शोध आलेख : जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का औपनिवेशिक भाषाई दृष्टिकोण / नित्यानन्द सागर

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का औपनिवेशिक भाषाई दृष्टिकोण
- नित्यानन्द सागर

शोध सार : अंग्रेज़ों का यह मानना था कि भारत में सुनियोजित ढंग से शासन चलाने के लिए देश को प्रत्येक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सर्वेक्षणों की एक लंबी श्रृंखला आरंभ की गयी, जिसके अंतर्गत भाषा सर्वेक्षण को सफलतापूर्वक संपन्न करने का कार्य ग्रियर्सन को दिया गया। भाषा सर्वेक्षण के दौरान ग्रियर्सन जिन भाषाई नमूनों को विभिन्न जिलाधिकारियों से मंगवाते थे, उनमें प्रायः पहली कथा ‘प्रोडिगल सन’ (Prodigal Son) की होती थी, जिसका उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार था। उन्होंने भाषाओं की सीमाओं के निर्धारण हेतु प्राकृतिक बाधाओं का सहारा लिया और भाषा परिवारों का वर्गीकरण इस प्रकार किया-आस्ट्रिक, द्रविड़, नाग और आर्य भाषा परिवार। उन्होंने यह स्वीकार किया कि आर्य भाषाओं की उत्पत्ति अनार्य भाषाओं के प्रभाव एवं मिश्रण से हुई है। ग्रियर्सन ने भाषा सर्वेक्षण का उपयोग ब्रिटिश शासन के हित में किया, वही दूसरी ओर भारतीय ब्राह्मणवाद के समर्थकों को प्रसन्न करने के लिए भी किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्राचीन ईरानी भाषा का निर्माण भारतीय और ईरानी जातियों के मिश्रण से हुआ था। मागधी प्राकृत के आधार पर अनेक भाषाओं का निर्माण हुआ। ग्रियर्सन ने ‘देशज’ अथवा ‘देश्य’ शब्द उन शब्दों के लिए प्रयुक्त किया है जिनका मूल संस्कृत में नहीं पाया जाता। उन्होंने ‘रोम’ शब्द की उत्पत्ति ‘डोम’ शब्द से माना और हिंदी का संबंध हिंदुओं से बताया।

बीज शब्द : ग्रियर्सन, औपनिवेशिक भाषाई दृष्टिकोण, भाषा सर्वेक्षण, भाषा वर्गीकरण, प्राकृत भाषा, प्राचीन ईरानी भाषा, भाषाई राजनीति, ध्वनि चिह्न, डोम, प्राकृतिक बाधा, उर्दू, हिंदी।

मूल आलेख : बेंजामिन शुल्टज का मानना था कि हिंदुस्तानी भाषा ‘बर्बरों की भाषा’ है, लेकिन धर्म-प्रचार के लिए यह सबसे उपयुक्त है। अतः उन्होंने इसकी भाषा और लिपि को सीखने की आवश्यकता पर बल दिया। अंग्रेज़ों का मानना था कि भारत में सुनियोजित तरीकों से शासन चलाने के लिए देश को प्रत्येक दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सर्वेक्षणों की एक लंबी श्रृंखला आरंभ हुई। अखंड भारतवर्ष का नक्शा तैयार किया गया। गाँवों का राजस्व सर्वेक्षण किया गया। धरती की सतह, मिट्टी की गुणवत्ता, वहाँ मिलने वाले पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं का भी सर्वेक्षण किया गया। प्रत्येक 10 वर्षों में जनगणना की जाने लगी। इसके अतिरिक्त प्राणी-विज्ञान सर्वेक्षण, पुरातत्वीय सर्वेक्षण, मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण, वन सर्वेक्षण आदि किए गए, तो भाषा इस सर्वेक्षणों से कैसे बच सकती थी, इसलिए भाषा सर्वेक्षण भी किया गया। इस कार्य को बखूबी अंजाम ग्रियर्सन ने दिया, परंतु ग्रियर्सन से पहले भाषा सर्वेक्षण का कार्य विलियम कैरी, मार्शमैन और वार्ड ने भी किया था, किंतु ग्रियर्सन को छोड़कर उन सभी के कार्यों में अनेक त्रुटियाँ थीं। इन त्रुटियों को स्वयं कैरी ने भी स्वीकार किया है। ‘भाषा सर्वेक्षण’ में ग्रियर्सन ने लिखा कि विद्वानों ने केवल भारत की प्राचीन भाषाओं और विचारधाराओं का अध्ययन किया है और उसी दृष्टि से आधुनिक भारत को भी देखा है। किंतु भारतीयों को आधुनिक भारत का वास्तविक ज्ञान केवल पश्चिम के ज्ञान-प्रकाश में ही संभव है। “गिलक्रिस्ट और ग्रियर्सन जैसे अंग्रेज़ विद्वानों के हाथ में आकर भाषाविज्ञान, औपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और कूटनीति का उपकरण बन गया।”1

1886 ईस्वी में वियना (ऑस्ट्रिया) में भाषा विषयक एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था, जिसमें भारत में भाषा सर्वेक्षण की आवश्यकता पर प्रस्ताव रखा गया। इस प्रस्ताव के प्रस्तोता और उपस्थित प्रमुख विद्वानों में बूलर, बेबर, ग्रियर्सन, मैक्समूलर और हार्नले आदि सम्मिलित थे। “इसका बीजवपन तो कोई 40 वर्ष पहले आस्ट्रिया की राजधानी वियना में हुआ था। 1886 ई. में जहाँ प्राच्य विश्वविद्यालयों की परिषद् का एक अधिवेशन हुआ था।”2 इस अधिवेशन में डॉ. क्रस्ट कांग्रेस के सदस्य के रूप में उपस्थित थे। उसी समय, जॉर्ज कैम्बेल एशियाटिक सोसाइटी के लिए शब्द-संग्रह का कार्य कर रहे थे। इस कार्य के लिए तीन प्रकार के उदाहरण चुने गए थे-(1)आदर्श अनुवाद (2)स्थानीय रूप से प्रयुक्त उद्धरण और (3)शब्दों एवं वाक्यों की सूची। इन उदाहरणों में बाइबिल की कथा ‘प्रोडिगल सन’ को भी सम्मिलित किया गया था। बाद में भारतीय भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इन उदाहरणों में परिवर्तन किया गया, हालाँकि इस प्रकार के प्रयोग इससे पहले भी हो चुके थे।

भाषा सर्वेक्षण के दौरान ग्रियर्सन जिन भाषाई नमूनों को अन्य जिलाधिकारियों से मंगवाते थे, उनमें पहली कथा प्रायः ‘प्रोडिगल सन’ की होती थी। इस कथा का अंग्रेज़ी में अनुवाद बहुत सीमित मात्रा में होता था, जबकि इसका अनुवाद भारत की विभिन्न भाषाओं में व्यापक रूप से किया जाता था, अर्थात् ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार। ग्रियर्सन ने भाषाओं की सीमाओं के निर्धारण हेतु प्राकृतिक बाधाओं जैसे ऊँचे पर्वतों, बड़ी नदियों आदि को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उनका विशेष ध्यान रखा।

ग्रियर्सन ने सर्वप्रथम ऑस्ट्रिक भाषा परिवार का परिचय प्रस्तुत किया और इसे सबसे प्राचीन भाषा-समूह माना, जो आज भी जीवित है और जिसका विस्तार अत्यंत व्यापक है। दूसरे एवं तीसरे स्थानों पर उन्होंने द्रविड़ और नाग भाषा परिवारों को रखा, और इसके बाद आर्य भाषा परिवार को। आर्य भाषाओं के संबंध में उन्होंने कहा कि ये केवल सभ्य वर्ग की ही भाषाएँ नहीं हैं, बल्कि उच्च वर्ण के लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएँ हैं, जो क्रमशः द्रविड़, मुंडा तथा तिब्बती-बर्मी भाषाओं को विस्थापित कर रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तथाकथित ‘अनार्य भाषाएँ’ कहीं भी आर्य भाषाओं पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पायी हैं, जबकि ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ग्रियर्सन स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि ‘आर्य भाषाओं’ की उत्पत्ति अनार्य भाषाओं के प्रभाव और मिश्रण से हुई है।

ग्रियर्सन ने करेन और मन भाषाओं को स्वतंत्र भाषा-परिवारों के रूप में वर्गीकृत किया और इसके पीछे का एक कारण बर्मा में भाषा सर्वेक्षण का अधूरा रह जाना बताया। इन्हीं भाषाओं को प्रो. टेरिन डे ने चीन की पूर्ववर्ती भाषाओं में गिना है और भारत में उनका संबंध किरात भाषाओं से जोड़ा है। ग्रियर्सन ने ‘मन भाषाओं’ का संबंध चीन से माना है। इन भाषाओं का उपयोग कभी-कभी चीनी लोगों द्वारा हिन्द-चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में बसे समुदायों के लिए भी किया जाता था। हालाँकि 1919 की जनगणना में इन भाषाओं को सीमावर्ती (हिन्द-चीन) क्षेत्रों से अलग माना गया और यह कहा गया कि मन भाषा बोलने वाली दो जनजातियाँ मिआओ और याओ अब दक्षिण शान रियासत (बर्मा) में सम्मिलित हो चुकी हैं, किंतु यह निष्कर्ष गलत है, क्योंकि ये जनजातियाँ आज भी नागालैंड में विद्यमान हैं। यह वही समय था जब ब्रिटिश हुकूमत भारत और बर्मा को अलग करने के प्रयासों में लगी हुई थी, ताकि उपनिवेशवादी शासन की जड़ें और मजबूत की जा सकें। ग्रियर्सन ने बड़ी चतुराई से इन भाषाओं के सर्वेक्षण का भार बर्मा पर डाल दिया, जबकि पूर्व में उन्होंने स्वयं ही इनका संबंध चीन और हिन्द-चीन सीमावर्ती क्षेत्रों से जोड़ा था। ध्यातव्य है कि 1935 में भारत से बर्मा को राजनीतिक लाभ के लिए अलग कर दिया गया अर्थात् तीव्र स्वधीनता आंदोलन को कमजोर करने के लिए भाषा को हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। “बर्मा के राष्ट्रवादियों ने जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से हाथ मिला लिया। बर्मा की स्वाधीनता संग्राम को कमजोर करने की आशा में 1935 में अंग्रेजों ने बर्मा को भारत से अलग कर दिया।”3

चीनी भाषाओं का प्रयोग भारत में बोलचाल की भाषा के रूप में कहीं नहीं होता था। चीन के निवासी प्रायः भारत के बड़े शहरों में शिल्पकारी से जुड़े कार्यों में संलग्न रहते थे, जैसे-बढ़ईगीरी, बेंत और चमड़े से संबंधित कारीगरी। वहीं रंगून और अपर बर्मा में चीनी लोगों की संख्या पर्याप्त थी, किंतु वे मुख्यतः अस्थायी निवासी थे। ग्रियर्सन ने तिब्बती-बर्मी भाषा-परिवार को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया: पहला, ‘तिब्बती-हिमालयवर्ती’ और दूसरा, ‘असम-बर्मी’। उन्होंने तिब्बती लिपि का उद्भव और विकास भारतीय लिपियों से माना है। सातवीं शताब्दी से तिब्बती भाषाओं में साहित्य की रचना प्रारंभ हुयी, जो मूलतः भारतीय ग्रंथों के अनुवाद पर आधारित थी। ग्रियर्सन ने भारतीय ब्राह्मणवाद के समर्थकों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से यह मत प्रस्तुत किया कि तिब्बती भाषाओं में भी संस्कृत का वर्चस्व रहा है, जो तर्कसम्मत नहीं है। उपर्युक्त भाषाओं पर प्राकृत भाषाओं का प्रभाव अत्यधिक रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि हिमालयवर्ती भाषाएँ कुछ पहलुओं में अन्य भाषाओं से भिन्न हैं, किंतु उन विशिष्ट तत्त्वों में इनका साम्य मुंडा भाषाओं से है। पश्चिम की कुछ बोलियों के बारे में ग्रियर्सन का मत था कि उनमें मुंडा भाषाओं से न केवल शब्द उधार लिए गए हैं, बल्कि अंतिम व्यंजन के उच्चारण में भी मुंडा और मान-ख्मेर भाषाओं के अवशेष देखे जा सकते हैं। कोल-मुंडा भाषाओं की प्राचीनता को रेखांकित करते हुए उन्होंने इनका संबंध खासी, मान-ख्मेर और तिब्बती-चीनी-बर्मी भाषा-परिवारों से भी जोड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि कोल-मुंडा भाषाओं का विस्तार विश्व के एक बड़े भूभाग में रहा है। तिब्बती-चीनी-बर्मी भाषा परिवार की डफ्ला, अक और अबोर भाषाओं में आपस में पर्याप्त समानताएँ पाई जाती हैं।

ग्रियर्सन का मानना था कि किसी भी भाषा परिवार का वर्गीकरण व्याकरणिक संरचना के आधार पर होना चाहिए। उनके अनुसार केवल शब्द समूहों के आधार पर किया गया वर्गीकरण भाषाओं के अन्य स्वरूपों की उपेक्षा करता है। यही अवधारणा तुलनात्मक भाषाशास्त्र की भी रही है, किंतु समस्याएँ तब उत्पन्न होती हैं जब किसी भाषा का व्याकरणिक ढाँचा प्रामाणिक रूप से उपलब्ध नहीं होता। “भाषा सर्वेक्षण में वे भाषाई परिवारों के अध्ययन में व्याकरणिक संरचना को आधार बनाते हैं।…………इसलिए भाषा सर्वेक्षण में उनके नमूने केवल दैनिक जीवन के सीधे-सादे वाक्यों के नहीं हैं। उन्होंने मुहावरे और कहावतें संकलित करवाये थे।”4

ग्रियर्सन ने कहा कि ईरान में आर्यों की भाषा से आधुनिक ईरानी भाषाओं का विकास हुआ। साथ ही उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आर्यों के आगमन से पूर्व ईरान में जो भाषा प्रचलित थी, वह ‘प्राचीन ईरानी’ कही जाती थी, जिसका विकास भारतीय और ईरानी लोगों के मिश्रण से हुआ था। प्राचीन ईरानी भाषा बोलने वालों में से कुछ समुदाय पूर्व दिशा की ओर, मध्य एशिया तक प्रवास कर गए थे। ग्रियर्सन ने ईरानी भाषाओं के अंतर्गत दरदी भाषा को रखा है और इन दरदी भाषाओं को सामूहिक रूप से ‘पिशाची’ भाषा कहा है। इन भाषाओं का विस्तार ईरान के अतिरिक्त अफ़ग़ानिस्तान की ओर्मुड़ी भाषाओं में भी पाया जाता है, जिनमें दरदी भाषाई तत्त्व उपस्थित हैं। भारत में दरदी भाषाओं का प्रभाव सिंधी भाषा और हिमालय की तराई में बोली जाने वाली कुछ भारतीय आर्य भाषाओं पर भी माना गया है। इसी कारण डॉ. शर्मा ने दरदी भाषा को भारतीय आर्य भाषाओं के अंतर्गत शामिल किया है। ग्रियर्सन ने कश्मीरी भाषा का मूलाधार भी दरदी भाषा को माना है। उनके अनुसार, कश्मीरी पंडितों की भाषा का निर्माण मुख्यतः तद्भव शब्दों के आधार पर हुआ है, यद्यपि उनकी साहित्यिक कृतियों में तत्सम शब्दों का भी व्यापक प्रयोग मिलता है। कश्मीर के मुसलमानों ने अपनी भाषा में फारसी के कई विकृत शब्दों को आत्मसात किया है। प्रो. हर्टेल का मत था कि आर्यों के भारत में आगमन से पूर्व ही ऋग्वेद की प्राचीनतम ऋचाओं की रचना हो चुकी थी। ग्रियर्सन ने यह भी कहा कि पूर्वी भारत में प्राकृत व्याकरणों में ‘स’ ध्वनि का कोमल उच्चारण ‘श’ के रूप में होने लगा। बंगाल और महाराष्ट्र में ‘स’ ध्वनि दुर्बल होकर ‘श’ बन जाती है, जबकि बंगाल और असम में यह और अधिक दुर्बल होकर ‘ख’ जैसी ध्वनि में परिवर्तित हो जाती है जो गलत है, यहाँ ध्वनियाँ क्षीण नहीं हो रही है, बल्कि मजबूत हो रही है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वैदिक युग में अनेक बोलियाँ प्रचलित थीं और इसका प्रमाण अपभ्रंश भाषा में मिलता है। द्वितीय प्राकृतों में कई ऐसे व्याकरणिक रूप मिलते हैं जिनकी व्याख्या पाणिनीय संस्कृत के नियमों से नहीं की जा सकती, जैसे-‘आपादान’ और ‘सप्तमी’ कारक के लिए प्रयुक्त होने वाली एक विभक्ति ‘हि’ है। इस विभक्ति की उत्पत्ति प्राकृत तथा प्राचीन संस्कृत की ‘धि’ नामक विभक्ति से हुई है, न कि साहित्यिक संस्कृत से। यही ‘धि’ प्रत्ययरूप में ग्रीक भाषा में ‘थी’ बन जाती है। वैसे वैदिक युग में भी इस प्रत्यय का प्रयोग मिलता है, लेकिन जिस परिनिष्ठित बोली से साहित्यिक संस्कृत की उत्पत्ति हुई, उसमें इसका प्रयोग नहीं होता था।

ग्रियर्सन ‘श’ और ‘स’ ध्वनियों के संदर्भ में यह कहते हैं कि बिहारी लोग शत्रुतावश बंगाली ‘श’ के स्थान पर ‘स’ ध्वनि का प्रयोग करते हैं। परंतु यह कथन तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता, क्योंकि अशोक के अभिलेखों में भी ‘स’ ध्वनि का ही प्रयोग हुआ है। बंगाली भाषा से बिहारी भाषाओं की कोई ऐतिहासिक शत्रुता प्रमाणित नहीं होती। “वस्तुत: बंगाली तथा भोजपुरी, दोनों इनसे अनभिज्ञ हैं कि उनकी भाषाएँ एक ही मागधी भाषा से प्रस्तुत हुई है।”5 यह ग्रियर्सन की औपनिवेशिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसे हम बंग-भंग की पृष्ठभूमि में भी देख सकते हैं। यही ग्रियर्सन बिहारी भाषाओं को लिपि के आधार पर हिंदी से भिन्न मानते हैं। जबकि ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो बिहार का झुकाव सदैव पूरब की ओर रहा है-चाहे वह मौर्यकाल रहा हो या सामंतकाल।

ग्रियर्सन के अनुसार, प्राचीन पूर्वी प्राकृत से औड्र की उत्पत्ति हुई और उसी औड्र से गौड़ भाषा का विकास हुआ। मगध के पूर्ववर्ती क्षेत्र में गौड़ या प्राच्य अपभ्रंश बोला जाता था, जो दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व दिशा में फैलते हुए आधुनिक बंगला भाषा की जननी बनी। आगे चलकर यह असम घाटी में ‘असमिया’ भाषा के रूप में विकसित हुआ। ‘उपनागर अपभ्रंश’ से पंजाबी की विभिन्न बोलियों का विकास हुआ, जबकि ‘नागर अपभ्रंश’ की अन्य बोलियों से राजस्थानी भाषाएँ विकसित हुईं। ग्रियर्सन ने तद्भव शब्दों की उत्पत्ति ‘प्रथम प्राकृत’ से मानी है। उन्होंने ‘देशज’ या ‘देश्य’ शब्द उन शब्दों को कहा है, जिनका मूल संस्कृत में नहीं पाया जाता है। उन्होंने कोल-मुंडा और द्रविड़ भाषाओं के अनेक शब्दों की उत्पत्ति भी प्रथम प्राकृत की ‘विभाषाओं’ (उपशाखाओं) से माना है और कहा है कि इनका संबंध संस्कृत से नहीं है। यहाँ तक कि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आर्य भाषाओं ने इन अनार्य भाषाओं से अनेक शब्द उधार लिए हैं। ग्रियर्सन के अनुसार, अंग्रेजों का शक्तिशाली राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक संस्कृत के पक्ष में रहा, लेकिन अब इसे समाप्त किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि गुजराती और सिंधी की तरह राजस्थानी भाषा में भी मूर्धन्य ध्वनियों का प्रचुर प्रयोग होता है।ग्रियर्सन के अनुसार, मूर्धन्य ध्वनियाँ मूल आर्य भाषाओं में नहीं थीं, परंतु भारतीय आर्य भाषाओं में ये व्यापक रूप से प्रचलित हो गईं। निश्चित रूप से इन ध्वनियों की जड़ें प्राकृत द्रविड़ तथा कोल-मुंडा भाषाओं में रही हैं।

प्राकृत में संप्रदान कारक को व्यक्त करने के लिए ‘कहुं’ का प्रयोग किया जाता था, जबकि संस्कृत में इसके लिए ‘कृत्’ विभक्ति प्रयुक्त होती है। द्रविड़ भाषाओं में इसके लिए ‘कु’ उपसर्ग तथा हिंदी में ‘को’ चिह्न का प्रयोग होता है। ‘कहुं’ का प्रयोग भारतीय आर्य और अनार्य भाषाओं में व्यापक रूप से पाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि इन भाषाओं के बीच परस्पर संपर्क और संबंध स्थापित हो चुके थे। ग्रियर्सन ने भारतीय आर्य भाषाओं का एक वर्ग ‘बाहरी उपशाखा’ के रूप में प्रस्तावित किया, जिसमें उन्होंने उन भाषाओं को रखा जो सिंधु नदी के आस-पास बोली जाती थीं। इस भाषाई विभाजन में ग्रियर्सन का औपनिवेशिक दृष्टिकोण परिलक्षित होता है, क्योंकि यह ऐतिहासिक संदर्भ में सिंध और अफगान पर ब्रिटिश विजय अभियानों से भी जुड़ा हुआ है, जो भाषा-विभाजन राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रेरित है। दरदी भाषा का प्रयोग इन्हीं क्षेत्रों में होता था, किंतु डॉ. रामविलास शर्मा इसे ‘बाहरी उपशाखा’ में न रखते हुए आर्य भाषाओं के अंतर्गत शामिल करने की बात करते हैं। शाहबाजगढ़ी और मानसेहरा से प्राप्त सम्राट अशोक (लगभग 250 ई.पू.) के अभिलेखों में उस समय की राजभाषा का प्रयोग हुआ है। इन अभिलेखों की भाषिक विशेषताएँ लहंदा, सिंधी और दरदी भाषाओं में परिलक्षित होती हैं। ग्रियर्सन ने यह भी उल्लेख किया है कि अवधी भाषा बिहार के कुछ मुस्लिम समुदायों द्वारा भी बोली जाती है। उन्होंने भीली और खान्देशी भाषाओं को आर्येतर भाषाएँ माना और उनका संबंध कोल-मुंडा तथा द्रविड़ भाषाओं से जोड़ा। यह तथ्य भी मान्य है कि इन भाषाओं पर बाद में आर्य भाषाओं का प्रभाव पड़ा, परंतु उनके मूल में कोल-मुंडा और द्रविड़ भाषाएँ ही थीं। इन भाषाओं के परस्पर संबंधों को केवल भाषावैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से भी समझने की आवश्यकता है। “इसके अतिरिक्त भारत में कोल भाषाएँ आर्य- द्रविड़ परिवारों से इतना प्रभावित हुई हैं कि उनके मूल तत्त्वों को छाँटकर निकालना सरल कार्य नहीं है।”6

ग्रियर्सन ने नेपाली भाषा का संबंध तिब्बती-चीनी-बर्मी भाषा-परिवार से माना है और यह भी कहा कि नेपाल में आर्य भाषाओं का प्रवेश आधुनिक युग की देन है। ग्रियर्सन का यह कथन कहाँ तक उचित है, यह एक स्वतंत्र अध्ययन का विषय हो सकता है। क्या नेवार, खस, गोरखा आदि समुदाय केवल नेपाल तक ही सीमित हैं? ग्रियर्सन ने भारत की कुछ जातियों को ‘चोर’ या ‘जासूस’ कहकर संदर्भित किया है-जैसे: डोम, चुहड़ा, नट और कंजरी। हालांकि, उन्होंने डोम जाति को आदिम युग की जाति माना है और इसका संबंध द्रविड़ समुदाय से जोड़ा है। उन्होंने ‘रोम’ शब्द की उत्पत्ति ‘डोम’ शब्द से माना है। यह ‘रोम’ शब्द यूरोप में जिप्सी जनजातियों के लिए प्रयुक्त होता है। ग्रियर्सन के अनुसार, ये जिप्सी लोग मूलतः भारतीय थे। फारसी इतिहासकारों के अनुसार, ये लोग भारत से ईरान गए और वहाँ से सीरिया होते हुए यूरोप पहुँचे, जहाँ वे जिप्सी कहलाए। “डोम जाति किसी समय बंगाल की बहुत शक्तिशाली जातियों में गिनी जाती थी। कहते हैं कि यूरोप की खानाबदोश (जिप्सी) जातियाँ इन्हीं डोमों की औलाद हैं।”7 यह समुदाय सम्पूर्ण भारत में फैला हुआ है, इसलिए इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ग्रियर्सन ने बर्मा, मद्रास, हैदराबाद और मैसूर को भारतीय भाषा सर्वेक्षण से बाहर रखा था। “सर्वेक्षण से मद्रास, हैदराबाद और मैसूर बाहर रखे गये। इस प्रकार यह सर्वे-ग्रंथ सर्व भारत का सर्वे न कर सका था।”8 ग्रियर्सन का कार्य काल्डवेल ने पहले ही आसन कर दिया था। काल्डवेल ने कहा था कि द्रविड़ भाषाएँ बिल्कुल अलग भाषा परिवार है जिनकी उत्पत्ति किसी एक आदि भाषा से हुई है अर्थात् भाषा के आधार स्वाधीनता आंदोलन को कमजोर किया जा रहा था “ब्रिटिश साम्राज्यवाद के प्रोत्साहन से भारत में द्रविड़ों को भारत से अलग करने के लिए राजनीतिक प्रयत्न किये गए। एक आदि द्रविड़ भाषा से सभी द्रविड़ भाषाओं की उत्पत्ति हुई; इसलिए द्रविड़ लोगों को अपना राष्ट्र अलग बनाना चाहिए।”9

ग्रियर्सन शास्त्रीय भाषाओं के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के अध्ययन में भी विश्वास रखते थे। ग्रियर्सन ने भाषाओं की सीमाओं के निर्धारण हेतु प्राकृतिक बाधाओं जैसे- ऊँचे पर्वतों, बड़ी नदियों आदि को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उनका विशेष ध्यान रखा। भाषा और बोली के अंतर को स्पष्ट करने के लिए ‘पहाड़’ (भाषा) और ‘पहाड़ी’ (बोली) जैसे शब्दों का प्रयोग किया। उनके अनुसार, भाषा और बोली के बीच का अंतर उनके व्यावहारिक प्रसार पर निर्भर करता है। उनका मानना था कि उर्दू को फारसी लिपि में लिखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उर्दू न केवल मुसलमानों की, बल्कि मुस्लिम सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित हिन्दुओं द्वारा भी बोली जाती थी। उन्होंने यह तर्क दिया कि भाषा स्वयं में नहीं चलती, बल्कि वह पढ़ी और लिखी जाती है, और इसके पीछे मुख्य कारण थी तत्कालीन राजसत्ता और उसकी कार्यप्रणाली, क्योंकि उस समय की राजभाषा फारसी थी। ब्रिटिश को मुगलों से ही सत्ता की प्राप्ति हुई थी इसलिए वे कुछ मुसलमानी तत्त्वों को बनाए रखना चाहते थे। भारतीय जनता इस पक्षपात को समझती थी। “हिन्दू जनता के मन में तो इस बात का पूरा संदेह था कि इस वस्तु के लिए अधिकांश भारत में ब्रिटिशों के मुसलमानों के प्रति राजनीति पक्षपात की नीति ही उत्तरदायी थी”10 ग्रियर्सन ने हिंदी को धार्मिक हिंदुओं की भाषा बताया और आधुनिक हिंदी का उद्भव अंग्रेजों की प्रेरणा और प्रशासनिक आवश्यकताओं से हुआ। उपर्युक्त दोनों कथन गलत हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी और उर्दू की वाक्य संरचना एक-दूसरे से भिन्न है। ग्रियर्सन ने यह भी कहा कि यदि हिंदी में अत्यधिक तत्सम शब्दों का प्रयोग होने लगेगा, तो वह बंगला की तरह बन जाएगी; अतः ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी का प्रयोग मिशनरियों द्वारा भी किया गया था।

निष्कर्ष : ग्रियर्सन का भाषा सर्वेक्षण एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक कार्य था। उन्होंने भाषाओं की सीमाओं के निर्धारण हेतु प्राकृतिक बाधाओं का सहारा लिया तथा भाषा-परिवारों का वर्गीकरण व्याकरणिक आधार पर किया। भारत में भाषाओं के विकास का क्रम उन्होंने इस प्रकार बताया-नेग्रिटो, आस्ट्रिक, द्रविड़, नाग और आर्य भाषा परिवार और यह स्वीकार किया कि आर्य भाषाओं की उत्पत्ति अनार्य भाषाओं के प्रभाव एवं मिश्रण से हुई है। मिआओ और याओ जनजातियाँ आज भी नागालैंड में विद्यमान हैं। ग्रियर्सन ने भाषा को माध्यम बनाकर एक ओर उपनिवेशवादी शासन की जड़ों को सुदृढ़ किया, तो दूसरी ओर भारतीय ब्राह्मणवाद के समर्थकों को प्रसन्न करने के लिए भी भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने उल्लेख किया कि चीनी भाषाओं का प्रयोग भारत में बोलचाल की भाषा के रूप में कहीं नहीं होता है। कोल-मुण्डा भाषाओं का संबंध न केवल नाग भाषाओं से, बल्कि पश्चिम की भाषाओं से भी है। आर्यों के आगमन से पूर्व ही प्राचीन ईरानी भाषा का निर्माण भारतीय और ईरानी जातियों के मिश्रण से हुआ था। उस काल में ईरान, हड़प्पा सभ्यता का उपनिवेश हुआ करता था, अतः पश्चिम भारत की भाषा वहाँ अत्यंत प्रभावशाली थी। ग्रियर्सन ने प्राकृत के तीन रूप बताए हैं। उन्होंने तद्भव शब्दों की उत्पत्ति प्रथम प्राकृत से माना है तथा देशज अथवा देश्य शब्द उन शब्दों को कहा है जिनका मूल संस्कृत में नहीं पाया जाता। उन्होंने यह भी माना कि मागधी प्राकृत से बंगला, असमिया, उड़िया आदि भाषाओं का विकास हुआ। प्राकृत की कुछ ध्वनियाँ भारत के पूर्वी अंचल में जाकर अधिक सुदृढ़ हुईं, जबकि मूर्धन्य ध्वनियाँ मूल आर्य भाषाओं में विद्यमान नहीं थीं। ग्रियर्सन के अनुसार, द्रविड़ भाषाओं की उत्पत्ति किसी एक आदि भाषा से नहीं हुई है। उनका मानना था कि उर्दू को फारसी लिपि में लिखा जाना चाहिए। न तो हिंदी का उद्भव और विकास अंग्रेज़ों की प्रेरणा से हुआ है, और न ही हिंदी केवल हिंदू धर्म की भाषा है।

संदर्भ :
  1. दिलीप सिंह, भाषा का संसार, वाणी प्रकाशन, 2011, नई दिल्ली, पृ.116
  2. भारत यायावर, भारतीय भाषाओं का अन्वेषण, महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली खंड 1, किताबघर, नई दिल्ली, 2014
  3. विपिन चन्द्र, आधुनिक भारत का इतिहास, ब्लैकस्वान, हैदराबाद, 2018, पृ.170
  4. अरुण कुमार, ग्रियर्सन भाषा और साहित्य चिंतन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृ.117
  5. उदयनारायण तिवारी, भोजपुरी भाषा और साहित्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पटना,1954, पृ.169
  6. रामविलास शर्मा, भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृ-87
  7. हजारी प्रसाद द्विवेदी, अशोक के फूल, लोक भारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृ. 25
  8. रामविलास शर्मा, भाषा और समाज, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, 2017, पृ. 192
  9. वही, पृ. 164
  10. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, भारतीय आर्यभाषा और हिंदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृ. 174

नित्यानन्द सागर
शोधार्थी, हिंदी विभाग, तेजपुर विश्वविद्यालय, असम - 784028

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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