विज्ञान की दुनिया के अनसुने किस्से : किस्सा सोने का / नीरज कुमार श्रीमाली

विज्ञान की दुनिया के अनसुने किस्से : किस्सा सोने का
- नीरज कुमार श्रीमाली


जैसे
लोहा, तांबा या कांसा, ठीक वैसे ही सोना, जमीन से निकलने वाली एक धातु ही तो है, पर हम इंसानों ने इसे इतना सिर पर चढ़ा दिया है कि अब ये उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। अब तो ये लखटकिया भी हो गया है। मैं तो मनहूस ही कहूँगा, ना होता तो बेहतर होता। वैसे भी, इसको खाया जा सकता है पिया। इतिहास उठाकर देख लीजिए, इस कमबख्त ने बड़ा भौकाल मचाया है। पहले तो ये राजा-महाराजों के ताजो तख़्त में शामिल हुआ, बाद में उन्ही को लील गया, सदियों तक ये मंदिरों के कंगूरों को चमकाता रहा, लेकिन जाते-जाते इन्ही मंदिरों में आनेवाले भक्तों के सिर कलम करवाता गया, महारानियों के गले की शोभा बढाने के लिए ये, जाने कितने ही किसानों का अनाज पीढ़ियों तक खाता रहा, बेटी की डोली और बाप की अर्थी उठवाने के लिए जाने इसने कितने ही आशियाने नीलाम करवा दिए, कितने ही खेत गिरवी रखवा दिए। 

इसने तो सुहाग की निशानियों तक को नहीं बक्शा। आज भी देहात में कई साहूकारों की तिजोरियाँ गाँव के हर घर के मंगलसूत्रों और कंगनों से भरी पड़ी हुई है। सब कुछ लुटा देने के बाद भी जब कर्जा नहीं भरता था, तब ये निर्मोही, हाड़-माँस के इंसानों को जानवरों की तरह कई वर्षों तक बंधुआ मज़दूर बनवाता गया। एक हार की ख्वाहिश पूरी करने के लिए कितने ही प्रेमासक्त नायकों ने अपने शरीर को गला दिया, और कितनी ही नायिकाएँ सोने के एक झुमके के बदले अपने ईमान से डगमगा गई। अब और क्या लानत दी जाए इस नामुराद सोने को!

शायद अब आप समझ गए होंगे कि मैं सोने को इतना भला बूरा क्यों सुना रहा हूँ, फिर भी अगर आपको सोने के प्रति सहानुभूति है, तो आइए, अब थोड़ा इतिहास के झरोखे से झाँक लेते है। पता नहीं किस नारद ने यह अफवाह फैला दी कि लंकावासी तो सोने की धूल मलकर नहाते है और सोने से बने घरों में ही रहते है। सोलहवीं शताब्दी में स्पेन के लूटेरों ने इस चक्कर में पूरा महाद्वीप खंगाल डाला, लाखों मूल निवासियों का सफाया कर दिया, लेकिन उन्हें असलीसोने का शहरकभी नहीं मिला। भली किस्मत थी उन यहूदियों की, जिनके पास कोई सोना नहीं था, जर्मन नाजियों ने सोने के दांत निकलवाने के लिए यहूदियों के जबड़े और अंगूठियों के लिए अंगुलियाँ ही शरीर से अलग करवा दी थी।

महमूद ग़ज़नी, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे लूटेरे भारत में सोना लूटने के लिए ही तो आए थे। शायद उन्हें भी किसी ने खबर दे दी होगी कि भारत कोसोने की चिड़ियाकहा जाता है, सबने मिलकर इस चिड़िया के पंख इस बेरहमी से काटे कि उसके ज़ख्म आज तक ताज़ा है। इतिहास के ढेरों पन्ने उन युद्धों की कहानियों से भरे पड़े है जो केवल सोने के लिए लड़े गए। ज़िंदा आदमी तो ठीक है, पर मुर्दा भी इसे जन्नत में साथ ले जाने की फिराक में रहता है। मिस्र के तुतुनखामेन को ही देख लीजिए, सदियों तक ढेर सारे सोने को लेकर ताबूत में सोया रहा। तीन हज़ार साल बीत गए, तुतुनखामेन तो पूरी तरह से सड़ गया, लेकिन सोने की चमक अभी भी बरकारार है।

खैर, मुझे डर है कि सोने को में इसी तरह ताने मारता रहा तो तमाम जौहरी कचहरी में मेरी पेशी करवा दे। वैसे बुरे वक्त में सोना ही काम आता है, चाहे लाईलाज बिमारी हो या फिर शादी ब्याह। 20वीं सदी में जब आधुनिक अर्थव्यवस्था बनी, तबगोल्ड स्टैंडर्डप्रणाली का विकास हुआ, हर देश की मुद्रा का मूल्य इस बात पर तय होता था कि उसके पास कितना सोना है। हालाँकि आज यह व्यवस्था बदल चुकी है, लेकिन आज भी अंतरराष्ट्रीय रिज़र्व में सोना सबसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता है। लेकिन क्या सोना अपनी चमक के कारण ही इतना महँगा है? या फिर इसकी कोई और वजह भी हैं! कही ये इसलिए तो महँगा नहीं कि हमारी धरती पर यह सीमित मात्रा में है?

चलिए, पहले सोने की खासियत की अहम वजह जान लेते है। सोना हमारी धरती पर नही बना, ये अरबों साल पहले अनंत घनत्व, ताप और दाब वाले दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर से बना है। चौंक गए, जी हाँ में भी चौक गया था, बिल्कुल आपकी तरह, फिर मैंने इसके पीछे का सारा विज्ञान समझा, जो आपसे साझा कर रहा हूँ।

क्या आपको पता है कि वो कौनसी सबसे पुरानी बात है, जो हम इंसान जानते है? वो बात है आज से 13.8 अरब वर्ष पूर्व हुए एक महाविस्फोट (बिग बेंग) की, जिससे हमारे ब्रह्मांड का जन्म हुआ था। इस विस्फोट के लगभग तीन मिनट बाद ही तापमान इतना कम हो गया कि इस विस्फोट की राख में इलेक्ट्रान, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे हल्के कण बनने लगे। कुछ ही मिनटों में ये कण आपस में जुड़ने लगे और इन कणों ने ब्रह्मांड के पहले शिशू को जन्म दिया, जिसे हम हाइड्रोजन के नाम से जानते है।

लाखों साल तक हाइड्रोजन की यह गैस ठंडी होकर विशाल बादलों में बदल गई। ये बादल लगातार सिकुड़ते रहे जिससे इनके केंद्र का ताप और दाब भी लगातार बढता गया। बस, इसी से शुरुआत हुई एक भट्टी की, जिसके केंद्र में हाइड्रोजन के नाभिक आपस में मिलकर हीलियम बनाने लगे जिससे पहली बार सितारे चमक उठे। उन तारों के हृदय में तापमान और दबाव इतना बढ़ा कि वे एक दिव्य कार्यशाला बन गए। तारों की इसी भट्टी (न्यूक्लियर फ्यूज़न) में अब कार्बन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जैसे हल्के तत्त्व जन्म लेने लगे।

सो सुनार की और एक लुहार कीये कहावत तो आपने ज़ररूर सुनी होगी। लोहे का किस्सा भी कम मशहूर नहीं है। जब हमारे सूरज से भी 20–30 गुना बड़े तारे बनते है, तो उनमे इतनी प्रचंड ऊर्जा होती है कि इन तारों के केंद्र में लोहा (आयरन) बनने लगता है। लोहे के निर्माण की अवस्था तब आती है जब तारा अपना सारा ईंधन जला चुका होता है या यूँ कहे कि वह अपनी अंतिम साँसे गिन रहा होता है। दरअसल आयरन का निर्माण तारे की मौत का संकेत है, क्योंकि जब आयरन बनने लगता है तो तारा और ऊर्जा पैदा नहीं कर पाता, उसका दिल ठहर जाता है और वह भयंकर विस्फोट से फट पड़ता है, जिसे सुपरनोवा कहा जाता है। यही सुपरनोवा अपने साथ आयरन को ब्रह्मांड में बिखेर देता है। इस धमाके को ब्रह्मांड की सबसे उग्र आतिशबाजी कहा जा सकता है,जहाँ लोहा हर तरफ़ फैलकर आकाशगंगाओं को रंग देता है।

हीमोग्लोबिन का नाम तो आपने सुना ही होगा जिसके कारण हमारे खून का रंग लाल होता है। ये हीमोग्लोबिन लोहे का ही बना होता है, मतलब ये कि हमारी रगों में जो खून बह रहा है, उसका लाल रंग अरबों सालों पहले किसी तारे की मौत से बनी राख का हिस्सा है। याद रखिएगा कि हमारे फेफड़ों में जा रही ऑक्सीजन, दांतों का केल्शियम, हड्डियों एवं डीएनए का फोस्फोरस तथा हमारी रगों में बहता आयरन, इन सभी ने करोड़ों साल पहले किसी तारे में ही जन्म लिया था। आपके शरीर के हरेक तत्त्व का निर्माण सुदूर किसी तारे में ही हुआ है। हम सचमुच तारों की संतान हैं। चाँदनी रात के साफ़ आसमान में आप जिन तारों को देखते है, वे केवल दूर के तारे नहीं हैं, बल्कि आपके ही पूर्वज हैं, वे तारे जिनकी धूल से आप बने हैं।

चलिए अब बात करते है सोने यानी गोल्ड की। सोना साधारण तारों में पैदा नहीं होता, यह पैदा होता है दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर से, जो खुद कभी सुपरनोवा के मृत अवशेष थे। कल्पना कीजिए, यदि दो अदृश्य बेहद घने गोले जो शक्कर के दाने जितनी जगह में पूरी हिमालय पर्वतमाला जितना भार समेटे हों, आपस में टकराएँ तो क्या होगा? ब्रह्मांड की इस सबसे बड़ी आतिशबाज़ी के दौरान ताप और दाब इतना जबरदस्त होता है कि वहाँ बनता है सोना, और साथ में प्लैटिनम और यूरेनियम जैसे कुछ भारी तत्त्व भी। 

अब ज़रा ये भी जान लीजिए की ये न्युट्रोन स्टार क्या बला है? जब सूर्य से लगभग 8–10 गुना भारी कोई तारा अपना जीवन पूरा करता है, तो उसका सारा ईंधन (हाइड्रोजन, हीलियम आदि) जलकर समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह ज़बरदस्त सुपरनोवा विस्फोट के साथ फट पड़ता है। इस विस्फोट के बाद उसका कोर सिकुड़कर इतना छोटा और घना हो जाता है कि वहाँ प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन आपस में मिलकर न्यूट्रॉन बना लेते हैं। यही कहलाता है न्यूट्रॉन तारा।

अब ज़रा आंकड़ों पर गौर करिएगा, एक न्यूट्रॉन तारे का व्यास मात्र 20 किलोमीटर जितना हो सकता है, यानी एक छोटे शहर के बराबर,लेकिन उसका द्रव्यमान सूर्य जितना होता है। एक चम्मच जितने न्यूट्रॉन तारे के पदार्थ का वज़न लगभग 10 करोड़ टन हो सकता है और उसकी सतह का तापमान शुरुआत में लगभग 10 लाख से 100 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है। कल्पना कीजिए, अगर दो ऐसे महादानव रूपी तारे आपस में टकरा जाएँ, तो क्या होगा? जब ऐसे दो मृत तारे आपस में टकराते हैं, तो ब्रह्मांड थर्रा उठता है और उसी क्षण जन्म लेता है सोना। इस महासंग्राम में इतनी भयंकर उर्जा और दबाव पैदा होता है कि अब साधारण तत्त्व (C, H, O, N) नहीं, बल्कि बहुत भारी तत्त्व बनते हैं जैसे सोना, प्लेटिनम और यूरेनियम। यह टक्कर इतनी दुर्लभ घटना है कि करोड़ों सालों में यह कभी कभार और कहीं-कहीं ही होती है। लेकिन जब भी होती है, तो ब्रह्मांड में सोने जैसी धातुएँ बिखर जाती हैंऔर उसके कुछ कण धरती तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि धरती पर सोना बहुत ही सीमित मात्रा में है। दिलचस्प है कि धरती की गहराई में मौजूद सारे सोने को निकालकर सांचे में ढाला जाएं तो बमुश्किल एक 22 मीटर का घन बन पाएगा जो कि एक छोटे से क्रिकेट स्टेडियम में समा जाए।

कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन मानव शरीर का मूल आधार है। हम इन्हें साँस में लेते हैं, पीते हैं, खाते हैं, लेकिन सोना हमारे शरीर के लिए ज़रूरी नहीं। इसे खाया जा सकता है पीया, लेकिन यह अरबों वर्ष पूर्व हुई किन्ही दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर की आसमानी यादगार है। इसीलिए सोना धरती पर बेहद दुर्लभ है, तभी तो इंसान ने इसकी चमक को अमरता, ऐश्वर्य और शक्ति का प्रतीक बना दिया। 

सोने की असली कीमत उसकी आसमान से आई कहानी में छुपी है। जब आप सोने का आभूषण पहनते हैं, तो समझिए कि आप अपने शरीर पर दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर का नतीजा, यानी ब्रह्मांड के सबसे विस्फोटक पल का एक अंश धारण कर रहे हैं। तो अगली बार आप जब सगाई में सोने की अंगूठी पहनाए तो अपनी मंगेतर को ज़रूर बताए, कि ये अंगूठी अरबों सालों पहले दो विशाल तारों की टक्कर से जन्मी अनमोल राख से बनी है, मैं ये तुम्हे पहना रहा हूँ, क्योंकि तुम भी मेरे लिए अनमोल हो।

 

                                                                नीरज कुमार श्रीमाली

                                                        सहायक आचार्य (वनस्पति विज्ञान)

                                    श्री गोविन्द गुरु राजकीय महाविद्यालय बांसवाडाराजस्थान

nirajkani81@gmail.com, 9602637100

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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