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शोधमूलक आलेख:निम्बाहेड़ा क्षेत्र के पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण/डॉ.कमल नाहर

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, जून 15, 2013 | शनिवार, जून 15, 2013

जून -2013 अंक 

             किसी स्थान विशेष के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के विकासक्रम का क्रमानुगत अध्ययन उसके ऐतिहासिक अनुसंधान से ही संभव हैं। इस आधार तक पहुंचना बहुत चुनौतिपूर्ण हैं, विशेषकर जब कि ऐतिहासिक लेखन-अध्ययन का कोई ठोस स्त्रोत, लिखित सामग्री उपलब्ध न हों। ऐसी दशा में पुरातात्विक अवशेष ही एक मात्र स्त्रोत के रुप में उपलब्ध होते हैं, जिनके समुचित अनुसंधान से ही ऐतिहासिक आधार को समझा जा सकता हैं।         

          चित्तौड़गढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थल से मात्र 30 कि.मी. दूर स्थित निम्बाहेड़ा क्षेत्र ऐतिहासिक रुप से विभिन्न राजवंशों, भौगोलिक संदर्भ में विभिन्न क्षेत्रों तथा सांस्कृतिक संदर्भ में विभिन्न संस्कृतियों का समागम स्थल रहा हैं। राजनीतिक रुप से यह क्षेत्र मराठों, मेवाड़ के महाराणाओं व टौंक के नवाब के अधीन रहा तो, प्राशासनिक दृष्टि से जागीरदारी के साथ-साथ खालसा क्षेत्र भी रहा। क्षेत्रीय-सांस्कृतिक दृष्टि से यह क्षेत्र मालवा व मेवाड़ की संगम स्थली तो, भौगोलिक दृष्टि से पहाड़ी पठारी व मैदानी स्थल। 

             पश्चिमी भारत के मेवाड़ व मालवा प्रदेशों के संगम स्थली पर भौगोलिक दृष्टि से निम्बाहेड़ा क्षेत्र 240 37‘ उ. अक्षांश और 74041‘ पूर्वी देशांतर पर स्थित हैं।राजस्थान की अरावली व मध्य भारत की विध्यांचल पर्वत श्रृंखलाओं के संधि स्थल पर होने के कारण इसका एक हिस्सा पठारी तो दूसरा मैदानी हैं। इस क्षेत्र ने ऐतिहासिक संन्दर्भ में अनेक परिवर्तन देखे, विशेषतौर पर मध्य युग में यहां मेवाड़ के महाराणाओं, परमारों, चालुक्यों, तुर्कों, मुगलों का तो आधुनिक काल में मराठों, टोंक के नवाब व अंग्रेजों का प्रभुत्व रहा। जिसका प्रभाव यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक दशा पर पड़े बगैर नहीं रहा। प्रस्तुत आलेख में निम्बाहेड़ा क्षेत्र के कुछ पुरातात्विक महत्व के स्थानों का ऐतिहासिक सर्वेक्षण किया गया।            

धारेश्वर के शैलचित्र:-

           भारत के उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त में चारगुल से लेकर असम और कर्नाटक में बहुत बड़ी संख्या में शैलचित्र मिलते हैं। इनका सबसे बड़ा भण्डार विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबैठका में मिलता हैं। अरावली पर्वत श्रृंखलाओं तथा द.-पू़. राजस्थान में कई लाख वर्ष पूर्व के मानव जीवन के अनेक चिन्ह प्राप्त हुए। इस समय मानव टोलियां बनाकर शिकार के लिए घूमता रहता था, वह हिंसक पशु व मौसम से बचने के लिए नदी घाटी के शैलाश्रयों की शरण लेता था।  निम्बाहेड़ा से लगभग 40 कि.मी. दूर स्थित धारेश्वर के समीप ही बहने वाली गुंजाली नदी के किनारे स्थित शैलाश्रयों की लगभग 300 मीटर लम्बी श्रृंखला में बहुत बड़ी संख्या  में  प्रागेतिहासिक शैलचित्र उपलब्ध होते हैं।

          धारेश्वर के शैलचित्र आकार एवं बनावट की दृष्टि से अन्य स्थानों- भीमबैठका, अल्मोड़ा से प्राप्त शैलचित्रों की तरह परिष्कृत नहीं हैं। इसका अर्थ यह है कि धारेश्वर के शैलचित्र प्रारम्भिक अवस्था के हो सकते हैं। यह क्षेत्र मानव सभ्यता के विकास का आरंभिक स्तर माना जा सकता हैं, किन्तु जहां तक यहां के चित्रों के विषयों की विविधता की बात हैं, यह अन्य स्थानों से काफी साम्यता रखते हैं। धारेश्वर क्षेत्र में इतनी विशाल मात्रा में शैलाश्रय व शैलचित्रों का होना यह सिद्ध करता हैं कि यह क्षेत्र प्राग्मानव की लम्बे समय तक क्रीडा स्थली रहा। इस क्षैत्र के भूगोल, जलवायु, वनस्पति, वन्य प्राणी, मिट्टी आदि का प्रभाव प्राग्मानव के अपने परिवेश एवं जीवन पर पड़ा। इस प्रकार इन शैलचित्रों से उस काल की पारिस्थिति तंत्र का अनुमान लगाया जा सकता हैं। धारेश्वर के इन शैलचित्रों के सही काल के निर्धारण हेतु व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा वैज्ञानिक तकनीक से परीक्षण व अनुसंधान कर इन शैलचित्रों के निश्चित काल निर्धारण तक पहुंचा जा सकता हैं। 

         यह शैलचित्र प्राकृतिक व अन्य कारणों से नष्ट हो रहे है, ऐसी स्थिति में इनके उचित संरक्षण की आवश्यकता हैं। स्लाइड्स, फोटोग्राफी एवं विडियोग्राफी के माध्यम से इन शैलचित्रों को सुरक्षित रखा जा सकता हैं। इस सम्बन्ध में आसपास के निवासियों एवं ग्रामवासियों में जागरुकता पैदा करने की आवश्यकता हैं, तब ही मानव जीवन की शुरुआत को प्रदर्शित करने वाली ये कला विथिकाएं सुरक्षित एवं संरक्षित रह पायेगी।

माद्याखेड़ी का मंदिर:-

          निम्बाहेड़ा से 15 किलोमीटर की दूरी पर 600 लोगों की बस्ती वाले ग्राम माद्याखेड़ी में निर्मित यह मंदिर पुरातात्विक दृष्टि से अल्पज्ञात हैं किन्तु यह प्राचीन मंदिर स्थापत्य का छोटा किन्तु महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। बनावट व शैली से इस मंदिर निर्माण का काल ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के होने का अनुमान हैं, यह मंदिर अपने अनुठे स्थापत्य व मूर्तिकला के कारण किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता हैं। किंतु रखरखाव के अभाव के कारण यह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच गया और इसका शिखर, मुख्य द्वार आदि धराशायी हो गये। यद्यपि हाल के वर्षो में स्थानीय लोगो ने इसका जिर्णोद्धार किया किन्तु जानकारी व संसाधनों के अभाव में हुए इस पुनर्निर्माण के कारण इसका पुरातात्विक स्वरुप काफी हद तक नष्ट कर दिया गया। यह संतोष का विषय हैं कि मंदिर का अधिकांश भाग अपने मौलिक स्वरुप में ही अस्तित्व में हैं, जिसमें मंदिर के मुख्य भाग का निचला हिस्सा, मण्डप, बाहरी दीवारों पर निर्मित मूर्तियां तथा कुछ चार दीवारी सम्मिलित हैं।

        माद्याखेड़ी का 12वीं शती का यह शिवमंदिर बहुत छोटा, किन्तु स्थापत्य व मूर्तिशिल्प की दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण हैं। निर्माण की सूक्ष्म बनावट, सुन्दर शिल्प, आकर्षक मुख-मुद्रा, अंगसंरचना से परिपूर्ण मूर्तिशिल्प इसकी प्रमुख विशेषता मानी जा सकती हैं। छोटे से स्थान पर भी अलंकृत मन्दिर का निर्माण होना यह सिद्ध करता हैं कि उस काल में मन्दिर स्थापत्य कला का फैलाव कितना अधिक था। 

मकनपुरा के मंदिर व रुठी रानी का महल:-

       निम्बाहेड़ा से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर मकनपुरा गांव में नई आबादी के साथ-साथ यत्र-तत्र बिखरे हुए अनेक भग्नावशेषों को देखा जा सकता हैं, जिनसे पता चलता हैं कि यह गांव सोलहवीं शताब्दी में पूर्ण रुप से विकसित था। सम्भवतः वर्तमान गांव के नीचे दबी हुई प्राचीन बसावट होने का अनुमान हैं। वर्तमान गांव मकनपुरा की बसावट 80 से 100 वर्ष पुरानी हैं, किन्तु यहां सम्पूर्ण गांव में बिखरे हुए पुरातात्विक अवशेष इसके नीचे 500 वर्ष पुराने होने की संभावना व्यक्त करते हैं। उपलब्ध विभिन्न साक्षों को जोड़कर देखने पर यह मालूम होता हैं कि इस प्राचीन गांव में बस्ती के साथ-साथ बावड़ी, छतरी, मंदिर समूह व महल निर्मित हुए जो उस काल के स्थापत्य कला पर प्रकाश डालते हैं। इस प्राचीन स्थापत्य को पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से देखने व इसे संरक्षित किये जाने की आवश्यकता हैं। 

बिनोता की बावड़ी:-

         पेयजल के मुख्य स्त्रोत बावड़ियों को सुन्दर प्रवेश द्वार, छतरियों, मेहराबों, कलात्मक झरोखों से सजाया गया। राजस्थान में ऐसी बावड़िया हाड़ौती, मारवाड़ व शेखावाटी क्षेत्र में बड़ी संख्या में निर्मित हुई। मेवाड़ में भी ऐसी बावड़िया हुई, जिसमें निम्बाहेड़ा से 18 किलोमीटर की दूरी पर बिनोता ग्राम में बनी बावड़ी भी अपनी बनावट शैली के कारण स्थापत्य की दृष्टि से अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं।  
      
        यह बावड़ी स्थापत्य की दृश्टि से अनेक विशेषताओं से युक्त हैं। बावड़ी में प्रवेश के लिए तीन ओर भव्य द्वार निर्मित किए गये। पश्चिम दिशा की ओर पूजा-अर्चना के लिए एक ओर भेरुजी तो दूसरी ओर गणपति की मूर्तियां स्थापित की गई। 20 सिढ़ियों के बाद मेहराबदार दरवाजे निर्मित हैं। यहां पर बावड़ी को तीन मंज़िला बनाया गया, सबसे नीचे की मंज़िल पर कुण्ड में प्रवेश करने हेतु मेहराबदार द्वार बनाया गया। इसके ठीक उपर द्वितीय मंज़िल पर मध्य में बड़े व बायें-दायें छोटे मेहराब बनाये गए हैं जिनके दोनों ओर पत्थर पर सुन्दर कलाकृति बनाई गई, जो आकृति में एक दूसरे से भिन्न हैं। ग्रामवासी पीने के पानी के लिए अथवा अन्य कार्य के लिए पश्चिम दिशा की ओर निर्मित दरवाजे का उपयोग करते रहे हैं। पूर्व दिशा की ओर निर्मित द्वार का स्थापत्य भी पश्चिमी दरवाजें के समान हैं, किन्तु इस ओर देव मूर्तियां स्थापित नहीं की गई।  उत्तर दिशा की ओर के विशाल द्वार को हाथी दरवाजा कहा जाता हैं। इस दरवाजे के सामने की ओर बावड़ी के दक्षिणी भाग में तीसरी मंज़िल पर अन्दर एवं बाहर से अलंकृत एक दरगाह निर्मित की गई। बावड़ी के स्थापत्य की विशेषता हैं कि पानी तीनों दिशाओं में स्थापित सीढ़ियों में समान स्तर पर रहता हैं। बावड़ी की दूसरी मंज़िल पर चारों ओर आने-जाने के लिए छोटे दरवाजों से होकर मार्ग बना रखा हैं। 

          18वीं शताब्दी में निर्मित इस कलात्मक बावड़ी का वर्तमान स्वरुप बहुत चिन्ताजनक हैं, गत कई वर्षो से इसका रख-रखाव तथा साफ सफाई नहीं हुई, परिणामस्वरुप जगह-जगह पत्थरों में दरारें पड़ गई और अब वे चटक कर टूटने लगे हैं। जगह-जगह बड़ी मात्रा में दीवारों में घास, झाड़ियां आदि उग आई, जिससे बावड़ी को ओर अधिक हानि होने की सम्भावना हैं। इसके कुण्ड में निरन्तर कचरा डालने से पानी बहुत अधिक गन्दा हो चुका हैं और सर्वत्र गन्दगी फैली हुई हैं। ऐसी अवस्था में इसका मौलिक स्वरुप ही बदल चुका हैं। आवश्यकता हैं पुरातात्विक महत्व की इस ऐतिहासिक धरोहर के उचित रख-रखाव व संरक्षण की, जिससे तीव्र गति से नष्ट हो रहे इस महत्वपूर्ण स्थापत्य को बचाया जा सकें। 

खेडा नाहरसिंह माता का मंदिर:-

           तीसरी शताब्दी से अद्यतन भारतवर्ष में मंदिर अपने अंलकरण के साथ-साथ आध्यात्मिक-दार्शनिक महत्व के लिये भी निर्मित हुए। इसके उदाहरण दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित खजुराहों के सूर्य मंदिरों में देखे जा सकते हैं, जो अपने आप में विलक्षण व अनूठे हैं। वास्तुशिल्प का ऐसा अनुठा उदाहरण निम्बाहेड़ा क्षेत्र में भी देखने को मिलता हैं। यहां से मात्र 48 किलोमीटर दूरी पर खेड़ा नाहरसिंह माता नामक गांव का यह मंदिर इसी शैली का निर्माण हैं। अत्यन्त जीर्णशीर्ण अवस्था में बचा हुआ यह मंदिर एक बारगी अत्यन्त साधारण मालूम पड़ता हैं, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने व अध्ययन करने पर मध्ययुगीन खजुराहों शैली का मंदिर प्रमाणित होता हैं। 

          यह अज्ञात पुरातात्विक मन्दिर अपनी निर्माण शैली, मूर्तिशिल्प, स्तम्भ, छतों, बाहरी मूर्तिर्यो के संन्दर्भ में बेजोड़ हैं, जिनकी तुलना खजुराहों, मेनाल व रणकपुर के सूर्य मन्दिरों से की जा सकती हैं। यहां के मण्डप की छत देलवाड़ा (माउण्ट आबु) के जैन मन्दिर की छतों के समकक्ष व तीक्ष्ण दिखाई पड़ती हैं। यहां की मैथुनरत मूर्तियों का शिल्प इस स्थल को राश्ट्रीय स्तर पर विख्यात प्राचीन सूर्य मन्दिरों के समकक्ष रखता हैं। एक उल्लेखनीय तथ्य यह हैं कि इस प्रकार के स्थापत्य व मूर्तिशिल्प का प्रभाव इस क्षेत्र के अन्य स्थानों के मन्दिरों में भी दिखाई देता हैं। मन्दिर निर्माण की नागर शैली जो परमार काल में विकसित हुई उसमें इस प्रकार के मन्दिरों की भी बहुत बड़ी भूमिका रही।    

विश्लेषण एवं निष्कर्ष:-

        सर्वमान्य पुरातात्विक स्थलों के बारे में पर्याप्त अनुसंधान हुआ तथा ऐसे स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, गैर सरकारी संगठन, सरकार आदि के द्वारा संरक्षित हैं। कुछ पुरातात्विक स्थल तो विश्व धरोहर घोषित किये जा चुके हैं। किन्तु स्थानीय स्तर पर यहां-वहां बिखरे हुए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर के बारे में अल्प अथवा नगण्य जानकारी ही उपलब्ध हैं। 

         प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में निम्बाहेड़ा क्षेत्र के धारेश्वर में उपलब्ध शैलचित्रों, पानगढ़ के दुर्ग, मकनपुरा के महल व शिव मंदिर समूह, बिनोता की बावड़ी, माद्याखेड़ी व खेडा नाहरसिंह माता के मंदिरों के सम्बंध में अध्ययन व अनुसंधान किया गया। चूंकि इन स्थलों का ऐतिहासिक विवरण किसी प्रकार के ऐतिहासिक या अन्य प्रकार के स्त्रोत, सरकारी-गैर सरकारी दस्तावेजों में उपलब्ध नहीं हैं, अतः इस सम्बंध में तथ्यात्मक खोज का मुख्य आधार केवल भग्नावशेषों के रुप में उपलब्ध पुरातात्विक स्त्रोत ही रहे। 

            इस प्रकार इन पुरातात्विक स्थलों के बारे में अनुसंधान के माध्यम से तथ्यात्मक निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयास किया गया। अनुसंधान का यह उपक्रम कई तथ्यों को उजागर करने वाला रहा। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह हैं कि यहां के धारेश्वर में भीमबैठका स्तर के शैलचित्र बहुत बड़ी संख्या में उपलब्ध होते हैं, तो बिनोता में शेखावाटी-हाडोती क्षेत्र के समकक्ष कलात्मक शैली की बावड़ी उपलब्ध हैं। यहां के छोटे से गांव माद्याखेड़ी में राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध मंदिरों के समकक्ष कलात्मक स्थापत्य व मूर्तिशिल्प लिए शिव मंदिर दर्शक को आश्चर्य में डाल देता हैं। पानगढ़ दुर्ग धराशायी होने के कगार पर होने के बाद भी इसका स्थापत्य एवं निर्माण शैली इसे एक श्रेष्ठ दुर्ग प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। खेडा नाहरसिंह माता के मंदिर के बारे में लगभग सभी अंजान हैं, किन्तु कलात्मक शैली के इस छोटे से मंदिर का मूर्तिशिल्प खजुराहों के मंदिरों के समकक्ष ठहरता हैं। निम्बाहेड़ा क्षेत्र के मकनपुरा ग्राम के स्थापत्य यद्यपि कलात्मक नहीं हैं किन्तु बड़ी मात्रा में यहां पुरातात्विक अवशेषों का उपलब्ध होना एक बड़े रहस्य को खोलने की साम्यर्थ रखता हैं। 

          क्षेत्र के इन स्थलों के अनुसंधान से यह तथ्य भी निष्कर्ष स्वरुप सामने आया कि स्थापत्य कला व मूर्तिशिल्प के बेजोड़ उदाहरण यह पुरातात्विक स्थल समय की मार खाकर तथा उचित रखरखाव के अभाव में लगभग नष्ट होने के कगार पर हैं। आवश्यकता हैं कि स्थानीय स्तर पर इस सम्बंध में जागरुकता पैदा कर लोगों को शिक्षित किया जाये कि वे अपने समीप उपलब्ध ऐतिहासिक धरोहर की इस अमूल्य विरासत के महत्व को समझते हुए इसे संरक्षित करने का कदम स्थानीय स्तर पर उठाएं। साथ ही स्थानीय प्रशासन, सरकार, गैर सरकारी संगठन व ए.एस.आई. इन पुरातात्विक स्थलों को संरक्षित करने के लिए आवश्यक कदम उठावें, जिससे इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को खत्म होने से पूर्व ही बचाया जा सके। 

डॉ.कमल नाहर
कॉलेज व्याख्याता,इतिहास
राजकीय महाविद्यालय,
निम्बाहेड़ा,चित्तौड़गढ़
मो-09413047570
ई-मेल drknahar@gmail.com        


(यह रचना पहली बार 'अपनी माटी' पर ही प्रकाशित हो रही है।इससे पहले के मासिक अंक अप्रैल और मई यहाँ क्लिक कर पढ़े जा हैं।आप सभी साथियों की तरफ से मिल रहे अबाध सहयोग के लिए शुक्रिया कहना बहुत छोटी बात होगी।-सम्पादक)                               
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