शोध आलेख : अनुदित पांडुलिपियों की रचनात्मक सृजनशीलता / भावना राठौर एवं नमिता त्यागी

अनुदित पांडुलिपियों की रचनात्मक सृजनशीलता
- भावना राठौर एवं नमिता त्यागी

शोध सार : भारत का चित्रकला के क्षेत्र में समृद्ध इतिहास रहा है, जो भारतीय चित्रकला की परम्परा, बहुरूपता, भावाभिव्यक्ति, धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए विश्वविख्यात रही है। भारत में पांडुलिपि चित्रण का स्वरूप 16वीं शताब्दी में मुगल सम्राटों के संरक्षण में विकसित हुआ, जो 14वीं शताब्दी में विकसित फारसी पांडुलिपि चित्रण से प्रेरित था। बाबर तथा हुमायूँ के काल में ईरानी शैली अपने मूल और अपरिवर्तित रूप में प्रचलित थी। अकबर के शासनकाल में इस शैली से एक नवीन कला का विकास हुआ, जिसे मुगल कला कहते हैं। अकबर के शासनकाल के दौरान पांडुलिपि चित्रण कागजी पुस्तक चित्रों तथा शबीह चित्रों की अधिकता थी। इस शोध पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार मूल पांडुलिपियों के अनुवाद के साथ-साथ उनकी चित्रात्मक प्रस्तुति में भी नवीन सृजनशीलता विकसित हुई। यह अध्ययन दर्शाता है कि अनुदित पांडुलुपियों का निर्माण फारसी और भारतीय कलाकारों के सहयोग से हुआ, जिसने न केवल कलात्मक नवाचार को प्रोत्साहन मिला, बल्कि सामाजिक सामंजस्य और सांस्कृतिक समन्वय की भावना भी सुदृढ़ हुई। अत: यह शोध पत्र अकबरकालीन अनुदित पांडुलिपियों की रचनात्मक सृजनशीलता, उनके कलात्मक महत्व तथा भारतीय कला इतिहास में उनकी भूमिका को समझने का प्रयास करता है।

बीज शब्द : लिपिबद्ध, पांडुलिपियां, मुगलचित्र कला, रज़्मनामा, लघुचित्र कला, सामाजिक सामंजस्य, साहित्य, भारतीय और फारसी कला, अंतर्सम्बंध, रचनात्मक सृजनशीलता।

मूल आलेख : भारतीय संस्कृति में अंतर्गत विद्या के तत्व ज्ञान का संप्रेषण मौखिक परंपरा के माध्यम से होता रहा है, जिसे श्रुत कहते हैं जबकि समृति के माध्यम से ज्ञान को संरक्षित रखने की परम्परा विकसित हुई। कालांतर में उसी ज्ञान को लिपिबद्ध किया गया और ग्रंथों के रूप में संकलित किया गया। प्राचीन समय के भारत में लेख या लिपि पत्थरों की शिलाओं पर लिखे जाते थे। भारत में मशीनी युग से पहले पुस्तक हाथ से लिखी जाती थीं, जिन्हें पोथी, ग्रंथ, पुराण, उपनिषद तथा पांडुलिपि आदि नाम से संबोधित किया गया है। संस्कृति की धरोहर के संरक्षण के लिए लिखित भाषा का प्रयोग किया जाता था। पांडुलिपियों में धार्मिक परंपराएं, पौराणिक कथाएं व नीतियों आदि को लिपिबद्ध किया गया था। “भारतीय पांडुलिपियां संस्कृत भाषा में लिखित हैं। यह हाथ से लिखी होने के कारण इन्हें पोथी, पांडुलिपि, लिपि ग्रंथ, हस्त प्रति व मातृकाग्रंथ भी कहा जाता है। पांडुलिपियां एक या एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा लिखी जाती हैं। अंग्रेजी भाषा में पांडुलिपि को मेनुस्क्रिप्ट कहते हैं, जो लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसमें मेनू का अर्थ- हाथ है और स्क्रिप्ट का अर्थ- लिखित प्रणाली अर्थात हस्तलिखित कार्य है।”1 पांडुलिपियों को लिखने का कारण उस समय ज्ञान का प्रसार करना, स्मृति का काम करता था। ऐसा देखा गया है कि यह केवल विद्वान और ब्राह्मण वर्ग ही लिखते थे। प्राचीन ग्रंथो में धार्मिक ग्रंथ ऐतिहासिक घटनाएं और परंपराओं की जानकारी मिलती है जो आज भी हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
 
“पांचवीं शताब्दी में चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा वृतांत में बंगाल के तमरालिप्त तमलुक क्षेत्र में पोथी चित्रण का उल्लेख मिलता है। फाह्यान का उल्लेख लगभग वात्सायन के कामसूत्र के समय का ही है और यह दोनों ही संदर्भ बड़े महत्वपूर्ण हैं, जो अलंकृत पोथियों एवं पोथी चित्रण की परंपरा का उल्लेख करते हैं।”2 पोथियों को चित्रित करने की परंपरा नवीं व दसवीं शताब्दी से प्रारंभ हो गई थी। भारत में भोजपत्र, भूर्जपत्र, सांची पात, कपड़ा, सुपरिमंथ फलक (काष्ठ) मुख्य रूप से लेखन एवं चित्रण के लिए प्रयुक्त होते थे। इस शती में भारत के निम्न राज्यों में बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा आदि प्रदेशों में पाल शासन के अंतर्गत एक चित्रकला शैली का प्रादुर्भाव हुआ जिसे लघु चित्रण (Miniature) कहा जाता है।

इसी दौरान बौद्ध और जैन हिंदू ग्रंथो पर चित्रण कार्य होने लगा। संस्कृत साहित्य में हमें भोजपत्र (तालपत्र) भुर्जपत्र पर लिखने के प्रमाण प्राप्त होते हैं पूर्वी भारत में पाल राज्यों के संरक्षण में पाल पोथियों का निर्माण हुआ, जो बंगाल तथा बिहार में लिखी गईं। यहां से दसवीं शताब्दी एवं परवर्ती काल की महायान बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक चित्रित पोथियां प्राप्त हुईं। यह सचित्र पोथियां ताड़ पत्र पर लिखी जाती थीं इसमें पृष्ठों के बीच-बीच में आयताकार और वर्गाकार स्थान रिक्त छोड़ दिए जाते थे। “पाल शैली की मुख्य सचित्र शैलियों में प्रज्ञापारमिता, साधन माला, पंचाशिका ग्रंथ आदि लघु चित्रित पोथियां प्राप्त हुईं। पाल ग्रंथों में अधिकतर सफेद, काले एवं लाल रंग से सुंदरता के साथ देवनागरी लिपि में लेख लिखे जाते थे। वही जैन ग्रन्थ में देखा जाए तो लाल से अतिरिक्त सोने से लेख लिखे गए हैं। इन पांडुलिपियों को मंदिर, बौद्ध मठों, जैन मंदिरों में संरक्षित किया जाता था।”3 इसके अतिरिक्त शास्त्रीय कला शैलियों का विकास हुआ, जैसे बौद्ध, जैन, पाल, गुजरात, अपभ्रंश, राजस्थानी, मुगल एवं पहाड़ी चित्र शैलियों ने भारतीय चित्रकला के गौरव को ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से आज तक सुरक्षित रखा है। अपभ्रंश शैली के चित्र अधिकतर श्वेतांबर जैनियों द्वारा लिखित ग्रंथों में तथा ग्रंथों पर आधारित ताड़ पत्रों पर पाए जाते गए हैं। यह पश्चिम भारत में विकसित लघु चित्रों की चित्रकला शैली थी जो 11वीं से 15वीं शताब्दी के बीच प्रारंभ में ताड़ पत्रों और बाद में कागज पर चित्रित हुई। “कागज के आविष्कार के पश्चात् चित्रण कार्य कागज पर भी शुरू हुआ और पाल शैली, जैन शैली में ताड़पत्रों, भोजपत्रों पर ग्रंथ चित्रण हुआ, जिससे बौद्ध की जातक कथाएँ तथा देवी देवताओं के चित्र अंकित किये गए”4

मुगल शासकों के आरक्षण में पाठ ग्रंथों के स्वरूप को व अलंकरण करने की कला को नया जीवन मिला। 16वीं शती के प्रारंभिक काल में पांडुलिपियों और व्यक्तिगत लघु चित्रों को विकसित रूप मिला। “मुगल शंहशाओं द्वारा कला का जितना भी सम्मान एवं संरक्षण होता गया, उनके शासन को उतनी ही अधिक समाजिकता, स्वीकृती एवं लोकप्रियता प्राप्त होती गयी।”5 भारत में पांडुलिपि चित्रण का स्वरूप 16वीं शताब्दी में मुगल सम्राटों के संरक्षण में भी अधिक विकसित हुआ। “मुगल कला का तेजी से विस्तार पांडुलिपि चित्रण और चित्रांकन से हुआ।”6 चित्रित पांडुलिपियों में चित्र ग्रंथों को आकर्षित और प्रभावशाली बनाते थे। माना जा सकता है कि अस्पष्टता के कारण चित्रित पंडुलिपियाँ स्थिरता और सहयोग प्रदान करती थीं। चित्रित पंडुलिपियाँ न केवल विचारोँ और ज्ञान का संवर्धन इसी करती थी बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान, शिक्षा कला और सांस्कृतिक परम्पराओं की रक्षा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इन्हें पांडुलिपियों का एक स्वरूप हमें मुगल काल में देखने को मिलता है, जिन्हें नामावलियों के नाम से जाना गया है इनकी प्रमुख पांडुलिपियों में केवल नाम लिखे जाते थे, जिनके माध्यम से मुगल कालीन जीवन शैली का ज्ञान प्राप्त होता है।

मुगल काल में नामा एक प्रमुख कला और संस्कृति के माध्यम के रूप में लिखे जाते थे। राजा और उनके दरबार के लोगों के शौक और रुचि को प्रकट करने का साधन करती थी। इन नामावलियों में विभिन्न प्रमुख घटनाओं, धार्मिक, काव्य, कला और रचनाओं का चित्रात्मक विवरण मिलता है। यह ऐतिहासिक और गैर ऐतिहासिक विषयों को शामिल किया। “महाभारत, गीत-गोविन्द, सूरसागर इत्यादि ग्रन्थों के आधार पर चित्रों का सृजन कर कलाकार अपने उद्देश्य की पूर्ति जनमानस को जागृत करने में करता था।”7 अकबर पहला सम्राट था, जिसने चित्रकारों को समझा और कला का भुगतान किया और पांडुलिपियों को चित्रित करने की कला को बढ़ावा दिया। “उसने व्यक्तिगत रूप से भारतीय और वार्षिक कलाकारों के काम की निगरानी की और अपने प्रतिभाशाली कलाकारों पर धन और उपाधियों का लुत्फ उठाया। मुगल काल का वैभव हमेशा कला प्रेमियों के सौंदर्य को भावना को आकर्षित करता है।”8 उसके काल में हिंदू और फारसी परंपराओं के समन्वय से अनुदित पांडुलिपियों में रचनात्मक सृजनशीलता का विकास हुआ।

मुगल हस्तलिखित पांडुलिपियां भारतीय कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तथा मुगल चित्रकला आकृति शैली और कला की विविधता का विवरण है। मुगलकाल में निर्मित चित्रित पांडुलिपियों का विकास विभिन्न कालों में किस प्रकार हुआ? मुगल कला की यह पांडुलिपियां मुगल दरबार के आदर्शों धर्म एवं संस्कृति को प्रदर्शित करती हैं। विभिन्न कालों में इन पांडुलिपियों में क्या भिन्नताएं थीं तथा इनको बनाने के मुख्य उद्देश्य क्या थे? यह पांडुलिपियां किस प्रकार मुगलकाल की व्यापक दृष्टिकोण को समझने में किस प्रकार सहायता करती हैं?

अकबर कालीन पांडुलिपियों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को स्पष्ट करना है। अकबर काल में पांडुलिपियों का केवल संरक्षण ही नहीं हुआ बल्कि उन्हें एक कलात्मक रूप भी प्रदान किया गया। अकबर ने हिंदू और फारसी धार्मिक ग्रंथों का फारसी में अनुवाद के साथ उन्हें चित्रित भी करवाया। पांडुलिपियों के माध्यम से विभिन्न संस्कृतियों के मध्य सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देने वाले पहलुओं का अध्ययन। अकबर के दरबार में हिंदू ईसाई बौद्ध धर्मों के समन्वय से ये देखने को मिलता है कि पांडुलिपियों की माध्यम से विभिन्न सांस्कृतिक संवाद को जोड़ा गया और चित्रों के माध्यम से धार्मिक ग्रंथों परंपराओं को बढ़ावा मिला भाषा और लिपि की कठिनाइयों को पार करके एक समावेशी समाज और सामाजिक सामंजस्य को भी स्थापित किया। इसका उद्देश्य विभिन्न सांस्कृतिक प्रक्रिया को समझना है। कला के माध्यम से समाज पर पड़े प्रभावों का विश्लेषण करना। मुगल कालीन पांडुलिपि चित्रकला समाज में चित्रों के माध्यम से संस्कृति को जोड़े रखती है की चित्रण में सामान्य लोगों के लिए आकर्षक तथा बहुत गम में बोधगम्य बनाया, जिसमें सामाजिक जीवन वेशभूषा स्थापत्य कला रीति रिवाजों, विचारों और उत्सवों को दर्शाया जाता। इसका उद्देश्य शिक्षा में और अधिक बढ़ावा देना व सामान्य जन को जोड़ने के माध्यम को दर्शाना है।

इस शोध विषय में संबंधित गहन शोध की संभावनाओं पर सुझाव तथा मुगल कालीन पांडुलिपियों के सांस्कृतिक प्रभाव का अध्ययन सम्मिलित है। मुगल पांडुलिपियां, शोधार्थियों कला विधार्थियों व एक बहुआयामी अध्ययन का क्षेत्र प्रदान करती है इसके माध्यम से कला के क्षेत्र में मुगल प्रभाव, समाज के विभिन्न वर्गों में भागीदारी व धार्मिकता को बारीकी से अनेक पहलुओं को समझना है।

पांडुलिपियों का मुख्य उद्देश्य भारतीय प्राचीन परंपरा का संरक्षण है। शोध पत्र में हिंदू और फारसी पांडुलिपियों का विश्लेषण सम्मिलित है जिसमें ऐतिहासिक विश्लेषणात्मक पद्धति का प्रयोग किया गया है। इस शोध कार्य में मुख्य उद्देश्य अकबरकालीन हिंदू और फारसी पांडुलिपियों के योगदान को समझना है। पांडुलिपियों का अध्ययन उनकी विषयवस्तु, चित्रण शैली और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को लेकर किया गया है। पांडुलिपि चित्रों के माध्यम से समाज में धार्मिक सांस्कृतिक परंपराओं के प्रभाव को दर्शाया गया है। इसके अंतर्गत हिंदू और मुगल पांडुलिपियों के अनुदित ग्रंथों के सचित्र संस्करणों का विश्लेषण करके यह पाया गया है कि अकबर ने किस प्रकार सामाजिक एकरूपता को बढ़ाया। “अपनी जटिलता,चमक और प्रतीकवाद के लिए प्रसिद्ध शैली और विषय- वस्तु दोनों में, इन मुगल पांडुलिपि लघुचित्रों में प्रभावों और अभिव्यक्तिओं की एक विस्तृत श्रृंखला समाहित थी।”9 पांडुलुपियों के द्वारा सामाजिक मूल्यों और चित्रकला के सांस्कृतिक आदान प्रदान को समझने का प्रयास किया गया है। “अकबर कालीन निर्मित पांडुलिपियों में मुख्यतः विषय भारतीय व अभारतीय कथाओं, दरबारी जीवन, ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक तथा व्यक्ति चित्रों युद्ध व आखेट आदि चित्रों में भी योगदान दिया।”10

मुगलों के शासनकाल के दौरान समग्र शैली परिष्कृत और स्पष्ट रूप से दरबारी शैली का अनुसरण करती है। 15 वीं शताब्दी में अनेक चित्रण पांडुलिपियां निर्मित की गई। आज भी लघु चित्रकला बहुत प्रचलित है। भारत में ही नहीं अपितु देश विदेशों में भी लघु चित्रकला अपना रूप फैलाए हुए है। मुगल शैली व उनके चित्र कलाकारों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है, जिसके अंतर्गत वह चित्रों की तकनीक विषय वस्तु अलंकरण आलेखन दृष्टिकोण मूल तत्व परिपेक्ष्य आदि का आधुनिक चित्रकला में प्रयोग करते हैं अर्थात आधुनिक समय में समकालीन चित्रकार भारतीय मध्यकालीन चित्रकला का अनुसरण कर रहे हैं। पांडुलुपियों में धार्मिक ग्रंथ ऐतिहासिक घटनाएं और परंपराओं की जानकारी मिलती है, जो आज भी हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

रज़्मनामा -

चित्र 1- हिंदू और मुस्लिम विद्वानों ने महाभारत का संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद किया, रज़्मनामा से चित्रण


रज़्मनामा संपूर्ण महाभारत का रूप है और यह भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण महाकाव्य को विशाल भूमि और समय के साथ अनेक कहानियां, उपदेशों और महत्वपूर्ण चित्रों को अभिव्यक्त करता है। महाभारत का संक्षिप्तिकरण सम्राट अकबर के आदेश पर किया गया था। रज़्मनामा को लिखने और चित्रित करने का उद्देश्य जो माना जाता है, वह अकबर की साहित्यों में रुचि के साथ हिंदू और मुसलमानों के बीच प्रचलित आपसी नफरत और कट्टरता को कम करने के लिए था। मुगल काल में सबसे महत्वपूर्ण वेशभूषा, उनका पहनावा था। वेशभूषा किसी भी सभ्यता में सामाजिक व राजनीतिक, संस्कृति और धर्म को निर्धारित करने के महत्वपूर्ण स्त्रोत के रूप में मानी जाती है। दमयंती असली नल की पहचान करके और उनको माला पहनाती हुई “चित्र में नल, दमयंती के स्वयंवर समारोह में जाते है और नल चार देवताओं, वरुण, इंद्र, अग्नि और यम से मिलते हैं। नल देवताओं की मदद कर दमयंती से उनके बगीचे में जाने के लिए उसकी मदद करते हैं और दमयंती की परीक्षा लेने के लिए सभी देवता नल का रुप धारण कर लेते हैं। पहचान के बाद दमयंती का नल स्वयंवर होता है।”11

इसमें आकृतियाँ अलग-अलग गतिविधियों के साथ बनायी गयी हैं, जो भारतीय पोशाकों से सुसज्जित हैं। इसमें पात्रों की बाहरी सीमाओं को स्पष्ट रेखा द्वारा चित्रित किया गया है तथा चित्रों में पोशाक और पगड़ी द्वारा सेना, दरबारियों, राजा के रूप को भिन्न करते हैं। इस चित्र में आकृतियों के अनुपात और आकार को बड़े ही कलात्मक रूप से चित्रण किया गया है तथा आकृतियों को आभूषणों के सूक्ष्म अलंकरण से सजाया गया है। चेहरे एक चश्म बने हुए हैं। जिसमें आंखें बड़ी व नोकदार बनायी गयी है। रंगों का संयोजन प्राथमिक रंग योजना के आधार पर किया गया है, जिसमें चित्र की समानता दिखाई पड़ती है। लाल, पीला, नीला, हल्का बैंगनी, काला, सफेद और हरा आदि रंग प्रमुख दिखाए गए हैं। महिला आकृतियों में पारदर्शी दुपट्टे के साथ सौंदर्यपूर्ण चित्रण है (चित्र 2)।

चित्र 2- “दमयंती असली नल की पहचान करके और उनको माला पहनाती हुई10

अकबरनामा -

यह ऐतिहासिक ग्रंथ अबुल फजल द्वारा लिखा गया जो उस समय के वह बहूविद थे। अकबरनामा (1600-1605) तीन खंडों में विभाजित है। अकबरनामा में शानदार रंगीन चित्रों में अकबर कालीन कला और संस्कृति के परिष्कार और वैभव को प्रदर्शित किया है। अकबरनामा तैयार करने के लिए अकबर के चित्रकारों ने अपनी अलग शैली का निर्माण किया जिसमें भारतीय फारसी और पश्चिमी परंपराओं के तत्वों को मिश्रित किया गया था।

चित्रित दृश्य में आगरा किले के सामने जमुना नदी पर नावों के पुल पर दुर्घटनाग्रस्त हुआ दिखाया गया है तथा सम्राट अकबर शाही हाथी के शिकार को दर्शाता है, जिसमें हाथी रण बाघा से लड़ने के लिए सवार हुआ है, जो उन्हें और उनके समूह को नदी के पार जंगली पीछा करने के लिए ले जा रहे हैं इस दृश्य में अकबर का चित्र राज्यसी शक्ति देवी सुरक्षा में विश्वास और साहस का प्रतीक है। यह चित्र शाब्दिक रूप से और प्रतीकात्मक रूप से उल्लेखनीय व्यक्ति की महत्वपूर्ण उपलब्धियों को दर्शाते हैं। इस चित्रण में फारसी चित्रकला के प्रारूप और बखूबी बनाए रखा है और लहरों की लयबद्धता में भी प्रकृति की परंपरा को भी समझाया है। दूसरे पैनल में चित्र दर्शन होठों पर उंगली को हल्के से दबाकर फारसी इशारे के माध्यम से विस्मय और भय व्यक्त करते हुए दिख रहे हैं। अन्य आकृतियों को विपत्ति में अपने हाथों को ऊपर की ओर फेंकते हुए हैं कुछ अपने शरीर को असंतुलित ढंग से रखते हुए हैं। चित्रों में देखा जाए तो भारतीय परंपरा और प्राथमिक रंगों के लिए विशेष रूप से गहरी लाल और पीले रंगों की प्राथमिकता को ध्यान में रखा गया है। पश्चिमी कलात्मक परंपराओं के तत्वों के साथ फारसी शैली की तुलना में आकृतियों के पैमाने चित्र तल से बड़े हैं तथा नावों, भवनों की गहराई से दूरी का आभास प्रतीत होता है (चित्र 3)। “विस्तृत और जटिल ज्यामितीय किनारों के साथ साथ कलाकृतियों में प्रयुक्त विशिष्ट दृश्य और परिप्रेक्ष्य भी फारसी लघुचित्रों की याद दिलाते हैं।”12 “अबुल फ़ज़ल लिखते हैं की 1564 ई. में हाथी के शिकार के बाद आराम करते हुए, अकबर ने आनंद के लिए कुछ देर तक दरबार खान से अमीर ह्मज़ा की कहानी सुनी।”13

चित्र 3- हाथी के शिकार पर सम्राट अकबर अकबरनामा से चित्र 

रामायण -

रामायण नामक पुस्तक भारत की सबसे प्राचीन और पवित्र हिंदू ग्रंथो में से एक है इसकी रचना मूल रूप से वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में की गई थी। रामायण का संस्कृत और हिंदी भाषा के अलावा फारसी में अनुवाद हुआ जिसे अबुल फजल के अनुसार सन् 1584 में सम्राट अकबर के आदेश पर अब्दुल कादिर बदायूंनी द्वारा फारसी में अनुदित कराया गया और यह लगभग 4 साल में पूरी हुई।

चित्र 4- अकबर कालीन फारसी रामायण से विशिष्ट की वार्ता का चित्र

विशिष्ट की वार्ता -

फारसी रामायण के अंतर्गत गुरु वशिष्ठ की वार्ता का वर्णन प्राप्त होता है, जिसमें राजा दशरथ की व्याकुलता बताई गई है। पिता के प्रेम से व्याकुल राजा दशरथ उनके गुरु वशिष्ठ के बीच वार्तालाप करते हुए दर्शाया गया है। इस चित्र में संभवतः श्रीराम को गुरुकुल भेजने के दुख कौन दर्शाया गया है। राजा पर क्रोधित होकर विश्वामित्र ने कहा कि राजन आप अपनी बात से पलट रहे हैं मैं यहाँ से जा रहा हूँ, तुम अपने सम्मान को सुरक्षित रखो। उनके क्रोध से सब तरह कोलाहल मच गया तब विशिष्ट ने समझाया कि आप क्षत्रीय हैं, धर्मात्मा और सत्य बोलने वाले हैं। धर्म को छोड़ते हैं तो यह उचित नहीं होगा और राजधर्म और कुल की परंपरा का पालन करना आवश्यक है। विश्वामित्र बुद्धिमान और तपस्या करने वाले हैं तथा ये विभिन्न प्रकार की अस्त्र विद्या जानते हैं। चित्र में राम और लक्ष्मण को विदा करते हुए दर्शाया गया है। रामायण के इस चित्र में हिंदू और फारसी शैली का समन्वय देखने को मिलता है, जिसमें आभूषण वेशभूषा आदि से भारतीय प्रभाव अपना परीलक्षित हो रहा है। जहाँ राजा दशरथ और कुछ आकृतियों को पारंपरिक धोती, मुकुट पहने चित्रण किया गया है तथा कुछ आकृतियों में मुगल कालीन पोशाक जामा (अंगरखा) पहने हुए चित्रित है। चेहरे की भाव भंगिमाओं को बारीक रेखाओं से उकेरा गया है। पृष्ठभूमि को समान रूप से विभाजित किया गया है (चित्र 4)। “चित्रकला के बारे में यह कहा जाता है कि वह अलंकरण और कथा के रूप में अवश्य रही होगी।”14

निष्कर्ष : अकबर कालीन पांडुलिपि ऐतिहासिक धरोहर के साथ सांस्कृतिक धरोहर भी रही है। यह पांडुलिपियां भारतीय और फारसी कला तत्वों के मिश्रण को दर्शाती है। शोध पत्र में पांडुलिपियों के चित्र धार्मिक ऐतिहासिक और गैर ऐतिहासिक विषयों के अनुकूल विश्लेषण प्राप्त होता है और साथ ही प्राचीन समय के संरक्षण को ही नहीं अपितु साहित्यिक और कलात्मक रूप को भी प्रकट किया गया है। अकबर काल के हिंदू का फारसी और ग्रंथों के अनुदित और सचित्र नामावलियों का निर्माण सांस्कृतिक विविधता के संवाद की दिशा में विद्रोहात्मक कदम था। यह सचित्र पांडुलिपियां मुगल, फ़ारसी, यूरोपीय और भारतीय आदि विभिन्न शैलियों के प्रभाव को प्रदर्शित करती है, जिससे समाज में सामाजिक सामंजस्य और सांस्कृतिक आदान प्रदान को बढ़ावा मिला। शोध में ऐतिहासिक घटनाओं, पौराणिक, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का समावेश किया गया है, जिससे स्थापत्य कला, वेशभूषा, समाज की जीवन शैली आदि की जानकारी प्राप्त होती है। अकबर काल से यह संरक्षित पांडुलिपियां ऐतिहासिक अनुसंधान, सांस्कृतिक अध्ययन और कला के इतिहास में आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं। यह शोध पत्र दर्शाता है कि अकबर के शासनकाल में निर्मित सचित्र पांडुलुपियों ने भारतीय और फारसी कला के मिश्रण के अंतर्गत भाषा, कल, संस्कृति के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया है। संरक्षण प्रयासों और आधुनिक शोध के माध्यम से चित्रित पांडुलिपियों के महत्त्व को और अधिक प्रकाशित किया जा सकता है।

सन्दर्भ :
  1. https://www.memeraki.com/blogs/posts/persian-influence-on-mughal-miniature-paintings?srsltid=AfmBOoq_QQFu2-o-70mhV2GOLPYRTw-PlMHYRuQkvC-NBBqlaQXKHhMi
  2. प्रेमशंकर द्विवेदी, उत्तर भारत पोथी चित्रकला, 2011, प्रकाशक: कला प्रकाशन, संस्करण: 2010, पृ. 36
  3. शैलेंद्र कुमार, उत्तर भारतीय पोथी चित्रकला, 2009, प्रकाशक: कला प्रकाशन, संस्करण: 2009 पृ. 45
  4. प्रेमशंकर द्विवेदी, उत्तर भारत पोथी चित्रकला, 2011, प्रकाशक: कला प्रकाशन, संस्करण: 2010, पृ. 11
  5. वाचस्पति गैरोला, भारतीय चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास, 2009, प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन, पृ. 91
  6. S. M. Saiful Islam, A Historical study of Mughal miniature painting During Emperor Jahangir’s Region (1605-1627), 2021, pg. 202
  7. विद्यासागर सिंह, कला और साहित्य का परस्पर संबंध और प्रभाव, शोध प्रबंध , 2002, पृ. 30
  8. मथुरालाल शर्मा, मुगल साम्राज्य का उदय और वैभव, 1976, प्रकाशक: कैलाश पुस्तक स्वामी, पृ. 377
  9. श्याम बिहारी अग्रवाल, मुगल चित्रकला परंपरा एक परिचय, रूपमशल्प प्रकाशन 12 इलाहाबाद 2024, पृ. 40
  10. ओमप्रकाश, भारत का सांस्कृतिक इतिहास, प्रकाशक न्यूएजपब्लिशर्स, 2004, पृ. 10
  11. Ashok kumar Das, Paintings of the Razmnama: The Book of War, Mapin Publication 2005, pg 65
  12. वही, पृ. 64
  13. https://smarthistory.org/akbarnama/
  14. अबुल-फ़ज़ल, अबुल-फ़ज़ल का अकबरनामा, 3 खंड, एच. बेवरिज द्वारा अनुवादित, बिब्लियोथेका इंडिका, कलकत्ता, 1903-39 (पुनःप्रकाशित दिल्ली, 1972-73), खंड II, पृ. 343-44.
  15. गोपाल चतुर्वेदी, भारतीय चित्रकला, ललित कला प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृ. 40
चित्र स्त्रोत
  1. https://share.google/3oLJ8Ef8zEeNeTlwE
  2. The Razmnama (Book of war) pg. 65
  3. https://share.google/yXfBqkkkybDSlmCuf
  4. रजा पुस्तकालय, रामपुर

भावना राठौर
शोधार्थी, ड्राइंग एवं पेंटिंग, कला संकाय, डी.ई.आई.आगरा

नमिता त्यागी
असिस्टेंट प्रोफेसर, ड्राइंग एवं पेंटिंग, कला संकाय, डी.ई.आई.आगरा
9870992620

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