राजकुमार कुम्भज की बारह कविताएँ
1. बदलता सच
थोड़ा प्यार भेजना
भेजना थोड़ा बहुत धिक्कार भी
भेजना मुझे थोड़ा संस्कार भी
जो कुछ भी
थोड़ा बहुत करना था,
कर नहीं सका
उससे कुछ थोड़ा बहुत
मरना था,
मर नहीं सका
चुग़लख़ोर बनना था,
बन नहीं सका
कहीं तो झुकना था,
झुक नहीं सका
फूल नहीं उठाना था
दिखाना था जूता नालदार,
दिखा नहीं सका
समझ नहीं पा रहा हूँ
कि किसे भेजूँ लानत?
दुर्बलताएँ घेरती हैं फिर-फिर
फिर-फिर कुरेदती हैं आत्मा
भरती हैं, भरती हैं
आत्म-ग्लानी से भरती हैं मुझे
करूँ क्या, करूँ क्या ?
कि टूटें काराएँ सबकी सब
समझना चाहता हूँ फिर-फिर
और फिर-फिर उलझना चाहता हूँ लहर-लहर
तमाम-तमाम उलझनों से
शायद इसी जनम, इसी जनम
देखता हूँ, देखता हूँ फिर-फिर
जीवन और कविता का
नये सिरे से
बदल रहा है भाषा-विज्ञान
बदल रहा है सच
2. क्या छुपाते हैं वे?
ये मत बताओ मुझे
कि क्या बताते हैं, क्या समझाते हैं
दरअसल वे मुझे ?
अगर बताना ही चाहते हो कुछ
तो सिर्फ़ इतना भर बता दो
कि मुझसे-तुमसे निरंतर-निरंतर
क्या छुपाते हैं वे?
3. जब सब कुछ हार जाऊॅंगा
जब सब कुछ हार जाऊॅंगा
तब भी हरहाल सुरक्षित रहेगी कविता
मैं ठहाका लगाऊॅंगा
और मेरी कमीज़ में जेब नहीं होगी
इठलाता ग़ुलाब झर जाएगा,
बाढ़ में बह जाएगा घर
बचा-खुचा उधार भी चुका नहीं पाऊॅंगा
महाजन देखता ही रह जाएगा बहीखाता
और मैं दिखाते हुए ठेंगा निकल जाऊॅंगा
दूर कहीं बहुत-बहुत दूर
क्या कभी कोई पुकारेगा मुझे भी
बख़त-ए-फ़ुरसत में?
4. रंगहीन चेहरों की भीड़ में
रंगहीन चेहरों की भीड़ में
आईने ढ़ो रहे हैं राज-सिंहासन
पालकियों में लदी हैं नर्तकियों की सेना
बीड़ी फूँक रहे हैं बूढ़े सैनिक
हवाईजहाज़ फेंक रहे हैं रोटियाँ और पानी
आसमान से फेंक रहे हैं फिर-फिर
रोटियों में नमक और नमक में स्वाद नहीं है
और कम से कमतर है नल में जल
है एक उम्मीद फिर भी और फिर भी
कि लोहा जो अभी तपता है आग में यहीं
बनेगा ज़रूर बनेगा औज़ार एक दिन
ज़रूरी औज़ार।
4. बारिश है, धूप नहीं है
सूनी हैं सड़कें
बारिश है, धूप नहीं है
प्रार्थनाओं से सराबोर हैं लोग
ढूँढ रहे हैं सूखी लकड़ियाँ आग के लिए
सूने हैं चूल्हे, सूनी हैं गलियाँ आदि
भौंक रहे हैं कुत्ते, जंजीरों में बॅंधे-बॅंधे
ढोल-ताशे नहीं, झंडे-डंडे नहीं,
हैं ज्ञानी-ध्यानी जो भी,जितने भी
देख रहे हैं सूनी हथेलियाँ और कनपटियाँ
अपने-अपने अपराध याद करते हुए
अपनी ही बस्ती, अपने ही मुलुक में
दिन-रात के अंधरे-उजालों में
प्रेम पूर्वक करते हुए गलबहियाँ
कि किस-किसको, कब-कब, कहाँ-कहाँ
इसलिए-किसलिए दिया नहीं धोखा
और कितना-कितना भरपूर?
समझ ही नहीं पा रहे हैं, समझदार हैं वे जो
और पी रहे हैं गाँजा-शराब
जब नशा नहीं शराब में, गाँजें में
तो दे दनादन, दे दनादन
भरपूर बक रहे हैं गालियाँ गांधी इत्यादि को
और नहीं ज़रा भी नहीं सरकार को
बारिश है, धूप नहीं है
सूनी हैं सड़कें।
6. लेकिन जब होता हूँ शामिल
जिस तरह लिपटती है लौ से लौ
कुछ-कुछ, वैसे-वैसे ही लिपटता हूँ मैं भी
पानी में, पानी से, पानी लिपटता है जैसे
हरे में हरे और लाल में लाल की तरह
अपनी ज़िदें, अपनी संभावनाएँ छोड़ते हुए
तोड़ते हुए तटबंध, मतबंध सभी
जोड़ते हुए पत्ता-पत्ता, पोर-पोर सुनते हुए ध्वनियाँ समर-सम नई भोर की
और आकांक्षाएँ तमाम-तमाम वे भी, वे भी
जिनमें जड़ताएँ गहरी-गहरी परदेदार
संभव नहीं था कुछ भी संभव जैसा
और कुछ होने से पहले कुछ होने जैसा
लेकिन जब होता हूँ शामिल
लिपटती लौ में लौ जैसा
तो होता हूँ लौ।
7. ज़िम्मेदारी से बचना।
ज़िम्मेदारी से बचना
और रचना रंग-बिरंगी दुनिया
सिर्फ़ ख़ुद के लिए
हो सकता हो शायद मुफ़ीद
मगर नहीं सभी के लिए नहीं
नया-नया भय लिए आता है
भाषा और हॅंसी में आजकल
नया-नया भरोसा।
8. मेरे इंतज़ार में
अपनी व्यथा-कथा फिर कभी
हाल-फ़िलहाल तो कमीज़ का टूटा बटन
ठीक-ठीक टांक लूँ अगर तो चलूँ
उधर वहाँ है जहाँ कोई मुझ-सा ही
मेरे इंतज़ार में है शताब्दियों से
पाँवों में छाले हैं, जिसके नहीं चप्पल
फटी हैं बिवाईयाँ भी।
9. परिंदा हूँ कि उड़ना जानता हूँ
परिंदा हूँ कि उड़ना जानता हूँ
कभी ढूँढता हूँ घर, कभी ढूँढता हूँ आसमान
मगर खोता नहीं हूँ कभी भी, कहीं भी
पहचान अपनी, ज़िद और ज़मीन अपनी
आता हूँ, जाता हूँ, करता हूँ सैर कई-कई
दुनियाभर की अपने पैरों से, परों से
मगर फिर-फिर लौटता हूँ घर की ओर
बार-बार और बच्चों के लिए
उनकी पतॅंग, उनके खिलौनों के लिए
उनकी ज़िद और ज़िंदगी के लिए
लाता हूँ, कभी बंदूक भी लाता हूँ
और लाता हूँ कभी गुब्बारे भी
कभी गेंद लाता हूँ, तो कभी कुछ बीज भी
बोने के लिए सूने-वीरानों में यहीं-कहीं
ताकि वे सीख सकें पत्थरों से खेलना
सीख सकें थोड़ा उछलना, उछालना आग
कि जैसे सोचना-समझना गहन गहराई
और न्याय-पक्ष में लड़ना-जीतना
युद्ध सच का।
10. है नहीं खूँटी पर टॅंगी हुई।
है नहीं खूँटी पर टॅंगी हुई
कि बढ़ाकर हाथ उतार लूँ नीचे
जिसे कहते हैं सचमुच सुबह
और पहन ही लूँ कमीज़ की तरह
सोचता हूँ, सोचता हूँ कभी-कभी
कि क्या कभी जागा हूँ उसके लिए रातभर?
क्या कभी सोची है कोई व्यथा उसकी भी?
क्या खोया, क्या पाया उसने मेरे लिए
अंधकार विरुद्ध?
कब उसे मिला नहीं,
बाद एक अंधेरे के अंधेरा दूसरा?
नीचे है ज़मीन और फिर ज़मीन के नीचे भी
ऐसा-वैसा बहुत कुछ, बहुत कुछ
जो कहलाता है खनिज इत्यादि
सोचो तो ज़रा भी दूर नहीं है सुबह
है नहीं खूँटी पर टॅंगी हुई कमीज़ वह
कि बढ़ाकर हाथ उतार लूँ नीचे
और पहन लूँ ?
11. शब्द मेरे पैदल सिपाही
जिसे कभी देखा नहीं हॅंसता हुआ
अगर वो दिखाई दे रहा है आज
पॅंख फैलाए, खिलखिलाते हुए,
हॅंसते हुए तो ज़ाहिर है
कि कहीं कोई हादसा हुआ होगा उधर
और ये भी, ये भी दर हक़ीक़त
कि उसमें हुक़्म भी रहा होगा उसी का
अपने हुक़्म की तामिली में
पहले भी हॅंसा है, हॅंसता रहा है वह
और चिढ़ाते हुए, लज्जित करते हुए
कई-कई बार हज़ारों-हज़ार बार
अब ये बात थोड़ी अलग है दृष्टिकोण में
कि तब पास उसके कहार नहीं थे
सिरफिरे पागल घुड़सवार नहीं थे
और शब्द मेरे पैदल सिपाही
इतने लाचार नहीं थे।
12. कहीं कुछ ग़ायब-ग़ायब जैसा है
घना है घनघोर घना
ऐसे में मना है कुछ भी बोलना-सुनना
और सोचना-लिखना सच-सबूत!
है कुहासा भी है घनघोर घना
मैं कुहासे में ढूँढता रहता हूँ चिंगारी
जो कि राह, जो कि मिलती नहीं है अभी
किंतु तय है इतना तो तय है
कि बनाने से ही बनती है
और सुलगाने से ही सुलगती है
एक राह जॅंगल में
एक दिन, एक राह जॅंगल में
रह-रहकर बनाता हूँ मैं निरंतर-निरंतर
तो नहीं सिर्फ़ अपने ही लिए नहीं,
बल्कि सभी के लिए, सभी जगह
जब जगह-जगह, सभी के लिए,
बनती जाती है जगह
तो यहीं-कहीं पाता हूँ मैं अकस्मात् ही
कुछ बेढ़ब, बेढॅंगे जादूगर, नायक-नालायक,
कुछ सौदागर और कुछ फटीचर वादाख़ोर
और कुछ ऐसे-ऐसे कमबख़्त हरामख़ोर भी
कि जिन्हें ज़रा भी आती नहीं है शर्म
जानते हैं, सभी जानते हैं इस दुनिया में
कि भरोसा भी बिकता है खुले बाज़ार में
और कभी-कभी तो घटी-दरों पर भी
अब ये हैसियत है और मुश्किल नहीं है
तो क्रेता-विक्रेता की ही है
और है हाथों की साफ़-सफ़ाई भी कुछ-कुछ
कि वे आपसी-वापसी के लेन-देन में
लेते-देतेहैं कितना कुछ भरोसा और धोखा
किस-किस को और क्या-क्या?
कौन-कौन क्या कुछ बेचता है
क्या कुछ, क्या कुछ
ख़रीदता है कौन, क्या कुछ पता नहीं
जबकि कहीं कुछ ग़ायब-ग़ायब जैसा है
तो वह है ईमान वग़ैरह ही।
राज कुमार कुम्भज
(अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' योजना के चौथे सप्तक के कवि )
331, जवाहर मार्ग, इन्दौर, 452002
0731-2543380, rajkumarkumbhaj47@gmail।com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा


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