सैयद दाऊद रिज़वी की कविता सम्पादक, अपनी माटी सोमवार, मार्च 04, 2019 पहचान किलकारी जब गूंजी , मेरी तो अपनों ने ही ठुकराया अपशगुन हो गया जैसे , कोई नज़रें…