- मलय नीरव
जसिंता केरकेट्टा हिन्दी कवयित्री और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे झारखंड के उराँव आदिवासी समुदाय से हैं। उनके चार कविता-संग्रह-‘अंगोर’, ‘जड़ों की ज़मीन’, ‘ईश्वर और बाज़ार’ और ‘प्रेम में पेड़ होना’; बच्चों के लिए दो किताबें प्रकाशित हैं- ‘ जसिंता की डायरी’ और ‘जिरहुल’। उनकी कविताओं का अनुवाद कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में हो चुका है। ‘औरत का घर’ उनका पहला कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह में उन्होंने आदिवासी समाज के रीति-रिवाज, संस्कृति, खान-पान में हो रहे सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन को चिन्हित किया है।
'औरत
का
घर',
सच
में...
कहाँ?
कहानी
में,
कल्पना
में!
यथार्थ
तो
यह
कहता
है—घर
की
औरत,
घर
में
कैद
औरत।
शीर्षक
में
संभावना
है,
उम्मीद
है,
पर
वास्तविकता
क्या
है?
कहानी-संग्रह
के
शीर्षक
से
ध्यान
हटकर
उसके
आवरण-चित्र
पर
जाता
है।
पेड़...सूखा
पेड़,
लेकिन
जड़
से
जुड़ा
हुआ।
सूर्योदय
या
सूर्यास्त
की
बेला
है।
उसी
सूखे
पेड़
के
नीचे
एक
आकृति,
जो
औरत
के
करीब
दिखाई
देती
है,
अपनी
गोद
में
एक
बालक
को
उठाए
हुए
है।
'औरत
का
घर'
शीर्षक
के
नीचे
का
यह
दृश्य
क्या
यह
बतला
रहा
है
कि
औरत
का
घर
यही
है—सूखा
पेड़!
कहानी-संग्रह
के
शीर्षक
और
उसके
आवरण-चित्र
से
मेरे
भीतर
'औरत
का
घर'
की
अवधारणा
को
लेकर
एक
द्वंद्व
उत्पन्न
होता
है।
लेखिका
किस
तरह
के
घर
की
बात
कर
रही
हैं,
यह
जानने
के
लिए
कहानियों
से
गुजरना
आवश्यक
है।
शायद
यहीं
मेरे
अंतर्द्वंद्व
का
भी
निराकरण
हो।
औरत,
वह
भी
आदिवासी
औरत
का
जीवन
कैसा
होता
है?
क्या
आदिवासी
समाज
स्त्री-पुरुष
के
प्रति
समान
भाव
रखता
है?
क्या
वह
पितृसत्तात्मक
विकृतियों
से
दूर
है?
जल,
जंगल
और
ज़मीन
से
जुड़ा
आदिवासी
समाज
जब
बाहरी
दुनिया
और
शहर
के
संपर्क
में
आता
है
तो
उस
पर
उसका
क्या
प्रभाव
पड़ता
है?
विकास
जब
प्रकृति
की
कीमत
पर
होता
है
तब
आदिवासी
उसे
कैसे
देखते
हैं?
आदिवासी
समाज
का
जिक्र
होते
ही
नक्सली
शब्द
सतह
पर
क्यों
तैरने
लगता
है?
ऐसे
अनेक
प्रश्नों
से
होकर
गुजरता
है
यह
कहानी-संग्रह।
हालाँकि
इसके
केंद्र
में
लगातार
यह
सवाल
बना
रहता
है—औरत
का
घर
कहाँ
है?
जसिंता
केरकेट्टा
के
कहानी-संग्रह
में
आदिवासी
समाज
की
अस्मिता
की
खोज
है,
स्त्री-विमर्श
है।
विकास
की
विडम्बना,
हिंसा
और
छल
की
पहचान
है,
आक्रोश
की
अभिव्यक्तियाँ
हैं।
प्रकृति
की
उपस्थिति
है
पर
बाज़ार
और
उपभोक्तावाद
की
संक्रामकता
के
साथ।
तलाशी,
आरोप,
गिरफ्तारी,
मुकदमा
और
हत्या
की
प्रक्रिया
में
तार-तार
होती
आदिवासी
ज़िंदगी
का
यह
स्वानुभूत
दस्तावेज़
है।
लेखिका
लिखती
हैं
कि
जंगल
से
जुड़े
लोग
किसी
भी
फूल
को
जंगली
नहीं
कहते।
शहर
ऐसा
अक्सर
कहता
है।
असल
में
वह
इनके
बारे
में
कुछ
नहीं
जानता।
जिनका
उसे
नाम
नहीं
मालूम,
जो
उसके
लिए
अजनबी
हैं,
उन्हें
वह
जंगली
कह
देता
है।
इस
संग्रह
के
माध्यम
से
वे
आदिवासी
समाज
और
गैर-आदिवासी
समाज
के
बीच
के
सूक्ष्म
अंतर
को
उजागर
करती
हैं।
'औरत का घर' कहानी-संग्रह में आदिवासियों के जीवन, उनके सरोकारों, बदलते हुए उनके समाज और संस्कृति, जंगल, ज़मीन तथा शहर—सबका खूबसूरती से चित्रण किया गया है। समाज की विकृतियों और प्रकृति के दोहन, दोनों को लेखिका ने बड़ी संवेदनशीलता और प्रामाणिकता के साथ उकेरा है। 'परवाह' कविता में जसिंता केरकेट्टा लिखती हैं—माँ/ एक बोझा लकड़ी के लिए/ क्यों दिन भर जंगल छानती,/ पहाड़ लाँघती,/ देर शाम घर लौटती हो?/ माँ कहती है—/जंगल छानती,/ पहाड़ लाँघती,/ दिन भर भटकती हूँ/ सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए।/ कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा पेड़! औरत का घर यही तो है—दूसरों के जीवन में, जीवनदान में। 'चम्पा बहा' कहानी में चम्पा अपने पति, बेटे और बेटियों के मोह में, उनकी परवाह में, खुद पर हो रहे अत्याचार को दरकिनार कर ताउम्र उस घर में रहती है, जो कैदखाने से भी बदतर है और यही परवाह अंततः उसकी लाश को उस घर से बाहर निकालती है। खुद की परवाह न कर दूसरों की परवाह करना ही उसके अस्तित्व को खत्म कर देता है, लेकिन अंत तक वह वहीं रहती है। किसलिए? दूसरों के जीवन के लिए।
"सभ्यताओं
के
मरने
की
बारी"
कविता
में
जब
वे
लिखती
हैं—"नदियाँ
ही
जानती
हैं/
उनके
मरने
के
बाद
आती
है/
सभ्यताओं
के
मरने
की
बारी",
तब
वह
केवल
नदी
की
ही
बात
नहीं
कर
रही
होती
हैं।
यहाँ
नदी
से
एक
स्त्री
भी
निकलती
हुई
दिखाई
देती
है।
सभ्यताएँ
नदी
और
नदी-सी
स्त्री
दोनों
के
वजूद
से
ही
जीवित
रह
सकती
हैं।
'औरत
का
घर'
की
कहानियों
में
भी
बार-बार
यह
दिखाई
देता
है
कि
पितृसत्तात्मक
समाज
में
भले
पुरुष
स्वयं
को
कितना
ही
'पुरखा'
घोषित
करे,
लेकिन
स्त्री
के
बिना
उसका
कोई
वजूद
नहीं।
चाहे
'औरत
का
घर'
कहानी
हो
या
'कुसुम',
हर
जगह
स्त्री
के
जाने
के
बाद
परिवार
का
संतुलन
बिखरता
हुआ
दिखाई
देता
है।
प्रकृति
के
स्वरूप
को
विकास
के
नाम
पर
बदला
जा
रहा
है।
जंगल
उजाड़े
जा
रहे
हैं,
नदियों
का
मुख
मोड़ा
जा
रहा
है,
उन
पर
बाँध
बनाए
जा
रहे
हैं,
पहाड़ों
को
काटा
और
विस्फोटकों
से
तोड़ा
जा
रहा
है
तथा
ज़मीन
को
लूटा
जा
रहा
है।
'भाषा'
जैसी
अनेक
कहानियों
में
लेखिका
इन
प्रश्नों
को
लगातार
उठाती
हैं।
'जड़ों
की
ज़मीन'
कविता
की
पंक्तियाँ—"वे
पेड़ों
को
बर्दाश्त
नहीं
करते,
क्योंकि
उनकी
जड़ें
ज़मीन
माँगती
हैं"—कहानी-संग्रह
के
स्त्री-विमर्श
से
भी
जुड़ती
हैं।
जब
ज़मीन
माँगने
वाले
पेड़
बर्दाश्त
नहीं
किए
जाते,
तब
अपना
घर
माँगने
वाली
औरत
कैसे
बर्दाश्त
की
जा
सकती
है?
यह
वह
दौर
है
जब
सच
को
सीधे
सवाल
की
तरह
नहीं
रखा
जा
सकता;
उसे
कहानी
के
रूप-रंग
में
ही
प्रस्तुत
करना
पड़ता
है।
इसलिए
लेखिका
इस
सत्य
को
कभी
अपनी
कविताओं
की
शक़्ल
में
हमारे
सामने
लाती
हैं
तो
कभी
कथा
की
सूरत
में।
'दुःख
ही
जीवन
की
कथा
रही,/
क्या
कहूँ
आज,
जो
नहीं
कही'
निराला
की
यह
पंक्ति
कहानी-संग्रह
की
पहली
कहानी
'कब्र
की
ज़मीन'
पढ़ते
हुए
कानों
में
बार-बार
गूँजती
रही।
तरह-तरह
के
नैसर्गिक
और
मानव
निर्मित
दुःख,
पीड़ा
के
विविध
रूप—सब
इस
कहानी
में
उपस्थित
हैं।
आदिवासी
जीवन
और
उसमें
भी
एक
स्त्री
का
जीवन
कितना
मर्मांतक
हो
सकता
है,
यह
इस
कहानी
में
देखा
जा
सकता
है।
दो
बेटों
के
बाद
परिवार
एक
बेटी
की
इच्छा
रखता
है,
लेकिन
लगातार
तीसरा
बेटा
जन्म
लेता
है।
वह
भी
बीमार।
उधर
घर
में
शराबी
पति
की
मार-पीट
अलग।
बच्चे
के
जन्म
के
अगले
ही
दिन
उसे
काम
पर
लौटना
पड़ता
है;
यदि
वह
काम
न
करे
तो
घर
का
चूल्हा
कैसे
जले?
अंततः
बच्चा
बीमारी
के
कारण
काल-कवलित
हो
जाता
है।
ईसाई
धर्म
अपना
चुके
इस
आदिवासी
परिवार
को
अपने
मृत
बच्चे
के
दफ़न
के
लिए
कब्रिस्तान
में
जगह
भी
नहीं
मिलती।
कारण
यह
बताया
जाता
है
कि
वे
चर्च
के
रविवार
वाले
कार्यक्रमों
में
शामिल
नहीं
होते
थे।
लेकिन
वह
स्त्री
काम
से
छुट्टी
लेकर,
भूखी
रहकर
चर्च
कैसे
जाती?
अंततः
समाज
को
दंडस्वरूप
भोज
देने
की
शर्त
पर
कब्रिस्तान
में
जगह
मिलती
है।
दुःख
और
पीड़ा
की
पराकाष्ठा
के
बीच
भी
वह
माँ
हार
नहीं
मानती।
यही
इस
कहानी
की
सबसे
बड़ी
ताकत
है—मनुष्य
की
जिजीविषा।
'मौत ही उसकी सबसे गहरी नींद होती है और क़ब्र ही उसका अपना कमरा, जहाँ उसे कोई परेशान नहीं कर पाता।' रेशमा जब यह कहती है, तब उसकी मनःस्थिति को व्यक्त करने के लिए शायद ही कुछ और कहने की आवश्यकता शेष हो। यह एक ऐसा वाक्य है जो उसके जीवन के समस्त दुःख, थकान, असुरक्षा और निराशा को अपने भीतर समेटे हुए है। इन कहानियों में आदिवासी जीवन, स्त्री-अनुभव और पीड़ा का ऐसा समवाय दिखाई देता है कि वे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे में गुंथे हुए लगते हैं।
"यह किसका बच्चा है?"—'औरत का घर' कहानी की यह पहली पंक्ति केवल एक बच्चे के पिता के बारे में जानना नहीं चाहती है, बल्कि औरत के पूरे अस्तित्व को नकारते हुए उसके वजूद पर पुरुष का स्वामित्व थोपती है। किसी पुरुष से उसके बच्चे के संबंध में शायद ही कभी पूछा जाता हो कि इसकी माँ कौन है। मानो बच्चा केवल पुरुष का होता हो, स्त्री का नहीं। कहानी की यह पंक्ति घर से पहले बच्चे का सवाल सामने ले आती है। क्या किसी औरत का अपना बच्चा हो सकता है? औरत का घर, औरत का बच्चा—और क्या-क्या औरत का हो सकता है, जो वास्तव में उसका नहीं माना जाता? 'निर्णय तो मरद ही लेते हैं।' यह वाक्य टीस की तरह चुभता है। स्त्री को इतना समर्थ नहीं माना जाता कि वह अपने बारे में भी स्वयं निर्णय ले सके। आदिवासी समाज, जो समानता की पृष्ठभूमि पर विकसित हुआ है, वहाँ भी असमानता का यह घुन प्रवेश कर चुका है। इस कहानी-संग्रह की मूल समस्याओं में से एक यह भी है—निर्णय तो मरद ही लेते हैं। कहानी-संग्रह में 'घर' बार-बार लौटता है—'औरत का घर'। जैसे सावन बीत जाने के बाद भी बारिश घूम-फिरकर बरसने आ ही जाती है, वैसे ही घर का प्रश्न इन कहानियों में बार-बार उपस्थित होता है। जल, जंगल, ज़मीन, अस्मिता, अस्तित्व, भाषा, संस्कृति—इन सबके बीच अंततः प्रश्न घर का ही रह जाता है।
'अंतिम
वार'
कहानी
में
केवल
एक
शक
के
आधार
पर
पति
उस
पत्नी
की
बीभत्स
हत्या
कर
देता
है,
जो
उसकी
प्रताड़ना
और
व्यवहार
से
परेशान
होकर
उससे
अलग
रहना
शुरू
कर
चुकी
थी।
न
पति
में
अपराधबोध
दिखाई
देता
है
और
न
ही
समाज
में।
तर्क
हैं,
द्वंद्व
हैं,
व्यवस्था
और
शहर
के
नकारात्मक
प्रभाव
के
विरुद्ध
विद्रोह
भी
है,
लेकिन
अपनी
गलती
की
स्वीकारोक्ति
नहीं
है।
लगभग
हर
कहानी
में
गुनाह
है
और
गुनहगार
भी,
किंतु
आदिवासी
समाज
में
गुनहगार
को
सज़ा
दिलाने
के
प्रति
अपेक्षित
जागरूकता
का
अभाव
दिखाई
देता
है।
या
यूँ
कहें
कि
उनमें
अपनों
के
प्रति
मोह
के
साथ-साथ
बाहरी
सत्ता
के
प्रति
एक
भय
भी
मौजूद
है।
शायद
उन्हें
आशंका
है
कि
यदि
वे
गुनहगार
को
पकड़वाने
के
लिए
व्यवस्था
को
अपने
समाज
में
प्रवेश
देंगे,
तो
कई
और
निर्दोष
लोग
भी
इस
व्यवस्था
की
बलि
चढ़
जाएँगे।
यहाँ
व्यवस्था
और
न्याय-तंत्र
के
प्रति
एक
गहरा
अविश्वास
दिखाई
देता
है।
इन
कहानियों
में
पुरुष
पात्र
मानो
मनुष्य
नहीं,
हैवान
बनकर
उपस्थित
होता
है।
वह
नारकीय
हिंसा
को
धरती
पर
साकार
कर
देता
है।
‘जईतबोरा’
एक
उम्मीद
भरी
कहानी
है।
चारों
ओर
जब
निराशा
का
वातावरण
हो,
तब
यह
कहानी
आदिवासी
समाज
में
आशा
और
उत्साह
जगाती
है।
यहाँ
हम
आदिवासी
समाज
की
सहनशीलता
और
लचीलेपन
को
देखते
हैं।
किसी
भी
परिस्थिति
में
सामंजस्य
स्थापित
करने
के
लिए
प्रयत्नशील
रहना
उसकी
सरलता
और
सहजता
का
परिचायक
है।
यही
आदिवासी
समाज
की
मूल
प्रकृति
और
संस्कृति
है,
जो
विषाक्त
सामाजिक
वातावरण
के
कारण
धीरे-धीरे
प्रदूषित
होती
जा
रही
है।
वहीं
दूसरी
ओर
‘रिश्ता’
कहानी
बिना
नाम
के
रिश्तों
की
खूबसूरती
को
सामने
लाती
है।
यह
एक
अलग
दुनिया
की
कहानी
प्रतीत
होती
है,
मानो
यथार्थ
से
परे।
आदिवासी
समाज
भी
प्रकृति
की
तरह
है—जितना
ज्ञात
है,
उससे
कहीं
अधिक
अज्ञात।
यह
कहानी
आदिवासी
समाज
के
उन्हीं
अनजाने
पहलुओं
को
उजागर
करती
है,
जिन्हें
जानकर
आधुनिक
समाज
चिंतन
में
डूब
सकता
है।
यह
क्या
है—अल्ट्रा
मॉडर्न
समाज
की
झलक
या
फिर
अनुशासन-विहीन
समाज
की
अभिव्यक्ति?
'औरत
का
घर'
विचार
और
विमर्श
प्रधान
कहानी-संग्रह
है।
कभी-कभी
यह
अखरता
है
कि
लेखिका
अपने
मंतव्य
को
स्पष्टता
से
कहने
के
लिए
पात्रों
की
संख्या
बढ़ाती
चली
जाती
हैं।
उनसे
मानो
ज़बरदस्ती
अपना
कथ्य
कहलवाया
जाता
है।
ऐसा
लगता
है
कि
लेखिका
जो
कुछ
भी
घटित
हो
रहा
है,
उसे
लिख
देना
चाहती
हैं।
जैसे
'अंतिम
वार'
कहानी
में
हत्या
के
बाद
चौराहे
पर
स्थित
पुष्पा
काकी
की
दुकान
का
दृश्य
है,
जहाँ
संख्यावाची
नाम
वाले
पात्र
आते-जाते
हैं
और
मानो
लेखिका
के
तोते
की
तरह
संवाद
दोहराते
चले
जाते
हैं।
कभी-कभी
तो
एक
ही
बात
बार-बार
अलग-अलग
कहानियों
में
आती
रहती
है।
इससे
दुहराव
का
आभास
होता
है,
लेकिन
यथार्थ
की
शक्ति
इसे
बोझिल
होने
से
बचा
लेती
है।
पाठक
की
समझ
पर
कुछ
छोड़
देने
का
संयम
लेखिका
में
कम
दिखाई
देता
है।
यदि
'औरत
का
घर'
उनका
मुद्दा
है,
तो
वह
पूरे
आग्रह
के
साथ
उपस्थित
होता
है;
उसे
इशारों
में
नहीं
कहा
जाएगा
और
न
ही
एक
बार
कहकर
छोड़
दिया
जाएगा।
उसे
बार-बार
कहा
जाएगा,
ताकि
समाज
उससे
आँखें
न
फेर
सके।
कहीं-कहीं तो पुरुष पात्रों, विशेषकर दुर्जन या खल पात्रों के कृत्यों के लिए सहानुभूति या औचित्य
का पर्दा खड़ा करने हेतु लगभग एक जैसी परिस्थितियों का सहारा
लिया
गया
है।
कहानी-संग्रह
के
रूप
में
पढ़े
जाने
पर
यह
प्रवृत्ति
इसकी
कमजोरी
बन
जाती
है।
हो
सकता
है
कि
ये
परिस्थितियाँ
यथार्थ
से
उपजी
हों,
किंतु
दुहराव
समग्रता
में
कहानी-संग्रह
के
कथापन
को
क्षति
पहुँचाता
है
और
उसके
प्रभाव
को
कुछ
हद
तक
सीमित
कर
देता
है।
कहानी-संग्रह
में
कई
ऐसी
कहानियाँ
हैं
जो
उद्वेलित
करती
हैं
और
विमर्श
का
एक
विशाल
द्वार
खोलती
हैं।
दर्द
और
पीड़ा
से
भरी
इन
कहानियों
को
एक
ही
बैठक
में
लगातार
पढ़
पाना
आसान
नहीं
है।
एक
कहानी
पढ़ने
के
बाद
किताब
को
बिस्तर
पर
रखकर
चिंतन
में
डूब
जाना
पड़ता
है
कि
आखिर
इंसान
इतना
निर्मम
कैसे
हो
गया
है।
एक
दिन
अचानक
मेरी
नज़र
किताब
पर
गई।
उसे
बंद
करके
रखने
के
बजाय
मैं
जहाँ
तक
पढ़
चुका
था,
उसी
पृष्ठ
पर
उलटकर
बिस्तर
पर
रख
दिया
था।
इस
तरह
रखे
जाने
पर
किताब
पूरी
तरह
बिस्तर
से
सटी
नहीं
थी,
बल्कि
कुटिया
की
आकृति
में
वहाँ
टिकी
हुई
थी।
'औरत
का
घर'
की
बात
करने
वाली
वह
किताब
स्वयं
भी
मानो
एक
कुटिया
का
रूप
धारण
किए
हुए
थी।
उस
क्षण
किताब
एक
प्रतीक
बन
गई—मानो
वह
कह
रही
हो
कि
मैं
केवल
घर
की
बात
नहीं
करती,
बल्कि
स्वयं
घर
बनकर
पाठक
के
भीतर
उस
अनुभव
को
रच
देती
हूँ।
जल
है,
जंगल
है,
ज़मीन
है;
अर्बन
नक्सल
है,
नक्सलवाद
है,
नोटबंदी
भी।
औरत
है,
मर्द
है,
दिकू
है,
आदिवासी
भी;
शहर
है,
गाँव
है;
पीड़ा
है
तो
उल्लास
भी।
विमर्श
है,
अस्तित्व
है,
अस्मिता
भी।
इन
तमाम
सरोकारों
और
प्रश्नों
के
बीच
कहानी-संग्रह
पाठक
को
अंततः
एक
मूल
प्रश्न
के
सामने
लाकर
खड़ा
कर
देता
है—आख़िर
औरत
का
घर
कहाँ
है?
'औरत का घर' पढ़ते हुए मैं अपने आस-पास आदिवासी समाज को खोजने लगता हूँ। कहाँ हैं हमारे शहरों में आदिवासी? तभी अतिक्रमण हटाने की खबरें आती हैं। हम खुश होते हैं कि अब ट्रैफ़िक जाम से मुक्ति मिलेगी। लेकिन अचानक मन में एक सवाल उठता है—यह अतिक्रमण आया कहाँ से? क्या अतिक्रमण केवल शहरों में ही होता है? हम जो धीरे-धीरे जंगलों के भीतर तक घुसते जा रहे हैं, जल, जंगल और ज़मीन को हड़पते जा रहे हैं, क्या वह अतिक्रमण नहीं है? उस अतिक्रमण को कौन हटाएगा? या फिर वह अतिक्रमण है ही नहीं, क्योंकि हमने उसे शहरीकरण, औद्योगीकरण और उदारीकरण जैसे आकर्षक नाम दे दिए हैं? इन कहानियों का कोई अंत नहीं है। कोई अंतिम सत्य भी नहीं! कहानी-संग्रह बस इतना कहती है, 'डहर बहुत ख़राब आहे दई। लेकिन चलना होगा, चलते रहना होगा। तभी सम्भव होगा; औरत का घर।'
किताब : औरत
का
घर
(कहानी
संग्रह),
लेखिका
: जसिंता
केरकेट्टा
प्रकाशन : राजकमल
प्रकाशन
,प्रथम
संस्करण
: 2026, कुल पृष्ठ
: 174



अद्भूत लेखनी..
जवाब देंहटाएंभाव, विद्वता और लेखनी की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है l जिन पहलु को आप, हम और अन्य नहीं देख पा रहें है उन्हें नीरव जी अपनी लेखनी से अभिव्यक्त कर रहें है l लेखिका जसिंता केरकेट्टा जी के भाषायी भाव को सशब्द प्रस्तुति अपने आप में प्रसंसनीय है l अच्छे लेख के लिए आपको बधाई! बहुत लिखिये और हम सभी को ज्ञानअर्जन को ओर ले चलिए l❤❤🌹🌹
Contemporary analysis
जवाब देंहटाएंसराहनीय प्रयास है।कहीं कहीं विश्लेषण का अभाव है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही प्रभावशाली और संवेदनशील लेख...❤️
जवाब देंहटाएंअत्यंत उत्कृष्ट विश्लेषण।
जवाब देंहटाएं'औरत का घर' कहानी संग्रह की सारगर्भित समीक्षा के लिए प्रिय बड़े भाई मलय जी का धन्यवाद 🙏
जवाब देंहटाएंआप की लिखी समीक्षा ने मुझे इस कहानी संग्रह को पढ़ने के लिए उत्साहित किया।
आप ने लेखिका की अन्य कृतियों का अध्ययन कर उनके भी संदर्भ जोड़े हैं जो किसी भी लेखक के साहित्य की समीक्षा के लिए आवश्यक पहलू है।
ऐसे ही आप लेखन करते रहें।
भविष्य के लिए शुभकामनाएं 🌺
A writer possesses the magic to turn simple words into deep emotions, clear thoughts, and vivid worlds. You give a voice to what we feel inside but cannot say. Such a fine ✍️ writer you are..!! 🙏✨ Keep it up..
जवाब देंहटाएंबिस्तर पर पड़े किताब का कुटिया बन जाना आपके लेखन को जीवंत बनाती है…🌻
जवाब देंहटाएंसुंदर भावों और सुंदर शब्दों के लेखक मलय नीरव की आगामी अभिव्यक्तियों को पढ़ने का इंतज़ार रहेगा…🌻
बहुत बढ़िया समीक्षा मलय जी। समकालीन कथाकारों में ख्यातिब्ध जासिंता केरकेट्टा की कहानी 'औरत का घर' की सारगर्भित समीक्षा आपके द्वारा बहुत ही सरल और सहज भाषा में है। आपको मंगलकामनायें, ऐसे ही अनवरत आपकी कलम में धार बनी रहे। ❤️💐
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