आलेख:डॉ.शंकर शेष के नाटकों में सामाजिक यथार्थ/डॉ.पी.थामस बाबु - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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आलेख:डॉ.शंकर शेष के नाटकों में सामाजिक यथार्थ/डॉ.पी.थामस बाबु

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
            वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-सितम्बर,2014                        
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चित्रांकन:उत्तमराव क्षीरसागर,बालाघाट 
डॉ. शंकर शेष हिन्दी नाटक साहित्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण नाटककारों में से एक हैं। समकालीन परिवेश और युगीन परिस्थितियों से उनका व्यक्तित्व संवेदनशील का निर्माण होता है। वे बहुआयामी प्रतिभाशाली लेखक के रूप में पहचाने जाते हैं। अपने जीवन काल में व्यक्तिगत स्तर पर और सामाजिक स्तर पर व्यक्ति और समाज के अनेक रूप देखे थे। समाज में सुखद और दुःखद अनेक घटनाओं का भी अनुभव किये थे। हमारे समाज कई समस्याओं से लड़ रहा है। डॉ. शेष के नाटक हमारे जीवन की विडंबनाओं और विसंगतियों को उनके जड़ से पकड़ ने का प्रयास किया। उनमें रूढ़ियाँ, अंधविश्वास, भौतिकता और आर्थिक दबाव एवं जनसंख्या के कारण भारतीय समाज का विकास स्थिर हो चुका है। हिन्दी नाटककारों ने समाज की इस प्रकार की स्थिति को सामने रखकर समकालीन समाज के विकास में अपना योगदान दिया है। उनके यहाँ व्यक्ति की समस्याएँ भी सामाजिकतौर पर उठाई गई हैं।इसीलिए उनके रचनाओं में खासकर नाटक साहित्य में सामाजिक यथार्थ के कई उपस्कारक हमें दिखाई देते हैं, यथा वर्ण व्यवस्था के प्रति परिवर्तित दृष्टि, स्त्री पुरुष संबंधों के प्रति दृष्टिकोण, मध्यवर्गीय जीवन का संघर्ष की अभिव्यक्ति, वर्ग संघर्ष की अभिव्यक्ति का अंकन, महत्त्वाकांक्षी जीवन का त्रासदी का चेहराआदि सामाजिक यथार्थ के विविध आयाम दृष्टिगोचर होते हैं।

डॉ. शंकर शेष के नाटकों में जाति व्यवस्था के नाम पर होने वाले अत्याचारों का यथार्थ चित्रण हुआ है। भारतीय समाज की छुआछूत जैसी कुप्रथा से संबंधित कई प्रश्न उठाए हैं।हमारे सभ्य समाज में जाति व्यवस्था आज भी विद्यामान है। आज भी सवर्ण जाति के लोग मंदिर पर अपना ही वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं। और मंदिरों में शूद्र का प्रवेश मना है,यदि कोई मंदिर में प्रवेश करने का साहस किये तो उसे गाँव से बहिस्कृत दंड दिया जाता है।इस कथन का प्रमाणबाढ़ का पानी में पंडित और छीतू के संवाद से स्पष्ट होता है - तुम्हारे बेटे ने जो किया धरम का नाश। पच्चीस हरिजनों को लेकर जो भगवान के मंदिर में घुस गया भगवान को छू लिया।

डॉ.शंकर शेष
गाँव में बाढ़ आने पर चमार जाति का नवल ठाकुर को बचाने जाता है फिर भी वह अपनी जिद पर अड़ा रहता है।इस का प्रमाणबाढ़ का पानी नाटक में गणपत की संवाद में मिलता है, जातीय विषमता आधुनिक काल में ही नहीं महाभारत काल में भी देखने को मिलता है। इस का प्रमाणकोमल गांधार में भीष्म और संजय के कथन से स्पष्ट होता है अरे मायावी सरोवर में राजा और ऋषि के कथन से ब्राह्मण और क्षत्रिय जाति के आपस की वर्चस्व स्पष्ट होता है, और एक और द्रोणाचार्य में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य से अंगूठा की माँग इसी जाती-पाँति व्यवस्था की अगली कड़ी है।इस प्रकार वर्ण व्यवस्था के प्रति परिवर्तित दृष्टि कोण का परिचय मिलता है।पढ़ना ठाकुरों का काम है। भौजी, हम चमारों का नहीं। हमरी कुण्डली में तो बस जूते बनाना और जूते खाना ही लिखा है।”  इस संवाद में एक हरिजन या चामार जाति के व्यक्ति पढ़ने या शिक्षित होनेकी कठिनाइयों को यथार्थ चित्रण किया है।

डॉ. शंकर शेष ने स्त्री पुरुष संबंधों को गहराई से समझा और अपने नाटकों का विषय बनाया। स्त्री पुरुष संबंध अस्तित्व पर आधारित है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में स्त्री पुरुषों के संबंधों का चित्रण पारिवारिक और दैहिक जरूरत के द्वन्द्व से परिपूर्ण होता है। शंकर शेष के कोमल गाँधार की गांधारी एक तवान ग्रस्त नायिका है। गाँधारी के जीवन संघर्ष के माध्यम से विवाह जैसे संवेदनात्मक सवालों का स्वार्थी जवाब ढूढ़ने की मनोवृत्ति को बेनकाब चित्रण किया है।रत्नगर्भ की इला और माया का जगदीश और सुनील के प्रति संघर्ष समकालीन देश काल में प्रेम भावना जीवन की शक्ति नहीं अपितु इस्तेमाल करो और फेंक दो जैसी बातों में बदल गया है और उसका उपयोग स्वार्थ के लिए किया गया एक उदाहरण है। इस का प्रमाण जगदीश और सुनील के इस कथन से स्पष्ट होता है - किसी का सुन्दर मन लेकर क्या चाटोगे? प्रेम और मन अब 19 वीं शती की बातें हैं सुनील..... मन से तन की ओर बढ़ रहा है।

अधिकांश पति-पत्नी तनाव में जीते हैं। रत्नगर्भ में सामाजिक संघर्ष मुख्यतः पति-पत्नी संबंध के धरातल पर प्रस्तावित हुआ है और मूर्तिकार नाटक में हमारी सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त असंगतियों को शोषक-शोषित वर्ग के शाश्वत संघर्ष के रूप में रेखांकित किया है।डॉ.शेष के नाटकों में अधिकतर सुखी एवं तनावग्रस्त दाम्पत्य-जीवन का यथार्थ चित्रण हुआ है।भारतीय पारिवारिक व्यवस्था मूलतः संयुक्त प्रणाली पर आधारित है। परन्तु इस स्थिति में धीरे धीरे टूटन और तनाव बढ़ता आया है। इस बदलाव के कारण नारी स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है। नारी धीरे धीरे आधुनिक रूप लेते हुए पुराने ढ़ांचे को नकारा है। इस का प्रमाण रक्तबीजनाटक में देख सकते है जैसे -बास का इस्तेमाल करने के लिए वह मेरा इस्तेमाल करना चाहता है। तो खतरनाक खेल देखते है कौन किसका पहले इस्तेमाल करता है।आधी रात के बादनाटक में शेष जी ने अनैतिकता के विभिन्न पहलुओं की उभारने की कोशिश किया है।चोर अपराध होने से इनकार नहीं करता, लेकिन वह उस कुलीन समाज के इन महत्वपूर्ण सेवकों के पाप से घृणा करता है। चोर परिस्थितियों के असहनीय दबाव से अपराधी बना है।नाटक में चोर तो रोजी रोटी के लिए चोरी करता है। पर लोग अनौतिक ढंग से रुपये कमाने और छुपाने के लिए कुछ भी करने तैयरा हो बैठे हैं।चोर के माध्यम से सामाजिक अत्याचार एवं अन्याय की भीषणता की ओर ध्यान आकर्षितक करना ही नाटककार का मूल उद्धेश्य रहा है। यही चोर का सामाजिक और नैतिक संघर्ष है।

फंदी नाटक के माध्यम से नाटककार डॉ. शेष ने न्याय व्यवस्था पर व्यंग्य करते नज़र आते हैं। फन्दीनाटक का नायक है और अंततक संघर्षशील औऱ जूझता नज़र आता है। लेकिन उसकी नियति अनिर्णयात्मक संशय में स्थगित हो जाती है।अपने कैंसर पीडित बाप के दर्द के मारे अपने बाप के माँगने पर वह उनका गला घोंट देता है। इस कथन के माध्यम से नाटककार ने पुराने कानूनी व्यवस्था को बदलने की घोषणा की हैकानून यदि स्थिर और पत्थर की समान जड़ हो जाय तो समाज की बदलती हुई परिस्थितियों में वह न्याय नहीं दे सकता है।कानून मनुष्य के लिए है, मनुष्य कानून के लिए नहीं है। इसीलिए कानून हमेशा नई चुनौतियों को स्वीकरते हुए आगे बढ़ना चाहिए। यहाँ फन्दी का मुकदमा भी इसी तरह की एक नई चुनौती है।

डॉ.पी.थामस बाबु 
पीएच.डी.(हिन्दी)
हैदराबाद विश्वविद्यालय।
ई-मेल:thomasphiliph@gmail.com
प्रकाशित रचनाएं
कोमल गांधार एक अनुशीलन, 
समकालीन हिन्दी महिला नाट्य लेखन
आधुनिक समाज में आर्थिक विवशताओं ने मध्यवर्गीय स्त्री-पुरुष में तनाव, कुण्ठा और हताश उत्पन्न की। आजादी के बाद देश में अर्थ-वैषम्य की भावना नए सिरे से पनप रही है।डॉ. शेष ने मूर्तिकार नाटक में शेखर और ललिता के कथन से मध्यवर्तीय मनुष्य के आर्थिक संघर्ष को चित्रण किया है। मूर्तिकार मूर्ति द्वारा अमर बनने की इच्छुक होते हैं मगर जीने के लिए पैसों की जरूरत पड़ता है। ... अमर बनने के लिए क्या कुछ दिन जीना जरूरी नहीं है? घर में तो दाना नहीं है। क्या मिट्टी के ढ़ेले खाकर मूर्ति बनाओगे?

डॉ.शंकर शेष युगचेतना के कलाकार है, इसलिए उनकी रचनाओं में सामाजिक असंगतियों का खुला चित्रण हुआ है।रत्नगर्भ, रक्तबीज, बाढ़ का पानी, पोस्टर, चेहरे, राक्षस, मूर्तिकार, बाढ़ का पानी, घरौंदा जैसे नाटक सामाजिक यथार्थ को यथाकथित अनावृत्त करनेवाली रचनाएँ हैं। इन नाटकों में नाटककार ने जहाँ एक ओर समकालीन मानव की त्रासदी, निराशा औऱ घुटन का यथार्थ वर्णन किया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हुए मानवता को नए मूल्य और प्रतिमान देने का प्रयास भी किया है। नाटक की सफलता और सार्थकता उसके मंचन में देखी जा सकती है।

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