सम्पादकीय : बातें बीते दिनों की (अंक-65) / माणिक

सम्पादकीय 
बातें बीते दिनों की (अंक-65) / माणिक 

(1)  लेखक होना मनुष्य होना ही है। बेहतर और संवेदनशील मनुष्य। ज्यादा की अपेक्षा के साथ समाज अपनी बेहतरी के लिए लेखक से रोशनी की अपेक्षा करता है बड़ी घटनाओं और बड़े उथल-पुथल के वक़्त जनता लेखकों की तरफ मुंह करके सोती है। एक दौर था जब प्रोफेसर, वकील और डॉक्टर को समाज का सबसे जानकार तबका माना जाता था। इन तीन पदों के व्यक्ति समाज में कुछ न कुछ सार्थक जोड़ते रहे हैंअसल में हमने अपने अवदान को फिर से रेखांकित करना छोड़ दिया है। योगदान पर पुनर्विचार करना छोड़ दिया है। अब तक चले गए पथ को मुड़कर देखना भूल के हिस्से डाल दिया है बहुसंख्यक की आस टूटती गयी। जानकारों का ज्ञान रीतता गया। दिशा अभिमुख होने में कोई पीछे नहीं रहा। लगा कि सारे दिशा सूचक फेल होते जा रहे हैं। रास्ते के अधबीच के संकेतक फुर्र हो गए हैं। सारे कुतुबनुमा किसी गहरे समुद्र में डूब गए हैं। केवल एक ध्रुव तारा बचा है अगर आप उसे देख सकें तो। मानवता किसी गहरी अंध गुफा में सिसक रही है। अखिल विश्व में आडम्बर और पूंजी का खेल है। प्रकृति को चोट करते भौतिकवाद को पोसने में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी है। सुविधा और सम्बन्ध में संतुलन का माप हमसे कहीं खो गया है। बहुतों ने कहा है कि साहित्य समाज का दर्पण है। संभव हो कि ऐसा साहित्य लिखा जाए जिससे मानव समाज पुनर्विचार की तरफ बढ़े। लेखक और अध्यापक होना बड़ा जिम्मा है। मौके-बेमौके माला पहन लेना और साफा बंधवा लेना पड़ाव है भाई किसी तरह की मंजिल नहीं। कुछ संकट अब देहरी पर हैं। संवेदनाओं का संकट। पर्यावरण का संकट। धरती को बचाने का संकट। बचपन को सहेजने का संकट। मशीनों के घेरे से दूर रहने का संकट। परिवार बचाने का संकट। सारे हालात का हल ज्ञान से होगा जिसमें लेखक, वकील, डॉक्टर और प्रोफेसर का बड़ा रोल देखता हूँ

(2) खूब सारी स्मृतियों के घटाटोप से निकलता है थोड़ा सा लेखन लगातार की घुमक्कड़ी के बाद पृष्ठभर लेखन कहीं बहुत दूर कुछ कौंधता है और फूट पड़ती है एक कोंपल दिनों तक उधेड़बुन रही। लिखे जाने के पहले तक लेखन इसी तरह खदबदाता है कढ़ी की तरह घंटों और दिनों तक। लिखना और फिर मिटाना कई बार यही क्रम अनुभव हुआ विचारने और मथने का। लम्बी उदासी के बाद न लिख पाना बड़ा आश्चर्य नहीं होता उसी तरह अभ्यास छूट जाने के बाद लिखने में आनाकानी या आलस्य अचरज का विषय नहीं है। अध्ययन और लेखन का अनिवार्य गुण है अभ्यास और निरतंरता जीवन में विविधता के बजाय जब व्यस्तता अपने से चिपक जाती है तो भी लेखन दूर छिटक जाता है बढ़िया लिखने का दबाव या अनोखा लिख लेने जैसा ध्येय अक्सर देरी में सहायक है। दबाव में लिखा हुआ उतना रुचिकर नहीं बन पड़ता है। दो हज़ार रुपए वाले मानदेय बाबत आकाशवाणी के लिए वार्ता लिखना और अपने मन की कोई दो कविताएं सृजित करना एकदम भिन्न स्वाद के अनुभव हैं उधर पठनीय गद्य को पाठक मन में उतारने के बाद लेखक को उसके हिस्से की तारीफ़ पहुँचाने में अगर देरी करता है तो वह लेखक की मृत्यु पक्की करने जैसा है। अंतराल कहीं भी हो यात्रा में कम ही साथ देता है इधर बीते लेखन पर मिली प्रतिक्रियाएं और बेहतर करने को प्रेरित करती ही है। लेखक और पाठक का सम्बन्ध भी बड़ा निराला है। हमने बिना पढ़े तारीफ़ करने वाले पाठक भी इसी समाज में देखे हैं थोड़ी मेहनत करेंगे तो आपको इसी समाज में बिना लिखने वाले लेखक भी मिल जाएंगे एक लेखक दूजे लेखक को नहीं पढ़ता या समय अभाव में पढ़ नहीं पाता ऐसे तो उदाहरण थोक में मिलेंगे समाज और देशकाल में बदलाव नहीं होने तक नए बिन्दुओं का अभाव भी लेखन कार्य के बीच में अंतराल पैदा करता है। विषयों में दोहराव से बचना लेखक का प्राथमिक धर्म है। कुछ चिंतन के बाद निर्णय हुआ लेखन भले स्थगित रहे मनुष्यता बची रहनी चाहिए। फिलहाल हम गिरावट के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। हमारा समाज कुछ शब्दों का उपयोग कहीं भी और किसी भी व्यक्ति के नाम के साथ करने लगा है जैसे; लेखक, साहित्यकार, शिक्षाविद, विद्वान, विदुषी। जो व्यक्ति खाली समाज में हर समारोह में उपस्थित रहता है वह अपने आप समाजसेवी और सामाजिक कार्यकर्ता की उपाधि धारण कर लेता है। असली लेखक शान्ति ओढ़े आसन ग्रहण किए रहता है मगर उथले-उथले लेखक बहुत लाउड होकर पेश आते हैं। डॉ. सत्यनारायण व्यास अक्सर कहते हैं प्रदर्शनप्रियता और आत्ममुग्धता दबे पाँव आती है

(3)  अध्यापक हूँ तो मैंने बीते दिनों जाना कि अगर आप बड़े मन से किसी विषय को पूरे में खोलकर रखते हैं तो विद्यार्थी अपने विवेक से बढ़िया निर्णय की तरफ बढ़ते हैं। सबसे बड़ा गुरु विवेक ही है। हम दुनिया को देखने के केवल उसी नज़रिए को साझा करेंगे जो हमें अपने अनुकूल लगता है तो फिर यह एक तरफ़ा मार्गदर्शन हो गया। बजाय इसके अध्यापक का धर्म है कि वह सभी पहलुओं पर केन्द्रित रहकर बात करें। कक्षा में पाया कि कुछ चुनिन्दा विद्यार्थी आपको पूरा पी जाते हैं। आपका कच्चापन भी और जानकार होना भी यों का यों उनमें उतरता चला जाता है। कक्षा ग्यारह में ज्योतिबा फुले पर बात करते हुए वर्ण, जाति और धर्म पर खुलकर चर्चा हुई। मेरी कमजोरी स्वीकार करूं कि मैं अक्सर एक तरफ़ा बोलता रहता हूँ। पाठ्यक्रम भले मुझे जल्दी के लिए संकेत करता रहे मैं रुक रुककर आरामतलबी के साथ आगे बढ़ता हूँ। पाठ के इर्दगिर्द के मेरे अब तक के समस्त अनुभव साझा किए बगैर नहीं रह पाता। कंप्यूटर लैब में ले जाकर स्मार्ट बोर्ड पर 'क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले' धारावाहिक की एक कड़ी दिखा आया। भारत एक खोज का फुले साहेब वाला एपिसोड साथ बैठकर देखा। पढ़ने-पढ़ाने का यही आनंद है। 'दौड़' को मैं कभी का नमस्कार कह चुका हूँ। 'स्लो' का अपना आनंद है इसी कक्षा में केवल पच्चीस विद्यार्थी हैं। चौबीस के घर अखबार नहीं आता। महीनेभर के पुराने समाचार पत्र लेकर शनिवार को कक्षा में बैठकर गतिविधि करवाई। स्क्रैब बुक बनवाई। पढ़ना, छांटना, काटना और चिपकाना सब मिलकर किया-करवाया। देहात के स्कूलों का अपना न्यारा जगत है। पूरी दुनिया से जुड़े होकर भी उनकी अपनी बेखबरी है। बालकों के पास मोबाइल और इंटरनेट होने से उन्हें ज्यादा एक्सपोजर है मगर अभिव्यक्ति में वे शर्मीले हैं। बालिकाएं लगभग बगैर मोबाइल और बिना इंटरनेट के जी रही हैं। मुझसे निजी लाइब्रेरी की पुस्तकें मंगवाकर पढ़ने वालों की तादात बढ़ रही है। यह भी एक आश्वस्ति है ग्रामीण भारत में पारिवारिक घेरेबंदी का नियंत्रण अलग से है ही। अवसरों की समानता नहीं है। छात्रा विद्यार्थियों पर दया आती है छात्र विद्यार्थियों पर दया का प्रकार अलग है। वे न जाने किस लोक में विचरते रहते हैं। उन्हें जानना अलग से वक़्त की मांग करता है अचानक से मिले समाचार पत्रों पर उनका टूट पड़ना खुशी देता है। स्तम्भ, स्तम्भकार और उनके विषयों को थोड़ा-थोड़ा समझने में उन्हें तीन शनिवार लगे। इस वर्ष के खाते गए आनंददायक शनिवार। कक्षा दस में 'नौबतखाने में इबादत' पढ़ाया तो बनारस की अपनी तीन यात्राएं स्मृति में ताज़ा हो आई। स्पिक मैके के अपने सारे के सारे संगीतमयी आयोजन और समारोहों के अनुभव जिनमें उस्ताद बिस्मिल्लाह खान आए सब सुनाए। विद्यार्थियों को सबकुछ बता देने का अपना आनंद है। कबीर का जिक्र हो या केदारनाथ सिंह की 'बनारस' कविता के निमित्त चर्चा। मैं उन्हें नागरी प्रचारिणी सभा के वर्तमान क्रियाकलापों तक ले चला जाता हूँ। व्योमेश शुक्ल की 'आग और पानी' तक ले जाता हूँ डूबने की अपनी तसल्ली है। अध्यापक होना बार-बार जिम्मेदारी की चादर ओढ़ाकर चला जाता है

(4) अपने से अगली यानी आने वाली पीढ़ी को हर कोई गरियाता रहता है। कुछ वाक्य अमर वाक्य हो जाते हैं। 'हमारे ज़माने की बात और थी।', 'हमारी हौड़ आप नहीं कर पाओगे।', 'अब ज़माना बहुत बदल गया है।', 'वक़्त-वक़्त की बात है भाई।', 'अब वैसी आत्मीयता नहीं रही।', 'आजकल की पीढ़ी सीधे मुंह कहाँ सुनती है।', 'अब हमको कौन पूछे लाली?' यही कहा-सुना जाता मिल जाएगा मैंने अपने पिता से सुना और मैं इसी तरह का अपनी बेटी को सुनाता रहता हूँ। मोहल्ले और गाँव-देहात में यही पसारा है। समय-दर-समय सुविधा जगत के विकास के साथ मानव के चेतना जगत में जागृति उस गति से नहीं हो पाई है इसलिए यह अंतराल बढ़ता ही गया। एक दौर था हम अपनी नयी पीढ़ी को डरा धमकाकर और इज्जत के नाम पर कसमें दिलाकर चला लेते थे। अब जेन-ज़ी के पास तर्क आ गया है। वे वर्तमान में विश्वास करते हैं। भूत और भविष्य की उतनी चिंता नहीं करते हैं। गति तेज़ है। बहुत कुछ ऑटोमेशन के हवाले हैं। तकनीक ने उनकी दौड़ बढ़ा दी है। निर्णय में फुर्ती आ गयी है। डर किस चिड़िया का नाम है वे नहीं जानते। उन्हें समाज, देश, मीडिया, धर्म और राजनीति की पर्याप्त समझ है  आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। सूचनाओं के बीच खड़े हैं। आत्मनिर्भरता ज्यादा है। परवाह एकदम न्यूनतम के स्तर पर टिक गयी है। आस्था के मानक धराशाही हो चुके हैं। अंधविश्वास पानी भरता है अब। भाषा में चौतरफा बदलाव दिखने लगा है। नौकरी और व्यापार में कमाई असीमित का आंकड़ा छूने लगी है। रोटी-कपड़ा और मकान वाली ज़रूरतों से बहुत आगे निकल चुके हैं। सपनों की इमारतें उन्हें ललचाती हैं। बड़े शहरों की ख्वाहिश उनके दिलों पर राज करती है। वक़्त-वक़्त पर हर पीढ़ी अपने आपको सिद्ध करती ही है। कसौटी पर खरा उतरता हुआ युवा बहुत प्यारा लगता है। एकाएक उन पर लाड़ करने को जी आता है। खासकर जब वे साम्प्रदायिकता के बजाय सामुदायिक सद्भाव को चुनते हैं। संकीर्णता के बजाय बंधुत्व को चुनते हैं हिंसा के बनिस्पत अहिंसा को चूमते हैं। जब वे अन्धानुकरण के बजाय प्रगतिशीलता को सीने से लगाते हैं मनभेद के बजाय मतभेद की पूरी समझ रखते हैं बिना विचारे अनुसरण की अपेक्षा संवाद में विश्वास है सामूहिकता में भरोसा होता है तो उन्हें बधाई देने का दिल करता है सारे उलाहने किसी गहरे कुए में फेंकने को मन करता है। धरती के विकास क्रम में अंतिम पायदान पर विकसित हुए मानव के बारे में कहावत है कि इसकी हर नयी पीढ़ी पहले वाली पीढ़ी से एडवांस ही होगी। हमारे हाथ में केवल और केवल समझ का साधन है जिसे पकड़कर हम पीढ़ीगत अंतराल को पाट सकते हैं। आपसी सम्बन्ध को साध सकते हैं। नयी पीढ़ी में जो ताकत है उसे प्रोत्साहित किया जाए और जो कमी है उसे धीरज के साथ विकसित करने के अवसर का इंतज़ार किया जाए। नयों को इत्मीनान से सुना जाए। उन्हें ज्यादा सुनाने से बचा जाए

(5) यह अंक भी आकार में अब एकदम सीमित हो गया है। नियमित कॉलम से हिम्मत बनी हुई है। बशीर बद्र साहेब को याद करते हुए उन्हें शब्द सुमन अर्पित किए हैं। कविताओं की जगह इस बार कुछ गज़लें प्रस्तुत हैं। 'कवितायन' खंड में नया दृष्टिकोण मिलेगा। शिवांगी गोयल की कविताओं और जसिंता केरकेट्टा की कहानियों पर  समीक्षा का प्रयास है इस अंक से 'धरोहर' शीर्षक से नया कॉलम शुरू किया है जिसमें किसी एक प्रसिद्ध राजस्थानी रचना और उस पर किसी जानकार साथी का एक आलेख प्रकाशन का जिम्मा हमारे साथी पुष्कर धाकड़ ने उठाया है। इस अंक में डॉ. जगदीश गिरी ने विजयदान देथा को केंद्र में रखकर लिखा है। प्रत्येक पत्रिका की अपनी विशिष्ट पहचान होती है, जो उसकी वैचारिकी और स्थानिकता का प्रभाव लिए होती है। चित्तौड़गढ़ से निकलने वाली पत्रिका 'अपनी माटी' अपनी वैचारिकी को लेकर प्रतिबद्ध है। परंतु काफी समय से मन को यह टीस सालती रही कि जिस राजस्थानी भाषा में हमने बोलना सीखा, तुतलाना सीखा और जो आज भी घर-परिवार में संवाद की भाषा है, वह अपनी मूल भाषा आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्षरत है। बच्चे इस भाषा में बात करते हैं, खेलते हैं, रमते हैं, पर इसको पढ़ना 'टेढ़ी खीर' और लिखना 'दूर की कौड़ी' है। यह भाषा आज भी उपेक्षा की शिकार है। हमने कोशिश की है कि राजस्थानी का रस हिंदी रसिकों तक पहुँचे। इसके लिए हमने राजस्थानी के पुरोधा तथा लोकप्रिय कथाकार विजयदान देथा की कहानी ‘अलेखूं हिटलर’ का चयन किया है। चूँकि हिंदी पाठकों के लिए राजस्थानी का रसास्वादन थोड़ा मुश्किल है, अतः पाठकों की सहायता हेतु रचना की मूल भावभूमि और मर्म को रेखांकित करता हुआ जगदीश गिरी जी का आलेख दिया जा रहा है, ताकि पाठकों की रुचि विकसित हो सके। प्रस्तुत हिंदी आलेख में इसकी बात उस राजस्थानी रचना के ठीक बाद पाठकों के समक्ष रखी जाएगी। इस पृष्ठभूमि के माध्यम से हिंदी पाठकों के लिए राजस्थानी रचना का आस्वादन करना सहज और बोधगम्य हो सकेगा। युवा आलोचक अंकित नरवाल से योगेश ने अपने बातचीत के कॉलम को आगे बढ़ाया है। यह सब आपको ज़रूर रुचिकर लगेगा। इस बीच हमारे पुराधाओं में जानेमाने फोटोग्राफर रघु राय चल बसे हम उन्हें याद करते हैं। अभी हाल के दिनों में अपने जीवन संघर्ष और पंडवानी गायन के लिए लोकप्रिय विदुषी तीजन बाई भी नहीं रही। दोनों की संगत में मेरी स्पिक मैके के आयोजनों में कई स्मृतियाँ हैं। जिन्होंने समृद्ध और प्रेरक जीवन जिया उनके चले जाने का दुःख तो होता ही है। आप दोनों अपने कला क्षेत्र के बड़े नाम थे। आपको हम एक प्रकाश स्तम्भ के रूप में देखते हैं। अपनी माटी की तरफ से आगामी अंकों में आपको स्मरण करने का प्रयास रहेगा

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

2 टिप्पणियाँ

  1. डॉ. सन्तोष विश्नोईअगस्त 02, 2026 10:07 pm

    ‘अपनी माटी' (अंक-65) का यह सम्पादकीय वर्तमान समाज, साहित्य और शिक्षण व्यवस्था के बदलते प्रतिमानों का एक बेहद संवेदनशील और यथार्थवादी दस्तावेज़ है। लेखक ने जिस तरह बौद्धिक वर्ग को उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारियों की याद दिलाई है, वह आज के उपभोक्तावादी दौर में बेहद ज़रूरी है। ग्रामीण परिवेश के विद्यार्थियों के साथ पुराने अख़बारों और डिजिटल माध्यमों के ज़रिए किया गया आत्मीय प्रयोग एक शिक्षक के सच्चे धर्म को उजागर करता है। इसके साथ ही, जेन-ज़ी (Gen-Z) पीढ़ी के तर्कों, उनके आत्मविश्वास और बंधुत्व की भावना को खुले मन से स्वीकारना और राजस्थानी भाषा के संरक्षण के लिए 'धरोहर' कॉलम की शुरुआत करना इस अंक को वैचारिक रूप से बेहद समृद्ध बनाता है। रघुराय और तीजन बाई जैसी महान विभूतियों को याद करते हुए मनुष्यता और कला को सर्वोपरि रखने का यह प्रयास सचमुच सराहनीय और संग्रहणीय है। माणिक जी को इस शानदार और मथने वाले सम्पादकीय के लिए ढेरों बधाइयाँ!

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  2. डॉ. हेमंत कुमारअगस्त 04, 2026 12:48 pm

    संपादकीय सबसे जरूरी चिंताओं और चिंतन से भरा है। तथाकथित प्रबुद्धों के जीवन पर जड़े अजड़ किवाड़ों को पीटता हुआ कि संवेदना बड़ी चीज है बचाने खातिर। इस एक चीज के बचाव में मानवता, पर्यावरण जैसी बेशुमार चीजों के बचाव का नुस्खा है। माला और माल को मंजिल मान बैठे बुद्धिजीवी के सामने की रिक्त राह दिखाता स्वर! लेखन की रचना प्रक्रिया को सामने लाते-लाते दूसरा परिच्छेद खुद रचना में तब्दील हो गया है। पहला परिच्छेद बुद्धिजीवियों के लिए है तो दूसरा मसीजीवियों के लिए। अध्यापन का विषय जितना 'अपनी माटी' के लिए महत्त्व रखता है, उतना शायद अन्य किसी हिंदी साहित्यिक पत्रिका के लिए नहीं। तीसरे खंड के अध्यापन अनुभव विद्यार्थी और अध्यापक दोनों के खासा काम के हैं। नई पौध के प्रति स्वागत का उत्साही स्वर भी काबिलेगौर है। सभी खंडों को मिला देने से इंसानी दुनिया का अंखड पाठ मुकम्मल करने का नजरिया देते संपादकीय के लिए बधाई!

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