ट मत है कि गोवा में जो भी अशोभन है वह टूरिस्टों की देन है और जो भी शोभनीय है, सुंदर है, वह वहाँ का निजी है। जैसा ‘दिल चाहता है’ में आम़िर खान का किरदार कहता है कि साल में एक बार गोवा जरूर आना चाहिए, मैं इससे सहमत हूँ। गोवा फिर से आया जा सकता है। जल्दी-जल्दी में सब घूमा, देखा, कुछ समझा और कुछ अनसमझा रह गया। कई साथियों के बारे में लिखना शेष रह गया। गोवा विवि में हिंदी विभाग की अध्यक्ष व्रुशाली मान्द्रेकर और अर्चना गायतोंडे मैम, असमी गायक ज़ुबीन गर्ग के एक फैन (ज़ुबीन दा को न्याय नहीं मिलने के कारण जिसने असम छोड़ दिया), धर्मेन्द्र के निधन पर उनके गीतों को गाकर और उनपर अमोल द्वारा नाचकर श्रृद्धांजलि देने... के बारे में लिखना रह गया। कश्मीर के हमारे साथी फैयाज़ सुल्तान जिन्होंने नौकरी के दौरान ही छुट्टी लेकर अपनी पीएचडी ही गोवा विश्वविद्यालय से की है, चार साल यहाँ रहे हैं और वे रिफ्रेशर कोर्स के लिए फिर से गोवा आए हैं। ये इस बात का सबूत है कि गोवा हर साल आया जा सकता है। आ पाएँगे या नहीं, कह नहीं सकते। हर यात्रा की तरह इस यात्रा को भी अपनी कमाल की फोटोग्राफी से स्मरणीय बनाने का क्रेडिट दीपक जी को है ही। दीपक जी को हर यात्रा के बाद थोड़ा और उदार, थोड़ा और लोकतांत्रिक बनाने का श्रेय बलदेव को है. मैं इन दोनों के बीच आता हूँ और मुझे सिवाय लैपटॉप पर उँगलियाँ चलाने और अक्षर उकेरने के कुछ नहीं आता.
विष्णु कुमार शर्मा
सहायक आचार्य, हिंदी, स्व. राजेश पायलट राजकीय महाविद्यालय बांदीकुई, जिला- दौसा, राजस्थान
vishu.upadhyai@gmail.com, 9887414614
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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