वैचारिकी: ''असमानता दूर करने के लिए आरक्षण अनिवार्य है लेकिन अपर्याप्त है''-प्रो. योगेन्द्र यादव - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 06, 2020

वैचारिकी: ''असमानता दूर करने के लिए आरक्षण अनिवार्य है लेकिन अपर्याप्त है''-प्रो. योगेन्द्र यादव

             'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-32, जुलाई-2020

 असमानता दूर करने के लिए आरक्षण अनिवार्य है लेकिन अपर्याप्त है-प्रो.योगेन्द्र यादव


सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव 
(फोटो उन्हीं के फेसबुक पेज से साभार)
दुनिया भर के समाज में किसी न किसी असमानता को लेकर बात होती है। उस असमानता को कैसे ठीक किया जाए उस बारे में बहस होती है और होनी भी चाहिए। वैसी बहस हमारे समाज में भी होती है। लेकिन कई बार देखता हूँ, बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और संवेदनशील लोग भी जैसे ही आरक्षण का सवाल आता है अचानक उनके चेहरे के तेवर बदल जाते हैं। इस मुद्दे पर संतुलित और वस्तुनिष्ठ ढंग से सोचने की जरूरत है। हम कुछ आंकड़ों और उदाहरणों से अपनी बात रखेंगे। हम ऐसी दुनिया चाहते हैं जिसमें सभी को अवसरकी समानता हो। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सभी लोग बराबर हों। मेरा अवसरइस आधार पर तय न हो कि मेरा जन्म कहाँ हुआ है? जन्म का संयोग यह तय न करे कि मैं ज़िंदगी में कहाँ पहुंचूंगा। संयोग से कोई लड़की पैदा हुई हो तो ऐसा न हो कि आपके लिए ये अमुक दरवाजें बंद हैं, इसके बारे में सोचो ही मत। संयोग से मैं एक जाति में पैदा हुआ, एक धर्म में पैदा हुआ, एक इलाके में पैदा हुआ, गाँव में पैदा हुआ, गाँव के गरीब घर में पैदा हुआ। सिर्फ इस आधार पर दुनिया में मेरे लिए दरवाजे बंद न हो जाए। मुझे अपनी मेहनत, अपनी बुद्धि, अपनी लगन का परिचय देने का अवसर मिलना चाहिए।


हम इस पर क्रम से बात करते हैं- हमारा पहला कदम यह होना चाहिए कि सबको समान अवसर मिले। दूसरा कदम यह है कि क्या हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां अवसर की समानता है? इसके लिए कोई लंबे-चौड़े प्रमाण की जरूरत नहीं है। सच यह है कि आज भी जन्म का संयोग सत्तरअस्सी प्रतिशत तय कर देता है कि आप कहाँ जाएंगे। मेरे गाँव के स्कूल में पढ़ने वाली वह लड़की जिसके पिता जी दिहाड़ी मजदूर हैं। उस लड़की के बारे में मैं कह सकता हूँ कि अमुक लड़की आई.ए.एस. अफसर तो नहीं बनेगी। ये मेडिकल कॉलेज में तो नहीं जाएगी। ये फलांफलां तरीके के काम तो नहीं करेगी। बहुत कर लेगी यदि इसकी किस्मत कमाल की होगी तो स्कूल टीचर बन जाएगी। तो हम जिस समाज में रहते हैं उसमें असमानता है। हम ऐसे समाज में नहीं रहते, जिसमें अवसर की समानता है। यह असमानता जाति के आधार पर है, अमीरगरीब के आधार पर है, गाँव-शहर के आधार पर है, आदमी-औरत के आधार पर है।हमारे अनुसार इन सभी आधारों पर असमानताएं हैं। इस पर बाद में चर्चा करेंगे। पहला कदम हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां अवसर की समानता होनी चाहिए, दूसरा कदम आज हम ऐसे समाज में नहीं रहते हैं तो अब तीसरा कदम क्या होना चाहिए कि इस अवसर की असमानता को बदलकर समानता लाई जा सके। इस अवसर की असमानताको अवसर की समानतामें कैसे बदलेंगे? कोई कहेगा कि आप भेदभाव हटा दीजिये। बिलकुल ठीक है, भेदभाव तो हटना ही चाहिए लेकिन क्या उतने से काम चल जाएगा। अभी आप भारत का उदाहरण छोड़ दीजिये, आप अमेरिका का उदाहरण ले लीजिये। दूर के उदाहरण कई बार समझने में आसानी होती है। क्योंकि हमारी भावना, गुस्सा थोड़े नियंत्रण में रहते हैं। आप अमेरिका में कालेऔर गोरेके बारे में सोचिए। वहाँ गोरे लोगों का दबदबा था। काले लोग दबे हुए थे, उनके लिए सभी दरवाजे बंद थे। 1960 के दशक में उनके लिए दरवाले खुलने शुरू हो गए, भेदभाव खत्म होने लगे, उसी बस के अंदर काले लोग भी बैठ सकते हैं, उसी स्कूल और चर्च में जा सकते हैं। विश्वविद्यालय में उसे जाने का अधिकार मिल गया। क्या इतने से अवसरकी समानता आ गई! मान लीजिये कि स्कूल में लड़कियां नहीं जाती थीं, आपने आदेश निकाला और कहा कि चलिये कल से लड़कियां स्कूल जा सकती हैं, मेडिकल और आईआईटी में जा सकती हैं, क्या इससे लड़कियां बराबर आनी शुरू हो जाएंगी। क्या अवसर की समानता हो जाएगी?इससे नहीं होगा। आपको क्या करना होगा, विशेष अवसर देने होंगे। यदि कोई भी समूह ऐतिहासिक रूप से वंचित(Disadvantage) है तो उसे समान अवसरप्राप्ति के लिए उसेविशेष अवसरदेने होंगे। समानता का मतलब बराबर का ट्रीटमेंट नहीं है। समानता का मतलब है कि बराबर के स्तर पर लाने के लिए अलग तरीके के ट्रीटमेंट करने होंगे। समानता का मतलब यह नहीं है कि हरेक को एक साइज़ का कुर्ता थमा दिया जाए। समानता का अर्थ है कि जिसे जिस साइज़ के कुर्ते की जरूरत है, उस साइज़ के कुर्ते देना। समानता के लिए जरूरी है कि हम अलगअलग लोगों के लिए अलगअलग इलाज़ दें वरना वह समानता नहीं होगी। एक उदाहरण मैं बराबर दिया करता हूँ, बहुत सरल उदाहरण है। 400 मीटर की दौड़ देखी हैं न, उसमें सारे धावक एक पॉइंट से दौड़ शुरू नहीं करते हैं। जो इनर लेन में है थोड़ी आगे से शुरू करता है, उसके बाद दूसरी लेन में जो है थोड़ी और आगे से शुरू करता है, तीसरी लेन वाला थोड़ी और आगे से शुरू करता है, चौथी लेन वाला उससे भी आगे से शुरू करता है। आँख से देखेंगे तो कहेंगे कि यार यह तो बहुत भेदभाव हो रहा है, अंदर वाला उतना पीछे से शुरू कर रहा है और बाहर वाला बहुत आगे से शुरू कर रहा है। बाहर वाले को इसलिए आगे रखा गया है कि वह सचमुच में 400 मीटर दौड़े, 440 मीटर न दौड़े। जो देखने में विशेष व्यवहार लग रहा है वह दरअसल समानता हासिल करने के लिए है। इसलिए समान अवसर प्राप्त करने के लिए विशेष अवसर देने होंगे। जो लड़कियां कभी भी स्कूल नहीं गईं उनके लिए स्पेशल बस चाहिए होगी, उन लड़कियों के लिए एक छात्रावास बनेगा, हो सकता है घर वाले भेज नहीं रहे हैं तो उनके लिए एक महिला शिक्षक देना पड़ेगा, उनकी माताओं को भी अनुमति देना पड़े कि आप भी आकार देख लीजिये। यानी विशेष अवसर देने पर ही उन्हें समानता का अवसर मिल पाएगा।

अब तक हमने सैद्धांतिक बात किया है कि पहला, सभी को समाज में समान अवसर मिलना चाहिए। दूसरा, अभी हम जिस समाज में हैं, उसमें अभी अवसर की समानता नहीं है। तीसरा, समान अवसर के लिए केवल औपचारिक समानता से काम नहीं चलेगा बल्कि विशेष अवसर देने होंगे अर्थात् सकारात्मक कार्रवाई करने होंगे। अब आप समझ गए होंगे मैं क्या कह रहा हूँ। यह हमारे आरक्षण के पीछे का तर्क है। आरक्षण हमारे समाज में एक ऐसी व्यवस्था है, जो कहती है कि हमारे समाज में सभी लोगों को समान अवसर मिलने चाहिए लेकिन आज नहीं है इसलिए कुछ विशेष वर्ग के लोगों को विशेष अवसर देंगे ताकि वे बराबरी कर पाएँ। आरक्षण एससी, एसटी, ओबीसी को मिलता है, इसके अलावा शारीरिक अक्षम, भूतपूर्व सैनिक और कई जगह महिलाओं को भी मिलता है। लेकिन बहस एससी, एसटी और ओबीसी को लेकर होती है। और बहस यह होती है कि जाति के आधार पर क्यों दिया जा रहा है। दो तरह की बहसें हैं पहला यह कि आरक्षण की जरूरत ही क्या है, दूसरा जाति के आधार पर ही क्यों हो? पहले बहस का जवाब तो मैंने दे दिया है। दूसरे बहस के लिए मैं चाहता हूँ कि दिल खोलकर बातें हों, अपने मन के दरवाजे बंद करके इस सवाल पर बात न करें।

मेरिट शब्द का जिक्र बारबार होता है, मेरिट महत्वपूर्ण है लेकिन मेरिट क्या है? क्या परीक्षा के अंक मेरिट हैं?आप जरा सोचिए,12वीं के अंक आ जाते हैं और हम कहते हैं बताइये 96 प्रतिशत अंक हैं किसी 82 प्रतिशत वाले को दाखिला क्यों दिया जा रहा है। एक मिनट के लिए सोचिए मेरिट क्या है। मेरिट वह होनी चाहिए कि मैंने अपनी हिम्मत, अपनी क्षमता, अपनी बुद्धि से जो कुछ हासिल किया वह मेरिट है, लेकिन मेरे पापा ने मेरी मम्मी ने जो अवसर मुझे मुफ्त में उपलब्ध करवा दिये वह तो मेरी मेरिट नहीं है न। मैंने शुरू में कहा था कि मेरे गाँव की वह बच्ची जिसके पिता जी दिहाड़ी मजदूर हैं। पिता जी आठवीं पास हैं, माँ पढ़ीलिखी नहीं है। वह गाँव के स्कूल में जा रही है। जिसके घर में कोई किताब नहीं है, अखबार नहीं आता है, पढ़ने की संस्कृति नहीं है। शहर की वह बच्ची जिसकी माँ भी शिक्षक, पिता भी शिक्षक हैं जो अंग्रेजी पढ़ते हैं दुनिया भर के अखबारों को देखते हैं, बच्ची एक बड़े स्कूल में जाती है, कोचिंग में जाती है। इन दोनों के रिज़ल्ट को हम कैसे देखेंगे?क्या यह कह देंगे कि उसके तो 90 प्रतिशत आए हैं और उसके तो सिर्फ 60 प्रतिशत आए हैं। मेरिट हमें ऐसे जोड़ने चाहिए कि यदि वह गाँव की बच्ची बिलकुल भी नहीं पढ़ती, कुछ भी नहीं करती तो उसके क्या अंक आते, और वह अपनी मेहनत से कहाँ तक पहुंची है। उसका स्टार्टिंग पॉइंट क्या है? उस गाँव की बच्ची का स्टार्टिंग पॉइंट होगा 20 या 25 परसेंट। उस शहर की बच्ची की माँ पढ़ाने वाली, पिता पढ़ाने वाले, उसकी नानी उसे फिजिक्स पढ़ा सकती हैं, उसके दादा उसे कुछ पढ़ा सकते हैं। उस बच्ची का स्टार्टिंग पॉइंट क्या होगा? यदि वह डफर भी होगी, पढ़ने में कोई रुचि नहीं होगी तब भी उसे 70 प्रतिशत मार्क्स आ जाएंगे। इसलिए हमें मेरिट का सिर्फ इंड पॉइंट नहीं देखना चाहिए बल्कि स्टार्टिंग पॉइंट भी देखना चाहिए।

इसलिए विशेष अवसर दिये जाने की बात होती है। लेकिन यह विशेष अवसर किस आधार पर दिए जाए? जाति के आधार पर क्यों दिए जाए? क्या इस देश में जाति आधारित असमानता आज भी है? कई लोग शहरों में कहते हैं कि मुझे तो अपनी जाति तक की पता नहीं थी यह तो आप लोगों ने बोलबोलकर और मण्डल आयोग की बहस शुरू हुई तब मुझे अपनी जाति का पता चला कि मेरी जाति क्या है। आपको अपनी जाति का पता नहीं था तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको अपनी जाति का फायदा नहीं मिला। कोई मर्द हो सकता है कि औरतों के प्रति बहुत संवेदनशील हो लेकिन मर्द होने के फायदे ज़िंदगी में उसे मिले हैं। इसलिए पता हो न हो उसके फायदे आपको मिले हैं।
खैर कई बार हमें अपने समाज की प्राथमिक चीज भी मालूम नहीं होती है। हमारे समाज का जातिवार बंटवारा क्या है-
दलित 17 प्रतिशत
आदिवासी 9 प्रतिशत
ओबीसी, 44 प्रतिशत
अन्य, 30 प्रतिशत (10 प्रतिशत अल्पसंख्यक गैर हिन्दू ) 20 प्रतिशत सवर्ण हिन्दू।

ओबीसी के बारे में बहुत लोग कहते हैं कि वह 52 प्रतिशत है। यह मण्डल कमीशन के आधार पर कहते हैं। यह एक माइथोलोजी है। फ़ैक्ट नहीं है। मण्डल कमीशन ने अंदाजे से यह बात बोल दी थी। जितने भी सर्वे हुए हैं एसटी और एससी के आंकडे तो मैं जनगणना के आधार पर दे रहा हूँ क्योंकि यह आंकड़े तो उसमें लिखे जाते हैं। ओबीसी की जनगणना में गिनती नहीं होती है। वैसे यह भी बड़ी अजीब चीज है जिसके लिए आरक्षण की व्यवस्था है उसकी गणना ही नहीं होती है। आप गिनने की बात करो तो लोग कहेंगे कि आप जातिवाद फैला रहे हो। अरे भाई, जब आरक्षण दे रहे हो तो कम से कम यह गिनना तो पड़ेगा न। यदि महिलाओं के लिए विशेष योजना चलाओगे तो गिनना तो पड़ेगा न कि कितनी महिलाएं हैं।

इस आंकड़े के अनुसार हमारी आबादी की 70 प्रतिशत हिस्सा एससी,एसटी और ओबीसी की है। बाकी 30 प्रतिशत क्या सवर्ण हिन्दू हैं? नहीं। ओबीसी में तो कुछ मुस्लिम आ गए लेकिन काफी मुस्लिम हैं जो ओबीसी में नहीं आते हैं, कुछ सिख तो एससी में आ गए, थोड़े ओबीसी में भी आ जाते हैं लेकिन काफी सिख हैं जो न एससी हैं, न ओबीसी हैं। ईसाई कुछ एसटी हैं बाकी उससे बाहर हैं। इस आधार पर जो जनरल हैं लेकिन हिन्दू नहीं हैं 30 प्रतिशत में से 10 प्रतिशत और बाहर कर दिए। अब बच गए 20 प्रतिशत। यानी सिर्फ 20 प्रतिशत उच्च जाति के हिन्दू हैं इस देश में, और महिलाओं को निकाल दिया जाए तो सिर्फ 10 प्रतिशत उच्च जाति के हिन्दू हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ आप जहां भी हैं थोड़ा सा निगाह घुमाकर देख लीजिये। आप किसी ऑफिस में काम करते हैं, आप किसी टीवी स्टुडियो में बैठे हैं, आप किसी टॉप संस्थान के क्लास में बैठे हैं, आप कहीं टीचर हैं, कंपनी के सीईओ हैं। वहाँ आप मन में हल्का सा कैलकुलेशन कर लीजिए कि अच्छा यह जो 10 लोग हैं उसमें से क्या 7 लोग एससी,एसटी और ओबीसी हैं? मैं आपको एक और आंकड़ा दिखाता हूँ भारत की मीडिया के बारे में यह ऑक्सफैम ने सर्वे किया था कि मीडिया में अपर कास्ट हिन्दू कितने हैं? यह सर्वे 2019 का है।

टीवी एडिटर में इनकी संख्या 88 प्रतिशत हैं। जो बड़े निर्णय लेते हैं कि क्या खबर दिखाई जाएगी, कौन सी नहीं दिखाई जाएगी। देश में न्यूज क्या होगा, यह निर्णय लेने वाले 88 प्रतिशत अपर कास्ट हिन्दू हैं। जो टीवी पैनलिस्ट ज्ञान देते हैं बैठकर मेरे जैसे लोग उसमें 70 प्रतिशत अपर कास्ट हिन्दू हैं। जो अखबारों में लेख लिखते हैं, देशदुनिया के बारे में बताते हैं, ओपिनियन मेकर उनकी संख्या 72 प्रतिशत अपर कास्ट हिन्दू की है।

मोटी बात है फिर याद रखिए कि जो समाज में 30 प्रतिशत जनरल हैं और 20 प्रतिशत सवर्ण हिन्दू हैं। वह बाकी सब जगहों पर जहां पर हम देखते हैं जो टॉप पोजीशन है वहाँ उनकी संख्या है 78 प्रतिशत, और समाज में जो 78 प्रतिशत है उनकी वहाँ संख्या 23 प्रतिशत है। एक बार मेरे साथ मजेदार किस्सा हुआ हम टीवी स्टुडियो में बैठे हुए थे आरक्षण पर बहस चल रही थी। उन्होंने कहा कि चलिये हम दर्शकों से पूछते हैं कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। वहाँ 90 प्रतिशत लोगों ने हाथ खड़े कर दिए कि नहीं होने चाहिए। पता नहीं क्यों उस दिन मेरे मन में आया और मैंने कहा कि ऐसा करिए अब दुबारा हाथ उठाइए। जो स्टुडियो में बैठे हुए हैं उसमें से एससी,एसटी और ओबीसी कितने प्रतिशत हैं? मुश्किल से 10 प्रतिशत भी नहीं थे। जो समाज में 80 प्रतिशत हैं वे बड़ीबड़ी जगहों पर 20 प्रतिशत हैं और जो समाज में 20 प्रतिशत हैं वह बड़ीबड़ी जगहों पर 80 प्रतिशत हैं। इतना बड़ा अंतर आज भी हमारे समाज में है। क्या यह अंतर उच्च शिक्षा में भी है? एनएसएसओ का आंकड़ा मेरे पास है। मेडिकल कॉलेज, इंजीनिरिंग कॉलेज और ग्रेजुएट कॉलेज में इनका हिस्सा कितना है?
     हिन्दू अपर कास्ट -     67% (मेडिकल),     66% (इंजीनिरिंग), 66%(ग्रेजुएट)
          हिन्दू ओबीसी -     15 %,                   10 %           13 %
       हिन्दू एससी-            2%            2%              4%
          हिन्दू एसटी -         1%            2%             1%
          मुस्लिम-              5%           10%            6%

इस आंकड़े के अनुसार अपर कास्ट जो समाज में एक तिहाई से कम हैं। वह यहाँ पर दो तिहाई से भी ज्यादा हैं। बाकी एससी,एसटी और ओबीसी के छात्रों की संख्या बहुत कम है। यदि आप और विस्तार में जानना चाहते हैं तो हर साल सरकार ऐनुवल हाइयर एजुकेशन रिपोर्टनिकालती है वहाँ पर भी देख सकते हैं।इस देश के शीर्ष सस्थानों केन्द्रीय विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में 65 से 75 प्रतिशत तक छात्र जनरल या अपर कास्ट हिन्दू वर्ग के हैं। ये तब जब आरक्षण लागू है। 70 प्रतिशत शिक्षक इसी कैटेगरी के हैं। मोटी बात यह है कि आज भी जातिगत असमानता बड़े पैमाने पर समाज में है।

चित्रांकन: कुसुम पाण्डे, नैनीताल
इसके साथ ही आपको मैं दक्षिण अफ्रीका का आंकड़ा दिखाना चाहूँगा क्योंकि कई बार बाहर के आंकड़े हमें समझने में मदद करते हैं। पूरी आबादी के 76 प्रतिशत अश्वेत (Black) लोग हैं और सिर्फ 9 प्रतिशत श्वेत (White) लोग हैं। श्वेत लोगों की संख्या बहुत कम है। लेकिन रंगभेद नीति (Apartheid) के खत्म होने के 25 साल बाद भी वे कितने प्रिविलेज हैं। यह नीचे के ग्राफिक्स में दिखता है-
          
इसमें एकदम ऊपर की तरफ नीले रंग की लाइन दिखाती है कि संपत्ति में श्वेत लोग कितने आगे हैं और एकदम नीचे हरे रंग की लाइन अश्वेत लोगों की है, अब आप देखिये कितना जमीनआसमान का फर्क दिखाई दे रहा है कि नहीं? यह हालत है जबकि सशक्तिकरण के 25 साल हो गए हैं, कानून बन गए हैं कि किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकते हैं। पीले रंग की लाइन एशियन लोगों की है जो भारत और दूसरे देशों से गए हैं। लाल रंग की लाइन कलर्ड अथवा मिक्स प्रजाति के लोगों की है। अभी भी अश्वेत लोग श्वेत की तुलना में लगभग वहीं हैं। मैं यह बात आप लोगों को दो कारणों से बताना चाह रहा था कि प्रिविलेज (विशेषाधिकार) की प्रकृति ऐसी होती है कि बहुत लंबे समय तक चलती है। ऐसा नहीं है कि आज प्रिविलेज था आपने कल दरवाजा खोल दिया और खत्म हो गया। ऐसा नहीं होता है। प्रिविलेज जब एक ऐसा प्लेटफ़ार्म बना देते हैं तो उसके बाद स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को स्टार्टिंग पॉइंट मिल गया वह आगे बढ़ते जाते हैं। ऊपर चढ़ते जाते हैं जो कि हमने दक्षिण अफ्रीका के अंदर देखा। दक्षिण अफ्रीका की तस्वीर इस लिए दिखाना चाह रहा था कि हम लोग कहते हैं कि कितना बुरा उन लोगों के साथ हुआ, दरअसल बहुत अच्छी स्थिति हमारी भी नहीं है। सुनने में अजीब लगेगा, कड़वा लगेगा लेकिन आज भी हमारे समाज में जो असमानता है, वह बहुत बड़ी है। दक्षिण अफ्रीका में हमने देखा कि 76 प्रतिशत अश्वेत और सिर्फ 9 प्रतिशत श्वेत हैं लेकिन वहाँ की संपत्ति में आधे से अधिक हिस्सा श्वेत लोगों का है। आज भी शिक्षा में जमीन-आसमान का फर्क है। शिक्षा में अंतर होगा तो स्वाभाविक है जॉब में भी फर्क पड़ेगा।

एक सवाल और पूछा जाता है कि क्या जाति आधारित असमानता ही सिर्फ है,  क्या अमीरीगरीबी की असमानता समाज में नहीं है? बिलकुल है। अमीरी-गरीबी का अंतर बड़ा अंतर है, मर्द-औरत के बीच असमानता है, गाँवशहर का अंतर है। यह चार असमानता हमारे यहाँ एक दूसरे को काटती हैं। अमीरीगरीबी का अंतर समाज में बहुत बड़ा है। लेकिन एक मात्र यही असमानता नहीं है। एक छोटा सा प्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह सतीश देशपांडे और राजेश रामचंद्रन का एक लेख है। जो इकनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकलीमें छपा है। इन्होंने केवल गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का जातिवार विश्लेषण किया है।
    ब्राह्मण             40% बारहवीं पास,            29% अन्य कार्य करते हैं  
   अन्य अपर कास्ट-     16%                            11%
     एससी-                 12                            8%
इस आंकड़े में गरीब ब्राह्मण, गरीब अन्य अपर कास्ट और गरीब एससी की तुलना की गई है। हर परिवार में देखा कि इसमें ऐसे कितने परिवार हैं जो कम से कम  एक व्यक्ति 12वीं पास है। यानी कम से कम 12 साल शिक्षा लिया हुआ है। यहाँ गरीबी रेखा के नीचे के गरीब ब्राह्मण में भी 40%, 12 वीं पास है।यानी उसको नौकरी वगैरह मिलने की थोड़ी गुंजाइश है। अन्य अपर कास्ट में 16% है और एससी में 12% है। यह कितना बड़ा फासला है, आर्थिक रूप से एक स्तर पर होते हुए भी। इसके अलावा एक प्रश्न और पूछा कि इसमें से कितना प्रतिशत लोग दिहाड़ी मजदूरी के अलावा भी छोटे-मोटे और बेहतर काम कर पा रहे हैं। इसमें भी 29% गरीब ब्राह्मण, 11% अन्य अपर कास्ट, 8%एससी का आंकडा है। यह सब अति गरीब लोग हैं। इसलिए गरीबी बहुत बड़ा सच है लेकिन गरीबी एक मात्र सच नहीं है। एक गरीब परिवार में भी फर्क होता है। फर्क यह होता है कि एक गरीब ब्राह्मण, ब्राह्मण का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि जिसका संस्कार और परंपरा है पढ़नेलिखने का। गरीब ब्राह्मण परिवार में भी कोई चाचा, कोई मामा आ जाएगा और कहेगा बच्चे में पोटेंशियल है, प्रतिभा है। चलो मेरे पास भेज दो। उनके साथ शहर चला जाएगा और कुछ पढ़ाई कर लेगा। संस्कार से फर्क पड़ता है, इसके लिए सोशियोलॉजी में एक दूसरा शब्द है सोशल कैपिटल। यानी उसके पास पूंजी नहीं है, पैसा नहीं है लेकिन सोशल कैपिटल है, कांटैक्ट है, कनैक्शन है, पढ़ना लिखना चाहिए यह विचार है। गरीब अपर कास्ट का बच्चा जब स्कूल जाकर पढ़ता नहीं है तो उसका बाप कम से कम कहता है कि बेटा तू पढ़। पढ़कर ही कुछ बनेगा। वही एक दलित परिवार, आदिवासी परिवार का बच्चा स्कूल से आकर कहता है कि पढ़ने में मन नहीं लग रहा है तो माँ कहती है तो क्या करे बच्चे का मन नहीं लग रहा है। चल कल से पिता जी के साथ काम शुरू कर दे। सोशल कैपिटलजो दिखाई नहीं देता है। इसे आप पैसे से नाप नहीं सकते लेकिन फर्क पड़ता है कि आप ज़िंदगी में कहाँ जा सकते हैं।

आरक्षण की व्यवस्था जो हमारे देश में आया है, वह हमारे यहाँ जो व्यवस्थागत असमानता रही है उसका आधा जवाब है। जाति आधार पर आरक्षण हमारे यहाँ इसलिए है कि असमानता को मापने का सबसे आसान तरीका है। जाति हमारे यहाँ छुप नहीं सकती। यहाँ जाति के आधार पर असमानता रही है और चल रही है। कुछ वर्गों को जानबूझकर पढ़ने से रोका गया और भेदभाव किया गया है। कुछ को शिक्षा दी गई और कुछ को कहा गया कि नहीं, तुम शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते, वेद पुराण पढ़ोगे तो कान में शीशा पिघलाकर डाल दिया जाएगा। इसलिए उसे ठीक करने के लिए उसी आधार पर बदलना होगा। मान लीजिए किसी समाज में यह कह दिया जाए कि जो 6 फुट लंबे है उन्हें कोई नौकरी नहीं मिलेगी और ऐसा पाँच सौ साल तक कर दिया जाए तो क्या होगा? 6 फुट लंबे लोग मुरझाए हुए, झुके हुए चलना शुरू कर देंगे। उनका आत्मविश्वास खत्म हो जाएगा वैसे समाज में मान लीजिए आप पहुँच गए तो आप क्या करेंगे? आप कहेंगे न कि 6 फुट से ऊपर के लोगों को विशेष अवसर दिए जाएंगे, घबराने की जरूरत नहीं है। जिस आधार पर भेदभाव होगा उसी आधार पर भरपाई होगी। हमारे समाज में असमानता कई आधार पर रही है लेकिन भेदभाव का सबसे बड़ा कारण जाति व्यवस्था रही है। इसलिए जाति आधारित आरक्षण असमानता को दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

आप कह सकते हैं कि प्रभावी तरीका कैसे हुआ? सत्तर साल हो गए अभी तक चलता आ रहा है। इसे अभी के कोरोना वायरस के उदाहरण से समझ सकते हैं। आप कहेंगे कि लॉकडाउन के दिन थोड़े से मामले थे आज इतना ज्यादा हो गया। हम कहेंगे कि लॉकडाउन से वायरस के बढ़ने की रफ्तार कम हुई है। इसी तरह आरक्षण के बारे में इस तरह के स्थूल सवाल मत पूछिये कि जाति की राजनीति खत्म नहीं हुई, सत्तर साल हो गया बताइये अब क्या करें। नहीं, यह पूछिए कि सत्तर साल पहले जहां हम थे क्या उससे कुछ बेहतर हुआ है आरक्षण की वजह से या यूं पूछिए कि आरक्षण न होता तो किस स्थिति में हम होते। आप कहीं भी देख लीजिए अंतर साफ दिखाई देगा। इस आरक्षण की वजह से खासतौर से एस.सी,एस.टी का एक नया वर्ग आया है जो पढ़ लिख रहा है, जो अपनी आवाज उठा रहा है। हमारे समाज का चेहरा बदला है। किसी गाँव में चले जाइए फर्क दिखाई देगा। फिर पलटकर एक बात और पूछी जाती है कि हो गया न सत्तर साल तक आरक्षण उतना बहुत है। अब बंद कर दीजिये। नहीं, यह भी अच्छा तर्क नहीं है। यदि कोई बीमार होता है तो हम पूछते हैं न कि दवाई कब बंद कर रहे हैं, अब दवाई बंद कर दें? प्लास्टर उतारने से पहले पूछते हैं न की हड्डी जुड़ गई है न। यही बात आरक्षण पर भी लागू होता है। बार बार कहा जाता है कि आरक्षण खत्म कब होगा। उन्हें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि जातिगत असमानता और भेदभाव कब खत्म होगा। जिस दिन यह खत्म हो जाए उस दिन आरक्षण खत्म कर देना चाहिए।

मूल बात यह है कि जाति आधारित आरक्षण हमारे देश में जो अवसर की समानता नहीं है और होना चाहिए वह लाने का एक औज़ार है। क्या इसका मतलब यह है कि यह एक मात्र औज़ार है? इससे काम बन गया है? क्या इसका मतलब जो आरक्षण है वैसा ही चलना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि इसमें कोई सुधार नहीं होना चाहिए? नहीं, मैंने बारबार लिखकर कहा है कि आज की व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। साधारण-सा सूत्र है कि आरक्षण अनिवार्य है लेकिन अपर्याप्त हैइसके अलावा भी बहुत से कार्य करने पड़ेंगे। जाति के अलावा जो असमानता है उसके लिए भी तो कुछ करना पड़ेगा न। अमीर-गरीब की असमानता, औरतमर्द की असमानता, गाँवशहर की असमानता इन सबके लिए कुछ करने की जरूरत है। सबके लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है और भी बहुत कुछ किया जा सकता है। अमीरी- गरीबी के लिए सबसे साधारण तरीका है कि बहुत बड़ी संख्या में वजीफ़ा दीजिए, महिलापुरुष के लिए सबसे बड़ी जरूरत है कि लड़कियों के लिए बड़ी संख्या में छात्रावास खोलिए, शहर और गाँव के लिए जरूरी है कि गाँव में अच्छी शिक्षण संस्थाएं खोलिए।

मेरे ख्याल से आरक्षण में भी सुधार होना चाहिए। आरक्षण बहुत सफल प्रयोग है लेकिन अब इसमें सुधार की जरूरत है। पहली बात याद रखिए कि आरक्षण का फायदा उसी को मिलता है जो दसवींबारहवीं तक पढ़ाई कर लेता है। ज़्यादातर गरीब, दलित और ओबीसी के बच्चे तो वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाते हैं। जो पंहुचेगा ही नहीं उसे कैसे फायदा मिलेगा। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है सरकारी स्कूल में अच्छी शिक्षा की व्यवस्था हो। यह दिलवा दीजिए आरक्षण अधिक प्रभावी हो जाएगा और आरक्षण की जरूरत भी धीरेधीरे खत्म हो जाएगी। दूसरा, भारतीय भाषाओं के बारे में मैं कह चुका हूँ कि जिस दिन इस देश में हिन्दी में एमबीबीएस, बीई होनी शुरू हो गई और नौकरी लेते और देते वक्त आपके अंग्रेजी का टेस्ट न हो उस दिन एकाएक गरीब, दलित,ओबीसी घर के बच्चे आने शुरू हो जाएंगे, सबकी स्थिति बेहतर हो जाएगी। क्योंकि अंग्रेजी इस देश में छलनी है। जो पहले से विशेष सुविधा वाले हैं उन्हें अतिरिक्त फायदा देती है। जिस दिन इस छलनी को बंद करवा दीजिए, ज़्यादातर असमानता एक झटके से अपने आप खत्म हो जाएगी। अंग्रेजी भाषा से मुझे कोई दिक्कत नहीं है लेकिन इसका जो डोमिनेंस है, हेजेमनी है, दबदबा है उसे तोड़ने की जरूरत है।

तीसरा, जो एससी, एसटी और ओबीसी की कटेगरी है इन तीनों कटेगरी के अंदर एक कटेगरी है जो बहुत दबी हुई है। उन तीनों में कुछ खास जाति के लोगों ने कब्जा कर लिया है। एससी में दोतीन समाज उत्तर भारत और दक्षिण भारत में है जो आज से सौ साल पहले थोड़े से बेहतर स्थिति में थे तो उन लोगों ने कब्जा कर लिया बाकी लोग पीछे रह गए। जैसे सफाईकर्मी समाज है, मुसहर समाज है इत्यादि। मेरी राय में इन लोगों के लिए उसमें अलग से वर्गीकरण करने की जरूरत है। एससी कोटा के अंदर दो कटेगरी हो, A और B, जो सबसे ज्यादा पीछे हैं महादलित उनके लिए विशेष सुविधा हो।  इसी तरह एसटी में जो पूर्वोत्तर भारत के एसटी हैं वह तुलनात्मक रूप से हमारे मिडलैंड के आदिवासी से बेहतर स्थिति में हैं, मिडलैंड के आदिवासी की हालत बहुत खराब है। इसलिए उसमें भी दो भाग करने चाहिए। इसी तरह ओबीसी में जो किसानी जाति यादव, कुर्मी, मराठा इत्यादि हुए जिनके पास जमीन है उन लोगों ने ओबीसी पर कब्जा कर लिया है और ओबीसी में जो सर्विस कम्यूनिटी है, जो हाथ से काम करने वाले समाज थे जो कारीगर लोग थे उन सबकी स्थिति आज बहुत खराब है। कई मायने में तो आज जो लोअर ओबीसी है वह एससी में जो टॉप वर्ग है उससे भी खराब स्थिति में है। इसलिए मैं बारबार कहता हूँ कि उनका कोटा अलग करने की जरूरत है।

इसके अलावा एक बात और है कि हमारे आरक्षण का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। हमारे देश में आरक्षण की सारी बहस सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरियों में सिमट कर रह जाती है। सरकारी नौकरियाँ हैं कितनी? राज्य और केंद्र की सब नौकरियों को मिला दीजिए तब भी अंदाजन 2 करोड़ नौकरियाँ हैं और हमारा मानव-संसाधन 45 करोड़ है। यानी 45 करोड़ में सिर्फ 2 करोड़ पब्लिक सेक्टर में नौकरियाँ हैं। जनसंख्या बढ़ रही है, जरूरत बढ़ रही है लेकिन सरकारी नौकरियाँ घट रही हैं। लेकिन सारी लड़ाईझगड़े, मारकाट उसी थोड़े से हिस्से के लिए हो रहा है। बाकी 90 प्रतिशत नौकरियों के बारे में चर्चा ही नहीं होती है। आज की तारीख़ में सरकारी क्षेत्रों की तुलना में संगठित क्षेत्रों के प्राइवेट सेक्टर में नौकरियाँ ज्यादा हैं। प्राइवेट सेक्टर में भी सकारात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। कई लोगों को सुनकर बड़ा अटपटा लगेगा कि लीजिये आप यहाँ भी कोटा लेकर चले आएं। मैं याद दिलाना चाहूँगा सभी साथियों को कि आप अमेरिका को देखिये क्योंकि अमेरिका का बहुत जिक्र होता है कि कैपिटलिज्म, मेरिट वगैरह-वगैरह। अमेरिका के हर कंपनी को हर साल लिखकर देना पड़ता है कि उसकी कंपनी की डायवर्सिटी प्रोफ़ाइल क्या है यानी कि आपके कितने पूरे कर्मचारी हैं और उसमें से कितने श्वेत(white) हैं और कितने अश्वेत(black) हैं, और आप ब्लैक कर्मचारी में सुधार के लिए क्या कर रहे हैं। ऐसा भारत में क्यों नहीं हो सकता है? इसके लिए आज से दस साल पहले भारत सरकार द्वारा एक कमेटी बनी थी,‘समान अवसर आयोगउस कमेटी का मैं भी हिस्सा था। लेकिन उस पर कुछ काम नहीं हुआ। फिर भी प्राइवेट नौकरियों में भी डायवर्सिटी (विविधता) दिखनी चाहिए। यह सब करेंगे तभी हम बेहतर नागरिक बनेंगे, बेहतर सोचेंगे और आगे बढ़ेंगे।

लिप्यांतरण: जितेंद्र यादव
शोधार्थी- हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली
संपर्क-9001092806, jitendrayadav.bhu@gmail.com

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