- रितू जायसवाल एवं निशि सेठ
शोध सार : यह अध्ययन प्रयागराज की धार्मिक-आध्यात्मिक विरासत से जुड़े प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों- रामलीला, रामदल, शृंगार चौकी परंपरा में युवा सहभागिता, की भूमिका का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। मिश्रित विधि (Mixed-Methods)
दृष्टिकोण के माध्यम से प्राप्त परिमाणात्मक (आवृत्ति, प्रतिशत, माध्य, भारित औसत स्कोर) तथा गुणात्मक (साक्षात्कार, अवलोकन, थीमैटिक कोडिंग) डेटा से यह स्पष्ट हुआ कि इन आयोजनों का स्थानीय समुदाय और युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में अपना महत्त्व है। परिणाम दर्शाते हैं कि कामगार, कलाकारों में पारंपरिक जुड़ाव, सांस्कृतिक रव और पेशेवर संतुष्टि का उच्च स्तर मौजूद है, जबकि युवा आधुनिक तकनीकि युग में इस सांस्कृतिक निरंतरता को जीवित रखने हेतु तकनीकी एवं प्रबंधन संबंधी भूमिकाओं में सक्रिय योगदान दे रहे हैं। स्थानीय साहित्य, ऐतिहासिक स्रोतों और सामाजिक–मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के एकीकृत उपयोग के कारण यह अध्ययन शहरीकरण और आधुनिकीकरण के दौर में तीर्थराज प्रयाग की इस सांस्कृतिक विरासत में युवा वर्ग की आस्था उसके संरक्षण में युवा सहभागिता का अध्ययन करने एवं इन परम्पराओं के संरक्षण में उनके दृष्टिकोण को समझने का एक विशिष्ट और मूल्यवान विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
बीज शब्द :
मूल आलेख : दशहरे के पर्व पर भारत के विभिन्न भागो में रामकथा का मंचन भारतीय लोक उत्सव का महत्त्वपूर्ण अंग है। यद्यपि उनके आयोजन का मूल लक्ष्य एवं प्रयोजन एक ही है, किन्तु वे जिस रूप में मनाए जाते हैं, उनकी शैली एवं शिल्प भिन्न-भिन्न है। गंगा यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्थित प्रयागराज रामलीला और उससे जुड़ी रामदल और शृंगार चौकी परंपरा का अनूठा वाहक है। प्रतिवर्ष आश्विन मास में एकादश दिवसीय दशहरे मेले में भोरकाल में सोने चाँदी के जड़ाऊ शृंगार युक्त चौकियों पर राम, लक्ष्मण और सीता का पुराने नगर के प्रमुख मार्गों से गुज़रना, रामलीला के माध्यम से नाट्य आंदोलन, सांस्कृतिक क्रियाकलापों से जुड़ी प्रतिभाओं का विभिन्न पात्रों के रूप में रामलीला का मंच पर प्रदर्शन और सायं व रात्रि में रामकथा के विविध प्रसंगों की चौकियों का रामदल में प्रदर्शन और उसकी निरंतरता प्रयागराज की लोकसंस्कृति की पहचान है जो यहाँ के सामाजिक-धार्मिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। आज भीशृंगार चौकी और रामदल की निरंतरता प्रयागराज की पहचान है और उत्तर भारत में प्रयागराज के अतिरिक्त कही और देखने को नहीं मिलती। प्रयाग के इस भव्य लोकोत्सव का आयोजन अलग-अलग रामलीला कमेटियों द्वारा किया जाता है जिसमें 19वीं शताब्दी की प्रयागराज की दो प्रधान संस्थाओं- महन्त हाथी बाबा पजावा रामलीला कमेटी तथा श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी का योगदान महत्त्वपूर्ण है। परंपरा, आस्था को समेटे इस लोकोत्सव में प्रयागराज और आस-पास के क्षेत्रों के कामगारों और युवा कलाकारों की भागीदारी रहती है। यह आयोजन न केवल भक्ति के माध्यम के रूप में कार्य करता है बल्कि स्थानीय कलात्मकता, मूल्यों, सामुदायिक भागीदारी और युवा सहभागिता की जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में कार्य करता है। प्रस्तुत शोधपत्र शहरीकरण और आधुनिकीकरण के दौर में तीर्थराज प्रयाग की इस सांस्कृतिक विरासत में युवा वर्ग की आस्था, उसके संरक्षण में युवा सहभागिता का अध्ययन करने एवं इन परम्पराओं के संरक्षण में उनके दृष्टिकोण को समझने का एक प्रयास है।
2. साहित्य समीक्षा
तीर्थराज प्रयाग के ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामुदायिक जीवन को समझने हेतु उपलब्ध साहित्य व्यापक और बहुआयामी है। प्रयागराज पर उपलब्ध विविध ग्रंथों और शोध आधारित लेखों ने न केवल इस नगर की सांस्कृतिक विरासत का विस्तृत चित्र प्रस्तुत किया है, बल्कि रामलीला, रामदल तथा शृंगार चौकी जैसी परंपराओं के विकास, स्वरूप और सामाजिक प्रभावों को भी रेखांकित किया है। हरिमोहन दास टंडन द्वारा रचित “प्रयागराज” में प्रयागराज की भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, धार्मिक परंपरा, राजनीतिक विरासत और सांस्कृतिक गरिमा का गहन विवेचन मिलता है। लेखक ने विशेष रूप से दशहरा, रामलीला तथा नगर की सारस्वत परंपरा को इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का आधार बताया है। इसी क्रम में, शालीग्राम श्रीवास्तव की कृति “प्रयागप्रदीप” (1937) प्रयाग के सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को कालानुक्रमिक स्वरूप में प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ समय के साथ नगर के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में आए परिवर्तनों को विस्तार से दर्शाता है, जो वर्तमान युवा सहभागिता को समझने में सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। योगेंद्र प्रताप सिंह द्वारा सम्पादित “प्रयाग की रामलीला” (2011) में प्रयाग और उसके अंचल में प्रचलित विभिन्न रामलीलाओं का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा संगठनात्मक विवरण संकलित है। पुस्तक में अकबर के काल में रामलीला के संरक्षण, तथा पजावा, पथरचट्टी और कटरा रामलीला कमेटियों के इतिहास को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक तीर्थराज प्रयाग की विशिष्ट शृंगार-परंपरा को भी विस्तार से समझाती है, जो वर्तमान शोध के सांस्कृतिक संदर्भ को मजबूत करती है। मोहनराम यादव की पुस्तक “रामलीला की उत्पत्ति तथा विकास” (2016) भारत के विभिन्न भागों में रामलीला की परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसमें प्रयाग क्षेत्र के रामदल का विशेष उल्लेख किया गया है, जिसमें इसकी संगठनात्मक संरचना, धार्मिक महत्त्व तथा सामुदायिक स्वरूप का वर्णन किया गया है। सामुदायिक सहभागिता के सामाजिक-मानसिक प्रभावों को समझने में अंतरराष्ट्रीय शोध महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। Sammyh
S. Khan एवं
सहयोगियों के 2016
के
दीर्घकालिक अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि सामूहिक उत्सव और आयोजन समुदायों पर गहरे सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभाव डालते हैं। उनका अध्ययन यह दर्शाता है कि सामूहिक धार्मिक-सांस्कृतिक भागीदारी व्यक्ति की सामाजिक पहचान, समूह-भावना और समुदाय से जुड़े रहने की प्रवृत्ति को सुदृढ़ करती है। यह निष्कर्ष प्रयागराज की रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी परंपराओं में युवाओं की सहभागिता के विश्लेषण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इन आयोजनों में सामूहिक भागीदारी सामाजिक एकजुटता एवं सांस्कृतिक निरंतरता को मजबूत करती है। दुबे एस.के. द्वारा रचित “कुंभ सिटी प्रयाग” (2018) में प्रयाग की प्राचीन महिमा, कुंभ के ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक आधार और नगर के विविध पर्वो-विशेषकर दशहरा एवं रामदल- की परंपरा पर प्रकाश डाला गया है। यह पुस्तक सामुदायिक सहभागिता और धार्मिक आयोजनों के सामाजिक विस्तार को समझने में महत्त्वपूर्ण है। अनुपम परिहार की पुस्तक “प्रयागराज की धार्मिक-आध्यात्मिक विरासत” (2023) में प्रयागराज की पौराणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत का अत्यंत रोचक विश्लेषण किया गया है। यह पुस्तक विशेष रूप से नगर की आध्यात्मिक पहचान को स्पष्ट करती है, जिसके आधार पर युवा वर्ग के पारंपरिक आयोजनों से संबंधों को समझा जा सकता है।
2.2शोध अंतराल
साहित्यिक समीक्षा से स्पष्ट हुआ कि रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी पर हुए अधिकांश शोध धार्मिक आस्था, प्रदर्शन शैली और सामाजिक प्रभाव तक सीमित रहे हैं। युवा सहभागिता, आधुनिकता के प्रभाव और सामुदायिक भागीदारी के बदलते स्वरूप पर कम अध्ययन हुए हैं, विशेष रूप से प्रयाग क्षेत्र में। पूर्व शोध अधिकतर परिणाम-केंद्रित रहे, जबकि आयोजन प्रक्रिया, पारंपरिक भूमिकाओं और धार्मिक व्यवहार पर कम ध्यान दिया गया। इसी शोध-रिक्तता को भरते हुए वर्तमान अध्ययन युवाओं की सहभागिता, अनुभव और परंपरा से उनके संबंध को गहराई से समझने का प्रयास करता है।
3.अनुसंधान पद्धति
यह अध्ययन प्रयागराज के पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों- रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी में युवाओं की सहभागिता, दृष्टिकोण और सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिकाओं का विश्लेषण करने हेतु तैयार किया गया है। अनुसंधान में वर्णनात्मक शोध रूपरेखा (Descriptive
Research Design) अपनाई
गई
है,
जो
प्रतिभागियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सांस्कृतिक सहभागिता और अनुभवों को तथ्यात्मक एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने में सहायक है। इस अध्ययन मिश्रित पद्धति (Mixed
Method Approach) पर
आधारित
है,
जिसमें
परिमाणात्मक (Quantitative)
और
गुणात्मक
(Qualitative) दोनों प्रकार के डेटा का संग्रह एवं विश्लेषण शामिल है। अध्ययन में दो समूहों को शामिल किया गया। Group-A (कामगार समूह) में पारंपरिक आयोजनों से जुड़े कलाकार, कारीगर और समिति सदस्य शामिल थे, जिनमें से 42
प्रतिभागियों का चयन उद्देश्यपूर्ण नमूना (Purposive
Sampling) द्वारा
किया
गया।
Group-B (आगंतुक समूह) में रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी में सहभागी या दर्शक के रूप में उपस्थित 189
युवाओं का चयन सरल यादृच्छिक नमूना (Simple
Random Sampling) से
किया
गया।
अध्ययन के लिए डेटा संग्रह हेतु संरचित प्रश्नावली (Structured Questionnaire)एवं साक्षात्कार अनुसूची (Interview Schedule)का प्रयोग किया गया। अध्ययन की विविध प्रकृति को ध्यान में रखते हुए दो स्वतंत्र, परंतु समान संरचना वाले उपकरण विकसित किए गए, जिनमें कामगारों हेतु प्रश्नावली में प्रतिभागियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, कार्य-संतोष, पारंपरिक जुड़ाव और तकनीकी प्रभाव से संबंधित प्रश्न सम्मिलित थे, जबकि आगंतुकों हेतु प्रश्नावली में धार्मिक आस्था, परंपरा के प्रति दृष्टिकोण, सांस्कृतिक सहभागिता और सामुदायिक सौहार्द से जुड़े प्रश्न शामिल किए गए।
3.1 शोध कार्य-प्रणाली
इस अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य तीर्थराज प्रयाग में आयोजित पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों- रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी- में युवाओं की सहभागिता के स्वरूप, उनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिकाओं, और उनके दृष्टिकोण को गहराई से समझना है। शोध के माध्यम से यह विश्लेषण किया गया है कि युवाओं की धार्मिक आस्था, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं सामुदायिक भावना इन पारंपरिक आयोजनों से किस प्रकार प्रभावित होती है। साथ ही, अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि तकनीकी विकास और आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव ने युवाओं की भागीदारी के स्वरूप, रुचि तथा जुड़ाव में क्या परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। इसके अतिरिक्त, यह शोध इस बात पर भी केंद्रित है कि सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण, सामुदायिक सौहार्द की स्थापना और सामाजिक एकता के संवर्धन में युवा वर्ग किस प्रकार एक सशक्त माध्यम के रूप में उभर रहा है। नमूना चयन में यह सुनिश्चित किया गया कि सभी प्रतिभागी आयोजनों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हों या सक्रिय रूप से भाग ले रहे हों, जिससे निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय और प्रतिनिधिक बन सकें।
4. डेटा विश्लेषण
अध्ययन में एकत्रित डेटा का विश्लेषण दो स्तरों पर किया गया- परिमाणात्मक और गुणात्मक। प्रश्नावली से प्राप्त परिमाणात्मक आँकड़ों का विश्लेषण आवृत्ति, प्रतिशत तथा संयुक्त औसत स्कोर (Weighted
Mean Score) की
सहायता
से
किया
गया,
जिसके
माध्यम
से
प्रतिभागियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, कार्य-संतोष, पारंपरिक जुड़ाव तथा तकनीकी प्रभाव से संबंधित प्रवृत्तियों का सांख्यिकीय आकलन किया गया। दूसरी ओर, साक्षात्कारों से प्राप्त गुणात्मक सूचनाओं का विश्लेषण थीमैटिक कोडिंग (Thematic
Coding)पद्धति
के
माध्यम
से
किया
गया,
जिसमें
उत्तरदाताओं के अनुभवों, विचारों और कथनों में समानताओं को पहचानकर पाँच प्रमुख विषय-वस्तुएँ (Themes)
विकसित
की
गईं।
इन
थीम्स
के
विश्लेषण
से
अध्ययन
ने
पारंपरिक
आयोजनों
से
जुड़े
व्यक्तियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक दृष्टिकोणों को गहराई से समझने का प्रयास किया।
4.1परिमाणात्मक विश्लेषण (आगंतुक)
तालिका 4.1:
युवा आगंतुकों की सामाजिक-आर्थिक प्रोफ़ाइल का प्रतिशत आधारित संयुक्त औसत स्कोर विश्लेषण
|
क्रमांक |
आयाम |
प्रमुख संकेतक (%) |
औसत स्कोर |
व्याख्या |
|
1. |
आयोजन में सहभागिता |
रामदल (38.6%), रामलीला (37.6%), शृंगार चौकी (23.8%) |
3.67 |
उच्च धार्मिक सहभागिता-प्रतिभागियों का विविध वितरण |
|
2. |
धर्म |
हिन्दू (100%) |
5.00 |
पूर्ण धार्मिक समानता |
|
3. |
आयु संरचना |
18–25 (31.2%), 26–35 (44.4%) |
4.00 |
युवा वर्ग की प्रमुख भागीदारी |
|
4. |
रोज़गार का प्रकार |
स्वरोज़गार (47.6%), नौकरी पेशा (36.0%) |
3.90 |
स्वरोज़गार व सेवा क्षेत्र की प्रधानता |
|
कुल औसत स्कोर4.14 मध्यम से उच्च समाज -आर्थिक स्थिरता एवं सहभागिता |
||||
(नोट:- औसत स्कोर 1 से 5 के पैमाने पर आधारित है, जहाँ 1 = बहुत निम्न प्रभाव और 5 = अत्यधिक प्रभाव को दर्शाता है।)
व्याख्या:- तालिका 4.1
से
यह
स्पष्ट
होता
है
कि
धार्मिक
आयोजनों
में
सहभागिता
मुख्यतः
युवा,
शिक्षित
और
मध्यम
आय
वर्ग
के
लोगों
की
है,
जिनमें
हिन्दू
समुदाय
का
पूर्ण
वर्चस्व
है।
सामाजिक
संरचना
में
सामान्य
जाति
का
प्रभुत्व
है,
परंतु
ओबीसी
और
एससी
वर्गों
की
सहभागिता
भी
संतुलित
रूप
में
उपस्थित
है।
अधिकांश
प्रतिभागी स्वरोजगार या सेवा क्षेत्र से जुड़े हैं और सांस्कृतिक व धार्मिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हैं। आयोजन में सहभागिता और औसत स्कोर यह दर्शाते हैं कि यह समुदाय सामाजिक रूप से जागरूक और आर्थिक रूप से स्थिर है।
तालिका 4.2:-
युवा आगंतुकों की धार्मिक आस्था एवं धार्मिक आयोजनों में सहभागिता का प्रतिशत आधारित संयुक्त औसत स्कोर विश्लेषण
|
क्रमांक |
प्रभाव का आयाम |
हाँ (%) |
नहीं (%) |
औसत स्कोर |
व्याख्या |
|
1. |
क्या आप नियमित रूप से धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं? |
76.2 |
23.8 |
3.81 |
उच्च सहभागिता |
|
2. |
क्या आपके परिवार में धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन होता है? |
100.0 |
00 |
5.00 |
पूर्ण आस्था |
|
3. |
क्या धार्मिक आयोजनों से आपकी धार्मिक आस्था बढ़ती है? |
94.2 |
5.8 |
4.71 |
अत्यधिक प्रभाव |
|
4. |
क्या आपके समुदाय के लोग नियमित रूप से धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं? |
86.8 |
13.2 |
4.34 |
उच्च सहभागिता |
|
कुल औसत स्कोर 4.47 उच्च से अत्यधिक प्रभाव |
|||||
(नोट:- औसत स्कोर 1 से 5 के पैमाने पर आधारित है, जहाँ 1 = बहुत निम्न प्रभाव और 5 = अत्यधिक प्रभाव को दर्शाता है।)
व्याख्या:- संयुक्त औसत स्कोर 4.47
यह
दर्शाता
है
कि
उत्तरदाताओं में धार्मिक आस्था एवं धार्मिक आयोजनों में भागीदारी का स्तर अत्यधिक उच्च है। अधिकांश आगंतुक नियमित रूप से धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं, उनके परिवारों में धार्मिक परंपराओं का पालन होता है, और वे मानते हैं कि ऐसे आयोजन उनकी आस्था, आध्यात्मिकता एवं सामुदायिक एकता को सशक्त करते हैं।
तालिका 4.3:- युवा आगंतुकों की सामुदायिक भागीदारी एवं सामाजिक सौहार्द से संबंधित मतों का प्रतिशत आधारित संयुक्त औसत स्कोर विश्लेषण
|
क्रमांक |
प्रभाव का आयाम |
हाँ (%) |
नही (%) |
औसत स्कोर |
व्याख्या |
|
1. |
क्या आप धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं? |
93.7 |
6.3 |
4.69 |
अत्यधिक सहभागिता |
|
2. |
क्या आपके परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं? |
83.6 |
16.4 |
4.17 |
उच्च सहभागिता |
|
3. |
क्या मोहल्ले गाँव के लोग मिलकर सामाजिक कार्य करते हैं? |
85.7 |
14.3 |
4.28 |
उच्च सहभागिता |
|
4. |
क्या धार्मिक आयोजन से सभी लोग मिलकर खुशी मनाते हैं? |
100 |
00 |
5.00 |
पूर्ण प्रभाव |
|
5. |
क्या ऐसे आयोजनों से आपसी सम्मान और प्रेम बढ़ता है? |
92.6 |
7.4 |
4.63 |
अत्यधिक प्रभाव |
|
6. |
क्या इन आयोजनों से समाज में झगड़े कम होते हैं? |
83.6 |
16.4 |
4.17 |
उच्च प्रभाव |
|
7. |
क्या इन आयोजनों से समाज सेवा की प्रेरणा मिलतीहै? |
91.0 |
9.0 |
4.55 |
अत्यधिक प्रभाव |
|
कुल औसत स्कोर 4.50 उच्च सेअत्यधिक प्रभाव |
|||||
(नोट:- औसत स्कोर 1 से 5 के पैमाने पर आधारित है, जहाँ 1 = बहुत निम्न प्रभाव और 5 = अत्यधिक प्रभाव को दर्शाता है।)
व्याख्या:- संयुक्त औसत स्कोर 4.50
यह
स्पष्ट
रूप
से
दर्शाता
है
कि
धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन; जैसे- रामलीला, शृंगार चौकी और रामदल सामुदायिक भागीदारी, सामाजिक सौहार्द और एकता को अत्यधिक रूप से सुदृढ़ करते हैं। अधिकांश उत्तरदाताओं ने माना कि ऐसे आयोजनों से समाज में मेल-मिलाप, पारस्परिक सम्मान, सहयोग और सामाजिक सद्भाव बढ़ता है, परिवार और समुदाय दोनों स्तरों पर सहभागिता में वृद्धि होती है, तथा लोग सामूहिक जिम्मेदारी और समाज सेवा की भावना से प्रेरित होते हैं। यह परिणाम दर्शाता है कि पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन आज भी भारतीय समाज में सामाजिक एकता और पारस्परिक सद्भाव के प्रमुख संवाहक (drivers)
हैं।
तालिका 4.4:-
युवा आगंतुकों के संदर्भ में शहरीकरण, आधुनिकीकरण एवं तकनीकी प्रभाव से धार्मिक आयोजनों में आए परिवर्तनों का प्रतिशत आधारित संयुक्त औसत स्कोर विश्लेषण
|
क्रमांक |
प्रभाव का आयाम |
हाँ (%) |
नही (%) |
औसत स्कोर |
व्याख्या |
|
1. |
शहरीकरण के कारण आयोजनों में बदलाव |
74.6 |
25.4 |
3.73 |
उच्च प्रभाव |
|
2. |
शहरीकरण के कारण सहभागिता में कमी |
39.2 |
60.8 |
2.45 |
मध्यम प्रभाव |
|
3. |
आधुनिकीकरण से रुचि में कमी |
28.6 |
71.4 |
2.14 |
निम्न प्रभाव |
|
4. |
आधुनिक जीवनशैली से भागीदारी में कमी |
61.4 |
38.6 |
3.07 |
मध्यम प्रभाव |
|
5. |
तकनीक व मोबाइलटीवी से भागीदारी में कमी |
69.8 |
30.2 |
3.49 |
उच्च प्रभाव |
|
6. |
आधुनिक जीवनशैली ने पारंपरिक आयोजनों को प्रभावित किया |
45.0 |
55.0 |
2.75 |
मध्यम प्रभाव |
|
7. |
तकनीक ने देखने का तरीका बदला |
68.3 |
31.7 |
3.42 |
उच्च प्रभाव |
|
8. |
तकनीक ने आयोजनों को और भव्य बनाया |
91.0 |
9.0 |
4.55 |
अत्यधिक प्रभाव |
|
9. |
नई तकनीक (लाइटिंग और साउंड) ने आयोजन को बेहतर बनाया |
100 |
00 |
5.00 |
अत्यधिक प्रभाव |
|
10. |
तकनीक के कारण भागीदारी में कमी (टीवी/मोबाइल के कारण) |
36.5 |
63.5 |
2.32 |
निम्न प्रभाव |
|
कुल औसत स्कोर
3.29 मध्यम से उच्च प्रभाव |
|||||
(नोट:- औसत स्कोर 1 से 5 के पैमाने पर आधारित है, जहाँ 1 = बहुत निम्न प्रभाव और 5 = अत्यधिक प्रभाव को दर्शाता है।)
व्याख्या:- संयुक्त औसत स्कोर 3.29
यह
दर्शाता
है
कि
कुल
मिलाकर
उत्तरदाताओं ने माना कि शहरीकरण, आधुनिकीकरण और तकनीकी प्रगति का धार्मिक आयोजनों पर मध्यम से उच्च स्तर तक प्रभाव पड़ा है। विशेष रूप से तकनीकी पहलू(जैसे लाइव प्रसारण, लाइटिंग, साउंड सिस्टम) को उत्तरदाताओं ने सबसे अधिक प्रभावशाली माना। हालाँकि, आधुनिकीकरण और बदलती जीवनशैली ने सहभागिता को कुछ हद तक कम किया है, लेकिन आयोजनों की भव्यता और पहुँच तकनीक के कारण उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है।
4.2 गुणात्मक विश्लेषण (आंगंतुक)
तालिका 4.5:
आगंतुकों के विचारों का थीम-आधारित गुणात्मक विश्लेषण
|
थीम |
कोड्स |
डेटा अंश |
|
पारंपरिक कला और सांस्कृतिक जुड़ाव |
सांस्कृतिक उत्तरदायित्व, सामुदायिक पहचान, युवाओं की सहभागिता |
|
|
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव |
पेशेवर स्थिरता, सामाजिक सम्मान, आर्थिक सहयोग, संगठनात्मक कौशल |
|
|
आधुनिकता और तकनीकी प्रभाव |
सोशल मीडिया प्रचार, डिजिटल मंचन, तकनीकी सीमाएँ |
|
|
पारंपरिक कला संरक्षण और भविष्य |
सामुदायिक सहयोग, प्रशिक्षण, शिक्षा, प्रशासनिक प्रोत्साहन |
|
|
निष्कर्ष |
पारंपरिक आयोजन समुदाय की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता के महत्त्वपूर्ण प्रतीक हैं। आधुनिकता और तकनीकी परिवर्तन के बावजूद लोगों का भावनात्मक जुड़ाव इनसे मजबूत बना हुआ है। ये आयोजन सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण में भी योगदान देते हैं। तकनीक ने इनके प्रसार को बढ़ाया गया है, लेकिन मौलिक कला, परिधान और मंचन की परंपरा अभी भी संरक्षित है। इन आयोजनों के सतत संरक्षण के लिए सामुदायिक सहभागिता, युवाओं की भूमिका, तकनीकी समन्वय और संस्थागत सहयोग आवश्यक है। |
|
4.6 गुणात्मकविश्लेषण (कामगार)
तालिका 4.6:- युवा कामगारों की सामाजिक-आर्थिक प्रोफ़ाइल का प्रतिशत आधारित संयुक्त औसत स्कोर विश्लेषण
|
क्रमांक |
आयाम |
प्रमुख संकेतक (%) |
औसत स्कोर |
व्याख्या |
|
1. |
आयु संरचना |
चालीस वर्ष से कम (47.6%), 40-60 वर्ष (45.2%) |
3.90 |
मध्यम आयु वर्ग की सक्रिय भागीदारी |
|
2. |
लिंग |
पुरुष (95.2%), महिला (4.8%) |
4.80 |
पुरुष प्रधान कार्य क्षेत्र |
|
3. |
धर्म |
हिन्दू (92.9%), मुस्लिम (7.1%) |
4.70 |
धार्मिक रूप से समरूप समूह |
|
4. |
व्यवसाय |
खुद का कार्य (40.5%), व्यवसाय (23.8%), श्रमिक (16.7%) |
3.90 |
स्व-रोजगार और श्रमिक प्रधान समूह |
|
5. |
समिति संबद्धता |
पथरचट्टी (78.6%), कटरा (16.7%), पजावा (4.8%) |
4.60 |
प्रमुखता से पथरचट्टी समिति से जुड़ाव |
|
6. |
अनुभव अवधि |
6–20 वर्ष (50%), 20 वर्ष से अधिक (28.6%) |
4.10 |
अनुभवी और दीर्घकालीन कार्यकर्ता |
|
7. |
कला सीखने का स्रोत |
परिवार (16.8%), समिति (64.2%), स्वयं (19%) |
4.30 |
पारिवारिक परंपरा एवं अनुभवजन्य ज्ञान |
|
8. |
पीढ़ीगत निरंतरता |
हाँ (57.1%), नहीं (42.9%) |
3.60 |
पारंपरिक कौशल की पीढ़ीगत निरंतरता |
|
9. |
कार्यदल आकार |
1–5 व्यक्ति (42.9%), 10–15 व्यक्ति (35.7%) |
3.80 |
छोटे समूहों में सहयोगी कार्यशैली |
|
10. |
संतुष्टि स्तर |
संतुष्ट (83.3%) |
4.60 |
उच्च कार्य संतुष्टि |
|
कुल औसत स्कोर
4.23
उच्च पेशेवर स्थिरता और पारंपरिक जुड़ाव |
||||
(नोट:- औसत स्कोर 1 से 5 के पैमाने पर आधारित है, जहाँ 1 = बहुत निम्न प्रभाव और 5 = अत्यधिक प्रभाव को दर्शाता है।)
व्याख्या:-
प्रतिशत आधारित संयुक्त औसत स्कोर से यह स्पष्ट होता है कि रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी जैसे पारंपरिक आयोजनों से जुड़े कामगारों में मध्यम से उच्च स्तर की पेशेवर स्थिरता, पारंपरिक जुड़ाव और कार्य संतुष्टि विद्यमान है। वे अपने कार्य को केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक उत्तरदायित्व के रूप में निभाते हैं। आर्थिक सीमाओं के बावजूद उनमें परंपरा, पारिवारिक निरंतरता, अनुभवजन्य ज्ञान और सांस्कृतिक गर्व का मजबूत भाव देखने को मिलता है, जो इन आयोजनों की निरंतरता और सामाजिक एकता का प्रतीक है। औसत स्कोर (4.23)
यह
संकेत
देता
है
कि
अधिकांश
कामगार
मध्यम
आयु
वर्ग
के,
पुरुष
प्रधान,
और
अनुभवी
कारीगर
हैं,
जिनकी
भागीदारी
पारिवारिक परंपरा से प्रेरित है। उनकी कार्यशैली छोटे सहयोगी समूहों में समयबद्ध और दक्षतापूर्ण है, जिससे यह कला अब भी जीवंत बनी हुई है।
4.7 गुणात्मक विश्लेषण (कामगार)
तालिका 4.7:-
बदलते तकनीक युग में साज-सज्जा एवं परिधान व्यवस्था में परिवर्तन और चुनौतियाँ
|
थीम |
कोड्स |
डेटा अंश |
|
तकनीकी नवाचार और साज-सज्जा में परिवर्तन |
पीढ़ीगत कौशल हस्तांतरण युवाओं की तकनीकी भागीदारी अनुभवी–युवा सहयोग |
|
|
परिधान डिज़ाइन और फैशन में आधुनिकता |
युवा सहभागिता, बाल–किशोर कौशल, पारिवारिक परंपरा, सांस्कृतिक उत्तराधिकार |
|
|
मंचन और दृश्य अनुभव में सुधार |
युवा कलाकारों का समर्पण, अनुशासन और प्रतिबद्धता |
|
|
सांस्कृतिक संरक्षण और आधुनिक तकनीक का संतुलन |
संगठनात्मक नेतृत्व, पारिवारिक सहयोग, आधुनिक सामग्री का उपयोग, मंचन में आधुनिक प्रभाव |
|
|
निष्कर्ष |
रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी जैसी सांस्कृतिक परंपराओं में युवाओं की सक्रिय सहभागिता पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के संतुलन को सुनिश्चित करती है। युवा कामगार और कलाकार अनुभवी कारीगरों के साथ मिलकर तकनीकी नवाचार, परिधान डिज़ाइन, और मंचन सुधार में योगदान दे रहे हैं। उनका समर्पण, नियमित अभ्यास और अनुशासन आयोजन की गुणवत्ता और दर्शकीय अनुभव को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। पारिवारिक मार्गदर्शन और सांस्कृतिक उत्तराधिकार के माध्यम से विरासत सुरक्षित रहती है। युवा प्रतिभागी न केवल वर्तमान आयोजनों में योगदान कर रहे हैं, बल्कि भविष्य में इन सांस्कृतिक परंपराओं के संवाहक के रूप में उभर रहे हैं। इस प्रकार, युवा सहभागिता सांस्कृतिक संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और नवाचार में संतुलन बनाने में निर्णायक भूमिका निभाती है। |
|
तालिका 4.9: प्रयाग की विरासत – शृंगार चौकी परंपरा-संरक्षण में युवा सहभागिता
|
थीम |
कोड्स |
डेटा अंश |
|
आधुनिकता और तकनीकी माध्यमों से पुनर्जीवन |
डिजिटल प्रसारण, सोशल मीडिया प्रचार, युवा पीढ़ी की भागीदारी |
|
|
धार्मिकता से मनोरंजन की ओर झुकाव |
धार्मिक उद्देश्य का ह्रास, मनोरंजन प्रधानता, सांस्कृतिक चुनौती |
|
|
संरक्षण, प्रचार और भविष्य की संभावनाएँ |
सांस्कृतिक संवर्धन, सोशल मीडिया की भूमिका, परंपरा का पुनर्जीवन |
|
|
निष्कर्ष |
शृंगार चौकी प्रयाग की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जिसने समय के साथ आधुनिकता के अनुरूप परिवर्तन अपनाए हैं। डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया के माध्यमों से युवाओं ने इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने में मदद की है। उचित संरक्षण और प्रचार के साथ यह परंपरा प्रयाग की सांस्कृतिक धरोहर तथा भारतीय कला और आध्यात्मिकता के महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में वैश्विक स्तर पर पहचान पा सकती है। |
|
तालिका 4.10: शृंगार चौकी विरासत को बनाए रखने के उपायों में युवाओं की सहभागिता
|
थीम |
कोड्स |
डेटा अंश |
|
पारंपरिक कला का संरक्षण और पीढ़ीगत हस्तांतरण |
पारंपरिक प्रशिक्षण, पीढ़ीगत हस्तांतरण, कौशल संवर्धन, कारीगरों की भूमिका |
|
|
युवाओं की भागीदारी और सांस्कृतिक शिक्षा |
युवा रुचि की कमी, सांस्कृतिक शिक्षा, संस्थागत जागरूकता |
|
|
तकनीकी नवाचार और आधुनिक मंचन |
प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि तकनीक, डिजिटल प्रचार, परंपरा और तकनीक का मेल |
|
|
निष्कर्ष |
रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी जैसी परंपराएँ भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर हैं, जिनके संरक्षण हेतु पारंपरिक कला, युवा सहभागिता और तकनीकी नवाचार का संतुलन आवश्यक है। कलाकारों को सम्मान और आर्थिक सहयोग देकर तथा शिक्षा संस्थानों में सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाकर नई पीढ़ी को इससे जोड़ा जा सकता है। डिजिटल माध्यमों से इन आयोजनों की पहुँच वैश्विक स्तर तक बढ़ाई जा सकती है। परंपरा, तकनीक और समाज के संतुलित समन्वय से यह विरासत भविष्य में भी प्रेरणा देती रहेगी। |
|
5. निष्कर्ष : प्रस्तुत अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि तीर्थराज प्रयाग की रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी जैसी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ केवल आस्था का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और पीढ़ीगत निरंतरता की प्रतीक हैं। शहरीकरण, आधुनिकीकरण और तकनीकी युग के बावजूद इन आयोजनों की जीवंतता आज भी बनी हुई है। आगंतुकों के मतों से यह ज्ञात हुआ कि इन आयोजनों के प्रति लोगों की श्रद्धा, सांस्कृतिक जुड़ाव और सामुदायिक सहयोग की भावना सशक्त बनी हुई है। यद्यपि तकनीकी साधनों और ऑनलाइन माध्यमों ने प्रत्यक्ष सहभागिता को कुछ हद तक सीमित किया है, फिर भी इन आयोजनों को देखने और अनुभव करने की रुचि में कमी नहीं आई है। यह परंपराएँ अब केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह गईं, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में समाज को जोड़ने का कार्य कर रही हैं। कामगारों के विश्लेषण से यह सामने आया कि वे केवल पारंपरिक शिल्पी या कलाकार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के संवाहक हैं। इनकी कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है, जिसमें पारिवारिक सहयोग, अनुभवजन्य ज्ञान और सामुदायिक संगठन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। तकनीकी युग में जहाँ LED,
डिजिटल
प्रोजेक्शन और आधुनिक उपकरणों का प्रयोग मंचन की गुणवत्ता बढ़ा रहा है, वहीं पारंपरिक कला की आत्मा अब भी सुरक्षित है। युवा सहभागिता इस अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण आयाम है। पाया गया कि नई पीढ़ी पारंपरिक आयोजनों से प्रेरित होकर न केवल दर्शक के रूप में जुड़ रही है, बल्कि आयोजन, तकनीकी संचालन, और प्रचार-प्रसार में भी सक्रिय योगदान दे रही है। इससे इन परंपराओं को नवीन रूप, आधुनिक अभिव्यक्ति और व्यापक पहुँच प्राप्त हुई है। युवाओं की भागीदारी ने इन आयोजनों को आधुनिक समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया है। समग्र रूप से कहा जा सकता है कि तीर्थराज प्रयाग की रामलीला, रामदल और शृंगार चौकी जैसी परंपराएँ आज भी परंपरा, आस्था और सामुदायिक भागीदारी के त्रिवेणी संगम का सशक्त उदाहरण हैं। ये आयोजन भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक एकता और सहयोग की भावना को जीवित रखे हुए हैं। यदि इन परंपराओं को संस्थागत संरक्षण, आर्थिक सहयोग और युवाओं की सृजनात्मक भागीदारी से जोड़ा जाए, तो ये न केवल स्थानीय बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी प्रतिष्ठित हो सकती हैं।
6. सुझाव एवं अध्ययन की सीमाएँ
अध्ययन
के
आधार
पर
यह
सुझाव
दिया
जा
सकता
है
कि
पारंपरिक
सांस्कृतिक आयोजनों को संस्थागत समर्थन मिले, ताकि युवाओं में सांस्कृतिक चेतना विकसित हो सके। विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में कार्यशालाएँ, प्रशिक्षण कार्यक्रम और पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाएँ, जिससे युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ें। आधुनिक तकनीक; जैसे- डिजिटल आर्काइव, सोशल मीडिया डॉक्यूमेंटेशन और ऑनलाइन प्रसारण का उपयोग इस प्रकार किया जाए कि पारंपरिक स्वरूप की प्रामाणिकता बनी रहे। साथ ही, आयोजनों से जुड़े कलाकारों और कामगारों को आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और मान्यता उपलब्ध कराई जाए। सामुदायिक भागीदारी और युवाओं की सक्रिय भूमिका को बढ़ावा देने के लिए स्वैच्छिक संगठनों को प्रोत्साहित किया जाए। राज्य और नगर प्रशासन की सांस्कृतिक नीतियों में प्रयागराज की इन परंपराओं को विशेष स्थान देकर इनके दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सकता है।
इस
अध्ययन
की
कुछ
सीमाएँ
हैं
जिन्हें
स्वीकार
करना
आवश्यक
है।
यह
शोध
केवल
प्रयागराज (तीर्थराज प्रयाग) क्षेत्र तक सीमित रहा है, इसलिए इसके निष्कर्षों को अन्य क्षेत्रों या नगरों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, सामाजिक संरचना और धार्मिक परंपराएँ भिन्न होती हैं। सर्वेक्षण में शामिल प्रतिभागियों की संख्या सीमित रही (कामगार n
= 42 तथा
युवा
और
आगंतुक
n = 189), जिससे निष्कर्षों की सामान्यता कुछ हद तक प्रभावित हो सकती है। अधिकांश आँकड़े प्रश्नावली और साक्षात्कार पर आधारित होने के कारण स्व-प्रतिवेदन (self-reporting)
की
संभावना
बनी
रही,
जिससे
कुछ
उत्तर
व्यक्तिगत धारणा, सामाजिक स्वीकार्यता या स्मरणीय त्रुटियों से प्रभावित हो सकते हैं। विषय की धार्मिक संवेदनशीलता के कारण कुछ प्रतिभागियों ने आलोचनात्मक विचार साझा करने से परहेज़ किया, जिससे कुछ विश्लेषणात्मक पहलू एकतरफा प्रतीत हो सकते हैं।
आभार ज्ञापन
प्रस्तुत
लेख
हेतु
लेखक
भारतीय
सामाजिक
विज्ञान
अनुसंधान
परिषद,
नई
दिल्ली
के
प्रति
विशेष
आभारी
है।
जिनके
द्वारा
प्रायोजित शोध-परियोजना “तीर्थराज प्रयाग की अमूल्य विरासत : दशहरा कुंभ एवं मुँज शिल्प के संदर्भ में”, द्वारा अभिलेखीकरण एवं सर्वेक्षण के कार्य सम्पन्न हुए।
संदर्भ
1.
सिंह,
योगेन्द्र प्रताप. (2011).
प्रयाग की रामलीला. लोकभारती प्रकाशन।
2.
इलाहाबाद.
(2009).वेयर द रिवर्स मीट (नीलम सारन गौड़). मार्ग पब्लिकेशन।
3.
प्रयागराज. (2019).दैट वास इलाहाबाद: रेट्रोस्पेक्ट एंड प्रॉस्पेक्ट. इलाहाबाद संग्रहालय।
4.
अवस्थी,
इन्दुजा.
(2000).रामलीला परम्परा और शैलियाँ. राधा कृष्ण प्रकाशन।
5.
यादव,
मोहन
राम.
(2017).रामलीला की उत्पथि तथा विकास: विशेषता-मानस की रामलीला. लोकभारती प्रकाशन।
6.
प्रकाश,
श्री.
(2014). तीर्थों में तीर्थराज प्रयाग. लोकभारती प्रकाशन।
7.
टण्डन,
हरी
मोहनदास.
(2003). इलाहाबाद का दशहरा उत्सव. साहित्य भवन प्रकाशन।
8.
टण्डन,
हरी
मोहनदास.
(n.d.). प्रयागराज. साहित्य भवन प्रयागराज।
9.
परिहार,
अनुपम.
(2023). प्रयागराज की धार्मिक–आध्यात्मिक विरासत.प्रयागराज।
10.
दास
टण्डन,
हरिमोहन.
(n.d.). प्रयागराज. लोकभारती प्रकाशन।
11.
यादव,
मोहनराम.
(2016). रामलीला की उत्पत्ति तथा विकास (पहला संस्करण). लोकभारती प्रकाशन।
12.
Srivastava,
S. (1937). Prayag Pradeep. Hindustani Academy.
13.
Dubey,
S. K. (2020, September). Kumbh City Prayag. Centre for Cultural Resources
and Training (CCRT). https://ccrtindia.gov.in/wp-content/uploads.
14.
Khan,
S. S., Hopkins, N., Reicher, S. D., Tewari, S., Srinivasan, N., &
Stevenson, C. (2016).How collective participation impacts social identity: A
longitudinal study from India. Political Psychology, 37(3), 309–325. https://doi.org/10.1111/pops.12248
रितू जायसवाल
प्रोफेसर,प्राचीन इतिहास विभाग, एस.एस. खन्ना गर्ल्स डिग्री कॉलेज, प्रयागराज
निशि सेठ
सहायक प्रोफेसर,प्राचीन इतिहास विभाग, एस.एस. खन्ना गर्ल्स डिग्री कॉलेज, प्रयागराज

एक टिप्पणी भेजें