पुस्तक समीक्षा : अपनों के आईने में श्रीप्रकाश शुक्ल / मयंक भार्गव

अपनों के आईने में श्रीप्रकाश शुक्ल
- मयंक भार्गव


श्रीप्रकाश शुक्ल की 'षष्टिपूर्ति' के अवसर पर उन पर केन्द्रित संस्मरणों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई – ‘बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल’। शीर्षक से ही इस पुस्तक का वितान स्पष्ट हो जाता है। श्रीप्रकाश शुक्ल बी० एच० यू० के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं। अपने मूल अध्यापकीय दायित्व के अतिरिक्त साहित्य और संस्कृति की रचनात्मक यात्रा और लोकानुरागी उद्यम से श्रीप्रकाश शुक्ल अपने समकालीन रचनात्मक समय के अभिन्न अंग बनते चले गए हैं। यह पुस्तक श्रीप्रकाश शुक्ल पर केन्द्रित उस बनारसी वृत्त का निर्माण करती है जिसके केंद्र में बी० एच० यू० है। श्रीप्रकाश शुक्ल की निर्मिति में गाजीपुर, इलाहाबाद जैसे शहरों का भी योगदान है जिसका आभास इस पुस्तक के संस्मरणों से हो जाता है। कृतिकार की कीर्तियात्रा में उनके भौगोलिक निवास का योगदान होता ही है। गाँव-कस्बे-शहर विशेष की स्थानीय परिस्थितियाँ रचनाकार की साँसों के साथ घुलकर उसकी रचनाओं को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर के विभिन्न शहरों में प्रवास और तदनुरूप उनकी रचनाओं पर इन स्थानों के प्रभाव का अध्ययन रोचक है। बनारस की ही बात करें तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे बड़े व्यक्तित्व का बनारस प्रेम तो सर्वविदित है पर उनके कृतित्व का बड़ा अंश बनारस से बाहर रहते रचा गया। नामवर सिंह के कम लिखने और ज्यादा बोलने की चर्चा चलती रहती है पर यह याद रखा जाना चाहिए कि बनारस में रहते हुए नामवर सिंह ने युवावस्था में ही अपनी पुस्तक "छायावाद" की रचना कर दी थी, हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान और पृथ्वीराज रासो की भाषा पर महत्त्वपूर्ण शोध किया था। अगर नामवर सिंह को भी बनारस की धरती और आकाश का सान्निध्य निरंतर मिलता रहता तो इसका उनके कृतित्व पर क्या प्रभाव पड़ता - अब यह कल्पना का विषय है। श्रीप्रकाश शुक्ल पढ़ते इलाहाबाद में थे। पढाते गाजीपुर में थे। कृष्णमोहन के संस्मरण से पता चलता है कि इलाहाबाद में पढ़ते हुए ही वह खूब सक्रिय थे। गाजीपुर में रहते उनका 'परिचय' साहित्य-जगत को मिल चुका था। पर बनारस आकर श्रीप्रकाश शुक्ल ने विराटता अर्जित की। सुरेन्द्र प्रताप ने सही पहचाना है कि "बनारस एक्चुअली उनके साहित्यिक जीवन में बड़ा भारी ब्रेक है। यहाँ आने पर उनके चिंतन में, उनकी कविता में, उनकी आलोचना में, एक जबरदस्त गुणात्मक परिवर्तन आता है, जो उनके लेखन में दिखाई देता है। बनारस ने उन्हें काफी कुछ दिया। उन्होंने बनारस से बहुत कुछ इनहेरिट किया और यहाँ आकर काफी कुछ लिख पाए"।1 

इसलिए इस पुस्तक के संपादकों ने इस पुस्तक को सचेत रूप से बनारस, बी० एच० यू० और श्रीप्रकाश शुक्ल पर केन्द्रित रखा है। 2005 में जब वह स्थायी रूप से बनारस आए उसके बाद उनकी परिधि का अद्भुत विस्तार हुआ। यह पुस्तक उस विस्तार को समझने की एक कोशिश है जिसमें संपादक आर्यपुत्र दीपक की 'भूमिका' और अक्षत पाण्डेय की 'अपनी बात' के अतिरिक्त 43 संस्मरणात्मक आलेख हैं। इन संस्मरणों के माध्यम से श्रीप्रकाश शुक्ल के व्यक्तित्व के कई रूप दिखते हैं - अध्यापक, कवि, संगठनकर्ता, सहृदय सामाजिक, घाटवॉकर, प्रशासक, संपादक, आलोचक, कलाप्रेमी, संयोजक, घुमक्कड़, शोध-निर्देशक, पर्युत्सुक पाठक, विशालहृदय अभिभावक, पारसधर्मी गुरु, यारों के यार - दुश्मनों के सवा सेर दुश्मन आदि-आदि। अलग-अलग लोगों ने अपने अनुभव के आधार पर उनकी छवि को शब्दांकित किया है। जब इस तरह कई लोग किसी व्यक्तित्व के सामने कई दर्पण लेकर खड़े होते हैं तो कई बार होता है कि वह छवि टूटती- बिखरती नजर आए। निदा फ़ाज़ली की पंक्ति है - हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना। किसी आदमी को उसके एक ही रूप से नहीं समझा जा सकता। एक ही इन्सान के कई अलग-अलग रूप होते हैं, जो अलग-अलग परिस्थिति में सामने आते हैं। इसलिए अलग-अलग संस्मरणों के दर्पण में एक ही छवि का उभरना आवश्यक नहीं। पर इस पुस्तक की विशेषता है कि इन संस्मरणों में श्रीप्रकाश शुक्ल के अलग-अलग पहलू तो उभरते हैं पर उनकी छवि न टूटती है न बिखरती है। संस्मरणों में कोई विरोधाभास नजर नहीं आता। उदाहरण के लिए कई लेखकों ने अपने संस्मरण में श्रीप्रकाश शुक्ल को एक उदारहृदय संरक्षक और अभिभावक के रूप में याद किया है पर शोधकार्य और शिक्षण के दौरान उनकी सख्ती और अनुशासनप्रियता को भी बहुतों ने सामने रखा है। औरों की छोड़ भी दें तो उनके अत्यंत प्रिय विन्ध्याचल यादव ने गवाही देते हुए लिखा है कि "मैंने उन्हें तमाम शोधाकांक्षी छात्रों के साथ बहुत 'रूडली' पेश आते हुए देखा था।" उनके ही शब्द हैं - "श्रीप्रकाश शुक्ल शोधकार्य के बाहर बहुत सिखाते हैं। सिखाने की दोनों पाटी का इस्तेमाल वे करते हैं। प्यार और पितृत्व की हद तक; एक तरफ। तो वहीं दूसरी तरफ घृणा की परिधि तक छूती हुई उपेक्षा। घनघोर इग्नोरेंस। जब श्रीप्रकाश शुक्ल की बरौनी खडी होती है तो हमलोग जौहर करने के लिए तैयार हो जाते थे"।2 

 श्रीप्रकाश शुक्ल के इस पहलू के कारण विंध्याचल लिखते हैं कि "ऊपर-ऊपर जानने वाले उन्हें एक खुर्राट आचार्य मानते हैं, लेकिन उनके भीतर बड़ी घनघोर छात्र-वत्सलता हिलोरें लेती हैं।" जब कई लेखकों के संस्मरणों में श्रीप्रकाश शुक्ल का यह पहलू दिखता है तो पाठक के मन में एक सवाल आता है कि आखिर श्रीप्रकाश शुक्ल का यह रूप सायास कुछ लोगों के हिस्से आता है या सचमुच यह उनकी शिक्षण-पद्धति का एक अंग है। एक व्यक्ति समाज के सामने कील-कवच के साथ आता है पर अपने परिवार में वह निष्कवच होता है। अगर वह अपने परिवार के सामने किसी अन्य रूप में है और समाज के सामने किसी दूसरे रूप में - तो इससे उस व्यक्तित्व को देखने की जटिलता बढती है। इस पुस्तक में सौभाग्य से श्रीप्रकाश शुक्ल की पुत्री दर्शिता शुक्ल का भी संस्मरण प्रकाशित है जिसका शीर्षक ही है - "पापा उर्फ़ गिरने के लिए छोड़ना, गिरा हुआ न छोड़ना"। उन्होंने लिखा है कि "जब भी पापा गणित पढाते, माहौल थोड़ी देर में रणभूमि में बदल जाता"।3 पापा से स्कूटी चलाना सीखते वक्त भी वह घबरा जातीं थीं। स्पष्ट है कि सीखने वाले को कड़े अनुशासन, पूर्ण समर्पण, बड़ी महत्त्वाकांक्षा और तीव्रतर-तीक्ष्णतर गति के वृत्त में रखने का यह श्रीप्रकाश शुक्ल का अपना तरीका है। विंध्याचल यादव ने उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए एक सूत्र दिया है कि "श्रीप्रकाश जी को स्कूटी चलाती लड़कियाँ और कम्प्यूटर चलाते लड़के बहुत पसंद हैं। कोई दोनों कर ले तो उसका शिष्य बनना लगभग पक्का"।4 उनके साथ चलने वालों को उनकी गति के साथ ताल-मेल करना ही होगा। श्रीप्रकाश शुक्ल पर केन्द्रित अधिकांश संस्मरणों में उनकी अपनी खास 'गति' को रेखांकित किया गया है। प्रभात मिश्र उनके व्यक्तित्व को सूत्रबद्ध करते हुए कहते हैं कि "श्रीप्रकाश शुक्ल अपनी पीढ़ी की 'गति' रहे हैं"।5

'गति' उनके जीवन का केन्द्रीय तत्त्व है। उनके महत्त्वपूर्ण आयोजन 'पुलिया-प्रसंग' से बुद्धि और शरीर दोनों गतिशील होते हैं। पंकज यादव ने लिखा है कि "पुलिया प्रसंग में शामिल होने की एकमात्र और महत्त्वपूर्ण शर्त है कि पहले टहलिए और फिर आइए। पुलिया प्रसंग में शामिल होने के बाद मैंने यह अनुभव किया कि पुलिया महज पुलिया नहीं, एक खुला मंच है जहाँ पर हमारे विचारों का शुद्धिकरण होता है और नये-नये विचार मन में आते हैं"।6 'अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय' भी उनकी गतिशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। काशी के घाटों पर तो सब चलते हैं पर श्रीप्रकाश शुक्ल घाट पर चलने को एक बड़े आयोजन और सामूहिक प्रयोजन में बदल देते हैं। पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित राजेश्वर आचार्य ने लिखा है कि "चिकित्सक डॉ विजयनाथ मिश्र के साथ 2019 में इन्होंने 'अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय' बना लिया और हिन्दी विभाग तथा भोजपुरी केंद्र से निकलकर काशी के घाट पर दौड़ने लगे"।7 अपनी विरासत को समझने और उसे आगे बढाने का यह रचनात्मक उदाहरण है। भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियाँ शायद इन्हें हमेशा ध्यान रहती हैं -

"कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो,
तू जिस जगह जागा सवेरे, उस जगह से बढ़ के सो।

इनकी यह गतिशीलता ईर्ष्या को भी जन्म देने वाली हो सकती है। राजेश्वर आचार्य ने इसे पहचानते हुए लिखा है कि "श्रीप्रकाश शुक्ल की गतिशीलता को देखना कुछ समानधर्मियों में ईर्ष्या भी होती है, स्पर्धा भी होती है। कई बकवास भी करते हैं और बकवाद भी" !8 यह पुस्तक डॉ विजयनाथ मिश्र को समर्पित है और उन्हें श्रीप्रकाश शुक्ल के लोकवृत्त की अनिवार्य आभा बताया गया है। श्रीप्रकाश शुक्ल को इतने निकट से देखने वाले डॉ विजयनाथ मिश्र ने लिखा है कि "उनके कई करीबी ऐसे हैं जो उनसे कुपित रहते हैं और अनाप-शनाप उनके बारे में बोलते रहते हैं पर इस संबंध में बहुत खोदने पर श्रीप्रकाश शुक्ल इतना ही कहते हैं - आपका वृत्त केवल प्रशंसा करने वाले नहीं, विरोध करने वाले भी बड़ा बनाते हैं"।9 विजयनाथ मिश्र जब उनसे पूछते हैं कि कुछ लोग बहुत तल्ख़ रूप में आप पर प्रहार करते हैं। आपको बुरा नहीं लगता तो श्रीप्रकाश शुक्ल का उत्तर है कि "जब बहुत उत्तेजित होता हूँ तब बहुत कुछ अच्छा लिख जाता हूँ"। विरोध को पीछे छोड़ श्रीप्रकाश शुक्ल आगे बढ़ते हैं और रचनात्मक होते जाते हैं। निरंतर आगे बढ़ते रहना उनकी जीवनदृष्टि है इसलिए महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने लिखा है कि श्रीप्रकाश शुक्ल "सक्रियता को जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण मूल्य मानते हैं और निष्क्रियता को सबसे खराब। उनकी दृष्टि में निष्क्रिय होना, जड़ होना है, मर जाना है। जाहिर है कि वे हर क्षण सक्रिय रहते हैं और अपने आसपास के लोगों से भी अपेक्षा रखते हैं कि सक्रिय बने रहें"।10 

अध्ययन, अध्यापन, संवाद, सेमिनार हर क्षेत्र में उनकी यह सक्रियता गजब ढाती है इतना कि रविशंकर सोनकर ने नोट किया है कि उनकी सक्रियता के कारण कुछ लोग सर को 'सेमिनार गुरू' कहते हैं। बड़े-बड़े आयोजन वह चुटकी में कर डालते हैं। अपने साथ के लोगों से भी उनकी यही अपेक्षा रहती है। आत्मज-आत्मजा हों या विभागीय शोधार्थी सबको वह सक्रियता की इस आग से परिपक्व करते हैं। वह गिरने के लिए छोड़ देते हैं पर गिरे हुए के साथ हमेशा खड़ें दिखते हैं। आप पसंद करें, नापसंद करें पर पूरी पुस्तक में श्रीप्रकाश शुक्ल की छवि एक ही रहती है। उसमें दोहरापन नहीं दिखता। इसका बड़ा श्रेय श्रीप्रकाश शुक्ल के व्यक्तित्व की दृढ़ता को दिया जा सकता है। 2013 में जब गंगा की भयानक बाढ़ में श्रीप्रकाश शुक्ल के घर में चार फुट पानी भर गया। पानी ने घर के सारे सामान के साथ-साथ फर्श और दीवारों को भी चपेट में ले लिया था। काफी क्षति हुई पर अपने धैर्य और जीवट से उन्होंने रंग-रोगन आदि कराकर उसकी क्षतिपूर्ति कर ली। जीवन की कोई बाढ़ उनकी इस दृढ़ता को हिला नहीं सकी शायद इसलिए किसी परिस्थिति में उनका व्यक्तित्व बिखरता नहीं। इस पुस्तक में उनकी छवि की एकाकारता का दूसरा कारण इसके लेखक और संपादक हैं। लगभग आधे से अधिक लेखक उनके विद्यार्थी या विद्यार्थी-मित्र हैं। उनके अनुभव-जगत में श्रीप्रकाश शुक्ल लगभग एक जैसे आते हैं। उनके व्यक्तित्व की आभा से अभिभूत लेखकों ने अपनी तरफ से श्रीप्रकाश शुक्ल के 'शुक्ल पक्ष' को ही रखा है। श्रीप्रकाश शुक्ल पर केन्द्रित इस पुस्तक में दो अनुपस्थिति भी पाठक का ध्यान खींचती है। संपादक की कलम से ही ज्ञात होता है कि इस पुस्तक की मूल योजना वाचस्पति जी की रही लेकिन किन्हीं कारणों से उनका संस्मरण नहीं मिल पाया। दूसरी महत्वपूर्ण अनुपस्थिति रामाज्ञा शशिधर की है। श्रीप्रकाश शुक्ल और रामाज्ञा शशिधर की जोड़ी के बारे में अक्षत पाण्डेय बताते हैं कि एक समय कला संकाय प्रमुख प्रो० कुमार पंकज ने कहा था कि "श्रीप्रकाश जी और रामाज्ञा जी के बीच जो सांस्कृतिक मित्रता पनपी है वह कहाँ तक चलती है यह देखना है"।11 कमलेश वर्मा ने लिखा है कि रामाज्ञा शशिधर श्रीप्रकाश जी के बहुत करीब रहे हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल पर किताब संपादित करते वक्त कमलेश वर्मा को रामाज्ञा जी की कही बात याद रहती थी कि जब तक वे नहीं लिखेंगे तब तक श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं पर लिखा हुआ पूरा नहीं हो पाएगा। दुर्भाग्य से रामाज्ञा शशिधर का लिखा हुआ कमलेश वर्मा को नहीं मिल पाया था और इस संस्मरणात्मक पुस्तक में भी रामाज्ञा शशिधर की कमी खलती है। यों, यह पुस्तक 'शुक्ल पक्ष' को संबोधित करती है, इसका ध्यान पुस्तक के संपादक को भी है। अक्षत पाण्डेय ने 'अपनी बात' में पुस्तक-संपादन-योजना के संबंध में बताते हुए कहा है कि "अब जब वे 18 मई 2025 को अपने साठवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं तो एक जुटान उनके शिष्यों, मित्रों की ओर से आयोजित है। यह एक तरह से 'शिष्यों का शुक्ल पक्ष' ही है जिसमें 'मित्र संवाद' भी होगा। यही जुटान एक किताब की शक्ल में आ रही है जिसमें उनके बनारसी वृत्त की आवाजें अपने-अपने अलहदा अनुभवों के साथ सुनाई पड़ेंगी"।12 श्रीप्रकाश शुक्ल का व्यक्तित्व-वृत्त ही ऐसा है जिसकी परिधि में ऐसी शुक्लता और संवाद की प्रचुरता है। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा है कि प्रभात मिश्र ने अपने संस्मरण का शीर्षक ही रखा है "जैसे सारा उजाला इधर ही तो है"।13 ऐसा लगे भी क्यों ना ! इस पुस्तक के कई संस्मरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि श्रीप्रकाश शुक्ल हर जरूरत के समय साथ खड़े रहते हैं। उनके इस गुण ने बहुतों को प्रभावित किया है। अवधेश प्रधान ने बनारस की बाढ़ के समय का वर्णन करते हुए लिखा है कि "एक बार जब पानी हमारी भी कॉलोनी की मुख्य सड़क पर आ गया था और हमलोग भी घिर गए थे और उस समय श्रीप्रकाश शुक्ल घर छोड़कर सिटी में चले गए थे तो सहसा उनका फोन आया कि आप लोगों की क्या हालत है ? इस चीज ने मुझे छू लिया"।14 श्रीप्रकाश शुक्ल के शोधार्थी रहे कुमार मंगलम ने लिखा है कि एक रात जब उन्हें कमर में भयानक दर्द हुआ, उन्होंने अपने कई दोस्तों को कॉल किया लेकिन किसी ने कॉल नहीं उठाया। अंत में रात के लगभग दो बजे उन्होंने श्रीप्रकाश शुक्लजी को कॉल लगाया। वह रात में ही उनके कमरे पर आए और अस्पताल में भर्ती कराया। अगले दिन स्पेशल वार्ड मिलने तक साथ रहे और फिर प्रतिदिन आकर उनकी चिकित्सा की सारी व्यवस्था देखते थे। कुमार मंगलम ने सही लिखा है कि "श्रीप्रकाश जी की मेरे प्रति चिंता किसी विशेष लगाव-बनाव के कारण संभव नहीं हो रही थी। बल्कि यह उनकी निर्मिति और आंतरिक स्वभाव के कारण था"।15 

एक तो श्रीप्रकाश शुक्ल का व्यक्तित्व ऐसा है, और अवसर भी षष्टिपूर्ति के उल्लास का है शायद इसलिए इस पुस्तक से 'शुक्ल पक्ष' के अतिरिक्त कुछ आशा भी नहीं की जानी चाहिए। श्रीप्रकाश शुक्ल पर लिख्रे हुए ज्ञानेंद्रपति जैसे महत्त्वपूर्ण कवि ने उन्हें एक कवि सखा के रूप में देखा है तो कृष्णमोहन जैसे उनके समकालीन लेखक ने एक-दूसरे की कतर-ब्योंत वाले एकाध उदाहरण भर दिए हैं कि संचालक के रूप में श्रीप्रकाश शुक्ल ने एक गोष्ठी में वक्ता के रूप में आमंत्रित आलोचक कृष्णमोहन का ऐसा परिचय दिया जिसका श्रोताओं पर अनुकूल असर पड़ने की संभावना नहीं थी। बलिराज पाण्डेय जैसे वरिष्ठ लेखक ने भी केवल निरामिष संकेत भर छोड़ा है कि पहली मुलाक़ात में ही श्रीप्रकाश शुक्ल ने उनका परिचय प्राप्त करते हुए पूछा कि क्या आप वही पाण्डे जी हैं जिन पर हंस पत्रिका में एक चिट्ठी छपी है ? बलिराज पाण्डेय ने यह भी नहीं लिखा कि क्या इस चिट्ठी का प्रसंग काशीनाथ सिंह द्वारा बलिराज पाण्डेय पर लिखी विख्यात चिट्ठी से है या किसी अन्य से। कमलेश वर्मा ने जरूर श्रीप्रकाश शुक्ल के बारे में पहले सुनी ज्यादातर खराब बातों की पेशबंदियों का जिक्र किया जिसने उन्हें पहले दूर रहने का माहौल दिया पर उसके बाद तो शुक्ल जी का मोहिनी-मन्त्र ऐसा चला कि उन्होंने श्रीप्रकाश शुक्ल पर एक पुस्तक ही संपादित कर डाली। श्रीप्रकाश शुक्ल का यह मोहिनी मन्त्र बहुत कारगर है। अपने प्रशंसकों के अतिरिक्त वह उदासीन और विरोधी खेमे से भी खींचकर लोगों को अपना बना लेते हैं। इस पुस्तक के संपादक आर्यपुत्र दीपक भी पहले श्रीप्रकाश शुक्ल के प्रति उदासीन ही थे। वह जब स्नातकोत्तर के छात्र थे तब वह श्रीप्रकाश शुक्ल के आत्मीय घेरे से बहुत दूर थे। पूरे सत्र में वह श्रीप्रकाश शुक्ल की कक्षा से अनुपस्थित रहे। एक दिन वह उनकी कक्षा में गए भी तो अपने मित्र धर्मचन्द के कहने पर। बेहतर होगा, इस प्रसंग को स्वयं आर्यपुत्र दीपक के ही शब्दों में देखा जाए - "एक दिन मेरा मित्र धर्मचन्द बताता है कि आज शुक्ला सर की अंतिम कक्षा है। कर लो, नहीं तो अटेंडेंस का लोचा होगा"।16 धर्मचन्द के कहने पर मैं वह अंतिम कक्षा करने गया। शुक्ला सर अटेंडेंस के वक्त मुझे खड़ा करवाते हैं और पूछते हैं - पहली बार दिख रहे हो। मैंने कहा - नहीं सर, यह दूसरी कक्षा है"। एक ऐसा छात्र जिसने कायदे से श्रीप्रकाश शुक्ल की कक्षा भी नहीं की, वह श्रीप्रकाश शुक्ल के आकर्षण में ऐसा बँधा कि यह पुस्तक सामने आयी। व्यक्तित्व-रूपांतरण की यह अद्भुत क्षमता श्रीप्रकाश शुक्ल में है जिसकी गवाही इस पुस्तक के कई संस्मरण देते हैं। उनके इस पारस-स्पर्श को रेखांकित करते हुए अमरजीत राम ने लिखा है कि "जिन विद्यार्थियों पर इनकी पैनी दृष्टि पड़ी, उनके अन्दर की अज्ञानता, खामियाँ, सब हेमंत के पीले पत्ते की तरह भू-पतित हो गयीं। वे सब कवि-आलोचक हुए। कुछ नहीं तो सुरुचि वाले तो हो ही गए"।17 सुरुचि उत्पन्न करने का काम अत्यंत कठिन और महत्त्वपूर्ण है इसलिए अमरजीत इसे विशेष तौर पर रेखांकित करते हैं। सुरुचि को विरल पाकर ही अत्यंत सुरुचिपूर्ण सौन्दर्यदृष्टि वाले कवि शमशेर बहादुर सिंह ने 'अज्ञेय से' शीर्षक कविता में लिखा -

जो नहीं है
जैसे कि 'सुरुचि'
उसका ग़म क्या?
वह नहीं है।

सुरुचिहीन समय में अगर श्रीप्रकाश शुक्ल का सान्निध्य उनके निकट आने वालों को और कुछ नहीं तो सुरुचिपूर्ण बना रहा है तो यह बहुत बड़ी बात है। श्रीप्रकाश शुक्ल के इस पारस-स्पर्श की ख्याति से उनके इर्द-गिर्द श्रद्धोत्सुक विद्यार्थी समुदाय एवं संवादरत विद्वद्जन का एक बड़ा घेरा बना रहता है। सूक्ष्म मानसिक स्तर पर ही नहीं, स्थूल रूप में भी उनके साथ-साथ रहते दिखते हैं। उनके विद्यार्थी नीतीश कुमार के शब्दों में "श्रीप्रकाश शुक्ल सर की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि जहाँ कहीं सर को देखता हूँ तो उनके साथ कुछ प्रोफेसर्स, दर्जनों शोधार्थी एवं विद्यार्थियों का जत्था साथ दीखता है। इसे देखकर कई बार लगता है - कोई राष्ट्रीय नेता विधायकी का नामांकन दाखिल करने जा रहा हो। मुझे आश्चर्य तब होता है जब देखता हूँ इनके लोकवृत्त में विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अलावा विभिन्न संकाय एवं विभागों के दर्जनों छात्र और प्रोफेसर शामिल होकर साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा करते रहते हैं"।18 श्रीप्रकाश शुक्ल की शोध-छात्रा आस्था भी ऐसी ही राय रखती हैं। उनके शब्दों में "गुरुदेव के आसपास हमेशा कुछ ऐसे छात्र रहते थे जो उनके विचारों और व्यक्तित्व के प्रति विशेष श्रद्धा रखते थे। वे गुरुदेव के हर व्याख्यान को महत्त्वपूर्ण मानते, हर सुझाव को अमूल्य समझते और हर आलोचना पर टिप्पणी करते। इन छात्रों की एक ख़ास विशेषता यह भी थी कि वे गुरुदेव के विचारों को सोशल मीडिया पर साझा करने में अग्रणी रहते"।19 जिन्होंने श्रीप्रकाश शुक्ल की गुरुता का यह विराट रूप ना देखा हो, उन्हें इस पर आश्चर्य न कर कमलेश वर्मा की बात याद रखनी चाहिए कि उनके पास मोहिनी मन्त्र भी है और 'उच्चाटन' भी। वे अपने वश में भी करते हैं और दूसरे के प्रभाव से निकाल भी लेते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल के इस मोहिनी रूप का जादू चलता है तो इसका बड़ा कारण है उनकी विद्वता। उनके विद्वान प्राध्यापक रूप को कई लेखकों ने अपने संस्मरण में रेखांकित किया है। 

कुमार मंगलम के अनुसार अरुण कमल ने उनसे कहा था कि समकालीन काव्य परिदृश्य में ज्ञानेंद्रपति के बाद श्रीप्रकाश जी की काव्यशास्त्र की जानकारी सर्वथा प्रामाणिक है। उनसे योग्य काव्यशास्त्र के जानकार कवि हमारे बीच नहीं हैं। जगन्नाथ दूबे ने लिखा है कि "काव्यशास्र, आधुनिक कविता और तुलसीदास को पढ़ाते हुए वे वही बातें नहीं बताते थे जो अन्य शिक्षक करते थे। वे नागार्जुन को पढाते हुए भामह या दण्डी की कोई कारिका उद्धृत कर अर्थ में एकदम नयापन ला देते थे"।20 पुस्तक-संपादक की 'भूमिका' में भी अंकित है कि महादेव के नगर में ये महादेवी को डूब कर पढ़ाते हैं"। समय चाहे कितना भी बदले, पढ़ाने वाले और बढिया पढ़ाने वाले शिक्षक सदैव सम्मान के पात्र होते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल अपनी विद्वता और कार्य-निष्ठा के कारण इस स्वाभाविक सम्मान के अधिकारी हैं। जब उनकी विद्वता के साथ सहज मानवीयता का मणिकांचन संयोग होता है तब उनका जादू सिर चढ़कर बोलने लगता है। कमलेश वर्मा ने उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए इसे समझदारी और संवेदना के योग के रूप में देखा है। उन्होंने लिखा है कि "श्रीप्रकाश जी का 'टोना' विज्ञान, संगीत, कला, इंजीनियरिंग, मेडिकल और न जाने कहाँ-कहाँ तक फैला है। किसी के 'अर्दब' में आते मैंने उन्हें नहीं देखा। हो सकता है जहाँ इसकी गुंजाइश हो वहाँ वे जाते ही न हों। प्यार करने वालों से घिरा होना यह जरूर बताता है कि यह भाग्य यूँ ही नहीं मिलता है। इसके लिए कुछ करना पड़ता है। एक ऐसे दिल और दिमाग की जरूरत होती है जिसमें समझदारी और संवेदना हो"।21 कमलेश वर्मा ही नहीं, कई लेखकों के संस्मरण से स्पष्ट है कि श्रीप्रकाश शुक्ल के पास एक समझदार दिल और संवेदनशील दिमाग है। जबकि अक्सर लोगों का दिल संवेदनशील और दिमाग समझदार होता है। श्रीप्रकाश शुक्ल को उनकी अथाह लोकप्रियता यूँ ही नहीं मिली है। अपने समझदार दिल और संवेदनशील दिमाग से किए गए कार्यों ने उन्हें यह लोकप्रियता दी है। उनके ऐसे बहुतेरे कार्यों में से एक उदाहरण व्योमेश शुक्ल के संस्मरण में दिखता है। उन्होंने लिखा है कि "श्रीप्रकाश शुक्ल मेरे मित्र नहीं हैं, सखा, सहचर, पड़ोसी या रिश्तेदार भी नहीं हैं"। वर्षों पहले एक बार एक साहित्यिक प्रसंग में मैंने उनपर कटूक्ति की थी"।22 लेकिन जब 2015 में व्योमेश शुक्ल की माँ बहुत गंभीर रूप से अस्वस्थ हुईं और वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सर सुन्दरलाल चिकित्सालय के सघन चिकित्सा कक्ष आए तो वहाँ श्रीप्रकाश शुक्ल अपने शिष्य-मण्डल के साथ मदद के लिए उपस्थित मिले। व्योमेश शुक्ल के ही शब्द हैं - "मैं आश्चर्य में डूबा हुआ था, ऐसी होती है मनुष्यता। नदियों की तरह उसमें समय-समय पर बाढ़ आ जाया करती है" ? श्रीप्रकाश शुक्ल के व्यक्तित्व में मनुष्यता की यह बाढ़ बराबर आती है। कई संस्मरण इसके साक्षी हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण श्रीप्रकाश शुक्ल का वह आचरण है जो उन्होंने अपने मेधावी, ऊर्जावान्, अत्यंत संभावनाशील शोधार्थी रविशंकर उपाध्याय के असामयिक कारुणिक निधन के बाद दिखाया। जीवित व्यक्तियों के प्रति किए गए कार्य में प्रतिदान की आशा अथवा दूसरे प्रयोजनों की तलाश की जा सकती है। पर दिवंगत के प्रति प्रेम सच्ची मनुष्यता की उपज होती है। श्रीप्रकाश शुक्ल का समझदार दिल और संवेदनशील दिमाग उन्हें इस मनुष्यता से हटने नहीं देता। विन्ध्याचल यादव ने दिवंगत शिष्य के प्रति दिखाई गयी इस मनुष्यता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि "आउट ऑफ़ वे जाकर छात्रों की मदद करते हुए उन्हें कई बार देखा जा सकता है। रविशंकर उपाध्याय को मरणोपरांत डॉक्टरेट की डिग्री अवार्ड करवायी श्रीप्रकाश शुक्ल ने। रविशंकर के लिए उनकी वह लड़ाई और तड़प जिसने देखी होगी वह समझ जाएगा"।23 सामान्यतः श्रीप्रकाश शुक्ल नियमों के प्रति इतने आग्रही हैं कि उससे तिल भर भी नहीं हटना चाहते।एक बार पूर्व निर्धारित समय होते ही उन्होंने गंगा में अपने बजड़े को खुलवा दिया और कुछ पल देर हो जाने से उनकी एक शोध-छात्रा अपने सामने से बजड़े को जाते देखती रह गयी और उस आयोजन में शामिल नहीं हो सकी। वही श्रीप्रकाश शुक्ल समय आने पर नियमों को अपने अनुकूल करवाकर, आउट ऑफ़ वे जाकर 'गिरे हुए' को सहारा देने के लिए साथ खड़े दिखते हैं। यह उनके अन्दर की मनुष्यता का प्रमाण है। यह पुस्तक श्रीप्रकाश शुक्ल की उस मनुष्यता का रेखांकन है। यह मनुष्यता बनी- बची रहे।

सन्दर्भ :
1. बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल - संपादक आर्यपुत्र दीपक अक्षत पाण्डेय, सेतु प्रकाशन, 2025, पृष्ठ 48
2. वही, पृष्ठ 189
3. वही, पृष्ठ 323
4. वही, पृष्ठ 193
5. वही, पृष्ठ 152
6. वही, पृष्ठ 278
7. वही, पृष्ठ 34
8. वही, पृष्ठ 41
9. वही, पृष्ठ 82
10. वही, पृष्ठ 159-160
11. वही, पृष्ठ 335
12. वही, पृष्ठ 338
13. वही, पृष्ठ 148
14. वही, पृष्ठ 57
15. वही, पृष्ठ 208-209
16. वही, पृष्ठ 15
17. वही, पृष्ठ 176
18. वही, पृष्ठ 313
19. वही, पृष्ठ 256
20. वही, पृष्ठ 216
21. वही, पृष्ठ 107-108
22. वही, पृष्ठ 143
23. वही, पृष्ठ 191

पुस्तक समीक्षा : बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल, संपादक : आर्यपुत्र दीपक, अक्षत पाण्डेय

मयंक भार्गव
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, एम. एल. टी. कॉलेज, सहरसा

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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