हम गुनहगार और बेशर्म औरतें : स्त्री अस्मिता और पितृसत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का काव्य
(कविता कादंबरी के काव्य-संग्रह ‘हम गुनहगार और बेशर्म औरतें’ का आलोचनात्मक मूल्यांकन)
- सन्तोष विश्नोई
कुछ कविताएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतरकर हमारी सोच, संवेदना और स्थापित मान्यताओं को बदल देती हैं। वे शब्दों के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव, प्रतिरोध और आत्मबोध के रूप में हमारे भीतर जीवितरहती हैं। कविता कादंबरी की रचनाएँ इसी प्रकार की सृजनात्मक उपस्थिति दर्ज कराती हैं, जहाँ कविता केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रह जाती, बल्कि वह प्रश्न बनती है, टकराव बनती है, और अंततः एक नए बौद्धिक तथा भावनात्मक पुनर्निर्माण का आधार बन जाती है। समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में कविता कादंबरी एक महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट स्वर के रूप में उपस्थित हैं। उन्हें केवल ‘कवयित्री’ कहना उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा, क्योंकि वे केवल कविता नहीं लिखतीं, बल्कि भाषा के भीतर छिपी सत्ता-संरचनाओं को पहचानती, उन्हें चुनौती देती और नए अर्थ-संसार की रचना करती हैं। उनकी कविता परंपरागत काव्य-संरचनाओं में बंधी हुई नहीं है; वह उन संरचनाओं को तोड़कर अपने लिए एक स्वतंत्र और साहसी स्पेस निर्मित करती है। उनकी रचनाओं में स्त्री कोई विषय मात्र नहीं, बल्कि विचार का केंद्र है। वह करुणा की पात्र नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जीवन को परिभाषित करने वाली सशक्त उपस्थिति है। कविता कादंबरी की कविताएँ स्त्री-अनुभव को निजी दायरे से निकालकर सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करती हैं। यहाँ स्त्री की चुप्पी भी बोलती है और उसका विद्रोह भी भाषा का नया व्याकरण रचता है। कुल तिहत्तर (73) कविताओं के साथ उनका काव्य-संग्रह ‘हम गुनहगार और बेशर्म औरतें’ इस रचनात्मक दृष्टि का अत्यंत सशक्त उदाहरण है। यह संग्रह केवल स्त्रियों के अनुभवों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिरोध-पत्र है। इसमें वे स्त्रियाँ बोलती हैं जिन्हें समाज ने असभ्य, बेशर्म या विद्रोही कहकर हाशिए पर धकेलने की कोशिश की, किंतु जिन्होंने अपनी आवाज़ खोने से इनकार कर दिया। यह संग्रह उन स्त्रियों की कथा नहीं कहता जिन्हें समाज ने परिभाषित किया है, बल्कि उन स्त्रियों की आवाज़ बनता है जो अपनी परिभाषाएँ स्वयं गढ़ रही हैं। यहाँ कविता एक जीवित प्रक्रिया है—जो समय, समाज, स्मृति और निजी अनुभवों के बीच लगातार रूपांतरित होती रहती है। यही कारण है कि यह काव्य-संग्रह केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समकालीन स्त्री-विमर्श की एक सशक्त वैचारिक उपस्थिति बनकर सामने आता है।इस संग्रह की पहली कविता ‘मेरे बेटे’ है, जो अपने सहज कथ्य और गहन जीवन-दृष्टि के कारण पाठक को सीधे संबोधित करती है। इस कविता में एक माँ अपने बेटे कों सफलता की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय एक संवेदनशील, व्यावहारिक और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान बनने की सीख देती है। सतही तौर पर यह एक माँ का अपने बेटे के लिए उपदेश लगती है लेकिन भीतर से यह समाज के बनाए कृत्रिम मानदंडों, पाखंडों और वर्ग-विभाजन पर गहरी चोट करती है। “मेरे बेटे/ कभी इतने ऊँचे मत होना / कि कंधे पर सिर रखकर कोई रोना चाहे तो/उसे लगानी पड़े सीढ़ियाँ... इतने धार्मिक मत होना / कि ईश्वर को बचाने के लिए इंसान पर उठ जाए तुम्हारा हाथ / न कभी इतने देशभक्त कि किसी घायल को उठाने को झंडा ज़मीन पर न रख सको” “न कभी इतने…” की पुनरावृत्ति कविता को एक लयात्मक संरचना प्रदान करती है और पाठक के मन में विचारों को स्थिर करती है। यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन में वास्तविक परिपक्वता किसी एक छोर पर पहुँचने में नहीं, बल्कि विभिन्न छोरों के बीच संतुलन बनाए रखने में निहित है। इसी कारण यह कविता न केवल एक पारिवारिक संवाद बनकर रह जाती है, बल्कि एक व्यापक मानवीय संदेश का रूप धारण कर लेती है। यह कविता मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का एक सशक्त प्रयास है, जो पाठक कों आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। यह रचना न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक और वैचारिक स्तर पर भी अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होती है।
समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-अनुभव, प्रतिरोध और मानवीय संबंधों की पुनर्व्याख्या एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति के रूप में उभरी है। कविता कादंबरी की “तुम्हारे साथ चलना” एक ऐसी कविता है, जो प्रेम को निजी अनुभव से निकालकर सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध का माध्यम बना देती है। कविता की आरंभिक पंक्तियाँ- “जब हम साथ-साथ चलते हैं / तो हमारे कंधे रगड़ खाते हैं”- सहयात्रा की एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली स्थिति को गहरे प्रतीक में रूपांतरित कर देती हैं। यहाँ “कंधों का रगड़ खाना” केवल शारीरिक निकटता का संकेत नहीं, बल्कि समानता, साझेदारी और संघर्ष की एक संयुक्त प्रक्रिया का रूपक है। आगे कवयित्री यह भी कहती हैं कि इस साथ चलने से “इतिहास की न जाने कितनी ही भूलों के निशान मिटने लगते हैं”-यह कथन कविता को निजी से सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में विस्तारित कर देता है। कविता का केंद्रीय स्वर प्रतिरोध का है, जो विशेषतः स्त्री-अनुभव से जुड़ा हुआ है। कवयित्री उन स्त्रियों को देखती हैं जिन्हें “चौक के बीचों-बीच संगसार” किया गया था, और जो अब धूल झाड़कर अपने प्रेमियों का हाथ थामे, सिर उठाकर, गीत गाते हुए “कातिल भीड़ को चीरकर” बाहर निकल आती हैं। यह दृश्य न केवल दमन के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक है, बल्कि स्त्री की आत्मनिर्भरता और पुनर्जन्म की घोषणा भी है। इसी क्रम में कविता प्रेम को सामाजिक बंधनों से मुक्त करने का प्रयास करती है। “देह, जाति, धर्म और बिरादरी की सीमाओं के बाहर” प्रेम करने वाले पुरुषों और स्त्रियों का चित्रण इस बात का संकेत है कि प्रेम एक स्वायत्त मानवीय अनुभव है, जिसे किसी सामाजिक या सांस्कृतिक चौखटे में सीमित नहीं किया जा सकता। यहाँ प्रेम, विद्रोह का माध्यम बन जाता है-एक ऐसा विद्रोह जो मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा है। कविता में बच्चों, युवतियों और सामान्य जनजीवन के बिंबों के माध्यम से एक व्यापक सामाजिक यथार्थ उभरता है। “अंधे कहकर जिंदा गाड़ दिए गए बच्चों” का दृश्य हो या “नंगा कर दी गई लड़कियों” का चित्रण - ये सभी बिंब समाज की क्रूरता और अमानवीयता को उजागर करते हैं। किंतु कवयित्री इन त्रासद स्थितियों में भी आशा और प्रतिरोध की संभावनाएँ खोजती हैं-बच्चे “फूलों की तरह खिलखिला रहे हैं” और स्त्रियाँ “क्षितिज को नाप रही हैं”। इस प्रकार कविता निराशा के बीच आशा का संचार करती है। भाषा और शिल्प की दृष्टि से कविता मुक्तछंद में रचित है, जिसमें संवादात्मकता और कथात्मकता का सुंदर समन्वय है। “मैं देखती हूँ” की पुनरावृत्ति कविता को एक साक्षी-भाव प्रदान करती है, जिससे कवयित्री एक संवेदनशील दर्शक और सक्रिय भागीदार दोनों के रूप में उभरती हैं। कविता का एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब “तुम” यह कहते हो कि “साथ-साथ चलना नितांत व्यक्तिगत क्रिया है।” यह कथन व्यक्तिगत और सामाजिक के द्वंद्व को सामने लाता है। कवयित्री इसका प्रत्युत्तर देते हुए स्पष्ट करती हैं कि “तुम्हारे साथ चलना रास्ते नापना भर नहीं है,” बल्कि यह “प्रतिरोध का गीत गाना” और “धरती के इंच-इंच पर प्रेम का मैनिफेस्टो लिखना” है। यहाँ कविता अपने चरम पर पहुँचती है, जहाँ प्रेम और प्रतिरोध एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। यह कविता स्त्री-स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और समानता के पक्ष में एक सशक्त काव्यात्मक वक्तव्य है। इसकी प्रासंगिकता आज के समय में और अधिक बढ़ जाती है, जब समाज में विभाजन और असहिष्णुता के स्वर प्रबल हो रहे हैं। ऐसे में यह कविता हमें याद दिलाती है कि साथ चलना केवल एक व्यक्तिगत क्रिया नहीं, बल्कि एक साझा संघर्ष और परिवर्तन की प्रक्रिया है।
समकालीन हिंदी कविता में ‘प्रगति’ और ‘आधुनिकता’ जैसे शब्दों की आलोचनात्मक पुनर्समीक्षा एक महत्वपूर्ण विमर्श के रूप में उभरी है। “प्रगति का पहिया” इसी विमर्श को केंद्र में रखकर लिखी गई एक तीक्ष्ण और वैचारिक कविता है, जो विकास, स्त्री-मुक्ति और सामाजिक परिवर्तन के प्रचलित नारों के पीछे छिपे यथार्थ को उजागर करती है। कविता का केंद्रीय बिंदु ‘नेपथ्य’ और ‘रंगमंच’ के द्वंद्व में निहित है। मंच पर जहाँ प्रगति का उज्ज्वल चेहरा प्रस्तुत किया जाता है, वहीं नेपथ्य में “दबा दी गई कहानियाँ”, “अनसुने षड्यंत्र” और “छुपे घाव” मौजूद हैं। यह विभाजन आधुनिक समाज की उस संरचना को उद्घाटित करता है, जिसमें सत्ता और प्रभुत्व अपने अनुकूल आख्यान रचते हैं, जबकि हाशिए की आवाज़ों को दबा दिया जाता है। कवयित्री जब कहती है- “इतिहास का पर्दा उठा तो देखेंगे” तो वह इतिहास की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता की ओर संकेत करती है। कविता विशेष रूप से स्त्री-विमर्श के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठती है। यहाँ ‘स्त्री’ और ‘मुक्ति’ के नाम पर किए जा रहे प्रगतिशील दावों की पोल खोली गई है। कवयित्री उन ‘प्रगतिवादी’ चेहरों को बेनकाब करती है, जो बाहर से परिवर्तनकारी प्रतीत होते हैं, किंतु निजी जीवन में वही शोषणकारी प्रवृत्तियाँ बनाए रखते हैं। “छोड़ दिया स्त्री को अपने / कई झूठे आरोप लगाकर” जैसी पंक्तियाँ इस दोहरे चरित्र को उजागर करती हैं। इस प्रकार कविता प्रगतिशीलता के आडंबर पर तीखा प्रहार करती है। कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसकी आत्म-आलोचनात्मक दृष्टि भी है। कवयित्री केवल समाज या व्यवस्था की आलोचना नहीं करती, बल्कि साहित्यिक और बौद्धिक वर्ग को भी कटघरे में खड़ा करती है।
इस संग्रह की अगली कविता ‘इग्नोर इट’ समकालीन स्त्री-अनुभूति की जटिलताओं, प्रेम की विडंबनाओं और सामाजिक संरचनाओं के भीतर छिपे सत्ता-तंत्र की तीखी पड़ताल करती है। यह कविता केवल प्रेम का भावुक आख्यान नहीं है, बल्कि प्रेम के नाम पर स्त्री के अस्तित्व, स्वतंत्रता और संवेदना पर किए जाने वाले अदृश्य नियंत्रणों का सशक्त उद्घाटन है। कविता का आरंभ ही “प्रेम कहने वाले सूक्ष्मदर्शी लेकर आये” जैसी पंक्ति से होता है, जो संकेत देती है कि यहाँ प्रेम स्वाभाविक अनुभूति नहीं, बल्कि एक ‘जांच’ का विषय बना दिया गया है। प्रेम करने वाले व्यक्ति को संवेदनशील साथी के बजाय एक निरीक्षक, नियंत्रक और संशोधक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। “मेरी कविताओं की पड़ताल” और “अवांछित तत्व निकाल देना” जैसे बिंब यह स्पष्ट करते हैं कि स्त्री की अभिव्यक्ति पर निरंतर निगरानी रखी जाती है, और उसे एक निश्चित ढाँचे में ढालने की कोशिश की जाती है। यह प्रेम नहीं, बल्कि एक प्रकार का सांस्कृतिक अनुशासन है। कविता में प्रयुक्त “भारी भरकम जंजीरें”, “अटूट ताले” और “कैंची जुबान” जैसे प्रतीक अत्यंत प्रभावी हैं। ये प्रतीक केवल बाहरी बंधनों का ही नहीं, बल्कि मानसिक और भाषिक नियंत्रण का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। विशेषतः “कैंची जुबान” स्त्री की वाणी पर लगाए गए प्रतिबंधों की ओर संकेत करती है, जहाँ उसे अपनी बात कहने के पहले ही काट दिया जाता है। यहाँ प्रेम एक दमनकारी शक्ति के रूप में उभरता है, जो स्त्री की स्वायत्तता को सीमित करता है। कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें प्रेम के आदर्शों की “लंबी फेहरिस्त” प्रस्तुत की गई है। यह फेहरिस्त दरअसल उन सामाजिक अपेक्षाओं का रूपक है, जिन्हें स्त्री पर थोपा जाता है। “गहरी नींद और बीमारी से झकझोर कर उठाया जाना” इस बात का द्योतक है कि स्त्री को अपनी सुविधा या असुविधा की परवाह किए बिना इन आदर्शों को निभाना होता है। यहाँ प्रेम एक परीक्षा बन जाता है, जिसमें सफल होने के लिए आत्म-त्याग अनिवार्य कर दिया जाता है। कविता का मध्य भाग प्रेम के सामाजिक और धार्मिक आयामों की आलोचना करता है। “धर्मग्रंथों की कसमें”, “बंदूकों की बटों पर हाथ” और “पूजा स्थलों के टूटने-बनने पर गीत” जैसे चित्र प्रेम के राजनीतिक और हिंसक रूप को उजागर करते हैं। यह प्रेम नहीं, बल्कि सत्ता का एक उपकरण है, जो भावनाओं के माध्यम से नियंत्रण स्थापित करता है। इस संदर्भ में “पिता के शव पर खेलते बच्चों” का चित्र अत्यंत मार्मिक और विडंबनापूर्ण है, जो यह दर्शाता है कि प्रेम के नाम पर मानवीय संवेदनाएँ किस हद तक क्षीण हो चुकी हैं। कविता का अंतिम भाग आत्मबोध और प्रतिरोध का स्वर प्रस्तुत करता है। “और मैं प्रेम की तमाम दहशतगर्दियों से भागती रही दूर” -यह पंक्ति स्त्री के भीतर जागृत हो रहे आत्म-संरक्षण के भाव को व्यक्त करती है। यहाँ प्रेम अब आकर्षण का केंद्र नहीं, बल्कि भय का स्रोत बन गया है। “इग्नोर इट” कहना एक प्रकार का प्रतिरोध है - एक ऐसा प्रतिरोध जो सीधे टकराव के बजाय उपेक्षा के माध्यम से व्यक्त होता है। दूसरे खंड “और तुम” में स्वर अपेक्षाकृत नरम होता है, लेकिन उसमें भी एक गहरी विडंबना छिपी है। यहाँ प्रेम को “ठंडी सीली यात्राओं का अद्भुत साथी” कहा गया है, जो एक ओर सांत्वना देता है, तो दूसरी ओर भीतर की “गीली राख” और “गहरी निराशा” को भी उजागर करता है। यह द्वंद्वात्मक स्थिति कविता की संवेदनात्मक गहराई को बढ़ाती है।
इस संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता ‘बेईमान प्रार्थनाएँ’ समकालीन समाज की उस विडंबना को उजागर करती है, जहाँ एक ओर मेहनतकश वर्ग विशेषतः स्त्रियाँ अपने श्रम, अभाव और संघर्ष के बीच जीवन जीती हैं, वहीं दूसरी ओर उनके श्रम का लाभ उठाने वाला वर्ग धर्म, ईश्वर और प्रार्थना के नाम पर नैतिक वैधता हासिल कर लेता है। कविता का मूल स्वर सामाजिक अन्याय, वर्ग-भेद और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध एक तीखा प्रतिरोध है। कविता की शुरुआत ही श्रमजीवी स्त्रियों के कठोर यथार्थ से होती है- “अगाढ़ के महीने में / ये पके रंग वाली मेहनतकश औरतें…/ अपना डेरा डंडा” यहाँ ‘पके रंग वाली’ औरतें श्रम और धूप से तपे जीवन का प्रतीक हैं। वे अपने पूरे परिवार के साथ विस्थापन और जीविका की तलाश में भटकती हैं- “बूढ़ पुरनियाँ, बच्चा बुतरू सब लेकर / घर झारकर उठ आयी हैं / बहुत दूर” यह उद्धरण उनके अस्थायी जीवन और मजबूरी का सशक्त चित्र प्रस्तुत करता है। कविता में इन स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को और गहराई से दिखाया गया है- “मंदिर के पीछे / और मंदिर से दूर” यहाँ एक तीखा व्यंग्य निहित है कि जो वर्ग सबसे अधिक श्रम करता है, वही धर्म-संस्थानों के केंद्र से बाहर रखा जाता है। वे ‘मंदिर’ के आसपास हैं, पर उसके भीतर नहीं—यह उनकी सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक है। उनके जीवन की न्यूनतम इच्छाएँ भी अधूरी रह जाती हैं- “जिनकी आँखों के लिये इस उम्र में भी /दिन में देखा गया सपना ही है /दो मुट्ठी भात” यह पंक्ति अत्यंत मार्मिक है, जहाँ ‘दो मुट्ठी भात’ जैसे साधारण भोजन को भी सपना बताया गया है। यह गरीबी की चरम स्थिति को उजागर करता है। कविता इन स्त्रियों के श्रम की कठोरता और शारीरिक पीड़ा को भी रेखांकित करती है- “खड़ी दोपहर में / बाल बच्चों को छोड़ /… /उतर जाती हैं” और “बाढ़ उतर जाने के बाद / कमर तोड़कर रोपती हैं धान” ये पंक्तियाँ उनके अथक परिश्रम और जीवन-संघर्ष का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। इसके साथ ही उनकी दयनीय जीवन-स्थितियाँ भी सामने आती हैं- “खुली भूख लिये / आधा पेट खाती हैं / गीत गाती हैं” यहाँ भूख और गीत का विरोधाभास एक गहरी संवेदनात्मक विडंबना उत्पन्न करता है दुख के बीच भी जीवन को ढोने की मजबूरी। कविता का सबसे तीखा व्यंग्य उस समय सामने आता है जब श्रम का वास्तविक श्रेय किसी और को दे दिया जाता है- “फसल लहलहा जाती है/ जोत मालिक/ आसमान की तरफ उठाता है हाथ/ और उस ईश्वर को देता है धन्यवाद/ जिसके पसीने की एक बूंद तक नहीं टपकी है उसके खेत में” यहाँ ‘जोत मालिक’ और ‘ईश्वर’ दोनों पर कटाक्ष है। जो लोग वास्तव में श्रम करते हैं, वे अदृश्य हैं, जबकि श्रेय किसी और को मिल जाता है। यह पंक्ति पूरी कविता की वैचारिक धुरी है। इसी संदर्भ में कवयित्री एक गहरा प्रश्न उठाती हैं— “इन पेट कटवा बेर्ईमानों का / कौन सा बेईमान ईश्वर है!” यह प्रश्न केवल धार्मिक आस्था पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी चोट करता है, जो श्रमजीवियों के शोषण को सामान्य बना देती है। अंततः कविता ‘बेईमान प्रार्थनाओं’ की अवधारणा को स्पष्ट करती है— “जो स्वीकार करता है बेईमान प्रार्थनाएँ/ और हड़प जाता है मेहनतकशों का हिस्सा/ बिना हिचके और बिना सवाल किए” यहाँ ‘बेईमान प्रार्थनाएँ’ वे हैं, जो दूसरों के श्रम का शोषण करके की जाती हैं और फिर ईश्वर के नाम पर उसे सही ठहराया जाता है।
इस संग्रह की एक और उल्लेखनीय कविता “बंजर होने का घोषणापत्र” है। समकालीन हिंदी कविता में ‘बाजार’ और ‘मनुष्य’ के संबंधों पर जितनी तीक्ष्ण और रूपकात्मक अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं, यह कविता उसी परंपरा का सशक्त उदाहरण है। “बंजर होने का घोषणापत्र” शीर्षक ही अपने भीतर एक गहरी विडंबना और प्रतिरोध की चेतना समेटे हुए है। ‘घोषणापत्र’ सामान्यतः किसी सक्रिय, सकारात्मक या क्रांतिकारी कार्यक्रम का सूचक होता है, परंतु यहाँ ‘बंजर होने’ का घोषणापत्र—अर्थात् जीवन, सृजन और उर्वरता से इंकार—अपने आप में एक गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक संकट की ओर संकेत करता है। कविता का आरंभ “मिट्टी की देह बंजर ही रहने दो” जैसे वाक्य से होता है, जो सीधे-सीधे एक नकारात्मक आग्रह है। यह नकार वस्तुतः प्रतिरोध का रूप है। ‘मिट्टी’ यहाँ केवल भौतिक धरती नहीं, बल्कि मानवीय चेतना, संवेदना और अस्तित्व का प्रतीक है। कवि यह स्वीकार नहीं करता कि इस मिट्टी में ‘धतूरे के बीज’ बोए जाएँ—धतूरा, जो विषाक्तता और भ्रम का प्रतीक है। इस प्रकार कविता बाजारवादी व्यवस्था द्वारा फैलाए जा रहे विषैले मूल्यों को अस्वीकार करने का आह्वान करती है। आगे की पंक्तियों में “बाजार से लौटे प्रेमियों” का चित्रण अत्यंत सार्थक है। ये प्रेमी अपने “ओठों के गुलाब” रोपना चाहते हैं, लेकिन उनके हाथ किसान के नहीं हैं। यहाँ ‘प्रेम’ भी कृत्रिम और उपभोग की वस्तु बन चुका है। प्रेम का स्वाभाविक, श्रमसाध्य और धरती से जुड़ा रूप समाप्त हो गया है; उसकी जगह एक बनावटी, सजावटी और बाज़ारी प्रेम ने ले ली है। “इत्र के भभके” से भरी देह इस कृत्रिमता को और स्पष्ट करती है—यह सुगंध भी प्राकृतिक नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति की देन है। कविता का एक अत्यंत मार्मिक बिंदु है—“बच्चों का भूख से मर जाना जब रोजमर्रा की खबर हो…”। यहाँ कवि समाज की क्रूर वास्तविकता को उजागर करता है। एक ओर बाजार में ‘गुलाबों की खेती’ हो रही है, दूसरी ओर बच्चे भूख से मर रहे हैं। यह विरोधाभास पूंजीवादी व्यवस्था की अमानवीयता को तीखे ढंग से सामने लाता है। ‘गुलाब’ यहाँ विलासिता और सौंदर्य का प्रतीक है, जबकि ‘भूख’ जीवन की मूल आवश्यकता। जब समाज में प्राथमिकताएँ उलट जाती हैं, तब ‘मिट्टी’ का बंजर होना ही एक नैतिक प्रतिरोध बन जाता है। कविता के उत्तरार्द्ध में “धरतीखोरों” द्वारा किसानों को “भू-मानचित्र की सीमाओं के बाहर” धकेल देने का बिंब अत्यंत प्रभावशाली है। यह वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में किसानों के विस्थापन और हाशियाकरण की ओर संकेत करता है। किसान, जो धरती का असली स्वामी और संरक्षक है, वही अब अपनी ही जमीन से बेदखल हो रहा है। इस विडंबना के कारण “मेरे माथे पर बड़ी-बड़ी दरारें” उभर आती हैं—यह दरारें केवल भूमि की नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ताने-बाने की टूटन का प्रतीक हैं। कविता का अंतिम कथन—“बंजर होने का मेरा आखिरी घोषणापत्र है”—एक गहरी निराशा के साथ-साथ प्रतिरोध का चरम रूप है। यह निराशा पलायन नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति असहमति है जो जीवन के मूल्यों को नष्ट कर रही है। ‘बंजर होना’ यहाँ आत्मरक्षा का साधन बन जाता है—एक ऐसी स्थिति जहाँ मिट्टी खुद को विषाक्त बीजों से बचाने के लिए अपनी उर्वरता त्याग देती है। “बंजर होने का घोषणापत्र” केवल एक कविता नहीं, बल्कि हमारे समय की सामाजिक, आर्थिक और नैतिक विडंबनाओं का तीखा दस्तावेज है। यह कविता बाजारवाद के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध दर्ज करती है और यह प्रश्न उठाती है कि जब जीवन के मूल मूल्य ही नष्ट हो रहे हों, तब उर्वरता का क्या अर्थ रह जाता है। इस दृष्टि से यह कविता समकालीन हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है।
इस संग्रह की ‘बेहया’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि समाज के दोहरे मापदंडों का आईना है। यह पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है कि आखिर ‘बेहयाई’ किसकी है—उस स्त्री की जो स्वतंत्र है, या उस समाज की जो उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं कर पाता। प्रस्तुत कविता ‘बेहया’ समकालीन समाज की मानसिकता, विशेषकर स्त्री-पुरुष संबंधों और सामाजिक दृष्टिकोण पर एक तीखी टिप्पणी करती है। कविता का शीर्षक ही अपने आप में अर्थपूर्ण है—‘बेहया’ शब्द सामान्यतः उस व्यक्ति के लिए प्रयोग होता है जिसे समाज शिष्टता के मानकों से बाहर मानता है। कवयित्री ने इसी शब्द को केंद्र में रखकर सामाजिक दोहरे मानदंडों को उजागर किया है। कविता की शुरुआत प्रकृति के चित्रण से होती है—“जब सूख जाते हैं सब ताल / झड़ जाते हैं सब पात…”। यह दृश्य एक सूखे, निष्प्राण वातावरण का संकेत देता है, जो केवल बाहरी प्रकृति ही नहीं, बल्कि समाज की आंतरिक संवेदनहीनता का भी प्रतीक है। “मौसम की आँखों में पीत उतर आना” एक गहरी बिम्बात्मक अभिव्यक्ति है, जो जीवन के क्षय और उदासी को दर्शाती है। इसके बाद कवयित्री अचानक सामाजिक परिदृश्य की ओर मुड़ती है। “कुछ लड़कियाँ अपनी पलकों पर हरियाली लिये फिरती हैं”—यह पंक्ति आशा, जीवंतता और स्वतंत्रता का प्रतीक है। यहाँ ‘हरियाली’ जीवन, ऊर्जा और सकारात्मकता का बोध कराती है। लेकिन इसी के साथ समाज की प्रतिक्रिया भी सामने आती है—“तिरछी आँखों से देखकर… औरतें मुँह बिचकाती हैं, फुसफुसाती हैं”। यह दर्शाता है कि स्त्री स्वयं भी पितृसत्तात्मक सोच से मुक्त नहीं है और वह अन्य स्त्रियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि रखती है। कविता का सबसे तीखा व्यंग्य अंत में प्रकट होता है, जहाँ पुरुषों का व्यवहार सामने आता है—“पुरुष जो चुपचाप चुन नहीं पाये उनके गुलाबी फूल… वे गला खंखार ऊँची करते हैं आवाज और कहते हैं उन्हें ‘बेहया’।” यहाँ ‘गुलाबी फूल’ स्त्री की सुंदरता, स्वतंत्रता या उसकी इच्छाओं का प्रतीक हो सकते हैं। जो पुरुष इन्हें ‘प्राप्त’ नहीं कर पाते, वही उन्हें ‘बेहया’ कहकर अपनी हताशा और असफलता को ढकने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार कविता समाज की उस मानसिकता पर प्रहार करती है जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता को सहज स्वीकार नहीं किया जाता। उसे या तो नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है या फिर अस्वीकार किए जाने पर उसे अपमानित किया जाता है। कवि ने अत्यंत सरल भाषा में गहरे सामाजिक सत्य को उजागर किया है, जो इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता है।
कविता कादंबरी की ‘मैं तुमसे प्रेम करती हूँ’ शीर्षक कविता पहली दृष्टि में एक साधारण प्रेम-कविता का भ्रम पैदा करती है, लेकिन जैसे-जैसे यह आगे बढ़ती है, प्रेम का उसका अर्थ पूरी तरह बदलता जाता है। यहाँ प्रेम दो व्यक्तियों के बीच सीमित भाव नहीं रह जाता, बल्कि एक व्यापक, सामूहिक और स्त्री-अनुभव से जुड़ा हुआ संवेदनात्मक विस्तार बन जाता है। यह कविता प्रेम की पारंपरिक परिभाषा को तोड़कर उसे एक नई नैतिक और मानवीय जमीन पर स्थापित करती है। कविता की शुरुआत में ही कवयित्री एक अप्रत्याशित मोड़ देती हैं—“मैं तुमसे प्रेम करती हूँ” कहने के साथ ही वह यह भी कहती हैं कि “मैं उन सभी स्त्रियों से प्रेम करती हूँ…”। यह विस्तार प्रेम को एक निजी दायरे से निकालकर साझा अनुभव में बदल देता है। यहाँ ‘तुम’ कोई एक पुरुष नहीं, बल्कि एक ऐसा केंद्र है जिसके चारों ओर अनेक स्त्रियों की स्मृतियाँ, संघर्ष और संबंध जुड़े हुए हैं। कविता में जिन स्त्रियों का उल्लेख है—वे वे स्त्रियाँ हैं जिनके साथ ‘तुम’ ने प्रेम किया, जिनके लिए कविताएँ लिखीं, जिनकी देह में अपने गीत बोए, जिनकी गोद में सुकून पाया। लेकिन कवयित्री इन स्त्रियों से ईर्ष्या नहीं करतीं, बल्कि उनके प्रति एक गहरी सहानुभूति और आत्मीयता व्यक्त करती हैं। यह दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्त्री को स्त्री की प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि उसकी सहयात्री के रूप में प्रस्तुत करता है। कविता का मध्य भाग अत्यंत संवेदनशील और बिंबात्मक है। कवयित्री उन स्त्रियों के लिए ‘पलाश’, ‘इंद्रधनुषी गजरे’, ‘गर्म पानी का परात’ और ‘कोमल फूल’ जैसी चीज़ों की कल्पना करती हैं। ये सभी बिंब देखभाल, स्नेह और सम्मान के प्रतीक हैं। यहाँ प्रेम केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि देखभाल और श्रम के रूप में भी व्यक्त होता है। यह एक तरह का ‘नारी-संघ’ (sisterhood) रचता है, जहाँ स्त्रियाँ एक-दूसरे के दुख-सुख में सहभागी हैं। कविता का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह स्त्रियों के त्याग और उनकी अदृश्य भूमिका को रेखांकित करती है—“ऐसे विषम समय में… उन्होंने तुम्हें इंसानी अस्तित्व की गरिमा के साथ बचाकर रखा।” यहाँ स्त्रियाँ केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि संरक्षक, पोषक और जीवन को बचाए रखने वाली शक्ति के रूप में सामने आती हैं। वे कठिन समय में भी मनुष्य की संवेदनशीलता और मिठास को बचाए रखती हैं। कविता के अंतिम हिस्से में कवयित्री फिर से अपनी मूल बात पर लौटती हैं—“मैं उन सभी स्त्रियों से प्रेम करती हूँ / जिनसे तुम प्रेम करते हो…”। यह दोहराव केवल कथन नहीं, बल्कि एक विचार की पुनः पुष्टि है। यह प्रेम का ऐसा रूप प्रस्तुत करता है जो स्वामित्व और अधिकार से मुक्त है। यहाँ प्रेम किसी को ‘पाने’ या ‘अपने तक सीमित रखने’ की इच्छा नहीं, बल्कि दूसरों के अनुभवों को स्वीकार करने और उन्हें सम्मान देने की क्षमता है। ‘मैं तुमसे प्रेम करती हूँ’ प्रेम के पारंपरिक ढाँचे को चुनौती देती है और उसे एक व्यापक, उदार और साझा अनुभव में बदल देती है। यह कविता न केवल प्रेम की नई परिभाषा गढ़ती है, बल्कि स्त्री-एकजुटता और मानवीय संवेदना की एक सुंदर और प्रभावशाली छवि भी प्रस्तुत करती है। यहाँ प्रेम स्वामित्व नहीं, बल्कि विस्तार है—और यही इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।
इस संग्रह की ‘मछली के पंख’ केवल एक रूपकात्मक कविता नहीं, बल्कि उस सामाजिक प्रवृत्ति की आलोचना है, जो व्यक्ति को उसकी स्वाभाविकता से काटकर एक तयशुदा आदर्श में ढालना चाहती है। यह कविता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में किसी की ‘बेहतरी’ चाहते हैं, या फिर उसे अपने मानकों में ढालकर उसकी पहचान छीन लेते हैं। यहाँ मछली केवल मछली नहीं, बल्कि हर वह व्यक्ति है, जिसे उसकी अपनी दुनिया से हटाकर एक ऐसे आकाश की ओर धकेला जाता है, जहाँ उसका दम घुटने लगता है। कविता कादंबरी ‘मछली के पंख’ जैसी एक छोटी-सी संरचना में गहरे और जटिल सामाजिक यथार्थ को समेटती है। यह कविता देखने में सरल लगती है, लेकिन अपने भीतर पहचान, स्वतंत्रता और थोपे गए आदर्शों की एक तीखी आलोचना छिपाए हुए है। यहाँ कवयित्री एक ‘मछली’ के माध्यम से उस व्यक्ति—विशेषतः स्त्री—की स्थिति को उजागर करती हैं, जिसे उसकी प्रकृति के विपरीत ढालने की कोशिश की जाती है। कविता की शुरुआत—“मैं बाज़ नहीं / मछली पैदा हुई”—एक स्पष्ट आत्मपहचान की घोषणा है। ‘बाज़’ और ‘मछली’ यहाँ दो अलग-अलग संसारों के प्रतीक हैं—एक आकाश का, दूसरा जल का। मछली का “तैरने का बेमिसाल हुनर” उसके अपने अस्तित्व की ताकत है, लेकिन समाज की नजर में यह पर्याप्त नहीं है। यह प्रारंभिक स्वीकार ही आगे आने वाले संघर्ष की नींव रखता है। “हिकारती नज़रों ने कहा / मुझे नहीं आता उड़ना”—यह पंक्तियाँ उस सामाजिक दृष्टि को सामने लाती हैं, जो किसी व्यक्ति की क्षमताओं को उसकी वास्तविकता में नहीं, बल्कि अपनी अपेक्षाओं के आधार पर आंकती है। यहाँ ‘उड़ना’ एक आदर्श बना दिया गया है, और ‘तैरना’—जो मछली की असली पहचान है—उपेक्षित कर दिया जाता है। यह मूल्यांकन का वह पैमाना है, जो विविधता को नहीं, एकरूपता को महत्व देता है। कविता का सबसे मार्मिक और व्यंग्यपूर्ण हिस्सा वह है, जहाँ “मेरी बेहतरी के लिये / मेरे फिन्स पर बाँध दिये / पत्थर के बड़े / और नक्काशीदार पंख।” यह ‘बेहतरी’ दरअसल नियंत्रण और दमन का एक सभ्य रूप है। ‘नक्काशीदार पंख’ सुंदरता और आदर्श का प्रतीक हैं, लेकिन उनका ‘पत्थर का’ होना इस बात को उजागर करता है कि ये सजावट दरअसल बोझ है। यहाँ कवयित्री यह दिखाती हैं कि समाज अक्सर सुधार और उन्नति के नाम पर व्यक्ति की स्वाभाविक क्षमताओं को कुचल देता है। अंतिम पंक्तियाँ—“और मैं आकाश देखते हुए / पानी में ही दबोची गयी / और भी आसानी से”—इस पूरी प्रक्रिया का दुखद परिणाम सामने लाती हैं। मछली को उड़ना सिखाने की कोशिश में उसे इतना बोझिल बना दिया गया कि वह अपने ही जल में असहाय हो गई। ‘आकाश देखना’ यहाँ एक अधूरी इच्छा और थोपे गए स्वप्न का प्रतीक है, जो अंततः विनाश का कारण बन जाता है।
कविता कादंबरी के इस संग्रह की विशेष कविता ‘महापुरुष का स्त्री होना’ अपने छोटे आकार में एक अत्यंत जटिल और समकालीन प्रश्न को उठाती है—क्या किसी स्त्री के अनुभव को केवल लिख देने या उसका स्वर ग्रहण कर लेने से कोई पुरुष वास्तव में ‘स्त्री’ हो जाता है? यह कविता इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमते हुए साहित्य, सत्ता और प्रतिनिधित्व की राजनीति पर गहरा प्रहार करती है। कविता की शुरुआत—“एक पुरुष स्त्री हुआ / अपने नारों में / अपनी कविताओं में…”—एक विडंबनापूर्ण स्थिति निर्मित करती है। यहाँ ‘स्त्री होना’ वास्तविक अनुभव नहीं, बल्कि एक बौद्धिक या रचनात्मक दावा है। पुरुष अपने लेखन में स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और संवेदना को अभिव्यक्त करता है, लेकिन यह ‘होना’ केवल शब्दों तक सीमित है। यह एक प्रकार का ‘रोल-प्ले’ है, जिसमें अनुभव की प्रामाणिकता अनुपस्थित है। कविता का केंद्रीय व्यंग्य तब उभरता है जब कवयित्री बार-बार यह स्पष्ट करती हैं कि वह पुरुष “प्रेम करने के लिये नहीं”, “समर्पण करने के लिये नहीं”, “क्षमा करने या अपराध स्वीकार करने के लिये नहीं” स्त्री हुआ। इन पंक्तियों में स्त्री-अनुभव के उन मूल तत्वों की ओर संकेत है, जिन्हें समाज ने स्त्री से जोड़कर देखा है—संवेदनशीलता, समर्पण, सहनशीलता। लेकिन यह पुरुष इन गुणों को अपनाने से बचता है; वह केवल उन हिस्सों को ग्रहण करता है जो उसकी ‘महानता’ को स्थापित कर सकें। “वो स्त्री होने के लिये स्त्री नहीं हुआ / वो स्त्री हुआ महापुरुष होने के लिये”—यह पंक्ति कविता का सबसे निर्णायक वक्तव्य है। यहाँ ‘स्त्री होना’ एक साधन बन जाता है, उद्देश्य नहीं। पुरुष स्त्री की पहचान को अपनाकर अपनी ‘महानता’ को और ऊँचा करता है—वह ‘महाकवि’ और ‘महाविचारक’ बनने के लिये स्त्री के अनुभवों का उपयोग करता है। यह सीधे-सीधे उस प्रवृत्ति की आलोचना है, जहाँ हाशिये के अनुभवों को मुख्यधारा के लोग अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। कविता का अंतिम हिस्सा—“उसने इन तमाम तमगों की रक्षा / अपनी मर्दाना ताकत से की”—इस पूरे ढोंग का पर्दाफाश करता है। यहाँ ‘मर्दाना ताकत’ उस सत्ता और विशेषाधिकार का प्रतीक है, जो अंततः उसकी असली पहचान है। यानी, भले ही वह ‘स्त्री’ होने का दावा करे, लेकिन अपने अधिकार, नियंत्रण और प्रभुत्व को वह नहीं छोड़ता। इस तरह, कविता कादंबरी की यह रचना साहित्य के भीतर छिपे सत्ता-संबंधों को उजागर करती है और ‘महानता’ के दावों के पीछे छिपे सच को बेनकाब करती है।
इस संग्रह की अहम कविता ‘भेड़िये’ में लेखिका एक साधारण रूपक के सहारे असाधारण सामाजिक यथार्थ को उजागर करती है। यहाँ ‘भेड़िये’ किसी जंगल के जीव नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद वे चेहरे हैं जो अवसर मिलते ही अपनी दरिंदगी प्रकट कर देते हैं। कविता की शुरुआत एक थकान भरे दृश्य से होती है—“जब हम देह से लहू और माथे से पसीने पोछते हुए लौट रही होती हैं…”। यह दृश्य केवल शारीरिक थकावट का नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के संघर्ष का प्रतीक है। इसी क्षण, जब लगता है कि ‘भेड़िये खत्म हो चुके हैं’, तभी उनका एक “विशाल झुंड” चारों दिशाओं से हमला करता है। यह बिंब इस बात को रेखांकित करता है कि स्त्री के लिए खतरा कभी समाप्त नहीं होता; वह हर समय, हर दिशा से घिरा हुआ है। कविता का मध्य भाग अत्यंत तीखा और असहज कर देने वाला है। “दाँतों में स्तनों के लोथड़े… जुबान पर खून का स्वाद…” जैसे बिंब हिंसा की क्रूरता को बिना किसी आवरण के सामने रखते हैं। यहाँ बलात्कार, शारीरिक शोषण और चरित्रहनन को बार-बार दोहराए जाने वाले अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। “अनगिनत बार होता है बलात्कार” जैसी पंक्तियाँ इस बात को उजागर करती हैं कि यह हिंसा अपवाद नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। लेकिन कविता यहीं रुकती नहीं। यह केवल पीड़ा का दस्तावेज़ नहीं बनती, बल्कि प्रतिरोध की चेतना भी रचती है। जब स्त्रियाँ इन हमलों से जूझ रही होती हैं, तभी कुछ ‘भेड़िये’ धर्म, संस्कृति और शील-शुचिता की बातें करने लगते हैं। यह विडंबना अत्यंत मार्मिक है—जो हिंसा करते हैं, वही नैतिकता का पाठ भी पढ़ाते हैं। यह दोहरा चेहरा समाज की सबसे खतरनाक सच्चाई को उजागर करता है। कविता का उत्तरार्ध एक निर्णायक मोड़ लाता है। यहाँ स्त्रियाँ केवल पीड़ित नहीं रहतीं, बल्कि अपनी पहचान को नए ढंग से परिभाषित करती हैं—“हम वेश्या की गाली पर शर्मिंदा होने के बजाय / एक बड़ा ठहाका लगाती हैं।” यह ठहाका केवल हँसी नहीं, बल्कि प्रतिरोध का स्वर है। यह उन सभी अपमानजनक शब्दों और परिभाषाओं को खारिज कर देता है, जो स्त्री को नियंत्रित करने के लिए गढ़े गए हैं। अंतिम पंक्तियों में कविता एक आशावादी और संघर्षशील स्वर ग्रहण करती है—“हम जानते हैं… हमारी लड़ाई लंबी तो है मगर अंतहीन नहीं।” यहाँ एक स्पष्ट विश्वास है कि परिवर्तन संभव है। “आँखों की आग” और “धर्मग्रंथों के काले पन्ने जल जाना” जैसे बिंब उस क्रांति की ओर संकेत करते हैं, जो एक दिन इन अन्यायपूर्ण संरचनाओं को ध्वस्त कर देगी। ‘भेड़िये’ एक ऐसी कविता है जो पाठक को झकझोर देती है। यह केवल स्त्री पर होने वाली हिंसा का चित्रण नहीं, बल्कि उस सामाजिक ढाँचे की आलोचना है जो इस हिंसा को जन्म देता है और फिर उसे ढँकने के लिए नैतिकता का आवरण ओढ़ लेता है। साथ ही, यह कविता स्त्री के भीतर छिपी उस शक्ति और साहस को भी सामने लाती है, जो हर बार टूटने के बावजूद फिर से खड़ी होती है। कविता कादंबरी की यह रचना केवल एक काव्य-प्रस्तुति नहीं, बल्कि प्रतिरोध की एक उग्र और जीवंत गाथा बन जाती है—जहाँ शब्द केवल बयान नहीं करते, बल्कि लड़ते भी हैं।
इस संग्रह की एक खास कविता ‘लम्बी औरत’ अपने छोटे आकार के बावजूद गहरे सामाजिक और स्त्री-विमर्श से जुड़े प्रश्नों को उठाती है। यह कविता किसी एक स्त्री का चित्रण नहीं, बल्कि उस समूची स्त्री-अनुभूति का रूपक है जो श्रम, त्याग और आत्म-संकोच के बीच अपना अस्तित्व गढ़ती है। कवयित्री यहाँ अत्यंत साधारण दृश्य—एक झुककर काम करती स्त्री—को लेकर उसे व्यापक अर्थों में रूपांतरित करती हैं। कविता का आरंभ “ये लम्बी औरत / झुक के झाड़ लगाती हुई” से होता है। ‘लम्बी’ विशेषण यहाँ केवल शारीरिक ऊँचाई का संकेत नहीं, बल्कि उसकी संभावनाओं, उसके विस्तार और उसकी अनंत क्षमता का भी बोध कराता है। किंतु यह ‘लम्बी’ औरत झुकी हुई है—यह झुकाव केवल शारीरिक नहीं, बल्कि सामाजिक दबावों, जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं का भी प्रतीक है। इस प्रकार, कविता का पहला ही बिंब स्त्री के भीतर छिपे द्वंद्व को उजागर कर देता है—विस्तार और संकुचन का द्वंद्व। कविता में बार-बार “गोल” होने की प्रक्रिया उल्लेखनीय है—“धीरे धीरे हो रही है गोल”, “फिर से होकर गोल।” यह ‘गोल’ होना एक बहुस्तरीय प्रतीक है। एक ओर यह रोटी, थाली, पहिया, गेंद और पृथ्वी जैसे जीवनोपयोगी और गतिशील रूपों से जुड़ता है; दूसरी ओर यह स्त्री के अपने आप को लगातार समेटने, सीमित करने और एक परिधि में बाँध लेने की प्रक्रिया को भी दर्शाता है। कवयित्री यह दिखाती हैं कि स्त्री अपने श्रम से संसार की संरचना करती है—“बनती है रोटी / बनती है थाली / बनती है पहिया / बनती है गेंद / और बनती है पृथ्वी भी”—अर्थात वह सृजन की केंद्रबिंदु है। परंतु इस सृजनशीलता के बावजूद एक विडंबना उपस्थित होती है—“लेकिन चाँद नहीं बन पाती।” यह पंक्ति कविता का केन्द्रीय कथ्य है। यहाँ ‘चाँद’ एक आदर्श, एक स्वप्न, या सामाजिक मान्यता का प्रतीक है। स्त्री सब कुछ बनाती है, सबका पोषण करती है, पर स्वयं उस ऊँचाई या मान्यता तक नहीं पहुँच पाती जो उसे मिलनी चाहिए। यह पंक्ति स्त्री की उपेक्षा और उसके अदृश्य श्रम की ओर तीखा संकेत करती है। कविता का अंत अत्यंत मार्मिक है—“और रात को सो जाती है / अपने घुटनों में सिर डाले।” यह दृश्य थकान, एकाकीपन और आत्म-संकोच का सम्मिलित चित्र प्रस्तुत करता है। दिनभर सृजन और श्रम के बाद भी स्त्री अंततः अपने भीतर सिमट जाती है। यह सिमटना केवल शारीरिक विश्राम नहीं, बल्कि उस मानसिक स्थिति का भी द्योतक है, जहाँ उसकी अपनी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ दब जाती हैं। ‘लम्बी औरत’ एक सशक्त स्त्रीवादी कविता है, जो स्त्री के श्रम, उसकी सृजनशीलता और उसके आत्म-संकोच को एक साथ प्रस्तुत करती है। यह कविता पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि जो स्त्री संसार को आकार देती है, वह स्वयं कब अपने पूर्ण आकार में पहचानी जाएगी।
कविता कादंबरी की लघु कविता ‘गिद्ध और गौरैया’ अपनी सादगी में एक गहरी वैचारिक टकराहट को समेटे हुए है। यह कविता आकार में भले छोटी हो, लेकिन अपने भीतर शक्ति, दृष्टि और अस्तित्व के दो भिन्न प्रतिमानों का तीखा अंतर प्रस्तुत करती है। कविता का पहला खंड गिद्ध पर केंद्रित है—“गिद्ध उड़ा / आसमान तक पहुँचा / सबने पंख देखा / ताकत होने की दाद दी।” यहाँ गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि उस सत्ता, प्रभुत्व और शक्ति का प्रतीक बन जाता है जिसे समाज तुरंत पहचानता और सराहता है। ‘पंख’ यहाँ शक्ति का दृश्य प्रमाण हैं, और समाज की दृष्टि उसी पर ठहर जाती है। इसके विपरीत, गौरैया का चित्रण एक अलग आयाम खोलता है—“गौरैया उड़ी / आसमान तक पहुँची / सबने जिस्म देखा / हल्के होने की बात की।” गौरैया भी उतनी ही ऊँचाई तक पहुँचती है जितना गिद्ध, लेकिन उसकी उपलब्धि को उसी तरह नहीं देखा जाता। यहाँ ‘पंख’ की जगह ‘जिस्म’ पर ध्यान दिया जाता है, और उसकी ‘हल्केपन’ की चर्चा होती है। यही कविता का सबसे तीखा बिंदु है—समान उपलब्धि के बावजूद मूल्यांकन का अंतर। गिद्ध की उड़ान शक्ति का प्रतीक बनती है, जबकि गौरैया की उड़ान को उसके ‘हल्केपन’ तक सीमित कर दिया जाता है। यह केवल पक्षियों का अंतर नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद उस दृष्टि का उद्घाटन है जो शक्ति को सम्मान देती है और कोमलता को कमतर आँकती है। इस कविता को एक स्त्रीवादी संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है। गिद्ध को यदि पुरुष सत्ता का रूपक मानें, तो गौरैया स्त्री के रूप में सामने आती है—जो उतनी ही ऊँचाई तक पहुँचती है, लेकिन उसकी उपलब्धि को उसके शरीर, उसकी ‘हल्केपन’ या उसकी ‘नाज़ुकता’ में बाँध दिया जाता है। यहाँ कवयित्री बेहद कम शब्दों में उस भेदभावपूर्ण दृष्टि को उजागर करती हैं, जो समान उपलब्धियों को भी अलग-अलग तराजू पर तौलती है।
इस संग्रह की “अच्छी औरत” एक महत्वपूर्ण स्त्रीवादी कविता है, जो ‘अच्छाई’ के सामाजिक मानदंडों को विखंडित करते हुए यह स्थापित करती है कि समस्या स्त्री के व्यवहार में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में है जो उसे नियंत्रित करती है। यह कविता पाठक को असहज करती है, और यही उसकी सबसे बड़ी सफलता है—क्योंकि वह हमें उस सच्चाई से सामना कराती है, जिसे हम अक्सर सामान्य मानकर अनदेखा कर देते हैं। कविता का आरंभ ‘मैं’ के कथनों से होता है—“मैं देर रात सड़कों पर नहीं घूमती अकेले…”, “मैं अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहनती…”, “मैं गैर मर्दों से नहीं बतियाती…”। ये पंक्तियाँ किसी व्यक्तिगत चुनाव का बयान नहीं हैं, बल्कि उस सामाजिक अनुशासन का परिणाम हैं, जो स्त्री के व्यवहार को ‘अच्छाई’ की कसौटी पर नियंत्रित करता है। यहाँ ‘मैं’ दरअसल एक व्यापक स्त्री-अनुभव का प्रतिनिधित्व करती है। कविता का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ ‘क्यों?’ के प्रश्न के बाद आता है। समाज का तैयार उत्तर है—“इसलिए कि तुम अच्छी औरत हो।” किंतु कवयित्री इस उत्तर को तुरंत खारिज कर देती है—“नहीं / इसलिए कि तुम ख़राब आदमी हो।” यही वह बिंदु है जहाँ कविता अपने प्रतिरोधी स्वर में प्रवेश करती है। ‘अच्छी औरत’ की परिभाषा को उलटते हुए कवयित्री यह स्पष्ट करती है कि स्त्री के व्यवहार पर लगे प्रतिबंध उसकी ‘अच्छाई’ नहीं, बल्कि पुरुष की हिंसक और असुरक्षित मानसिकता का परिणाम हैं। अंतिम पंक्तियाँ—“कि शायद मैं सही सलामत घर ना लौटूं / मुझे तुमसे डर लगता है”—कविता के भावबोध को चरम पर ले जाती हैं। यहाँ ‘डर’ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक है; यह वह भय है जो हर स्त्री के जीवन में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है। यह पंक्ति कविता को केवल विचार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे एक गहरी मानवीय त्रासदी में बदल देती है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसका स्पष्ट वैचारिक स्टैंड है। यह किसी प्रतीकात्मक या परोक्ष शैली में बात नहीं करती, बल्कि सीधे सामाजिक संरचना पर प्रहार करती है।
इस संग्रह के केन्द्रीय भाव की कविता ‘गुनहगार और बेशर्म औरतें’ जो स्त्री-अनुभव की एक तीखी, साहसी और असुविधाजनक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आती है। शीर्षक ही अपने आप में एक चुनौती है—‘गुनहगार’ और ‘बेशर्म’ जैसे शब्द, जो सामान्यतः स्त्रियों को नीचा दिखाने के लिए प्रयुक्त होते हैं, यहाँ कवयित्री द्वारा पुनः अपनाए गए हैं। यह पुनरधिग्रहण (reclaiming) कविता का केंद्रीय राजनीतिक और सौंदर्यबोधात्मक तत्व बन जाता है। कविता की सबसे बड़ी विशेषता इसका दोहराव (repetition) है—“हम गुनहगार और बेशर्म औरतें” का बार-बार आना। यह दोहराव केवल शैलीगत नहीं, बल्कि एक सामूहिक घोषणापत्र जैसा प्रभाव पैदा करता है। हर बार इस पंक्ति के साथ स्त्रियों की एक नई भूमिका सामने आती है—वे शरण देती हैं, सांत्वना देती हैं, श्रम करती हैं, संघर्ष करती हैं, और यहाँ तक कि हिंसा के बीच भी जीवन को बचाए रखने की कोशिश करती हैं। इस तरह कविता स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि संरक्षक और सृजनकर्ता के रूप में स्थापित करती है। कविता में प्रयुक्त बिंब अत्यंत सशक्त और यथार्थपरक हैं। “खून बहती उंगलियाँ”, “कपड़ों से लगे अभियोग”, “जली हुई फसलें”, “कीचड़ सने हाथ”—ये सब मिलकर एक ऐसे सामाजिक परिदृश्य का निर्माण करते हैं जहाँ हिंसा, अन्याय और दमन रोजमर्रा की सच्चाई है। इन बिंबों के माध्यम से कवयित्री यह दिखाती हैं कि स्त्रियाँ केवल इस हिंसा की साक्षी नहीं, बल्कि उसके बीच सक्रिय रूप से जीवन को संभालने वाली शक्ति हैं। कविता का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका पुरुष-विमर्श के प्रति दृष्टिकोण है। यहाँ ‘अपरिचित पुरुष’ बार-बार आते हैं—वे पीड़ित भी हैं, हिंसक भी, और असहाय भी। स्त्रियाँ इन पुरुषों को शरण देती हैं, उनके घावों को भरती हैं, लेकिन साथ ही उनके द्वारा किए गए अत्याचारों की साक्षी भी रहती हैं। यह द्वंद्व कविता को एक जटिल नैतिक धरातल देता है—यह न तो पुरुषों को पूरी तरह खलनायक बनाती है, न ही उन्हें निर्दोष ठहराती है। बल्कि यह दिखाती है कि पितृसत्ता का ढाँचा दोनों को अलग-अलग तरीकों से क्षतिग्रस्त करता है। यह कविता स्त्री-अनुभव को केवल निजी नहीं रहने देती, बल्कि उसे सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में बदल देती है। यह स्त्रियों को ‘पीड़ित’ की संकीर्ण परिभाषा से बाहर निकालकर उन्हें संघर्षशील, सहनशील और सृजनशील इकाई के रूप में प्रस्तुत करती है। ‘गुनहगार’ और ‘बेशर्म’ जैसे शब्द यहाँ अपमान नहीं, बल्कि प्रतिरोध की पहचान बन जाते हैं। इस प्रकार, यह कविता न केवल स्त्री-विमर्श की एक महत्वपूर्ण रचना है, बल्कि हमारे समय के सामाजिक यथार्थ का भी एक सच्चा दस्तावेज़ है।
इस संग्रह में ‘तुम्हारी देह क्रांति का विचार है’ शीर्षक कविता अपने आप में एक वैचारिक उद्घोष है, जो देह को मात्र भौतिक अस्तित्व से उठाकर उसे एक सक्रिय राजनीतिक और सामाजिक अर्थ प्रदान करता है। यहाँ ‘देह’ वस्तु नहीं, बल्कि ‘विचार’ है; और यही रूपांतरण कविता की केंद्रीय शक्ति है। कविता की शुरुआत में कवयित्री देह की सामान्य धारणा को स्थापित करती हैं—“बस जो देह होती है…”—और तुरंत ही उसे खारिज कर देती हैं। यह खारिज करना केवल सौंदर्यशास्त्रीय नहीं, बल्कि वैचारिक है। देह को “कहीं कोने में रख देने” की सहजता के विपरीत, कवयित्री उसे एक जीवंत, प्रतिरोधी और सक्रिय सत्ता के रूप में सामने लाती हैं। इस प्रकार, कविता पितृसत्तात्मक दृष्टि को चुनौती देती है, जो स्त्री-देह को नियंत्रित करने का प्रयास करती है। “तुम्हारी देह… शोषण, अत्याचार और अलगाव के विचार का प्रतिपक्ष है”—यह पंक्ति देह को एक वैचारिक प्रतिरोध में बदल देती है। यहाँ देह केवल निजी नहीं रहती, बल्कि वह सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध खड़ी एक इकाई बन जाती है। देह के माध्यम से कवयित्री वर्ग, श्रम और सत्ता के प्रश्नों को भी जोड़ती हैं—“किसानों और मजदूरों के संघर्ष” का प्रतीक बनाकर वह स्त्री-विमर्श को व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में रखती हैं। कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष इसका द्वंद्वात्मक स्वर है—जहाँ एक ओर देह को क्रांति और प्रतिरोध का प्रतीक बताया गया है, वहीं दूसरी ओर उसमें प्रेम, कोमलता और सौम्यता भी मौजूद है। “तुम्हें प्रेम करते हुए… शांति युद्ध के देवता के सजदे में हूँ”—यह पंक्ति इस द्वंद्व को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। यहाँ प्रेम और युद्ध, कोमलता और संघर्ष—सभी एक साथ उपस्थित हैं, जो देह की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करते हैं। यह कविता स्त्री-देह को पुनर्परिभाषित करने का एक साहसी प्रयास है। यह देह को शर्म, नियंत्रण और वस्तुकरण के दायरे से निकालकर उसे स्वतंत्रता, संघर्ष और क्रांति का प्रतीक बनाती है। इस दृष्टि से यह कविता केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि एक वैचारिक हस्तक्षेप है, जो पाठक को देह और समाज के संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
इस संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कविता “दुनिया के सबसे शानदार पुरुष” है जो पुरुषत्व की नई परिभाषा गढ़ती है और स्त्री-पुरुष संबंधों को समानता, संवेदना और संघर्ष के आधार पर पुनर्स्थापित करती है। यह कविता न केवल पितृसत्ता की आलोचना करती है, बल्कि एक मानवीय और न्यायपूर्ण समाज की संभावना भी प्रस्तुत करती है। कविता का आरंभ पुरुषों की उस छवि से होता है, जो बाहरी आडंबर से मुक्त है। वे पुरुष जो अपनी माँओं की सरलता से गढ़े गए हैं, जो प्रेम और उदारता को जीवन का आधार बनाना चाहते हैं। यहाँ कवयित्री पुरुषत्व को कठोरता, शक्ति और प्रभुत्व से नहीं, बल्कि संवेदना और मानवीयता से परिभाषित करती है। यह दृष्टिकोण पारंपरिक पितृसत्तात्मक अवधारणाओं का प्रतिरोध करता है। आगे कविता में इन “शानदार पुरुषों” का जीवन चित्रित होता है—वे भावुक हैं, अपने संबंधों के प्रति ईमानदार हैं, अपने श्रम और संघर्ष से जुड़े हुए हैं। वे अपनी स्त्रियों के प्रति प्रेम व्यक्त करते हैं, उनके श्रम और अस्तित्व को सम्मान देते हैं। यह चित्रण पुरुष को एक सहचर, सहयोगी और संवेदनशील मनुष्य के रूप में स्थापित करता है, जो स्त्री के साथ समान धरातल पर खड़ा है। कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि ये पुरुष प्रदर्शनप्रिय नहीं हैं। वे अपने प्रेम का बाज़ारीकरण नहीं करते, न ही वे ‘नायकत्व’ के कृत्रिम आदर्शों का अनुसरण करते हैं। वे चुपचाप श्रम करते हैं, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हैं और अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं। इस प्रकार कवयित्री उस समाज की आलोचना करती है, जो दिखावे और शक्ति के आधार पर ‘महानता’ का निर्धारण करता है। कविता के उत्तरार्ध में स्त्रियों की आवाज़ उभरती है, जो इन पुरुषों के साथ एक नए समाज की कल्पना करती हैं। यहाँ स्त्रियाँ स्वयं को भी पुनर्परिभाषित करती हैं—वे बाज़ार, पितृसत्ता और रूढ़ मान्यताओं से मुक्त होना चाहती हैं। कवयित्री यह संकेत देती है कि सच्ची मुक्ति केवल स्त्रियों की नहीं, बल्कि स्त्री-पुरुष दोनों की साझी प्रक्रिया है।
कुल मिलाकर कविता कादंबरी का यह संग्रह ‘हम गुनहगार और बेशर्म औरतें’ परंपरागत ‘स्त्री-कविता’ की सीमाओं को तोड़ देता है। यहाँ कोई सजावटी करुणा नहीं है, कोई बनावटी कोमलता नहीं—यहाँ एक बेचैन, सवाल करती, तमतमाई हुई औरत है, जो अपने ऊपर चिपकाए गए नामों को उधेड़ फेंकती है। ‘गुनहगार’ और ‘बेशर्म’—ये शब्द, जो समाज ने ताने की तरह गढ़े, कादंबरी के यहाँ पहचान बन जाते हैं। यह एक तरह का भाषाई विद्रोह है—जहाँ आरोप ही आत्मस्वीकार में बदल जाता है। कादंबरी की कविताओं की सबसे बड़ी ताकत उनका सीधापन है। वे बातों को घुमाती नहीं, उन्हें काटती हैं। उनकी भाषा में एक किस्म की खुरदरी ईमानदारी है—जैसे कोई सच बिना सजावट के सामने रख दिया गया हो। उदाहरण के लिए, उनकी कविताओं में जब प्रकृति आती है, तो वह महज़ दृश्य नहीं रहती—वह चरित्र बन जाती है, प्रतिरोध का प्रतीक बन जाती है। सूखते ताल, झड़ते पत्ते या हरियाली से भरी आँखें—ये सब उस समाज के रूपक हैं, जो भीतर से बंजर हो रहा है, फिर भी जीवन की छोटी-छोटी हरियालियों से डरता है। इस संग्रह की एक और दिलचस्प परत यह है कि यह केवल पुरुष सत्ता पर ही प्रहार नहीं करता, बल्कि उन सामाजिक संरचनाओं पर भी सवाल उठाता है जिनमें स्त्रियाँ खुद भी शामिल हैं। तिरछी निगाहों से देखती औरतें, फुसफुसाकर निर्णय सुनाती आवाज़ें—ये सब मिलकर दिखाती हैं कि पितृसत्ता कोई बाहरी ताकत भर नहीं, बल्कि एक आंतरिक आदत भी है। कविता कादंबरी की रचनाओं में ‘सभ्यता’ और ‘नैतिकता’ जैसे शब्द भी नए अर्थ ग्रहण करते हैं। उनकी कविता ‘सभ्य आदमी’ इसका तीखा उदाहरण है, जहाँ तथाकथित विकास और संस्कृति के पीछे छिपी क्रूरता उजागर होती है। यहाँ आदमी जितना ‘सभ्य’ दिखता है, उतना ही भीतर से हिंसक और लालची है। इस तरह कादंबरी केवल स्त्री-विमर्श तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढाँचे को कटघरे में खड़ा कर देती हैं। उनकी कविताओं में एक खास बात यह भी है कि वे पाठक को सहज नहीं रहने देतीं। वे चुभती हैं, असहज करती हैं, और यही उनकी सफलता है। क्योंकि सच्चा साहित्य वही है जो हमें हमारी सुविधाजनक चुप्पियों से बाहर खींचे। अंत में, ‘हम गुनहगार और बेशर्म औरतें’ को केवल एक कविता-संग्रह कहना उसके प्रभाव को कम करना होगा। यह दरअसल एक घोषणा-पत्र है—उन औरतों का, जो अब सफाई नहीं देंगी, जो अब अपने होने के लिए माफी नहीं माँगेंगी। यह संग्रह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असल ‘बेशर्मी’ किसमें है, उस औरत में जो अपने हिस्से की जिंदगी माँगती है, या उस समाज में जो उसे यह हक देने से कतराता है। कविता कादंबरी की कविताएँ पढ़ना दरअसल अपने समय की सबसे असुविधाजनक सच्चाइयों से सामना करना है और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
सन्तोष विश्नोई
सहायक प्राध्यापक एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लक्ष्मी नारायण दूबे महाविद्यालय, मोतिहारी, बिहार (बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर)
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा


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