स्मरण : विनोद कुमार शुक्ल होने के लिए शुक्रिया / पूनम वासम

विनोद कुमार शुक्ल होने के लिए शुक्रिया
- पूनम वासम 


आप जब आकाश की तरफ देखते हैं तो लगता है कि आकाश बहुत ऊँचाई पर है। तब मन में एक बचकानी सी इच्छा होती है कि काश उस ऊँचाई को थोड़ा कम किया जा सके। जैसे हम आकाश और अपने बीच की दूरी घटाने के लिए बीच में एक स्टूल रख दें और उस पर खड़े हो जाएं। दूरी सच में कितनी कम होती है, यह उतना जरूरी नहीं, जितना जरूरी यह है कि मन यह मान ले कि उसने आकाश तक पहुंचने की कोशिश की है। एक फुट ही सही, पर ऊँचाई के सामने खड़े होने का साहस तो हुआ।

इसी तरह जीवन भी कई बार अपने आकाश जितना ऊँचा और दूर हो जाता है। उलझनों में घिरा हुआ। निरुद्देश्य और भारी। तब मन कुछ ऐसा खोजता है जो उसे फिर से जमीन पर टिकाए, फिर से अर्थ दे, फिर से सांस लेने लायक बना दे। ऐसे समय में मैं एक छोटी सी पुड़िया खोलकर बैठ जाती हूं। उस पुड़िया में इस सदी के महानायक यानी मेरे पुरखा लेखक विनोद कुमार शुक्ल की ढेरों जादुई बातें हैं। वे बातें जो दिल और दिमाग दोनों पर बराबर असर करती हैं। वे बातें जो यह भरोसा देती हैं कि भाषा सिर्फ कहने का माध्यम नहीं है, भाषा बचाने की चीज है।मनुष्य को बचाने के लिए भाषा को बचाना कितना जरूरी है।

वह फरवरी का ही महीना था। प्रेम का महीना। इन्हीं दिनों मिलना तय हुआ उस शख्सियत से जो मेरा प्रेमी नहीं, मेरा दोस्त नहीं, पड़ोसी नहीं, रिश्तेदार भी नहीं। फिर भी मेरा मन उनके लिए ऐसा बेचैन हो उठा था कि दिल और दिमाग दोनों को समझाना कठिन हो गया। पहली बार समझ में आया कि किसी लेखक से मिलने की इच्छा भी प्रेम की तरह होती है।वह प्रेम जो एक चेहरे को देखने के लिए नहीं, बल्कि उसके भीतर बैठे हुए उस मनुष्य को छूने के लिए तड़पता है, जिसके भीतर सम्वेदनाओं की लबालब भरी हुई एक गहरी नदी बह रही है।

यह कितना कठिन समय है कि इस समय में एक साधारण मनुष्य रह पाना भी आसान नहीं रह गया। इस समय में एक असाधारण लेखक बने रहना और फिर भी अपने भीतर साधारण मनुष्य को बचाए रखना, मेरे लिए बेहद असाधारण सी बात थी। मैं उनसे मिलने जा रही थी और यह सोचकर ही मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी कि मैं उन आंखों के सामने बैठूंगी जो दुनिया को जीतने के लिए नहीं, दुनिया को देखने, महसूसने और समझने के लिए बनी हैं। मैं उन आंखों को पढ़ने के लिए बेसब्र थी, जिनमें भाषा खेलती कूदती, हँसती, गाती, रोती, सवाल उठती, जवाब देती, कल्पनाओं के भीतर बाहर एक छत्र अपना राज-पाट चलाती है।उन आँखों में एक मनुष्य की मनुष्यता कैसे समाई हुई है यही देखना था मुझे।

उनके घर का आंगन अपने आप में कविता की तरह था। ढेर सारे पेड़ पौधे और उन्हीं में से एक पेड़ के नीचे, कुर्सी पर बैठे हुए विनोद जी। कोई बनावटी मुद्रा नहीं। बस एक सामान्य मनुष्य की तरह जो जैसे रोज की तरह बैठा हो और जैसे रोज की तरह ही दुनिया को देख रहा हो। उन्हें देखते ही आंखें अपने आप भीग गईं। मैंने कहा, दादा जोहार। उन्होंने मुस्कुराकर बड़ी आत्मीयता से जवाब दिया।यह मुस्कान इस सदी के महान लेखक की नहीं थी यह मुस्कान किसी बुजुर्ग की थी, किसी ऐसे व्यक्ति की जो मनुष्य को मनुष्य की तरह देखता हो, जिसके भीतर प्रेम भरा हो।

मैं एक बहुत बड़े कवि के सामने कैसे बैठूं, कैसे खड़ी रहूं, कैसे बात करूं, मुझे इसकी कोई तमीज नहीं थी। मैं सीधे उनके सामने रखी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। और फिर बस उन्हें देखती रही। मैं उस लेखक को देख रही थी जिसे पढ़कर मैंने भाषा से प्रेम करना सीखा, प्रतिरोध सीखा, सवाल पूछने का सलीका सीखा, जवाब देने की तमीज सीखी। मैंने उनके शब्दों से जल जंगल जमीन की संवेदना के साथ जीना सीखा था। मैं एक कवि से नहीं मिल रही थी, मैं उस भाषा के जादूगर से मिल रही थी जिसने अपनी भाषा के भीतर एक रहस्यमय संसार अकेले ही रचा और फिर उसे इतनी सादगी से हमारे सामने रख दिया कि हम समझ ही नहीं पाए कि यह सादगी कितनी बड़ी साधना है।

मुझे लगा जैसे कोई छोटा सा पक्षी चुपचाप अपने घोंसले में बैठकर दुनिया को टुकुर -टुकुर देखता हो, वैसे ही मैं उन्हें देख रही थी। उनकी निश्छल हंसी सुन रही थी। इस समय जब दुनिया में हर तरफ क्रोध और शोर है, ऐसी हंसी धरती को उपजाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी लगती है। उनके चेहरे पर प्रसिद्धि नहीं थी, उनके चेहरे पर उपलब्धि नहीं थी, उनके चेहरे पर कोई अहंकार नहीं था। उनका चेहरा ऐसा था जैसे वह रोज सुबह उठकर चुपचाप चाय-पानी पीकर दिन भर उतनी ही चुप्पी से अपने हिस्से का काम करते हों, बिल्कुल वैसा ही जैसा एक सामान्य व्यक्ति करता है।। उनकी चाल में जल्दी नहीं थी। उनके ठहरने में भी एक तरह की कवितामय भाषा थी। उनका बोलना भी बोलने जैसा नहीं लगता था, लगता था जैसे कोई कविता सुन रहे हों या किसी सुंदर गद्य का कोई हिस्सा, जिसे कोई जोर-जोर से पढ़कर सुना रहा हो।

मैंने आग्रह किया कि दादा, कुछ अपने और अपने लेखन के विषय में बताइए न। उनसे जो भी बातचीत हुई, वह सारा कुछ मैंने रिकॉर्ड कर लिया।

(विनोद कुमार शुक्ल की बातचीत ज्यों का त्यों)

लिखने की इच्छा होती है और कभी न लिखने की भी, यह इच्छा एक नशे की तरह होती है, जिससे सोच में भी नशा आ जाता है। यह नशा आदत का भी है, कविता लिखने की आदत, एक बार लिखना शुरू किया तो इसकी आदत पड़ गई। लेकिन यह सिर्फ आदत नहीं है, बल्कि अपनी बात कहने, अपनी अभिव्यक्ति को खोजने की एक कोशिश भी है। इस अभिव्यक्ति की खोज में हम प्रतीकों, बिंबों और रूपकों का सहारा लेते हैं, यह एक अभ्यास जैसा लगता है लेकिन इससे कोई उस्तादी नहीं आती। यह नहीं कि मैं पैंसठ साल से कविता लिख रहा हूँ तो अब कविता लिखने का उस्ताद हो गया हूँ। ऐसा आत्मविश्वास कभी नहीं हुआ। कविता लिखना हर बार पहली बार लिखने जैसा ही होता है। मैं किसी को शागिर्द भी नहीं बना सकता, लेकिन किसी की कविता को देखकर उसे अपने ढंग से गढ़ने की इच्छा हो सकती है। मुक्तिबोध जी ने मेरी कविताओं को कहीं-कहीं सुधार भी दिया था ऐसे प्रभाव साहित्य में स्वाभाविक हैं।

हम अभिव्यक्ति को खोजते हैं और जब उसे ठीक-ठीक पकड़ लेते हैं, तो वही कविता बन जाती है। लेकिन जैसा मैंने कहा, इसमें उस्तादी नहीं आती, आज भी मैं जो कविता लिखता हूँ, वह पहली कविता की तरह ही होती है नएपन और अनिश्चितता से भरी हुई। छंद पद्यात्मकता का एक सहारा है, एक लाठी, पुराने समय में छंद का उपयोग स्मरणशक्ति को बढ़ाने के लिए होता था। लय और संगीत कविता को याद रखने में सहायक होते हैं। मुक्तिबोध जी ने मुझसे कहा था "छंदात्मक कवियों को पढ़ो" उन्होंने तुलसी, घनानंद, सूरदास को पढ़ने की सलाह दी थी। यहाँ तक कि फिल्मी गीतों को भी मैं गुनगुनाता था, कभी-कभी शब्द भूल जाता तो अपनी कल्पना से नए शब्द जोड़ भी लेता था। राजनांदगांव में मेरे घर के सामने कृष्णा टॉकीज़ था, वहां से सेकंड शो के संवाद हमें सुनाई देते थे और हम उन्हें सुनकर आनंद लेते थे। बच्चों के लिए लिखते समय मैं लय का विशेष ध्यान रखता हूँ, उदाहरण के लिए यदि मैं जिराफ पर लिखूँ तो उसके साथ ‘लिहाफ’ को जोड़ देता हूँ।

पहले मैं कम लिखता था, महीने में दस-बारह कविताएँ लिख लेने पर लगता था कि बहुत लिख लिया। नौकरी थी, पढ़ाने की तैयारी करनी पड़ती थी, गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ थीं। लिखने की शुरुआत नौ-दस साल की उम्र में हुई। मेरे चचेरे भाई भगवती प्रसाद शुक्ल बहुत अच्छा लिखते थे, उन्होंने खंडकाव्य भी लिखे थे। राजनांदगांव में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी थे, जिनकी वजह से साहित्यिक माहौल मिलता था। घर में पत्रिकाएँ आती थीं, चाँद, माधुरी, कल्याण जो साहित्य और अध्यात्म की पत्रिकाएँ थीं इससे घर पर एक साहित्यिक वातावरण बन गया था। मेरी माँ कहती थीं "अपने परिवार के बारे में जरूर लिखना" और मैं मानता हूँ कि मेरा सारा लेखन आत्मकथात्मक है। कहीं अधिक, कहीं कम, कहीं प्रत्यक्ष, तो कहीं परोक्ष रूप में मैं उसमें मौजूद हूँ। मेरी अधिकांश रचनाएँ मेरे आसपास के लोगों पर ही आधारित हैं। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ मेरी अपनी गृहस्थी की कहानी है।

लिखने की शुरुआत कविता से हुई और अंत भी कविता से ही होगा। मौलिकता को बचाना बहुत जरूरी है। पूरा संसार रचनात्मकता से भरा हुआ है। आकाश को हमने बनते नहीं देखा, लेकिन हम उसकी कल्पना कर सकते हैं, उसकी ऊँचाइयों को महसूस कर सकते हैं। मैं अपनी कल्पना में आकाश की ऊँचाई को कम करने के लिए एक स्टूल पर खड़ा हो जाता हूँ। इससे भले ही दूरी बस एक फुट कम होती हो, लेकिन यह भी एक कोशिश है। मौलिकता की राह खोजने की कोशिश कीजिए, यह जरूरी नहीं कि आपकी कविता छंद में बंधी हो। छंद से मुक्ति, कविता की भी मुक्ति है। कविता के लिए छंद आवश्यक नहीं, बल्कि उसकी अभिव्यक्ति आवश्यक है गद्य में भी काव्यत्व होना चाहिए।

मेरा गद्य हमेशा असमतल रहा है, ऊबड़-खाबड़, संघर्षों से भरा। सुख इसमें कम ही रहा। हमारी ज़िंदगी में जो दुख और करुणा है, उसे पकड़ने में गद्य मदद करता है। यह जल्दी लिखाया जाता है, जल्दी समझ में आता है। लेकिन जल्दबाजी में हम कभी-कभी गिर भी जाते हैं, और फिर उठने के लिए कविता का सहारा लेना पड़ता है।

जब मैंने लिखना शुरू किया तो कभी-कभी भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियाँ मेरी कविता में आ जाती थीं, मेरे बड़े भाई ने डाँटा और कहा "यह भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्ति है, यह कैसे आ गई?" उन्होंने मेरी कॉपी में लिख दिया

"उम्मीदें जितनी कम होंगी, सदमे भी उतने कम होंगे।"

उन्होंने समझाया "किसी से उम्मीद मत करना, अपने आप से भी नहीं कि तुम कुछ कर पाओगे, बस यह मानकर चलो कि तुमने कोशिश की, लेकिन कुछ पाया नहीं।"

अम्मा ने मुझे समझाया "हर चीज़ की छन्नी होती है जैसे आटे की छन्नी होती है, वैसे ही कविता की भी एक छन्नी बनाओ। कोशिश करो कि उसमें दूसरों की कविता न आए।"

पढ़ने की छाप हमेशा बनी रहती है यदि हम अच्छा पढ़ते हैं, तो आगे बढ़ते हैं लेकिन बुरा पढ़ने से हम पिछड़ सकते हैं इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने मूल स्वर को पहचानें और उसी की ओर बार-बार लौटें।

मेरे लिए अंतिम सत्य यही है कि "लिखने की शुरुआत कविता से हुई थी, और अंत भी कविता से ही होगा।"

उनकी बातें सुनते -सुनते ऐसा लगा जैसे आंगन, यहां तक कि पेड़ पर बैठी चिड़िया भी कुछ देर के लिए यह भूल गई हो कि वह चिड़िया है और उसका काम चहकना है। बहुत देर बाद मैंने चुप्पी तोड़ते हुए उनसे कहा, दादा कुछ किताबें लेकर आई हूं आपकी, क्या आप एक किताब पर मुझे अपना आटोग्राफ देंगे। उन्होंने बारी-बारी सारी किताबों पर कुछ न कुछ लिखकर दिया। बोले कि इतनी दूर से आई हो, सारी किताबें भी लाई हो, तो एक ही किताब पर क्यों। सारी की सारी किताबों पर तुम्हारा हक बनता है। फिर उन्होंने सारी किताबों पर कुछ न कुछ लिखने लगे। जब मैंने देखा कि उन्होंने एक किताब पर मेरी कविताओं के लिए कुछ पंक्तियां लिखी है तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं वहीं जोर से चीखकर धन्यवाद दादा कहने लग गई।

बात कविताओं की प्रशंसा की नहीं थी। बात यह थी कि इतने बड़े कवि इतनी छोटी सी कवयित्री को पढ़ने की बात सामने से खुद ही स्वीकार कर रहे हैं। वह लेखक जो अपने पाठक को पाठक नहीं, अपना ही कोई मानता है। वह आदमी जो अपने सामने बैठे व्यक्ति को किसी प्रशंसक की तरह नहीं, एक बराबर के मनुष्य की तरह देख पा रहा हो, वह मनुष्य कितना असाधारण होगा। उनका जीवन भी उनके लेखन जैसा था, बहुत चुपचाप घटता हुआ। सरकारी नौकरी, साधारण घर, साधारण जरूरतें और भीतर एक सजग मन, जो हर चीज को बहुत ध्यान से देखता है। उन्होंने कभी साहित्य को जीवन के ऊपर नहीं बैठाया, उन्होंने साहित्य को जीवन के बराबर में रखा, ऐसे जैसे कोई घर में आए अतिथि को कुर्सी पर बैठाकर खुद भी पास ही बैठ जाए।

उनकी कविताओं में घर आता है, उनके गद्य में घर रहता है। उनके लेखन में दफ्तर आता है, दफ्तर की थकान आती है। रास्ते आते हैं, पेड़ आते हैं, कुर्सियां आती हैं, दरवाजे आते हैं, दीवारें आती हैं, जंगल आता है आदिवासी स्त्री आती हैं, पुरुष आता है लड़की आती है, और इन सबके बीच मनुष्य आता है। विनोद कुमार शुक्ल का महत्व इसी में है कि उन्होंने साधारण से साधरण बात, घटना को साधरण दिनचर्या को भी साहित्य बना दिया। उन्होंने हमें यह भरोसा दिया कि कविता कोई उत्सव नहीं है, वह रोजमर्रा का दिन है। वह दोपहर का सन्नाटा है, वह शाम की थकान है जिसके भीतर एक मनुष्य सांस ले रहा है, खा रहा है, सो रहा है, जाग रहा है।

उनकी भाषा में आक्रामकता नहीं है, पर उनकी भाषा कमजोर भी नहीं है। उनकी भाषा बहुत सहज और उतनी ही सहजता से वे बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं। उनकी चुप्पी में एक कठोर सच छिपा रहता है। आज जब शब्द बहुत ऊंची आवाज में बोले जाते हैं और भाषा को जीत हार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, विनोद कुमार शुक्ल हमें याद दिलाते हैं कि भाषा का एक काम यह भी है कि वह किसी को बचा ले। मनुष्य को बचा ले, स्मृति को बचा ले और उस नाजुक संतुलन को बचा ले, जो टूट जाए तो सब कुछ टूट जाना तय है।

उनका धरती पर होना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वे अपनी कविताओं में नारे की तरह नहीं आते, वे किसी आंदोलन के पोस्टर पर चस्पा की गई पंक्तियों की तरह भी नहीं आते, वे किसी विचारधारा के शोर की तरह नहीं हैं। वे एक ऐसे लेखक हैं जो मनुष्य के पक्ष में खड़े रहते हैं, पर अपने को बीच में नहीं लाते। उनका प्रतिरोध हथौड़े की तरह नहीं बल्कि वह पानी की तरह है, धीरे धीरे पत्थर को बदल देने वाला, नरम मुलायम कर देने वाला। जब मैं उनसे मिली तो मुझे लगा कि महानता कभी खुद को घोषित नहीं करती। वह बस हमारे आसपास मौजूद रहती है, हमारी बात कहती हुई, सवाल उठाती हुई और सबसे बड़ी बात हमारे पक्ष में खड़ी होती हुई। विनोद जी की मौजूदगी में एक नैतिक शांति थी। जैसे उन्होंने बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ सहा है, और फिर भी वे कड़वे नहीं हुए। कड़वाहट न होना इस समय में बहुत बड़ी उपलब्धि है यही उपलब्धि विनोद जी को विनोद कुमार शुक्ल बनाते है।

उस मुलाकात में बहुत बातें नहीं हुईं। मुझे लगा कि जैसे वे कहना चाहते हों कि धीरे चलो, देखो, सुनो, दुनिया अभी पूरी तरह खराब नहीं हुई है। मुलाकात के बाद भी दिल धड़क रहा था, लेकिन अब वह धड़कन खुशी से फूलकर गुप्पा होने की थी, वह धड़कन जिम्मेदारी की थी, कि ऐसी भाषा को बचाना है कि ऐसी दृष्टि को बचाना है कि इस समय में ऐसे मनुष्यों का होना, उनका किया व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। वे हमें यह सिखाते हैं कि बिना आक्रामक हुए भी जयघोष किया जा सकता है कि बिना ऊंचा बोले भी दूर तक सुना जा सकता है। शुक्रिया विनोद कुमार शुक्ल, विनोद कुमार शुक्ल होने के लिए।

पूनम वासम
1989 बस्तर, छत्तीसगढ़, साइंस म्यूजियम के सामने, ब्लॉक कॉलोन बीजापुर, छतीसगढ़-494444

(आदिवासी संवेदना के लिए नई पीढ़ी की उल्लेखनीय कवयित्री। "मछलियाँ गाएँगी एक दिन पंडुम गीत" कविता संग्रह वाणी प्रकाशन से प्रकाशित और सम्मानित। बस्तर की लोक संस्कृति, प्रकृति, जनजातीय जीवन के संघर्ष को अपनी कविताओं में स्वर देने वाली पूनम वासम देश के कई हिस्सों में कविता पाठ कर चुकी हैं। देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और ऑनलाइन माध्यमों में उनकी कविताएं लगातार प्रकाशित हो रही हैं।  पुनर्नवा पुरस्कार (2020), शब्द सम्मान (2022)  कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल बुक अवार्ड (2022) तथा 2025 में शमशादी ख़ानम स्मृति कविता सम्मान।)

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने