शोध आलेख : राजस्थान परिक्षेत्र से प्राप्त वामन-त्रिविक्रम प्रतिमाएँ : एक अवलोकन / पूजा अवस्थी

राजस्थान परिक्षेत्र से प्राप्त वामन-त्रिविक्रम प्रतिमाएँ : एक अवलोकन
- पूजा अवस्थी


शोध सार : वामन की कथा वैदिक संहिताओं में विशेष महत्व रखती है। यह कथा त्रिविक्रम की वैदिक अवधारणा से विकसित मानी जाती है। ऋग्वेद में विष्णु के तीन-पदों के विचक्रमण का वर्णन मिलता है। वामन–त्रिविक्रम कथा का प्रारम्भिक रूप शतपथ ब्राह्मण में प्रकट होता है। इतिहास-पुराण परंपरा में वामन अवतार कथा का विस्तार और विकास हुआ तथा इसे प्रभावशाली बनाने हेतु इसमें कई पात्रों को जोड़ा गया। यह कथानक प्राचीन भारतीय साहित्य के साथ-साथ कला का भी एक प्रिय विषय रहा है। राजस्थान के कला-केंद्रों से प्राप्त वामन-त्रिविक्रम मूर्तियों पर केन्द्रित यह शोध-पत्र, इस क्षेत्र में किये गये अन्वेषणोपरांत प्राप्त साक्ष्यों पर आधारित है। वामन-त्रिविक्रम से सम्बद्ध शिल्पांकन राजस्थान के विभिन्न पुरास्थलों एवं संग्रहालयों में संरक्षित है। वामन-त्रिविक्रम मूर्तियों के वैशिष्ट्य और शिल्प-शास्त्रीय परंपरा से कहाँ तक साम्यता रखते हैं या कुछ नवीनता रखते थे या नहीं? उसे विश्लेषित किया जायेगा। साथ ही त्रिविक्रम स्वरूप को भी विश्लेषित किया जायेगा कि पूरे कथानक को शिल्पी ने किस प्रकार से प्रस्तुत किया और विशेषकर किस साहित्यिक परंपरा से उनका साम्य है, उसको भी वर्णित करने का प्रयास किया जाएगा। फलतः इन सूक्ष्मताओं को रेखांकित कर वामन-त्रिविक्रम अवतार की साहित्यिक एवं कलागत संदर्भों को आधार बनाकर पूर्ण विवेचना करना ही प्रस्तुत शोध-पत्र का अभिष्ट है।

बीज शब्द : शिल्प-ग्रंथ, राजस्थान, कला-केंद्र, वामन, त्रिविक्रम, दशावतार, संग्रहालय, मूर्तिकला, विष्णु

परिचय: वामन स्वरूप की अवधारणा वैदिक परंपरा में निहित है, जिसका आधार ऋग्वेद में वर्णित विष्णु के तीन पद-क्रमों से मिलता है। यद्यपि ऋग्वेद में विष्णु को प्रमुख देवता के रूप में नहीं प्रस्तुत किया गया, तथापि उनके तीन विराट पगों द्वारा लोक–व्याप्ति का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। पृथ्वी के त्रिपद मापन तथा अंतरिक्ष-व्याप्ति जैसे उनके विशिष्ट कृत्यों के कारण उन्हें उरुगाय और उरुक्रम जैसे विशेषण प्राप्त हुए।1 शतपथ ब्राह्मण में देवताओं द्वारा असुरों से भूमि प्राप्ति हेतु विष्णु को अग्रणी करने का प्रसंग मिलता है,2 जबकि इतिहास-पुराण परंपरा के ग्रंथों में इस कार्य की पूर्ति वामन रूप में विष्णु द्वारा असुरराज बलि से भूमि प्राप्त करके की गई है। इस कथानक को आधार बनाकर कला में मूर्तियां बननी प्रारंभ हुई। सर्वेक्षण के दौरान राजस्थान के ओसियाँ (जोधपुर जिला) के हरिहर मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, विष्णु मंदिर और सूर्य मंदिर, बड़ोली (रावतभाटा, चितौड़गढ़ जिला) का वामनावतार मंदिर; बुचकला का पार्वती मंदिर, चित्तौड़गढ़ का कुम्भस्वामी मंदिर आदि पुरास्थलों एवं जोधपुर राजकीय संग्रहालय; जयपुर अल्बर्ट हॉल संग्रहालय; झालावाड़ राजकीय संग्रहालय; कोटा राजकीय संग्रहालय; मंडोर राजकीय संग्रहालय; उदयपुर राजकीय संग्रहालय; भरतपुर राजकीय संग्रहालय, अजमेर राजकीय संग्रहालय आदि का भ्रमण किया गया है। इस दौरान जिन कला-सामग्रियों को एकत्रित किया गया, यह शोध-पत्र उन्हीं पर आधारित है।

वामन त्रिविक्रम की मूर्तियां 2 प्रकार से प्राप्त होती हैं-

वामन स्वरूप
त्रिविक्रम स्वरूप

पुराणों एवं शिल्पशास्त्रीय ग्रंथों में इन दोनों प्रकार की मूर्तियों के प्राथमिक लक्षण का वर्णन प्राप्त होता है जैसे- मत्स्य पुराण3(260/36-37) में कहा गया है कि वामन अपने दाएं हाथ में छत्र और बाएं हाथ में कमण्डलु लिए हो। विष्णुधर्मोत्तर पुराण4(3/85/54) के अनुसार वामन भगवान छोटे अवयवों और मोटे शरीर वाले अर्थात वामन आकृति में निर्मित होने चाहिए। उनका शरीर दूर्वा घास के सदृश्य श्याम हो और वें कृष्ण अजीनोपवीत धारण किए हों। वे दंडधारी और अध्ययन को उद्दत हो। अग्निपुराण5(49/5) में वामन प्रतिमा छत्र और दण्डधारी वर्णित है।

वामन मूर्ति के साथ-साथ देवता के त्रिविक्रम स्वरूप का वर्णन भी शास्त्रों में वर्णित है, जो इस प्रकार है- विष्णुधर्मोत्तरपुराण6(3/85/55-56) के अनुसार त्रिविक्रम का वर्ण जलपूर्ण मेघ के समान हो। उनके हाथों में दण्ड, पाश, शंख, चक्र, गदा और पद्म हों, जिसका प्रदर्शन आयुध-पुरुषों के रूप में न होकर प्राकृतिक हो। उनके विस्फारित नेत्रों से युक्त एक उर्ध्वमुख हो। शिल्परत्न ग्रन्थ7(अ० 25/18) के अनुसार त्रिविक्रम मूर्ति का वाम पाद पृथ्वी पर स्थिर हो और दक्षिण सम्पूर्ण नभस्थल नापने के लिए ऊपर की ओर प्रसारित हो। वैखानसागम ग्रन्थ8 में त्रिविक्रम-मूर्ति का विस्तृत विवरण मिलता हैं। इसमें त्रिविक्रम मूर्ति उत्तम-दस-ताल-माप के अनुसार बनाये जाने का उल्लेख है और उनकी कुल ऊँचाई 124 अंगुल होनी चाहिए। इस आगमानुसार मूर्ति चतुर्भुजी अथवा अष्टभुजी निर्मित करना चाहिए। यदि वह चतुर्भुजी हो तो उसके दो हाथों में शंख और चक्र हों तथा एक दाहिना हाथ अभय या वरद-मुद्रा में और बायाँ हाथ ऊपर की ओर प्रसारित वाम पाद के समानान्तर प्रसारित हो। यदि प्रतिमा अष्टभुजी हो तो पांच हाथों में चक्र, शंख, गदा, शार्ंग और हल हों तथा शेष तीन हाथ पूर्ववत्‌ हों। इसके अतिरिक्त, मूर्ति में त्रिविक्रम के मस्तक के ऊपर छत्र लगाए हुए इंद्र, चामरधारी वायु और वरूण, सूर्य और चन्द्र, सनक और सनत्कुमार, त्रिविक्रम के प्रसारित पाद के उर्ध्व भाग को प्रक्षालित करते ब्रह्मा, अंजलि-मुद्रा में हाथ जोडे हुए शिव, राक्षस नामुचि, गरुड़, शुक्राचार्य तथा वामन को पृथ्वी संकल्प करते हुए सपत्नीक राजा बलि और भेरीवादन करते हुए जाम्बवन चित्रित करने का भी उल्लेख है।

सर्वेक्षण से ज्ञात वामन मूर्तियां :

वामन स्वरूप की एक प्रतिमा दसवीं शती की सांभर (जयपुर) से प्राप्त एवं अल्बर्ट हॉल संग्रहालय (फलक सं०1) में संरक्षित है। इसमें वामन चतुर्भुज स्वरूप में है जिनके ऊपरी दोनों हाथ खंडित हो चुके हैं। वामन का निचला दायां हाथ वरद मुद्रा में हैं, जिसमें अक्षमाला लिए प्रदर्शित हैं, जबकि निचले बाएं हाथ में शंख शोभायमान है और इसके ऊपर के बाएं हाथ में गदा का खंडित भाग अवशेष है। इस मूर्ति में उन्हें कानों में कुण्डल, गले में हार, यज्ञोपवीत, कौस्तुभ मणि, करधनी, बाजूबंद, नूपुर, वनमाला आदि आभूषणों से सुसज्जित उत्कीर्ण किया गया है। उनके शरीर को बौने स्वरूप में, हाथ-पैर छोटे, पेट निकला हुआ तथा केश घुंघरालें, छोटी-छोटी गाठों में बंधे हुए से हैं। इनके पैरों के समीप दोनों ओर शंख और चक्र पुरुषों का अंकन किया गया है। शंख और चक्र पुरुषों के पीछे दोनों ओर दो स्त्रियों का अंकन है, जो संभवतः भू-देवी और लक्ष्मी हैं। इसमें वामन भगवान समभंग मुद्रा में कमलासन पर खड़े हैं। ऐसी ही एक अन्य मूर्ति राजस्थान के अथूर्णा से प्राप्त हुई है।9

वामन स्वरूप की ऐसी ही अन्य दो प्रतिमायें शंखोद्वार (झालरपाटन) से प्राप्त, राजकीय संग्रहालय झालावाड़10 तथा कोटा से प्राप्त, राजकीय संग्रहालय कोटा (फलक सं०2) में संरक्षित है। ये मूर्तियां भी दसवीं शती की है। इसमें वामन विष्णु चतुर्भुज स्वरूप, समभंग मुद्रा में कमलासन पर खड़े हैं। वामन पूर्वोक्त की भांति सभी वस्त्राभूषणों से सुसज्जित हैं। वामन (राजकीय संग्रहालय कोटा) के दोनों ओर पार्श्वों में शंख और चक्र पुरुष तथा गरूड़ और भू-देवी या लक्ष्मी का अंकन है। वामन के दोनों पार्श्व परिकर में गज, व्यालादि का अंकन है। वामन के ऊपर मध्य में योग-नारायण तथा इनके दोनों पार्श्वों में उड़ते हुए विद्याधरों का अंकन है। वामन के दाईं ओर आले में गणेश चतुर्भुज स्वरूप में, जबकि बाईं ओर आले में वीणाधारिणी सरस्वती उत्कीर्ण हैं।

गुर्जर-प्रतिहार कालीन (दसवीं-ग्यारहवीं शती ई०) बडौली के वामन अवतार मंदिर (फलक सं० 3) की मूल प्रतिमा चतुर्भुज स्वरूप में, जिसमें वामन समभंग मुद्रा में कमलासन पर खड़े हैं। इनके चारों हाथ खंडित होने के कारण लांछनों की पहचान अस्पष्ट है। उन्हें कुंडल, हार, ग्रैवेयक, कौस्तुभमणि, यज्ञोपवीत, भुजबंध, करधनी, कौपीन एवं वनवाला आदि सभी वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित किया गया है। वामन के परिकर के केंद्र में योग-नारायण, वराह एवं नरसिंह का अंकन है, जबकि उनके बाईं ओर चतुर्भुज शिव और दाईं ओर चतुर्भुज ब्रह्मा का अंकन हैं। इनके दोनों ओर पार्श्वों में बलराम और बुद्ध को उत्कीर्ण है। निचले पार्श्वों में शंख और चक्र पुरुषों का अंकन है। शंख पुरुष के पीछे भू-देवी या लक्ष्मी, जबकि चक्र-पुरुष के पीछे गरुड़ का अंकन है।

सर्वेक्षण से प्राप्त त्रिविक्रम मूर्तियां :

ओसियाँ में वामनावतार की स्वतंत्र मूर्तियों का अभाव है, जबकि त्रिविक्रम मूर्तियों के सात उदाहरण विभिन्न मंदिरों से प्राप्त होते है।11 हरिहर मंदिर संख्या-1 (फलक सं० 4) से त्रिविक्रम कथानक का शिल्पांकन किया गया है। यह प्रतिमा चतुर्भुज स्वरूप में, जिसमें देवता का दायाँ कर नीलोत्पल एवं ऊर्ध्व दायें कर में गदायुक्त तथा वामोर्ध्व कर में चक्र एवं अधःकर खंडित है। इसमें त्रिविक्रम कुण्डल, हार, पाजेब, करधनी, वनमाला, किरीटमुकुट, यज्ञोपवीत, अधोवस्त्र, कंकण, ग्रैवेयक, कटिसूत्र आदि सभी वस्त्राभूषणों से अलंकृत है। इसमें देवता के शरीर का भाग दक्षिणार्ध धनुष के समान वक्र है। उनका दायाँ पैर पृथ्वी पर एवं बायाँ पैर मस्तक तक प्रसारित, जो दैत्याकृति के मुख में प्रविष्ट होता, प्रतीत हो रहा है। उनके प्रसारित पैर के नीचे ठिगने एवं भारी-भरकम शरीर वाले वामन छत्र लिए तथा राजा बलि और शुक्राचार्य दान देने से रोकते हुए शिल्पांकित है। दायें पैर के समीप एक अन्य आकृति अंकित है जो संभवतः हवा में उड़ते असुर है। वामन के छत्र के ऊपर अश्व उत्कीर्ण है जो राजा बलि द्वारा अश्वमेध यज्ञ के प्रतीक स्वरूप है। ऐसी ही एक अन्य प्रतिमा अजमेर राजकीय संग्रहालय में संरक्षित है, अपवादस्वरूप इस त्रिविक्रम मूर्ति की मुखाकृति उग्र है।12

ओसियाँ से त्रिविक्रम स्वरूप (फलक सं० 5) की एकमात्र अष्टभुजी प्रतिमा सत्यनारायण मंदिर (आठवीं शती ई०) से प्राप्त हुई है जिसके चार वाम करों में चक्र, खेटक, बाण तथा शंख और दक्षिण चार करों में पद्म, गदा, खड्ग एवं तूणीर से बाण निकालते हुए शिल्पांकित है। त्रिविक्रम् मूर्ति को सभी वस्त्राभूषणों से सुसज्जित किया गया है। उनके घुंघरालें बाल, किरीटमुकुट, अधोवस्त्र, कंकण, ग्रैवेयक, वनमाला, कटिसूत्र, कुण्डल, यज्ञोपवीत आदि शोभायमान है। मूर्ति के ऊर्ध्व भाग में चार देवता संभवतः वरुण, वायु, सूर्य एवं चामर लिए चंद्र प्रदर्शित है। विराट स्वरूप त्रिविक्रम का दायाँ पैर पृथ्वी पर स्थिर एवं बायाँ पैर ऊपर प्रसारित है। प्रसारित पैर के समीप एक दैत्य मुखाकृति उत्कीर्ण है जिसे दुर्गानन्द तिवारी13 ने राहु के रूप मे पहचान की है। उनके उठे पैर के नीचे राजा बलि द्वारा वामन को दान का संकल्प कराते हुए तथा दैत्याचार्य शुक्र द्वारा राजा बलि को दान देने से रोकने के प्रयास को दर्शाया गया है। स्थिर दायें पैर को पकड़े एक आकृति उत्कीर्ण है, जिसकी पहचान नामुचि के रूप में की गयी है। राजा बलि द्वारा दान से पूर्व अश्वमेध यज्ञ के आयोजन के सूचक स्वरूप अश्व मुखाकृति का अंकन किया गया है। जाम्बवन का भी अंकन किया गया है।

कोटा संग्रहालय में नौवीं शती की बारां से प्राप्त त्रिविक्रम प्रतिमा संरक्षित है। इसमें त्रिविक्रम समभंग मुद्रा एवं चतुर्भुज स्वरूप में हैं, जिनके दो हाथ खंडित हो चुकें हैं और अन्य दो हाथों में चक्र तथा गदा शोभायमान है, जबकि खंडित निचले बाएँ हाथ में शंख शेष है। इसमें त्रिविक्रम विष्णु किरीट मुकुट, कुंडल, ग्रैवेयक, यज्ञोपवीत, वनमाला आदि सर्वाभूषणों से सुसज्जित हैं। इनके दाईं ओर त्रिमुखी, चतुर्भुज ब्रह्मा और बाईं ओर चतुर्भुज शिव उत्कीर्ण हैं। इनके पैरों के समीप दोनों ओर शंख और चक्र पुरुष का अंकन है। शंख पुरुष के पीछे भू-देवी या लक्ष्मी और चक्र पुरुष के पीछे गरुड़ का अंकन है।

राजकीय संग्रहालय, झालावाड़ में दसवीं-ग्यारहवीं शती ई० की एक अन्य त्रिविक्रम प्रतिमा संरक्षित है। इसमें त्रिविक्रम विष्णु, किरीट मुकुट, कुंडल, ग्रैवेयक, यज्ञोपवीत, वनमाला आदि सर्वाभूषणों से सुसज्जित है। इसमें उन्हें चतुर्भुज स्वरूप में उत्कीर्ण किया गया हैं। उनके तीन हाथों में चक्र, गदा और पुष्प धारण किए हैं, जबकि चौथा हाथ खंडित हो चुका है। इनका दायां पैर पृथ्वी पर स्थिर है और बायां पैर ऊपर मस्तक तक उठा हुआ है, जो एक पुरुष मुखाकृति में घुसता हुआ प्रतीत हो रहा है, जिसे कुछ विद्वान राहु (दुर्गानन्द तिवारी) और कुछ ब्रह्मांड (वासुदेव शरण अग्रवाल14 तथा गोपीनाथ राव15) का प्रतीक मानते हैं। वामन के उठे पैर के नीचे दो विकृत आकृतियाँ उत्कीर्ण है, जो संभवतः राजा बलि और छत्र लिए वामन खड़े हैं, जो दान देने की मुद्रा में प्रदर्शित है।

अल्बर्ट हॉल संग्रहालय, जयपुर (फलक सं० 6) में बारहवीं शती ई० की एक अन्य त्रिविक्रम प्रतिमा संरक्षित है। इसमें त्रिविक्रम का अंकन कथानक स्वरूप में हुआ है। भगवान पूर्व वर्णित सर्वाभूषणों से सुसज्जित हैं। उनके तीन हाथों में शंख, चक्र और गदा शोभायमान है, जबकि चौथा हाथ मस्तक की ओर मुड़ा़ है, उसमें पुष्प लिए प्रतीत हो रहे हैं। इसमें भगवान का बायां पैर पृथ्वी पर स्थिर है, जबकि दायां पैर ऊपर उठा हुआ है, और पुरुष मुख में घुसता हुआ प्रतीत होता है। उठे दाएं पैर के नीचे छत्र लिए वामन और कलश लिए राजा बलि, जो दान देने की मुद्रा में प्रदर्शित है। राजा बलि के पीछे दो अन्य आकृतियां उत्कीर्ण है, जो संभवतः दैत्य गुरु शुक्राचार्य, जो दान देने से राजा बलि को रोकते हुए प्रतीत हो रहे हैं। ये शिल्पाकंन शिल्परत्न ग्रन्थानुसार किया गया है।

सर्वेक्षण से प्राप्त दशावतार पट्ट :

विभिन्न पुरास्थलों एवं संग्रहालयों में संरक्षित वामन-त्रिविक्रम प्रतिमाओं के अलावा वामन-त्रिविक्रम स्वरूप का अंकन दशावतार फलकों में भी मिलता है। कभी-कभी विष्णु एवं उनके अवतार मूर्तियों के परिकर में वामन-त्रिविक्रम का अंकन मिलता हैं। यहां कुछ महत्वपूर्ण दशावतार पट्टों का उल्लेख किया जा रहा है-

राजकीय संग्रहालय, कोटा में नौवीं शती ई० की एक शेषशायी विष्णु, जो बडौली, रावतभाटा से प्राप्त हुई है। इसमें दशावतारों का अंकन मिलता हैं। इसमें वामन ललितासन मुद्रा में बैठें हैं। उनका धड़ खण्डित हो चुका है और वें दो भुजी स्वरूप मे, जिनका दायां हाथ वरद मुद्रा में और बाएं हाथ में छत्र लिए हैं। इसमें वामन सर्वाभूषणों से सुसज्जित हैं।

राजकीय संग्रहालय, झालावाड़ (फलक सं० 7) में काकूनी (बारां) से प्राप्त द्वारशाखा मिला है, जिसमें वामन और त्रिविक्रम दोनों का अंकन मिलता है। इसके सबसे ऊपर वामन समभंग मुद्रा में छत्र लिए खड़े हैं और दूसरा हाथ वरद मुद्रा में, जिसमें अक्षमाला धारण किए हैं। द्वारशाखा के सबसे नीचे चर्तुभुज स्वरुप में त्रिविक्रम का अंकन हैं। उनके तीन हाथों में शंख, चक्र और गदा विराजमान है, जबकि चौथा हाथ दायीं जंघा के ऊपर रखा है। उनका दायां पैर पृथ्वी पर और बायां पैर पुरूष मुखाकृति में प्रविष्ट हो रहा है। उनके उठे पैर के नीचे दो विकृत आकृतियां संभवतः राजा बलि और वामन का अंकन हैं। यह द्वारशाखा दसवीं शती ई० का है।

इसी संग्रहालय में हरिहर (फलक सं० 7) की एक प्रतिमा दसवीं शती ई० की काकूनी से प्राप्त हुई है। इसमें वामन केंद्र में चर्तुभुज स्वरुप में, समभंग मुद्रा में खड़े हैं। उनके दो हाथों में कमल पुष्प और तीसरे में शंख और चौथा हाथ वरद मुद्रा में है।

निष्कर्ष : निष्कर्ष पूर्वक कहा जा सकता है कि सर्वेक्षण के दौरान राजस्थान के विभिन्न पुरास्थलों एवं संग्रहालयों में संरक्षित जिन मूर्तियों का अध्ययन किया गया हैं उनका काल आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी ई० के मध्य की है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि पूर्व-मध्यकाल में इस क्षेत्र में त्रिविक्रम प्रतिमाएं एवं दशावतारों का अंकन अत्यधिक मात्रा में प्राप्त होती है। जबकि स्वतंत्र वामन मूर्तियां अल्प मात्रा में प्राप्त हुई हैं। वामन मूर्तियां चतुर्भुज स्वरूप में प्राप्त हुई हैं जिनके दो हाथ ही अवशेष हैं जबकि किन्हीं-किन्हीं प्रतिमा के सभी हाथ खंडित हो चुके है। खंडित हाथों के पास आयुधों का अंकन शेष हैं। इनके आयुधों के अंकन में कोई नवीनता नहीं है और न ही प्रतिमाशास्त्रीय ग्रंथो का पूर्णतः पालन किया गया है। ये अधिकांशतः विष्णु प्रतिमाओं के सदृश्य हैं।

दशावतार स्तंभों एवं पट्टों में वामन अधिकांशत: द्विभुज स्वरूप या कभी-कभी चतुर्भुज स्वरूप में अंकन किया गया है। उनका एक हाथ अभय या वरदमुद्रा में, जबकि दूसरे हाथ में छत्र दिखाया गया है, कभी-कभी कमंडलु के साथ भी उत्कीर्ण किया गया है। वामन प्रतिमाओं को स्थानक (समभंग/त्रिभंग) या आसन (ललितासन) मुद्रा में अंकित है। दशावतार पट्टों में अधिकांशत: वामन, लेकिन कहीं-कहीं त्रिविक्रम स्वरूप का भी शिल्पांकन मिलता है।

राजस्थान में त्रिविक्रम स्वरूप बादामी और एलोरा के समान कथानक शैली में शिल्पांकित हैं। मूर्तियों में एक ओर जहाँ त्रिविक्रम का विराट स्वरूप प्रदर्शित है, वहीं दूसरी ओर इस दान-कथा की नाटकीयता को भी सारगर्भित रूप में वामन, बलि, शुक्राचार्य, नमुचि तथा अश्व आदि की आकृतियों के माध्यम से दर्शाया गया है। प्रतिमाशास्त्र की दृष्टि से त्रिविक्रम के चतुर्भुज स्वरूप में विष्णु के चार प्रमुख आयुधों का ही प्रदर्शन किया गया है। इसके निरूपण में विष्णुधर्मोत्तरपुराण, अपराजितपृच्छा, शिल्परत्न ग्रंथ (अल्बर्ट हॉल संग्रहालय, जयपुर) तथा वैखानसागम ग्रंथ का मिला-जुला प्रभाव देखा जा सकता है। त्रिविक्रम का बायां पैर पृथ्वी पर, जबकि दायां पैर राहु या ब्रह्मांड के मुख में प्रविष्ट हो रहा है। मूर्ति शैली एवं देव लक्षणों की दृष्टि से ओसियां के प्रारंभिक मंदिरों की देव मूर्तियाँ पूर्ववर्ती गुप्तकालीन कला परंपरा से प्रभावित जान पड़ती हैं। यहाँ की देवप्रतिमाएं सामान्यतया आकृति में छोटी, सौम्य, गतिशील तथा आध्यात्मिक भावों से परिपूर्ण हैं। त्रिविक्रम के उठें पैर के ऊपर एक विचित्र मुखाकृति मिलती है, जिसे लेकर विद्वानों में काफी विवाद का विषय रहा है। गोपीनाथ राव ने वराह पुराण को उद्धृत करते समय विचार व्यक्त किया, कि जब त्रिविक्रम ने स्वर्ग नापने के लिए अपना पैर ऊपर उठाया तो उसके टकराने से ब्रह्मांड फूट गया और उस टूटे ब्रह्मांड की दरारों से जल बहने लगा। यह मुख संभवतः ब्रह्मांड की उस अवस्था को दर्शाता है। वी० एस० अग्रवाल की भी यही मान्यता है। कालांतर में डॉ० स्टेला कैमरिस, डॉ० आर० डी० बनर्जीं, डॉ जे० एन० बनर्जी और श्री सी० शिवराममूर्ति, दुर्गानन्द तिवारी आदि ने इसे राहु का प्रतीक बताया है। इन विद्वानों के अनुसार मध्यकालीन कला में राहु का इस प्रकार से चित्रण किया जाता था।

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पूजा अवस्थी
शोध-छात्रा, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, 221005

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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