समकालीन यथार्थ की काव्यात्मक पड़ताल : ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’
(पराग पावन के कविता-संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ पर एक आलोचनात्मक दृष्टि)
- सन्तोष विश्नोई
पराग पावन समकालीन हिन्दी कविता के उन युवा कवियों में हैं, जिनकी रचनात्मक चेतना अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ से गहरे स्तर पर संवाद करती है। उनका जन्म 30 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद में हुआ। प्रारम्भ से ही साहित्य और अध्ययन के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें अकादमिक और रचनात्मक—दोनों स्तरों पर सक्रिय बनाया। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर और पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उनके लेखन को वैचारिक स्पष्टता, आलोचनात्मक दृष्टि और भाषिक अनुशासन प्रदान करती है। पराग पावन की कविताएँ और शोध-आलेख हिन्दी की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनात्मकता की व्यापक स्वीकृति का प्रमाण यह है कि उनकी कविताओं का अनुवाद बांग्ला, उड़िया, मराठी, असमिया और अंग्रेज़ी भाषाओं में भी हुआ है। उनकी कविता केवल निजी अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह समाज की गहरी संरचनाओं, असमानताओं और विडम्बनाओं को प्रश्नांकित करती है। पराग पावन का राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ पहला कविता-संग्रह है, जिसमें समकालीन समय की बेचैनी, अविश्वास और संघर्षशील मनुष्यता की अभिव्यक्ति सशक्त रूप में हुई है। यह संग्रह एक ऐसे कवि की उपस्थिति दर्ज करता है, जो भाषा को संवेदना और विचार—दोनों के स्तर पर गंभीरता से बरतता है। पराग पावन का रचनात्मक संसार अकादमिक अनुशासन, सामाजिक सरोकार और काव्यात्मक संवेदना के संतुलित संयोग के रूप में सामने आता है, जो उन्हें समकालीन हिन्दी कविता में एक महत्त्वपूर्ण युवा हस्ताक्षर बनाता है।
समकालीन समय में कविता का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि वह क्या कह रही है, बल्कि यह है कि वह किस समय में, किसके सामने और किन परिस्थितियों में बोल रही है। पराग पावन का कविता-संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ इसी संकट की गहरी पहचान से उपजा हुआ संग्रह है। यह ऐसी कविताओं का संसार है, जहाँ हँसी भी निर्दोष नहीं रह गई, जहाँ मुस्कान के पीछे भय, अनिश्चय और सत्ता की परछाइयाँ मौजूद हैं। यह संग्रह अपने शीर्षक से ही एक राजनीतिक-सांस्कृतिक स्थिति की ओर संकेत करता है। ‘हँसी’ जैसी मानवीय और सहज अनुभूति का ‘संदिग्ध’ हो जाना दरअसल हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक संरचनाओं पर एक तीखा प्रश्न है। पराग पावन की कविताएँ इसी प्रश्न को अलग-अलग अनुभवों, बिंबों और स्थितियों के माध्यम से सामने लाती हैं। इस संग्रह की कविताओं की केन्द्रीय चिंता‘ सत्ता और आम जन’ के बीच बिगड़ते रिश्ते, भय की सामान्यीकृत उपस्थिति और असहमति के दमन से जुड़ी हुई है। कवि किसी एक घटना या प्रसंग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह एक ऐसे वातावरण को रचता है जहाँ मनुष्य की सामान्य प्रतिक्रियाएँ—हँसना, चुप रहना, सवाल करना—सब राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। यहाँ हँसी खुशी की नहीं, बल्कि आत्मरक्षा की मुद्रा बन जाती है।
‘चूल्हे की राख’ इस संग्रह की पहली कविता हैं, जिसमें माँ अपने बच्चों को राख पर अक्षर बनाना सिखाती है, जो ज्ञान और परंपरा का प्रतीक भी है। इसमें कवि अपने बचपन की स्मृतियों को याद करता है—वे दिन जब घर में चूल्हा लीपा जाता था, चौका नम होकर पवित्र लगने लगता था। माँ सब कुछ साफ कर देती, परदो मुट्ठी राख हमेशा बचाकर रखती—सुबह की राख शाम के लिए और शाम की राख सुबह के लिए। इसी राख पर, जब दोनों भाई माँ के पास बैठते, वह अपनी भाषा का पहला अक्षर बनाकर उन्हें अक्षरों की दुनिया से परिचित कराती। वही अक्षर उनके जीवन का मार्ग बने और वे कविता के “सुदूर इलाकों” तक पहुँच गए। अब जब उनकी उम्र माँ की उम्र के करीब पहुँच रही है, वे उसी परम्परा को आगे बढ़ाना चाहते हैं—दो मुट्ठी राख बचाकर रखना, यानी परम्परा, स्नेह, सीख और अपनी जड़ों की स्मृति को संजोकर दुनिया के सामने फैलाना। यह कविता स्मृति, परम्परा, भाषा, संस्कार और रचनात्मकता की जड़ों को एक अत्यंत घरेलू और सांस्कृतिक वातावरण में चित्रित करती है। कविता की पृष्ठभूमि घरेलू संस्कारों से भरी है—चूल्हा, चौका, राख, माँ और बच्चे। यह भारतीय ग्रामीण/पारंपरिक जीवन का अत्यंत जीवंत स्मरण है। यह केवल बचपन की याद नहीं, बल्कि अक्षर-जनन की कथा है—कैसे एक माँ अपनी सामान्य-सी राख को ज्ञान का पवित्र माध्यम बना देती है। राख में बने पहले अक्षर ज्ञान और भाषा के आरम्भ का प्रतीक हैं। यह बताता है कि भाषा का पहला स्पर्श कितना सरल, आत्मीय और घरेलू हो सकता है। कविता संस्कृति के उस पक्ष को उभारती है जहाँ ज्ञान और रचना का आरम्भ किसी महंगे औज़ार से नहीं, बल्कि एक साधारण-सी राख की दो मुट्ठियों से होता है। माँ ने जैसे राख बचाई, वैसे ही कवि अब उम्र बढ़ने के बाद उसी ज्ञान-परम्परा को आगे बढ़ाना चाहता है। यह परम्परा के एक चक्र की पूर्णता दर्शाता है। जब कवि कहता है कि अब उसकी उम्र माँ की उम्र होती जा रही है, तो ज्ञान-संरक्षण की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ जाती है। यहपीढ़ियों की निरंतरता का भाव है। “अक्षरों का पीछा करते-करते कविता के इलाकों तक पहुँचना”—यह रचनाकार के विकास की यात्रा है, जहाँ बचपन की सीख रचना-सम्पदा का स्रोत बनती है। कवि कविता के “सुदूर इलाकों” में पहुँच गया है, फिर भी अपनी जड़ों, अपनी पहली गुरु और अपनी पहली सीख को नहीं भूला। यह किसी भी रचनाकार की नैतिक और भावनात्मक जड़ है। कवि की दृष्टि अत्यंत संवेदनशील है। यह कविता एक व्यक्तिगत स्मृति से उठकर सामूहिक सांस्कृतिक अनुभव बन जाती है। हर भारतीय घर में ज्ञान की कोई न कोई ऐसी शुरुआत हुई है—कभी धूल पर, कभी पीली मिट्टी पर, कभी स्लेट पर। कवि इसी सार्वभौमिक अनुभव को ‘राख’ के माध्यम से रूपायित करता है। कविता में प्रयुक्त भाषा अत्यंत सादगीपूर्ण है, जो पाठक को कवि के अनुभव से तुरंत जोड़ देती है। कवि ‘चूल्हा लीपने’, ‘चौके की नमी’, ‘डेकची चढ़ने’ जैसे दृश्यात्मक बिंबों के माध्यम से वातावरण उपस्थित कर देता है; पाठक अपने आप वही दृश्य देखने लगता है। कविता में कथा है, भाव है और काव्यात्मक प्रतीक—सभी संतुलित। यह दिल को छूने वाली सादगी के साथ गहरी अर्थवत्ता प्रस्तुत करती है। प्रतीक-शास्त्र (Symbolic Interpretation) की दृष्टि से देखे तो इस कविता में राख, चूल्हा, अक्षर, माँ—सब अपनी-अपनी प्रतीकात्मक भूमिकाएँ निभाती हैं। यह परम्परा, स्मृति, भाषा और रचना—चारों का सुंदर संगम है, और ‘दो मुट्ठी राख’ पूरे अनुभव का मौलिक, सरल और अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक। कवि की इस संग्रह की पहली ही कविता बचपन की स्मृति नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का सांस्कृतिक कोड है—जहाँ माँ राख से अक्षर बनाती है और बच्चे अक्षरों का पीछा करते करते कविता तथा ज्ञान की ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं। जो अपने आप में अप्रतिम कविता का दर्जा पा जाती है।
इस संग्रह की दूसरी कविता ‘असली हत्यारे’ एक गहन, प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक कविता है। यह कविता “असली हत्यारों” के बहाने ऐसी शक्तियों की ओर इशारा करती है जो प्रत्यक्ष हिंसा नहीं करतीं, बल्कि प्रक्रिया, संरचना, भाषा और संस्कृति के माध्यम से लोगों को मारती हैं—उनकी चेतना, उनकी स्वतंत्रता, उनकी समझ, उनके विवेक को। कविता कहती हैं कि असली हत्यारे न तो बंदूक चलाते हैं, न तलवार चलाते हैं—वे उसके पीछे की प्रणाली चलाते हैं। जो सीधे शिकार नहीं करते, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करते रहते हैं कि शिकार “स्वाभाविक” लगे। उनकी हत्या का शिकार अक्सर शरीर नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता, विचार, असहमति और जनचेतना होती हैं। कवि बार-बार दिखाता है कि कैसे विरोध और निंदा भी एक राजनीतिक हथियारबन जाती है।
वे “चाक़ू की निंदा” भी करते हैं और “कच्चे लोहे की दुकान” भी खोलते हैं—अर्थात् वे वही चीज़ें नकारते भी हैं और उनसे लाभ भी उठाते हैं। वे बांस की “लाठी” और “बांसुरी”—यानी हिंसा और कला—दोनों बनाते हैं। यह सत्ता का दोहरा चरित्र है। “असली हत्यारे आपकी बग़ल में खड़े होकर चाय पी रहे हैं”—यह पंक्ति बताती है कि वे आम लोगों की तरह ही दिखते हैं। वे पुस्तकालय जाते हैं, संसद जाते हैं, दावतों में शामिल होते हैं, टीवी देखते हैं, और अंत में सो जाते हैं—यही उनकी ताकत है कि आप उन्हें पहचान नहीं पाते, क्योंकि वे “सामान्यता” का रूप ओढ़े रहते हैं। आत्मा नहीं, आत्मा की परिभाषा यह अत्यंत गहरी पंक्ति है। यानी वे मनुष्यता नहीं रखते, बल्कि मनुष्यता को परिभाषित करने की शक्ति रखते हैं। वे यह तय करते हैं कि किसकी आत्मा है, किसकी नहीं; किसका जीवन मूल्यवान है, किसका नहीं। ‘असली हत्यारों की शिनाख्त करनी हो तो उपसंहार तक मत जाना, असली हत्यारें भूमिका में अपना काम कर चुके होते हैं’ इसमें कवि चेतावनी देता है कि असली हत्यारे अंत में नहीं, शुरुआत में अपना काम कर जाते हैं। वे कथा की भूमिका ही इस तरह लिखते हैं कि निष्कर्ष पहले से तय हो जाता है।
अर्थात् वे इतिहास, कथा, विमर्श और संदर्भ—सबको नियंत्रित कर लेते हैं। कवि वस्तुओं के माध्यम से सत्ता की आलोचना करता है, बंदूक/तलवार (प्रत्यक्षहिंसा), बांस(साधारण वस्तु जिससे लाठी (दमन) और बांसुरी (कला/संस्कृति) दोनों बनते हैं), पुस्तकालय, संसद (ज्ञान और सत्ता के केंद्र) आदि कविता को एक राजनीतिक-दार्शनिक आयाम देते हैं। कवि की शैली सूक्ष्म व्यंग्य और रहस्यमय चित्रकथा जैसी है। वाक्य छोटे हैं, लेकिन उनके भीतर गहरी व्यंजनाएँ हैं। “असली हत्यारे…” का बार-बार दोहराव कविता को एक मंत्र या घोषणा जैसा प्रभाव देता है। यह दोहराव उस भयावह सामान्यीकरण को व्यक्त करता है जिसे कविता उजागर कर रही है। कविता भय और असहायता नहीं, बल्कि चेतावनी पैदा करती है। कविता उन लोगों की आलोचना है जो व्यवस्था, धर्मग्रंथों, संस्कृति, और नैतिकता की आड़ में हिंसा को वैध बनाते हैं। ये वे लोग हैं जो सत्ता, परंपरा, नैरेटिव और सामाजिक मानकों को नियंत्रित करके समाज को अपनी इच्छानुसार मोड़ते हैं। कविता अपने केंद्र में एक बेहद आधुनिक, पोस्ट-स्ट्रक्चरलिस्ट समझ रखती है—कि असली अपराधी वे नहीं जो अंतिम घात करते हैं, बल्कि वे हैं जो पूरा वातावरण बनाते हैं, जिसमें वह घात संभव होता है। वे अदृश्य हैं, सामान्य हैं, शिक्षित हैं, निर्णायक हैं—और वे “भूमिका” में ही हत्या कर लेते हैं।
इस संग्रह की एक अन्य कविता ‘मेरे ख़ून का एक संक्षिप्त इतिहास’ बहुत सुंदर और तीखी कविता है। यह कविता दर्द, स्मृति, अन्याय और सँघर्ष से भरी हुई है। इसमें कवि अपने पुरखों की प्रतीक्षा कर रहा है। जंगल, पहाड़, ढोर-ढोरान, पक्षी-जानवर—सब लौट आए हैं, पर उसके पुरखे नहीं लौट रहे। इस प्रतीक्षा में बेचैनी, भय और अनहोनी का आभास है। इसी अंधेरी सांध्य बेला में कवि को अपने देश की विडंबनाएँ याद आती हैं—जहाँ निर्दोषों को अपराधी साबित किया जाता है और अपराधियों को सत्ता दी जाती है; जहाँ ईमान और नैतिकता हाशिए पर हैं। इन सबके बीच कवि के भीतर क्रोध और प्रतिरोध की आग है, जो किसी और दिन के लिए दबाई हुई है। कविता अंत में फिर उसी मूल पीड़ा पर लौटती है—“पुरखे अब भी नहीं लौटे। “यह हिस्सा किसी वर्तमान या विशिष्ट सत्ता को लक्षित न होकर सैद्धांतिक और साहित्यिक है। कविता में वक्ता अपने “पुरखों” की प्रतीकात्मक तलाश करता है—वे पुरखे जो जंगल के पार टीलों पर किसी काम से गए थे, पर आज की घनी शाम, घिरते बादल, डूबते रास्तोंके बावजूद वापस नहीं लौटे। प्रकृति के सारे जीव—कबूतर, मुर्गियाँ, जानवर—सब लौट आए हैं, लेकिन पुरखे नहीं। यह “न लौटना” केवल भौतिक अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि संस्कृति, सत्य, प्रतिरोध, साहस और ईमानदारी के खो जाने का बिंब है। इसके बाद कविता भयावह सामाजिक यथार्थ पर कटती है—“जहाँ मेमने हत्यारे साबित किए जाते हैं, और हत्यारों को प्रधानमंत्री घोषित किया जाता है। जहाँ ईमान की देवी जल्लाद की बैठक में नाचती है, और जल्लाद अहिंसा पर शोध-पत्र प्रस्तुत करता है। यानी नैतिकता उलट गई है। सत्य और झूठ की जगहें बदल गई हैं। न्याय-व्यवस्था अपना अर्थ खो चुकी है। कवि के भीतर क्रोध है, विद्रोह की आग है, लेकिन वह उसे किसी और दिन के लिए बचाकर रखता है—क्योंकि यह शाम अँधेरी है, रास्ते ढल चुके हैं, और उसके पुरखे—उसकी जड़ें—अब तक नहीं लौटे। ““पुरखों के न लौटने” की पंक्तियाँ कविता का केन्द्रीय भाव हैं, जो केवल वंश या पूर्वजों की बात नहीं करतीं। यह सांस्कृतिक-नैतिक विरासत, लोक-चेतना, प्रतिरोध की परंपरा, विवेक, सत्य, और आदर्शवाद के लापता हो जाने का प्रतीक है। आज का समय उपभोक्तावाद और डिजिटल विचलन से भरा है। इस भरी दुनिया में भी मनुष्य अपनी पहचान, परंपरा, स्मृति और नैतिक आधार को खोता जा रहा है। आधुनिक संदर्भ में यह कविता एक ऐसे मनुष्य की कहानी है जो नैतिकता खोते समय, भीड़ और भ्रम में डूबे समाज के बीच अपनी जड़ों—अपने ‘पुरखों’—को पुकारता है। पर उन्हें वापस नहीं पाता। यह कविता आधुनिक समय के नैतिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक विघटन का रूपक है।
इसी संग्रह में ‘महिषासुर का सन्धि-पत्र’ नामक कविता एक ऐसे पुरुष की आवाज़ है, जो “दुर्गा” नामक स्त्री से कह रहा है कि यह युद्ध—यह हिंसा—असल में उनका व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है। उसके शरीर में धँसे हथियार उसके नहीं, किसी सत्ता के हैं। वह बताता है कि उसने कभी स्त्री का अपमान या अधिकार नहीं छीना, बल्कि जीवनसंगिनी-सा प्रेम और समान मर्यादा की इच्छा की थी। इसके बाद वह पितृसत्ता, जाति-व्यवस्था और सामाजिक हिंसा की ओर संकेत करता है—जहाँ पुरुष की हत्या के बाद भी स्त्री सुरक्षित नहीं रहती। वह चेतावनी देता है कि स्त्री भी सत्ता-संरचना की उसी हिंसक व्यवस्था में दंडित होगी, जो पुरुष को मारती है। कविता अंत में स्त्री से आग्रह करती है कि वह युद्ध रोककर इस सत्ता-तन्त्र की पड़ताल करे और ईमानदारी से बताए कि बलात्कार, दमन और सामाजिक हत्या की घटनाओं से उसका कोई संबंध कैसे नहीं हो सकता—क्योंकि वह भी उसी व्यवस्था की शिकार है। कविता स्त्री-पुरुष के व्यक्तिगत संबंध से शुरू होती है, पर धीरे-धीरे यह संबंध पितृसत्ता, जाति-हिंसा, समाज द्वारा गढ़े मिथकों और शक्ति-तंत्रों के गहरे विश्लेषण में बदल जाता है। कवि यह कहता है “हिंसा कभी व्यक्तिगत नहीं होती; हथियार किसी और के होते हैं। सामाजिक संरचना स्त्री और पुरुष दोनों को हिंसा के लिए उकसाती है। पुरुष स्त्री को बताता है कि पितृसत्ता द्वारा पुरुष की हत्या केवल शुरुआत है; अंत में सबसे क्रूर दंड स्त्री को मिलता है—इज़्ज़त, पवित्रता, शुचिता, बहिष्कार जैसे हथियारों से। कविता स्त्री-पुरुष विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता-तंत्र के विरुद्ध एक सामूहिक आत्मालोचना है। “मोटी और श्यामवर्णी माँ को भैंस कहा”—आज भी जातिगत अपमान इसी तरह जारी है। यह कविता उस इतिहास को वर्तमान से जोड़ती है। पूरी कविता “दुर्गा!” के संबोधन में है—जिससे यह एक संवाद नहीं, एकलंबी पुकार बन जाती है। इससे भावनात्मक तीव्रता बढ़ती है। दुर्गा—शक्ति, स्त्रीत्व, प्रतिरोध—का पौराणिक संदर्भ और आज की स्त्री का सामाजिक संदर्भ एक साथ रखा गया है। इस कविता की वैचारिक केंद्रीयतासत्ता-संरचना के विरुद्ध स्त्री और पुरुष की साझा मुक्ति की चेतना है। कवि यह स्थापित करता है कि हिंसा, युद्ध और दमन मनुष्य की दो इकाइयों—स्त्री और पुरुष—का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है, बल्कि एक संगठित सामाजिक-राजनीतिक तंत्र का परिणाम है, जो दोनों को अपने हित के अनुसार भिड़ा देता है। सत्ता-विरोधी, स्त्री-मुक्ति और सामाजिक न्याय की चेतना ही इस कविता की वैचारिक केंद्रीयता है। कविता बताती है कि patriarchal system केवल पुरुष को ही नहीं, स्त्री को भी नियंत्रित करता है। पुरुष पर हथियार चलवाए जाते हैं, और स्त्री पर “इज़्ज़त” नामक हथियार चलाया जाता है। “मेरी हत्या के ऊपर तुम्हारी हत्या है” अर्थात् – दमन की अंतिम शिकार स्त्री ही होती है।
इसी संग्रह की कविता “स्त्रियाँ” यह कविता स्त्री को किसी एक जैविक या सामाजिक पहचान तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे एक नैतिक, सांस्कृतिक और मानवीय शरण-स्थल के रूप में रचती है। कवि के लिए ‘स्त्रियाँ’ जीवन देने वाली भी हैं और जीवन को अर्थ देने वाली भी—वे जन्म देती हैं, शिक्षा देती हैं, प्रतीक्षा सिखाती हैं, और अपने अनुभवों की सूक्ष्मता से संसार को मनुष्यता की ओर मोड़ती हैं। कविता का मूल स्वर प्रतिरोध और प्रत्याशा का है। एक ओर “हृदयहीन सांसारिकता” से कवि का टकराव है, तो दूसरी ओर स्त्रियों, नदी, मिट्टी, घास—यानी प्रकृति और करुणा के पक्ष में खड़े होने की आकांक्षा। कवि का यह कथन—“मुझे स्त्रियों के पास रहने दो/जहाँ नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की आवाज़ न पहुँचती हो” कविता को समकालीन राजनीति से सीधे जोड़ देता है। यहाँ यह पंक्ति किसी व्यक्ति-विशेष से अधिक सत्ता, वर्चस्व और शोर के प्रतीक के रूप में आती है। यह साहसिक हस्तक्षेप कविता को केवल भावुक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध बनाता है। कवि स्त्री को सभ्यता के विकल्प के रूप में देखता है—जहाँ घास अपनी “लघुता” में भी मुखर हो सके। यह दृष्टि स्त्रीवाद के किसी नारेबाज़ संस्करण से अलग, संवेदनात्मक स्त्रीवाद है। यह कविता संवेदना, साहस और समकालीन चेतना का ऐसा संगम है जो इसे आज की हिंदी कविता में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप बनाता है। यह कविता स्त्री को किसी विमर्श का विषय नहीं, बल्कि मनुष्य होने की शर्त के रूप में प्रस्तुत करती है। यह कविता सत्ता के शोर के विरुद्ध धीमी बारिश का पक्ष लेती है। ‘स्त्रियाँ’ अंततः प्रेम, पीड़ा और उम्मीद की वह जगह है जहाँ मनुष्य अब भी बचा हुआ है।
इस संग्रह की एक ओर कविता है ‘मैं कैसा हूँ’। यह कविता आत्मकथ्यात्मक होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं रह जाती; वह व्यक्ति के माध्यम से समकालीन नागरिक की मानसिक अवस्था को व्यक्त करती है। शीर्षक में निहित प्रश्न— ‘मैं कैसा हूँ’—का उत्तर कवि बाहर से नहीं, भीतर टूटते-बनते मनुष्य से देता है। कविता की शुरुआत अपेक्षा से होती है—“मैं सफलताओं का इंतज़ार कर रहा था” यह पंक्ति आधुनिक मनुष्य की सामान्य आकांक्षा को प्रकट करती है। लेकिन अगले ही क्षण कविता निजी सफलता से हटकर राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ में प्रवेश कर जाती है—“और एक सरकार गिरने का/पर जाने क्या हुआ/ मेरे भीतर एक आदमी गिरा” यहाँ सरकार का गिरना बाहरी घटना है, जबकि ‘आदमी का गिरना’ आंतरिक नैतिक पतन का संकेत है। कवि यह बताता है कि सत्ता-परिवर्तन से अधिक भयावह वह क्षण होता है, जब मनुष्य के भीतर का विवेक ढह जाता है। ‘देश का समाचार’ सुनकर आदमी का गिर जाना यह दर्शाता है कि खबरें अब सूचना नहीं, आत्मा को आहत करने वाला अनुभवबन चुकी हैं। कविता के अगले खंड में कवि का मौन महत्वपूर्ण है—“मैं चुप था कि चिड़िया की चाल देख सकूँ” यह चुप्पी एक सजग चुप्पी है—प्रकृति, जीवन और सूक्ष्म गति को समझने की इच्छा। लेकिन—“तभी बड़बोलों का एक झुंड आया/मुझे गूँगा कहकर निकल गया” यहाँ ‘बड़बोले’ उस समाज का प्रतीक हैं जहाँ शोर को विचार और आक्रामकता को सच मान लिया गया है। जो नहीं चिल्लाता, वह ‘गूँगा’ घोषित कर दिया जाता है। कविता यहाँ मौन बनाम शोर का तीखा द्वंद्व रचती है। लोकतंत्र का मानवीकरण कविता का एक प्रभावी बिंब है—“मैंने लोकतंत्र को ड्योढ़ी पर रोककर रखा” लोकतंत्र यहाँ दरवाज़े पर खड़ा है—न पूरी तरह बाहर, न भीतर। कवि कहता है—“अभी बाकी है दुनिया का एक अध्याय” यह पंक्ति आशा का संकेत है कि इतिहास समाप्त नहीं हुआ, संघर्ष शेष है। ‘तुम कल आना’ लोकतंत्र को टालना नहीं, बल्कि उसे अधूरी तैयारी के बीच भीतर न आने देने की सजगता है। अंतिम पंक्तियाँ कविता का सबसे तीखा वक्तव्य हैं—“मैं प्रतीक्षा से पीड़ित नहीं हुआ/जितना कि प्रधानमंत्री की भाषा से।” यहाँ ‘भाषा’ सत्ता की शैली, वक्तव्य और संवादहीनता का प्रतीक है। कवि स्पष्ट करता है कि सत्ता की भाषा मनुष्य को केवल भ्रमित नहीं करती, बल्कि उसे मानसिक रूप से घायल करती है। यह कविता समकालीन हिंदी कविता की उस परंपरा में खड़ी है जहाँ निजी अनुभव राजनीतिक हो जाता है। कवि नारा नहीं देता, बल्कि अनुभव के स्तर पर सत्ता की आलोचना करता है। यही इसे प्रभावी बनाता है। प्रधानमंत्री की भाषा पर सीधी टिप्पणी कविता को समकालीन बनाती है। यह जोखिम भरा लेकिन ज़रूरी हस्तक्षेप है।
पराग पावन के इस संग्रह की ‘अलविदा भाई तुलसीदास!’ कविता समकालीन हिंदी कविता की एक ऐसी रचना है जो परंपरा से संवाद नहीं, बल्कि उससे टकराव और आत्ममंथन का रिश्ता स्थापित करती है। यह कविता तुलसीदास को केवल भक्ति-परंपरा के कवि के रूप में नहीं देखती, बल्कि उन्हें भाषा, नैतिकता और सामाजिक विवेक के प्रतिनिधि के रूप में पुनर्परिभाषित करती है। कविता का स्वर शोकाकुल नहीं, बल्कि गहरी वैचारिक बेचैनी से भरा हुआ है। कविता की आरंभिक पंक्तियाँ—“ताकत से पैदा हुआ पहाड़/ताकत का और ऊँचा पहाड़ पैदा करता है” सत्ता के चक्रीय और आत्मविस्तारवादी स्वरूप को उद्घाटित करती हैं। यहाँ ‘पहाड़’ शक्ति का रूपक है, जो यह संकेत देता है कि बल से उत्पन्न संरचनाएँ अंततः और अधिक दमन को जन्म देती हैं। इसके बरक्स, ‘अमावस की सबसे घनी रात’ और ‘जुगनू का डर’ जैसे बिंब यह स्पष्ट करते हैं कि अंधकार के भीतर भी भय और आशा का द्वंद्व सक्रिय रहता है। कविता में तुलसीदास को संबोधन करते हुए कवि समकालीन समाज कीसंवेदनहीन राजनीतिपर तीखा प्रहार करता है—“सम्बोधनों की राजनीति में प्रश्नों का बेताल छिपा रहता है” यह पंक्ति दर्शाती है कि आज भाषा संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि प्रश्नों को दबाने और उत्तरों को अपदस्थ करने का औज़ार बन चुकी है। गालियों का ‘घुस आना’ केवल भाषिक पतन नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक गिरावट का सूचक है। कविता की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह कविता की भूमिका पर ही प्रश्न खड़ा करती है—“कुछ नहीं किया जा सकता कविता की लय का/ जिसमें गुलामी की प्रस्तावना है” यहाँ कवि स्पष्ट करता है कि सौंदर्य, लय और अलंकार तब तक मूल्यहीन हैं, जब तक वे स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़े न हों। कविता यदि सत्ता का सौंदर्यीकरण करने लगे, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है। अंतिम खंड में ‘धर्म की घोड़ी’, ‘इतिहास का मैदान’, ‘चाँदी के प्याले में रखा ज़हर’ जैसे बिंब कविता को तीव्र व्यंग्यात्मक ऊँचाई प्रदान करते हैं। ये बिंब बताते हैं कि धर्म, इतिहास और संस्कृति जब सत्ता के हाथों में सौंप दिए जाते हैं, तो वे जीवनदायी नहीं, बल्कि विषैले हो जाते हैं। “शब्दों की हैसियत ज़िन्दगी से मापी जाती है” यह पंक्ति कविता का केंद्रीय निष्कर्ष है। यहाँ शब्दों का मूल्य उनके अलंकरण से नहीं, बल्कि उनके जीवन-सापेक्ष सत्य से तय होता है। यही दृष्टि इस कविता को समकालीन प्रतिरोधी काव्य की परंपरा में स्थापित करती है।
‘सिर्फ़ कश्मीर नहीं’ पराग पावन की उन कविताओं में है जो किसी एक भौगोलिक या राजनीतिक प्रश्न तक सीमित न रहकर पूरे राष्ट्र-जीवन की नैतिक और मानवीय संरचना पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। शीर्षक स्वयं कविता की वैचारिक दिशा स्पष्ट कर देता है—यह रचना कश्मीर को प्रतीक बनाकर उस व्यापक असंवेदनशीलता की ओर संकेत करती है, जो धीरे-धीरे पूरे समाज में सामान्यीकृत होती जा रही है। कविता का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका सीधा, लगभग अभियोगात्मक संबोधन है—‘दोस्त!’। यह संबोधन पाठक को सुरक्षित दूरी पर नहीं रहने देता, बल्कि उसे नैतिक कटघरे में खड़ा कर देता है। कवि राष्ट्र-गौरव के अमूर्त नारों के बरक्स देह, भूख, थकान, प्यास और मृत्यु जैसे ठोस अनुभवों को रखता है। ‘एक बिस्तर-भर सो पाओगे’, ‘दो आलू के मुकाबले छोटी भूख’, ‘अपना ही कुआँ’ जैसे बिंब नागरिक जीवन के संकुचन और आत्मकेंद्रितता को तीखे व्यंग्य में बदल देते हैं। कविता में हिंसा केवल गोलियों या युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि चुप्पी, सुविधा और उदासीनता के रूप में उपस्थित है। ‘आख़िरी आदमी के क़त्ल’ की प्रतीक्षा दरअसल उस सामाजिक मनःस्थिति की आलोचना है, जो तभी जागती है जब सब कुछ समाप्त हो चुका होता है। इस अर्थ में यह कविता नैतिक चेतना के क्षरण का दस्तावेज़ बन जाती है। उत्तरार्द्ध में कविता का स्वर और अधिक करुण तथा राजनीतिक हो उठता है। ‘सरहदों के उलझे मसले’, ‘कनस्तर के उत्सव’ और ‘शब्दकोश से प्रेम और करुणा का विदा लेना’—ये पंक्तियाँ बताती हैं कि समस्या केवल सत्ता की नहीं, बल्कि भाषा, स्मृति और संवेदना के क्षरण की भी है। कवि यह स्पष्ट करता है कि जब समाज का शब्दकोश बदल जाता है, तब हिंसा स्थायी नागरिक यथार्थ बन जाती है। कविता का अंतिम प्रश्न—‘किस ख़ाने में छुपाओगे?’—सिर्फ़ राजनीतिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि हर उस नागरिक से है जो व्यवस्था की क्रूरता को निजी सुविधा के ख़ानों में छुपा देता है। यही प्रश्न इस कविता को साधारण प्रतिवाद से ऊपर उठाकर नागरिक आत्मालोचना की रचना बनाता है। संक्षेप में, ‘सिर्फ़ कश्मीर नहीं’ समकालीन हिन्दी कविता में नैतिक बेचैनी, राजनीतिक विवेक और मानवीय करुणा की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। यह कविता पाठक से सहानुभूति नहीं, जवाबदेही माँगती है—और यही इसकी सबसे बड़ी सिद्धि है।
“धान रोपती औरतें” कविता ग्रामीण स्त्री के श्रम, संवेदना, त्याग और अदृश्य संघर्ष को केंद्र में रखती है। धान रोपते हुए औरतें जिस श्रमशीलता से खेत में बुवाई करती हैं, वही श्रम वे घर में भोजन, देखभाल और परिवार की निरंतरता में भी दोहराती हैं। कविता स्पष्ट करती है कि जीवन की उत्पादकता का मूल स्त्रोत स्त्री है— खेत में भी और घर में भी। कवि ने खेत, पानी, मिट्टी, आग, चूल्हा, चावल, दाल, बच्चे आदि जीवन के अत्यंत साधारण प्रतीकों से बेहद सशक्त बिम्ब रचे हैं। “धान की रोपाई — बाण की कलम” और“गीली मिट्टी की स्याही से खेत के काग़ज़ पर लिखना”ये रूपक न केवल दृश्यात्मक हैं बल्कि श्रम को सृजन में बदल देने वाला सौंदर्य भी रचते हैं। रोपाई के बाद औरतें घर लौटती हैं और पुनः रसोई में ‘चावल’ को पकाकर ‘भात’ और ‘दाल’ बनाती हैं। अर्थात खेत में बोया अनाज घर में भोजन के रूप में लौट आता है — यह श्रम की चक्रीयता का रूपक है। कविता यह भी बताती है कि स्त्री का श्रम कहीं भी अवकाश नहीं मांगता; उसमें विश्राम भी एक देरी से मिला ऋण-सा है —“कल सुबह सबसे पहले उठने के लिए रात को सबसे बाद में सो जाएँगी।” कविता पुरुषप्रधान समाज के उन क्षेत्रों को उजागर करती है जहाँ श्रम तो स्त्री करती है पर उसका श्रेय, पहचान और महत्व अदृश्य रह जाता है। भोजन खिलाना, बच्चों और पति को सँभालना, और अंत में स्वयं “बर्तन में बचा हुआ” खाना— यह स्त्री के आत्मत्याग का प्रतीक है। यह कविता किसान जीवन, ग्रामीण संस्कृति और स्त्री-श्रम के त्रिकोण का प्रतिनिधित्व करती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ किसान स्त्रियाँ हैं — यह तथ्य कविता में शांत पर तीखी उपस्थिति रखता है। इसमें श्रम-सौंदर्य और श्रम-व्यथा दोनों साथ में दिखाई देते हैं। भाषा साधारण, ग्रामीण, बोलचाल के निकट और अत्यंत दृश्यात्मक है। यही भाषा कविता को लोक-संवेदना से जोड़ती है। रूपक, प्रतीक, मानवीकरण और पुनरावृत्ति (repetition) का संयमित प्रयोग कविता को सौंदर्य और गहराई देता है। कविता अंत में एक प्रश्न पर लौटती है —“आख़िर क्या लिखती हैं?” यह प्रश्न खुला है — उत्तर पाठक पर छोड़ दिया गया है। संकेत यही है कि औरतें अपनी मिट्टी, शरीर, समय और जीवन से दुनिया की खेती लिखती हैं; उनके श्रम और प्रेम से ही जीवन का अर्थ आगे बढ़ता है। यह कविता स्त्री को ‘उत्पादक शक्ति’ (productive force) और ‘पालनहार’ (nurturer) दोनों रूपों में रेखांकित करती है। इसमें करुणा भी है, गर्व भी, और विद्रोही अंतर्धारा भी— बिना किसी ऊँचे स्वर के। यह कविता सिर्फ धान रोपती औरतों की नहीं, बल्कि हर उस स्त्री की कहानी है जो अपने श्रम, त्याग और प्रेम से दुनिया को टिकाए रखती है, पर स्वयं उसकी कहानी अनलिखी और अनपहचानी रह जाती है। कविता इन “अनलिखी स्त्रियों” को साहित्य में दृश्यता देती है — यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।
इस संग्रह को पढ़ते हुए मुझे ये यह महसूस हुआ है कि पराग पावन की कविताएं किसी तात्कालिक उत्तेजना का परिणाम नहीं है, बल्कि एक गहरी वैचारिक तैयारी और अनुभवजन्य बेचैनी से जन्मी है। शायद यही कारण है कि ये कविताएँ पाठक को उत्तेजित कम, बेचैन अधिक करती हैं। वे तत्काल समाधान नहीं देतीं, बल्कि प्रश्नों के साथ छोड़ देती हैं—और यही उनकी कविताओं की सबसे बड़ी सफलता है। एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी दिखाई देती हैं कि कवि पीड़ित की भूमिका में आत्मदया नहीं रचता। वह सत्ता की आलोचना करता है, अपने समय की सामाजिक चुप्पी और सामूहिक निष्क्रियता पर सवाल भी उठाता है। इस दृष्टि से ये कविताएँ केवल प्रतिरोध की नहीं, बल्कि आत्मालोचना की कविताएँ भी हैं। कवि बार-बार यह संकेत करता है कि डर केवल ऊपर से थोपा नहीं गया है, वह भीतर भी बस चुका है। अपने पहले संग्रह में ही पराग पावन यह स्पष्ट कर देते हैं कि वे समकालीन हिन्दी कविता में एक सजग, जिम्मेदार और वैचारिक हस्तक्षेप करने वाले कवि हैं। यह संग्रह उस पीढ़ी की आवाज़ है, जो मुस्कराना चाहती है, लेकिन जानती है कि समय उससे पहले उसकी नीयत पर शक करता है।
भाषा के स्तर पर पराग पावन की कविताएँ सजावटी नहीं हैं। वे एक संयत, सधी हुई और तर्कपूर्ण काव्य-भाषा का निर्माण करती हैं। शब्द अनावश्यक भावुकता से मुक्त हैं, लेकिन उनमें संवेदना की तीव्रता बनी रहती है। यह संयम उनकी कविताओं को नारेबाज़ी से बचाता है और उन्हें वैचारिक गहराई प्रदान करता है। बिंब रोज़मर्रा के जीवन से उठाए गए हैं—शरीर, सड़क, घर, हथियार, डर, चुप्पी—जो पाठक को कविता के भीतर खींच लेते हैं। शिल्प की दृष्टि से यह संग्रह एकरस नहीं है। यहाँ व्यंग्य है, आख्यान है, संवाद है और आत्मस्वीकृति भी। ‘कथा कहूँ कवि गंग की’ जैसी सुदीर्घ कविता यह स्पष्ट करती है कि पराग पावन कविता को केवल भावाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक अनुशासित विधा के रूप में लेते हैं। ‘गाँव 2020’ का अतियथार्थ यह दिखाता है कि कवि यथार्थ को जस-का-तस रखने में नहीं, बल्कि उसकी विकृतियों को उजागर करने में अधिक विश्वास करता है। ‘बेरोज़गार’ कविता-शृंखला इस संग्रह की वैचारिक धुरी है। यहाँ बेरोज़गारी मात्र आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, पहचान और भविष्य के स्थगन की पीड़ा बनकर आती है। इन कविताओं में एक नागरिक मन की उदासी है—वह उदासी जो व्यवस्था से नहीं, अपनी ही उम्मीदों से ठगी गई है। लेकिन यह संग्रह केवल निराशा पर समाप्त नहीं होता। पराग पावन की कविता प्रेम को प्रतिरोध का विलोम नहीं, उसका सहचर मानती है। समकालीन हिन्दी कविता अपने समय की राजनीतिक संवेदनाओं और सामाजिक विडम्बनाओं से गहरे स्तर पर संवाद करती रही है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में रची गई कविताओं में भय, असहमति के दमन और नागरिक स्वतंत्रता के क्षरण जैसे प्रश्न विशेष रूप से उभरते हैं। पराग पावन का कविता-संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ इसी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में एक महत्त्वपूर्ण काव्यात्मक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। यह संग्रह उस स्थिति को रेखांकित करता है जहाँ मनुष्य की सहज प्रतिक्रियाएँ भी राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। कवि किस प्रकार भाषा, बिंब और संरचना के माध्यम से अपने समय की सत्ता-संरचना और सामाजिक चुप्पी की आलोचना करता है।
अन्ततः मैं कह सकती हूँ कि ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय का एक काव्यात्मक दस्तावेज़ है—जो यह दर्ज करता है कि किस तरह हँसी भी इतिहास के कठघरे में खड़ी हो सकती है। ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ शीर्षक स्वयं में एक सांस्कृतिक वक्तव्य है। ‘हँसी’ सामान्यतः विश्वास, सहजता और मानवीय निकटता का प्रतीक मानी जाती है, परन्तु उसका ‘संदिग्ध’ हो जाना सामाजिक-राजनीतिक अविश्वास की स्थिति को प्रकट करता है। यह शीर्षक संकेत देता है कि समय ऐसा है जहाँ भावनाएँ भी निगरानी और संदेह के दायरे में आ चुकी हैं। इस प्रकार शीर्षक पूरे संग्रह की वैचारिक धुरी का कार्य करता है। पराग पावन का यह काव्य-संग्रह समकालीन हिन्दी कविता में एक गंभीर, सजग और मानवीय हस्तक्षेप है। यह उस युवा कविता का उदाहरण है जो न तो जल्द निष्कर्षों में विश्वास करती है और न ही आसान आश्वासनों में—बल्कि सवालों के साथ खड़े रहने का साहस करती है। पराग पावन द्वारा रचित कविताओं की यही ताकत है कि वो सत्ता से डरकर नहीं, सत्य से प्रतिबद्ध होकर बोलती है। कविता जानबूझकर किसी समाधान की ओर नहीं जाती। यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति है—यह कविता प्रश्न जगाती है, दिशा पाठक पर छोड़ देती है।
सन्तोष विश्नोई
सहायक प्राध्यापक एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लक्ष्मी नारायण दूबे महाविद्यालय, मोतीहारी, बिहार
(अंगीभूत इकाई बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर)
santosh.vishnoi2010@gmail.com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा


एक टिप्पणी भेजें