शोध आलेख : देश विभाजन की यातना को अभिव्यक्त करती 'गरम हवा' / प्रदीप कुमार पांडेय एवं जितेन्द्र यादव

देश विभाजन की यातना को अभिव्यक्त करती 'गरम हवा'
- प्रदीप कुमार पांडेय एवं जितेन्द्र यादव

 

शोध सार : उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका इस्मत चुगताई की अप्रकाशित कहानी, कैफी आज़मी और शमा जैदी की पटकथा और एम. एस सथ्यू के निर्देशन में 1973 में बनी फ़िल्म ‘गर्म हवा’ भारतीय मुसलमान की वास्तविक तस्वीर पेश करती है। विभाजन की भयावह पीड़ा को महात्मा गांधी के शहादत के बाद देशकाल, परिस्थिति को बिना किसी दंगा-फसाद के दृश्य के भी इस तरह सिनेमा के पर्दे पर उकेरा है कि उसे देखकर विभाजन के भयानक दर्द को भी महसूस किया जा सकता है। भारत का विभाजन सिर्फ़ सरहद का बँटवारा नहीं था बल्कि एक ऐसा जख्म था जिसकी टीस आज भी सरहद के दोनों ओर मौजूद है। पूरी दुनिया में ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है कि नागरिकों को अपना घर-बार छोड़कर इतनी व्यापक संख्या में इधर से उधर, उधर से इधर जाना पड़ा हो।

बीज शब्द : विभाजन, भारत, पाकिस्तान, त्रासदी, मुसलमान, फ़िल्म

मूल आलेख : बलराज साहनी, शौकत आज़मी, फ़ारुक शेख, जलाल आगा और गीता सिद्धार्थ जैसे इप्टा के मंजे हुए कलाकारों के साथ यह फ़िल्म आगरा के मिर्ज़ा परिवार की कहानी को बयां करती है। इसे विभाजन पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म माना जाता है। ‘गर्म हवा’ एमएस सथ्यू की पहली फ़िल्म थी और इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फ़िल्म को रिलीज होने में ग्यारह महीने लग लग गए थे। सेंसर बोर्ड प्रमाण पत्र नहीं दे रहा था। विभाजन जैसे संवेदनशील विषय पर होने के कारण निर्देशक को रिलीज कराने में काफ़ी समस्याएँ आईं। जब उन्होंने खुद फ़िल्म इंदिरा गांधी को दिखाई तब जाकर सेंसर बोर्ड ने प्रमाण पत्र दिया। ‘गरम हवा’ का प्रीमियर पेरिस में हुआ था। फ़िल्म का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन पेरिस में ही हुआ था। फिर इसे कान फ़िल्म फेस्टिवल के लिए चुना गया। एक समीक्षक ने इसकी सिफ़ारिश की थी। इसे मुख्य फेस्टिवल में ही दिखाया गया। वहाँ अकादमी के लोग फ़िल्म देखने आए थे और उन्होंने गर्म हवा को गैर अँग्रेज़ी भाषा की फ़िल्म श्रेणी में ऑस्कर के लिए चुना। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना बन गई’।1

फ़िल्म के शुरुआती दृश्य में ही गांधी की हत्या का दृश्य दिखाई पड़ता है और उसके तुरंत बाद सलीम मिर्ज़ा अपनी बड़ी बहन को कराची के लिए स्टेशन से विदा करते हैं। उनके बहनोई पहले ही पाकिस्तान जा चुके हैं। फ़िल्म के इस शुरुआती दृश्य में ट्रेन की छुक-छुक आवाज के साथ कैफी आज़मी की एक नज़्म भी उन्हीं की आवाज में सुनाई पड़ती है। जो बँटवारे की त्रासदी को आँखों के सामने चित्रित कर देती है-

‘तकसीम हुआ मुल्क तो दिल हो गए टुकड़े
हर सीने में तूफान वहाँ भी था यहाँ भी
हर घर में चिता जलती थी लहराते थे शोले
शहर में शमशान वहाँ भी था यहाँ भी
गीता की कोई सुनता न कुरान की कोई सुनता
हैरान सा ईमान वहाँ भी था यहाँ भी’2

‘विख्यात आधुनिकतावादी उर्दू लेखिका इस्मत चुगताई द्वारा लिखी गई लघुकथा पर आधारित गर्म हवा, आम सहमति से, विभाजन की उस त्रासदी का सेल्यूलाइड पर सबसे रचनात्मक और अंतर्दृष्टिपूर्ण चित्रण है जिसे अंग्रेजों ने जाते-जाते हम पर मढ़ दिया था। जब इस तरह की त्रासदी किसी देश पर आती है तो इसमें कोई शक नहीं कि तमाम लोगों को बिना किसी ग़लती के कष्ट झेलना पड़ता है, लेकिन इसके साथ ही कुछ लोग अमानवीय ताक़तों के समक्ष झुकने के बजाय और मजबूत होकर उभरते हैं। सलीम मिर्ज़ा और उनके स्नातक बेटे सिकंदर(जिसका किरदार फारुक़ शेख़ ने निभाया है) दोनों को बाद वाली श्रेणी में रखा जा सकता है जिन्होंने अपने जीवन में घटने वाली दुखद घटनाओं के बाद भी आशा का दामन नहीं छोड़ा या फिर अपने आप को ‘पीड़ित’ के तौर पर नहीं देखा’।3

हलीम मिर्ज़ा जो कल तक कसमें खा रहे थे कि ‘हिंदुस्तान हमारा वतन है, ये ताजमहल, ये फतेहपुर सीकरी, ये सलीम चिश्ती की दरगाह जो लोग अपनी मुकद्दर को छोड़कर सियासत के कारण भाग रहे हैं वह बुज़दिली के शिकार हैं। उन्हें अपने खुदा पर भरोसा नहीं। सारे मुसलमान देश छोड़कर चले जाएँ लेकिन एक मुसलमान कभी नहीं जाएगा। जब तक जिंदा है यहीं रहेगा। उस मुसलमान का नाम है हलीम मिर्ज़ा’4 लेकिन फ़िल्म में कुछ ही समय बाद उनका निर्णय बदलते हुए दिखाई देता है। जब उनकी बीवी कहती हैं कि उनका बेटा काजिम मिर्ज़ा बी. ए. कर लिया है तो वह कहते हैं कि वह बी. ए. कर ले या एम. ए. अब किसी मुसलमान को हिंदुस्तान में नौकरी नहीं मिलेगी। बीवी पूछती है तब कहाँ मिलेगी तब वह कहते हैं कि पाकिस्तान में मिलेगी। नए पाकिस्तान के लोभ में अपने भाई सलीम और उसके परिवार को भारत छोड़कर चले जाते हैं।

फ़िल्म के केंद्र में सलीम मिर्ज़ा(बलराज साहनी) और उनका परिवार है। हलीम मिर्ज़ा उनके बड़े भाई थे जो भारत छोड़कर पाकिस्तान चले जाते हैं। फ़िल्म की कहानी में यहीं से मोड़ आता है। दरअसल सलीम मिर्ज़ा को भारत से बेहद लगाव है। यहाँ आगरा में उनका जूते का कारख़ाना है। एक बड़ी-सी हवेली है। उनके अब्बा की कब्र यही पर दफ़न है। इस मिट्टी से इतना लगाव है किन्तु नए पाकिस्तान का लोभ और यहाँ हिंदुस्तान में अपने भविष्य की चिंताओं से ग्रस्त होकर गांधी जी के शहादत के बाद भी मुसलमानों का पलायन होता रहा। फ़िल्म की कहानी ऐसे ही एक मुसलमान की कहानी है जो भारत छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाना चाहता है। इस वतन की मिट्टी, साझी संस्कृति की गहरी जड़ों से जुड़ा है। किन्तु उसके मुसलमान होने के कारण उसे हर जगह अविश्वास और शक की दृष्टि से देखा जाता है। कारख़ाना चलाने के लिए कर्ज की ज़रूरत है लेकिन कोई बैंक वाला या साहूकार लोन देने के लिए तैयार नहीं है, उन्हें शक है कि कर्ज लेकर पाकिस्तान न चला जाए। बैंक मैनेजर से सलीम मिर्ज़ा कहता है कि ‘आप उन मुसलमानों की सज़ा उनको क्यों दे रहे हैं जो न भागे हैं न भागेंगे’।5 सलीम मिर्ज़ा के कारख़ाने में काम करने वाले ज़्यादातर मुसलमान कराची जा चुके हैं। जो यहाँ हैं या बचे हैं वे भी जाने की तैयारी में हैं। विभाजन से जन्मे एक भयंकर दंश को एक मुस्लिम व्यापारी परिवार किस प्रकार झेल रहा है। उसकी कहानी को फ़िल्मकार ने बहुत ही सूक्ष्मता से चित्रित किया है। 

बलराज साहनी ने मुस्लिम व्यापारी सलीम मिर्ज़ा के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया है। फ़िल्म देखते हुए ऐसा महसूस होता है कि काश देश विभाजन के गुनहगार को पता होता कि इस निर्णय का इतना दूरगामी परिणाम होगा और निर्दोष नागरिक को सज़ा भुगतनी होगी। बँटवारे की आग ने सलीम मिर्ज़ा से क्या नहीं छिना। सब कुछ बर्बाद कर दिया। सलीम मिर्ज़ा भारत के उन मुसलमानों में शामिल हैं जो बँटवारे के बाद भी भारत को अपना वतन चुनते हैं क्योंकि जिन्ना के दो राष्ट्र सिद्धान्त से बहुसंख्यक मुस्लिम सहमत नहीं थे। वरना पाकिस्तान से ज़्यादा मुसलमान भारत में क्यों रहते। सलीम मिर्ज़ा एक आशावादी मुसलमान हैं जिन्हें लगता है कि गांधी जी की शहादत बर्बाद नहीं जाएगी। अब हालात सुधर जाएंगे। किन्तु सलीम मिर्ज़ा का सब कुछ छीन जाता है। हवेली जिसमें परिवार रहता है वह उनके भाई के नाम से थी। भाई के पाकिस्तान चले जाने से हवेली को कस्टोडियन अपने कब्जे में लेकर उसका नीलामी करवा देती है। बड़ा बेटा, बहू और पोता भी एक दिन पाकिस्तान चले जाते हैं। जूते के कारख़ाने को चलाने में जिस मुश्किल का सामना उसे करना पड़ता है उसके बाद बेटे को लगता है कि भारत में मुसलमान सिर्फ भिखारी बनकर रह सकता है लेकिन व्यापारी बनकर नहीं। इसलिए वह भी एकदिन अपना बोरिया बिस्तर समेटकर पाकिस्तान चला जाता है। फिर एक दिन दंगा में कारख़ाना को भी आग के हवाले कर दिया जाता है। उनकी बेटी पहले काजीम मिर्ज़ा से शादी करना चाहती है लेकिन वह पाकिस्तान चला जाता है फिर टूटा दिल लेकर शमशाद पर किसी तरह भरोसा करती है लेकिन वह भी धोखा देकर पाकिस्तान चला जाता है। इसके बाद वह घर में आत्महत्या कर लेती है। सलीम मिर्ज़ा गंभीर बनकर दुख के पहाड़ को एक-एक करके अपने सीने पर झेलते हैं। हवेली छूटने के बाद एक छोटे से किराये के मकान में गुज़र करना पड़ता है। कारख़ाना जलने के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारते हैं और कहते हैं कि इन हाथों में अब भी हुनर है और खुद अपने हाथ से जूते बनाने लगते हैं। यह दृश्य गोदान के होरी की बरबस याद दिलाता है जो किसान होते हुए भी दूसरे के खेत में मज़दूरी करने के लिए मजबूर होता है। कुछ ऐसी ही लाचारी यहाँ भी दिखती है। सलीम मिर्ज़ा का दुख यहीं खत्म नहीं होता है बल्कि झूठे जासूसी के केस में फँसाया जाता है। सरे बाज़ार पुलिस गिरफ्तार करती हैं। जब छुटकर आते हैं तो लोग ताने मारते हैं कि देखो जासूस जा रहा है। अब यहीं से सलीम मिर्ज़ा का सब्र टूटता है। एक दिन वह भी उसी तांगे पर सवार होकर पाकिस्तान जाने के लिए स्टेशन की तरफ़ निकल जाते हैं।

‘गर्म हवा’ के नायक बलराज साहनी हैं। पूरी फ़िल्म उन्हीं के इर्द -गिर्द घूमती है। यह उनकी अंतिम फ़िल्म थी। अब तक के सबसे दमदार अभिनय का प्रदर्शन इस फ़िल्म में उन्होंने किया है किन्तु दुर्भाग्य देखिए कि फ़िल्म जब रिलीज हुई तो वह इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे। आज़ादी के बाद जिन मुसलमानों ने भारत को ही अपना घर माना था। उनकी मार्मिक व्यथा का फिल्मांकन यहाँ प्रस्तुत है। पूरी फ़िल्म में एक मौन यातना छिपी हुई है। फ़िल्म का एक-एक दृश्य विभाजन की गहरी पीड़ा को व्यक्त करता है। फ़िल्म का एक-एक संवाद कसा हुआ है। कैफ़ी आज़मी और शमा जैदी की लिखी पटकथा और संवाद ने फ़िल्म में जान डाल दी है। फ़िल्म में विभाजन का दर्द यथार्थपूर्ण ढंग से चित्रित है। कहीं पर भी कोई दृश्य व्यर्थ नहीं लगता। सलीम मिर्ज़ा की माँ के दो दृश्य दर्शक को झकझोर देते हैं। पहला जब हवेली छोड़कर किराये के मकान में जाना पड़ता है। वह हवेली की अँधेरी कोठरी में छिप जाती हैं। उनकी जिद है कि अपनी हवेली छोड़कर नहीं जाएँगे। फिर जब किराये के मकान में जाती हैं तो छत के कमरे पर रहती हैं ताकि यहाँ से उनकी हवेली दिखाई देगी। दूसरा दृश्य और भी अधिक ह्रदयविदारक है। जब मृत्यु के अंतिम क्षण में वह चाहती हैं कि उन्हें उनकी हवेली लेकर चला जाए। सलीम मिर्ज़ा हवेली के मालिक आजमानी से जाकर बात करते हैं। फिर अपनी माँ को डोली में उठाकर हवेली ले जाते हैं। डोली में जाते वक़्त जब दुल्हन बनकर आई थी तब का दृश्य सोचने लगती हैं। शहनाई की ध्वनि बैकग्राउंड से आती है। फिर हवेली में जाते ही उन्हें असीम सुकून मिलता है और प्राण त्याग देती हैं। यह दृश्य मन को विचलित करता है। न जाने कितने लोग सरहद से इधर से उधर, उधर से इधर अपना सब कुछ छोड़कर आए होंगे। उनकी व्यथा भी अपने घर को लेकर ऐसी ही रही होगी। जब बड़ा लड़का हलीम मिर्ज़ा घर छोड़कर पाकिस्तान जाने के लिए कहता है तो वह कहती हैं कि ‘एक बात कान खोलकर सुन लो। यहाँ क़ब्र में तुम्हारे अब्बा जी की हड्डियाँ दफ़न है। यहाँ से छोड़कर मैं नहीं जा सकती’।6

फ़िल्म में एक समानांतर कहानी और भी चलती है। वह है सलीम मिर्ज़ा की बेटी अमीना की। अमीना अपने जीवन में विभाजन की प्रत्यक्ष भुक्तभोगी है। दो-दो प्रेमी शादी का वास्ता देकर और उसका शारीरिक, मानसिक शोषण करके पाकिस्तान चले जाते हैं। फ़िल्म में उसके जीवन का अंतिम दृश्य दर्शक को गहरा झटका देता है। उसकी फूफी आती है और साड़ी की ख़रीददारी साथ में करती है। उसके घरवालों को लगता है कि अमीना की शादी के लिए यह सब हो रहा है। अमीना भी बहुत प्रसन्न है। लेकिन जब उसकी माँ पूछती है कि इस रंग की साड़ी क्यों ले ली। तब उसकी फूफी कहती है कि शमशाद की दुल्हन के लिए वह थोड़ी साँवली है न इसलिए। अमीना का दिल धक्क से करता है। उसका मन एकदम घबरा जाता है और सदमे में डूब जाती है। वह तुरंत उठकर अपने कमरे में चली जाती है और दरवाज़ा बंद कर लेती है। उसके बाद का दृश्य बहुत दर्दनाक है। वह दुल्हन की तरह तैयार होती है और फिर अपने हाथ की नस काटकर आत्महत्या कर लेती है। यहाँ पर बलराज साहनी (सलीम मिर्ज़ा) पिता पर क्या गुज़रती है। निर्देशक ने यहाँ पर सीढ़िया चढ़ते हुए बलराज साहनी को फिल्माया है जहाँ दरवाज़ा खोलकर बेटी का शव देखते हैं जैसे उन्हें काठ मार गया हो। जिनकी आँख में बिल्कुल आँसू नहीं थे। लेकिन दृश्य इतना मर्मस्पर्शी है कि दर्शक की आँख में आँसू आ जाते हैं। निर्देशक एम. एस. सथ्यू को पता था कि खुद बलराज साहनी की बेटी शबनम ने आत्महत्या की थी। यहाँ निर्देशक खुद स्वीकार करते हैं ‘असल में बलराज जी की ज़िंदगी में भी ऐसा ही हुआ था उनकी एक बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। बलराज उस समय शूटिंग से लौटकर आए थे उन्होंने कुछ इसी तरह सीढ़ियाँ चढ़ी थी जैसा फ़िल्म में था। बलराज उस समय इतने अवसन्न हो गए थे कि रो भी नहीं पाए। फ़िल्म बनाते समय मेरे जेहन में वही घटना थी पर मैं बलराज जी से सीधे-सीधे नहीं कह सकता था इसलिए मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि आपको इस सीन में रोना नहीं है’।7 बलराज साहनी मेथड एक्टिंग के जनक रहे हैं। किसी भी दृश्य को फ़िल्माने से पहले उसे अपने भीतर जीते थे फिर पर्दे पर प्रस्तुत करते थे। इसके वह बहुत माहिर कलाकार थे। इसलिए इस दृश्य को देखकर दर्शक की आत्मा रो देती है।

इस फ़िल्म में तांगेवाले का छोटा-सा रोल है लेकिन वह फ़िल्म की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इस फ़िल्म के आरंभ में जब सलीम मिर्ज़ा अपनी बड़ी बहन को कराची के लिए स्टेशन छोड़कर लौटते हैं तो सलीम मिर्ज़ा कहते हैं- ‘कैसे हरे-भरे दरख्त कट रहे हैं इस हवा में। तब तांगेवाला कहता है– ‘बड़ी गर्म हवा है मियाँ, जो उखड़ेगा नहीं वह सूख जाएगा’।8

‘गर्म हवा’ फ़िल्म के नामकरण का निहितार्थ पता चलता है। फ़िल्म में एक दूसरे तांगेवाले का दृश्य भी है। सलीम मिर्ज़ा जब बैठते हैं तो वह कहता है कि दो रुपया लगेगा मियाँ ,तब मिर्ज़ा कहते हैं कि आठ आना किराया लगता है। तब वह बड़े तल्ख लहजे में कहता है कि आठ आने में जाना है तो पाकिस्तान चले जाओ’। तब सलीम मिर्ज़ा कहते हैं कि चलो प्यारेलाल नयी-नयी आज़ादी मिली है सब अपने-अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं।9

यह संवाद आज की राजनीति में भी कितना मौजूँ है।

एक दूसरे दृश्य में जब अपने बड़े बेटे और बहू को स्टेशन छोड़कर तांगे पर सवार होते हैं तो तांगेवाला पूछता है कि ‘आज किसे छोड़ आए मियाँ? सलीम मिर्ज़ा कहते हैं- बाकर मिर्ज़ा को। तांगेवाला- वाह मियाँ वाह, बड़ी हिम्मत है जिगर के टुकड़ों को एक-एक करके छोड़ आए और खुद यहाँ डटे हो ,कैसा जालिम ज़माना आ गया है’।10

अंतिम दृश्य में जब सलीम मिर्ज़ा भारत में तंग आकर खुद पाकिस्तान जाने के लिए तांगे पर सवार होते हैं तब तांगेवाला कहता है कि ‘मेरा मन तो पहले ही कहता था कि एक दिन तुम भी जाओगे जरूर’।11

फ़िल्म का अंतिम दृश्य बहुत ही मार्मिक है। सलीम मिर्ज़ा अपनी पत्नी और बेटे सिकंदर के साथ रास्ते में जाते हुए देखते हैं कि जनता का हुजूम रोजी-रोटी और मकान के लिए आंदोलन कर रहा है। तांगा भीड़ में रुक जाता है और सलीम मिर्ज़ा बेटे सिकंदर से कहते हैं आखिर ‘अकेले इंसान कब तक जी सकता है, तुम भी जाओ सिकंदर’। और खुद भी यह कहते हुए आंदोलन में शामिल हो जाते हैं कि ‘मैं अकेले घुटन भरी ज़िंदगी से तंग आ गया हूँ’।12 यहीं पर पाकिस्तान जाने की योजना खत्म हो जाती है। फ़िल्म का यह अंत वास्तविक लगता है। क्योंकि भारत हो या पाकिस्तान हर कहीं संघर्ष करना ही पड़ेगा। इसलिए वह जनता के साथ आंदोलन में जुड़कर अपने हक़ की लड़ाई में शामिल हो जाता है।

एक तरफ़ मिर्ज़ा का व्यवसाय डूब रहा है और दूसरी तरफ़ उसके रिश्तेदार एक-एक करके पाकिस्तान के लिए रवाना हो रहे हैं। इसके साथ ही परिवार पर भी दुःख के पहाड़ टूट रहे हैं। अंत में मिर्ज़ा अपनी पत्नी और अपने शिक्षित बेरोज़गार बेटे सिकंदर के साथ ही रह जाते हैं। अनेक सलाहों के विपरीत सिकंदर यह तय करता है कि वह यहीं रुकेगा और पूर्वाग्रह और अराजकता के माहौल के बीच ही अपने लिए एक जगह बनाएगा।

निष्कर्ष : फ़िल्म ‘गर्म हवा’ विभाजन की पीड़ा को भारतीय मुसलमान के नज़रिये से दिखाती है। विभाजन के शिकार हिन्दू, मुसलमान, सिख सभी हुए थे। फ़िल्म का केंद्रीय भाव मानवीयता है। मानवीय पहलू को उजागर करके विभाजन की त्रासदी को यथार्थ रूप में प्रदर्शित किया है। भारतीय सिनेमा में इस तरह की फिल्में कभी-कभी ही बन पाती हैं। इस फ़िल्म ने एम. एस. सथ्यू के निर्देशन कला को ऊँचाई पर पहुँचा दिया था। कम लागत में इतनी बेहतरीन सामाजिक, राजनीतिक मुद्दे पर बनी फ़िल्म हिन्दी सिनेमा के लिए गर्व का विषय है। यह सब कलाकारों के समर्पण से संभव हो पाया।

संदर्भ :
  1. द वायर, एमएस सथ्यू और सिद्धार्थ भाटिया की बातचीत,जुलाई 2020
  2. विद्यार्थी चटर्जी, जनपथ पत्रिका, जुलाई 2020
  3. गर्म हवा, निर्देशक एमएस सथ्यु, 1973
  4. फ़िल्म संवाद,‘गर्म हवा’, निर्देशक एमएस सथ्यू
  5. अतिथि संपादक प्रहलाद जोशी वसुधा पत्रिका, सिनेमा विशेषांक, अंक 81, पृष्ठ 352
  6. फ़िल्म संवाद,‘गर्म हवा’, निर्देशक एमएस सथ्यू, 1973
  7. वही
  8. वही
  9. वही
  10. वही
  11. वही
  12. विद्यार्थी चटर्जी, जनपथ पत्रिका, 2020

प्रदीप कुमार पाण्डेय
प्राचार्य, सकलडीहा पी.जी.कॉलेज, सकलडीहा चंदौली

जितेंद्र यादव
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, सकलडीहा पी. जी. कॉलेज,सकलडीहा चंदौली

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने