नैतिकता, आध्यात्मिकता और धर्म : एक विमर्श
- अमिता सिंह
शोध सार : समाज के सन्दर्भ में जब हम नैतिकता, आध्यात्मिकता और धर्म की चर्चा करते हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि हमारा धर्म हमारे समाज को नैतिक बनाते हुए कितना आध्यात्मिक बना सका है। यद्यपि वैदिक काल से आज तक का धर्म-साहित्य नैतिकता, आध्यात्मिकता एवं धर्म के समन्वय से ही उत्थान की बात करता है। वैदिक साहित्य नैतिक आदर्शों पर बल देता है और नैतिक आदर्श ही धर्म की आधारशिला होते हैं। इस दृष्टि से मानव व्यवहार के लिए उचित समस्त तत्त्व नैतिकता के अन्तर्गत आता है और नैतिकता के अभाव में धर्म स्वयं अधर्म बन जाता है। नैतिकता ही धर्म एवं अधर्म की विभेदक है। अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए धर्म को आधार बनाकर किया गया कार्य धर्म के नाम पर अधर्म होता है। नैतिकता जीवनगत मूल्यों की अवबोधक होती है। इसका सीधा संम्बन्ध हमारे भावात्मक पक्ष के साथ ही साथ समाज व व्यवहार के नियन्त्रित निर्देशों तथा लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधनों से है। किसी भी समाज का आदर्श उसके नीतिगत मूल्यों में निहित होता है तथा किसी भी राष्ट्र के विकास का आधार भी नैतिकता ही हो सकती है। नैतिकता के अनेक आयाम है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वैयक्तिक अनेक सन्दर्भों में इसका महत्त्व निर्विवाद है।बीज शब्द : संस्कृति, अलौकिक, नैतिकता, अध्यात्मिकता, समाज, मूल्य, पुरुषार्थ चतुष्ट्य, धर्म, निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञ।
मूल आलेख : धर्म मानव-समाज का ऐसा व्यापक, स्थायी एवं शाश्वत तत्त्व है जिसको सम्यक् रुप से समझे बिना हम समाज के स्वरूप को नहीं समझ सकते। सामान्यतः धर्म का सम्बन्ध अलौकिक शक्ति के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति से माना जाता है, जिससे व्यक्ति को आन्तरिक शक्ति एवं सुख की प्राप्ति होती है, किन्तु यह धर्म के एक पक्ष को प्रदर्शित करता है। वास्तविकता तो यह है कि धर्म भारतीय संस्कृति का प्राण है। भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले वेदों में वर्णित समस्त विषयों का मूलाधार धर्म ही है। वैदिक सहित्य में धर्म को विश्लेषित करते हुए कहा गया है कि “यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि सः धर्मः”1 अर्थात् लौकिक अभ्युदय तथा पारलौकिक उन्नति का समान्य रुप ही धर्म है। धर्म शब्द का प्रयोग भारत में किसी उपासना-पद्धति के विशेष सन्दर्भ में नहीं अपितु धर्म को मनुष्योचित अनुशासन की आदर्श आचार-संहिता माना जाता है जिसके अन्तर्गत उच्च जीवन-मूल्यों को अपनाने की बात कही गयी है। धर्म व्यक्ति की तरह समाज का भी विधायक है क्योंकि महाभारत में कहा गया है कि धर्म से प्रजा धृत होती है ‘धर्मों धारयति प्रजाः’।2 ऋग्वेद में इसे ऋत कहा जाता है, जिसका अर्थ है- सत्य, नियम, विधानादि। ऋत के रूप में यह सम्पूर्ण जगत् पर शासन करता है और शासक के अभाव में शासन में अराजकता व्याप्त हो जाती है-“ऋतस्य पथा सरमा विद्दगाः”3, “सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः”4, “ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति, दिवि सोमो अधिश्रितः”5। अतः धर्म सृष्टि के सन्तुलनार्थ अनिवार्य तत्त्व है।
व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को समन्वित करने वाले पुरूषार्थ चतुष्ट्य में भी धर्म की ही प्राथमिकता है, क्योंकि धर्म ही अर्थ और काम पर नियन्त्रण रखता है, व्यक्ति के कुमार्ग पर जाने के पथ को बाधित करता है और उसे इस तथ्य से अवगत कराता है कि क्या करणीय है या क्या अकरणीय? महाभारत के शान्तिपर्व में भी त्रिवर्गों में से धर्म को अधिक महत्त्व प्राप्त है, क्योंकि एक धर्मात्मा ही अर्थ और काम पर नियन्त्रण करने में समर्थ होता है-
“धर्मे चार्थे च कामे च धर्म एवोत्तरो भवेत्।
अस्मिन् लोके परे चैव धर्मात्मा सुखमेधते।।”6
दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि धर्म एक ऐसा पुरुषार्थ है जो कि अन्य पुरुषार्थों का पथ प्रदर्शन करता है। काम को मर्यादित करके उसको अर्थ और मोक्ष के अनुकूल बनाना मात्र धर्म के अधीन है। न रुकने वाले काम (उत्तेजना) को काबू में करके तथा मर्यादा में रहकर मोक्ष, अर्थ और काम के बीच सामंजस्य धर्म ही स्थापित कर सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म इहलोक और परलोक दोनों का ही निर्माण कर सकता है। वस्तुतः धर्म एक ऐसा नियम है जो लोक-परलोक के मध्य निकटता स्थापित करता है। इस प्रकार से व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र के समन्वित विकास एवं प्रगति के लिए धर्म एक आवश्यक तत्त्व है। धर्म मानवमात्र का ही विशिष्ट गुण कहा गया है, अन्य जीवधारियों का नहीं, जैसा कि प्रसिद्ध है -
“आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुर्भिनराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।।”7
समाज के सन्दर्भ में जब हम नैतिकता, आध्यात्मिकता और धर्म की चर्चा करते हैं तो हम यह समीक्षा करते हैं कि हमारा धर्म हमारे समाज को नैतिक बनाते हुए कितना आध्यात्मिक बना सका है। यद्यपि वैदिक काल से आज तक का धार्मिक साहित्य नैतिकता, आध्यात्मिकता एवं धर्म के समन्वय से ही उत्थान की बात करता है। वैदिक साहित्य नैतिक आदर्शों पर बल देता है और नैतिक आदर्श ही धर्म की आधारशिला मानी जाती है। इस दृष्टि से मानव-व्यवहार के हेतु उचित समस्त तत्व नैतिकता के अन्तर्गत सम्मिलित है और नैतिकता के अभाव में धर्म स्वयं अधर्म बन जाता है, क्योंकि नैतिकता ही धर्म एवं अधर्म की विभेदक है। अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए धर्म को आधार बनाकर किया गया कार्य धर्म के नाम पर अधार्मिक होता है। महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व के अनुसार काम, क्रोध तथा लोभ के भय से अथवा जीवन के भय से भी धर्म का परित्याग करना उचित नहीं है, अतः प्रत्येक परिस्थिति में धर्म अवश्य पालनीय है-
“न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मंत्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः।
धर्मो नित्यः सुखदुःखेत्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्यत्वनित्यः।।”8
मनु के मतानुसार भी मनुष्य को ऐसे अर्थ और काम का परित्याग कर देना चाहिए जो धर्म के विपरीत हो-
“परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।”9
अब चर्चा करें नैतिकता की, तो नैतिकता एक व्यापक शब्द है, जिसका अभिप्राय नीति के अनुसार आचरण या व्यवहार करना है। यह जीवनगत मूल्यों की अवबोधक होती है, जिसका सीधा सम्बन्ध हमारे भावात्मक पक्ष के साथ-साथ समाज व व्यवहार के नियन्त्रित निर्देशों तथा लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधनों से है। किसी भी समाज का आदर्श उसके नीतिगत मूल्यों में निहित होता है तथा किसी भी राष्ट्र के विकास का आधार भी नैतिकता ही हो सकती है। नैतिकता के अन्तर्गत आत्मशुद्धि, आध्यात्मिकता, धर्म, सदाचरण, सत्य का आदर्श, आचरण के नियमों की प्रधानता, ज्ञान, आनन्द व मोक्ष की प्राप्ति, कर्मोपासना, देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति, समानता, सहिष्णुता एवं श्रद्धाभावना आदि नैतिक मूल्यों एवं मानवीय गुणों का समावेश किया जा सकता है। ऋग्वेद तथा यजुर्वेद में सच्चरित्रता व नैतिकता को ही जीवन का प्रमुख मानवीय मूल्य माना गया है, क्योंकि जो व्यक्ति चरित्रवान् होता है वही स्वयं का तथा समाज का कल्याण कर सकता है और उचित मार्गदर्शन कर सकता है-
“परिमाग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज।”10
“वाचं ते शुन्धामि प्राणं ते शुन्धामि चक्षुस्ते शुन्धामि।
श्रोतं ते शुन्धामि नाभिं ते शुन्धामि चरित्रांस्ते शुन्धामि।।”11
जब हम नैतिकता से अध्यात्मिकता की ओर बढ़ते हैं तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम मन्दिर में बैठकर भगवान् के सामने भजन या कोई धार्मिक कर्मकाण्ड कर रहे हैं। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि हम अपने अन्दर सन्तुलन बनाकर मन में शान्ति रखना चाहते हैं। यह तभी सम्भव है जब कि हम मानवीय धर्म का पालन करें अर्थात् जीव-जीवन एवं प्रकृति के प्रति पशुवत् व्यवहार न करें अर्थात् हम सबके प्रति सहिष्णुतापूर्ण उदारवादी मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण व्यवहार करें। श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि हमारा मन बहुत ही चंचल है, मन को काबू में करना अत्यन्त कठिन है-
“चंचलं हि मनः कृष्णः प्रमाथि बलवद्दृढ़म्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।”12
परन्तु आध्यात्म ही ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा मन को नियन्त्रण में किया जा सकता है। हम जीवन में एकरसता से ऊब जाते हैं और मनोरंजन के साधन तलाश करने लगते हैं। हम समझ नहीं पाते हैं कि खालीपन का क्या कारण है ? हम स्वयं को प्रसन्न रखने के लिये टेलीविजन, कम्प्यूटर या मनोरंजक पुस्तकों का आश्रय लेते हैं जिससे कुछ देर के लिए हमें राहत मिल जाती है। लेकिन धीरे-धीरे तनाव और खालीपन हमारे मन पर छाने लगता है। यह तनाव, थकान दरअसल हमारी आत्मा का होता है, जिसे हम समझ नहीं पाते। इस तनाव और खालीपन को दूर करने के लिए हमें स्वयं को अध्यात्म के प्रति समर्पित कर देना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि यदि हममें नकारात्मकता या घृणा है तो हमें उसका त्याग करना होगा। सन्तुष्टि और प्रसन्नता जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं, अन्य बातों का आना-जाना लगा रहेगा। वास्तविकता तो यह है कि आध्यात्म और कुछ भी नहीं है बल्कि हमारा अपना ही आन्तरिक सन्तुलन है। इसे पूरी संवेदनशीलता के साथ बहुत गहराई से अनुभव किया जाना चाहिए और यदि हमने आन्तरिक सन्तुलन कायम कर लिया तो हमारे ही जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल परिवर्तित हो जाएगा और जीवन अत्यन्त सरल तथा सौन्दर्यपूर्ण दृष्टिगोचर होगा। कारण कि आज प्रत्येक मानव की जिज्ञासा है कि कठिन परिस्थितियों में भी किस प्रकार अविचल रहा जा सकता है। गीता में श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हुए कहते हैं-
“प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।”13
अर्थात् जब व्यक्ति अपनी समस्त मनःकामनाओं का सम्यक् रूप से त्याग कर देता है और अपने आप से अपने आप में सन्तुष्ट रहता है उस काल में वह व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता है। यह श्लोक ‘स्व नियमन‘ तथा ‘स्व सन्तुष्टि‘ की मनोवैज्ञानिक आधारशिला है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे ‘आन्तरिक अभिप्रेरणा‘ कहा जाता है।
आज जिसके पास धन व ऐश्वर्य है वे भी प्रसन्न नहीं है और जिनके पास कुछ भी नहीं है वे तो परेशान हैं ही। सच कहा जाए तो हम जीवन को व्यतीत कर रहे हैं, उसे जी नहीं रहे क्योंकि यदि एक बार हम अपने जीवन का आनन्द लेना प्रारम्भ कर दें तो प्रत्येक कठिन से कठिन कार्य सरल प्रतीत होगा। यदि हमारे मन के अन्दर शान्ति ही नहीं है तो बाहर कितना भी ढूँढ़ लें हम कभी भी स्वयं को सन्तुष्ट नहीं कर पाएगें। आध्यात्मिकता का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि बाकी दुनिया छोड दें और बस अध्यात्म की तलाश में लगें रहें। इसका अर्थ यह है कि हम एक बार इस बात पर विचार करें कि क्या हम जीवन को उसी प्रकार जी रहे हैं जैसा हम चाहते हैं। यदि उत्तर नहीं है तो हमें आन्तरिक सन्तुलन की आवश्यकता है। जो मात्र आध्यात्म द्वारा ही पाया जा सकता है और जब हम एक बार आध्यात्मिक जीवन में सम्मिलित हो जाएँगे तो हमें अत्मिक ज्ञान और अनुभव की प्राप्ति होगी, जिससे हम सर्वदा आनन्दित रहेंगे। इस क्रिया में सबसे अनिवार्य तत्त्व है ‘स्वयं से प्रेम करना’। जैसा कि एक प्रसिद्ध गीत भी है ‘दूसरों की जय से पहले खुद को जय करें’। क्योंकि श्रीभगवान् कहते भी हैं ‘अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें। आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु’-
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।”14
स्पष्टतया नैतिकता, आध्यात्मिकता और धर्म द्वारा प्रदर्शित नैतिक मूल्यों एवं आदर्शों के आधार पर समाज में सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है। नैतिकता, आध्यात्मिकता और धर्म का विश्लेषण इस रूप में किया जा सकता है कि नैतिकता समाज का एवं मानवता मुनष्य का धर्म है। नैतिक व्यवस्था के अभाव में समाज आदिम बर्बरता की अवस्था में चला जाएगा और धर्म (मानवता) के अभाव में मनुष्य पशुवत् व्यवहार करने लगेगा और व्यक्ति एवं समाज दोनां ही दिशाहीन हो जाएँगे। अतः वाल्टेयर महोदय ने कहा है कि यदि ईश्वर नहीं हैं तो हमें उसका सृजन करना चाहिए, ईश्वरीय भय के अभाव में सर्वत्र अव्यवस्था हो जाएगी। धर्म ही जीवन में स्थायित्व लाता है, मानव को संकीर्णता से संघर्ष सिखाने के साथ ही साथ मानवीय संस्कृति को सृजनशील बनाता है। इसीलिए डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था कि धर्म हमारी आत्मा तक पहुंचता है और हमें बुराइयों से संघर्ष करना सिखाता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि धर्म एक प्रकार से सामाजिक पूर्णता का प्रयास है। यह पूर्णता तभी अपने वास्तविक स्वरूप को ग्रहण कर पाती है जब धर्म सभी संकीर्ण विवादास्पद धारणाओं से अपने आप को मुक्त रखे। चरित्र-निर्माण, शिव और महत् की प्राप्ति, स्वयं तथा विश्व की शान्ति हेतु धर्म ही सर्वोपरि प्रेरक शक्ति है। यही कारण है कि आदिकाल से ही धर्म समाज में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाये हुए है।
आधुनिक समाज में धर्म का कार्य कुछ कम अवश्य हो गया है किन्तु व्यक्ति किसी न किसी रूप में अपने आप को धर्म से जुड़ा हुआ पाता है। हर समाज की एक सामाजिक व्यवस्था होती है। उस व्यवस्था से लोग जुड़े होते हैं और उसमें आस्था व्यक्त करते हैं। कुछ ही लोग समाज में ऐसे होते हैं जो व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करते हैं। जिन्हें सामान्यतः अनैतिक, अधार्मिक कहा जाता है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत मात्र अलौकिक शक्ति में विश्वास ही धर्म नहीं है बल्कि यह एक कर्म प्रधान, उपयोगी एवं व्यावहारिक व्यवस्था है जो व्यक्ति एवं समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भमिका का निर्वहन करती है। इस प्रकार से धर्म कई रूपों में समाज को विकसित करने का कार्य करता है। जिसे हम निम्न रूप में देख सकते हैं -
1. धर्म व्यक्ति के जीवन की शुद्धता का नाम है। मनुष्य के अन्दर दैविक एवं पैशाचिक दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं। धर्म और नैतिकता के माध्यम से व्यक्ति अपनी पैशाचिक प्रवृत्तियों का शमन करता है और धर्म के पथ पर चलते हुए आत्म विकास करता है।
2. धर्म स्वयं में एक अनुशासन है, क्योंकि अनुशासित मानव लोभ, मोह, क्रोध से मुक्त होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में स्थितप्रज्ञ की अवधारणा इसी अनुशासन तथा आत्मनियन्त्रण पर केन्द्रित है, जिसके अनुसार-
“दुःखेष्वनुद्विग्नमनः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।”15
अर्थात् दुःख में उद्विग्न न होने वाले, सुख में स्पृहा से रहित, राग, भय और क्रोध रहित मनुष्य ही मुनि कहलाता है। ऐसा मनुष्य सम्पूर्ण विश्व में एक ही ईश्वरीय चेतना का दर्शन करता है और विश्व में एकता और सहयोग की स्थापना करता है और इसे स्थायित्व प्रदान करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है।
3. धर्म मानव को निष्काम कर्म की शिक्षा देकर भोग और निराशा दोनों से बचाता है। धर्म, कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने की कला है। जिससे सामंजस्य बना रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता का यह सुप्रसिद्ध श्लोक इसी अभिप्राय को प्रकट करता है
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।”16
अर्थात् कर्तव्य-कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। अतः तुम कर्मफल का हेतु भी मत बनो और तुम्हारी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
4. तात्त्विक धर्म सर्वधर्म समभाव को जन्म देता है, जैसा कि ईशावास्योपनिषद् में ऋषि कहते हैं-“यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।”17
अर्थात् जो साधक सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही देखता है और समस्त भूतों में भी आत्मा को ही देखता है, वह इस सार्वात्म्य दर्शन के कारण ही किसी से घृणा नहीं करता। अतः समभाव से नैतिकता का विकास होता है और नैतिकता की उपस्थिति में वर्ग भेद, जाति भेद, राष्ट्र भेद आदि का उन्मूलन स्वतः हो जाता है और ऐसे में किसी व्यक्ति और राष्ट्र का चरित्र कितना सन्तुलित होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
5. धर्म से सभी को सुख की प्राप्ति होती है। धर्म कहता है कि सुख स्वार्थ में नहीं परमार्थ में है। इस प्रकार धर्म परमार्थ के लिए लोगों को प्रेरित करता है। जो स्वस्थ समाज के विकास के लिए आवश्यक है।
6. धर्म से जीवन में आशा का संचार होता है और पुर्नजन्म के आधार पर व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन को पूर्ववर्ती जीवन से सुन्दर और सफल बनाना चाहता है। मनुष्य को विश्वास है कि नैतिकता और धर्म के पथ पर चलने से इहलोक और परलोक दोनो में ही सुख की प्राप्ति होगी। अतः सन्मार्ग पर चलकर व्यक्ति स्वयं और समाज को सुन्दर बनाता है। धर्म जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है क्योंकि व्यक्ति धर्म के द्वारा ही संकीर्णताओं से लड़ना सीखता है और सृजनशील बनता है।
7. धर्म समाज की प्रगति में महत्त्वपूर्ण रूप से सहायक है। ’’आत्मदीपो भव’’ से मनुष्य को शिक्षा मिलती है कि उसकी मुक्ति उसी के हाथ में है। वह अपने सद्कर्मो से अपने जीवन को उज्ज्वल बना सकता है।
8. धर्म में आस्था होने के कारण व्यक्ति के मन में कभी असुरक्षा का भाव नहीं आता क्योंकि वह कार्य करने के पश्चात् यह सोच कर सन्तुष्ट होता है कि जो उसका कर्म था उसने कर दिया। फल देना ईश्वर की इच्छा के अधीन है, इससे वह अनावश्यक हताशा एवं निराशा से बच जाता है।
9. धर्म में आस्था से आत्मबल, आत्मविश्वास और जीवन की उलझनों के प्रति अभियोजन की क्षमता का विकास होता है। व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी समायोजन करना सीख जाता हैं और अपना जीवन सार्थक बनाने में सफल होता है।
10. धर्म नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत है । नैतिकता के अभाव में सर्वत्र भ्रष्टाचार का ताण्डव होने लगता है। धर्म अपराध की भावना से मुक्ति दिलाता है। हम देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने अपराधों की उनसे क्षमा मांगते हैं और हम ऐसा विश्वास करते हैं कि ईश्वर हमें क्षमा कर देगा और अपराध-मुक्त होकर सहज सरल एवं उत्तम जीवन व्यतीत करने में सफल होंगे।
निष्कर्ष : उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि धर्म, नैतिकता और आध्यात्मिकता मानव-जीवन तथा समाज के अभिन्न और परस्पर पूरक तत्त्व हैं। धर्म केवल आस्था या कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं है, अपितु वह जीवन का अनुशासन, मूल्य-चेतना और कर्तव्यबोध है, जो व्यक्ति को उचित-अनुचित का विवेक प्रदान करता है। नैतिकता धर्म की आधारशिला है; उसके बिना धर्म अधर्म में परिवर्तित हो सकता है। वहीं आध्यात्मिकता व्यक्ति के आन्तरिक सन्तुलन, आत्मबोध और मनःशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। धर्म, अर्थ और काम को मर्यादित कर जीवन को सन्तुलित बनाता है तथा व्यक्ति को समाजोपयोगी आचरण की प्रेरणा देता है। इससे सामाजिक समरसता, सहिष्णुता, परमार्थ और उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मनियंत्रण और निष्काम कर्म का आदर्श व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ बनाता है, जिससे वह सुख-दुःख में समभाव रख सके। अतः कहा जा सकता है कि धर्म सामाजिक स्थिरता, नैतिक जागरूकता और आध्यात्मिक उन्नयन का मूल आधार है। इसके अभाव में समाज दिशाहीन और व्यक्ति मूल्यहीन हो सकता है। इसलिए समकालीन समाज में भी धर्म, नैतिकता और आध्यात्मिकता की समन्वित साधना अत्यन्त आवश्यक है।
सन्दर्भ :
1.वैशेषिक सूत्र- 1.1.2
2.महाभारत, वनपर्व- 8.49.50
3.ऋग्वेद- 5.45.8
4.वही- 10.85.9
5.अथर्ववेद- 14.1.1
6.महाभारत, शान्तिपर्व- 91.53
7.वही- 249.29
8.महाभारत, स्वर्गारोहण पर्व- 5.63
9.मनुस्मृति- 4.176
10.ऋग्वेद- 4.28
11.यजुर्वेद- 6.14
12.श्रीमद्भगवद्गीता- 6.34
13.वही- 2.55
14.वही- 6.5.
15.वही- 2.56
16.वही- 2.47
17.ईशावास्योपनिषद्- 6
अमिता सिंह
असिस्टेन्ट प्रोफेसर- संस्कृत, सावित्री बाई फुले राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चकिया-चन्दौली
Singhamita1984@gmail.com, 8299805217
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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