भक्ति की वैराग्य एवं रसिकवैरागी पद्धति - संत स्वरूपा स्त्री की भूमिका एवं सहभागिता
- सुरेन्द्र कुमार
शोध-सार : यह शोध भारत में भक्ति, वैराग्य तथा रसक-वैरागी परंपरा में महिला स्वरूप की भागीदारी और भूमिका का ऐतिहासिक एवं वैचारिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि वैराग्य और रसक-वैरागी पद्धति का प्रसार एक असंरचित सामाजिक-आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में हुआ, जिसने भक्ति को एक रचनात्मक अंतरदृष्टि प्रदान की। इस असंरचित प्रक्रिया का तात्पर्य यह है कि भक्ति का आधार कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मानुभूति और भीतर से थोपे गए सामाजिक-धार्मिक पहचान से मुक्ति की आकांक्षा है। इस परंपरा में ‘हस्ती को मिटाकर निज की खोज’ करना, अस्तित्व और पहचान के पारंपरिक ढाँचों का निषेध करने की प्रक्रिया बन जाती है। वैराग्य और रसक-वैरागी पद्धति में मार्गदर्शन गुरु के माध्यम से होता है, जहाँ ईश्वर का अस्तित्व ‘गुण’ में निहित माना जाता है, और अंततः गुरु और ईश्वर एक ही ज्योति के रूप में अनुभव किए जाते । इस संदर्भ में महिला संतों की भागीदारी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने वैराग्य को केवल साधना नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति और आत्मसाक्षात्कार के साधन के रूप में देखा। यह शोध भक्ति परंपरा में स्थापित वैचारिक प्रतिमानों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए, वैराग्य और रसक-वैरागी परंपरा में महिला स्वरूप की उपस्थिति, विचारधारा, और सामाजिक-दार्शनिक भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
बीज शब्द : वैरागी, रसिक-वैरागी परंपरा, सामुदायिक चेतना, भक्ति, स्त्री संत, सगुण, निर्गुण, स्त्री अवधूत, आत्मज्ञान, आध्यात्म ।
मूल आलेख : दक्कन क्षेत्र में सातवीं शताब्दी के आसपास उत्पन्न जनचेतना को हम आलवार और नयनार आंदोलन के रूप में जान सकते हैं। आने वाली शताब्दियों में यह चेतना क्रमशः कर्नाटक, महाराष्ट्र, और उत्तर भारत तक प्रसारित हुई। इसका केन्द्रीय आधार भक्ति थी, जिसके कारण विद्वानों ने इसे “भक्ति आंदोलन” की संज्ञा दी। इस आंदोलन की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसने प्राचीन रूढ़िवादी धार्मिक धारणाओं और कर्मकांडों को चुनौती दी तथा आध्यात्मिकता को जन-लोक कथाओं और लोकभाषाओं के माध्यम से समाज तक पहुँचाया।
श्रीमद्भगवद्गीता में “वैराग्य” शब्द का प्रयोग मन की विषयवृत्तियों के नियंत्रण के लिए हुआ है। अर्जुन जब कहता है -
“चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।” (गीता 6.34)
तब श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं -
“अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।” (गीता 6.35)
यहाँ वैराग्य का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि विषय-वासना से विमुख होकर मन की एकाग्रता से है। प्राचीन परंपरा में “वैराग्य” का तात्पर्य गृहस्थ जीवन का त्याग और मठीय या संन्यासी जीवन अपनाने से था। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थों में मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग संन्यास से होकर जाता था। भक्ति संतों ने वैराग्य को आंतरिक अनुशासन और भावनात्मक एकाग्रता के रूप में पुनर्परिभाषित किया जहाँ गृहत्याग की आवश्यकता नहीं, बल्कि ईश्वर-चेतना में लीन होना ही मुक्ति का मार्ग माना गया। इस वैचारिक पुनर्निर्माण का एक विकसित रूप “रसिक वैराग्य” की अवधारणा के रूप में सामने आता है, जिसका उल्लेख गुरु ग्रंथ साहिब में मिलता है—
“रसिक वैरागी सदा रंग राते हरि रस भोगे।”
यहाँ “रसिक वैरागी” वह है जो सांसारिक जीवन का त्याग किए बिना ही ईश्वर-रस में डूबा रहता है। यह भक्ति का वह चरण है जहाँ वैराग्य का अर्थ संन्यास नहीं, बल्कि आत्मा की ईश्वर के प्रति निरंतर लीनता है। “रसिक वैराग्य” ने आध्यात्मिकता को लोकतांत्रिक बनाते हुए यह प्रतिपादित किया कि ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुला है, बशर्ते वह अपने कर्म, श्रद्धा और आत्मानुभूति के माध्यम से ईश्वर में लीन होने की क्षमता विकसित करे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :
भारत के मध्यकालीन सामाजिक और धार्मिक इतिहास में भक्ति आंदोलन एक गहन वैचारिक एवं सांस्कृतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया के रूप में उभरा। 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर 16वीं शताब्दी तक फैले इस आंदोलन ने भारतीय समाज की पारंपरिक संरचनाओं विशेषतः जाति, लिंग और धार्मिक पदानुक्रम को गहराई से प्रभावित किया (Sharma, 2005; Lorenzen, 1995)। । इस प्रकार, भक्ति आंदोलन ने स्त्रियों को धर्म और समाज के बीच एक वैकल्पिक सांस्कृतिक जगह प्रदान की, जहाँ वे परंपरा से संवाद करती हुई अपनी आध्यात्मिक स्वायत्तता का मार्ग तलाशती हैं। (Hawley, 2015) वहीं जॉर्ज ग्रियर्सन (1909) ने भक्ति को केवल धार्मिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि एक धर्म, पंथ और सिद्धांत के रूप में देखने का प्रयास किया। मध्यकालीन भारत में यह आंदोलन सगुण भक्ति (रूपात्मक ईश्वर की उपासना) और निर्गुण भक्ति (निराकार ईश्वर की साधना) दोनों धाराओं में विकसित हुआ, किंतु औपनिवेशिक कालीन प्राच्यविद्याविदों की रुचि मुख्यतः सगुण परंपरा तक सीमित रही (Lorenzen, 1995; Hawley, 2015)। सिंथिया टैलबोट (2001) और कार्ला सिनोपोली (2003) ने यह दिखाया है कि 1350 से 1650 ई. के बीच मंदिर दान और शाही संरक्षण ने भक्ति परंपरा के सामाजिक-आर्थिक आधार को सुदृढ़ किया और इसे साम्राज्यवादी राजनीति से भी जोड़ा। भक्ति आंदोलन के अध्ययन में महिलाओं की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित करना आवश्यक है। यद्यपि ऐतिहासिक अभिलेख अक्सर पुरुष-प्रधान और अभिजात्य रहे (Pandey, 2010)।
हालाँकि प्रारंभिक चरणों में भक्ति का यह विचार मुख्यतः पुरुष संतों के अनुभवों तक सीमित था, परन्तु समय के साथ इसने महिलाओं के लिए भी आध्यात्मिक और सामाजिक आत्मचिंतन का द्वार खोला। भक्ति, वैराग्य और रसक-वैरागी परंपरा का संगम है जो भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के उस स्वरूप को उद्घाटित करता है, जिसमें आत्मा और ईश्वर के मध्य किसी कर्मकांडीय माध्यम की अपेक्षा नहीं रखी गई, बल्कि आत्मानुभूति और अस्तित्व के सत्य की खोज को प्रधानता दी गई। इस संदर्भ में, तीन प्रमुख महिला संतों कर्नाटक की अक्का महादेवी (12वीं शताब्दी), कश्मीर की लाल देद (लल्लेश्वरी) (14वीं शताब्दी), और राजस्थान की मीराबाई (16वीं शताब्दी) के दर्शन और साधना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये तीनों संत अपने-अपने सांस्कृतिक और धार्मिक परिवेश में “नग्न संत परंपरा” से सम्बद्ध हैं, जो आत्मबोध, देह-स्वातंत्र्य और सामाजिक बंधनों के विरुद्ध आध्यात्मिक प्रतिरोध का प्रतीक बनती है। भक्ति आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल उनके व्यक्तिगत आत्मबोध को आकार दिया, बल्कि सामाजिक बंधनों से मुक्ति की दिशा में भी वैचारिक चेतना का निर्माण किया (Chaudhuri, 1993; Chakravarti, 1998)।
गेल ऑम्वेट के शब्दों में, “भक्ति महिलाओं के लिए बेगमपुरा का मार्ग है — एक वैकल्पिक सांस्कृतिक संसार, जहाँ वे अपनी आवाज़, अपने श्रम और अपने ईश्वर को स्वयं चुन सकती हैं” (Omvedt 2008: 61)। “बेगमपुरा” की अवधारणा संत रैदास ने परिकल्पित किया, केवल एक सामाजिक यूटोपिया नहीं है, बल्कि वह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मुक्ति का नगर है, जहाँ किसी प्रकार का दुःख, भेद या अन्याय नहीं है। गेल ऑम्वेट ने अपनी पुस्तक ‘Seeking Begumpura’ में स्पष्ट किया है कि भक्ति आंदोलन के संतों ने केवल धार्मिक सुधार नहीं किया, बल्कि वे एक वैकल्पिक सामाजिक संस्कृति का निर्माण कर रहे थे एक ऐसी संस्कृति जो जाति, लिंग और श्रम के भेदों से मुक्त थी (Omvedt 2008: 23)।
इस परंपरा में अक्का महादेवी और लाल देद (लल्लेश्वरी) ने अपने-अपने सामाजिक संदर्भों में आत्मबोध, देह-स्वातंत्र्य और सामाजिक निषेधों के प्रतिरोध को भक्ति का अभिन्न अंग बनाया। ये दोनों संत उस वैराग्य और रसक-वैरागी परंपरा की जीवंत प्रतिमाएँ हैं, जिसके केंद्र में आत्मानुभूति और सामाजिक अस्वीकार का द्वंद्व निहित है वही द्वंद्व जिसे इस शोध के सारांश में “हस्ती को मिटाकर निज की खोज” की असंरचित आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है।
उनकी वाणी —
“मेरी सास माया है, ससुर संसार है, और पति की प्रवृत्ति सांसारिक स्त्रियों में रमी हुई है... मैं इस बंधन को धोखा देकर अपने वास्तविक स्वामी—शिव से मिलूँगी।”(Ramanujan, 1985: 141)
यह उद्घोष भारतीय परंपरा के उस वैवाहिक अनुशासन को चुनौती देता है जिसमें स्त्री से अपने पति को ‘देवता’ मानने की अपेक्षा की जाती है। अक्का महादेवी के लिए ईश्वर ही एकमात्र पति है, इसी प्रकार, लाल देद ने 14वीं शताब्दी के कश्मीर में शैव और सूफी परंपराओं के संगम के मध्य अपनी वाणी और साधना के माध्यम से पितृसत्तात्मक नियंत्रण और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिरोध को आकार दिया (Kaul, 1973; Hoskote, 2011)। किंवदंतियों में वर्णित उनके जीवन के प्रसंग जैसे सास द्वारा प्रताड़ना, ताने और अपमान इस बात को रेखांकित करते हैं कि उनकी साधना सामाजिक यातना के प्रतिरोध से जन्मी थी (Parimoo, 1978: 10)। उनके एक वाख में वे कहती हैं —
“वे बड़ी भेड़ या कोमल मेमने को मार सकते हैं, लेकिन लल्ला को उसका पत्थर का टुकड़ा तो मिलेगा ही।”
यह पंक्ति उनके आत्मसंघर्ष और समाज के प्रति व्यंग्यपूर्ण दृष्टि दोनों को व्यक्त करती है। उनका यह कथन
“मैंने न तो बच्चे को जन्म दिया और न ही कैद में रही” (Kaul & Parimoo, 1978: 11)
स्त्री की उस सामाजिक पहचान का अस्वीकार है जिसमें मातृत्व और अधीनता को स्त्रीत्व का मापदंड माना जाता था। लाल देद के कथनों में दार्शनिक स्वीकृति और प्रतिरोध का द्वंद्व निहित है वे दुख को भी जीवन का आवश्यक अनुभव मानती हैं:
“जैसे बिजली और वज्रपात को सहना पड़ता है, वैसे ही मुझे भी घने अंधकार का सामना करना होगा।” (Kaul & Parimoo, 1978: 13)।
इन दोनों स्त्री संतों की साधना इस तथ्य की पुष्टि करती है कि भक्ति आंदोलन केवल धार्मिक प्रवाह नहीं था, बल्कि यह एक दार्शनिक और सामाजिक विमर्श था, जिसने स्त्रियों को आत्म-अभिव्यक्ति और वैचारिक प्रतिरोध का वैकल्पिक मंच प्रदान किया (Narayanan, 1999; Lorenzen, 1995)। लाल देद के वाख शैव दर्शन को जीवनानुभव और आत्मानुभूति से जोड़ते हैं। दूसरी ओर, अक्का महादेवी की नग्न तपस्या और शिव के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण भक्ति को वैराग्य और आत्म-एकत्व के स्तर पर पुनर्परिभाषित करते हैं। (Ramaswamy, 1996)। अब अगर बात अजनेश्वर जी महाराज (अजनेश्वरी जी) की संत परंपरा की अवधारणा, साधना और दर्शन पर की जाए तो उन्होंने आधुनिक भारतीय समाज में “स्त्री अस्तित्व” की वैचारिकी को पुनर्परिभाषित किया ।
संत अजनेश्वर जी :
राजस्थान की संत अजनेश्वर जी महाराज का जन्म लगभग 125 वर्ष पूर्व जोधपुर जिले में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्रीराम और माता हरकुबाई गहन धार्मिक भावनाओं से संपन्न थे। किंवदंती है कि मात्र चार वर्ष की आयु में ही वे ईश्वर-भक्ति में लीन हो जाती थीं और प्रायः जोधपुर के श्री कुंज बिहारीजी मंदिर में नियमित रूप से दर्शन के लिए जाया करती थीं (Smriti Granth Mala, Ajneshwar Dham, n.d.)। दस वर्ष की आयु में उनका विवाह श्री रामबक्सजी से हुआ, जो पूजनीय देविदान जी महाराज के बड़े भाई थे। किंतु विवाह उनके तपस्वी स्वभाव को परिवर्तित न कर सका। वे संसार को क्षणभंगुर मानते हुए निरंतर ईश्वर की साधना में प्रवृत्त रहीं। इसी समय उनके पिता ने भी संन्यास ग्रहण किया, जिससे उनका वैराग्य और गहरा हुआ। परिणामस्वरूप, मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास का मार्ग अपनाया। संन्यास की औपचारिक दीक्षा उन्हें उनके पिता गुरु श्रीरामजी महाराज से प्राप्त हुई। उन्होंने ‘ॐ’ का पवित्र मंत्र उन्हें प्रदान किया, जिसे वे जीवनभर साधना का केंद्र मानती रहीं। दीक्षा के उपरांत उन्होंने द्वारका, जगदीश मंदिर और रामेश्वर महादेव जैसे पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा पैदल की। कठोर तपस्या के लिए वे चौरासी आसनों और नेती-धोती साधना का नियमित अभ्यास करती थीं। ‘ॐ’ के जाप में वे इतनी तल्लीन होतीं कि बाहरी संसार से पूर्णतः अनभिज्ञ हो जाती थीं। उनकी तपस्या का एक अनूठा पहलू यह था कि उन्होंने लगातार बारह वर्षों तक मौनव्रत रखा और प्रत्येक क्षण को परब्रह्म चिंतन के लिए समर्पित किया (Smriti Granth Mala, Ajneshwar Dham, n.d)। जो वैराग्य की परंपरा में मुक्ति की सबसे उच्च अवस्था मानी जाती है जब सुखनंदन बाग में उनके शिष्यों और भक्तों की संख्या बढ़ने लगी, तो उन्होंने भीड़ से दूर होकर पहाड़ियों की एकांतता में अपनी साधना जारी रखी। उनके अनुसार, निरंतर ‘ॐ’ का जाप सभी मानसिक विकारों को नष्ट कर आत्मा को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकता है। इस भाव को उन्होंने अपने पदों में इस प्रकार अभिव्यक्त किया:
“ओंकार निज नाम है, सब नावों का मोड़।
ओम ओम हिरदे रटो, मिटे इन्द्रिया मन की खोड।।
ओउंकार कु सिंवरले, भजले सांसो स्वास।
भवजल की फांसी कटे, मिटे यम की त्रास।।
असंख्य नाम नारायण तिहरा। सब ही नाम मांक है प्यारा।
ओम नाम की बलिहारी जाऊँ। मैं ओम नाम को शीश निवाऊँ।। ”
उनकी आराधना में पिता श्रीरामजी महाराज का विशेष स्थान रहा। वे उन्हें जीवन का मार्गदर्शक और रक्षक मानती थीं, जैसा उनके एक पद में व्यक्त हुआ है:
“करणाहार करतार हो श्रीराम महाराज। तुम्हरे थकां मैं नचीत हूं रखियो शरण पड़े की लाज।।”
आगे ही रक्षा आप करो पीछे रक्षक आप। अब ही रक्षा आप करो मेरे तुम ही साई बाप।।
मैं कछु नहीं मेरा कोई नाहीं तुम्हीं हो श्रीराम गुसांई।”
उनकी जीवनी का उल्लेख अजनेश्वर धाम में संरक्षित ‘स्मृति ग्रंथ माला’ में मिलता है, जो उनके संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है। इस धाम की विशेषता यह है कि इसे महिलाओं द्वारा संचालित किया जाता है और सूर्यास्त के बाद पुरुषों का प्रवेश निषिद्ध है। इस नियम ने इसे स्त्रियों के लिए एक विशेष आध्यात्मिक स्थल बना दिया, क्योंकि यह उन्हें केंद्र में रखकर निर्मित किया गया था (Smriti Granth Mala, Ajneshwar Dham, n.d.; Narayanan, 1999) ।
यह चित्र अज्ञनेश्वर जी महाराज की उस छवि को प्रकट करता है, जिसमें वे एक अवधूत के रूप में दिखाई देती हैं ऐसा साधक जो सांसारिक बंधनों और लौकिक नियमों से परे जाकर आत्मबोध की अवस्था प्राप्त कर चुका हो। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के इतिहास के आधुनिक काल में अज्ञनेश्वर जी महाराज जी को अवधूत जी संज्ञा दी गई। यह छायाचित्र मौखिक परंपराओं में वर्णित उन कथाओं की साक्षी है, जिनमें स्त्री अवधूताओं के नग्न स्वरूप का उल्लेख मिलता है। यह नग्न स्वरूप सामाजिक मान्यताओं से विद्रोह नहीं, बल्कि आत्मज्ञान और ईश्वर के साथ पूर्ण एकत्व का प्रतीक है। भारतीय संत परंपरा में अवधूत शब्द उन महायोगियों के लिए प्रयोग होता है यह अवस्था साधारण सामाजिक जीवन से अलग, पूर्ण आत्मज्ञान और मुक्ति की स्थिति को दर्शाती है (White, 1996)। इन तीनों स्त्री संतों ने, रैदास की “बेगमपुरा” की अवधारणा की तरह, एक ऐसे समाज का स्वप्न देखा जहाँ स्त्री देह को पाप नहीं, बल्कि साधना का माध्यम माना जाए; जहाँ आत्मबोध को धर्म से अधिक महत्व मिले; और जहाँ समाज की परिभाषा ब्राह्मणवादी नियमों से नहीं, बल्कि समानता, प्रेम और मुक्ति से तय हो। भक्ति आंदोलन का यह स्वरूप भारतीय संस्कृति के लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण की आधारशिला बना । अक्का महादेवी के ‘शिव’ से संवाद, लाल देद का ‘शून्य’ के प्रति आत्म-समर्पण और अजनेश्वर जी का ‘ॐ’ के प्रति समर्पण उनके रसिक वैरागी होने का प्रतीत है। उनका यह अनुभव स्वायत्त आध्यात्मिक और “बेगमपुरा” की उस अवधारणा से मेल खाता है जहाँ हर व्यक्ति चाहे वह जाति, लिंग या वर्ग किसी भी श्रेणी से जुड़ा हो ईश्वर और आत्मा के साथ सीधे संवाद कर सकता है।
इस प्रकार, नीचे दिया छायाचित्र भारतीय स्त्री अवधूत परंपरा की निरंतरता का द्योतक भी है। यह दर्शाता है कि भारतीय संत परंपरा में स्त्रियाँ भी गहनता से आध्यात्मिक स्वतंत्रता, आत्म-अभिव्यक्ति और सामुदायिक सौहार्द का प्रतीक बन सकती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने भक्ति के माध्यम से केवल आत्मबोध या देह-मुक्ति का मार्ग नहीं सुझाया, बल्कि स्त्री उद्धार की सामुदायिक चेतना को जन्म दिया। ऐसा इसलिए माना जा सकता है की उन्होंने भक्ति आंदोलन और उसके अंतर्गत स्त्रियों की आध्यात्मिक साधना को “बेगमपुरा” की खोज के रूप में देखा, यह केवल एक आध्यात्मिक या धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक क्रांति है , जहाँ भक्ति मुक्ति का साधन है, और मुक्ति संस्कृति का पुनर्जन्म लेकिन इसने भक्ति की नई अवधारणा को जन्म दिया जहाँ भक्ति के रस को यदि नाम जपने से देखा जाए तो यह उनके लिए रसिक वैराग्य जैसा था और यदि गृह त्याग की बात की जाए तो उनके लिए यह भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय था। इस प्रकार, वैराग्य और रसक-वैरागी पद्धति केवल साधना का मार्ग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और आध्यात्मिक समानता की दिशा में एक क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में उभरती है। महिला संतों की यह परंपरा भारतीय भक्ति आंदोलन में स्त्री स्वरूप की भागीदारी को न केवल ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भक्ति के माध्यम से स्त्री ने आत्म-साक्षात्कार और सामाजिक न्याय दोनों की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
फोटो: अज्ञनेश्वर आश्रम, जोधपुर
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- आर. होस्कोटे(2011). आई, लल्ला: द पोएम्स ऑफ लल डेड. पेंगुइन बुक्स।
- विजया रामास्वामी, डिवाइन डोमेस्टिसिटी: विमेन, रिलिजन एंड भक्ति इन मीडीवल साउथ इंडिया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1996।
सुरेन्द्र कुमार
एसोसिएट प्रोफेसर , इतिहास विभाग, दिली विश्वविद्यालय
skumar2@history.du.ac.in, 9013463158
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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