मेवाड़ का आंजणा मठ (शैव नाथपंथ) : पर्यटकीय महत्त्व
- हेमेन्द्र सिंह सारंगदेवोत एवं भेरू लाल सुथार
शोध सार : मेवाड़ के इतिहास में ‘शैव नाथ परंपरा’ का अमूल्य स्थान रहा हैं जो कि 7वीं-8वीं शताब्दी ई. से बप्पा रावल के कालखंड से वर्तमान तक प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण बनी हुई हैं। इसी सन्दर्भ में मेवाड़ में देवगढ़-मदारिया क्षेत्र में स्थित आंजणा मठ भी उल्लेखनीय हैं; जहाँ के स्थापत्य कार्य और अप्रकाशित शिलालेख महत्वपूर्ण हैं। मेवाड़ के गुहिलोत महाराणाओं के ही वंशज देवगढ़ ठिकाने के चुण्डावत सिसोदिया सामंत भी इस मठ के प्रति अपने उद्भव काल से ही श्रद्धा रखते आये हैं एवं वर्तमान में भी इस क्षेत्र के निवासी इस परंपरा के प्रति पूर्ववत् नतमस्तक हैं। यह स्थल प्राकृतिक अर्थात् भौगोलिक व धार्मिक पर्यटन सहित ग्रामीण पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बिंदु भी हैं। जनश्रुतियों, साक्षात्कारों सहित यहाँ उपलब्ध अप्रकाशित शिलालेख मेरे प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित इस शोध आलेख को समृद्ध करते हैं।
बीज शब्द : मेवाड़, शैव, नाथ, आयस, मठ, आंजणा, देवगढ़, सांगावत, चुण्डावत, भौगोलिक पर्यटन, धार्मिक पर्यटन, ग्रामीण पर्यटन।
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| (आंजना मंदिर की सीढ़ियाँ गज प्रतिमा व सभा मण्डप) |
मूल आलेख : मेवाड़ का इतिहास गौरवमय रहा जिसमें यहाँ की भौगोलिक स्थिति की विशिष्टता का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। मेवाड़ के ‘मठ-मंदिर’ इतिहास एवं अरावली पहाड़ियों सहित प्राकृतिक सौन्दर्यता से भी संबंधित रहे हैं जो कि उनको वर्तमान संदर्भ में भौगोलिक, धार्मिक, प्राकृतिक एवं ग्रामीण पर्यटन के संदर्भ में और अत्यधिक प्रासंगिक बनाते हैं।
मेवाड़ में पाशुपत-अभिलेख को ‘नाथ-प्रशस्ति’ के रूप में रेखांकित किया गया है। दसवीं सदी से यहाँ नाथ-प्रभाव दिखाई देता है। मेवाड़ के आराध्य एकलिंगजी को ‘एकलिंगनाथ’ ही कहा जाता है। यहाँ के शासकों के विरुद्ध 1303 ई. तक रावल और महारावल ही रहा जो राजकुलस का लौकिक रूप माना गया है। मेवाड़ के स्थल पुराण के रूप में ख्यात ‘एकलिंगपुराण’ में महाराणा रायमल के शासन काल (1472-1507 ई.) के दौरान 1485 ई. के आस-पास एकलिंगजी की शुद्राचार-विधि से पूजा का प्रमाण मिलता है। मेवाड़ के शासकों द्वारा आसनधारी नाथ योगियों को पुण्यार्थ भूमि प्रदान करने के संदर्भ 16वीं सदी तक मिलते हैं। महाराणा प्रताप के शासनकाल में आयस या नाथों का बड़ा प्रभाव था।[1]
गुहिलोत सिसोदिया मेवाड़ महाराणा लाखा (1382-1397 ई.) के ज्येष्ठ पुत्र चुंडा के वंशजों में से सांगा को देवगढ़ ठिकाने की जागीरी प्राप्त हुई। देवगढ़ ठिकाने सहित यहाँ मदारिया के नाथ मठों में प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण एवं मेवाड़-मारवाड़ व मेरवाड़ा के संगम पर स्थित इस क्षेत्र में कई स्थापत्य कार्य निर्मित कराये। ‘राजपुताना गजेटियर्स, दी मेवाड़ रेजीडेंसी’ में देवगढ़ ठिकाने के सन्दर्भ में परकोटे से युक्त देवगढ़ कस्बे, परकोटे युक्त गढ़, रियासत कालीन ठिकाने देवगढ़ ठिकाने के धर्मगुरु अर्थात् आंजणा मठ के शैव मठाधिशों के मठ (गढ़ व मन्दिर) उल्लेख प्राप्त होता है।
“Deogarh - An Estate in north–west of Mewar, Consisting of one town And 181 villages held by one of the first class nobles who has the title of rawat and belong to the Chondawat sept of the Sisodias Rajput........... The family claims descent from Sanga, the second son of Singha who was a Grand son of Chonda. After Sanga came Dudaji : ... "The principal place in the estate of the same name (Deogarh town) situated in 25o32' N And 73o,55' E About 68 miles north by north east of Udaipur city, population (1901) 5, 384.......... The town is walled and contains a fine palace with the fort.... Three miles to the east in the village of Anjana is a monastery of the Natha sect of devotees who Are the gurus of Rawat of Deogarh, a religious fair is held here annually.”[2]
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| (आंजना महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार) |
विद्वान प्रकाशनाथ जी चौहान लिखते हैं कि “देवगढ़ के पास आंजणा ग्राम में स्थित नाथ मठ के महन्त जी को इस क्षेत्र में 'रावल जी' कहकर संबोधित करते हैं। इस मठ के अधीन महल एवं काफी जागीरी है तथा मेवाड़ में रावल नाथों के बीस मठ भी इसके अन्तर्गत आते हैं। लादूवास के महन्त जी की उदयपुर में तलवार पूजा की व्यवस्था व देखरेख का सारा दायित्व आँजणा नाथ मठ के रावल जी का होता है। इस मठ के क्षेत्र में नाथ जी का मन्दिर, पर्वतीय गुफाये एवं मेवाड़ की किसी राजकुमारी द्वारा निर्मित जलकुण्ड हैं। इस मठ में वर्तमान महन्त श्री नारायण रावल है। श्रीनाथ तीर्थांवली ग्रन्थ में इस मठ का वर्णन इस प्रकार मिलता है, “लादूवास के निकट आँजन नामक महा आसन है। वहाँ महादेव जी का पारमेश्वर लिंग प्रतिष्ठित हैं। नाथों के छह आसन और गोरखनाथ जी की पादुका है। इसके पास ही चोली नाम का शुभ आसन है। वहाँ साक्षात गहेला रावल जी अपने वाहन के साथ विराजित है। नाथ जी की परा चरण पादुका भी है, सामने बनासा नाम की नदी बहती है।”[3]
इस प्रकार राजपुताना गजेटियर में उल्लेख मिलता है कि आंजना के नाथ मठ के आयस या मठाधीश को देवगढ़ सामंत अपना गुरु मानते थे और उनके प्रति देवगढ़ ठिकानेदारों की असीम श्रद्धा रही है। आंजना में वार्षिक धार्मिक मेला भी इसी श्रद्धा के संदर्भ में आयोजित होता रहा है। स्पष्ट है कि मेवाड़ महाराणा के समान देवगढ़ के रावत भी नाथ सम्प्रदाय में श्रद्धा रखते थे।
इन आसनों को दी गई डोहलियों/डोलियों के साथ कतिपय शर्ते भी रही थी, यथा आयस अपने आसन पर हमेशा उपस्थित रहेंगे और किसी भी अनुपस्थिति के लिए स्थानीय अधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती। शिष्य या उत्तराधिकारी बनाते समय दरबार से अनुमति अनिवार्य लेनी होगी। आयस के निधन हो जाने पर उत्तराधिकारी की नियुक्ति दरबार की ओर से किया जाता था। आसनों से संबंधित मामलों की सुनवाई दरबार में होती थी। आयसों को राज्य द्वारा महंताई देकर जमात में भिक्षा वसूल करने का अधिकार (परवाना) दिया जाता था। लादूवास के एक महंत द्वारा जीर्ण हुए ऐसे परवाने के नवीनीकरण के प्रार्थनापत्र से इस नियम की पुष्टि होती है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि तब नाथों को ‘षट्दर्शन’ के अन्तर्गत माना गया था। महाराणा जवानसिंह के शासनकाल में अनेक आसनों की भूमि और आयसों की जाँच की गई थी। मेवाड़ में नवरात्र पर खड्ग स्थापना नाथ योगी द्वारा की जाती थी।[4]
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| (गुम्बद, आमलक व कमल पुष्प, प्राकृतिक गुफा) |
लादूवास, आंजणियां-देवगढ़, गोरख्या, गोरमघाट, महाराज की खेड़ी, सवीना आदि के आसनों की विशेष मान्यता रही है। लादूवास नाथजी का बड़ा आसन माना जाता है । इसके अधीन चालीस नाथ मठ मन्दिर है। मेवाड़ राजवंश में नाथ जी की दी हुई तलवार सुरक्षित है। प्रतिवर्ष नवरात्र में लादूवास के महंत निर्देशानुसार ही कोई अधीनस्थ मठ का एक नाथ योगी निराहार रहकर शक्ति साधना करता है। आंजणिया में कतिपय सुरह और सतम्भ- अभिलेख 17वीं सदी से लेकर 19वीं सदी तक के हैं। यहा नाथ मठ के योगी को रावलजी कहा जाता है। इसके अधीन महल और पर्याप्त जागीरी है। इसी प्रकार नाथ जी का मंदिर, पर्वतीय गुफा और उनमें भैरवादि की मुर्तियाँ लगी हुई है। इसकी रमणीयता कलात्मक कुण्ड के कारण भी लगती है। मानसिंह कृत ‘श्रीनाथतीर्थावली’ नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि लादूवास के निकट आंजना नामक महा आसन है । वहाँ महादेव का पारमेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है। नाथों के 6 आसन और गोरखनाथ की पादुकाएँ विराजित है। नाथ जी की पराचरण पादुकाएँ भी है।[5]
‘‘देवगढ़ के समीप स्थित आंजना महादेव नामक धार्मिक स्थल पर विशाल काली चट्टानों के बीच गुफाएं हैं जो नाथ संप्रदाय के साधुओं की प्राचीन साधना स्थलियां थीं। यहाँ एक जलकुंड भी है। आंजना में कई छतरियां तथा भगवान शंकर व गणेश की पूजा स्थलियां है।‘‘[6]
गोरमघाट मारवाड़-मेवाड़ रेलमार्ग पर अरावली पर्वतमाला में बहुमत सुन्दर प्राकृतिक स्थान है। इसको ‘गोरम पहाड़’ भी कहा जाता है। नाथ मत के सिद्ध गोरमनाथ पर इसका नामकरण हुआ है। गोरखनाथ की शिष्य परंपरा के आयस सुन्दरजी ने यहाँ नाथजी के मंदिर का निर्माण करवाया जिसकी प्रतिष्ठा आषाढ शुक्ल नवमी, संवत् 1851 को हुई। इसके निर्माण में तत्कालीन महाराणा भीमसिंह और देवगढ़ के सामंत गोकुलदास ने सहयोग किया था। राजा मानसिंह प्रणीत श्रीनाथतीर्थावली में इस स्थान के लिए निम्न काव्य-पंक्तियाँ आई है-मारूहर मेवाड़ बीचे, अनड़ पहाड़ आड़ो।
गोरम री गाजा सुनी, जिऊहार गियौ हाड़ौ।।
गगन हिण्डोला घासिया,गगन गुफा री पोल।
हिण्डे निरंजन नाथजी सुरत निरत री डोल।।[7]
गगन हिण्डोला घासिया,गगन गुफा री पोल।
हिण्डे निरंजन नाथजी सुरत निरत री डोल।।[7]
इसके पास ही काजलियावास पर नाथ धूंधली धोरमनाथजी की समाधि है जहाँ बने गोमुख से गिरती जलधारा का उपयोग लोग अपने और दूधारू पशुओं के रोग निवारण के लिए करते आए हैं। गोरमनाथ, धोरमनाथ, गंगानाथ, भाऊनाथ आदि नाथ सिद्धों ने यहाँ तप किया। यह मारवाडत्र ही नहीं मेवाड़ के लाखों लोगों की आस्था का केन्द्र है। इस तरह नाथ समुदाय का प्रसार मेवाड़ में गाँव-गाँव में मिल जाता है। जो अपने अलखमती भी कहता हैं। जगह-जगह बगीची, वनी होने से यह समुदाय पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण के लिए चैतन्य रहने की प्रेरणा भी देता है।[8]
आंजना मठ का मंदिर स्थापत्य व शिलालेख
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| (श्रीत्रिशूल पर अंकित शिलालेख) |
त्रिशूल के नीचे पहाड़ी के शीर्ष पर शिलालेख लगा हुआ है जो कि देवगढ रावत राघोदास के शासनकाल का है और जिसमें वि. सं. 1838 की तिथि का उल्लेख प्राप्त होता है।[10] यह शिलालेख स्पष्टरूप से रावत जसवंतसिंह के उत्तराधिकारी रावत राघोदास के शासनकाल को इंगित करता है।
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| (देवगढ रावत राघोदास का शिलालेख) |
‘‘श्री पारेश्वरनाथजी प्राकृतिक गुफा में विराजमान हैं और इसका फैलाव 38 अडतीस बीघा है श्री स्थापना स्वयं भूलिंग है जो छोटे सब रुप में हैं पास ही बड़ा लिंग एक ही जल में धारण है यह लिंग इस लिंग इस मन्दिर से दो मील की दूरी पर परालीया नामी ग्राम में तालाब के अंदर था। श्री देवगढ़ रावतजी साहब संग्रामसिंहजी को सपने में किसी महापुरूष ने आदेश दिया की इस मंदिर व प्रतिमा लिंग को श्री पारेश्वरजी गुफा में प्रतिष्ठित करे सो उन्होंने यहा स्थानान्तर किया । बड़ी प्रतिमा व मंदिर गुफा के बाहर सभा मण्डप जमीन के अन्दर से गडे़ हुये निकालकर यहाँ पधराए गए हैं। इनके पूर्व मन्दिर के निर्माण या कोई विवरण नही है।.......’’[11]
आंजना मठ के मुख्य पारेश्वर मंदिर के नीचे सीढ़ियों के सम्मुख श्री ओगड़नाथजी की समाधि के पास खम्भेनुमा संगमरमर पर निम्नलिखित शिलालेख अंकित है[12]-
जोगेसर श्री नरबेरावलजी पुजारी
सम्वत 1794 वर्ष महा सुद 5 शनिवार
।।श्रीरामजी।
श्रीपारेसुरजी माहादेवजी, देवल: बावड़ी: दरवाजो: कोट: सभा मंडप: पेवारा कम रावत श्री संग्ररामसींघ जी रे राजलोक लोडी जोधपुरीजी रा कारायो फते कवरजी म. करनसुजान सींघोत री सुजन: केसरी सीघोतरी: महाराजा री पोती: पीसांगन रा धणी री बेटी. रावत संगरामसींघजी रा राजलोक संग्ररमसींघ दुवारका दासोत दुवारकादास गोकुलदासोत गोकुलदास ईसरदासोत मदारे धणी वास देवगढ़ जात सीसोदिया चुण्डावत सांगावत देवल रा मुड़ा आगे कसवसो रावतजी श्री संग्रामसिंहजी रे करायो वेजो 1794…
उपर्युक्त शिलालेख में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि रावत संग्रामसिंह की धर्मपत्नी फतेहकुँवर जोधपुरी जी ने आंजना के पारेश्वर महादेव मंदिर में देवल, बावड़ी, दरवाजा, परकोटा सभामंडप आदि का निर्माण करवाया। इस शिलालेख में देवगढ़ ठिकाने के सामंतों की वंशावली भी प्राप्त होती है।
विक्रम संवत 1774 में आंजणा शैव मठ में (आसण) श्री पारेश्वरनाथ महादेव मन्दिर का निर्माण कराया। विक्रम संवत 1777 में बहुजी फतेहकँवर जोधपुरी ने आसन आंजणा में श्री पारेश्वरनाथ मन्दिर हेतु सभा मण्डप व सीढ़ियाँ निर्मित करवाई।[13]
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| (देवगढ़ ठिकाने की वंशावली) |
आंजना का पवित्र तीर्थस्थल योगियों व संतों की तपस्या
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| (आंजना मंदिर का प्रवेश मण्डप व सभा मण्डप) |
भूमि रही जहाँ पर स्थापत्य के भी अद्भूत आयाम दृष्टिगाचर होते हैं। उपरोक्त रावतजी साहब (रावत संग्रामसिंहजी ) की किवदन्ती है कि “वे पूर्व जन्म में गुर्जर जाति में हीरा के खेड़े संग्राम गुर्जर के नाम से प्रकट हुए व श्री पारेश्वरजी में दुध सेवा करते थे । इसी बात पर उनकी भोजाई से झगड़ा हो जाने से श्रीपोरेश्वर जी गुफा में कमल पूजा में मस्तक उतार कर शरीर त्याग किया। यदिगार (यादगार) चबूतरा पका मन्दिर के बड़े दरवाजे के आगे अन्दर जाते हुये दाहिनी ओर है। रावत जी साहब श्री संग्राम सिंह जी जिन्होंने यह मन्दिर बनवाया। अपने जीवन काल में यह प्रकट करते थे कि मैं पूर्व जन्म में हीरा के खेड़े संग्राम गुजर के नाम से प्रगट हुआ था यहाँ तक कि बलीवेदी पर जाने से पहिले एक स्थान पर जमीन में कुल्हाड़ी चड़सी गाड़ दी थी वो निकाल कर अपने वचन की थी।’’[14] इस प्रकार रावत संग्राम सिंह ने अपने पूर्व जन्म में भी श्री पारेश्वरजी की सेवा की ओर अपना सिर काटकर कमल पूजा के रूप में महादेव को अर्पित कर दिया जिनका चबुतरा मंदिर के बड़े दरवाजे के समीप स्थित है जो कि स्थापत्य का एक अच्छा उदाहरण है।
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| (रावत संग्राम सिंह जी यादगार का चबूतरा) |
‘‘मन्दिर से पूर्व में ब्रह्मशिला के नीचे प्राकृतिक छटा कुण्ड है जिसका वर्णन शिलालेखों में अमृत कुण्ड के नाम से हुआ हैं इसमें स्नान करने से इस समय भी कई भक्तगण रोगमुक्त हुये है इसमें सर्वदा जल रहता है इसमें ऊपर पश्चिम में भी हनुमानजी की प्रतिमा है व गुफा का मार्ग हैं जो कुछ दूर जाकर बन्द हो जाता है श्री मन्दिर में इस स्थान से ये दो ही मार्ग इस गुफा के गुप्त भाग में जाने के है जो बन्द है। गुफा का जो मार्ग(भाग) दृष्टिगोचर होता हैं उसमें कई आशन चट्टान में बने हुये हैं जिन पर एक मनुष्य के सोने बैठने की गुंजाइश है। श्री मदिर दरवाजे के आगे प्राचीन महात्माओं की कई समाधि छतरियां है जो बहुमूल्य है इसमें यही निश्चय होता कि यह स्थान कई सम्पन्न योगेश्वरों की तपोभूमी है जिन्होंने तप करते-करते यहाँ शरीर त्याग किया व भक्तों ने बहुमूल्य समाधियों का निर्माण कराया। श्री गुफा मंदिर के ऊपर दो कुण्ड़ प्राकृतिक चट्टान में ही मंदिर नीरमाता (निर्माता) देवगढ़ रावजी साहब के बनाये हुये है जो जीर्ण हो गये है व बारिश की मौसम समाप्त होने पर इनमें जल नहीं ठहरता है। श्री पारेश्वर जी मंदिर पूजा का प्रबन्ध श्री आयशजी म. आंजणा नाथ योगेश्वर रावल सम्प्रदाय के अधीन है जिनके रहने का स्थान आशन मंदिर से उत्तर में एक पहाड़ी पर है जो दर्शनीय है यह समाधि मन्दिर संगमरमर का बना हुआ बहुमूल्य है।’’ इस आंजना आसण में 16वीं शताब्दी ई. अर्थात् 400 वर्ष से श्री आयसजी महाराज का निवास रहा है, इससे पहले मंदिर-गुफा में रहते थे। इस स्थान पर एक सार्वजनिक देवालय है यहाँ महाशिवरात्रि पर दो दिन का मेला लगता है व हजारों प्रेमी भक्त आते हैं ग्रहण पूर्व इत्यादि समय पर सैकड़ों व्यक्ति जागरण व श्री अमृत कुण्ड में स्नान करते हैं’’[15] यह मेला भी पर्यटन का उल्लेखनीय पहलु है जो स्थानीय निवासियों हेतु रोजगार भी सृजित करता हैं।
इस प्रकार देवगढ़ कस्बे से 4 किमी. दूरी पर स्थित आंजनेश्वर महादेव मंदिर लोगों के लिए किसी हैरत से कम नहीं है। दरअसल मंदिर में करीब 3.5 फीट ऊंचा शिवलिंग है, जो कि देवगढ़-मदारिया के जनमानस का श्रद्धा केन्द्र है। माना जाता है कि यह शिवलिंग हर शिवरात्रि को एक गेहूं के दाने जितना बढ़ता है। लोगों का कहना है कि यह शिवलिंग चट्टानी पत्थर से बना है, लेकिन इसके बढ़ने का रहस्य आज तक समझ नहीं आया है। ऐसे में शिवलिंग का हर शिवरात्रि पर ही बढ़ना किसी चमत्कार से कम नहीं है। लोगों के बीच ऐसी भ्रांतियां भी हैं कि इस शिवलिंग के ऊपरी चट्टान को छूने पर समग्र पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। यह मंदिर दो बड़ी चट्टानों के बीच बना हुआ है। ऊपरी छोर पर संगमरमर का काफी वजनी त्रिशूल स्थापित है। यहाँ लगे शिलालेख के अनुसार इस त्रिशूल की स्थापना संवत 1847 में हुई थी। मंदिर के समीप ही एक ब्रह्मशील कुण्ड है। कुण्ड की विशेषता है कि यहाँ का पानी अब तक के किसी भी अकाल में नहीं सूखा है।[16]
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| (आंजना मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग) |
‘‘देवगढ़ के समीप स्थित आंजना महादेव नामक धार्मिक स्थल पर विशाल काली चट्टानों के बीच गुफाएं हैं जो नाथ संप्रदाय के साधुओं की प्राचीन साधना स्थलियां थीं। यहां एक जलकुंड भी है। आंजना में कई छतरियां तथा भगवान शंकर व गणेश की पूजा स्थलियां है।‘‘ [17] इस प्रकार यह धार्मिक स्थल देवगढ़-मदारिया क्षेत्र के भक्तों द्वारा पूजनीय है लेकिन साथ ही देशी-विदेशी पर्यटक जो देवगढ़ के होटल में पर्यटन हेतु आते हैं, उनका ग्रामीण-भौगोलिक पर्यटन का केंद्र बिंदु भी आंजना क्षेत्र रहता हैं जहाँ कि विशाल ग्रेनाईट चट्टाने अत्यधिक आकर्षक हैं। समीप के सभी शिव भक्तों हेतु यह धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बिंदु भी हैं।
निष्कर्ष : मेवाड़ के पूर्व-मध्यकालीन भाग से लेकर आधुनिक काल तक के इतिहास में शैव नाथ सम्प्रदाय के मठों का उनकी राजनीतिक-सांस्कृतिक भूमिका के संदर्भ में विवेचन कई अप्रकाशित शिलालेखों सहित होना अतिआवश्यक हैं जिससे आंजना मठ जैसे कई अन्य अप्रकाशित मठों की इतिहास सामग्री को प्रकाश में लाया जा सकेगा। आंजना या आंजणा मठ का स्थापत्य पहलू अभी भी कई पहलु अपने में समेटे हुए हैं जिनको खोजना प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों के संदर्भ में उल्लेखनीय होगा। आंजना मठ व देवगढ़-मदारिया क्षेत्र देवगढ़ होटल में पर्यटन हेतु आने वाले पर्यटकों हेतु अद्भुत विषय हैं जहाँ धर्म का भूगोल व् इतिहास के साथ संगम दृष्टव्य हैं।
संदर्भ
[1] श्री कृष्ण जुगनू, गाँव-गाँव गोरख नगर-नगर नाथ, आर्यावर्त्त संस्थान, दिल्ली, 2019, पृ.156-158
[2] के.डी, अर्सकिन,राजपूताना गजेटियर्स, द मेवाड़ रेजीडेन्सी, बुक्स ट्रेजर, जोधपुर, 2007, पृ.सं.105
[3] प्रकाशनाथ चौहान, नाथ इतिहास, श्री सरस्वती प्रकाशन, अजमेर,1993, पृष्ठ संख्या.134
[4] श्री कृष्ण जुगनू, गाँव-गाँव गोरख नगर-नगर नाथ, पृ.158-159
[5] श्री कृष्ण जुगनू, गाँव-गाँव गोरख नगर-नगर नाथ, पृ.159-160
[6] संकलन एवं सम्पादन, श्याम सुन्दर जोशी, भीलवाड़ा जिला दर्शन, प्राइम पब्लिकेशन, भीलवाड़ा, 2016, पृ. 47
[7] श्री कृष्ण जुगनू, गाँव-गाँव गोरख नगर-नगर नाथ, पृ.160
[8] श्री कृष्ण जुगनू, गाँव-गाँव गोरख नगर-नगर नाथ, पृ.160
[9] स्वयं द्वारा शिलालेख का अध्ययन, सहयोगी अंजना मठ के भक्त व आयसजी अजजी महाराज
[10] स्वयं द्वारा शिलालेख का अध्ययन, सहयोगी अंजना मठ के भक्त व आयसजी
[11] पुजारी उदयराम सुथार, भैरूलाल शर्मा आराधना के स्थान श्री आंजनेश्वर महादेवजी का मंदिर, परिचय पत्रिका, पृ.3 (आंजना मठ के शिलालेखों व जनश्रुतियों पर लिखित 100 वर्ष पुरानी छोटी पुस्तिका),प्रकाशक पुजारी उदयराम सुथार, भैरूलाल शर्मा
[12] स्वयं द्वारा किया गया शिलालेख का अध्ययन
[13] देवगढ़ (मेवाड़) की तवारीख (अप्रकाशित), पृ. सं.26 (प्रताप शोध प्रतिष्ठान, उदयपुर) ; सं. जीवनसिंह खरकवाल, शोध पत्रिका, वर्ष 69, अंक 1-4 (पूर्णांक 274-277) जनवरी-दिसम्बर, 2018, आलेख लेखक ऋतु जोशी, हेमेन्द्र सिंह, मेवाड़ राज्य का देवगढ़ ठिकाणा और स्थापत्य परिचय (16वीं से 20वीं शताब्दी ईस्वी), साहित्य संस्थान, उदयपुर, 2018, पृ.सं.75
[14] पुजारी उदयराम सुथार, भैरूलाल शर्मा आराधना के स्थान श्री आंजनेश्वर महादेवजी का मंदिर, परिचय पत्रिका, देवगढ़ ठिकाने एवं आंजना मठ के भक्तों, आयस जी एवं शंकरजी सुथार निवासी आंजना (उम्र 55 वर्ष ) के साक्षात्कार के अनुसार, पृ. 5-8
[15] पुजारी उदयराम सुथार, भैरूलाल शर्मा आराधना के स्थान श्री आंजनेश्वर महादेवजी का मंदिर, परिचय पत्रिका, देवगढ़ ठिकाने एवं आंजना मठ के भक्तों, आयस जी एवं शंकरजी सुथार निवासी आंजना (उम्र 55 वर्ष ) के साक्षात्कार के अनुसार, पृ. 5-8
[16] संकलन: मोहित माहेश्वरी, अतुल्य देवगढ़, राजस्थान पत्रिका, पृ.सं.23, प्रकाशक राजस्थान पत्रिका 2017 ई.; स्वयं द्वारा शिलालेख का अध्ययन एवं जनश्रुतियों का संकलन
[17] संकलन एवं सम्पादन, श्याम सुन्दर जोशी, भीलवाड़ा जिला दर्शन, पृ. 47
हेमेन्द्र सिंह सारंगदेवोत
9,कृष्णा नगर, मधुबन कालोनी, चित्तौड़गढ़ (राज.)
सह-आचार्य, इतिहास विभाग, मेवाड़ विश्वविद्यालय, गंगरार(राजस्थान)
7727019682, hamendra024@gmail.com
भेरू लाल सुथार (शोधार्थी, भूगोल विभाग)
मेवाड़ विश्वविद्यालय, गंगरार (राजस्थान)
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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