शोध आलेख : ताओवादी दर्शन की प्रतिमूर्ति : ‘मोमेंट इन पेकिङ’ का पात्र याओ सीआन / इरफान अहमद

ताओवादी दर्शन की प्रतिमूर्ति :मोमेंट इन पेकिङका पात्र याओ सीआन
- इरफान अहमद 

शोध सार : बीसवीं सदी के चीनी लेखक लिन य्वीथाङ की रचनात्मकता पूर्व और पश्चिम की सांस्कृतिक परंपराओं के बीच एक सेतु का कार्य करती है। उनका यह कथन - “मेरा एक पैर पूर्वी संस्कृति में है तो दूसरा पश्चिमी मेंलिन य्वीथाङ, यही जीवन है 23- केवल उनकी वैचारिक स्थिति को, बल्कि उनकी साहित्यिक दृष्टि को भी रेखांकित करता है। चीनी सभ्यता की पृष्ठभूमि में रचित उनका अंग्रेजी उपन्यास मोमेंट इन पेकिङ (Moment in Peking) इसी द्वैत का सशक्त उदाहरण है। इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र याओ सीआन लेखक द्वारा ताओवादी जीवन-दर्शन से अनुप्राणित एक विशिष्ट पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत शोध-आलेख याओ सीआन के जीवन-दर्शन के माध्यम से ताओवादी दर्शन की साहित्यिक अभिव्यक्ति का विश्लेषण करता है और यह प्रश्न उठाता है कि क्या यह चरित्र केवल ताओवाद से प्रभावित है अथवा लिन य्वीथाङ द्वारा रचित एक सचेतन आदर्श-प्रतिमान है। 

बीज शब्द : ताओवाद, मोमेंट इन पेकिङ, लिन य्वीथाङ, याओ सीआन, ताओ चिङ, लाओत्सी, च्वाङत्सी, च्वाङत्सी, चीनी दर्शन, चीनी साहित्य, छी ऊर्जा

मूल आलेख : लिन य्वीथाङ का जन्म सन 1895 में दक्षिणी चीन के फ़ूच्येन प्रांत में एक खाते-पीते परिवार में हुआ। उन्होंने ताओवाद बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन किया था। चीन से ही स्नातक करने के बाद हार्वर्ड लीपजिग विश्वविद्यालयों से क्रमशः स्नातकोत्तर पीएचडी की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वापस लौटकर पेईचिङ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1935 में वह अमेरिका में जा बसे जहाँ दशकों वास किया। 1976 में थाएवान (ताईवान) में देहांत हुआ। 

उपन्यास चीन के बॉक्सर विद्रोह(1899-1901) की पृष्ठभूमि से शुरू होता है और द्वितीय चीनजापान युद्ध (1937-1945) के प्रारंभ की पृष्ठभूमि में समाप्त हो जाता है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में उपन्यास काल्पनिक चरित्रों के माध्यम से चीनी सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, तत्कालीन समाज, तत्कालीन राजनीति राजधानी पेईचिङ को सुंदरता से पिरोता है। यह उपन्यास सन 1939 में छपा और अगले ही साल लेखक को नोबेल साहित्य पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। इसमें लगभग चार लाख शब्द हैं और लेखक का शाहकार भी माना जाता है। 

इस विषय पर विद्यमान शोध का संक्षिप्त अवलोकन दिलचस्प है। ली श्याओली के अनुसार, याओ का चरित्र बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में चीन के प्रसिद्ध बौद्ध संन्यासी ली शूथूङ (हूङ यी) से मिलता जुलता है जो मोह-त्याग के समान पथ पर चले93-97 ल्यो श्वेई ने वाङ चाओशङ को उद्धृत करते हुए लिखा है कि चीन में कन्फ्यूशीवादी बौद्धवादी परिप्रेक्ष्य में नामचीन वृहत उपन्यास पाए जाते हैं लेकिन मोमेंट इन पेकिङ ने ताओवादी परिप्रेक्ष्य में किसी वृहत उपन्यास की रिक्ति को भरने का महान कार्य किया है (198-199) वाङ फङ फेई छन सीयु ने रेखांकित किया है कि लिन य्वीथाङ का सम्पूर्ण जीवन ताओवाद की व्याख्या एवं प्रचार में समर्पित रहा (720) इन शोधपत्रों ने ताओवाद की व्यापक और प्रचलित व्याख्या तो की है, लेकिन याओ सीआन के जीवन दर्शन के एक-एक पहलू को ताओवादी ग्रंथों के आधार पर चिह्नित करने का प्रयास अभी भी सीमित है। 

ताओवादी दर्शन: एक सैद्धांतिक संदर्भ 

ताओवाद चीन का लगभग ढाई हजार साल प्राचीन एक महत्वपूर्ण दर्शन है जो जीवन के हर पहलू में प्रकृति प्राकृतिक मार्ग, अर्थात् ताओ () को बल देता है। लाओत्सी (老子) को इस दर्शन का जनक माना जाता है, जिन्हें ताओवाद के आधारभूत ग्रंथ ताओ चिङका लेखक भी माना जाता है। उनके बाद की पीढ़ी में एक अन्य महान दार्शनिक च्वाङत्सी (庄子) भी हुए, जो उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध ताओवादी ग्रंथच्वाङत्सीके रचनाकार भी माने जाते हैं, जिसे दूसरा आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। ताओवाद के अनुसार, एक आम व्यक्ति को किसी कार्य या कला में ऐसी दक्षता प्राप्त कर लेनी चाहिए कि वह कार्य निश्चेष्ट भाव से प्राकृतिक सहजता के साथ संपन्न किया जा सके। अर्थात् उस अवस्था को प्राप्त करना जिसमें व्यक्ति उसकी कलादोनों एक हो जाएँ। वहीं ताओवादी संन्यासी समाज से दूर प्रकृति की गोद में ध्यान-साधना को अपनाते हैं (ताओइज़्म”) 

च्वाङत्सी में एक कसाई की कथा के माध्यम से कार्यकुशलता कार्यप्रियता को ताओवादी मार्ग से जोड़ा गया है। इस कथा के अनुसार, जब एक कुशल कसाई एक मृत भैंसे के माँस को काटता है, उसकी कुठार-जनित ध्वनि भी संगीत तुल्य होती है (च्वाङत्सी अध्याय 3) अतः अपनी कारीगरी में सहजता और आनंद की पराकाष्ठा ही ताओवादी मार्ग है, ठीक शिवपूजन सहाय केहज्जामसरीखा, जिसका छूरा चरमानंद में रसे-रसे चलता है (शिवपूजन सहाय 485-487)

याओ सीआन का चरित्र: ताओवाद का एक साहित्यिक प्रतिरूप 

याओ सीआन का आरंभिक जीवन सांसारिक विलासिता और मोह-माया के एककाले अध्यायके रूप में चित्रित है, जो ताओवादी दृष्टि में अज्ञानता एवं ताओ से विच्छिन्नता की अवस्था को सूचित करता है। किंतु तीस वर्ष की आयु के पश्चात उसमें आया आमूलचूल परिवर्तन केवल बाह्य आचरण का रूपांतरण नहीं, बल्कि ताओवादी साधना द्वारा प्राप्त एक गहन आंतरिक परिवर्तन का परिणाम प्रतीत होता है। इस परिवर्तन की सर्वप्रथम और सर्वाधिक ठोस अभिव्यक्ति उसके शरीर और गति में परिलक्षित होती है। ताओवाद से प्रेरित कूङफू (功夫) के नियमित अभ्यास ने शरीर को संतुलित बनाए रखा, किंतु उसकी वास्तविक विशेषता उसकी चाल में निहितजल-सदृशगुण में निहित है।

उसका प्रत्येक कदम धीर, ठोस और संतुलित था, उसका शरीर सदैव एक लयबद्ध तत्परता में रहता था, जो किसी भी दिशा से आनेवाले आघात को सहजता से आत्मसात कर सके। यह ताओ चिङ (अनुभाग 8) में प्रतिपादितपरम श्रेष्ठता जल के समान है’ (上善若水)— इस मूलभूत ताओवादी सिद्धांत का एक साकार शारीरिक प्रतिरूप थी। इस प्रकार, याओ की कूङफू-परिष्कृत देह केवल एक शारीरिक कौशल का परिचायक नहीं, बल्कि ताओवादी श्रेष्ठता के दार्शनिक आदर्श की एक जीवंत अभिव्यक्ति बन जाती है।

याओ सीआन के जीवन में ताओवादी संयम का दर्शन होता है। उसका संपूर्ण व्यक्तित्व एक अद्भुत मानसिक संयम और धैर्य से निर्मित था, जो उसके ताओवादी दृष्टिकोण का केंद्रीय स्तंभ था। वह जीवन की अराजकता एवं उथल-पुथल के बीच भी एक अडिग शांति बनाए रखता था, यह मानते हुए कि अधीरता आत्मा के लिए विष के समान हानिकारक है। दरअसल यह दर्शन ताओवाद के दूसरे बड़े ग्रंथ च्वाङत्सी में स्पष्ट रूप से उपलब्ध है, जिसके दो अध्याय हैंधीर विचरण逍遥游” (च्वाङत्सी अध्याय 1) संयमपूर्णता 在宥” (च्वाङत्सी अध्याय 11) पहला अध्याय मन की वह उच्चतम अवस्था प्रस्तुत करता है जहाँ वह सांसारिक बंधनों और अशांति से मुक्त होकर विचरण करता है, जबकि दूसरा अध्याय बिना स्वाभाविक सहजता में जीने के सिद्धांत पर बल देता है। 

याओ सीआन के जीवन दर्शन में 'प्रकृति-अनुकूलता' और 'भाग्यपरायणता' की अवधारणा किसी निष्क्रिय समर्पण का पर्याय होकर, प्रकृति के शाश्वत नियमों के साथ सचेतन सामंजस्य स्थापित करने की एक गहन सक्रिय प्रक्रिया के रूप में उभरती है याओ इस दार्शनिक यथार्थ को पूर्णतः आत्मसात करता था कि मानवीय पुरुषार्थ की अपनी एक विवश सीमा है। यह दृष्टिकोण ताओवादी ग्रंथ च्वाङत्सी के मौलिक चिंतन में गहराई से प्रतिध्वनित होता है। विशेषकर, "जीवन की वास्तविक अनुभूति” (达生) नामक अध्याय इस सत्य को उद्घाटित करता है कि "जो व्यक्ति भाग्य की वास्तविक प्रकृति को समझ लेता है, वह उन स्थितियों को बदलने के निरर्थक प्रयास में ऊर्जा व्यय नहीं करता जो अनिवार्यतः उसके नियंत्रण से परे हैं (达命之情者不务知之所无奈何) यहाँ 'भाग्य' का अर्थ कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के वे अपरिवर्तनीय नियम हैं जिनका उल्लंघन असंभव है। इसी क्रम में, च्वाङत्सी (अध्याय 7) का "ब्रह्मांड की प्रकृति का अनुपालन" (顺物自然) का सिद्धांत याओ के जीवन में मूर्त रूप लेता है। उसके व्यक्तित्व में व्यर्थ के संघर्ष और कृत्रिम प्रतिरोध का स्थान एक ऐसी प्रज्ञा ले लेती है जो अस्तित्व के नैसर्गिक प्रवाह के साथ बहना जानती है। 

याओ सीआन का आध्यात्मिक जीवन केवल दार्शनिक चिंतन तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी एक ठोस एवं नियमित शारीरिक साधना में भी अभिव्यक्त होता था। उसकी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग था आधी रात को जागृत होकर ध्यानमुद्रा में बैठना और 'छी' (आंतरिक ऊर्जा) के संधान हेतु एक जटिल प्रक्रिया का अनुसरण करना। यह प्रक्रिया, जिसमें शरीर के विशिष्ट मर्मस्थलों (माथा, गाल, हथेलियाँ, तलवे) पर मालिश, साँसों का गहन नियंत्रण, और लार का संचालन शामिल था, एक ऐसी आंतरिक यात्रा थी जिसका लक्ष्य शरीर के निचले भाग में स्थित 'आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र' को जागृत करना था। इस प्रक्रिया के दौरान वह 'आंत-द्रव' के प्रवाह को अनुभव कर पाता था और अपने पूरे अस्तित्व को एक 'मधुर सुखद अनुभूति' से भर देने वाले 'आध्यात्मिक चरमानंद' की प्राप्ति तक साधना जारी रखता था (लिन य्वीथाङ, मोमेंट इन पेकिङ  13)

यह साधना ताओवादी एवं योगिक परंपराओं के बीच एक गहरे सूत्र को उजागर करती है। ताओ चिङ (अनुभाग 10) में "छी को एकाग्र कर कोमलता प्राप्त करने से शिशु जैसा लचीलापन आता है" (专气致柔能婴儿乎) का सिद्धांत याओ की इसी साधना का सैद्धांतिक आधार प्रतीत होता है। उसका यह छी ऊर्जा का व्यायाम योग के प्राणायाम से अद्भुत समानता रखता है। विदित हो कि, वह पेट का जिस निचले हिस्सा सक्रिय कर रहा था, वह कुंडलिनी योग की परंपरा में 'मणिपूर चक्र' के रूप में पहचाना जाता है (तिरुमलय कृष्णमचार्य 10), जिसे समस्त शारीरिक एवं प्राणिक ऊर्जा का केंद्र और वितरण-स्थल माना गया है। 

याओ सीआन का सामाजिक दृष्टिकोण उसकी ताओवादी चेतना का सबसे क्रांतिकारी पक्ष प्रस्तुत करता है, जो रूढ़िवादी कन्फ्यूशी समाज के लिंग-आधारित पदानुक्रम को सीधी चुनौती देता था। उसने केवल अपनी बेटियों के पैर बाँधने की क्रूर प्रथा काजो कुलीनता का प्रतीक मानी जाती थीअपनी धर्मपत्नी की इच्छा के विरुद्ध जाकर भी विरोध किया, बल्कि उनकी व्यक्तिगत रुचि का सम्मान करते हुए उन्हें नाटकों के गीत गाने की शिक्षा भी दी। यह एक ऐसे युग में एक साहसिक कार्य था जब संगीत, नृत्य एवं नाटक जैसी कलाओं को 'अनैतिक' मानकर सामाजिक दृष्टि से हाशिये पर धकेल दिया गया था। इससे भी आगे बढ़कर, उसने बेटियों को आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल भेजा, जो उस समय की सामाजिक मान्यताओं के विपरीत एक सचेतन एवं प्रगतिशील निर्णय था। इन क्रियाओं के माध्यम से याओ ने पुत्र और पुत्री के बीच किसी भेद को स्वीकार नहीं किया, जिससे उसकी लिंग-निरपेक्ष दृष्टि स्पष्ट होती है।

यह दृष्टिकोण ताओवादी दर्शन की मूलभूत प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। ताओवाद प्रकृति के द्वैतयिन और यंगमें सामंजस्य देखता है, कि पदानुक्रम। इसलिए, इसके ग्रंथ भाव और वाक्य-विन्यास दोनों स्तरों पर एक लिंग-निरपेक्षता का प्रदर्शन करते हैं, जो पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को नैसर्गिक नहीं, बल्कि सामाजिक निर्माण मानते हैं। शार्लेन थान के अनुसार, ताओवादी परिप्रेक्ष्य सामाजिक न्याय की एक ऐसी संकल्पना प्रस्तुत करता है जो बिना किसी भेद के समस्त जीवन की स्वाभाविकता का समर्थन करती है (शिक्षा में सामाजिक न्याय की संकल्पना” 596-611) अतः याओ की लिंग-निरपेक्षता केवल एक व्यक्तिगत स्वभाव नहीं, बल्कि ताओवाद के लिंग-निरपेक्षता के सिद्धांत का एक सामाजिक क्षेत्र में किया गया साहसिक अनुप्रयोग था। 

याओ सीआन के व्यक्तित्व का एक मूलभूत आधार था सामाजिक आडंबरों एवं बाह्य प्रदर्शन के प्रति गहन उदासीनता। उसने किसी धनी या प्रतिष्ठित कुल में जाकर, एक दीन परिवार के सुसंस्कृत युवक को स्वयं प्रस्ताव देकर अपना दामाद चुना। यह निर्णय सांसारिक प्रतिष्ठा और आर्थिक लाभ से ऊपर उठकर मानवीय गुणों एवं आंतरिक संस्कार को प्राथमिकता देती है।

यह आडंबर-विरोध ताओवादी दर्शन के सार के साथ पूर्ण सामंजस्य रखता है। ताओवाद बाहरी प्रतिष्ठा, धन-संपदा और सामाजिक हैसियत जैसे कृत्रिम आडंबरों का निरंतर तिरस्कार करता है, क्योंकि ये ताओ से विचलन के प्रतीक हैं। इसके स्थान पर, यह जीवन में विनय, सहजता और बौद्धिक स्वतंत्रता को आवश्यक मानता है, क्योंकि ये गुण व्यक्ति को समाज के दबावों से मुक्त करके उसकी स्वाभाविकता की ओर ले जाते हैं (शार्लेन थान, “ताओवादी नज़रिए में पाठशाला” 9) 

याओ सीआन के ताओवादी जीवन-दर्शन का केंद्रीय सूत्र था वू-वेई (अहस्तक्षेप) का सिद्धांत, जो उसके घरेलू और व्यावसायिक जीवन में समान रूप से प्रकट होता था। वह परिवार तथा व्यवसाय, दोनों की दैनंदिन व्यवस्था में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करने से सचेतन रूप से दूर रहता था, जिससे उन्हें अपनी स्वाभाविक गति से विकसित होने की स्वतंत्रता मिलती थी। यह दूरी एक उदासीनता या उपेक्षा नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक विश्वास का प्रतीक थीयह विश्वास कि प्रकृति एवं मानवीय व्यवस्थाएँ अपने आंतरिक संतुलन से ही सर्वोत्तम रूप से संचालित होती हैं। ऐसा अहस्तक्षेप उसे एक दुर्लभ आंतरिक स्वतंत्रता प्रदान करता था, अतः वह केवल अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए समय निकाल पाता था, बल्कि उसमें पूर्णतया निमग्न भी हो सकता था।

यह सिद्धांत ताओ चिङ  अध्याय 3 में स्पष्टतः अभिव्यक्त हुआ है: "जहाँ हस्तक्षेपहीनता है, वहाँ सब कुछ स्वतः ही अनुशासित रहता है (为无为则无不治)" एडवर्ड स्लिङ्गरलैण्ड (299-300) के अनुसार, वू-वेई ताओवाद का सार है। एक ऐसी अवस्था जहाँ कोई क्रिया बिना किसी दबाव के, स्वाभाविकता और सहजता के साथ घटित होती है। याओ सीआन का जीवन इसी आदर्श का एक व्यावहारिक उदाहरण था। उसका अहस्तक्षेप निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक परिष्कृत सक्रियता थी।

याओ सीआन के विचारों की परिपक्वता सत्य और असत्य की उसकी सापेक्षिक समझ में सबसे स्पष्ट झलकती है, जो ताओवादी दृष्टिकोण का एक सूक्ष्म पहलू है। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में चीनी सुधारवादियों पर अपने दामाद से चर्चा करते हुए वह एक गहन दार्शनिक टिप्पणी करता है: “… अगर कुछ ग़लत है तो वे एक वक्त खुद थक जाएँगे। क्या च्वाङत्सी को भूल गए? सही, ग़लत कुछ नहीं होता। सिर्फ एक बात सही है, और वह है सच, लेकिन किसी को सच का पता नहीं। सच हमेशा बदलता रहता है और फिर अपने पुराने रूप में जाता है” (लिन य्वीथाङ, मोमेंट इन पेकिङ 580-581) यह कथन नैतिक निरपेक्षतावाद को नकारते हुए एक गतिशील और परिवर्तनशील वास्तविकता की ओर इशारा करता है। याओ के लिए, मानवीय निर्णय और विचारधाराएँ सदैव एक विशिष्ट संदर्भ और परिप्रेक्ष्य से बंधी होती हैं, और इसलिए कोई भी 'सही' या 'ग़लत' पूर्ण एवं स्थायी नहीं होता।

यह दृष्टिकोण सीधे तौर पर ताओवादी दार्शनिक च्वाङत्सी के चिंतन से उपजा है। च्वाङत्सी (अध्याय 2) में यह मूलभूत सूत्र दर्ज है: "यह (विचार) भी एक सही-ग़लत है और वह (विचार) भी एक सही-ग़लत है (彼亦一是非此亦一是非)" तात्पर्य यह है कि सत्य के विभिन्न पहलू हैं और प्रत्येक विचार अपने स्वयं के संदर्भ में वैध हो सकता है। एक सार्वभौमिक, निरपेक्ष सत्य को पकड़ पाना मानवीय बुद्धि की सीमा से परे है। याओ का यह विश्वास कि "सच हमेशा बदलता रहता है" इसी ताओवादी अवधारणा को प्रतिध्वनित करता है। इस प्रकार, उसकी सत्य की सापेक्षता में आस्था केवल एक संशयवादी रवैया नहीं, बल्कि ताओवाद के ब्रह्मांडीय प्रवाह और निरंतर परिवर्तन के बोध से उपजी एक गहन स्वीकृति है। यह उसे अपने समय के राजनीतिक एवं सामाजिक उन्मादों से एक दार्शनिक दूरी बनाए रखने में सहायक होती थी, जिससे वह अधीरता से मुक्त रह सका।

जीवन और मृत्यु के प्रति याओ सीआन का दृष्टिकोण उसके ताओवादी वैराग्य की चरम परिणति को दर्शाता है। अपने बेटे और पत्नी की मृत्यु के समय, जब समस्त परिवार शोकाकुल एवं व्यथित था, याओ ने आँसू की एक बूँद तक नहीं बहाई। यह व्यवहार एक सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया के प्रत्यक्ष विपरीत प्रतीत होता है, किंतु ताओवादी दर्शन के प्रकाश में यह एक गहन आध्यात्मिक समझ का प्रतीक है। यह वैराग्य भावहीनता या संवेदनशून्यता नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु के चक्र और स्थायी-अस्थायी के ताओवादी बोध से उत्पन्न एक गहन आंतरिक स्वीकृति थी।इसी प्रकार का एक प्रसंग ताओवाद के महान दार्शनिक च्वाङत्सी के जीवन में भी मिलता है। जब च्वाङत्सी की पत्नी की मृत्यु हुई और उसका मित्र ह्वेत्सी उन्हें सांत्वना देने पहुँचा, तो उसने देखा कि च्वाङत्सी पैर फैलाए बैठे एक बर्तन बजाते हुए गीत गा रहे थे। ह्वेत्सी को यह देखकर आश्चर्य हुआ, परंतु च्वाङत्सी ने समझाया कि मृत्यु प्रकृति के परिवर्तन का एक स्वाभाविक चरण है, जिस पर शोक करना उस अटल नियम को समझ पाने का प्रमाण है (च्वाङत्सी अध्याय 18) याओ सीआन का व्यवहार भी इसी दार्शनिक स्थिति को दर्शाता है। उसके लिए, मृत्यु 'ताओ' के अनंत प्रवाह में एक परिवर्तन मात्र थी, कि एक स्थायी विलगाव। उसका यह वैराग्य उसकी संपूर्ण ताओवादी साधना का प्रतिफल था, जिसने उसे सांसारिक आसक्तियों से मुक्त करके एक व्यापकतर ब्रह्मांडीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया था। इस प्रकार, उसने अपने निजी दुख को एक सार्वभौमिक सत्य की समझ में विलीन कर दिया, जो ताओवादी चिंतन की परम उपलब्धि मानी जा सकती है।

निष्कर्ष : लिन य्वीथाङ के ऐतिहासिक उपन्यास मोमेंट इन पेकिङ में याओ सीआन का चरित्र ताओवादी दर्शन की अमूर्त अवधारणाओं को मूर्त एवं जीवंत मानवीय अनुभव में ढालने का एक सुविचारित साहित्यिक प्रयास है। इस शोधपत्र में किए गए विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि याओ का संपूर्ण व्यक्तित्वउसका जल-सदृश लचीलापन, अहस्तक्षेप (वू-वेई) का सिद्धांत, प्रकृति के साथ सामंजस्य, आंतरिक ऊर्जा (छी) का संधान, सामाजिक आडंबरों का विरोध, लिंग-निरपेक्ष दृष्टिकोण, सत्य की सापेक्षता में आस्था, और जीवन-मृत्यु के प्रति वैराग्यताओवाद के मूलभूत सिद्धांतों का एक सुसंगत एवं सचेतन प्रतिरूप प्रस्तुत करता है। प्रत्येक गुण या कर्म को ताओ चिङ एवं च्वाङत्सी जैसे मौलिक ग्रंथों में दर्ज दार्शनिक सूत्रों से सीधे जोड़ा जा सकता है। 

अतः याओ सीआन केवल ताओवाद से प्रभावित एक आकस्मिक चरित्र नहीं है, बल्कि लिन य्वीथाङ द्वारा रचित एक आदर्श ताओवादी प्रतिमान है। यह चरित्र इस तथ्य का प्रमाण है कि लेखक को केवल ताओवाद का गहन बौद्धिक ज्ञान था, बल्कि उन्होंने इस दर्शन को आत्मसात् करके उसे साहित्यिक सृजन का आधार बनाया। याओ के माध्यम से लिन य्वीथाङ ने बीसवीं सदी के उथल-पुथल भरे चीन में एक ऐसे आदर्श व्यक्ति की कल्पना की, जो बाह्य संकटों के बीच भी आंतरिक शांति, लचीलेपन और नैतिक स्वायत्तता को बनाए रख सकता है। इस प्रकार, मोमेंट इन पेकिङ केवल एक पारिवारिक गाथा या ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं रह जाता, बल्कि ताओवादी जीवन-दर्शन की सजीव व्याख्या और उसकी सार्वकालिक प्रासंगिकता का एक शक्तिशाली उद्घोष बन जाता है।

संदर्भ :

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  2. च्वाङत्सी. च्वाङत्सी(庄子) https://ctext.org/zhuangzi
  3. ताओइज़्म.स्टैनफ़र्ड एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी (Stanford Encyclopedia of Philosophy), एडवर्ड एन. ज़ाल्टा द्वारा संपादित, स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी, 2025. https://plato.stanford.edu/entries/daoism/.
  4. शार्लेन थान,  ताओवादी नज़रिए में पाठशाला”  (“The learning school through a Daoist lens”. ऑक्सफोर्ड रिव्यू आफ एजुकेशन, 2020
  5. शार्लेन थान.शिक्षा में सामाजिक न्याय की संकल्पना : एक ताओवादी परिप्रेक्ष्य" (“Conceptualising social justice in education: A Daoist perspective"). काम्पेयर : जर्नल आफ कम्पैरटिव ऐंड इंटर्नैशनल एजुकेशन, 51(4), 2021
  6. योगी भजन. एक्वेरियन टीचर: योगी भजन द्वारा सिखाए गए कुंडलिनी योग में केआरआई इंटरनेशनल टीचर ट्रेनिंग (The Aquarian Teacher: KRI International Teacher Training in Kundalini Yoga as taught by Yogi Bhajan ), संस्करण 4, कुंडलिनी शोध संस्थान, 2007
  7. लाओत्सी. ताओ चिङ (道德) https://ctext.org/dao-de-jing.
  8. लिन य्वीथाङ. छन तानतान (सं.).यही जीवन है人生不过如此छयूनयेन प्रेस, 2010
  9. लिन य्वीथाङ. मोमेंट इन पेकिङ (Moment in Peking). विदेशी भाषा शिक्षण शोध मुद्रणालय, पेईचिंग, 2009
  10. ली श्याओली.मोमेंट इन पेकिङ में अभिव्यक्त ताओवाद : याओ सीआन मूलान पर चर्चा (“试析《京华烟云》的道家情怀——议姚思安与木兰”). जर्नल आफ येनप्येन यूनिवर्सिटी, 43(01), 2010
  11. ल्यो श्वेई.मोमेंट इन पेकिङ में विदेशी पाठकों के प्रति अभिव्यक्त ताओवाद” (《京华烟云》中面向外国读者的儒道思想体现). शिएनताए वनश्वे फिलुन, 2011(03)
  12. वाङ च्येनय्वी एल. स्ट्रिङ्गर.चीनी अवकाश-संस्कृति पर ताओवाद का प्रभाव” (“The Impact of Taoism on Chinese Leisure”). वर्ल्ड लीज़र जर्नल, 2000
  13. वाङ फङ फेई छन सीयु.प्रकृति के लिए ताओवाद: लिन य्वीथाङ के मोमेंट इन पेकिङ का विश्लेषण (“The Taoist Way to Follow Nature: Analysis of Lin Yutang’s Moment in Peking”). जर्नल आफ लिटरेचर एंड आर्ट स्टडीज़, 12 (7), जुलाई 2022
  14. शिवपूजन सहाय.मैं हज्जाम हूँ.” शिवपूजन सहाय साहित्य-समग्र 2, संपादक मंगलमूर्ति, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 2011
  15. एडवर्ड स्लिङ्गरलैण्ड.सहज क्रिया: (वू-वेई) का चीनी आध्यात्मिक आदर्श” (“Effortless Action: The Chinese Spiritual Ideal of Wu-wei”). जर्नल ऑफ़ अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ रिलीज़न, 2000

 

टिप्पड़ी

  1. इस शोधपत्र में प्रयुक्त अनुवाद मेरे (इरफान अहमद के) हैं।
  2. लेख में प्रयुक्त चीनी शब्दों का लिप्यंतरण मेरे (इरफान अहमद) द्वारा उनकी मानक ध्वनियों के आधार पर किया गया है। चीनी मानक ध्वनियों के लिप्यंतरण के बारे में मेरा एक सरल विडियो उपलब्ध है: https://www.youtube.com/watch?v=OIe4Ko3g7pc&t=1148s,

 

इरफान अहमद
सहायक प्राध्यापक
चीनी विभाग, सिक्किम (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, गंगटोक, सिक्किम737102
irfanahmadjnu786@gmail.com

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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