विषय
प्रवेश: “सीता कवि की
भाव
भूमि
में
समा
गईं।
चिंतन
के
हल
चले।
कल्पनाओं
की
दूब
जमी।
अनुभूतियों
की
गंगा
बही।
कला
की
खेती
हुई।
भावकों
ने, रसिकों ने,
श्रोताओं
ने, पाठकों ने रस
का
आस्वादन
किया।
सदियों
तक
चलने
वाला
भाव-सत्र।
कभी
काव्य
का
श्रुति-यज्ञ, कभी नाटकों का
चाक्षुष-यज्ञ।
यज्ञ
भूमि
में
जब-जब
हल
चला, सीता का जन्म
हुआ।
सीता
बोलने
लगीं।”
लेकिन
वास्तव
में
सीता
कब
बोलने
लगीं? जब सीता रूपा
स्त्रियों
ने
लिखना
शुरू
किया
तब
सीता
बोलने
लगीं।
‘सीता पुनि बोली’
मृदुला
सिन्हा
की
आत्मकथात्मक
शैली
में
लिखा
गया
उपन्यास
है।
पुस्तक
की
भूमिका
में
ही
मृदुला
जी
ने
इस
उपन्यास
के
लेखन
व
इस
शैली
के
चुनाव
के
अनेक
कारण
बताए
हैं।
इनमें
से
एक
कारण
है
कि
जिस
सीता
को
तुलसीदास
जी
ने
‘गिरा
अरथ
जल
बीचि
सम’
कहकर
राम
से
अभिन्न
बताया
है; उस सीता को
राम
से
विलग
कर
स्वतंत्र
व्यक्तित्व
के
रूप
में
उसकी
प्रतिष्ठा।
लेखिका
का
मानना
है
कि
विभिन्न
भारतीय
भाषाओं
में
लिखी
गई
रामकथाओं
में
सीता
को
दैवीय
स्वरूप
प्रदान
कर
उसे
मानवीय
रूप
से
वंचित
कर
दिया
गया
है।
पुस्तक
लेखन
का
एक
उद्देश्य
सीता
को
मानवीय
गुण-दोषों
से
युक्त
कर
सामान्य
स्त्री
रूप
को
प्रकट
करना
रहा
है
जो
अपनी
स्पष्ट
वैचारिकता, निर्णय-क्षमता और
कार्यों
के
कारण
असाधारण
चरित्र
बनती
है।
लेखिका
का
यह
भी
मानना
है
कि
सीता
के
स्त्री-मन
को
शास्त्र
की
अपेक्षा
लोक
ने
अधिक
समझा
है।
लोकगीतों
व
लोक-परम्पराओं
में
वर्णित
सीता
के
स्त्री-मन
का
उद्घाटन
भी
लेखिका
का
अभीष्ट
रहा
है।
‘नारी-देह
के
स्थान
पर
पृथ्वी
के
गर्भ
से
अपना
जन्म
लेने
की
बात
सुनकर
सीता
के
बालमन
पर
क्या
प्रभाव
पड़ा
होगा? धनुष-यज्ञ में
राजाओं
के
धनुष
पर
प्रत्यंचा
चढ़ाने
में
असफल
रहने
पर
किशोरी
सीता
किस
तरह
व्याकुल
हुई
होंगी? कल जिसके पति
अयोध्या
के
राजा
बनेंगे
उस
किशोरी
का
मन
किस
प्रकार
उद्वेलित
हुआ
होगा
जब
उसे
यह
समाचार
मिला
होगा
कि
माता-पिता
की
आज्ञा
स्वीकार
कर
उसके
पति
ने
वनवास
जाने
का
निर्णय
कर
लिया
है? सुसंस्कारित जनकनंदिनी
सीता
ने
पति
व
सास
की
अवहेलना
कर
राम
के
साथ
वनवास
का
निर्णय
क्यों
लिया? शक्तिसम्पन्ना सीता
ने
अग्नि-परीक्षा
क्यों
दी? गर्भकाल में परित्यक्त
सीता
ने
इक्ष्वाकुवंश
के
बीज
को
पाल-पोसकर
संस्कारित
करने
का
निर्णय
क्यों
लिया? क्या सीता ने
राम
को
क्षमा
कर
दिया?’ लोक के
आलोक
में
इन
तमाम
उत्तरित-अनुत्तरित
प्रश्नों
के
उत्तरों
को
ढूँढ़ते
हुए
सीता
की
मानवीय
रूप
में
प्रतिष्ठा
ही
इस
रचना
का
ध्येय
है।
बीज
शब्द : स्त्री, मानवीय, संस्कृति-संघर्ष।
मूल
आलेख : बचपन में छोटी
बहन
उर्मिला
द्वारा
सीता
को
यह
कहना
कि
आप
माँ
के
पेट
से
नहीं
जन्मीं, आप तो भूमिजा
हैं, इसलिए माँ-पिताजी
मुझे
अधिक
स्नेह
करते
हैं; सीता के बालमन
पर
ऐसा
आघात
दे
जाता
है
कि
उसकी
पीड़ा
जीवनभर
बनी
रहती
है।
कैशोर्यागमन
पर
सीता
का
प्रथम
बार
रजस्वला
होना
और
उसके
कारण
एक
विशेष
व्यवहार
किया
जाना; लगता है हर
स्त्री
के
जीवन
की
एक
घटना
है।
सीता
द्वारा
मंदिर
चलने
की
बात
कहने
पर
माँ
का
यह
कहना
“अभी
नहीं
बेटी।
चार
दिनों
तक
तुम्हें
कहीं
नहीं
जाना।”
यह
किसी
आम
लड़की
की
ही
नहीं
सीता
जैसी
राजकुमारी
की
भी
पीड़ा
है।
राजा
सुधन्वा
युवा
हुई
सीता
को
पाने
के
लिए
मिथिला
पर
आक्रमण
करता
है।
इस
पर
सीता
की
माँ
सुनयना
का
यह
कथन
“जिस
प्रकार
धन, संपत्ति और धरती
के
टुकड़ों
के
लिए
दो
राजाओं
के
बीच
लड़ाइयाँ
होती
हैं, उसी प्रकार स्त्री
के
लिए
भी
होती
हैं।
पुरुष
अपनी
जान
देकर
भी
इन
तीनों
की
रक्षा
करता
है।
तुम्हारे
पिता
और
हमारी
तेजोमय
सेना
के
आगे
वह
सुधन्वा
टिक
नहीं
सकता।
वह
मारा
जाएगा।...
बेटी, युद्ध करना राजा
का
धर्म
होता
है, मगर यह मानव-धर्म
नहीं
है।
और
जब
युद्ध
हम
महिलाओं, किसी राजा की
बेटी, बहन या पत्नी
के
लिए
होता
है, तो मुझे सुनकर
बड़ा
दुःख
होता
है।
क्या
हम
स्त्रियाँ
इसी
के
लिए
हैं?" स्त्री को
संपत्ति
की
श्रेणी
में
रखे
जाने
की
पितृसत्तात्मक
सामंती
सोच
को
उजागर
करता
है।
यह
स्पष्ट
है
कि
“वह
(स्त्री)
उतनी
ही
मनुष्य
है, जितने पुरुष हैं, न ज्यादा और
न
ज़रा-सा
भी
कम।
उसके
वही
संकट
हैं, जो एक सचेतन
जीव
के
होने
चाहिए।
वह
भिन्न
है, लेकिन समान है।”
लेखिका
ने
अपनी
सीता
का
विकास
एक
तर्कबुद्धिसम्पन्ना
युवती
के
रूप
में
किया
है
और
सीता
द्वारा
उठाए
गए
अनेक
प्रश्नों
के
द्वारा
सम्पूर्ण
स्त्री-जाति
के
शाश्वत
प्रश्नों
को
उठाया
है।
अपने
स्वयंवर
के
आयोजन
पर
अपनी
माँ
के
साथ
हुई
बातचीत
में
सीता
प्रश्न
करती
हैं
कि
आपने
तो
पिताजी
को
पाने
के
लिए
तपस्या
की
लेकिन
पिताजी
ने
आपको
पाने
के
लिए
तपस्या
नहीं
की।
ऐसा
क्यों
होता
है? इस पर माँ
सुनयना
का
उत्तर
उल्लेखनीय
है
– “अब
देखो
ना
जिस
राजकुमार
से
तुम्हारा
विवाह
होगा, उसके पिता ने
कोई
प्रण
नहीं
कर
रखा।
उन्होंने
वधू
की
परीक्षा
के
लिए
कोई
शर्त
नहीं
रखी।
शर्त
तो
तुम्हारे
पिता
ने
यानी
कन्या
के
पिता
ने
रखी
है।
उन्हें
अपनी
कन्या
के
योग्य
वर
चाहिए।
उन्हें
अपनी
बेटी
के
गुण-कर्म
पता
हैं।
इसलिए
उसके
योग्य
जो
राजकुमार
होगा, उसी से ब्याह
होगा।
स्वयंवर
होता
है, स्वयंवधू नहीं, अर्थात् वर का
चयन
कन्या
द्वारा
ही
होता
है।"
पुष्प-वाटिका
में
राम-सीता
के
मिलन
में
लेखिका
ने
युवती
सीता
के
हृदय
में
यौवनागम
से
उच्छलित
प्रेम-तरंगों
का
सुन्दर
चित्रण
किया
है।
राम
द्वारा
धनुष-भंग
के
उपरांत
सीता
का
राम
के
साथ
विवाह
हो
जाता
है।
लेखिका
ने
विवाह-पश्चात्
सीता
के
अयोध्या
आगमन
पर
राम-सीता
के
दाम्पत्य
जीवन
का
मर्यादित
चित्रण
किया
है।
राम
को
वनवास
मिलने
पर
सीता
भी
वन
जाने
को
उद्यत
होती
हैं।
राम
द्वारा
सीता
को
वन
चलने
के
लिए
मना
करने
पर
सीता
का
यह
कहना
कि
इस
निर्णय
में
मुझे
आपकी
आज्ञा
की
ज़रूरत
नहीं
है, मैं शास्त्रसम्मत दाम्पत्य
धर्म
व
व्यवहार
की
बात
कर
रही
हूँ; एक पत्नी के
रूप
में
यह
सीता
के
सबल
पक्ष
को
प्रस्तुत
करता
है।
सीता
की
सुकुमारता
को
लक्ष्य
कर
लक्ष्मण
द्वारा
यह
कहने
पर
कि
भाभी, आप वन जाने
योग्य
नहीं
हैं; सीता का कथन
दृष्टव्य
है-
"देवरजी, सदियों से स्त्री
को
दुर्बल
और
अक्षम
समझकर
ही
कुछ
पुरुष
उसे
निर्बल
बनाने
की
भूल
करते
रहे
हैं।
मुझे
विश्वास
है
कि
आपके
बिना
उर्मिला
रह
लेगी, मगर आपके भैया
अब
मेरे
बिना
चौदह
वर्ष
वन
में
नहीं
रह
सकते।
मैं
नहीं
चाहती
कि
वे
चौदह
वर्ष
विरह
का
जीवन
जिएँ।
विरह
की
अग्नि
में
पराक्रम
का
पराभव
हो
जाता
है।
वन
में
जाकर
भी
उन्हें
अपना
पराक्रम
दिखाना
होगा।
मैं
उनके
पुरुषार्थ
में
बाधक
नहीं
बनूँगी।
कम-से-कम
आप
तो
मेरा
पक्ष
लीजिए।
मैं
आपको
वन
जाने
से
रोक
नहीं
रही।
फिर
आप
मुझे
क्यों
रोक
रहे
हैं? कहीं एक की
जगह
दो
की
सेवा
करने
से
घबरा
तो
नहीं
रहे?" इस प्रकार
सीता
व
लक्ष्मण
दोनों
राम
के
साथ
वनगमन
करते
हैं।
वनवास
के
चौदह
वर्षों
के
लिए
राम
सीता
की
सहमति
से
ब्रह्मचर्य
व्रत
का
संकल्प
लेते
हैं।
लेखिका
ने
उपन्यास
में
स्त्री
के
मातृत्व
भाव
को
सबसे
ऊपर
प्रतिष्ठित
किया
है।
राम
सीता
से
कहते
हैं
कि
कभी-कभी
मैं
भी
आपको
माँ
के
रूप
में
देखता
हूँ।
"स्त्री-पुरुष
संबंध
में
भी
बाल-सुलभ
ममता
और
वात्सल्य
या
व्यापक
तौर
पर
कहें
तो
करुणा
समाहित
रहती
है।"
अपने
संबंध
में
पिता
महाराज
जनक
का
कथन
जिसे
सीता
स्मरण
करती
हैं, यहाँ उल्लेखनीय है–
“अपने
गर्भ
से
बच्चों
को
जन्म
देकर
उसके
पालन-पोषण
में
अहर्निश
लिप्त
रहनेवाली
माँ
का
भी
मातृत्व
तब
तक
श्रद्धापूर्ण
नहीं
होता
जब
तक
उस
माँ
को
संसार
के
सभी
बच्चे
अपने
बच्चे
जैसे
नहीं
लगते
हों।
वह
मातृत्व-भाव
है, जो वंदनीय है।
मेरी
बेटी
सीता
में
बचपन
से
ही
मातृत्व-भाव
कूट-कूटकर
भरा
है।"
निषादराज
गुह, अहल्या, केवट
आदि
से
मिलाप
के
बाद
राम
भरद्वाज
ऋषि
के
आश्रम
पहुँचते
हैं।
वहाँ
दोनों
के
मध्य
वार्तालाप
होता
है।
ऋषि
भरद्वाज
कहते
हैं
कि
आपको
वनवास
के
दौरान
सावधानी
रखनी
होगी
क्योंकि
आपके
साथ
सीता
हैं।
ऋषि
के
कथन
से
सीता
को
दुःख
होता
है
कि
वे
स्त्री
को
पुरुष
से
दोयम
समझते
हैं।
वह
ऋषि
के
समक्ष
तुरंत
अपना
पक्ष
रखती
हैं-
"भगवन्!
मेरे
पिताजी
कहा
करते
थे
कि
स्त्री
ही
पुरुष
की
शक्ति
होती
है।
पुरुष
की
तीनों
अवस्थाएँ
स्त्री
पर
आश्रित
होती
हैं।
माँ, बहन और पुत्री
के
रूप
में
वह
पुरुष
का
निर्माण
और
संरक्षण
करती
है।
बाल्यकाल
में
माँ, युवावस्था में
पत्नी
और
प्रौढ़ावस्था
में
पुत्री
ही
पुरुष
को
स्नेह
से
सिंचित
करती
है।
उनका
यह
भी
कहना
था
कि
पुरुष
सिद्धांतवादी
होता
है
और
स्त्री
व्यवहारकुशला।
मेरा
मानना
है
कि
इन
दोनों
पर
विशेष
बोझ
न
बनूँगी।
मैंने
सुन
रखा
था
कि
वन
में
भी
एक-से-एक
तपस्विनी
और
पतिपरायणा
नारियाँ
रहती
हैं।
मुझे
उनके
दर्शन
का
भी
लाभ
मिलेगा।"
ऋषि
भरद्वाज
ने
मुस्कराकर
अपना
अभिप्राय
स्पष्ट
करते
हुए
कहा
कि
स्त्री
पुरुष
के
बराबर
नहीं, विशेष है,
इसलिए
उसे
विशेष
सुरक्षा
की
आवश्यकता
है।
आगे
चलकर
राम
चित्रकूट
में
कुटिया
बनाते
हैं।
सीता
अपने
स्त्री
व्यक्तित्व
से
उसे
एक
सजीव
घर
में
बदल
देती
हैं, कुटिया की दीवारों
पर
अपने
हाथों
से
चित्रकारी
करती
हैं, अपने हाथों सुस्वादु
भोजन
बनाती
हैं।
वनवासी
लड़कियों
को
अच्छी
शिक्षा
देकर
उन्हें
संस्कारी
बनाती
हैं।
यहाँ
लेखिका
ने
सीता
को
एक
कुशल
गृहिणी
के
रूप
में
चित्रित
किया
है।
राम
को
अयोध्या
लौटाने
के
लिए
चित्रकूट
में
भरत
के
साथ
अयोध्या
के
राज-समाज
का
आगमन
होता
है।
साथ
ही
विदेहराज
जनक
भी
आते
हैं।
सीता
अपने
मृदुल
व्यवहार
से
पीहर
व
ससुराल
दोनों
पक्षों
का
हृदय
जीत
लेती
हैं।
राम
भी
भरत
को
नीतिपूर्ण
बातें
समझाकर
अयोध्या
लौटा
देते
हैं।
इसके
बाद
राम
वन
में
आगे
बढ़ते
हैं
और
अत्रि
ऋषि
के
आश्रम
पहुँचते
हैं।
अत्रि
ऋषि
की
पत्नी
अनसूया
से
सीता
को
पतिव्रत
धर्म
की
सीख
मिलती
है।
फिर
आगे
वे
सुतीक्ष्ण
ऋषि
व
अगस्त्य
ऋषि
के
आश्रम
पहुँचते
हैं।
राम
द्वारा
जनक-सभा
में
अष्टावक्र
जी
का
प्रसंग
सीता
को
सुनाने
पर
सीता
का
ध्यान
राम
की
एक
बात
पर
अटक
जाता
है-
"आप
मेरे
पिताजी
को
'पिताजी' क्यों नहीं कहते? आप सदा 'आपके पिताजी'
कहते
हैं।
मैं
तो
अपने
ससुरजी
को
प्रारंभ
से
ही
'पिताजी' कहती हूँ।" राम
इसके
लिए
सीता
से
क्षमा
माँगते
हैं।
इस
प्रसंग
के
द्वारा
लेखिका
ने
समाज
की
पितृसत्तात्मक
सोच
को
उजागर
किया
है।
राम
भी
उससे
अछूते
नहीं
हैं।
विवाह
के
पश्चात्
स्त्री
अपने
पति
के
सभी
रिश्ते-नातों
को
स्वीकार
कर
लेती
है
किन्तु
पुरुष
ऐसा
नहीं
करता।
सीता
के
कथन
के
माध्यम
से
लेखिका
का
मंतव्य
यह
है
कि
पुरुष
यदि
यह
चाहता
है
कि
उसकी
पत्नी
उसके
घर-परिवार, रिश्ते-नातों को
सहज-भाव
से
स्वीकार
कर
ले
और
उन्हें
सम्मान
दे
तो
एक
स्त्री
भी
यह
चाहती
है
कि
उसी
प्रकार
पुरुष
भी
उसके
पितृकुल
को
अपना
समझे
और
मान-सम्मान
दे।
अगस्त्य
ऋषि
अपने
पति
के
साथ
वनवास
के
लिए
सीता
की
प्रशंसा
करते
हैं।
साथ
ही
कहते
हैं
कि
राम
से
ऋषि-मुनियों
को
अनेक
अपेक्षाएँ
हैं।
अगस्त्य
ऋषि
से
विदा
लेकर
राम-सीता
व
लक्ष्मण
आगे
दक्षिण
में
गोदावरी
नदी
की
ओर
बढ़ते
हैं।
लेखिका
ने
सीता
को
चिंतनशीला
स्त्री
के
रूप
में
चित्रित
किया
है।
वह
ऋषि-मुनियों
व
ऋषि-नारियों
से
हुए
प्रत्येक
संवाद
पर
चिंतन
करती
हैं।
कभी
राम
से
विचार-विमर्श
करती
हैं
तो
कभी
स्वयं
अपने
आप
के
साथ
विचार
करती
हैं।
अगस्त्य
ऋषि
द्वारा
‘राम
से
लोगों
की
अपेक्षाएँ’
बात
पर
चिंतन
करते
हुए
वह
‘अपेक्षा’
शब्द
पर
विचार
करती
हैं
कि
"घर-परिवार
से
लेकर
वनों
में
रहनेवाले
ऋषि-मुनियों
ने
भी
राम
से
बहुत
सी
अपेक्षाएँ
पाल
रखी
थीं।
ये
अपेक्षाएँ
मनुष्य
के
विकास
में
साधन
व
सहयोगी
होती
हैं।
पुरुषार्थी
पुरुष
इन
अपेक्षाओं
की
पूर्ति
में
अपनी
सारी
शक्ति
लगा
देता
है।
यदि
किसी
से
कोई
अपेक्षा
ही
नहीं
हो
तो
फिर
कोई
क्यों
करे
परिश्रम? ...कभी-कभी
हम
दूसरों
की
अपेक्षाओं
के
अनुरूप
ही
बनने
का
प्रयास
करते
हैं।
अपेक्षाएँ
हमेशा
ऊँचा
उठानेवाली
ही
होती
हैं।"
शूर्पणखा
के
प्रसंग
में
राम
कहते
हैं
कि
कुसंस्कार
के
संबंध
में
स्त्री
और
पुरुष
में
कोई
भेद
नहीं
है।
कोई
भी
कुसंस्कारी
हो
सकता
है।
फिर
भी
व्यभिचारिणी
स्त्री
में
थोड़ी
लोक-लाज
तो
होती
ही
है।
शूर्पणखा
में
वह
भी
नहीं
थी।
लगता
है
वह
किसी
के
द्वारा
भेजी
गई
थी।
खर-दूषण
का
वध
कर
राम
और
लक्ष्मण
वनवासियों
व
ऋषि-मुनियों
को
निर्भय
कर
देते
हैं।
सीता
राम
से
एक
मृग
पकड़कर
लाने
के
लिए
कहती
हैं
तो
राम
पशु-पक्षियों
को
पालतू
बनाने
के
विरोध
में
लंबा
व्याख्यान
दे
डालते
हैं।
यहाँ
सीता
स्वीकार
करती
हैं
कि
जीवन
के
विविध
आयामों
पर
हमारा
आपसी
विरोध
भी
था।
यह
बताता
है
कि
एक
सामान्य
दम्पति
की
भांति
सीता
और
राम
के
भी
विचार
भिन्न-भिन्न
थे, उनमें भी आपसी
विरोध
था।
यह
तथ्य
सीता
और
राम
की
सामान्य
मानवीय
भाव-भूमि
पर
प्रतिष्ठा
करता
है, उन्हें जन-सामान्य
के
और
अधिक
निकट
लाता
है।
“भिन्नता
का
सम्मान
बराबरी
की
पहली
शर्त
है।”
फिर
एक
दिन
सीता
एक
सोने-से
दमकते
मृग
को
देखकर
मचल
उठती
हैं
और
राम
को
वह
मृग
लाने
को
कहती
हैं।
पुरुषार्थी
राम
पत्नी
की
इच्छा-पूर्ति
के
लिए
दौड़
पड़ते
हैं
और
रावण
द्वारा
सीता
का
हरण
कर
लिया
जाता
है।
रावण
साम-दाम-दंड-भेद
सभी
नीतियों
से
सीता
को
अपनी
पटरानी
बनाने
का
प्रयास
करता
है
किन्तु
सीता
अडिग
रहती
हैं।
उन्हें
श्रीराम
की
शक्ति
व
पुरुषार्थ
पर
पूरा
भरोसा
है।
रावण
द्वारा
यह
कहे
जाने
पर
कि
राक्षस-विवाह
तो
तुम्हारे
यहाँ
भी
स्वीकार्य
है, सीता कहती हैं
कि
राक्षस
विवाह
किसी
की
पुत्री
का
हरण
कर
किया
जाता
है, किसी की पत्नी
का
हरण
कर
नहीं।
यह
बताता
है
कि
सीता
को
लोक
व
शास्त्र
का
पर्याप्त
ज्ञान
था।
उपन्यास
में
लेखिका
ने
राम-रावण
युद्ध
को
सांस्कृतिक-संघर्ष
के
रूप
में
चित्रित
करते
हुए
द्वंद्व
के
माध्यम
से
बखूबी
उभारा
है।
राजसभा
में
रावण
द्वारा
सीता-हरण
का
कारण
आर्य-संस्कृति
पर
प्रहार
बताना
उसकी
कूटनीतिज्ञता
को
दर्शाता
है।
उसका
कहना
था
कि
अगस्त्यमुनि
को
दंडकारण्य
भेजना
आर्यों
द्वारा
हमारी
संस्कृति
को
नष्ट
करने
का
प्रयास
है।
राम
द्वारा
बालि
का
वध
भी
राक्षस-संस्कृति
पर
आक्रमण
है
क्योंकि
बालि
हमारी
संस्कृति
को
आगे
बढ़ा
रहा
था।
लंका-निवासिनी
लैला, मातंगी आदि राक्षसियों
के
आपसी
झगड़ों
व
परपुरुषगामी
व्यवहार
पर
सीता
कहती
हैं
कि
अपने
इस
व्यवहार
के
कारण
ही
तुम
राक्षसी
कहलाती
हो।
एक-दूसरे
के
साथ
प्रेम-सद्भाव
से
रहने
व
एकपतिव्रत
का
पालन
करने
से
तुम
भी
सभ्य
कहलाओगी।
इसका
वैज्ञानिक
कारण
बताते
हुए
वह
उन्हें
समझाती
हैं
कि
अनेक
पुरुषों
के
साथ
संभोग
करने
से
तरह-तरह
के
स्त्री-रोग
होते
हैं।
लेखिका
का
मानना
है
कि
देव-दनुज-मानव
आदि
जातियों
में
कोई
भेद
नहीं
है, भेद वस्तुतः संस्कृति
का
है।
सीता
से
वार्तालाप
में
त्रिजटा
भी
इसी
आशय
का
भाव
आर्य
संस्कृति
की
प्रशंसा
करते
हुए
प्रकट
करती
है
कि
जो
अपने
लिए
ही
जिए
वही
दानव
है
और
जो
दूसरों
के
लिए
जिए
वह
मानव
है।
युद्धक्षेत्र
में
अपने
सेनापतियों
के
साथ
राम
का
संवाद
भी
इसकी
पुष्टि
करता
है
कि
यह
वस्तुतः
दो
संस्कृतियों
के
मध्य
का
संघर्ष
है
- "कहीं
ऐसा
न
हो
कि
अपनी
मृत्यु
सामने
आते
देख
रावण
उनके
(सीता
के)
साथ
अन्याय
कर
बैठे, उन्हें जीवित ही
न
छोड़े।
फिर
हमारे
लिए
लंका
जीतकर
भी
क्या
होगा।
उनके
गुप्तचरों
को
अपने
पक्ष
में
करके
सीता
की
सुरक्षा
का
प्रबंध
भी
करते
रहना
है।
सीता
मात्र
मेरी
पत्नी
ही
नहीं, वे आर्य संस्कृति
की
प्रतीक
भी
हैं।
उनकी
सुरक्षा
करना
हमारा
कर्तव्य
है।
यह
सत्य
है
कि
वे
इस
युद्ध
का
कारण
बनी
हैं, परंतु इस युद्ध
में
निश्चित
ही
राक्षस
संस्कृति
की
पराजय
होगी।
ऋषि
विश्वामित्र
और
अगस्त्य
ऋषि
के
संकल्प
पूरे
होंगे।"
यहाँ
ध्यान
देने
योग्य
बात
यह
है
कि
“राम
की
विजय
में
सीता
के
सत्याग्रह
की
बड़ी
भूमिका
है।
राम
के
साथ
वानर-भालुओं
की
सेना
थी, सुग्रीव और विभीषण, हनुमान, जाम्बवान
और
अंगद
जैसे
मंत्री
और
महावीर
थे, लक्ष्मण जैसा तेजस्वी
शूरवीर
भाई
था।
सीता
का
प्रतिरोध
तो
एक
अकेले
व्यक्ति
का
सत्याग्रह
था।
राम
की
विजय
सीता
के
इस
एकाकी
सत्याग्रह
पर
निर्भर
थी।
सीता
यदि
रावण
के
आगे
समर्पण
कर
देतीं
तो
राम
का
सारा
पुरुषार्थ, सारा बल-विक्रम, सारा सैनिक बल
धरा
रह
जाता।
सीता
राम
की
शक्ति
हैं।”
इसीलिए
महात्मा
गाँधी
ने
कहा
कि
राम
का
यश
सीता
पर
निर्भर
है।
रावण
के
वध
के
उपरांत
राम
ने
विभीषण
को
लंका
का
राजा
बनाया।
अपने
राज्याभिषेक
में
शासन
की
प्राथमिकताएँ
तय
करते
समय
विभीषण
भी
घोषणा
करते
हैं
कि
ऋषियों
की
आर्य-संस्कृति
का
विकास
लंका
तक
होगा।
इस
अवसर
पर
राम
का
कथन
उल्लेखनीय
है
- "मित्र
विभीषण!
आपने
मेरा
साथ
देकर
मानव
संस्कृति
के
हित
में
काम
किया
है।
आप
अपने
सुकर्म
के
लिए
युगों-युगों
तक
जाने
जाएँगे।
मानव
और
राक्षस
के
शरीर
में
फ़र्क
नहीं
है।
ये
दो
अलग-अलग
वृत्तियाँ
हैं।
रावण
विद्वान्
होकर
भी
राक्षसी
वृत्ति
का
था।
उसके
प्रजाजन
भी
उसी
राह
पर
चलने
लगे
थे।
राजा
विभीषण, आपका कुल उत्तम
रहा
है।
अपने
कुल
के
महापुरुषों
को
स्मरण
कर
मानवीय
मूल्यों
की
प्रतिष्ठा
करिए।
आप
सब
भी
आर्य
हो।
एक
अत्याचारी
राजा
के
कारण
सारी
जातियाँ
अनार्य
नहीं
हो
सकतीं।"
राम
से
मिलन
से
पूर्व
‘सीता
की
अग्निपरीक्षा’
एक
ऐसा
प्रश्न
जो
संभवतः
आज
भी
अनुत्तरित
है।
सीता
ने
क्यों
स्वीकार
की
अग्निपरीक्षा? उपन्यास में सीता
कहती
हैं
कि
यह
हमारे
दाम्पत्य
जीवन
की
पहली
गाँठ
थी।
अग्नि
पर
चलने
पर
पांवों
पर
फफोले
भले
ही
न
पड़े
हों, मन पर अवश्य
पड़
गए।
हनुमान
द्वारा
इस
संबंध
में
पूछे
जाने
पर
राम
भावी
लोकोपवाद
की
ओर
संकेत
करते
हैं
कि
मेरे
राज्याभिषेक
के
उपरांत
जनता
में
घूमना-फिरना, यह बात समझ
में
आ
जाएगी।
लंका
से
लौटते
हुए
राम-सीता
किष्किन्धा
में
रुकते
हैं।
वहाँ
सीता
का
तारा
से
मिलाप
होता
है।
वह
सीता
को
बताती
है
कि
राम-रावण
युद्ध
में
सुग्रीव
के
व्यस्त
रहने
पर
तारा
ने
सारी
राज-व्यवस्था
संभाली
थी।
सीता
द्वारा
आश्चर्यमिश्रित
भाव
से
प्रश्न
करने
पर
वह
आत्मविश्वास
से
उत्तर
देती
है
कि
संसार
में
जो
सारे
काम
पुरुष
कर
सकता
है, वह स्त्री भी
कर
सकती
है।
राजकाज
के
सफल
संचालन
के
लिए
राजा
को
अपनी
पत्नी
से
अवश्य
सलाह
करनी
चाहिए।
स्त्री
सशक्तीकरण
की
प्रतीक
प्रातः-स्मरणीय
पंचकन्याओं
में
तारा
का
नाम
श्रद्धा
से
लिया
जाता
है।
अयोध्या
लौटने
पर
राम-सीता
और
लक्ष्मण
का
भव्य
स्वागत
होता
है।
राम
का
राज्याभिषेक
होता
है, सीता महारानी बनती
हैं।
दो
महीने
बाद
ही
सीता
के
गर्भवती
होने
का
समाचार
सीता-राम
और
राजपरिवार
सहित
संपूर्ण
अयोध्या
में
हर्ष
का
संचार
करता
है
किन्तु
कुछ
ही
दिनों
बाद
राम
द्वारा
सीता
का
परित्याग
करना
और
गर्भवती
सीता
को
वनवास
देना
राम
पर
एक
ऐसा
प्रश्न
आरोपित
करता
है
जिसका
उत्तर
न
राम
के
पास
था
और
न
‘सीता
निर्वासन
एक
झूठी
कथा’
लिखकर
उन्हें
मर्यादा
पुरुषोत्तम
सिद्ध
करने
वाले
उनके
पक्षधरों
के
पास।
जिसके
लिए
युग
बीत
जाने
पर
भी
लोक
ने
अभी
तक
उन्हें
क्षमा
नहीं
किया
है।
सीता
के
महर्षि
वाल्मीकि
के
आश्रम
में
रहते
हुए
लव-कुश
के
जन्म
पर
वनवासी
स्त्रियों
द्वारा
गीत
गाए
गए
जिनमें
एक
बधावा
के
शब्दों
का
आशय
था
– “चारों
ओर
समाचार
फैला
दो
कि
सीता के दो लाल
हुए
हैं।
किंतु
राम
को
सूचना
नहीं
मिलनी
चाहिए।
अयोध्या
में
सास, देवर-देवरानी सबको
सूचित
करो, पर राम को
नहीं।
उन्हें
भूल
से
भी
यह
समाचार
नहीं
मिलना
चाहिए।"
यह
इस
बात
का
प्रमाण
है।
महर्षि
वाल्मीकि
के
निर्देशन
में
दोनों
बालक
शस्त्र
व
शास्त्र
की
शिक्षा
ग्रहण
करते
हैं।
गुरुदेव
उन्हें
स्वरचित
रामकाव्य
के
छंद
कंठस्थ
कराते
हैं।
नैमिषारण्य
में
यज्ञ
के
अवसर
पर
महर्षि
वाल्मीकि
लव-कुश
से
अपने
रामकाव्य
का
गान
कराते
हैं।
राम
उन्हें
पहचान
लेते
हैं।
महर्षि
वाल्मीकि
भी
इसकी
पुष्टि
करते
हैं
कि
ये
आपके
ही
पुत्र
हैं।
महर्षि
वाल्मीकि
से
वे
सीता
को
नैमिषारण्य
लिवा
लाने
का
निवेदन
करते
हैं।
महर्षि
वाल्मीकि
सीता
को
लेकर
उपस्थित
होते
हैं।
उपस्थित
जनसमुदाय
सीता
के
मुख
से
अपनी
शुद्धि
के
प्रमाण-शब्दों
को
सुनने
की
प्रतीक्षा
में
है।
सीता
घोषणा
करती
हैं-
"मैं
पृथ्वी-पुत्री
सीता
इन
दोनों
पुत्रों
की
जननी
हूँ।
इक्ष्वाकु
वंश
को
ये
दोनों
संतानें
उनके
प्रतापी
वंश
को
अर्पित
कर
मैंने
अपना
दायित्व
पूर्ण
किया।
माँ
के
सत
की
घोषणा
नहीं
होती
और
परीक्षा
भी
नहीं।
माँ
तो
माँ
होती
है।
उसी
के
गर्भ
से
संतान
पैदा
होती
है।
यह
सत्य
है
और
इसीलिए
मातृत्व
शिव
एवं
सुंदर
भी
है।
असंख्य
संतानों
की
माँ
धरती
का
अंश
अब
मैं
अपनी
माँ
के
सान्निध्य
में
जाना
चाहती
हूँ।
चलते-चलते
बहुत
थक
चुकी
हूँ, मानो शक्ति क्षीण
हो
गई
है।
शक्ति-प्राप्ति
के
लिए
धरती
ही
उपयुक्त
स्रोत
है।
मैं
कुश
एवं
लव
की
जननी
और
पालनकर्त्री
अब
अपनी
जननी
का
आलिंगन
करना
चाहती
हूँ, उसके सत में
विलीन
हो
जाना
चाहती
हूँ।"
यह
कहकर
सीता
धरती
में
विलीन
हो
गईं।
राम
के
साथ
उपस्थित
जनसमूह
भी
बिलख
उठा
– ‘सीता
धरती
में
गइली
समाय
मुखहूँ
नहीं
बोलली
हे।’
सीता
ने
राम
को
क्षमा
किया
या
नहीं
यह
तो
वही
जानें, किन्तु उन्होंने अपनी
पीड़ा
का
मान
अवश्य
रख
लिया।
निष्कर्ष : मृदुला सिन्हा का
यह
उपन्यास
आज
के
तथाकथित
फेमिनिज्म
के
मुहावरे, व्याकरण और भाषायी
औजारों
के
बिना
ही
भारतीय
संस्कृति
की
एक
महत्त्वपूर्ण
पात्र
सीता
की
पुनः
सर्जना
करता
है।
इस
उपन्यास
में
लेखिका
ने
वे
तमाम
सवाल
सीता
के
माध्यम
से
उठाए
हैं
जो
आज
की
लड़कियों
को
बेचैन
किए
रहते
हैं, जिन्हें पूछना तथाकथित
सभ्य
परिवारों
में
विद्रोह
समझा
जाता
है।
साथ
ही
आज
की
युवा
पीढ़ी
जो
इन
ऐतिहासिक-पौराणिक
पात्रों
को
मिथक
कहकर
ख़ारिज
करती
है, जो आधुनिकता के
नाम
पर
इन्हें
आउटडेटेड
करार
देती
है, उसे यह उपन्यास
अवश्य
पढ़ना
चाहिए।
यह
उपन्यास
सीता
और
राम
को
उनके
दैवीय
स्वरूप
के
घटाटोप
से
निकालकर
सहज
मानवीय
रूप
में
प्रस्तुत
करता
है।
सहायक आचार्य, हिंदी स्व. राजेश पायलट राजकीय महाविद्यालय, बांदीकुई
vishu.upadhyai@gmail.com, 9887414614

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