जंगळी खेल (चीकू के बीज) / मृणाल

जंगळी खेल (चीकू के बीज)
- मृणाल (बदला हुआ नाम)

कई बार हम किसी से इतनी बड़ी और गहरी उम्मीद लगा बैठे हैं कि वह अपने को साबित करने का सुनहरा अवसर दिखने लगता है। जब हम उसे पूरा करने के लिए अपनी सारी ताकत लगा देते हैं, एवं कई अलग-अलग रास्ते अपना कर मेहनत करने लग जाते हैं, तब उससे जुड़ाव हो जाना भी स्वाभाविक है। पर जब सारी दौड़-भाग के बावजूद हमें हमारी मंजिल नहीं मिल पाती है तब हम निराशा के सागर में गौते लगा जाते हैं।

यह वह दौर था जब स्कूल लंबी गर्मी की छुट्टियों के बाद खुले थे। नया सत्र, नई कक्षा और नई गतिविधियों के साथ मैं अब 11वीं क्लास में आ चुकी थी। मेरे लिए कला वर्ग के अलावा कोई विकल्प था ही नहीं, क्योंकि पड़ोस के गाँव कि जिस स्कूल में मैं पढ़ती थी, उसमें सिर्फ यही एक संकाय चलता है। स्कूल टॉपर होने के बावजूद विज्ञान संकाय के सपने को घर की गुवाड़ी में दफन करना पड़ा। “छोरी! पढ़ना है तो पास की स्कूल में पढ़ लो, नहीं तो घर पर बैठो, रोटियाँ बनाओ, गाय भैंस संभालो या फिर शादी की तैयारी करो।” घर वालों का जवाब मुझे अच्छी तरह से समझ आ गया। अब जो दिलाया गया, उसी से खुश होना पड़ा। घरवालों से बहस करने का कोई फायदा नहीं था, क्योंकि वे जगे हुए होंगे तब तो मेरी सुनेंगे न?

वही स्कूल होने के बावजूद 11वीं क्लास 10वीं तुलना में थोड़ी अजीब क्लास थी। उन शिक्षकों से मिलना हुआ जिनकी क्लासों को हम पहले कभी छिप-छिपकर सुना करते थे। नवीं क्लास से ही हमें 11वीं क्लास आकर्षित करती रहती रही। इस क्लास में पढ़ने की बहुत विविधता थी और रटने से आजादी। अलग-अलग गतिविधियाँ करके सीखना इस क्लास की सबसे बड़ी विशेषता थी। 10-12 जुलाई तक सब विद्यार्थी आने लगे और स्कूल का माहौल पिछले साल की तरह बनने लगा। पिछले साल भर से स्कूल में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। इसी कारण जगह-जगह ईंट, पत्थर, रेत और पुराना मलबा पड़ा था। जुलाई का पखवाड़ा बीतने के बाद हमारे कक्षा अध्यापक जटेश्वर सर ने इन पत्थरों को एक तरफ करने के लिए कहा और इसी के साथ शुरू होती है हमारी ‘मनरेगा’ की तैयारी। जटेश्वर सर का मूल नाम कुछ और है पर हमारी क्लास उन्हें इसी नाम से पुकारने लगी।

हमारे ‘मेट साहब’ जटेश्वर सर का कहना था कि स्कूल को व्यवस्थित और सुंदर रखने की जिम्मेदारी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की है, इसीलिए काम में जुट जाओ। हमारी मनरेगा टीम हँसी-मजाक के साथ थोड़े-थोड़े ग्राउंड को साफ करती और ऊबड़-खाबड़ मैदान को ठीक करती रही। स्कूल में कुछ जगह खाली पड़ी थी, उसको देखकर हमारे ‘मेट साहब’ ने सुझाव दिया कि यहाँ तुम लड़कियों के लिए कबड्डी का मैदान बनाया जा सकता है। स्कूल कैंपस से बाहर बने खेल मैदान में हम लड़कियों को जाने की इजाजत स्कूल वालों की तरफ से नहीं थी। लड़कें जरूर जा सकते थे। हमारी टीम गैंती, फावड़ा, खुदाली, सब्बल लेकर अपना मैदान तैयार करने में जुट गई। इस सारी गतिविधियों को रोकने या फिर चेकिंग के बहाने प्रिंसिपल सर आए और उन्होंने कहा, “रहने दो, पत्थर मिट्टी बहुत है। लड़कियाँ थक जाएगी।” “हम कर लेंगे सर।” हमारे जवाब के भीतर छिपे आत्मविश्वास को देखकर साहब कुछ नहीं बोले और वापस ऑफिस में चले गए। ‘मेट साहब’ जटेश्वर सर ने हमारा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि पिछली बार हमारी कब्बड्डी की टीम हार गई, पर इस बार स्कूल के लिए जरूर ट्रॉफी जीतकर लाएंगे।

इस तरह ‘मेट साहब’ ने हमें अब नया लक्ष्य दे दिया। इसी जुनून के साथ धारदार पत्थर और मिट्टी के कई ऊँचे-ऊँचे टीले खींच-खींचकर हम मैदान को समतल बनाने में जुट गई। ये कंकड़-पत्थर इतने थे कि लगभग साल भर बाद भी नहीं उठ पाए। इन कंकड-पत्थरों के बीच हमारी कबड्डी टीम तैयारी के लिए उतरती। रोज किसी न किसी का घुटना, कोहनी या मुँह छिल जाता। इतना होने के बावजूद किसी भी अध्यापक को हम पर तरस नहीं आया कि मैदान में अच्छी मिट्टी डलवा कर हमारे खेलने लायक जगह बना दें। अकेले जटेश्वर सर इसके लिए हाथ-पैर मारते रहे। स्टाप वालों और गाँव वालों से मिट्टी के लिए कई तिकड़म लगाये, पर जड़ मानसिकता भला कभी नया पसंद करती है? जटेश्वर सर की बात को अनसुना कर दिया गया। कोहनियाँ फूटती रही, घुटने छीलते रहे, कपड़े फटते रहे, पर हमारे जोश और बड़े लोगों की बेशर्मी में किसी भी तरह की कमी नहीं आई। लंच के समय फुर्ती से खाना खाकर जितना भी समय मिलता, हम तैयारी करने में जुट जाते। खाना खाने का समय हमें बोझ लगने लगा, इसीलिए कुछ दिनों बाद लंच छोड़कर हम सारा समय खेल में देने लगी। बेचारी भूख हमारी तैयारी को देखकर कहती, “मैं इतना भी किसी को अपने वश में नहीं कर सकती। इनके जुनून के आगे तो मेरी भी हार हो गई।”

स्कूल में खेलने के साथ-साथ अब हमने गाँव में भी प्रेक्टिस की कोशिश शुरू कर दी। पर लड़कियाँ फ्री कहाँ रहती है? लड़कियों को तो फुर्सत शमशान में ही मिलती है। जो भी दो-तीन लड़कियाँ मिल जाती, हम उन्हीं के साथ तैयारी में जुट जाती। हमें खेलता देख गाँव के मर्द कहते, “लड़कियों के लिए खेलना कूदना सही नहीं है।” इनकी सोच को देखकर लगता है कि आजादी के इतने साल बाद भी हम लड़कियों को आजादी नसीब नहीं हुई। इन सब चुनौतियों के बीच जटेश्वर सर ने हमें कहा कि आप पीटीआई सर से बात करो और कहना कि साहब से अंतिम दो कालांश में प्रेक्टिस की स्वीकृति दिलवा दीजिए। इस आईडिया ने हमारे चेहरे पर रौनक ला दी। हमारी उम्मीदों को किसी ने तो समझा। पीटीआई साहब को मनाना आसान था, वे मान भी गए। हमें साहब के पास भी परमिशन के लिए भेजा। हमें डर था कि क्या प्रिंसिपल सर मानेंगे? हमारी टीम ने कहा कि क्यों नहीं मानेंगे? हम कबड्डी की प्रैक्टिस के लिए तैयारी का समय मांग रहे हैं कोई उनका पद थोड़ी मांग रहे हैं जो मना कर देंगे? प्रिंसिपल सर हमेशा कोर्स रटवाने पर जोर देते थे और इसी तरीके से अच्छे नंबरों से पास हो जाओगे, ऐसा उनका मानना था। पर क्या हर बच्चा इसी तरह से आगे बढ़ता है? सह-शैक्षणिक गतिविधियाँ, कलाएं, नृत्य, खेल इन सब का अगर कोई महत्त्व नहीं है तो स्कूलों में क्यों चलाई जाती है?

हिम्मत बटोरकर हमारी टीम सीधी प्रिंसिपल सर से मिली और कलेजे पर हाथ रखकर बोला, “सर…..सर हम कबड्डी की तैयारी करना चाहते हैं। आपकी अनुमति हो तो क्या हम खेल सकते हैं?” उत्तर मिला “कहाँ खेलोगे?” झट से उत्तर दिया, “सर वहाँ हमने मैदान बनाया है, वहीं पर खेलेंगे।”

“ठीक है, लेकिन धूप बहुत है।”

“हम खेल लेंगे सर।”

“ठीक है, आज-आज खेल लो।”

प्रिंसिपल सर का मूड सही था या फिर हम पर दया आ गई। मन ही मन हम सभी ने साहब की लंबी उम्र की कामना की। पर लंबी उम्र की यह दुआ लंबे समय तक नहीं टिक पाई, जल्द ही बद्दुआ में बदल गई। रोज-रोज उनसे परमिशन मांगना कहाँ तक ठीक था? हम पशोपेश में थी कि जटेश्वर सर ने कहा कि सर को प्रार्थना पत्र में अपनी पूरी बात लिखकर टूर्नामेंट तक के लिए एक साथ अनुमति मांग को। हम सब ने मिलकर प्रार्थना पत्र लिख तो दिया पर साहब को कौन दे? हिम्मत बटोर कर पीटीआई सर को ही दे दिया। पीटीआई सर को मालूम था साहब नहीं मानेंगे, इसीलिए उन्होंने प्रार्थना पत्र अपने पास ही रख लिया और उनके निर्देशन में कुछ दिनों तक हम खेलते रहे।

पीटीआई साहब द्वारा जब सारी बात जटेश्वर सर को पता चली तो उन्होंने फिर हमें हिम्मत बढ़ाते हुए कहा कि आप सीधे साहब से मिलो ताकि भविष्य में किसी प्रकार का कोई विवाद न हो। हमने हिम्मत बटोरकर साहब को नियमित खेलने की अनुमति हेतु प्रार्थना पत्र दिया। साहब ने धमकाने के अंदाज में कहा, “यह जंगळी खेल है। हाथ पैर टूट गए तो भविष्य बिगड़ जाएगा।” डरते हुए हम लोग वापस कक्षा में आ गए। हम सहेलियाँ बहुत गुस्से में थी। चोट लग सकती है, पर अगर हम सावधानी से खेले हैं तो क्या दिक्कत है? वैसे भी खेल में चोट लगती ही है, इस डर से क्या हम खेलना बंद कर दें?

अब हमने रणनीति में थोड़ा बदलाव किया। जब साहब स्कूल में नहीं होते तब लंच टाइम और अंतिम क्लास में खेला करते थे, कभी-कभी गाँव में भी खेलते। कुछ समय बाद बरसात ने हमारे स्कूल को पानी से भर दिया। खेलने की कोई जगह न बची थी। अब क्या करें? टूर्नामेंट नजदीक आ रहे थे। हमने खेलने के लिए विकल्प तलाशना शुरू किया। खेलने, जुझने और जीतने का हौसला इस कदर हम पर हावी हो गया कि दूसरी सारी चुनौतियाँ बिल्कुल मामूली लगती। अब हमने कक्षा कक्ष के भीतर ही खेलना शुरू कर दिया। जिस समय शिक्षक क्लास में नहीं होते उस समय हम अपने बस्तों को एक तरफ रखकर खेलने लगे। गेट पर एक ‘चौकीदार' भी कर खड़ा देते थे, ताकि अगर कोई शिक्षक आ रहा हो तो हम अपने आप को निर्दोष साबित करते हुए चुपचाप अपनी जगह पर बैठ जाए। कुछ समय बाद हमने लड़कों के साथ भी खेलना शुरू किया। अब हम इतनी निपूर्ण हो गई थी कि लड़कों को उठाकर पटक देती थी। हमें किसी भी सूरत में यह बर्दाश्त नहीं था कि लड़के हमसे ज्यादा ताकतवर हो।

यह सब गतिविधियाँ केवल जटेश्वर सर की नजर में थी। जटेश्वर सर ने हमें प्रोत्साहित करना जारी रखा। उनकी सलाह थी कि लड़कों के साथ मैदान में मत खेलना, वरना प्रिंसिपल सर तुम्हारी सभी गतिविधियों पर रोक लगा देंगे। क्या हमारे साहब की ही सोच ऐसी है या सभी स्कूलों के साहब की? पता नहीं, पर जिस स्कूल का संस्था प्रधान ही दकियानूसी सोच वाला हो तो भला बताइए बाहरी समाज से हम क्या अपेक्षा करें? लिंग भेद की असल शुरुआत घर से होती है, पर शिक्षण संस्थानों में यह और भी ज्यादा विस्तार और मजबूती पा रही है। हालांकि शिक्षण संस्थान हर तरह के भेदभाव को समाप्त करने के लिए ही बनाये गए हैं।

दिन बीत रहे थे और हमारा हौसला पहाड़ के समान विराट होता जा रहा था। अब टूर्नामेंट में सात दिन बचे होंगे तब एक नई चिंता ने हमें घेर लिया। चिंता थी कि क्या साहब हमारी टीम खेलने के लिए भेजेंगे? टूर्नामेंट का स्थान स्कूल से 80 किलोमीटर दूर था। साहब को छोड़ो, क्या हमारे घर वाले भेजेंगे?

मैंने घर पर बात की, “दादा (पिताजी) मैं कबड्डी खेल बा जाऊ।”

“कठी न जाणो। हाथ पग तुड़ाबा।”

“न, म जाऊं!”

“हावटी बोलबा ला गी।” दादा ने आंखें तरेर कर मेरी तरफ देखा। मैं सिहर कर वहाँ से टल गई। घरवालों की चिंता यह नहीं थी कि लड़कियाँ बाहर कैसे और कहाँ जाएगी? उनकी सोच यह थी कि छोरियाँ का काम खेलने नहीं है। पर मैं यह भी जानती हूं कि बार-बार जिद करने पर पिताजी और घरवाले मान जाएंगे। पूरा समाज कभी बराबर नहीं होता है, कुछ की सोच खुली होती है तो कुछ की सीमित। उसी दिन जब दो-तीन बार फिर कहा तो उन्होंने कहा, “10 तारीख को खेलने के लिए तुम्हें जाना है तो अभी परेशान मत कर। अभी जो काम दिया है, वह कर।” रात को मम्मी से पूछा तो वह बोली कि हमारी कोई नहीं सुनता बेटा फिर भी मैं कोशिश करूंगी।

मर्द मनमानी करते हैं, औरत की बात अक्सर नहीं सुनते। जटेश्वर सर की यह बात मुझे अब अच्छे से समझ में आ रही थी। स्त्री की आवाज को शुरू से ही दबाया जाता है, इसीलिए वह मुखर नहीं हो पाती।

घर वाले माने न माने पर अगर कोई शिक्षिका मान गई तो तुम्हारा काम आसान हो जाएगा, जटेश्वर सर से ऐसा सुनकर हममें एक नई आस जगी। इस समय शतरंज की टीम भी खेलने के लिए जा रही थी। एक शिक्षिका उनके साथ जाने के लिए पहले से ही आतुर थी। अब एक शिक्षिका जिनसे हमें उम्मीद थी, उनसे पूछा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। अपनी बीमारी और बेटी की परीक्षा का बहाना बनाकर हमसे पिंड छुड़ाना चाहा। सरकार शिक्षकों को स्कूल में बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए रखती है या फिर केवल तनख्वाह देने के लिए? हमारे ही कारण तो इनके घरों का चूल्हा जलता है और हमीं से ऐसी बेरुखी? अब हमारी समस्या ने रूप बदल लिया था, हालांकि रास्ते बहुत थे, लेकिन उन रास्तों को चुना किसी ने नहीं। एक के बाद एक शिक्षिकाओं ने इनकार करना शुरू किया तो हमारा हौसला काफी हद तक टूट गया। पर फिर भी हमारी मेहनत ने कहा कि यहाँ तक पहुंचने के बाद भी क्या तुम हार मान लोगे? नए रास्ते खोलने के लिए नई उमंग के साथ तैयारी करनी है। साल में 10 महीने डेपुटेशन पर रहने वाली मैडम से भी हमने बात की, पर कुछ सोचने के बाद उसने भी मना कर दिया। हमने पीटीआई साहब से कहा कि आप ही कोई रास्ता निकालिए और बात कीजिए कि क्या किसी शिक्षक को हमारे साथ भेज सकते हैं? इस पर उन्होंने कहा कि महिलाओं के साथ में महिला ही जा सकती है बेटा। हमारे स्कूल में महिला शिक्षिकाएं जाने के लिए तैयार नहीं है तो पंचायत स्कूलों से उन्हें मंगवाया जा सकता है। जब हमने इस बारे में प्रिंसिपल सर से बात की तो उन्होंने हमें बहुत सुनाया, “कहा कहाँ है मेडमे तुम्हारे लिए? वे खाली बैठी है? उनकी ड्यूटी लगा रखी है कई जगह।”

“पर सर वहाँ क्या एक ही मैडम है?” यह सवाल करने की हिम्मत हमारे में नहीं थी। बात पूरी स्कूल में फैल चुकी थी। बाकी शिक्षक भी हमारे प्रति सहानुभूति जता रहे थे। उन्होंने पंचायत की मैडमों से अपने स्तर पर बात करना शुरू कर दिया। पुरानी मैडम से जिसने बीमारी का बहाना बनाया था, उनसे वापस बात की तो उसने हमें डांटते हुए भगा दिया। मैडम की ना के बाद हम बहुत टूट गई। ख़ामोशी के साथ हम हमारी कक्षा में पहुंची और फूट-फूटकर रोने लगी। जैसे तैसे नंबर लेकर हमने फिर से पंचायत की शिक्षिकाओं से एक के बाद एक बात करने लगी। पर एक-एक करके सभी शिक्षिकाओं ने मना कर दिया, क्योंकि वह अपने उच्च अधिकारी के खिलाफ नहीं जा सकती थी। प्रिंसिपल सर को धर्म ज्ञान का विद्वान कहा जाता है, उन्होंने हमारी इच्छाओं को कुचल दिया।

जब चारों तरफ से हमें इनकार का जवाब मिलता है तो हमारी आशा निराशा में, खुशी गम में, हौसला और जुनून आंसुओं के साथ बह गया। कल मैच है एक दिन में हम सब कुछ कर सकते थे लेकिन करें क्या ? हमारे प्रधानाचार्य के पद पर ऐसा विद्वान बैठा है जिससे अपने गाँव और स्वयं के वर्ग का विकास ही दिखता है। कहते हैं कि मेहनत का फल जरूर मिलता है। पर क्या हमारी मेहनत अच्छी नहीं थी जो हमें कुछ नहीं मिला ? जटेश्वर सर के साथ-साथ अन्य कई शिक्षकों ने ऑफिस से कई बार बहस की, लेकिन उनकी बात भी प्रिंसिपल सर ने नहीं मानी। क्या कोई पुरुष शिक्षक हमारे साथ नहीं जा सकता? इस प्रश्न पर हमें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। पढ़े-लिखे लोग भी अगर अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते लिंग भेद करते हुए हमारे प्रतिभाओं को रोंदते हैं, तब ऐसी स्वतंत्रता का क्या मतलब? ऐसी स्वतंत्रता क्या समानता ला सकती हैं? एक-एक पल आंसुओं के साथ बीत रहा था। ये आंसू ऐसे ही नहीं गिर रहे थे, बल्कि हमारा हौसला चकनाचूर हो चुका था। भारी-भारी पत्थर उठाना, कंकड़ों पर गिरना, छिप-छिपकर क्लास रूम में खेलना, लड़कों को उठा-उठाकर पटकना हमें लगातार रुला रहा था।

दिन निकल रहे थे, खबर आई कि शतरंज की टीम की दो लड़कियों का राज्य स्तर पर चयन हो गया है। यह हमारी पूरी पंचायत के इतिहास में पहली बार हुआ था कि पंचायत का कोई विद्यार्थी राज्य स्तर पर खेलने जाएंगे और वह भी लड़कियाँ। जटेश्वर सर ने इस टीम को पूरे साल अच्छी तैयारी करवाई थी। शतरंज की टीम भी तमाम दकियानूसी चुनौतियों से लड़-झगड़ कर खेलने गई थी। राज्य स्तर पर चयन की खबर जब जटेश्वर सर को मिली तो उनका सीना चौड़ा हो गया। प्रिंसिपल साहब से लड़कियों के लिए भिड़ना कुछ तो फायदा लेकर आया।

मैं अनुमान लगा सकती हूं कि जब दो लड़कियों के चयन की खबर प्रिंसिपल साहब को मिली होगी, तब वे निश्चित रूप से खुश नहीं हुए होंगे। शायद इसी जलन के कारण स्कूल की ऐतिहासिक उपलब्धि के बावजूद इसकी खबर अखबार में नहीं छपवाई गई। जंगळी खेल क्या होता है, यह मुझे अब समझ में आया। ताकतवर द्वारा कमजोर को दबाना, ओछी मानसिकता के कारण प्रतिभाओं को रोंदना जंगळी खेल ही होता है। सिस्टम के ताकतवर लोगों ने हमारी प्रतिभा को कुचलने के लिए यह जंगळी खेल खूब खेला।

प्रार्थना सभा में जटेश्वर सर ने शतरंज के खिलाड़ियों का सम्मान किया गया। हमें खुशी थी कि ये गए और इनका चयन हुआ, लेकिन खुशी ज्यादा देर तक नहीं ठहर पाई। दुख का सागर इतना उमड़ा कि क्लास में पहुंचकर हम खूब रोये हैं। जटेश्वर सर को जब सूचना मिली तो तुरंत क्लास में पहुंचकर हमारा हौसला बढ़ाया, “क्या तुमने हार मान ली? क्या अब कभी उम्मीद नहीं रखोगी? मेरी बेटियों! जीवन में ऐसे दुखड़ें रोओगी तो आगे कैसे बढ़ेगी? जिंदगी एक चुनौती है और इसको कैसे जीतना है, यह सीखना होगा। हालांकि तुमसे ज्यादा दुख मुझे है, पछतावा है। पर क्या हम इसी पछतावे में रहेंगे? कुछ नया नहीं करेंगे? एक नई शुरुआत के लिए जो बीता उसे भूल जाओ और आगे क्या होगा, कैसे होगा, इसके बारे में सोचो।” ये शब्द दिल को छू गए और दिल साफ हो गया। किसी और के साथ कहीं भी कोई जंगळी खेल न खेले इसका ध्यान रखना हमारी जिम्मेदारी है। पर क्या हम ऐसा कर पाएंगे?

- मृणाल (बदला हुआ नाम)

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

2 टिप्पणियाँ

  1. बेहतरीन रचना, ऐसी लड़ाई हर लड़की को लड़नी पड़ती , चाहे समय कल का रहा हो चाहे आज का। मैं भी इस संघर्ष से गुजरी हूं।आज प्रोफेसर हूं। लेकिन देखती हूं कि मेरा संघर्ष आज भी अलग-अलग स्तरों पर जारी है।साथ ही मेरी छात्राओं का भी संघर्ष भी मेरे साथ जुड़ गया है। लेकिन निराश हुए बगैर लड़ना हमारे जीवित होने का लक्षण है। कभी कभी तक जाते हैं लेकिन इस नहीं टूटती। लड़ाई जारी ही रहेगी.......

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  2. बहुत अच्छी रचना, हर संघर्षशील स्त्री की यही कहानी हैं। इसको पढ़ कर मुझे हिंदी फिल्म का एक गीत याद आता है, "रुक जाना नहीं तू कही हार के......" 👍👍

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