साहित्य और इतिहास दुनिया के दो कूड़ाघर हैं
(प्रियंवद से विष्णु कुमार शर्मा की बातचीत)
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| (गूगल से साभार) |
( सिविल लाइंस कानपुर स्थित प्रियंवद जी के आवास पर यह साक्षात्कार विष्णु कुमार शर्मा द्वारा 1 मार्च, 2022 को लिया गया। इस साक्षात्कार का एक अंश 'अपनी माटी' के 45वें अंक (दिसंबर, 2022) में "अच्छी और सफल प्रेम कहानी लिखना खासा कठिन होता है" शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है 22 दिसंबर 2025 को प्रियंवद जी 73वें जन्मदिन पर हम उस बातचीत का यह दूसरा हिस्सा प्रकाशित कर रहे हैं। इस बीच पेंगुइन से इतिहास पर उनकी नई किताब ‘लोकतंत्र का कोरस : कुछ बिसरी बिखरी ध्वनियां’ प्रकाशित हो चुकी है। हम प्रियंवद जी के के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं। ‘अकार’ पत्रिका के माध्यम से भारतीय हिंदी पाठक वर्ग में उनका साहित्यिक और वैचारिक हस्तक्षेप किसी से छिपा हुआ नहीं है। ‘संगमन’ जैसी बेहद ज़रूरी शृंखला के हाल के शान्तिनिकेतन में हुए सफल आयोजन से उनकी भागीदारी को हम बखूबी पह्चाह्नते हैं । -संपादक )
आपकी इतिहास और साहित्य दोनों में समान गति है। क्या ज्यादा पसंद करते हैं?
सबसे ज्यादा तो मैं इतिहास पढ़ता हूँ जो मुझे बहुत प्रिय है। इतिहास मुझ पर जादू करता है। इतिहास में सब आ जाता है... मैं हमेशा कहता हूँ दुनिया में दो कूड़ाघर हैं - एक इतिहास के पास, दूसरा साहित्य के पास। लाखों लोग जो इतिहास में जो बड़े सूरमा बनते थे, आज पता नहीं किस कोने में पड़े बिलबिला रहे हैं । होता वही है जिसको समय छांटकर निकाल देता है, जिसमें कुछ दम होता है इसलिए किसी को वो मुगालता है तो भइ करके देख लो। ऐसे ही लोगों को राजनीति में लगता है, उन्हें पता ही नहीं कि पाँच साल बाद कूडे में फेंक दिए जाओगे... देखिए, एक ही समय में छह बड़े लेखक तो होते नहीं। जब प्रेमचंद ने लिख रहे थे, उस समय और भी बहुत लोग लिख ही रहे थे लेकिन सब तो बड़े नहीं हुए ना !
हाँ, समय तय करता है, समय सब फिल्टर कर देता है।
निश्चित रूप से, समय ही तो सबसे बड़ा हिसाब-किताब करता है... वो जिसको बचाएगा, वही बचेगा।
साहित्य की खेमेबाजी सब धरी की धरी रह जाती हैं।
कुछ नहीं, कुछ नहीं, सब बकवास है जी, वो सब बेकार की बातें है।
आपने ‘प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति’ में एम. ए. किया। इसके बाद आप पीएचडी करना चाह रहे थे। उसकी सिनोप्सिस भी तैयार थी लेकिन टॉपिक स्वीकृत नहीं हो पाया। क्या विवाद रहा?
टॉपिक स्वीकृत हो गया था लेकिन झगड़ा बचा था। हमारा टॉपिक था ‘प्राचीन भारत में रूपाजीवाओं की भूमिका’। ‘रूपाजीवा’ शब्द लिया था हमने, क्योंकि ‘गणिका’ शब्द थोड़ा हल्का था। तो हम बात उन पर करना चाहते थे जैसे... असल में भारतीय संस्कृति को लोग उस तरह से समझते नहीं हैं- आम्रपाली, बसंतसेना बहुत बड़ी-बड़ी गणिकाएँ हुई है हमारे यहाँ। तो हमने ‘रूपाजीवा’ शब्द रखा था। सिनोप्सिस के पहले सब्जेक्ट अप्रूवल होने को हुआ तो इस सब्जेक्ट पर बड़ा झगड़ा मचा कि ये ‘रूपाजीवा’ क्या होता है? यहाँ ऐसे विषय पर काम नहीं करने देंगे। तो हमारे गाइड जो थे, वो कमेटी से अड़ गए। नहीं, ऐसे कैसे नहीं करने देंगे? कमेटी ने कहा कि इसका सोर्स दिखाएं। किताबें देखी गईं तो उसका अर्थ था मिला कि ‘जो अपने रूप से आजीविका अर्जित करे’। खैर, वो शब्द बदल दिया गया... ये विचार मेरे मन में आया था मिर्ज़ा हादी रुसवा की ‘उमराव जान अदा’ को पढ़ कर। जब मैंने ‘उमराव जान अदा’ पढ़ी तो मुझे उसने मुझे बड़ा अपील किया। वो छह महिने कानपुर में रहीं थी। लाठी मौहाल में उसने घर लिया था। मैंने और पढ़ा तो मैंने पाया कि भारत में इस तरह की एक से एक स्त्रियाँ हुई हैं। पूरी दुनिया में भी है... तो मुझे लगा कि इस विषय पर बात होनी चाहिए । दरअसल ये सब स्त्रियाँ अपने समय में बहुत पॉवरफुल रहीं हैं, सत्ता को मुट्ठी में रखती थीं, राजा को अपनी मुट्ठी में रखती थीं। तो उसका चरित्र मुझे बहुत पसंद आया। और अपने समय के किसी भी पुरुष से ये ज्यादा शक्तिशाली रहीं हैं । ग्रीस वगैरह में स्पासिया थी, क्लियोपेट्रा थी; अपने यहाँ आम्रपाली थी, वसंत सेना थी... तो इस विषय को मैंने लिया और मैं इस पर काम भी कर रहा था। कुछ दिनों बाद ही लग गया कि मजा आ नहीं रहा है पीएचडी करने में क्योंकि जिन किताबों पीएचडी के लिए मुझे पढ़ना था उनको मैं पहले ही शौकिया तौर पर पढ़ चुका था । लग गया था कि ये बेकार का काम है... तब तक मैंने इधर शिफ्ट कर लिया कविता वगैरह में। इसमें मुझको बड़ा मजा आता था। तो हम कविता लिखने लगे, लेख लिखने लगे ।
अपनी ननिहाल लखनऊ में बचपन में देखें रामलीला और मुहर्रम के ताजियों के दृश्यों और यहाँ कानपुर में सभी सम्प्रदायों के लोगों के बीच उठने-बैठने से एक पंथनिरपेक्ष या कहूं कि एक सच्चे इंसान बनने की आपकी परवरिश हुई। इस पर आपका क्या कहना है? साथ ही लखनऊ से आप कैसा नाता महसूस करते हैं?
लखनऊ अपने आप में एक बहुत शानदार शहर है। ‘अकार’ में मैंने आरिफ़ लखनवी का लिखा लखनऊ का एक पूरा पीस दिया है। आरिफ़ लखनऊ का जो लेख है उसमें, उन्होंने उस समय का जिक्र किया है । मैंने उसकी शुरूआत में भूमिका में लिखा भी है... वो लखनऊ तो और भी शानदार था । लखनऊ ननिहाल था मेरा और घर ‘चौक’ में था। अमृतलाल नागर भी चौक में रहते थे। उन्होंने ‘ये कोठे वालियां’ चौक में रहकर ही लिखी है। आप ‘चौक’ में रहें और इनसे मुतासिब न हों। ये मुमकिन नहीं है। वहाँ की कला-संस्कृति, नाच-गाना सब लिखा है... तो जहाँ मेरा घर था, वहाँ घनघोर मुस्लिम बस्ती थी। एक छोटी-सी गली थी उसमें दाएं हाथ मुस्लिमों के घर थे, बाएं हाथ चार घर हिन्दुओं के थे। तो मैंने उनको नजदीक से देखा है, ताजिएं देखे हैं । ताजिएं तो यहाँ कानपुर में भी खूब देखे हैं... लेकिन लखनऊ की तहजीब और तवाददुल जो है, वो जादू करता है। लखनऊ का इतिहास... वाजिद अली शाह, उमराव जान वगैरह... और ज़ुबान वहाँ की; वहाँ की ज़ुबान का पूरी दुनिया में कोई मुकाबला नहीं है। ‘पहले आप, पहले आप’ मज़ाक नहीं है ।
और कोई याद?
लखनऊ की पतंगें बहुत मशहूर थी, बढ़िया मांझा मिलता था । लखनऊ से मेरा ताल्लुक इसी तरह रहा... लेकिन मुहर्रम-ताजिया तो कानपुर में उससे भी ज्यादा बड़े निकलते थे और मैंने देखे हैं। पतंग-मांझे वगैरह कानपुर में मुस्लिम बस्तियों व गलियों में ही ज्यादा मिलते थे। तो वहाँ रोज जाता ही था। खाना-पीना भी सब वहीं होता था। जब थोड़ा बड़े हुए, फिल्म वगैरह जब देखने लगे तो तीन टॉकीज भी मुस्लिम इलाके में थे। वहाँ हम पिक्चर देखने जाते थे। उनके नाम भी थे नारायण, रूपम और सत्यम; घनघोर मुस्लिम आबादी में।
आज मुस्लिम इलाकों में जाने से लोग डरते हैं।
किस बात का डर लगता है? पता नहीं। चलिए, आइए मेरे साथ। मैं तो वहाँ ज़िंदगी भर पिक्चर देखा हूँ, वहीं घूमा-फिरा। काहे का डर?
ये डर इन दिनों कुछ ज्यादा बढ़ा है आप के हिसाब से?
हाँ, बहुत ज्यादा बढ़ा है। आप बात करके देखिए, औरतें तो आपको अस्सी प्रतिशत मिल जाएगी जो कभी मुस्लिम इलाके से निकली ही नहीं। हमें तो किसी ने नहीं सिखाया कि ये लोग कुछ दूसरे होते हैं। हम तो वही रहे हैं -सड़कों पर, गलियों में, कूचो में। ये सब हमारी कहानियों में भी बहुत आता है और कोई खौफ नहीं था। हम तो पिक्चर देखते थे, दस-दस घंटे बैठे रहते थे, कहीं हमने कुछ नहीं देखा। हाँ, छोटे-मोटे दंगे, झगड़ा वगैरह सुनते थे। ये थोड़े बहुत सभी जगह होते थे। अब ये कानपुर में बीच वाला मंदिर है, उसकी दायीं पट्टी पूरी मुस्लिम है और बायीं पट्टी पूरी हिन्दू है । बीच में दोनों की दुकानें हैं आसपास, कोई दिक्कत नहीं, वो अपनी ज़िंदगी में जी रहे हैं, हम अपनी।
लेकिन अब दिनोंदिन संकीर्णता बढ़ रही है या इस डर को इरादतन बढ़ाया जा रहा है?
इरादतन बढ़ाया जा रहा है, डरने की कोई जरूरत नहीं है। देखिए, जिंदगी भर हमारा पेंटर मुस्लमान रहा है, कार बनाने वाला मुस्लमान, आज भी हमारा ड्राइवर जो आपको लेकर आया है- शहाबुद्दीन, वो मुस्लमान। बहुत से कारीगर चाहिए हमको, वो सब मुस्लमान ।
हाँ
ये सब तो मतलब... संकीर्णता उनके लिए है, जिनकी समझ छोटी है ।
लेकिन उस छोटी समझ को अब थोपा जा रहा है सब पर और लोग इसे ग्रहण भी कर रहे हैं।
थोप कोई नहीं सकता, और ग्रहण आप इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आप अज्ञानी हैं । आपके पास तर्क नहीं है, विवेक नहीं है। जो आपको समझाया जा रहा है, आप आँख बंद करके अंधों की तरह सुन रहे हैं। आपने कभी सवाल ही नहीं किया।
आजकल तो ये मुश्किल हो रही है कि जो पढ़ा लिखा है वो ......
देखिए, कोई अगर डाक्टर है तो उसके पास मेडिकल की पढ़ाई की डिग्री है लेकिन विवेक नहीं तो वो काहे का पढ़ा-लिखा? बड़े-बड़े अनपढ़ होते हैं, कभी स्कूल नहीं गए, डिग्री नहीं है लेकिन उनके अंदर ज्ञान और विवेक होता है। मेरे पिता जी कभी नहीं पढ़ें लेकिन शहर के सारे लेखक साहित्यकार हमारे घर आते थे, नेता आते थे, सारे पत्रकार आते थे। सब उठते-बैठते थे। आपको ज्ञान नहीं है तो पढ़ने-लिखने और डिग्री का क्या मतलब? शिक्षा के नाम पर आज जो मिल रहा है, वो महज एक एक डिग्री है। उसका हम अपने करियर में इस्तेमाल कर रहे हैं। मैं तो जिन्दगी भर सेकेंड क्लास स्टूडेंट रहा।
इस पढ़ाई से समझ विकसित नहीं हो रही ना सर.......
देखिए, आज आप मुझे पढ़ा-लिखा मानते हैं। मेरी समझ भी किसी ने विकसित नहीं की। इस पढ़ाई ने तो बिलकुल नहीं। समझ विकसित की सिर्फ किताबों ने। किताब और अनुभव ने। मैं मान ही नहीं सकता जिसने सौ-दो सौ किताबे पढ़ी हों और वो ऐसी संकीर्णता की बातें मान लें। ये बात वो आदमी सोचता है जिसने ज़िंदगी में एक किताब नहीं पढ़ी ।
व्हाट्सप्प और फ़ेसबुक पर पढ़ने को ही ‘पढ़ना’ मान रहे हैं लोग...
तो आप उनका क्या करेंगे? आपको रोज सुबह उठकर एक ज्ञान व्हाट्सप्प पर दे दिया जाता है। अंधभक्त और जड़ता किसे कहते हैं? हम तो महानगर पालिका के स्कूल में पढ़ें हैं और उसके बाद गवरमेंट इन्टर कालेज में पढ़ें। हम तो किसी अंग्रेजी स्कूल में भी नहीं पढ़ें। कानपुर से बाहर नहीं गए कभी लेकिन ज्ञान और चीज हम को मिलती गई और हम हासिल करते गए, अर्जित करते गए। आप अपनी गति को प्राप्त होंगे ही होंगे। अपने बच्चों को भी यही सिखा रहे हैं तो माशाल्लाह !
तो ये परिवर्तन क्यों आया कि हम पीछे की और लौट रहे हैं ? प्रगति करने की बजाय हम प्रतिगामी क्यों हो गए हैं?
देखिए ये तो बहुत लंबा विषय हो जाएगा कि हम क्यों हो गए लेकिन...
संक्षेप में कुछ कहना चाहेंगे।
अगर आप मुझसे पूछे कि ऐसा क्यों हुआ तो असल में 1857 तक एक दूसरा हिन्दुस्तान था, मिली-जुली संस्कृति का, मिली-जुली तहजीब का। कोई कुछ कहे लेकिन ये एक सच्चाई है और उसमें सारी विचारधाराएं, सारे स्वरूप, सारे लोग, सब उसमें शामिल थे... ये अलगाव, ये कट्टरपन, ये अपना-अपना धर्म, सम्प्रदायवाद, ये सब 1857 के बाद आया । ये अंग्रेजों का एक प्रयोग था जिसमें वे सफल हुए। उन्होंने दोनों के बीच खाई पैदा करना शुरू किया और उसमें कामयाब होते चले गए। पहले एक मुस्लमान अलग हुआ, फिर एक हिन्दू अलग हुआ; दोनों ने अपना-अपना इतिहास गढ़ा, अपनी-अपनी बातें लिखी और उसमें रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरता, शुद्धता, परम्परा और ये सब आता चला गया... लेकिन पहले-पहले तक देश इनसे बहुत मुक्त था। बोलने की बहुत आजादी थी। हम तो कहीं नहीं पढ़ते कि अभिव्यक्ति के नाम पर किसी को फांसी दी गई हो, हमने तो नहीं पढ़ा इतिहास में। नजीर अकबराबादी ने तो सभी हिंदू देवी-देवताओं की पूजा की, किसी ने फतवा नहीं दिया।
अपनी पुस्तक ‘भारत विभाजन की अंतःकथा’ के एक अध्याय ‘राष्ट्रवाद’ में आपने इस विषय की गहरी पड़ताल की है। आप लिखते हैं कि अकबर, वलीउल्लाह, सर सैय्यद अहमद, इकबाल जैसे गंगा-जमुनी तहज़ीब के समर्थक चेहरों (एक सीमा तक) के लिए भी “इस्लाम से इतर कोई और राज्य सत्ता इन्हें भी स्वीकार नहीं थी। राज्य सत्ता हाथ से जाने का अर्थ इस्लाम पर संकट था”। दूसरी ओर मुस्लिम शासन के 600 वर्षों के दौरान भी हिन्दू जनता व हिन्दू नेतृत्व अनिच्छा से ही मुस्लिम संस्कृति से सामंजस्य बिठाए हुए था। तो क्या हिन्दू-मुस्लिम एकता की अवधारणा कोरा भ्रम थी और गाँधी से लेकर आप-हम जैसे मानववादी वैचारिकी के लोगों के लिए यूटोपिया? वहीं इसी पुस्तक के ‘भाषा’ अध्याय में भाषाओं के मिश्रण को आपने सभ्यताओं के सामंजस्य का प्रमाण माना है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
नहीं, हिन्दू- मुस्लिम एकता कोई भ्रम और मिथ नहीं था। वो था। और जैसा मैंने अभी आपको बताया कि ये टूटना शुरू हुआ है 1857 के बाद। देखिए, इतिहास में आप कुछ भी ढूँढ सकते हैं। आप जैसा उदाहरण ढूँढना चाहें वो मिल जाएगा। अगर आप चाहे कि वो अलग-अलग थे। एक-दूसरे से नफरत करते थे तो इसके भी चार- छह उदाहरण मिल जाएंगे आपको। और ऐसे भी मिल जायेगे जो साबित करें कि साथ रहते थे, आपसी मेलजोल था। मैंने कानपुर का उदाहरण दिया, लखनऊ का उदाहरण दिया। मैं तो आजकल आदमी हूँ लेकिन हमने भी वो समय देखा है। ये मिश्रण नीचे की सतह पर बहुत ज्यादा था। ऊपर आभिजात्य वर्ग में इतना नहीं दिखेगा। नीचे के लेवल पर रोजी-रोटी या आर्थिक कारणों से दोनों में यह बहुत आस-पास था। आपका भक्ति आंदोलन और उसमें कितने बड़े-बड़े कवि पैदा हो गए... और 1857 की लडाई दोनों ने साथ लड़ी। हमको नहीं दिखता कि कोई मतभेद था, राजनीतिक रूप से ऊपरी स्तर पर भी जो एक तालमेल बैठाया गया था। शाहजहां की माँ हिन्दू, जहांगीर की माँ हिन्दू... तो ये तो आप नहीं कह पाएंगे कि हिन्दू वंश या रक्त उसमें नहीं है। माँ है तो वंश तो है। आज के कानून के हिसाब से तो माँ का ज्यादा बड़ा हक है।...फिर क्या करेंगे? संकट आ जाएगा। और वो भी राजपूत का ! फिर क्या करेंगे?
हाँ
इसके अलावा चित्तौड़ को छोड़कर सबने बहु-बेटी के सम्बंध किए तो एक तालमेल तो था। राणाप्रताप से लड़ने कोई मुस्लमान तो नहीं गया था, मानसिंह गया था। शिवाजी को लेकर जयसिंह गए थे। लक्ष्मीबाई का तोपची मुस्लमान था। महादजी सिंधिया का तोपची मुस्लमान था। सबके तोपची मुस्लमान थे।
महाराणा प्रताप का सेना नायक हकीम खान सूरी था ।
हाँ, महाराणा प्रताप का था। अब आप ये बताइए कि मुसलमानों में औरंगजेब के यहाँ सबसे ज्यादा मनसबदार हिन्दू थे। तो ये तो आप अगर निकालने बैठें कि आप अलग थे तो आप निकाल लो लेकिन जो दिखाई पड़ता है... जब वो ढांचा छह सौ साल चला तो उसकी जड़ में कुछ तो था। और अगर उस ढांचे में दम नहीं होता तो वो नहीं चलता। तो कहीं तो कुछ था... ये जो मैं कह रहा हूँ कि अंग्रेजो ने इसको 1857 के बाद तोड़ा और 50 साल तक ये कोशिश की कि हिन्दू-मुसलिम फिर दोबारा कभी ना मिल पाएं और वे इसमें कामयाब हो गए।
हाँ, बिल्कुल नहीं मिल पाए।
क्योंकि उसके मिलने का नतीजा 1857 था। और वो उसमें कामयाब हो गये। आखिर में धर्म के आधार पर देश भी बंटा और दूरियाँ बढ़ती गयी। भाषा के मुद्दे पर, नौकरियों देने के मुद्दे पर और कई तरह से उन्होंने भेद भाव किये। बाद में जब गांधी आए तो उन्होंने किया कि अगर देश की आजादी के लिए हमे लड़ना है तो हिन्दू-मुस्लिम को एक होना पड़ेगा। दलित को जोड़ों, स्त्री को जोड़ों, सबको जोड़ो और गांधी ने ये काम किया। 1931 के आंदोलन में खिलाफ़त के एजेंडे को उन्होंने टॉप पर रखा। तब ये नैरेटिव फिर बना कि हमारी एक साझी संस्कृति है। इसको जिन्ना ने बाद में खारिज किया कि बाद में; नहीं, हम साझी-संस्कृति नहीं हैं हम हमेशा से दो राष्ट्र थे। उन्होंने ये स्थापित किया और देश को बांट दिया उस वक्त। और अंग्रेज कामयाब हो गए। तो ये पूरा एक समझने वाला मामला है। ये नैरेटिव जैसे आज आप लोग कहते हो... व्हाट्सप्प और उससे लोग मानते हैं तो तब अंग्रेजो ने समझाया और लोगों ने मान लिया। उनके पास नौकरियाँ थी, चीजें थी। लालच था। उन्होंने सबको एक-दूसरे से बैलेंस किया।
हाँ तो, मुट्ठी भर अंग्रेज हम पर भारी पड़ गए और...
जिन्ना का मोहभंग बीच में ही हो गया था। गांधी जी आने के बाद जिन्ना अलग हो गया। जिन्ना ठीक-ठाक अच्छे राष्ट्र भक्त थे और तिलक से उनके बहुत अच्छे सम्बंध थे। उनके लिए मुक़दमा लड़ते थे। गुरु मानते थे... तो ये उदाहरण तो आपको बहुत मिल जाएंगे। गांधी जाते थे अजमल खा और अंसारी के यहाँ ठहरते थे, वहीं खाना खाते थे। तो इस तरह से उदाहरण अगर देने लगे तो बहुत मिल जाएंगे। भाषा में तो खैर उसका प्रमाण दिखता ही है।
बिलकुल दिखता है।
वही भाषा बोलना हिन्दुस्तान की गाँव के स्तर पर, शहर के स्तर पर। तीज-त्योहार के स्तर पर, फसल के स्तर पर सब परम्पराएं टकराई एक दूसरे से। लेकिन रोटी और ब्याह का रिश्ता नहीं बना ये एक सच्चाई है। ये एक सच्चाई है कि एक दूसरे का ब्याह इच्छा से हो जाए मतलब प्रेम विवाह हो जाए... वर्ना नहीं बना। तो खाने-पीने, रोटी का रिश्ता नहीं बना। तो मान लिया दोनों ने की भइ कि तुम अलग हम अलग, बस। इतना ही था, इतना ही रहा लेकिन 1857 में देश बंटने के बाद बिगड़ता ही चला गया। कोशिश की नेहरू गांधी ने इस देश को बनाने की। 50 साल तक आजादी के बाद या बँटवारे के बाद भारत एक लोकतांत्रिक देश बना, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र, प्रगतिशील बना, समाजवादी बना। ये बड़ी बात थी। क्योंकि पाकिस्तान तो इस्लामिक राष्ट्र बन गया ना और इस हिसाब से भारत को हिन्दू राष्ट्र बन जाना चाहिए था।
हाँ, लेकिन नेहरू, पटेल व अम्बेडकर की बड़ी भूमिका थी?
बिल्कुल, आपकी जड़ें बहुत गहरी थी तभी तो आप बचा ले गए। नहीं देश तो चला जाता उस गड्ढे में जहाँ अब जा रहा है ।
अब उसी गड्ढे में जा रहा है?
पाकिस्तान 70 साल पहले चला गया था। भारत अब जा रहा है।
चूँकि तर्क ये है कि विभाजन तो धर्म आधार पर ही हुआ था ना !
पाकिस्तान ने 1947 में स्वयं को इस्लामिक राष्ट्र कह दिया था लेकिन आपने कहा कि नहीं, हम धार्मिक राष्ट्र नहीं हैं। आपने बड़े मूल्य पकड़े- लोकतन्त्र, समाजवाद, प्रगतिशीलता, धर्मनिरपेक्षता; और उस मार्ग पर आप अपने देश को ले गए। और आज आप कह रहे हो कि हम धार्मिक राष्ट्र बनेंगे।
जी, आज गर हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात की जा रही है तो ये कैसे गलत है?
आज आप उस गड्ढे की ओर बढ़ रहे हैं जिस गड्ढे में पाकिस्तान 70 साल पहले जा कर अपनी गति को प्राप्त जो गया। उसका एक हिस्सा बंगलादेश पचास साल पहले अलग हो गया। अगर धर्म में ताकत होती तो ये क्यों होता? वो भी मुस्लमान था और ये भी मुस्लमान था। धर्म में तो कोई ताकत नहीं होती, ताकत तो दूसरी चीजों में होती है। अगर वो दूसरे मूल्यों को पकड़ता तो वो नहीं होता। लेकिन अब आप भी उसी तरफ जा रहे है।
उपन्यासों पर थोड़ी बात करें। आपका उपन्यास ‘वे वहां कैद हैं’ आज ज्यादा प्रासंगिक लग रहा है। ‘छुट्टी के दिन का कोरस’ अपने भाव, भाषा और शिल्प के कारण हिन्दी साहित्य की विशिष्ट धरोहर है। जिस तरह से ये लिखा गया है उससे लगता है कि उसके पीछे कोई वृहद योजना रही है। तो इसके लेखन का मूल्य उद्देश्य क्या रहा?
देखिए, इसको मैं अपना बहुत अच्छा उपन्यास मानता हूँ। ये बड़ा सघन उपन्यास है। इसको लिखने में मुझे बहुत आनंद भी आया और बहुत मेहनत भी पड़ी। उसके हर वाक्य में बड़ी गहराई से भाव गुम्फित है। और प्रयोग भी खूब हैं। उसकी कोई एक निश्चित कथावस्तु नहीं है। जैसे आप फ़ूलों को आप माला की तरह भी सजा सकता हो और गुलदस्ते की तरह भी सजा सकते हो।
आपने उसमें बहुत सी अन्तःकथाओं को गुम्फित किया है।
उस फॉर्म को लेकर भी थोड़ा सा है... असल में जब बहुत सारे चरित्र इकट्ठा हो जाते हैं, बहुत सी चीजें हो जाती हैं तो उनको एक कथा में पिरोना थोड़ा दिक्कत करता है। तो आपको ऐसा फॉर्म तलाश करना पड़ता हैं जिसमें आप इनको इस्तेमाल कर सकें। जब कभी ऐसा हो जाता है तो एक ‘कथा रहित कहानी’ का फॉर्म बनाना पड़ता है। तो मेरी कई कहानियां इस तरह की हैं जैसे ‘एक लेखक की एनाटमी’ भी इसी तरह की कहानी है। उसमें इतनी चीजें पास करने को हो गई थी की फिर मैंने एक फॉर्म ऐसा चुना जिसमें मैं सब समेट ले गया। क्योंकि एक निश्चित चरित्र उस कथा में नहीं आ सकता था। ‘छुट्टी का दिन का कोरस’ की भाषायी जटिलता और गहराई की से मुक्ति पाने के लिए मैंने ‘धर्मस्थल’ लिखा। उस। उसकी भाषा सरल है, सरल चरित्र हैं... फिर आगे चलकर बच्चों के लिए लिखा तो और सरल भाषा अपनाई, सरल कथा लिखी। ये खुद के साथ प्रयोग करने वाली बात है।
उसैन बोल्ट की तरह आप अपने मानक आप खुद ही ध्वस्त करते हैं। हहाहहा...
करना चाहिए, हर बड़े लेखक को ये करना चाहिए। अपने को हर बार खुद तोड़ना चाहिए। अपने को ही ध्वस्त करके नया निर्माण करना चाहिए। भाषा, फॉर्म, शिल्प... हर स्तर पर। अपने ही साथ प्रयोग चलता रहना चाहिए, यही उसका विकास है ।
आपका दूसरा उपन्यास 2000 ईस्वी में प्रकाशित परछाईं नाच जो कि बाजारवाद पर आधारित है। आज जिस तरह से पूँजी और तकनीक मिलकर व्यक्ति समाज, धर्म और राजनीति सब पर हावी है। ऐसे में गुजारिश है कि इसके अगले संस्करण में एक नई भूमिका इस गठजोड़ को लेकर केंद्र में लिखी जाए। पाठकों की इस आशा पर आप क्या कहना चाहेंगे?
देखिए, उपन्यास के पहले भूमिका ठीक नहीं मानी जाती। मैंने खाली ‘वे वहां कैद है’ में भूमिका लिखी है। और वो भी इसलिए लिखी है कि वो उपन्यास जो नब्बे के पहले का था... उसमें जो घटनाक्रम लिखा गया था वो बाद में असल में चरितार्थ हुआ।
हाँ, बिल्कुल हुआ।
और उससे हमें भी धक्का लगा जो हम नब्बे के पहले सोच रहे थे वो ही जब आँखों के सामने हुआ। कि ये कैसे हो गया? इसलिए भूमिका लिखी। फिर जब दूसरी भूमिका लिखी तो और बुरी स्थितियाँ हुई इसलिए लिखी। अगला संस्करण आए तो हो सकता है मैं फिर से भूमिका लिखूं। क्योंकि भूमिकाएं भी एक कथावस्तु का इतिहास बता रहीं है; क्रम बता रही हैं कि आज की तारीख में स्थितियाँ बदलते हुई आईं तो वो रिलेट हो जाती हैं । अब बाजारवाद…
उस पर पूंजी और तकनीक दोनों मिलकर के...
देखिए, पूंजी और तकनीक एक सच्चाई है। अगर हम ये कहे कि पूंजी बुरी चीज है या तकनीक बुरी चीज है तो ये भी हम नहीं कह पाएंगे। क्योंकि पूँजी तो हमेशा दुनिया में रही है ।
हाँ
सिंधु घाटी सभ्यता में भी थी। तकनीक को हम कह दें कि बुरी चीज है तो विकास होता क्या? तो वो आसान चीज नहीं है। इसके साथ दूसरी चीजें हैं कि पूंजी और तकनीक कहाँ तक, किस दूरी तक, क्या करें... उसको हम जस्टीफाई नहीं कर पाएंगे। हम उपन्यास लिख रहे हैं उससे ही जो कुछ निकलना है, निकलेगा।
दरअसल तो मनुष्य का लालच ही जो.....
अब हमने ‘परछाईं नाच’ में ‘मिनरल वाटर’ को लेकर लिखा जो उससे पहले कहीं नहीं था। साल 1997-98 में यह एक नया विचार था कि हम पानी बेचेंगे। गंगा जल शुद्ध करके...
हाँ , आज यह सच्चाई हो गई।
हां, आज सच्चाई हो गई। नब्बे के दशक में कहीं हिन्दू राष्ट्र की बात होती ही नहीं थी । आज दिख रही है... तो ‘परछाईं नाच’ की भूमिका में कुछ लिखने के लिए नहीं है क्योंकि उसमें भी कई चीजें हैं। आज बाजार में पूंजी और तकनीक का गठजोड़ तो वहाँ पहुँच गया है जहाँ हम लोग इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। हम लिख लें उसका कोई मतलब नहीं है ना कि पूँजी बुरी है, तकनीक बुरी है। हम तकनीक इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं या हम पूँजी का इस्तेमाल नहीं कर रहने हैं। तो ये हम कैसे कह दें?
जी
तो वो सवाल दूसरे हैं कि इनका क्या प्रभाव पड़ता है लोगों पर जीवन पर... उस पर तो बात हो सकती है।
‘धर्म स्थल’ में आपने भारत में प्रचलित अँग्रेजी न्याय व्यवस्था की गहरी पड़ताल की है। क्या शिक्षा व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करने वाली ऐसी ही रचना की उम्मीद पाठक आपसे कर सकते हैं?
देखिए, न्याय व्यवस्था की जो पड़ताल की है वो इसलिए कि इस न्याय व्यवस्था में पहले दिन ही अन्याय हो गया था... अगर मैंने शिक्षा व्यवस्था पर केंद्रित कोई उपन्यास लिखा तो फिर इतिहास पर तो जाना ही पड़ेगा। आज की शिक्षा व्यवस्था का ढांचा तो मैकाले का खड़ा किया हुआ है। अगर शिक्षा व्यवस्था पर बात होगी तो वहाँ से शुरू करनी ही पड़ेगी। अब उसमें एक समस्या है ।
क्या?
ये हम... नहीं कह पायेंगे कि अगर ये शिक्षा व्यवस्था नहीं होती तो हमारे पास कौन सी व्यवस्था थी। हमारे पास कोई अच्छी शिक्षा व्यवस्था तो थी नहीं। अगर अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का ये सिस्टम नहीं आता तो उसके पहले जो पढ़ाई कराई जा रहीं थीं, उस शिक्षा व्यवस्था की भी हम प्रशंसा नहीं कर पाएंगे।
क्या हमारे पास कोई अच्छा मॉडल नहीं था?
कुछ नहीं था हमारे पास। शिक्षा में धर्म के नाम पर रूढ़ियाँ बहुत थीं, सामाजिक और धार्मिक किताबें ही ज़्यादा थीं, वो भी उर्दू भाषा में। तो एक जो ज्ञान व सूचना का अन्तरराष्ट्रीय परिपेक्ष्य है, वो अँग्रेजी के माध्यम से आया। विश्व साहित्य आया और दूसरी सब चीजें आईं ।
और मनुष्य में तर्क करने की जो शक्ति है...
वो सब आया, तो हम उसकी बुराई इतनी जल्दी नहीं कर पाएंगे। ये तो हम बताएंगे कि प्रक्रिया क्या रही? वो कैसे आयी? लेकिन अच्छी-बुरी का फैसला हम नहीं कर पाएंगे। न्याय व्यवस्था में भी हमने अच्छा-बुरा नहीं कहा है। ये बताया कि जब शुरू हुई तो ऐसे था। और अन्याय पहले दिन हो गया था। एक अन्यायी न्याय व्यवस्था पहले दिन आ गई थी और आज तक है। वो बात कहनी थी, तो उस तरह कही।
राज्य, धर्म और समाज इन तीनों व्यवस्थाओं की आप मुखालफ़त करते हैं लेकिन व्यवस्था तो चाहता है ना मनुष्य? समाज अपने आप में एक व्यवस्था ही है।
बुरी व्यवस्था है। मैं पहले ही कह चुका हूँ। समाज बुरी व्यवस्था है। धर्म बुरी व्यवस्था है। राज्य बुरी व्यवस्था है ।
इनका निर्माण तो कहीं न कहीं व्यक्ति की सुरक्षा के लिए ही किया गया होगा न?
जिस चीज के लिए निर्माण किया गया अगर ये काम वो करते तो क्या बुराई थी? लेकिन वो तो गुलाम बनाने का काम करते हैं ना। ये व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं हैं, ये व्यक्ति की आजादी के पक्ष में नहीं हैं, वो तो अपने को सुरक्षित रखने का काम करते हैं। आज समाज आपको कोई ऐसा काम नहीं करने देगा कि उसके अस्तित्व पर खतरा हो। उसके ठेकेदारों पर खतरा हो। राज्य आपको कोई ऐसा काम नहीं करने देगा कि राज्य पर संकट आ जाए।
जी
वो कानून और दमन लेकर टूट पड़ेगा। धर्म आपको कोई ऐसा काम नहीं करने देगा जिससे धार्मिक पंडों, पादरियों और मुल्लाओं पर संकट आ जाए। आप सवाल उठाएंगे ये आपकी गर्दन काट देंगे। तो ये बने किस लिए थे? काश ये वो काम करते! क्या दिक्कत थी? ये सारी सत्ताएं मनुष्य विरोधी हो चुकी हैं।
मूल में तो इनका निर्माण अच्छाई के लिए ही हुआ था ।
बिल्कुल हुआ था। राज्य व्यवस्था इसलिए कि गई थी कि कोई किसी का शोषण नहीं करे, ताकतवर किसी गरीब को ना दबाए, अब राज्य ही ये काम कर रहा है। धीरे-धीरे उसने खुद ही इतनी शक्ति ले ली कि आज कहने लगे हैं– ये करो, वो करो, ये कपड़ा पहनो, ये कपड़ा मत पहनो। ये खाओ, वो मत खाओ। तो गुलामी और किसे कहते हैं? तो ये मैं तो शुरू से ही इनके खिलाफ हूँ और लिख रहा हूँ। मैं पहले दिन से उस काम को कर रहा हूँ।
इतिहास पर आपकी आगामी पुस्तक कौन-सी आ रहीं है ? स्वतंत्र भारत के इतिहास पर आपने नेहरू से लेकर इंदिरा के कालखण्ड पर एक पुस्तक लिखने का वादा पाठकों से किया था।
नहीं, वो आ रही है। वो पेंगुइन से है। प्रकाशन के लिए तैयार हो रहीं हैं। उसका नाम है "भारतीय लोकतन्त्र का कोरस : कुछ बिसरी बिखरी ध्वनियां" 1950 से लेकर 12 जून, 1975 पहला खंड है। 12 जून, 1975 को इंदिरा गांधी का हाई कोर्ट का एक जजमेंट आया था जिनमें जिसमें उनके चुनाव को रद्द कर दिया गया था। उसके बाद 25 जून से आपातकाल होता है। उसके बाद दूसरा खंड होगा जो 25 जून 1975 से जनवरी, 1980 तक जाएगा जब इंदिरा गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बनी। तो इसमें लोकतन्त्र की पड़ताल है। एक खंड तैयार हो गया है, दूसरा लिख रहा हूँ।
उसके आगे बाबरी विध्वंस और कश्मीर समस्या को लेकर भी इतिहास की पुस्तक की कोई योजना है ?
नहीं, ये मेरी इतिहास की आखिरी पुस्तक होनी चाहिए। इसके बाद इतिहास की कोई पुस्तक नहीं लिखूँगा। बहुत मेहनत लगती है इतिहास लेखन में। बाकी मैं टुकड़ों में इतिहास लिखता ही रहूँगा जो ‘अकार’ के ओडिटोरियल में आता रहेगा। अभी मैकाले पर लिखा इस बार के अंक में उसमें इतिहास भी है और वर्तमान स्थिति भी है। ‘अकार’ के अंक-60 में लिखूँगा यूक्रेन और रूस पर। तो अब इतिहास आएगा तो इसी तरह आएगा टुकड़ों-टुकड़ों में।
सर, आप व्यापार और साहित्य लेखन दोनों एक साथ कैसे कर पाते हैं?
मेरा अपना कोई व्यवसाय नहीं है। मैं जब एम.ए. कर रहा था तब मेरे भाईसाहब ने कहा कि फैक्ट्री आया करो, तीन घंटे के दो सौ रुपये महीना देंगे। ये बात है 1974-75 की। दो सौ रुपए उस जमाने में बहुत थे। मैं तीन घण्टे काम करता था और चला आता था। दो-चार साल मैंने यही किया। चलता रहा... सन 80 में हमारे यहाँ एक बहुत बड़ी हड़ताल हुई। सौ एक मजदूर थे हमारे यहाँ। तब कानपुर चमड़े का बड़ा केंद्र था। मैंने फैक्ट्री की तरफ से उन लोगों से मुठभेड़ की। उसके बाद मैं फैक्ट्री का प्रोडक्शन देखने लगा। मजदूरों के साथ उठना-बैठना उतना ही मैंने किया। उससे पैसे मिलते रहे, जॉइंट फैमिली थी, कोई दिक्कत थी नहीं... बस इतना ही किया।
कभी फैक्ट्री में बैठकर भी लिखा ?
हाँ, फैक्ट्री में बैठ कर कहानियां तब भी लिखता था और आज भी लिखता हूँ। सुबह दस बजे जाता हूँ, एक-दो बजे लौट आता हूँ।
हाँ, नियति और पुनर्जन्म मे विश्वास करते हैं ?
पुनर्जन्म पर तो नहीं करता, नियति पर... मैं मान लेता हूँ कि बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं होता। वो किसके हाथ में है वो? मैं नहीं जानता। अनिश्चितता ही नियति है।
क्या आप क्षणवाद में विश्वास करते हैं?
नहीं, क्षणवाद में नहीं, कोई विश्वास नहीं है। जहां तक सोच सकता हूँ, कर सकता हूँ, प्लानिंग के साथ काम करता हूँ, योजनाएं बनाता हूँ।
आपके पात्र क्षण में जीते हैं। भविष्य की कोई चिंता नहीं है।
क्षणवाद से आपका मतलब है कि क्षण में जी रहे हैं। (सोचते हुए ) वो क्षण कौन-सा है ? उस पर निर्भर करता है। जैसे अभी हम लोग खाना खा रहे थे तो खाना हिसाब से खा रहे थे। भविष्य की चिंता नहीं और खाते ही चले जाए, ऐसा तो नहीं है। अगर क्षणवाद का मतलब है कि सब कुछ भूल कर जी रहे हैं तो मैं ऐसा नहीं करता। मैं विवेक के साथ क्षण को जीता हूँ।
हाँ, मृत्यु के प्रति आपमे जो गहराव और चमकदार आकर्षण है इसके स्त्रोत क्या हैं? क्या भारतीय उपनिषद् की परम्परा या कोई पाश्चात्य दार्शनिक या निजी बोध ?
देखिए मृत्यु की बात तो पूरी दुनियां में सब जगह एक ही तरह से है वो कोई भी धारा हो चाहे कुछ हो। निजी बोध भी कोई विशेष नहीं, सबके साथ होता है लेकिन मृत्यु एक महत्वपूर्ण पक्ष है जीवन का। दो चीजें हैं जीवन और मृत्यु। आप जन्म को मानते हो तो मृत्यु भी है ही । जीवन जितना महत्त्वपूर्ण है मृत्यु भी इतनी ही महत्वपूर्ण है। और कुछ लोगों के लिए मृत्यु बहुत कष्टकारी होती है तो उनके लिए वह मुक्ति है, वहाँ वह अच्छी भी है और "तू कहाँ थी ए अजल नामुरादों की मुराद, मरने वाले राह तेरी उम्र भर देखा किए।" तो ऐसे भी होती है। तो मृत्यु अंततः मुक्ति है। इसी में भी जीवन का समापन है। तो मुक्ति तो है। उस जीवन से। ज़्यादातर लोग मृत्यु तक पहुंचते-पहुंचते अपना पूरा जीवन जी लेते हैं और मृत्यु तक दुर्बल, कमजोर भी हो जाते हैं। बहुत कुछ ऐसा देख लेते हैं जो जीवन में नहीं देखा वो मृत्यु में देख लेते हैं। उसमें अकेलेपन की त्रासदी भी है, बीमारी भी है... ये सब कुछ है। तो अंततोगत्वा मृत्यु मुक्ति है। इसलिए वो उतनी चमकदार भी है और दमदार भी है। अनिवार्य और अंतिम सत्य है उसके बाद कुछ है नहीं। मृत्यु तो बहुतों को आकर्षित करती है इसलिए। वहाँ तुम्हें पहुँचना है ना। हमें जाना तो वही हैं। तो कैसे दिमाग से उतरेगा?
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| विष्णु कुमार शर्मा |
तो मृत्यु का बोध क्या जीवन का कुछ द्वार खोलता है, उसे कुछ आसान बनाता है? या मृत्यु की स्वीकृति?
जीवन को आसान नहीं बनाता। देखिए स्वीकृति भी नहीं है। कौन मरने के बाद सोचता है? हम ही नहीं सोचते। और हाँ ये हो सकता है कि कुछ लोग बहुत डरते हैं मृत्यु से। कोरोना में भी कितने लोग डरे मृत्यु से भयभीत हुए।
हाँ, भयभीत हुए।
मुझे भी अच्छा खासा कोरोना हो गया था लेकिन मुझे डर उतना नहीं लगा। मृत्यु से उस तरह डर नहीं था । ये एक सहज स्वीकृति तक बात आ जाती है । आरामदेह स्थिति है। कुछ लोग उससे बहुत डरते हैं कि ये ना हो।
जी, बहुत शुक्रिया।
विष्णु कुमार शर्मा
शिक्षक कॉलोनी, गुप्तेश्वर रोड, दौसा (राजस्थान) - 303303
9887414614, vishu.upadhyai@gmail.com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा


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