कश्मीर केंद्रित उपन्यासों में आतंकवाद एवं स्त्री जीवन
- प्रतिभा एवं नमस्या
शोध सार : कश्मीर की खूबसूरत वादियां किसी भी संवेदनशील इंसान के दिल को मोह लेने की ताकत रखती हैं, इसीलिए इसे धरती पर स्वर्ग कहा जाता है। अपनी भौगोलिक सुंदरता के अलावा, कश्मीर का एक शानदार सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास भी है। यह शोध पत्र कश्मीर केन्द्रित हिन्दी उपन्यासों में आतंकवाद का स्त्री जीवन पर प्रभाव का गहन अध्ययन करता है, जिसमें इस क्षेत्र के संघर्ष और पीड़ा को विविध दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया गया है। इस शोध पत्र के माध्यम से यह स्पष्ट होगा कि साहित्य ने कश्मीर में आतंकवाद एवं स्त्री जीवन को किस प्रकार से चित्रित किया है। इस शोध आलेख में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। कश्मीर लंबे समय से आतंकवाद और हिंसा का शिकार रहा है। इस संघर्ष का सबसे गहरा प्रभाव वहाँ की स्त्रियों पर पड़ा है। हिंदी उपन्यासों में कश्मीरी स्त्री को केवल एक पात्र नहीं, बल्कि पीड़ा, संघर्ष और धैर्य की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आतंकवाद स्त्री से उसका परिवार छीन लेता है। कई उपन्यासों में “आधी विधवा” की स्थिति दिखाई गई है-जहाँ पति लापता है, न जीवित माना जाता है न मृत। यह मानसिक यातना स्त्री को भीतर से तोड़ देती है। स्त्री को लगातार भय और असुरक्षा में जीना पड़ता है। गोलीबारी, तलाशी अभियान और धमकियों के बीच उसका दैनिक जीवन प्रभावित होता है। वह स्वतंत्र रूप से बाहर निकलने से डरती है, जिससे उसकी सामाजिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। आतंकवाद स्त्री को आर्थिक रूप से कमजोर बना देता है। परिवार के पुरुष सदस्य के न रहने पर रोज़ी-रोटी का भार उसी पर आ जाता है। कई हिंदी उपन्यासों में स्त्रियों को छोटे-मोटे काम करते या संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए दिखाया गया है।
बीज शब्द : कश्मीर, सांप्रदायिकता, संघर्ष, आतंकवादी, स्त्री, हिन्दू, मुस्लिम, कश्मीरियत इत्यादि।
मूल आलेख : कश्मीर, जिसे प्राचीन काल से 'ऋषियों की भूमि' और 'धरती का स्वर्ग' कहा जाता है, 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद से राजनीतिक अस्थिरता और साम्प्रदायिक तनाव का शिकार रहा है। 1980 के दशक के अंत में पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी आंदोलन और जिहादी तत्वों (जैसे लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन) के उदय ने घाटी को आतंकवाद की गिरफ्त में जकड़ लिया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हुआ और सामाजिक सौहार्द टूट गया। हिंदी उपन्यास साहित्य ने इस संकट को गहनता से चित्रित किया है, जहां आतंकवाद को न केवल राजनीतिक समस्या बल्कि मानवीय त्रासदी के रूप में देखा गया है। विशेष रूप से स्त्री जीवन का चित्रण इन उपन्यासों में केंद्र बिंदु है, क्योंकि महिलाएं घरेलू, सामाजिक और राजनीतिक हिंसा की दोहरी मार झेलती हैं। यह आलेख कश्मीर केंद्रित हिंदी उपन्यासों का विश्लेषण करता है, जहां आतंकवाद स्त्रियों की स्वायत्तता, पहचान, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है। आतंकवाद ने कश्मीर की स्त्रियों को 'आधी विधवा' (पति गायब या मारे गए), विस्थापित और शोषित बना दिया है, लेकिन साहित्य में वे प्रतिरोध की प्रतीक भी हैं। कुछ रचनाओं में बलात्कार, उत्पीड़न और अपमान जैसी त्रासद स्थितियों का चित्रण है, जो स्त्री की गरिमा और आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाती हैं। साथ ही, हिंदी उपन्यास यह भी दिखाते हैं कि कश्मीरी स्त्री केवल पीड़िता नहीं है - वह सहनशील, साहसी और संघर्षशील भी है। वह बच्चों को संभालती है, परिवार को जोड़कर रखती है और विषम परिस्थितियों में भी आशान्वित रहती है। जिन रचनाकारों ने कश्मीर को अपने उपन्यासों का विषय बनाया उनमें प्रमुखतः- चन्द्रकान्ता का 'कथा सतीसर' और ऐलान गली जिंदा है, संजना कौल का 'पाषाण युग', क्षमा कौल का 'दर्दपुर', जय श्री रॉय का ‘इक़बाल’, मधु कंकरिया का ‘सूखते चिनार’, रवीन्द्र प्रभात का ‘कश्मीर 370 किलोमीटर’, रमेश बख्शी का कश्मीर 1990, मीरकांत का कोई था कहीं नहीं सा, पद्मा सचदेवा का नौशींन और मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित उपन्यास 'शिगाफ़' शामिल हैं।
इन उपन्यासों में स्त्रियाँ आतंकवाद की मुख्य शिकार हैं। कश्मीर में आतंकवाद, हिंसा और शोषण का शिकार सिर्फ हिन्दू स्त्रियाँ ही नहीं हुई, बल्कि मुस्लिम महिलाओं का भी शोषण हुआ। आतंकवादी उनके घरों में आकर जबरदस्ती उनसे तहखाने बनवाकर वहाँ रुकते थे और उन्हीं के परिवार की स्त्रियों का यौन शोषण करते थे। चन्द्रकान्ता अपने उपन्यास 'कथा सतीसर' में घाटी की स्त्रियों की दारुण दशा को प्रस्तुत करती हैं। मुख्य पात्र तुलसी कबाइलियों के बलात्कार की शिकार बनी हिंदू युवती है, साथ ही नसीम के रूप में मुस्लिम युवती के साथ हैवानियत का व्यवहार, कश्मीर में जिहाद के नाम पर फैले आतंकवाद के घिनौनेपन को उजागर करता है। चन्द्रकान्ता 'कथा सतीसर' उपन्यास में लिखती हैं - "तुलसी निरपराध होकर भी अपराधिनी थी। शीलहनन को अंतिम अक्षम्य अपराध मानने वाले समाज में वह सुच्ची नारी नहीं ध्वस्त खंडहर थी क्योंकि वह दो दिन कबाइलियों के कब्जे में रह चुकी थी।"1 समाज में देवी की पदवी पाने वाली स्त्रियों के साथ अगर गलत हो जाए तो समाज स्त्री पर ही पूरा आरोप लगा देता है। आतंकवादियों के अमानवीयता का शिकार हो जाने पर भी समाज पीड़िता की ही गलत बता रहा है। लेखिका प्रश्न उठाती हैं कि यह समाज का कैसा न्याय है जिसमें पीड़िता को ही सबसे अधिक प्रताड़ित होना पड़ता है।
दूसरी तरफ आतंकियों के अमानुषिक कृत्यों की शिकार हुई मुस्लिम युवती नसीम है। जब धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा लड़कियों को पर्दा करने और मुँह ढकने के लिए फरमान जारी किया जाता है तो वह इस मज़हबी कट्टरपन का विरोध करती है। उसे पर्दा करने, बुर्का पहनने, नमाज पढ़ने के लिए कहा जाता है और गैर इस्लामिक कार्य जैसे 'साइकिल चलाना', गाड़ी चलाने को मना किया जाता है। नसीम के भाई को हिन्दुस्तानी जासूसों (हिन्दुओं) से दूर रहने की सलाह दी जाती है। जब पीटर कहता है अपना ख्याल रखना नसीम ! हालात काफी ख़राब हो रहे हैं। तब वह पीटर से कहती है "सब ठीक हो जायेगा, विकी! इस जिहाद का जोश ज्यादा टिकाऊ नहीं होगा। हमारी रगों में ऋषियों और सूफियों का खून है। जल्दी ही उबाल ठंडा हो जायेगा। फिलहाल अपने लड़के कठपुतली बने हुए हैं। इन्हें चलाने वाले दूसरे हैं, यह बात जिस दिन वे समझेंगे, ज़रूर नए सिरे से सोच-विचार करेंगे।"2 परंतु कट्टरपंथियों के बात न मानने पर वह नसीम को उठा ले जाते हैं और उसके साथ बलात्कार करते हैं। नसीम के माध्यम से चंद्रकांता ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि आतंकवादियों का कोई धर्म और मजहब नहीं होता है केवल दहशतगर्दी ही उनका एक मात्र लक्ष्य है जिसमें सबसे कमज़ोर वर्ग के बच्चों और स्त्रियों को वह अपना निशाना बनाते हैं। उनके लिए स्त्री केवल एक भोग की वस्तु है। ये आतंकवादी पशुओं से भी बर्बर हैं जिनके अंदर दया करुणा और ममता नाम की कोई चीज नहीं है।
कट्टरपंथियों के अमानुष कृत्य का शिकार बनी नसीम, जब बच्ची को जन्म देती है तो वे उस बच्ची को मार देना चाहते हैं। उन्हें डर है कि इस बच्ची की आवाज से बी.एस.एफ. के जवान चौकन्ने हो जाएँगे। नसीम किसी तरह वहाँ से भाग निकलती है फिर भी उसकी समस्या खत्म नहीं होती है। जब नसीम का भाई उसकी बच्ची को पता नहीं ‘किसका खून है कहकर किसी अनाथालय दे देंगे’ की बात करता है तब वह कहती है “सभी से कह दो नसीम की बेटी है। मैंने उसे जना है। मैं रहूँगी तो यह भी रहेगी।.... जुल्म का शिकार देह होता है, रूह नहीं। बलात्कार किसी भी जुल्म जैसा जुल्म है भाईजान। इसे पाकीजगी के साथ जोड़ना दुहरी नाइंसाफी है, उन मासूम लड़कियों के साथ, जिन्हें दहशतगर्द जबर्दस्ती उठा ले गए।’’3 नसीम द्वारा बच्चे का जन्म देना और आतंकवादियों के गिरफ्त से भागकर घर लौटना कश्मीर में एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है और यह आतंक के अँधेरे में उम्मीद की नयी रोशनी है। इतिहास साक्षी है कि बहू-बेटियाँ आक्रमणकारियों के हाथों हमेशा से ही उत्पीड़न का शिकार हुई हैं। चंद्रकांता के कश्मीर केन्द्रित दूसरे उपन्यास ‘ऐलान गली ज़िंदा है’ में कश्मीरी स्त्री पात्रों के माध्यम से उनके जीवन की विभिन्न समस्याओं को उजागर किया है। उपन्यास में स्त्रियों को पुरुषों पर आर्थिक रूप से निर्भर होने के कारण घरेलू हिंसा से पीड़ित दिखाया गया है, जिस कारण वह अपने जीवन को एक निश्चित ढांचे में रखने के लिए मजबूर है और अपने सपनों और इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाती। उपन्यास में स्त्री अस्मिता एवं उसके अस्तित्व के लिए संघर्ष करते स्त्री पात्रों का वर्णन किया गया हैं। अरुंधती, रत्नी, लच्छी, शुभी जैसे पात्रों एवं प्रसंगों के माध्यम से स्त्री के मन एवं जीवन के कई पक्षों को स्पर्श करती दिखाई देती हैं। उपन्यास की एक पात्र शुभी जो आतंकियों द्वारा बलात्कार की शिकार होती है, उसे समाज घृणित दृष्टि से देखने लगता है। अरुंधति कमली को एक बात बोलती है कि “दस जगह अपने को खराब करने से अच्छा था वितस्ता में छलांग लगा देती”4 यह पंक्तियाँ घाटी में स्त्रियों के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न छोड़ती हैं साथ ही उनकी मार्मिक स्थिति को उजागर करती है।
आतंकवाद ने महिलाओं को सबसे अधिक प्रभावित किया। वे घरों की रक्षक, परिवार की संरक्षक और समाज की धुरी होती है। लेकिन संघर्ष में उनकी भूमिका अनदेखी रह जाती है। दर्दपुर उपन्यास में आतंकवाद के कारणों पर भी बारीकी से प्रकाश डाला गया है। उपन्यास की नायिका सुधा स्वयं एक निर्वासित कश्मीरी हिन्दू है। एक विशेष योजना के अन्तर्गत कश्मीरी मुस्लिम स्त्रियों के दुखदर्द, भय और विवशता में सहयोग करती है। यही उपन्यास का मर्म है कि एक विस्थापित हिन्दू अपनी जीविका को भी उद्देश्य से जोड़कर देखता है। अपने दर्द को पीकर गहरी सहानुभूति से अपने मिशन को सार्थकता देता है। यहाँ तक कि सुधा को आतंकवादी की विधवा का जीवनयापन सताता है। सुधा काबाइलियों के हमलों के बारे में बताती हैं कि पंडित मर्दों को इतनी बेरहमी और क्रूरता से मारा गया, और उनके घरों को लूटा और जला दिया गया। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई; उनकी औरतों को अगवा कर लिया गया। वे एक गाँव को लूटते, जलाते, पंडित मर्दों को मार डालते, और फिर उनकी बहनों और बेटियों को अपने साथ ले जाते। ‘‘जब हम सभी औरतें टीले पर पहुँच गयीं तो तड़-तड़-तड़ गोलियां चलने की आवाजें हुई। हम समझ गये कि पुरुष मारे गये हैं। स्त्रियाँ रोने बिलखने लगी। पर काबाइली विकराल दानव थे। हाँककर ले गये। कहते हैं बारामूला कैंप में सैकड़ों पंडित स्त्रियाँ हैं जिनकी वे अस्मत लूटते है।”5 यह पंक्तियाँ स्त्रियों की असुरक्षा को उजागर करती है साथ ही उनके ऊपर हुए वीभत्स अत्याचारों को दर्शाती है। यह उपन्यास आतंकवाद को केवल हिंसा नहीं, बल्कि धीमी सामाजिक-मानसिक मौत के रूप में दिखाता है, जहाँ स्त्रियाँ न केवल शारीरिक खतरे में होती है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान खोने, परिवार टूटने और निरंतर भय से जूझती है।
इसी प्रकार से मीरकांत का उपन्यास ‘एक कोई था कहीं नहीं सा’ कश्मीर के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास की पृष्ठ भूमि को उजागर करता है। यह उपन्यास मुख्य रूप से स्त्री जीवन के संघर्षों, विशेषकर विधवाओं के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण, उनके जीवन की रिक्तता तथा उन पर थोपी गयी वर्जनाओं की समस्या को उजागर करता है। शबरी इस उपन्यास की मुख्य पात्र है जो कि एक किशोरी विधवा है। शबरी का जीवन सामाजिक उपेक्षा का एक जीवंत उदाहरण है। लेखिका ने उसके भाई अंबरनाथ के माध्यम से प्रगतिशील विचारों और पारंपरिक समाज के बीच का टकराव की स्थिति को दिखाया गया है, एक स्त्री को शिक्षित बनाने में उसे सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ता है। कश्मीरी विस्थापन के कारण स्त्रियों को किस प्रकार की परेशानी उठानी पड़ी उसका चित्रण रवीन्द्र प्रभात ने अपने उपन्यास में किया है। उनका उपन्यास ‘कश्मीर 370 किलोमीटर’ में लेखक ने हिन्दुओं में जो दहशत और असुरक्षा का डर है उसे अपने उपन्यास में दर्शाया है कि किस तरह वादियों में लोग डर की वजह से अपना पुश्तैनी घर छोड़ने पर मजबूर हैं “नहीं सुदेश नहीं, हमें नहीं रुकना यहाँ। इन वादियों में हमारी सैकड़ों बेटियों की बेबस कराहें सुनाई दे रही हैं, जो अपने ही खून की बदकारी का शिकार हुई हैं। घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर वादी के गोशे-गोशे तक में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफ्न हुई हैं।’’6 विस्थापन का कष्ट सबको झेलना पड़ता है परंतु सबसे अधिक भयावहता स्त्रियों के हिस्से में आती है उनको बेरहमी और निर्दयता से मार दिया जाता है। रमेश बख्शी का उपन्यास कश्मीर 1990 कश्मीर में व्याप्त आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के संघर्ष को दर्शाता है साथ ही विस्थापन की पीड़ा, सांप्रदायिकता और मानवीय संबंधो के बिखरने की कथा को जीवंत रूप में चित्रित किया है।
जय श्री राय द्वारा लिखित ‘इकबाल’ उपन्यास यात्रा विवरण की शैली में लिखा गया है यह उपन्यास कश्मीर की समस्यायों को उजागर करता हैं। उपन्यास में आधुनिकतम संचार साधनों ट्विटर, फेसबुक आदि का प्रयोग किया गया है। इन्ही माध्यमों से नायिका जिया एक कश्मीरी नवयुवक इकबाल से परिचित होती है और इकबाल द्वारा उसे कश्मीर मे होने वाली पूर्व घटनाओं से परिचित कराया जाता है कि किस प्रकार 1991 में राजपुताना राइफल्स के जवानों द्वारा पूरे गाँव को घेरकर वहाँ के लोगों पर पूछताछ के नाम पर कितनी बेरहमी के साथ ज़ुल्म ढाये गए और आदमियों को बेरहमी से पीटा गया एवं महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। जिया सोचती है, “औरत का ज़िस्म कभी किसी के लिए हिन्दू या मुसलमान का ज़िस्म नहीं होता इस स्तर पर वह बस मांस है, बोटी है और हर मर्द यहाँ आकर आदमखोर बन जाता है।’’7 आमतौर पर समाज स्त्री को धर्म, जाति और कुल की मर्यादा के चश्मे से देखता है। लेकिन ये पंक्तियाँ तर्क देती हैं कि जब बात यौन शोषण या कुंठित वासना की आती है, तो स्त्री की धार्मिक पहचान अर्थहीन हो जाती है। हमलावरों की नज़र में वह केवल एक वस्तु या उपभोग की सामग्री बनकर रह जाती है। लेखिका कश्मीर समस्या को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखती हुई यथार्थ एवं संवेदना के धरातल पर उजागर करती हैं उपन्यास में एक पात्र अशोक कौल कहती है कि “1990 में जब कश्मीर में दहशतगर्दी पहले-पहले शुरू हुई थी, इस घर की बड़ी बेटी नूतन का सामूहिक बलात्कार हुआ था-इन्हीं के सामने। इतना करके भी वे जालिम शांत नहीं हुए थे। लकड़ी चीरने की आरी से उसे दो टु…..कडों में चीर दिया था।’’8 इस प्रकार की वीभत्स घटना से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कश्मीरी औरतों को किस प्रकार से शारीरिक शोषण किया गया। धर्म के नाम पर आतंकवादी अनेकानेक युवकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। स्त्री हो या पुरुष आर्थिक समस्याएँ इंसान को ईमान बेचने के लिए मजबूर करती हैं।
मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा रचित ‘शिगाफ़’ उपन्यास कश्मीर के आतंकवाद और हिन्दू विस्थापन पर आधारित है। “शिगाफ़ में कश्मीर जीवन से संबन्धित अपने स्वाधीनता के पक्ष को प्रस्तुत करते हुए वहाँ के समाज, धर्म में आतंकियों के आतंक से निर्मित दरार, डर, आतंक की प्रस्तुति है।”9 उपन्यास में जुलेखा एक ऐसी लड़की है जो एक आतंकी के प्रेम में फँसकर अपना जीवन उसके हवाले करती है। गरीबी और मजबूरी में गलत रास्तों पर चल पड़ती है। गाँव की मस्जिद पर आतंकवादी ग्रुप का लड़का सगीर और उसके कुछ साथियों ने कब्जा कर लिया था। एक दिन मुखबिरों ने फौजियों को संदेश देकर मस्जिद पर हमला बोल डाला, उसमें बहुत सारे फिदायीन मारे गये, मगर सगीर जुलेखा के तहखाने में छुपा था तो बच गया और वहाँ से भाग गया। उससे वह छिप-छिपकर मिलता था। जुलेखा उसे हथियार पहुँचाने का काम करती थी। इसी बीच फौज से छूटकर आया अब्दुल कड़ी पूछताछ के कारण मुजफ्फराबाद भाग जाता है। अब जुलेखा अकेली थी। वह सिपाहियों की पूछताछ से डरती नहीं थी, वह उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा करती थी। पता नहीं है कि हमारा बाप कहाँ भाग गया। दो महीने बाद सगीर फिर जुलेखा से मिलता है। वह जुलेखा को एक चीज सौंपता है। सीमा के पास एक गाँव में कुछ सामान लेकर बुलाता है और वहाँ उससे मिलने का वादा करता है। उसके पास जो सामान था वह बॉम्ब था इसका उसे पता नहीं था। जुलेखा उस गाँव पहुँच जाती है तो वह आत्मघाती बॉम्ब से उड़ा दी जाती है और उसकी बहन जुबीना वापस अपने गाँव चली जाती है। ‘‘बस, यही अंजाम हुआ, गफलत-भरे इश्क के अफसाने का।’’10 इस तरह एक सीधी-साधी गरीब घर की लड़की को प्यार में जिहादी बना दिया जाता है।
कश्मीर में आतंकवादियों ने लडकियों और स्त्रियों को अपने बन्धनों का बंदी बना दिया है। न उन्हें पढ़ने की अनुमति है, न वो घूम सकती हैं। ऐसे कार्यो को इस्लाम में विरोधी माना जाता है। कश्मीरी लड़की जीवन भर अपने सपनों का गला घोंटकर जीवनयापन करती है। ‘‘सच तो ये है, बाकी दुनिया सोचती है कि कश्मीरी औरत में हिम्मत नहीं है और वे बड़ी पिछड़ी औरतें है। मगर सच, ग्रेस पढ़कर पता चलता है कि कश्मीरी औरत कितनी सजग है। वह भी फिल्म देखना चाहती है खुलकर अपनी फिजिकल प्रोब्लम पर बात करना जानती है।’’11 किसी भी धर्म में ऐसा नहीं लिखा गया है कि स्त्री को पढ़ना नहीं चाहिए। कश्मीर का इस्लामिक वर्चस्व संस्कृति और अंधश्रद्धा ने स्त्री के पैरों को जकड़कर रखा है। उन्हें ऐसा लगता है कि स्त्री के कदम घर से बाहर पड़े तो हाथ नहीं लग सकती, इसी कारण उन्होंने कुरान का नाम लेकर लड़कियों पर बंधन डाले हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने ‘शिगाफ़’ उपन्यास की कथावस्तु में ऐसे संदर्भ प्रस्तुत किए हैं जो पाकिस्तान एवं कश्मीर के सैनिक अधिकारियों, सैनिकों की नैतिकता का भंडाफोड़ करके उनके अनैतिक कर्म को समाज के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं। लड़कियों और जवान औरतों को ब्लैकमेल किया गया,उन्हें राजनेताओं ने नौकरी के बहाने तथा पुलिसवालों से पूछताछ करने के बहाने ब्लैकमेल किया तथा उनके ऊपर अत्याचार किए गए। कश्मीर में मर्द बीवी को तलाक देते हैं। इसी विषय में शिगाफ़ की पात्र नसीम कहती है कि, ‘‘क्या बताऊँ, तलाक के बाद कश्मीरी मर्द के लिए मन फट गया था। ये कश्मीरी मर्द यूँ तो सीधा और गुस्सैल होता है मगर शादी के बहुत जल्दी बाद ही इनकी मोहब्बत खत्म हो जाती है। बचता है, बच्चा और औरत।’’12 कश्मीर में अनेकानेक कारणों से विवाह विच्छेद या तलाक होते हैं। तलाकशुदा युवती अन्य स्थानों पर अपना जीवन-साथी ढूँढने का प्रयास करती है।
शिगाफ़ उपन्यास में कश्मीर की उस औरत की सच्चाई है जिसका शौहर चंद रोज पहले घर से आतंकियों द्वारा ले जाया गया था, लेकिन आज तक वापस नहीं आया। ये कहानी है कश्मीर की हर एक विधवा की है जिसकी आँखों का दर्द इंतजार में सुखकर सुर्ख हो गया है। ये औरतें अपने बच्चों के साथ एक कमरे में किसी तरह गुजर-बसर कर रही हैं। ‘‘हमारा हर दिन नई समस्याओं को जन्म देते हुए उगता है। कश्मीर में हर दिन विधवाओं की नई फसल हो जाती है। फौज और उग्रवादियों ने मिल-जुल कर ग्यारह हजार जवान विधवाओं की फसल तैयार की है, जिसे न समाज से कोई आसरा है न सरकार से। वे अपने ओंठ सिये घातक मानसिक रोगों का शिकार होती जा रहीं हैं।’’13 विधवाओं की समस्याओं पर सरकार भी कुछ ध्यान नहीं देती। समाज भी उन्हें सहारा देने से इंकार कर देता है। कश्मीर में औरतों को बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ता है हर वक्त हो रहे आतंकवादी हमलों के कारण सरकार कोई नागरी सुविधा नहीं दे रही है। इसी कारण औरतों को सब काम करने पड़ते हैं।
दुनिया के किसी भी हिस्से में जब भी दो देशों के बीच युद्ध हुआ या दो धर्मों के बीच संघर्ष या सांप्रदायिक दंगे हुए, उनमें सबसे अधिक यातना स्त्रियाँ को सहनी पड़ी। हर युद्ध की विभीषिका स्त्रियों को सबसे अधिक सहनी पड़ती है। इराक और सीरिया में महिलाओं के साथ जिस बर्बरता का व्यवहार हुआ वह मानवता को शर्मसार कर देनी वाली है। इसी अमानवीयता का शिकार कश्मीर की स्त्रियाँ हुई हैं। जिहादी जिसकी लड़की से विवाह करना चाहते हैं उसके दरवाजे पर मेहंदी का पैकेट रखते हैं। वे कभी भी हिन्दुओं और मुसलमानों के घरों में अपना अड्डा जमा लेते हैं तथा उन्हीं की बहू-बेटियों के साथ मनमानी करते हैं। अमिता के साथ ब्लॉग से जुड़ी एक मुस्लिम स्त्री अपने जीवन से जुड़े एक भयानक हादसे के बारे में बताती है वह बोलती है “एसिड से जली श्रीनगर की एक कॉलेज जाने वाली लड़की की जो अब भी मिलिटरी अस्पताल में मौत से जूझ रही है। अब पूरे कश्मीर में ही लड़कियों के लिए कट्टरपंथियों ने बुरके की आखिरी तारीख तय कर दी है। इसके बाद बुरका या एसिड।”14 दहशत के कारण औरते घर से बाहर नहीं निकलती उनका बौद्धिक विकास रूक गया। डर में लगातार जीने के कारण कश्मीर की औरतें अब अंदर से पूरी तरह टूट चुकी हैं। वे अपने आत्मसम्मान को बचाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रही हैं। वे अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहती हैं और अपने विचारों और भावनाओं को खुलकर ज़ाहिर करना चाहती हैं। ऐसा नहीं है कि कश्मीरी औरतों को डर से चुप करा दिया गया है; वे भी अपनी समस्याओं को दूसरों के सामने रखना चाहती हैं और अपने विकास के लिए कोशिश करना चाहती हैं। लेकिन, कश्मीर में छोटी सोच वाले लोगों और कट्टरपंथियों की वजह से अशांति और हिंसा का माहौल है, और इसका सबसे ज़्यादा असर औरतों पर पड़ रहा है।
1947 ई. में जब देश का विभाजन हुआ तब देश में कई जगहों पर सांप्रदायिक दंगे हुए। परंतु कश्मीरी समाज ने उस समय भी भारतवर्ष के सामने एकता का परिचय दिया। यहाँ के लोग, हताशा और निराशा की उस घड़ी में एक दूसरे के मददगार बने। देश को आजादी मिलने के बाद कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित कबाइलियों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। ये कबाइली भले ही मुसलमान थे परंतु वादी के मुसलमानों ने उनका साथ न देकर हिन्दुओं के साथ मिलकर उनका विरोध किया और अपनी कश्मीरियत का परिचय दिया। राजेंद्र सिंह जैसे हिन्दुओं के साथ मकबूल शेरवानी जैसे मुसलमानों ने भी वादी को उस संकट से बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। चन्द्रकान्ता अपने उपन्यास 'कथा सतीसर' में ताता के माध्यम से लिखती हैं "उस कठिन समय में राजेंद्र सिंह ने राजा को वचन दिया कि मेरी लाश से गुजरकर ही दुश्मन आगे बढ़ेगा। तब उनका इशारा बारामूला के मकबूल शेरवानी जैसे सपूतों की तरफ होता है, जिसे कबाइलियों ने शहर के बीच खम्बे से बांधा, ईशा मसीह की तरह ! माथे पर कील ठोकी। इसलिए की वह हिन्दू-मुस्लिम में भेदभाव के ख़िलाफ था। भाईचारे में विश्वास करता था।"15 परंतु सांप्रदायिकता की आग धीरे-धीरे घाटी में फैलने लगी थी। 1980 के दशक में कश्मीर में जगह-जगह सांप्रदायिक घटनाओं को अंजाम दिया जाने लगा तथा देखते ही देखते कश्मीर घाटी सांप्रदायिक आतंकवाद की आग में झुलसने लगी। इस सांप्रदायिक आतंकवाद की आग ने सदियों से सांझी संस्कृति में रची-बसी कश्मीरी आवाम के विश्वासों को तार-तार कर दिया, जब सांप्रदायिक उन्माद में वर्षो से साथ रह रहे पड़ोसियों ने अल्पसंख्यकों पर धावा बोल दिया।
संजना कौल का 'पाषाण युग' उपन्यास भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें कश्मीर की जनता पर कहर ढाने वाले आतंकवादियों की गतिविधियों को केंद्र में रखकर मानवमूल्यों के विघटन को चित्रित किया गया यह एक ऐसे पिता (बृजमोहन)-पुत्री (अंजलि) की कहानी है जो कश्मीर में गोलियाँ चलने और बम धमाकों के बीच अपनी मिट्टी और परम्पराओं के गहरे आकर्षण बांधे हुए हैं। जो अन्य अनेक कश्मीरी हिन्दुओं की तरह अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर जाने या न जाने की पसोपेश में हैं। इस उपन्यास में स्त्री पात्रों की बहुलता है। मुख्य चरित्र अंजलि और नसीम का है। नसीम एक ऐसी पात्र है जो हमें चन्द्रकान्ता का उपन्यास 'कथा सतीसर' मनीषा कुलश्रेष्ठ का 'शिगाफ़' और संजना कौल का 'पाषाण युग' तीनों उपन्यासों में सशक्त स्त्री के रूप में दिखाई पड़ती है। जो अपनी अस्तित्व की लड़ाई स्वंय लड़ती है। गलत सही में फर्क करते हुए गलत के प्रति मुखर रूप से अपने विचारों को प्रकट करती है। कश्मीर की लडकियों में इस कदर डर का माहौल भर दिया गया है कि वो “भारतद्रोह और धार्मिक आतंकवाद के प्रोपेगेंडा से भरपूर एक पतली-सी किताब। किताब के आखिर में मुसलमान लड़कियों और औरतों को पर्दे में रहने की कड़ी हिदायत, हिन्दू लड़कियों को बिंदी लगाने की ताकीद और सिख औरतों से कड़ा पहनने और परांदा इस्तेमाल करने का इसरार।”16 इस प्रकार से देखा जाये तो कश्मीर में स्त्रियों को कपड़े पहनने की भी आज़ादी नहीं हैं।
निष्कर्ष : कश्मीर केन्द्रित हिन्दी उपन्यास आतंकवाद को मानवीय त्रासदी के रूप में चित्रित करते हैं, जहाँ स्त्री जीवन सबसे अधिक प्रभावित होता है– शारीरिक हिंसा से लेकर मनोवैज्ञानिक ट्रामा तक, ये शोध कार्य सामाजिक चेतना जागृत करता हैं, स्त्रियाँ पीड़ित से प्रतिरोधी बनकर उभरती हैं। यह अध्ययन हिंदी साहित्य को स्त्रीवादी दृष्टिकोण से जोड़ता है और कश्मीर संकट के अनदेखे पक्षों को उजागर करता है। आतंकवाद ने महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है।
संदर्भ :
1.चन्द्रकान्ता : कथा सतीसर, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2013, पृ. 213
2. वही, पृ. 479
3. वही, पृ. 528
4 चंद्रकांता : ऐलान गली ज़िंदा है, पृ. 20
5. क्षमा कौल : दर्दपुर, ज्योतिपर्व प्रकाशन, गाज़ियाबाद, पृ. 199
6. रवीन्द्र प्रभात : कश्मीर 370 किलोमीटर, प्रथम संस्करण : 2019, प्रकाशक : एक्सप्रेस पब्लिशिंग वाया नोशन प्रेस, चेन्नई -600031, पृ. 37
7 . जयश्री राय : इक़बाल, आधार प्रकाशन, पंचकुला हरियाणा, संस्करण: 2014, पृ. 81
8 . वही पृ. 81
9 . जयश्री पवार : कश्मीरी समाज विस्थापन और समस्याएँ (शिगाफ़ उपन्यास के संदर्भ में), चिंतन प्रकाशन, कानपुर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 30
10. मनीषा कुलश्रेष्ठ : शिगाफ़, राजकमल प्रकाशन,नवीन शाहदरा, दिल्ली-32, संस्करण 2012, पृ. 198
11. वही, पृ. 134
12. वही, पृ. 76
13. वही, पृ. 86
14. मनीषा कुलश्रेष्ठ : शिगाफ़, राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, 2012, पृ. 98
15. चन्द्रकान्ता : कथा सतीसर, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2013, पृ. 462-463
16. संजना कौल : पाषाण युग, आधार प्रकाशन पंचकूला, हरियाणा, संस्करण:2003, पृ. 23
प्रतिभा
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, कला संकाय, दयालबाग इंस्टीट्यूट , दयालबाग, आगरा
नमस्या
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कला संकाय, दयालबाग इंस्टीट्यूट , दयालबाग, आगरा
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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