पितृसत्तात्मक व्यवस्था और स्त्री की अदम्य जिजीविषा की इयत्ता का द्वन्द्व
( कमल कुमार के ‘मैं घूमर नाचूँ’ उपन्यास के विशेष संदर्भ में)
- अवनि शर्मा एवं विमलेश शर्मा
शोध सार : स्त्री को दैवी या अतिमानवीय कहकर उसे महिमामंडित करने और उसे उसके अधिकारों से वंचित करने की एक ऐतिहासिक परम्परा हर देश और कालखण्ड में रही है। इन ऐतिहासिक परम्पराओं ने स्त्री को जीवन के हाशिए पर धकेलने की साज़िश रची है जिनका सामना वह सामाजिक बंधनों में आज भी कर रही है। आधुनिक स्त्री तमाम प्रवंचनाओं के साथ नकार की इस कुहरीली छाया से निकलने का प्रयास कर रही है। हालाँकि उसके जीवन में दरकने हैं पर वह अपनी ही राख से चिनगारियाँ बीनकर आगे बढ़ रही है औऱ साहित्य उसकी इसी जीवट को आवाज़ दे रहा है। यह शोध ‘मैं घूमर नाचूँ’, उपन्यास के माध्यम से राजस्थान के स्त्री सरोकारों को, यहाँ की स्त्री के संघर्षमूलक अवदान और उसकी विकास यात्रा तथा साथ ही स्त्री निर्मिति की चिरन्तशील स्वावलम्बी प्रक्रिया को लक्षित करने का प्रयास है।
बीज शब्द : समाजशास्त्र, आधुनिकता,स्त्री कथा-लेखन, स्त्री विमर्श, स्त्री-संघर्ष, स्त्री-निर्मिति,सा हित्य का समाजशास्त्र, राजस्थान का कथा-साहित्य, पितृसत्तात्मक संरचना, रूढ़िवादिता, सामाजिक जड़ता, इयत्ता (सीमा)।
मूल आलेख : हर कालखण्ड में समाज को समझने की आधारभूत इकाई तद्युगीन साहित्य और साहित्यिक रचनाएँ रहीं हैं। अध्ययन के इसी क्रम में आधुनिक समाज, जिसे समाजविज्ञानी उसकी आकारिकी के कारण जटिल समाज की संज्ञा देते हैं, की सामाजिकी और सांस्कृतिकी को समझने की कुंजी भी साहित्य ही है। वस्तुतः हर रचना की निर्मिति के पीछे समाजशास्त्रीय दृष्टियों की अनेक परतें होती हैं और यही कारण है कि रचना की निर्मिति इकहरी नहीं हो सकती। इसी निर्मिति में साम्प्रदायिकता, सामाजिकता, शोषण और दमन की समझ, स्त्री और वंचित समाज के प्रति दृष्टिकोण, साहित्य और समाज पर बाज़ारीकरण का दबाव और उसी के तहत स्त्री का वस्तुवादी चित्रण आदि बिन्दुओं पर साहित्य का कथ्य और उसमें लिपटी भाषिक अभिव्यक्तियाँ वेगवती नदी की तरह अनेक मोड़ लेती चलती है। संभवतः इन्हीं मोड़ों पर साहित्य के विमर्श अपनी ज़गह बनाते हैं। वस्तुतः हिन्दी के सारे विमर्श भारतीय समाज में फैली जड़ताओं, संकीर्णताओं और कुरूपताओं के विरुद्ध खड़े हैं। साहित्य समाज की विसंगतियों और विकास का उद्घाटन इस तरह करता है कि किसी रचना विशेष के कथापात्र के बाद आने वाली पीढ़ी उन्हें पहचान ले। साहित्यकार का यह उद्घाटन कर्म जड़ता की सतह को तोड़ने का कर्म है। “प्रेमचंद ने नारी की पराधीनता का चित्रण करते समय समाज के उन सभी वर्गों को उभार कर सामने ला दिया है,जिनके कारण नारी पराधीन है। प्रेमचंद के सभी उपन्यासों में किसानों की मुक्ति का आंदोलन नारी-स्वाधीनता के भाव से जुड़ा हुआ है। समाज की सर्वाधिक शोषित ये दोनों शक्तियाँ उनके उपन्यासों में एक साथ एक तरह से चित्रित होती हैं। वास्तविकता को परत-दर-परत उद्धाटित करने में प्रेमचंद का ज़वाब नहीं। ‘गोदान’ के होरी का साक्षात् शोषण कोई नहीं करता फिर भी होरी तबाह रहता है, तबाह वह इसलिए है कि अपने शरीर में लगी हुई ज़ोंको को नहीं देख पाता। प्रेमचंद ने इस उपन्यास में भारतीय समाज का एक्स-रे करके रख दिया है और इसी को कहते हैं साहित्यकार का उद्घाटन-कार्य। सतह को इसी तरह तोड़ने का काम गहराई है।”1 साहित्य और समाजशास्त्र यहाँ एक ही साथ खड़े नज़र आते हैं।
साहित्य में सामाजिकता और उसकी गहराई पर बात करते हुए नामवर सिंह ने पलायनवादियों पर ‘आन्तरिक सामाजिकता’ का ज़ुमला उछाला है। “सच पूछिए तो सामाजिक वास्तविकता में प्रवेश करने पर ही हम अपने भी मन में प्रवेश करते हैं। जिन्होंने समाज की वर्तमान विषमता से आँखें मूँद ली है, उन्हें अपने जीवन के बारे में भी सोचने-विचारने से छुट्टी है और यदि वे सोचते-विचारते भी हैं तो केवल निजी ज़रूरत की बातें। उनके सोचने में गहराई नहीं होती; इसीलिए उनमें मानवता नहीं होती। इस प्रकार गहराई की व्यापकता मानवता तक जाती है।”2 किसी भी समाज के विकास के साथ उस समाज की भाषा और साहित्य में नवीन प्रवृत्तियों का विकास होता है और इस परिवर्तन को साहित्य की समाजशास्त्रीय दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है। वस्तुतः “किसी रचना की अंतर्वस्तु में ही समाज व्यक्त नहीं होता है...रचना के हर स्तर पर अर्थात् उसकी अंतर्वस्तु, संरचना, शिल्प और भाषा में समाज की अभिव्यक्ति होती है और रचना के माध्यम से समाज की खोज उसके विकास या ह्रास के मापदण्डों पर की जाती है।”3 साहित्य का समाजशास्त्र वस्तुनिष्ठता एवं आत्मनिष्ठता के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करता है। प्रसिद्ध साहित्यकार गुलाब राय ने लिखा है, “समाजशास्त्रीय विश्लेषण पद्धति एक वैज्ञानिक पद्धति है। वह तथ्यों के अवलोकन, परीक्षण एवं विश्लेषण की प्रणाली है, तर्क आश्रित हैं तथा वस्तुनिष्ठ अध्ययन में निष्ठा रखती है। वस्तुनिष्ठता से उसका आशय एक ऐसी योग्यता से है, जिसके द्वारा अनुसंधानकर्ता स्वयं को उन दशाओं से पृथक रख सके जिनका कि वह स्वयं अंग है तथा किसी तरह के लगाव अथवा भावना के स्थान पर, पक्षपात रहित तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त तर्कों के आधार पर विभिन्न तथ्यों को उनके स्वाभाविक रूप में लक्षित करने से है।”4
“साहित्य रचना की रचना-प्रक्रिया में समाज, लेखक और साहित्य परस्पर एक दूसरे को इस तरह प्रभावित करते है कि इनमें प्रत्येक क्रमशः परिवर्तित व विकसित होता रहता है-समाज से लेखक, लेखक से समाज और साहित्य से पुनः समाज।”5 प्रत्येक साहित्यिक रचना पर समाज की विशिष्ट छाया रहती है और लेखक और समाज के इस देय-प्रदेय से दोनों ही परस्पर लाभान्वित होते हैं। “समाज यदि एक ओर लेखक के व्यक्तित्व के माध्यम से साहित्य रूप ग्रहण करते हुए व्यक्ति की सीमा से सीमित हो जाता है तो दूसरी ओर व्यक्ति की विशेषता के स्पर्श से विशिष्ट हो उठता है। इसीलिए प्रत्येक सार्थक रचना समाज के जीवन में नवीन योगदान होती है। “साहित्य में व्यक्त समाज का प्रत्येक सफल चित्र समाज को पहले से कुछ बड़ा बना देता है। हर श्रेष्ठ रचना से समाज महत्तर और अग्रसर होता है। और ऐसी रचना करके स्वयं रचयिता भी महत्तर होता है- महत्तर केवल यश के क्षेत्र में नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी। ऐसी रचना स्वयं लेखक की मानसिक तथा आध्यात्मिक सत्ता को समृद्ध करती है।”6 साहित्य की विषयवस्तु लेखक की कल्पना से आती है, परन्तु लेखक की कल्पना का सम्बन्ध भी समाज से होता है। गोदान का होरी हो, धर्मवीर भारती की कनुप्रिया हो या रंगभूमि का सूरदास उनका चित्रण समाज के बिना संभव नहीं है। बकौल मैनेजर पाण्डेय, “समाज में कलाकार की बदलती हुई स्थितियों का विवेचन पहले कला के इतिहास के अन्तर्गत होता था। यूरोपीय समाज के विकास के साथ कला के विकास का इतिहास लिखने वालों ने यह किया है। अर्नाल्ड हाउजेर ने कला का सामाजिक इतिहास नामक विशाल ग्रन्थ लिखा है। उसके चार खण्डों में विभिन्न कालों और समाज व्यवस्थाओं में कलाकारों की बदलती सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से कलाकारों और साहित्यकारों की सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण बीसवीं सदी में विकसित हुआ। यही पूँजीवादी समाज में कलाकारों और साहित्यकारों की जटिल त्रासद स्थितियों को समझने के प्रयत्न का परिणाम है। वैसे स्वतन्त्र कलाकार या साहित्यकार की धारणा भी आधुनिक युग की ही देन है।”7 साहित्य को समाज की दृष्टि से समझने-परखने की मीमांसापरक और अनुभववादी दो धाराएँ हैं। “पहली धारा साहित्य में समाज की अभिव्यक्ति की खोज करती है और दूसरे समाज में साहित्य की वास्तविक स्थिति की पहचान पहले को प्रायः साहित्यिक, समाजशास्त्री या समाजशास्त्री आलोचना कहा जाता है और दूसरी को साहित्य का समाजशास्त्र।”8
समाज और साहित्य में कार्यकारण संबंध है। समाज की सत्ताएँ और वर्ग, साहित्य में भी प्रतिभासित होते हैं। हिन्दी साहित्य के द्विवेदी युग में इसे ही दर्पणवादी दृष्टिकोण कहा गया है; परन्तु इस दृष्टिकोण की सीमा है कि यह रचनाकार की योग्यता और कल्पना की उपेक्षा करता है। समाज में स्त्री, पुरुष, तृतीयलिंगी, अनेक वयधारी मनुष्य, धर्म, वर्ग, जाति, समुदाय और मानवेतर प्राणी स्थान पाते हैं। लेखक इन वर्गीय-जातीय संकल्पनाओं के माध्यम से किसी सामाजिक यथार्थ को रचना में प्रतिबिम्बित ही नहीं करता वरन् उसकी पुनर्रचना भी करता है। अतएव आज के साहित्यिक समाजशास्त्री रचना की अस्मिता को स्वीकार करते हुए समाज से उसके संबंध का विश्लेषण करते हैं। इसी समाजशास्त्रीय प्रत्यय में स्त्री और स्त्री-निर्मिति की भी हर कालखण्ड में अलग-अलग भूमिका और सामाजिक स्थिति रही है। भारतीय वाङ्मय स्त्री को सृष्टि की केन्द्रीय सत्ता और महाचिति कहकर संबोधित करता रहा है; परन्तु कभी महाचिति या शक्तिरूपा कही जाने वाली स्त्री आज के आधुनिक समाज में किस संज्ञा से पहचानी जा रही है और उसके पीछे का समाजशास्त्र क्या है, यह आज का साहित्य बताता है। जगत् के पोर-पोर में रमने वाली वह चैतन्य शक्ति स्त्री क्या वाक़ई अपने उस पूर्व विवेच्य अस्तित्व से आज कोई सरोकार या उसकी छाया मात्र से भी समाज के दृष्टिकोण से साम्य रखती है, यह पक्ष विचारणीय होने के साथ-साथ कई कालखण्डों से अनुत्तरित भी रहा है। यह सच है कि स्त्री अभूतपूर्ण विलक्षणता और शक्ति को लेकर जन्मती है; परन्तु समाज के द्वारा उपेक्षा और उसके स्वार्थ के कारण वह शनै: शनै: समाप्त हो जाती है। दरअसल स्त्री का जीवन उसके जन्म से लेकर अंत तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था के इशारों पर डूबता-उतराता रहा है। यह कहन कई मनीषाओं को नकारात्मक लग सकता है पर यह हमारे समाज की तल्ख़ सच्चाई है। इसके बरक्स जबसे स्त्री ने इस अभिशाप से मुक्ति के लिए अपने जीवनानुभवों को आत्माभिव्यक्ति के लिए चुना है, साहित्य में एक नवीन धारा का सूत्रपात होता दिखाई देता है। स्त्री जीवन का रागात्मक पक्ष सृष्टि के लिए जितना आह्लादकारी और अनिवार्य है उसके उच्छ्वासों और अँधेरे मन के नम तहखानों का दुःख उतना ही दारुण और यातनापूर्ण है। इस दु:खद पक्ष को अनेक रचनाकारों ने प्रामाणिक अभिव्यक्ति प्रदान की है। यह सत्य है कि स्त्री एक स्वायत्त संस्था है परन्तु यह समाज उसे नगण्य बनाकर उसके हक़ूक को ज़मीदोज़ कर देना चाहता है।
अरस्तू के अनुसार,“औरत केवल पदार्थ है, जबकि पुरुष गति है।… अपनी भावी पीढ़ी को पूरी तरह अपने वश में करने के लिए पुरुष ने औरत को अधीनस्थ किया और जगत् पर प्रभुता चाही।”9 एक ज़गह वे लिखते हैं, **पुरुष स्वभावतः श्रेष्ठ है और स्त्री निम्न, पुरुष शासक और स्त्री प्रजा है। यह वशीकरण शरीर के साथ-साथ मन और मस्तिष्क को कुंद करने की हदों तक सदियों से अनवरत चलता रहा, चला आ रहा है। जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार , “किसी भी क्षेत्र में स्त्री को कोई सुविधा कभी नहीं मिली। इसीलिए आज स्त्रियाँ नयी स्थिति की माँग कर रही हैं।”10 यहाँ अक़सर इस नयी स्थिति या स्त्री स्वातंत्र्य को स्वेच्छाचारिता से जोड़ लिया जाता है और कई स्त्री झंडाबरदारों ने इस ओर क़दम भी बढाए हैं परन्तु यह कोण स्त्री स्वातंत्र्य और उसके बुनियादी अधिकारों की लड़ाई को कमज़ोर ही करता है। स्त्री के पक्ष की बात करते समय यह ध्यान रखा जाए कि वह एक स्वतंत्र जैविक सत्ता है और उसके जीवन जीने संबंधी कुछ बुनियादी अधिकार हैं। वे अधिकार उसके जीवन को संभावनाशील और सर्जनात्मक बनाते हैं इसलिए यदि सत्ता केवल एक वर्ग पर केन्द्रित रही तो ऐसा ध्रुवीकरण समाज में विचलन ही पैदा करेगा। “यह ठीक है कि आज हम एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं। इस दुनिया में आज भी सारी सत्ता, सारे मूल्य और संस्थाएँ पुरुषों के हाथों में हैं। यदि स्त्रियों को कुछ अधिकार दिये भी गये हैं तो वे अमूर्त रह गए हैं। वे रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों के कारण व्यावहारिक जगत् में लागू नहीं किए जा सकते। इसलिए अब भी स्त्री की पूरी पकड़ दुनिया पर नहीं है। कहने को स्त्री और पुरुष समान हैं , किंतु वास्तव में इन दोनों में बहुत बड़ा भेद क़ायम है।”11
हिन्दी में अस्मिता शब्द का प्रयोग ‘आइडेण्टिटी’ के समानार्थी और उसके अनुवाद ‘पहचान’ के लिए किया जाता है। अस्मिता का अर्थ उपेक्षित आवाज़ों के अर्थ में अधिक आत्मवाची और स्वत्व का बोधक है। जॉन ग्रे की पुस्तक ‘मेन आर फ्रॉम मार्स, विमेन आर फ्रॉम वीनस’ और सिमोन द बोउवार की ‘द सैकण्ड सैक्स’ स्त्री-पुरुष की प्रकृति और संस्कृति को समझने के अलग-अलग आयाम लेकर उपस्थित होते हैं। इन्हीं आवाज़ों के उग्र सिंहनाद ने स्त्री विमर्श का प्रारंभ किया। स्त्री-अस्मिता केन्द्रित लेखन स्त्री से जुड़े तमाम पक्षों पर विश्वसनीय बहस करता है। वह उन सभी मुद्दों पर आवाज़ उठाकर उसकी पैरवी करता नज़र आता है, जिसकी प्रेत-छाया में गाहे-बगाहे कभी परिवार-समाज और उसका ही हमवर्ग उसे अँधेरे तहखानों में धकेल देता है। समाज साहित्य में रूपायित होता है इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श को पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (भाग्यवती), प्रेमचंद (गोदान, सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि आदि), रांगेय राघव (गदल, लखिमा की आँखें आदि), जैनेन्द्र से लेकर नयी कहानी त्रयी में शामिल राजेन्द्र यादव (सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, अनदेखे अनजान पुल), कमलेश्वर (काली आँधी, आगामी अतीत, अनबीता व्यतीत, तीसरा आदमी, डाक बँगला आदि) तथा अद्यावधि तक समकालीन कथा-साहित्य के अनेक रचनाकारों ने मुखर रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की है। हिन्दी साहित्य में स्त्री-लेखन के इसी पक्ष को प्रामाणिक और स्वानुभूत रूप से सामने लाने वाली स्त्री रचनाकारों में कृष्णा सोबती (मित्रो मरजानी), उषा प्रियम्वदा (रुकोगी नहीं राधिका,पचपन खंभे लाल दीवारें और शेष यात्रा), मन्नू भण्डारी (आपका बंटी), ममता कालिया (बेघर, एक पत्नी के नोट्स), मृदुला गर्ग (अनित्य, चितकोबरा, मैं और मैं, कठगुलाब), चित्रा मुद्गल (आवाँ) ,मेहरुनिस्सा परवेज़ (कोरजा), नासिरा शर्मा (शाल्मली, ठीकरे की मँगनी, पारिजात), राजी सेठ (तत्सम), चंद्रकांता (अपने-अपने कोणार्क), प्रभा खेतान (पीली आँधी, छिन्नमस्ता), मैत्रैयी पुष्पा (इदन्नमम , चाक, अल्मा कबूतरी) , अल्का सरावगी (शेष कादम्बरी, दूसरी कहानी), गीतांजली श्री (माँई, रेत समाधि), मधु काँकरिया (सलाम आख़िरी), सूर्यबाला (मेरे संधिपत्र, सुबह के इंतज़ार तक), मनीषा कुलश्रेष्ठ (शिगाफ़, मल्लिका) शामिल हैं, जो स्त्री मुद्दों को व्याप देती हुई उन पर सजग विमर्श करती हैं। यह लेखन उल्लास, जिजीविषा और संघर्ष की त्रिवेणी है, जिसके माध्यम से वह यह बयां करता है कि सामाजिक व्यवस्थाएँ स्त्री और पुरुष को लेकर जो भी धारणाएँ रखती रहीं हो वह उन्हें स्वीकारने को बाध्य नहीं है। यह लेखन पुरुष को विरोधी की तरह नहीं देखता और ना ही उसकी स्वेच्छाचारी मानसिकता को ही तरज़ीह देता है वरन् यह अनावश्यक घेरेबंदी और जकड़बंदी को तोड़ने की पैरवी करता है।
राजस्थान-हरियाणा जैसे राज्यों में स्त्री की सामाजिक स्थिति और उसके विरुद्ध घट रही पितृसत्ता की प्रतिशोध की पुनरावृत्तियाँ अत्यन्त चिंताजनक हैं। राजस्थान के हिन्दी साहित्य में स्त्री सरोकारों और स्त्री-पुरूष संबंधों की पड़ताल करते हुए अनेक उपन्यास लिखे गए हैं। शरद देवड़ा का प्रयोगधर्मी उपन्यास ‘टूटती इकाइयाँ’, घनश्याम प्रसाद शलभ का ‘आंलिंगन के ऑक्टोपस’, स्वयं प्रकाश का ‘ज्योतिरथ के सारथी’ और पानू खोलिया का ‘सत्तर पार के शिखर’ स्त्री जीवन और समता पर आधारित स्त्री-पुरुष संबंधों की झलक प्रस्तुत करता है। स्त्री रचनाकारों में दिनेशनंदिनी डालमिया (मुझे माफ़ करना, आहों की बैसाखियाँ, कंदील का धुआँ), प्रेमलता (अभिशप्ता), प्रभा सक्सेना (अन्तर्यात्रा, टुकड़ों में बँटा इन्द्रधनुष) आदि लेखिकाएँ स्त्री के मनोभावों और उसके संघर्ष का सूक्ष्म और विश्वसनीय अंकन करती हैं। राजस्थान की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को लेकर रचे गए हाल के उपन्यासों में गजानन माधव मुक्तिबोध राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखिता कमल कुमार का ‘मैं घूमर नाचूँ’ और लक्ष्मी शर्मा का ‘सिधपुर की भगतणें’ महत्त्वपूर्ण है। इस शोध-पत्र में हम ‘मैं घूमर नाचूँ’ के माध्यम से ही स्त्री के जीवन और जीवट का समाजशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन करने का प्रयास करेंगे। यह उपन्यास बताता है कि आधुनिक परिवेश में भी राजस्थान में रूढ़िवादिता और अंधविश्वास चरम पर हैं। इस उपन्यास की कहानी ‘पैराडाइम शिफ्ट’ अर्थात् स्त्री के सबलीकरण की कहानी है। आज भी इस तथाकथित आधुनिक और तकनीक से लबरेज़ परिवेश में राजस्थान में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास और दक़ियानूसी मानसिकता अपने चरम पर है और यह स्त्री जीवन को सतत लील रही है। लेखिका कमल कुमार ने ‘मैं घूमर नाचूँ’ उपन्यास का आधार पितृसत्ता की इन्हीं पतनोन्मुख खाइयों को बनाया है। उपन्यास इस थीम पर बढ़ता है कि- ‘हर व्यक्ति का जीवन एक महाभारत है।’ किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह नैतिक या अनैतिक किसी का भी पक्षधर हो सकता है। हर जीवन में कई असंगतियाँ-विसंगतियाँ और सीमाओं का उल्लंघन हैं। किसी एक सीधी-सी जीवन कहानी में अनेक मर्तबा कई मोड़, कई उपकथाएँ और कई अध्याय अनपेक्षित रूप से शामिल होते रहते हैं, उपन्यास इस तथ्य को घटनाओं के माध्यम से सिलसिलेवार चरितार्थ करता है। उपन्यास ‘कृष्णा’ नामक बाल-विधवा के जीवन पर केन्द्रित होकर भी बहुत सारे स्त्री चरित्रों और रूदालियों को समाहित करता हुआ एक विराट् फलक की सृष्टि करता हुआ स्त्री पीड़ा और उस पर हो रहे अत्याचारों की कलई खोलता नज़र आता है।
उपन्यास की स्त्री पात्र ‘कृष्णा’ वैधव्य शब्द का अर्थ तक नहीं जानती लेकिन परिवेश सृष्टि द्वारा प्रदत्त उसके सौन्दर्य भाव को कुचल देता है। उसे रंगों, तीज-त्योहारों से बेदख़ल किया जाता है और कृष्णा के कृष्णा होने के अधिकार से ही उसे वंचित कर दिया जाता है। दरअसल यह किसी एक कृष्णा की कहानी नहीं है वरन् हर उस कृष्णा की कहानी है जिसे जन्मते ही रेत के ढूहों में गाड़ दिया जाता है, आखातीज पर दुधमुँहे साथी के साथ विवाह के गठंबंधन में बाँध दिया जाता है , अपने पिता की ही उम्र के व्यक्ति के साथ या कि किसी रसूखदार के साथ ब्याह दिया जाता है। ऐसी ना जाने कितनी ही कृष्णाओं की आपबीती और कथा को यह उपन्यास आवाज़ देता है जिन्हें समाज कभी डायन, भूतनी, कुलक्षिणी, व्यभिचारिणी कहकर जहाँ एक ओर मासूम ज़िन्दगियों को लील जाता है तो वहीं दूसरी ओर वह अपनी आत्मरतिग्रस्त छवि में कुत्सित लालसाओं को पूरा करता है। इस उपन्यास का कथानक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ या कि स्त्री विषयक सोच और तयशुदा मुहावरों को बदलने की कोशिश कर स्त्री सशक्तीकरण की एक इबारत गढ़ने का प्रयास भी करता है पर साथ ही अनेक सवाल भी अनुत्तरित छोड़ जाता है कि- क्या स्त्री जीवन से संबंधित ऐसे फ़ैसले जो समाज के विपरीत जाते हैं उस जीवन को सहज रहने देते हैं? क्या स्त्री को उसके शरीर और आत्मा पर अधिकार प्राप्त हो पाया है? क्या समाज अपनी उपयोगिता के आगे भी स्त्री को देख-समझ पाया है? यदि साहित्यिक समीक्षा की दृष्टि से देखें तो उपन्यास की भाषा कथानक ,अंचल और पात्रानुकूल है परन्तु समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो इसकी भाषा और कथानक पितृसत्ता की बहुपरतीय संरचना के अनुरूप ही विविधवर्णी और तारतम्यता लिए हुए है। उपन्यास की पात्र योजना विषयानुकूल है। यह उपन्यास स्त्री -जीवन के बृहत्तर पक्षों को चित्रित करने के उद्देश्य को लेकर रचा गया है और आद्युपान्त यह सवाल उठाता है कि आख़िर औरत का धर्म क्या है ? धर्म की तलवार से उसे केवल उसे ही क्यों काटकर फेंक दिया जाता है ? आख़िर क्यों यह ज़रूरी नहीं है कि स्त्री के जीवन में जो कुछ भी होता है, या हो सकता है, या होना चाहिए , उसमें कोई संगति हो, कोई तारतम्यता हो ? यह उपन्यास सामाजिक ताने-बाने के बहिरंग को ही नहीं वरन् स्त्री के अन्तरंग को भी सच्चाई और ईमानदारी के साथ खोलता है।
राजस्थान का लोकमानस और संस्कृति -
‘मैं घूमर नाचूँ’ उपन्यास जिस प्रकार विषय को गंभीरता से उठाता है, उतनी ही गंभीरता से उपन्यास में वर्णित अंचल विशेष की संस्कृति, भाषा और उसके भौगोलिक विवरण को भी सामने लाकर रख देता है। उपन्यास में अरावली की पहाड़ियाँ हैं, रेत के धोरें हैं, राजे-रजवाड़े हैं , मीठे पानी की नदियों और खारे पानी की झीलों का ज़िक्र है और साथ ही इसी भूगोल के बीच ज़िक्र है यहीं पनपती अनगिनत रूदालियों का। “कहते हैं कभी थार प्रदेश भी खूब हरा-भरा था। यहाँ कई नदियाँ बहती थीं। चंबल, बेड़च, बनास, गंभीरी, लूनी,माही , सरस्वती और बाणगंगा। इतना ही नहीं यहाँ मीठे पानी की भी नदियाँ थीं। पिछौला, राजसमन्द, आन्तसागर, पुष्कर इत्यादि जिससे लोग पेयजल की आपूर्ति करते। खारे पानी की झीलें- साम्भर, डीडवाना, पचपद्रा लूणकरणसर थीं। खारे पानी से नमक बनाया जाता था।पठार,जंगल और उनमें रहते लोग, शहरों में, कस्बों में, गाँवों में और घुमन्तु या टिक जाने वाली जनजातियाँ। उसे जसमा रुदाली और उसकी बेटी की याद आई थी। कैसा जीवन था इनका। काले कपड़ों में सिर से पेट तक ढकीं – ये औरतें जीते जीं भी प्रेतनियाँ लगती थीं। फिर बड़े घरों में मृत्यु का शोक मनाने के लिए उनका रोने का धंधा। फिर सोने की-सी देह वाली सोनारी की याद आ गई थी।”12 उपन्यास केवल भौगोलिक परिवेश की ही बात कहकर पाठक से राजस्थान का परिचय नहीं करवाता है वरन् वह क़दम-क़दम पर यहाँ के अंधविश्वास , रूढ़ मानसिकता, मृत्यु के जश्न सरीखी परंपराओं, मनुवादी व्यवस्था के षडयंत्रों में दमकती सामंती व्यवस्था, भ्रूण हत्या, बाल-विवाह, डायन -प्रथा जैसी कुप्रथाओं से भी अनेक उपकथाओं के माध्यम से भी रूबरू करवाता है। उपन्यास का वैशिष्ट्य उसके कहन में है और इस कहन में अनेक लोक-कथाएँ भी स्थान पा गई हैं। ‘बरिस अठारह छत्री जिए, आगे जीवन को धिक्कार’ और ‘मरणा नूँ मंगल गिणै, समर चढ़ै मुख नूर’ के माध्यम से उपन्यास में कहीं राजपूताना की सार्वभौम सत्ता का उल्लेख है तो कहीं तलवारों की झंकार के साथ कुम्भा की वीणा की मधुर स्वर-तानें। उपन्यास पग-पग पर लोक संस्कृति के रंग उरेहता हुए इसकी कथा-भित्तियों को सजाता है। “यहीं है चित्तौड़ , रणथम्भौर और जालौर के दुर्ग जहाँ अपने वीर योद्धा पतियों के बलिदान के बाद उनकी वीरांगनाओं ने जौहर किया, वे पूजनीय बनीं। लोक संस्कृति व जनमानस की वे सच्ची देवियाँ थीं। लेकिन मीरा, मेवाड़ की मीरा अपनी जाति की औरतों से अलग विद्रोह की अग्निशिखा थी जिसने अपने प्रेम के लिए परिवार और समाज का विरोध सहा। विष का प्याला पिया और अडिग रही और अपने प्रेम की राह पर चलती रही।”13 राजस्थान के लोक-रंगों को समेटता-सहेजता उपन्यास कभी नगाड़ों,ठोल, अलगोझों, सारंगी , पुंगी और रावणहत्था की रागीनियों के साथ ढाढी, मिरासी, पाटर नट, कलावंतों की टोलियों के प्रेम,विरह, भक्ति और वात्सल्य में डूबे लोक-स्वर को सुनाता है को कभी गुड़्ल्यों और गड़वा नृत्यों के हर्षोल्लास की थिरकन का एहसास कराता हुआ पाठक को कुओं-बावड़ियों, झरोखों,छतरियों, देवलों और मंदिरों के प्रदेश में लाकर खड़ा कर देता है। इस लोक संस्कृति के बीच जनजातियों के दुःख की कहानी कहता कथानक कभी ‘खैंखरा’, ‘कुल कामड़ी’ जैसे खेलों का ज़िक्र करता है तो कभी ‘कल्लो’ सरीखी गरासिया लड़कियों के भाग्य के स्याह पक्ष को सामने रखता है। “उनकी इज़्जत के साथ राजपूत पुरुष खेलते, उन्हें अपने सुख और भोग के लिए जैसा चाहते, इस्तेमाल करते। कल्लो का क्या हुआ ताई ने नहीं बताया था। ...फिर सहरिया, भानूमल जो बंधुआ मजदूर था, जीवन दुःख, पीड़ा और प्रताड़ना की कहानी कहता पर तो भी जब मौका मिलता वे लोग नृत्य और संगीत में डूब जाते। वे नृत्य और संगीत में माहिर थे। जो अपनी तकलीफ को नाच-गाकर भुलाना जानते थे। इन सहरियों की अनगिनत कहानियाँ राजस्थान के लोकमानस का हिस्सा है।”14 जो शोषित होता है वह अपनी तकलीफ भूलना जानता ही है क्योंकि इसके अलावा ओर किसी चीज पर उसका वश नहीं चलता है, यही जनजातियों के साथ-साथ स्त्री जीवन की कटु सच्चाई है। उपन्यास व्यवस्थाजनित सामाजिक लोकाचार की हर तह पर चोट करता है।
‘औरत जन्म से औरत नहीं होती वरन् बढ़कर औरत बनती है।‘ -
सिमोन द बोउवार के अनुसार कोई भी जैविक, मनोवैज्ञानिक या आर्थिक नियति आधुनिक स्त्री के भाग्य की अकेली नियंता नहीं होती। पूरी सभ्यता ही इस अजीबोगरीब जीव का निर्माण करती है। समाज और उसकी पौरुषेय मानसिकता जिसे पितृसत्तात्मक मानसिकता के नाम से जाना जाता है स्त्री के लिए नियमों के मकड़जाल से परिवेश बुनती है। यही परिवेश उसकी इयत्ता का नियंता बन जाता है। “पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री के जीवन पर नियंत्रण को वैध एवं स्थायी बनाने के लिए एक ऐसे समाजशास्त्रीय विधान की संरचना की, जहाँ परिवार, धर्मा, न्याय , शिक्षा एवं मीडिया ने स्त्रीविरोधी नियमों, वर्जनाओं , आचार संहिताओं, रीतियों एवं दंड संहिताओं पर स्वीकृति की मुहर लगा कर पुरुष की वर्चस्ववादी स्थिति मजबूत की। ये संस्थाएँ एक-दूसरे से शक्ति लेकर स्वयं को पुष्ट करती हैं और संचार माध्यमों के जरिए पुरुष की लैंगिक श्रेष्ठता को ईश्वर-प्रदत्त स्थिति घोषित करती हैं।”15 उपन्यास में कृष्णा ऐसा ही पात्र है जो बाल विधवा है, जिसे यह नहीं पता कि विधवा शब्द का अर्थ क्या होता है। “मुझे नहीं पता था, विधवा होने से क्या हो जाता है। क्यों हो जाता है कि वह हँस-गा नहीं सकती। नाच नहीं सकती। यहाँ तक कि वह सब खाने की सारी चीजें जो उसे अच्छी लगती हैं वे उसे नहीं दी जाएँगी। और वह नहीं खाएगी।”16 उपन्यास में कृष्णा के साथ-साथ उसके वैधव्य को कोसने वाली ताई भी विवाह के कुछ ही समय बाद विधवा हो जाती है परन्तु लोक-लाज के चलते और सामाजिक मान्यताओं के दृढ़ अनुसरण के चलते वह कृष्णा के बाल-मन से कोई सहानुभूति नहीं रखती। 25 बरस की नवयौवना ताई किस प्रकार अपने जीवन को एक यातना की तरह जीती है, किस प्रकार समाज और उसकी चहारदीवारी के लोग उसे वासना का शिकार बना लेना चाहते हैं, किस प्रकार वह अपने बच्चों का पालन -पोषण करती है और अंततः एक कठोर मन की स्वामिनी और विरत स्वभाव वाली युवती बन जाती है, ऐसा कठोर और यंत्रणा झेलता वैधव्य उपन्यास में बख़ूबी चित्रित किया गया है। “हज़ाम आया था उसके बाल मूँड गया था। ताई को मुँह अँधेरे उठना पड़ता। पौ फटने में देर होती। वह स्नान करती, धुली पर फटी-पुरानी धोती पहनती और ठाकुरद्वारे में जाकर बैठती। सोए ठाकुर को जगाने के वास्ते, धूप, घी का दिया, फूल, चंदन अक्षत थाली में सजाकर दीप जलाकर दाएँ हाथ से आरती उतारती और बाएँ हाथ से घंटी टुनटुनाती। ...हर तीसरे महीने हज़ाम गाँव की विधवा औरतों के साथ उसके भी बाल मूँड जाता। बापू बताते थे, ताई के बाल बहुत सुंदर थे। काले, लम्बे और रेशमी, नागिन की तरह बलखाए रहते उसके गोरे-चिट्टे सिर पर।”17 घुप अँधेरे ज़ख्मी पैरों घड़ों पानी लाना, रास्ते में पीठ पर किसी की चुभती नज़रों को झेलना और साँस के कँटीले बोल सुनना। यह महज़ एक ताई की नहीं वरन् हर विधवा की शाश्वत नियति थी। “आँख उठाकर देखा था, झुटपुटे से एक छाया-सी हिली थी और धीरे-धीरे उसके साथ बढ़ने लगी थी। वह जानती थी और कोई नहीं बीच वाला देवर था। पर क्या करती , किससे कहती। वह सीधी चली जा रही थी। उसे लगता था कि उसके पैरों में ताकत नहीं बची। गर्दन पर भार ऐसा कि घड़े तब गिरे कि अब गिरे।...ओढनी साँकल से अटक कर कंधे पर से उतर आई थी। वह आगे बढ़ा था। उसने सहारा देकर एक-एक कर घड़े उतरवाए थे। वह बरजती रही थी।...तभी सासू माँ भीतर आई थी उसकी पीठ पर दोहत्थड़ मारी थी, “कलमुँही ओढ़नी कठै गई? अरे म्हारे छौरे ने बिगाड़ री ऐ। तू होश कर इस घर माँ। तेरी टांग्या काट कै फैंक दूँगी। जा अंदर मर जा के।...मेरे बेटे ने खागी। इब ये चार टाबर और तू मणै खाएँगे।”..वह ज़रा सा खाने को माँगती तो सासू माँ की आवाज़ कोड़ों की तरह उस पर बरसती।”18 वस्तुतः वैधव्य जीवन के ये उत्पीड़न केवल कृष्णा और ताई के नहीं हैं , ग्रामीण क्षेत्र में ऐसे अनगिनत दृश्य बिखरे पड़े हैं। शहर भी इनसे अछूते नहीं वहाँ की तासीर तो एक ही है पर रंग कुछ भिन्नाभिन्न। हर स्त्री स्त्री ही है , हर स्त्री को चाहे वह किसी भी अंचल , परिवेश की हो दहलीज़ पार करते वक्त एक ही शिक्षा दी जाती रही है, “म्हारी बात ध्यान ते सुण छोरी। इब तू अपने घर जारी स। घर गृहस्ती बसाने का ज़िम्मा थारो। धणी को परमेश्वर मानियो। औरत की जून, तू अपने को माटी ई समझना बेटी।”19 वास्तविकता में यही वो परिवेश है जो उसे अपने हिसाब से संस्कारित और पोषित करता है। जो जीवन में दु:ख और उत्पीड़न सहे जाने को स्वीकारता है भले किसी जीवन का भीतर सूख जाए, उसके जीवन में कड़वाहट भर जाए, जिजीविषा और उल्लास दम तोड़ दे और भले जीवंत कहानियाँ दम तोड़ दे पर उसे यह मानते रहना होगा कि औरत के सुख पति के पाँवों में है फिर वे पाँव भले उसे लतियाते हों। यहाँ लेखिका समाज और उसके लीक पीटते खोखले संस्कारों को रेखांकित करती है जो उसकी इंसानी पहचान को छीनकर व्यवस्था का बेजान पुर्जा बना डालने को आमादा रहती है।
महाभारत के कथानक के माध्यम से नवीन जीवन सत्यों का अनुसंधान -
महाभारत संबंधों में बँधने और उससे मुक्त होते जाने की कथा है। उपन्यास में आद्युपांत महाभारत की समानान्तर कथा के माध्यम से सत्य-असत्य, सफल-असफल, सार्थक- निर्रथक तथा जय-पराजय और पाप-पुण्य के बीच कोई भेदक रेखा है ही नहीं सरीखे तथ्यों को रेखांकित करने की चेष्टा की गई है। द्रौपदी के चीरहरण पर पाण्डवों की चुप्पी, भीष्म, धृतराष्ट्र और संपूर्ण कुरुसभा की निष्क्रियता, कर्ण की कटुता और उस पर विकर्ण की ललकार,नियोग और इच्छामृत्यु समाज की स्त्री-विरोधी मानसिकता और उसके समक्ष विनत मानवीय स्वरों का बिम्ब प्रस्तुत करती है। विकर्ण की ललकार उस आश्वस्तिपरक मानसिकता की अनुगूँज है जो यह बताती है कि , ‘स्त्री पुरुष की संपत्ति नहीं है जिसे दाँव पर लगाया जा सके।’ महाभारत की प्रमुख स्त्री-पात्र द्रोपदी है जो कि स्त्री की जातीय प्रज्ञा की प्रतीक है। वह प्रज्ञा स्रष्टा की विलक्षण सृष्टि है जो नए परिवेश में, नए कर्म में नयी हो जाती है। कृष्णा महाभारत की कथा से साम्य बाँधती हुई स्त्री की अस्मिता और युगसत्य को परिभाषित करती हुई अपने धर्म को परिभाषित करती है। उसके भीतर जो पल रहा है वह बस उसका है, यही अनुकूलता कृष्णा जयसंहिता में भी खोजने का प्रयास करती है। “व्यास ने महाभारत रची पर उन्हें लगा था- सब व्यर्थ होगा। अँधेरा छा जाएगा, मूल्य धुँधला जाएँगे। हमारी मान्यताएँ विश्वास और आस्थाएँ पीली-निपाती हो जाएँगी। लेकिन यह सब होगा एक नए उजाले के लिए। निपात- पीलापन -परिणति होगा नए फुटाव में। मेरे इस जीवन की महाभारत की परिणति क्या होगी ? मेरे भीतर का यह भ्रूण समय का नया फुटाव है क्या? महाभारत में शाश्वत सत्य कहाँ है? ... पाण्डवों का एकांगी धर्म महाभारत के महान सत्य की पीठिका है, अपने भीतर के सत्य के साथ होना, अपने साथ ईमानदार होना है।”20 कृष्णा के जीवन का स्त्री-पर्व उसके जीवन में संघर्ष और उद्दाम लहरों का तूफान लेकर आता है जहाँ बिंदिया, बुआ, रज्जो,डॉ.तृष्णा उसकी जीवन-यात्रा में समाहित होती हुई सी प्रतीत होती है।
स्त्री की अस्मिता का अतिक्रमण – डायन प्रथा
‘मैं घूमर नाचूँ’ उपन्यास के माध्यम से लेखिका कमल कुमार स्त्री से जुड़े लगभग सभी मुद्दों पर बात करती है। स्त्री को एक ओर वे जहाँ प्रकारान्तर से छतरियों का रूपक देकर कहती हैं कि वे धूप और बारिश सब सहती हैं और अपने लिए सोचती ही नहीं। वैसी ही तनी रहती हैं- बाँह पसारे ताकि उनके नीचे उनका घर, परिवार , पति और बच्चे धूप और बारिश की ज़्यादतियों से बचे रह सकें। पर ये छतरियाँ ही कब समाज और परिवार की आँख में शूल-सी चुभने लगती हैं, कब घर से बेदख़ल कर दी जाती हैं और कब किसी अतीत की तरह बिसरा दी जाती है। स्त्री अपने जीवन में अनगिनत भावात्मक हिचकोले खाती है और ऐसे ही भावात्मक अतिक्रमण पर वह कहीं अपने अस्तित्व से ही बेदख़ल कर दी जाती है। “ हम औरतें गधों की तरह होती हैं धीमी और धैर्यवान। हम पर जितना मर्ज़ी बोझ लाद दो। कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लादे चले जाओ। कोई विरोध प्रतिरोध नहीं। भार लादे ,किसी भी ज़गह , कितनी भी दूर, चलते-चलते या रुके खड़े गधों की तरह धीरज बाँधे रखती हैं। अपने स्वामी की गालियाँ खाते हुए पर तटस्थ निर्विकार भाव से भार ढोने के अपने फलहीन कर्म में लीन।”21 घर, परिवार से निरस्त होती स्त्री लगातार परिधि की ओर सरकती जाती है और अंततः बेदख़ल कर दी जाती है। राजस्थान की धरा पर स्त्री को डायन कहकर भी संबोधित किया जाता रहा है। उसे अब भी प्रेतबाधा की जकड़नों में जकड़ा जाता है। अज़ीब विरोधाभास है कि कोई इसी परिवेश को अपनी सफलता की जानिब बताता है तो अन्य इसी परिवेश में अपने मूलभूत अधिकारों के लिए ही तरसता रह जाता है। सारी यातनाएँ शायद स्त्री के हिस्से में ही आई है। ग्रामीण जीवन भले ही हमें प्राकृतिक समृद्धता और सहजता से लुभाता हो ,परन्तु सांस्कृतिक और धार्मिक विद्रूपताओं के वास्तविक गढ़ भी ये ही हैं। ताज़्जुब यह है कि स्वयं सभी रूढ़ियों का शिकार होती हुई भी स्त्री उम्र के एक पायदान पर स्वयं, उस विचारधारा की वाहिका बन जाती है, जो स्वयं उसके वर्ग के लिए क्रूर यातनाओं को गढ़ता है। कितना वीभत्स है कि उसके प्रतिरोध को प्रेतबाधा माना जाता है। उसे जूतों पर रखी जाने वाली रूढ़ियों को सर माथे पर रखने के लिए बाध्य किया जाता है, अपनी कोख को पुंसवादी रंग देने के लिए पहुँचे हुए संत कहे जाने वाले बहुरूपियों का थूक चटाया जाता है। बहुत कुछ है जो सोच को जड़ तक कर सकता है।जाने कितनी बातें हैं, कितनी-कितनी रूदालियां है पर प्रश्न एक ही है आखिर कब तक? लेखिका इसी कुप्रथा को उपन्यास में बिन्दों पात्र के माध्यम से उठाती है।
इजाडोरा का यह कथन कि, ‘संसार कि सब मांओं को धरती के सबसे सुंदर कोनों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। संसार की सबसे अच्छी किताबें, सबसे सुंदर संगीत, सबसे उन्नत कलाएँ, उनके लिए होनी चाहिए।’ हर स्त्री के लिए सटीक बैठता है पर हमारे समाज में स्त्री जीवन पर कन्या भ्रूण हत्या एक समस्या के रूप में आज भी हावी है। इस मान्यता की जकड़न इस क़दर हावी है कि आज पढ़ा-लिखा समाज भी अपनी कोख को पुंसवादी रंग देने की पुरज़ोर कोशिश करता नज़र आता है। सामाजिक सांस्कृतिक पर्यावरण से व्यक्ति तक आती इस कुत्सित सोच को रोकने के लिए वृहद् स्तर पर सतत् प्रयास करने ज़रूरी हैं। आज भी कन्या से मुक्ति पाने की सोच से त्रस्त हर स्त्री मन कांई थारो करयो म्हे कसूर कहता नज़र आता है। उपन्यास भ्रूण हत्या और सती प्रथा पर बात करता हुआ स्त्री जीवन की इन्ही ज़्यादतियों को शब्द प्रदान करता है।
स्त्री जीवन-सत्य की अन्विति -
‘मैं घूमर नाचूँ’ उपन्यास केवल एक स्त्री की कथा , उसके जीवन और आशा-निराशा के संघर्ष के साथ आगे नहीं बढ़ता वरन् अनेक जीवन-कथानकों को लेकर आगे बढ़ता है। कथानायिका का कहन है कि,“मेरी इस कहानी में और भी कई कहानियाँ हैं, अलग-थलग, बिखरी, टूटी पर ये सब मेरी ज़िन्दगी की कहानी को पूरा करती है,उसे पूर्णता देती है और साथ ही उसे लयबद्ध करती है। यह कहानी भूगोल, इतिहास, समय, स्थान की सीमाओं से परे है। सभी वर्गों और घेरों से परे है। यह मेरी है, तुन्हारी और उन सबकी भी उतनी ही है। यह असल में हर औरत की कहानी है। इसलिए यह मेरी होकर भी मेरी नहीं है।”22 वाकई यह उपन्यास हर स्त्री की कहानी है, हर वर्ग की कहानी है और इसकी इसी प्रासंगिकता के कारण अनेक स्थलों पर यह भूगोल-वर्गों के बंधनों को तोड़कर सर्वव्यापी हो जाता है। यहाँ अगनपाखी की तरह जीती संघर्ष करती ज़रीना है, जो थी तो शेख फख़रूद्दीन की बड़ी बेगम पर उसकी स्थिति घर के पिछवाड़े में बँधे मवेशी की तरह थी। औरत को वस्तु और वक्ती रिश्तों की तरह देखते फखरूद्दीन ने अपने गुजर-बसर के लिए नई बेगम तलाश ली और ज़रीना तथा उसके बेटे करीम को हवेली के पिछवाड़े में धकेल दिया था। “सुबह उसे स्टोर से गहने-कपड़े मिलते। जहाँ भी जाती, घर के बाहर रिश्तेदारी और बिरादरी में। सभी औरतें उसके गहने-कपड़ों की प्रशंसा करतीं। हाथ से छू-छूकर देखती और उसके भाग्य पर ईर्ष्या करतीं। अपने भीतर के ज्वारभाटे को थामे वह सब सुनती और चुप रहती।”23 ज़रीना समाज की उस औरत का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें प्रतिशोध की ताकत नहीं है और यह ज़ज़्बा तब और हवा हो जाता है जब स्त्री के ही विरोध में समाज दुष्प्रचार, आरोप और नाना प्रतिबन्ध लगाता है। स्त्री के निर्णय के विरोध में सारा जनमत जुट जाता है और इस प्रकार उसके निर्णय एकतरफ़ा और निष्क्रिय हो जाते हैं। ज़रीना की कला और उसका ज़ज़्बा उसे उसका अतीत भुलाने में मदद करता है और वो सिफर से यात्रा फिर शुरू करती है। लेखिका ने ज़रीना के माध्यम से उपन्यास में शरीअत और धर्म के उस पक्ष को रेखांकित किया है जो एक वर्ग को निष्क्रिय और उत्पीड़ित करता है। “ हम औरतों को अरबी में कुरान पढ़ाया जाता था। उसका समझना संभव नहीं था। अगर हम औरतें उसका अनुवाद पढ़ सकतीं तो शायद स्थिति यह न होती। हमें पता चलता कि असली मज़हब क्या है?”24 उपन्यास के स्त्री पात्र ज़रीना, सोनाली, और कृष्णा कभी अपनी चुप्पी तो कभी अपने प्रतिकार से अपने अस्तित्व का प्रकटीकरण करती हैं।
उपन्यास में केवल यातनाओं और यंत्रणाओं की ही उपकथाएँ नहीं हैं वरन् आत्मसम्मान की बानगी भी है। उपन्यास में ‘सोनाली’ भील जाति की अनपढ़ पर आत्मसम्मानी लड़की है। गाँव का ठाकुर उस पर बुरी नज़र रखता है और उसी के तहत उसके प्रतिकार करने पर भी गुंडों से उठवा लेता है। उसकी कहार उससे छीन लेती है पर उसकी सिंहनी की तरह की ललकार और अपने जाति के प्रति सम्मान ठाकुर को नीचा दिखा देता है। कथा नायिका कृष्णा की बेटी मीनू भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का शिकार बनती है पर वह कृष्णा के साथ के चलते अपने जीवन को फिर से आत्मसम्मान की राह पर लेकर चलती है। यहाँ आश्चर्य इस बात पर होता है कि मीना के पिता और कृष्णा के पति जो कि नामी डॉक्टर है; परन्तु उसकी मानसिकता इतनी संकीर्ण है कि वह मीनू की पढ़ाई छुड़वा कर उसकी जल्दी ही शादी कर देता है। उपन्यास की डॉ. तष्णा आधुनिका स्त्री है जिसे स्वच्छंद मानसिकता का अनुगामी बतलाकर विद्रोही ज़रूर दिखाया गया है परन्तु अंततोगत्वा वह भी पुरुष की स्वरार्थपरता का शिकार होती है।
उपन्यास का मुख्य कथानक कृष्णा की आपबीती और उसकी जीवन-यात्रा है, जिसमें वह बच्ची से बाल-विधवा, सुहागन , प्रेमल पत्नी, तीन बच्चों की माँ और अंततः एक प्रेयसी बनती है। इस प्रक्रिया में समाज के झंझावात, अकेले छूटने की पीड़ा, सतत निष्क्रिय होने की वेदना शामिल है जिसे अनेक प्रसंगों के माध्यम से बख़ूबी सामने लाया गया है। कृष्णा के भीतर उल्लास है, ऊँचे हिंडोले पर झूलने की अदम्य इच्छा है, स्त्री मन की विविध मनःस्थितियाँ हैं जिसके चलते वह कहीं शांत नज़र आती है तो कहीं धुर विरोधी हो प्रतिकार का महाख्यान रचती नज़र आती है। कहीं वह एक आदर्श पत्नी और माँ के रूप में नितांत घरेलू तो कहीं अपनी अस्मिता की सहेजन करती आधुनिका बन जाती है। यद्यपि आयुष के साथ उसके विवाहेतर संबंध उसे स्त्री के तथाकथिक पितृसत्तात्मक आदर्श रूप की चौहद्दी से बाहर धकेलते हैं; परन्तु आयुष का भीरू होकर पुरुषोचित् स्वरार्थपरता का वरण करना उसे अपने गर्भ के प्रति सबल बना जाता है। वह सबल स्त्री की तरह अपने शरीर और कोख पर अपना अधिकार सिद्ध करती हुई फैसला सुनाती है, “बास्टर्ड या नाज़ायज़ शब्द पुरुष की दुनिया का शब्द है। क्योंकि यह पुरुष वर्चस्व को चुनौती देता है। उसके वर्चस्व को ठुकराने वाली औरत को, उसके बच्चो को नाजायज़ बताकर फाँसी की सजा सुनाता है। मातृ-सत्ता में यह मेरा बच्चा है। अगर कुंती का पुत्र कौंतेय और देवव्रत बाद में भीष्म पितामह जो गंगा के पुत्र होने से गांगेय कहलाए तो यह मेरा , कृष्णा का बेटा, कृष्ण भी तो हो सकता है।”25 उपन्यास अनेक स्त्री पात्रों चाहे वह ज़रीना हो, कृष्णा की बेटी मीनू हो या डाँ. तृष्णा; सामाजिक बदलावों को लेकर कहता है कि, जब भी कोई सामाजिक बदलाव या सामाजिक यथार्थ विकसित हो रहा होता है उसे रोकने का प्रयत्न किया जाता है। क्योंकि नयी चेतना सब कुछ बदलती है। सोच और विचार ही नहीं , जीवन पद्धति और कार्यपद्धति , जीवन शैली और संबंधों को भी नए रूप में परिभाषित करती है। सब कुछ समय-सापेक्ष बदलता है परन्तु नए मानदण्ड पुरातन मान्यताओं, आस्थाओं और विचारों को नहीं स्वीकारते हैं। औरत को समाज धर्म, कर्म, दर्शन, पाप और पुण्य की जंजीरों से बाँध देता है। उपन्यास की परिणति स्त्री जाग्रति और मुक्ति के उस जुमले से होती है, जिसे स्त्री – विमर्श का एक वर्ग स्वीकराता है, “फैरन ने ‘रेचेड ऑफ द अर्थ ’ में यही कहा था कि स्त्री को सबसे पहले अपनी कोख और अपनी श्रम शक्ति के उत्पादनों पर नियंत्रण करना चाहिए। जिसको पुरुष सत्ता ने अपने वश में कर रखा है। तभी वह अपने व्यक्तित्व को प्राप्त कर सकेंगी। अपने को नए ढंग से अपनी अनुरूपता में परिभाषित कर सकेगी। ”26 कृष्णा अंततः अपनी संतति, उस संतति के साथ जिसे समाज त्याज्य और हेय समझता है जीने की ठानती है और उपन्यास इस संदेश तक पहुँचता हुआ यह प्रश्न पाठक के मन में छोड़ जाता है कि, स्त्री हक़ूक की यात्रा अभी सदियों-सी लम्बी बाकी है, जो जाने ठीक से शुरू भी हो पाई है कि नहीं?
विमर्श किसी भी समाज को वयस्क बनाने की कोशिश करने में पहलक़दमी करते हैं और स्त्री विमर्श केंद्रित लेखन इसी दिशा में महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं की शिनाख़्त कर स्त्री हितों की रक्षा और समतावादी समाज की स्थापना की दिशा में सकारात्मक परिप्रेक्ष्य देने का आग्रह रखता है। इसी क्रम में विवेच्य उपन्यास पितृसत्ता के संरचनात्मक ढाँचे को मज़बूत करने वाली संस्थाओं-परिवार, विवाह, धर्म आदि का सूक्ष्म विश्लेषण कर, उसे सुधारात्मक दिशा प्रदान कर साहित्य-समाज को नये आलोक में देखने का तो प्रयास करता ही है साथ ही आधुनिक स्त्री की चुनौतियों से जूझने की संकल्पबद्ध दृढ़ता, उसके साहसको भी रेखांकित करता है। सारतः यह उपन्यास स्त्री की सहृदयता और मानवीयता का आकलन अत्यंत वस्तुनिष्ठता और निस्पृहता से करता है।
संदर्भ :
1. नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना, व्यापकता और गहराई, सत् साहित्य प्रकाशन, बनारस, प्र.सं. फरवरी 1956,पृ.15
2. वही, पृ.16
3. मैनेजर पाण्डेय, साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, ई-बुक-पृ-49, स्रोत-https://notnul.com
4. गुलाबराय, साहित्य और समीक्षा, बाबू गुलाबराय ग्रंथावली, आत्मा राम एण्ड सन्स, दिल्ली 2005, पृष्ठ 42
5. नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना, व्यापकता और गहराई, सत् साहित्य प्रकाशन, बनारस, प्र.सं. फरवरी 1956,पृ.38
6. वही, पृ.45
7. मैनेजर पाण्डेय, साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, ई-बुक-पृ-20, स्रोत-https://notnul.com
8. वही, पृ.17
10. स्रोत- Mill, John Stuart (1869). The Subjection of Women (1869 first ed.). London: Longmans, Green, Reader & Dyer. web source- https://archive.org/details/subjectionofwome00millrich/page/1/mode/1up
**While Aristotle discusses marriage and family in other places, he examines the hierarchical aspect of the relationship between men and women most fully in Politics I. Close examination of Politics I reveals that Aristotle thought that the subjection of women in the household was rooted in force. In Politics 1.1254b, Aristotle writes, "the male is by nature superior and the female inferior, the male ruler and the female subject."
11. प्रभा खेतान, स्त्री उपेक्षिता, हिन्दी पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, सं. -2004, पृ.67
12. कमल कुमार, मैं घूमर नाचूँ, राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, नई दिल्ली, सं.2010,पृ.5
13. वही,पृ.8
14. वही, पृ.28-29
15. रोहिणी अग्रवाल, साहित्य की ज़मीन और स्त्री-मन के उच्छ्वास, वाणी प्रकाशन, सं.2014, पृ.21
16. कमल कुमार , मैं घूमर नाचूँ, राजपाल एंड सन्ज ,कश्मीरी गेट, नई दिल्ली,सं.2010, पृ.29
17. कमल कुमार , मैं घूमर नाचूँ, राजपाल एंड सन्ज ,कश्मीरी गेट, नई दिल्ली,सं.2010, पृ.31
18. वही पृ.31,32
19. वही, पृ.33
20. वही, पृ. 13
21. वही, पृ.123
22. वही, पृ. 12
23. वही, पृ.57
24. वही, पृ.60
25. वही, पृ.101
26. वही, पृ. 278
अवनि शर्मा
आचार्य,समाजशास्त्र विभाग, राजकीय कन्या महाविदियालय,अजमेर
विमलेश शर्मा
सह. आचार्य, हिन्दी विभाग, राजकीय कन्या महाविदियालय,अजमेर
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा


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