शोध : बेरोजगार युवा का मनोजगत (अखिलेश के ‘अन्वेषण’ उपन्यास के संदर्भ में) / बर्नाली नाथ - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : बेरोजगार युवा का मनोजगत (अखिलेश के ‘अन्वेषण’ उपन्यास के संदर्भ में) / बर्नाली नाथ

बेरोजगार युवा का मनोजगत

(अखिलेश के ‘अन्वेषण’ उपन्यास के संदर्भ में) / बर्नाली नाथ

 

शोध-सार


      अखिलेश के अन्वेषण उपन्यास का संबंध उस समय के युवा से है, जिसे हर पल व्यवस्था की मार ने कुचला और रौंदा है पर इसके बावजूद वह घुटना नहीं टेकता और अपने भीतर की मुक्तिकामी छटपटाहटों को मरने नहीं देता है। जिस उम्र में उत्साह और उमंगों से भरा हुआ होना चाहिए उस उम्र को बेरोजगारी ने झुलसा कर रख दिया है। बेरोजगारी पहले भी थी और आज भी है। आज की तारीख में इसकी बढ़ोत्तरी और हुई है। अखिलेश ने बड़ी ही कुशलता से एक बेरोजगार युवा के साथ घट रही त्रासदी और उसके अंतर्जगत में चल रहे अंतर्द्वंद तथा भावनाओं के सागर को वाचक द्वारा हमारे समक्ष रखने की कोशिश की है। इसके साथ ही एक बेरोजगार के प्रति समाज, सत्ता तथा व्यवस्था का क्या रुख है उसे भी उस बेरोजगार के ही जुबानी दिखाने का प्रयास किया है। उपन्यास के केंद्रीय पात्र उस युवा के द्वारा उसके जीवन की असुरक्षा, कुंठा एवं निराशा की भावनाओं को इस उपन्यास ने बहुत ही आवेग के साथ उकेरा है। अखिलेश ने उस युवा के मनोजगत पर हो रहे विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से बेरोजगारी की भयावहता पर हमारा ध्यान आकर्षित करवाया हैं। यह भयावहता ही हमारे मन में बेरोजगारी को लेकर अनेकों सवाल खड़ा कर देती हैं। 

 

बीज-शब्द : बेरोजगार, बेरोजगारी, जीवन, समाज, व्यवस्था, अर्थनीति, युवा, मनोजगत, अंतर्द्वंद्व, आत्म-निर्वासन, अन्वेषण उपन्यास।

 

मूल आलेख


       समाज में बेरोजगारी ने हर तरफ से कोहराम मचाया हुआ है। इसकी अनुगूँजों को दबाया जरूर गया है पर यह छुपाए नहीं छुपती है। बेरोजगारी पहले भी थी और आज भी है। आज की तारीख में इसकी बढ़ोत्तरी और हुई है। कितने ही वादे, कितनी ही योजनाएँ पर यह सब हवा में गुल हो जाती है, यह तो बस एक क्षण मात्र की चमक होती है और उसके बाद ‘मिराज़’ (मृगतृष्णा) बन कर रह जाता है। ऐसे स्थितियों में ‘अन्वेषण’ उपन्यास का आना बहुत जरूरी था कि इन चमकदार खोखलेपन की शिनाख्त हो और हमें बेहतर समाज के निर्माण के लिए, संघर्ष की ओर प्रेरित करें। अन्वेषण उपन्यास अखिलेश द्वारा लिखित पहला उपन्यास है जिसे ‘बेरोजगारी का मार्मिक आख्यान’ कहा गया है। अन्वेषण उपन्यास सन् 1992 में प्रकाशित हुआ था। कथा-सृजन और सम्पादन की दुनिया में अखिलेश का नाम बहु चर्चित है। उन्होंने बहुत ही कम समय में सार्थकता के साथ अपने नाम को पाठक गण के सामने स्थापित किया है। अखिलेश रचनाक्रम में अत्यंत धीरशील, व्यवस्थित तथा विधिवत है। भाषा और जीवन दोनों पर अखिलेश की गहरी पकड़ है। उनकी यह पकड़ उनके कथा-लेखन में सुसंगत रूप से परिलक्षित होती है।

       

    बहरहाल अखिलेश के अन्वेषण उपन्यास का संबंध उस समय के युवा से है, जिसे हर पल व्यवस्था की मार ने कुचला और रौंदा है पर इसके बावजूद वह घुटना नहीं टेकता और अपने भीतर की मुक्तिकामी छटपटाहटों को मरने नहीं देता है। जिस उम्र में उत्साह और उमंगों से भरा हुआ होना चाहिए उस उम्र को बेरोजगारी ने झुलसा कर रख दिया है। लेखक ‘हरे प्रकाश उपाध्याय’ ने अपने लेख ‘बेरोजगारी का मार्मिक आख्यान’ में इस उपन्यास के बारे में लिखा है - “कथाकार अखिलेश का पहला उपन्यास अन्वेषण दरअसल भयावह बेरोजगारी और कैरियरवाद के बीच व्यवस्था से जूझते उस संघर्ष और सरोकार की तलाश की कोशिश है, जो कहीं दीप्त तो अपनी पूरी आभा के साथ है मगर उसके लापता हो जाने का खतरा सामने पेश है। ध्यान देने की जरूरत है कि यह उपन्यास नब्बे के आसपास लिखा गया है और प्रकाशित हुआ है, जब एक तरफ आर्थिक उदारवाद, भूमंडलीकरण आदि का शोर तेजी से उभरता है और नए तरह का कैरियरवाद युवाओं के बीच जगह बनाने लगता है, वहीं हाशिए पर धकेल दिए गए वंचित व संघर्षरत लोगों की तरफ से उठने वाली आवाजें कमजोर पड़ने लगती हैं, लापता होती-सी लगती हैं।”[i]

          

    मनुष्य को जीवन-निर्वाह के लिए एक रोजगार चाहिए होता है। बिना रोजगार के कोई कमाई नहीं और कमाई नहीं तो, जीवन जीना भी आसान नहीं है। एक उम्र तक हर व्यक्ति को रोजगार चाहिए होता है। रोजगार भिन्न तरीके के हो सकते हैं। सामाजिक-ढाँचा में रोजगार को लेकर कुछ नियमावली भी अवश्य है। एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति यही आशा करेगा कि उसे सरकारी नौकरी रोजगार के रूप में मिलेगी। समाज की भी उस सफल पढ़े-लिखे व्यक्ति से यही अपेक्षा होती है की उसे रोजगार प्राप्त जरूर होगा। प्रस्तुत उपन्यास में एक बेरोजगार युवा की मानसिक तथा भौतिक दशा का मार्मिक चित्रण हुआ है। उपन्यास का केंद्रीय बिंदु ‘बेरोजगारी’ है। उपन्यास का नायक उच्च-शिक्षित है, लेकिन वह बेरोजगार है और उसकी नौकरी पाने की उम्र अब निकलती जा रही है। उपन्यास में मुख्य पात्र का कोई नाम नहीं दिया गया है। वहाँ नायक के रूप में ‘मैं’ वाचक है। अर्थात् यह उपन्यास एक बेरोजगार युवा के आत्मकथ्य के रूप में है। हर एक बेरोजगार अपने आप को इस ‘मैं’ में ढूँढ़ सकता है। वाचक मैं तमाम बेरोजगारों के मनोविज्ञान को प्रतिनिधित्व कर रहा है। लेखक ‘हरे प्रकाश उपाध्याय’ ने उपन्यास के उस बेरोजगार युवा के बारे में लिखा है - “यह उपन्यास प्रमुखत: बेरोजगारी की समस्या को जिस आवेग से उठाता है, वह झकझोर देने वाला है। एक ऐसा युवक जो शिक्षित है, प्रतिभावान है मगर किन्हीं कारणों से नौकरी नहीं पा सका है और उसकी नौकरी पाने की उम्र गुजर चुकी है, उसके लिए बेरोजगारी क्या चीज है, इस बात को दूसरा कोई नहीं समझ सकता। वह किस तरह अपने जीवन को शर्म की तरह जीता है, इसका बड़ा ही सांगोपांग चित्रण अखिलेश ने अपने इस उपन्यास में किया है।”[ii] अखिलेश ने बड़ी ही कुशलता से एक बेरोजगार युवा के साथ घट रही त्रासदी और उसके अंतर्जगत में चल रहे अंतर्द्वंद्व तथा भावनाओं के सागर को वाचक द्वारा हमारे समक्ष रखने की कोशिश की है। इसके साथ ही एक बेरोजगार के प्रति समाज, सत्ता तथा व्यवस्था का क्या रुख है उसे भी उस बेरोजगार के ही जुबानी दिखाने का प्रयास किया है।

      

    अखिलेश ने उपन्यास के केंद्रीय पात्र उस युवा के द्वारा उसके जीवन की असुरक्षा, कुंठा एवं निराशा की भावनाओं को बहुत ही आवेग के साथ उकेरा है। “मैं रात को सो नहीं पाता था। सोता तो चौंककर जाग जाता। मुझमें असुरक्षा की बरसात में डर और निराशा के मेंढक उछल-कूद करते। कभी-कभी रात-रात-भर जागता और पसीना-पसीना हो जाता।”[iii] एक बेरोजगार युवक की उम्मीदों का जब गला घोंट दिया जाता है तब जाहिर-सी बात है कि  उसमें असुरक्षा की भावनाएँ घर कर जाती हैं। उसमें अपने जीवन को लेकर घोर निराशाएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है। भविष्य की चिंता ने उसमें डर, कुंठा, निराशा आदि भावनाएँ जागृत होना भी स्वाभाविक ही है। लेकिन एक सम्भावनाशील युवा के लिए यह अस्वाभाविक है कि वह अब तक नौकरी नहीं पा सका है और यही चिंता तथा डर उसे रात को सुकून से सोने नहीं देता है। यह समाज इस नवयुवक की प्रतिभा पर शक करता है तथा उसे संदेहजनक नजर से देखने लगता है। हर एक नजर तथा हर एक संवाद इस नवयुवक को अपमानित-सा लगने लगता है। ऐसे में हमेशा उसके आत्मसम्मान तथा आत्मविश्वास पर आघात होता है। यह हमारे ही समय तथा समाज की वास्तविक स्थिति है। यह कोई काल्पनिक स्थिति को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास नहीं है। बेरोजगारी हमारे समाज की एक तीखी सच्चाई है। हमारे देश के बहुत सारे युवा बेरोजगारी से आज तक जूझ रहे हैं। उपन्यास का केंद्रीय पात्र वह युवक अपने भीतर जवानी में भी निस्तेज और शक्तिविहीन महसूस कर रहा है। बेरोजगारी में भला वह अपने भीतर के जज्बे, जोश, तथा उत्साह-उमंग को कहाँ से बरकरार रख पाता? “सुबह आँख खुलने पर कायदन मुझे स्फूर्त और चैतन्य होना चाहिए था, लेकिन मैं पाता, पूरे बदन में सुस्ती हिल रही है। शरीर में रक्त- संचार बेहद मद्धिम हो गया है। मुझे महसूस होता, कमर जकड़ी है और मैं बेहद थका हूँ। मैं उठकर बैठता लेकिन खड़ा होने पर लगता, चक्कर खाकर गिर जाऊँगा, इसलिए फिर चारपाई पर बैठ जाता और फिर लेट जाता था।”[iv] वह अब बेहद थक चुका है, क्योंकि बेरोजगारी ने उसे हर तरफ से थकाया है। उसकी सारी उम्मीदें अब मर चुकी है। वह एक मध्यवर्गीय बेरोजगार युवक है उसके साथ उसके परिवारवालों की अपेक्षाएँ भी जुड़ी हुई हैं। लेकिन सफलता उसके हाथ लग ही नहीं रही है। ऐसे में उसके जीवन का सारा उत्साह मर चुका है।

       

    नाउम्मीदी के बावजूद भी वह फिर से, नई उमंग के साथ उठ खड़ा होना जरूर चाहता है, वह कोशिश भी करता है लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि उसे सम्भलने ही नहीं देती है। फिर से उसे वहीं पर लाकर खड़ा कर देती है। परिस्थितियाँ हर समय उसे अपनी  नाकामयाबी का एहसास करवाती रहती है। “...जबरदस्त इच्छा हुई कि इस बच्चे को प्यार कर लूँ। मैं उसे देखकर मुस्कराने लगा। वह भी मुस्कराया। मैं उसे गोद में लेने के लिए आगे बढ़ा। तभी मुझमें कौंधा कि मैं उनतीस साल का हो चुका हूँ। तीसवाँ शुरू है और अभी तक नौकरी नहीं पा सका हूँ।”[v] उसे जब भी अपने उम्र और बेरोजगारी का पड़ाव महसूस होता है तब वह ऐसे ही अचनाक से और ज्यादा परेशान तथा कुछ जड़-सा हो जाता है। जैसे वह कुछ इंच और धँस गया हो। “मुझे ऐसा एहसास हुआ कि मेरा शरीर सूज गया है। भीतर कुछ भी रह नहीं गया है - अंतड़ियाँ, फेफड़े-सारे अंग खो गए हैं। रक्त भी नहीं है। सिर्फ नसें-ही-नसें बिछी हैं। हर जगह खंखाड़ है। बस, सीने में हवा भरी है। वह तेज-तेज धड़क रहा है। धड़क रहा है ! जब भी मुझमें बेरोजगारी और उम्र के इस पड़ाव का विचार घूँसा मारता है, मैं इसी तरह जड़ एवं हतबुद्धि हो जाता हूँ।”[vi] उसका वर्तमान और भविष्य दोनो ही बेरोजगारी के कारण संदिग्ध हो गया है। उसके सामने घना अंधेरा छाया हुआ है।

      

    जब भी हम किसी सच्चाई से वाकिफ होते हैं तब उस सच्चाई से किसी-न-किसी तरह बार-बार सामना करना पड़ता है और यह सच्चाई हमें हर पल इस बारे में किसी भी स्थिति में अपनी याद दिलाती रहती है। उस नवयुवक को हर छोटी-बड़ी बातों में उसे अपने जीवन की असफलताएँ याद हो आती है अर्थात् उसके आस-पास की परिस्थितियाँ उसे अपने उम्र तथा बेरोजगारी का अनवरत एहसास करवाती रहती है। बच्चों से सम्मोहन तथा लगाव होना एक स्वाभाविक क्रिया है लेकिन बेरोजगारी ने उसके मन में उस बच्चे से प्यार करने तक बाधाएँ उत्पन्न की हैं! उस समय वह ऐसी दशहत से भर उठा जिसने उसको अपमानित करके उसके आत्मविश्वास पर संहार किया। वह ठीक एक दशहत ही नहीं, उस समय वह ऐसा महसूस कर रहा था जैसे उसके भीतर बहुत कुछ खाली होने लगा था या फिर उसके भीतर बहुत कुछ भरने लग गया था। वह स्थिर होते हुए भी भागने लगा था। कुछ उस तरह की भाग, जैसे कोई दुश्मन का निशाना देखकर भागता है। उसका फर्क इतना था कि वह स्थिर होते हुए भी भाग रहा था। अर्थात् वह बेरोजगारी तथा परिस्थितियों से भाग रहा था। वह इन सबसे भागकर अपने आप को अपने कमरे पर लाकर पटक देता है जहाँ से वह हमेशा बाहर निकलना भी चाहता है। लेकिन बाहर कोई महफूस जगह उसके लिए अब बची भी नहीं है। यह वही कमरा है जिसे वह अपना डेरा तब से मानता है जब लोगों पर उसे विश्वास था और लोग भी उस पर विश्वास रखते थे। जैसे ही उसके मन में उम्र का खयाल हो आया उसे ऐसे लगने लगा कि वह अब तक उनतीस साल से जी ही नहीं रहा था बल्कि वह उनतीस बरसों से मर रहा था। वह कहता है कि - “ऐसा बार-बार होता है की मैं उल्लास और प्यार से लबालब होकर जीवंत होना चाहता हूँ तभी मुझमें साँप की चमड़ी की तरह चमक जाता है कि मैं जिंदगी के उनतीसवें साल में हूँ या मैं मृत्यु के उनतीसवें साल में हूँ।”[vii] जब भी उसे इस तरह से समय और उम्र का एहसास होता है तो वह भय और डर से भर उठता है तथा सिहर जाता है। बहुत सारे सवाल उसके दिमाग में शोर करने लगते हैं कि अब क्या होगा? उम्र बीती जा रही है और अब तक कोई रोजगार नहीं! वैसे तो सरकारी नौकरियों के अलावा ओर भी रोजगार होते हैं जहाँ पर नौकरी से अवसर प्राप्त लोगों को भी काम मिल जाता है। लेकिन हालात और व्यवस्था ही कुछ ऐसे थे कि वह युवक अब रिटायर्ड लोगों की कतार में आ गया है। जैसे मानो उसका युवा-अवस्था से अवकाश हो गया हो।

           

    बेरोजगार व्यक्ति की नियति यह है कि समाज उससे दूरी बनाने लगता है। उसकी क्षमताओं पर या तो लोग संदेह करते हैं या फिर उस पर अतिरिक्त दया दिखाकर उस से सहानुभूति जताते हैं। उस बेरोजगार युवक के मकान मालिक जो खुद एक शराबी है और हीन भावना से ग्रस्त है वह भी इस युवक पर जबरदस्ती दया दिखाने की कोशिश करता है। वह इस युवक की क्षमताओं पर संदेह करता था। मकान मालिक इस युवक को पक्का शराबी समझता था तथा इस बात को पक्का करने के लिए जब भी युवक अपने कमरे पर होता है तो वह युवक के आस-पास बिना वजह मँडराते लगते थे। इस तरह मकान मालिक इस बेरोजगार युवक के स्वाभिमान तथा आत्मसम्मान पर आघात करता है तथा यही आघात उसे कमजोर बनाने लगता है। जबकि यह वही लड़का है जिस पर कॉलेज के दौरान उसके दोस्त उसकी क्षमताओं का बखान किया करते थे कि वह अपने जीवन में जो भी करना चाहेगा उसमें सफलता उसके कदम चूमेगी। लेकिन आज उसके सामने सच्चाई यह है कि वह एक निरर्थक मनुष्य के रूप में अपने किराए के कमरे पर लेटा हुआ है। वह कहता है - “एक वक्त था कि मेरे दोस्तों ने मेरे बारे में मशहूर किया था कि मैं जीवन के किसी भी इलाके में प्रवेश करूँ, सफलता कदम चूमेगी। सचमुच, मेरे मित्रों का दावा था कि मैं चाहू तो बहुत बड़ा लेखक बन सकता हूँ? मैं चाहूँ तो बहुत बड़ा अफसर बन सकता हूँ। मैं चाहूँ तो बड़ा स्मगलर बन सकता हूँ। मैं चाहूँ तो बहुत बड़ा अभिनेता बन सकता हूँ। मैं जो भी चाहूँ, बन सकता हूँ। लेकिन मैं अपने किराए के कमरे की चारपाई पर एक निरर्थक मनुष्य की तरह लेटा हुआ था।”[viii] निरर्थक इसलिए कि उसका अब किसी भी काम में मन नहीं लगता है। वह कुछ भी करने के लिए सोचता है तो उसे अपनी उम्र का खयाल हो आता है। समय के भयानक रसायन से युक्त समाज में अब उसे कोई दिलचस्पी नहीं रही। उसे संसार का हर कार्य और कारण - निरर्थक और निष्प्रयोजन लगने लगा था।

      

    परिवार के भीतर या समाज के सामने वह अपने आप को निरर्थक महसूस करता था। अपने जीवन को वह एक शर्म की तरह जी रहा था। एक प्रतिभावान पारदर्शी युवक जो कभी पढ़ाई-लिखाई में बहुत व्यस्त हुआ करता था उसके पास अभी करने के लिए कोई काम नहीं था। अपितु अब उसका किसी भी काम में मन ही नहीं लगता था। लोगों के द्वारा दी हुई सहानुभूति उस युवक को मंजूर नहीं है, वह उसे नापसंद करता है, वह इन संवेदनाओं से बचना चाहता है। नायक इन स्थितियों को बदलता हुआ देखना चाहता है। लेकिन यह तभी सम्भव है जब बेरोजगारी उसका पीछा छोड़ेगी ! वह कहता है - “मैं समाज और दुनिया को बदलता हुआ देखना चाहता था। लेकिन मैं दुखी था क्योंकि किसी काम में मेरा मन नहीं लगता था। यहाँ तक कि कभी तड़के भोर में जागकर राजनीति, साहित्य, कला, दर्शन आदि की किताबों में डूब जानेवाला मैं अब दस-ग्यारह बजे तक लेटा हुआ पैर हिलाता रहता। देखनेवाले मुझे घबराहट और दुखमय संवेदना से देखते और मैं इससे घबराकार मुँह छुपा लेता था या आँखें बंद कर लेता। यह मेरा डर नहीं, मेरी शर्म की अभिव्यक्ति थी।”[ix] परिवार तथा समाज की हर समस्या के लिए वह अपने आप को जवाबदेह समझने लगता था। बेरोजगारी का दंश कुछ ऐसा होता है कि चाहे वह समाज के सामने हो, माता-पिता हो, दोस्त हो या प्रेमिका हो यह किसी के भी सामने व्यक्ति को सहज नहीं होने देते हैं। वह किसी भी तरह इन सबसे बचकर अकेलेपन की तलाश करना चाहता था। वह अपने आप से भी सामना नहीं कर पाता था। उसने अपनी शक्ल तक देखना बंद कर दिया था। लेकिन वह यह भी आशा रखता है कि समय के साथ एक दिन सब कुछ सही हो जाएगा। लेकिन वह यह भी संकेत करता है कि अपने आप से कुछ ठीक नहीं होता है उसे ठीक करवाना पड़ता है। समय, व्यवस्था, समस्या तथा समाज के आपसी बदलाव के लिए वह आशावादी है। यहाँ वह संघर्ष की ओर संकेत कर रहा है। वह कहता है  - “कभी-कभी चीजें अपने-आप भी तो सँवर जाती हैं। लेकिन नहीं, वे आप कहाँ सँवरतीं हैं। जैसे बालों को ही लिया जाए - हो सकता है, हवा ने उन्हें उड़ाकर ठीक कर दिया हो या हो सकता है, मेरे हाथ उन पर इस तरह फिरें हो की वे दुरुस्त हो गए हों। यानी कि चीजें खुद-ब-खुद नहीं सवरतीं, उन्हें कोई ठीक करता है, भेले ही उसे देखा न जा सके। सुना न जा सके। यहाँ मेरा इरादा किसी रहस्य की ओर संकेत करना कतई नहीं है, बल्कि मैं तो रहस्य पर से रहस्य का परदा उठा रहा हूँ।”[x]

         

    इस बेरोजगार युवा को समाज में हर किसी से डर लगता है कि कहीं वह उससे उसकी बेरोजगारी का जवाब न माँग ले। लोगों के तानों ने उसके आत्मविश्वास को तोड़ दिया है तथा उसके स्वाभिमान को भी बार-बार तार-तार किया है। वह इन सबसे दूर अपने किला रूपी किराए के कमरे में ही रहना महफूज समझता है। वह अपने परिवार से भी पलायन करता फिरता है। इस पलायन का औचित्य वह इससे करता है कि - वे भी कहीं उससे जवाब न माँगे। वह यह भी कहता है कि वह इसलिए घर नहीं जाता - कहीं उसके घर पहुँचने से उसकी माता-पिता की विकलता का प्रसार बढ़ न जाए और यह बढ़-बढ़के एक दिन गुब्बारे की तरह फूट न जाए कि वे अपनी ही हत्या न कर ले। बेरोजगारी ने उससे सब कुछ छीन लिया है और उसके बदले हार, पराजय, निराशा, हताशा, तनाव, अपमान, कुंठा तथा हीनता आदि तमाम अवसादों से उसे भर दिया है। वह अपने आप से सवाल करने लगता है - “क्या मैं लोगों से कटा हूँ? या लोग मुझसे कटे हैं? मैं लोगों से क्यों कटा हूँ? लोग मुझसे क्यों कटे हैं, दोनों का उत्तर एक है। सवाल अलग-अलग हैं मगर जवाब एक है।”[xi] यह जवाब यही है कि वह बेरोजगार है। हर सवाल हर समस्या का एक ही उत्तर कि वह बेरोजगार है। उसके दिलों-दिमाग में हर समय अपनी बेरोजगारी को लेकर बातें उमड़ती रहती है। अपने माता-पिता के लिए वह कुछ करना चाहता है, उनके दुखों का निवारण करना चाहता है। यह चिन्ताएँ उसे अंदर से खायी जा रही है - “ऐसा लगा, अभी शरीर की नसें फट जाएँगी और खून का फव्वारा निकल पड़ेगा। सब कुछ खिंचता जा रहा था... खिंचता जा रहा था... तभी अचानक मेरी आँखों से आँसू गिरने लगे, मैं क्या करूँ? कुछ करने को हो, तो करूँ? आखिर मैं क्या करूँ?”[xii] यह कितना मार्मिक तथा भयावह है कि एक शिक्षित बेरोजगार युवक कह रहा है कि वह कुछ करना चाहता है लेकिन करने को कुछ है नहीं। उसकी शंका, भय, उत्कंठा, संकोच, घबराहट, लाचारी तथा असहाय-बोध को उपरोक्त वाक्य से महसूस किया जा सकता है। बेरोजगारी ने जैसे उसे विचित्र बना दिया है। या तो वह कभी जोर से बोलने लगता है या कभी एक दम ही चुप हो जाता है। कभी अपने आप को अकेला पाता है तो कभी कोलाहलों से भरा हुआ - “मैं विचित्र हो गया हूँ। कभी एकदम भीड़-भाड़ और शोरगुल के बीच निपट अकेला हो जाता हूँ और कभी भरपूर सूनेपन में भी कोलाहलग्रस्त।”[xiii]

           

    उपन्यास में युवक का ‘स्व’ लगातार उसके बाधक के रूप में अपने से ही बात करता रहता है। उसके मानसिक अंतर्द्वंद्व की इस जटिलता को उपन्यास में अखिलेश ने बहुत ही कौशलपूर्वक अभिव्यक्ति दी है। वाचक युवक और उसकी भूतपूर्व प्रेमिका का कुछ संवाद उद्धृत है - “वह बोली, ‘क्या कर रहे हो आजकल?’ मुझे कहना चाहिए था, ‘मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ। मैं बेरोजगार हूँ।’ लेकिन मैंने कहा, ‘कुछ खास नहीं, बस ऐसे ही।’ उसने कहा, ‘शादी की या नहीं ?’ मुझे कहना चाहिए था, ‘नौकरी न होने के कारण हुई ही नहीं।’ लेकिन कहा, ‘अभी नहीं।’ उसने मुझे दया से देखा, मैं रोगी की तरह कमजोर हो गया था।”[xiv] उसकी मानसिक कुंठा के कारण उसके उत्तर भी दो-दो दुविधाओं से युक्त थे। एक जो सच होते हुए भी वह कह नहीं पा रहा था और एक जो सच्चाई प्रकाश न होने के लिए वह बस उत्तर देने की औपचारिकता कर रहा था।

            

    समाज से बचने के लिए इस युवा के पास आत्मनिर्वासन के सिवाय और कोई उपाय नहीं है। वह अपने आप को समाज से, परिवार से, अपने दोस्तों से तथा इस दुनिया से काटकर सिमट जाना चाहता है। सिर्फ अपने कमरे की गुफा तक ही नहीं अपने अंतर्मन की गुहा तक वह सिमट जाना चाहता है। यह ‘आत्मनिर्वासन’ युवक को सबसे अलग करके उसे अनजाना-अनचीन्हा बना देते हैं। आइने में अपने आप को देखकर वह खुद भी हैरान हो जाता है कि क्या वह वही है जो पहले हुआ करता था - “ताज्जुब है, कभी मैं कितना मुखर और जिंदादिल था! मैं दोस्तों का दोस्त और दुश्मनों का दुश्मन था। मेरे ठहाके विख्यात थे और रात-रात भर की मेरी गप्पें कुख्यात। लेकिन अब मैं अंतरगुहावासी। मेरी बेरोजगारी ठोकर मारते हुए मुझे इस कमरे की गुफा में धकेल देती है। मैंने शुरू में इस कमरे से आजाद होकर सूर्य और पृथ्वी-जल के मध्य के इस संसार का संगी होने की कोशिश की। कई बार कोशिश की। लेकिन हर बार मेरे खालीपन - मेरी अस्तित्वहीनता ने धक्के देकर मुझे गुफा-रूपी इस कमरे में गिरफ्तार कर दिया।”[xv] युवक का यह अंतरगुहावासी बनना तथा अस्तित्वहीन बनना उसका कोई मनोरोग नहीं है, बल्कि हमारे समाज की ही यह देन है और हमारी अर्थनीति का प्रभाव है तथा सत्ता की विफलता है कि वह अतिजरूरी रोजगार नहीं दे पा रहा है।

    

    धीरे-धीरे यह युवक खत्म होने लगा था। जीवन से जुड़ी उसकी तमाम आशा, उमंग घटने लगी थी। जैसे वह अपना अवशेष रह गया हो। वह आने वालें दिनो में उसकी और क्या स्थिति हो सकती है उसपर जैसे खुद ही सवालों से घिर गया था। वह आत्ममंथन करने लगता है - “इधर मैं स्वाद के रस से वंचित था। मैं गंध की तरंगों से वंचित था। मैं रंग की किरणों से वंचित था। स्पर्श का रोमांच मैं भूलने-सा लगा था। जीवन के लिए मेरी उमंग बौनी होती जा रही थी। दिन-प्रतिदिन उसमें कुछ घट रहा था। मुझे डर लगता था। मेरी उमंग रोज घट रही है। रोज छोटी हो रही है। ऐसा ही एक दिन होगा जब जीवन के लिए मेरी उमंग मेरे सम्मुख एक पारे की तरह डोलती हुई मिलेगी। और एक दिन होगा, जब वह पारा भी अदृश्य हो जाएगा। तब कैसा हूँगा मैं और कैसा होगा मेरा समय ?”[xvi] इन स्थितियों से पता चलता है कि एक बेरोजगार युवा किन अंधकारों से गुजरता है। वह अपना दुःख कहे तो कहे किसे और कैसे कहे ! युवक के तनाव ने उसे एक समय आत्महत्या की तरफ धकेल दिया था। रिश्तों की संवेदनाओं ने उसे इस आत्महत्या से बचाया था। इस आत्महत्या के विरुद्ध कभी उसके माँ-पिता कवच बनते तो कभी उसकी खुद की कविताएँ उसे बचा लेती थी। लेकिन फिर भी बेरोजगारी उसे बार-बार खुदकुशी के लिए नए-नए तरीके लाकर देती थी। ऐसे में उसका संबल ‘पब्लिक सर्विस कमीशन’ की चारदीवारी बनी थी। वह बार-बार इम्तिहान देता था इस आशा के साथ की कहीं नौकरी हाथ लग जाए। इम्तिहान देने जाने पर वहाँ आए हुए और भी उसके जैसे नौजवानों की हालत युवक महसूस कर पाता है - “इम्तिहान देने आने पर देखता, हजारों नौजवान आए हैं। सभी के नाक-नक्श पृथक हैं पर आँखों-आँखों की तलहटी में एक जैसा है। जिसकी आँखें देखो - गहरे में वही निराशा, दुख और यातना के फफूँद दिखाई देंगे। सबके पैरों की माप और गति अलग हैं, लेकिन उनकी थकान और हताशा समान है। उनके पैरों में चिकनापन नहीं होता, हाथों के नाखूनों में लालिमा नहीं होती। मत्थे पर चमक नहीं होती।”[xvii] यहाँ से प्रतीत होता है कि हर साल इम्तिहान देने वाले प्रार्थी कितने होते हैं और वे कितने लाचार होते हैं ! यह एक चिन्तनीय विषय है कि बेरोजगारी की समस्या दिन-प्रतिदिन और भी भयावह तथा ज्वलंत बनती जा रही है।

        

    उपन्यास के अंत में युवक संघर्ष की राह पर चलने और व्यवस्था से मुठभेड़ करने के लिए निकल पड़ता है। वह ‘राघव’ की तलाश करता है जो कि पढ़ाई के बाद बिछड़ गया था। राघव अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाला प्रतीक है। लेखक ‘प्रियम अंकित’ ने अपने लेख ‘लहूलुहान होती संभावनाओं की गरिमा का’ में लिखते हैं - “अन्वेषण लगातार विच्छिन्न होते क्रूर दौर की सलाखों में गिरफ्तार युवा के अंतस्तल में प्रतिध्वनित होते विप्लवों को पूरी ईमानदारी से दर्ज़ करता है। लेकिन उपन्यास इसे भी शिद्दत से दर्ज़ करता है कि ये विप्लव अंतस्तल के हैं, मगर अंतस्तल तक महदूद नहीं रहना चाहते। ये बाहर आना चाहते हैं एक मुकम्मल शक्ल अख्तियार करना चाहते हैं।”[xviii] अर्थात वे बेरोजगारी की सलाखों से मुक्त होना चाहते हैं। इसी कारण वे विप्लव के लिए राघव रूपी जत्था की तलाश करते हैं। राघव युवक के अंतर्मन के विक्षोभों को एकजुट करता है। उपन्यास में राघव शारीरिक रूप से अनुपस्थित है। विश्वविद्यालय के बाद से उसकी मुलाकात राघव से नहीं हो पाती है। लेकिन उपन्यास के शुरू से अंत तक राघव की गतिविधियाँ उपस्थित है तथा यही उपस्थिति युवक के भीतर की आग को हवा देती है तथा वह भी राघव जैसे बनने के लिए, संघर्ष के रास्ते पर चलने के लिए तैयार हो जाता है।

      

    युवक का अपने एकाकी जगत से बाहर आना तथा राघव की तलाश करना उसके अपने भीतर के मुक्तिकामी भावों का समाजीकरण करना है। वाचक युवक जिन हालातों से गुजरता तथा जूझता है उस स्थिति में सामूहिक मुक्ति के लिए एक मात्र उपाय - संघर्ष ही है। बदले हुए समय और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक हालातों से निराश होकर विमुख होने से अच्छा है संघर्ष पर चलकर उजालों का अन्वेषण करना। राघव वह उजाला है जो अंधेरे के खिलाफ एक उम्मीद की किरण है। राघव का दूसरा नाम संघर्ष है। राघव सशरीर तो नहीं दिखते लेकिन उसकी उपस्थिति हर कोने में महसूस होती है। राघव वह मुक्तिकामी प्रतिमान है जो हर बेरोजगार के अंदर छुपा हुआ है। राघव को ढूँढता हुआ वाचक युवक अपने शब्दों में कूछ यूँ कहता है - 

    “वह एक चेहरा नहीं, असंख्य चेहरों का एक जुलूस है - गुस्सा, ज्ञान और निर्णय से लैस। वह रणभूमि है। रणभूमि नहीं दिखती। असंख्यों चेहरों का जुलूस नहीं दिखता। मैं पूरब में गया, पश्चिम में गया, मैं उत्तर में गया, दक्षिण में गया। गली-गली दिशा-दिशा गया, वह नहीं मिला। ... वह है मगर दिखता नहीं है। हर जगह होता है पर नहीं होता है। उसकी गंध है, उसके रंग हैं - पर वह हाजिर नहीं है। मैं ही नहीं, बहुत सारे लोग उसे ढूँढ़ रहे हैं। कुछ को छोड़ शेष दुनिया को उसकी चाहत है।”[xix]

     

      अंतत: उपन्यास के वाचक युवक खुद में राघव की खोज करता है तथा वह राघव के व्यक्तित्व को अपने में समाहित करना चाहता है। उसके संघर्षों को अपना पथ बनाना चाहता है। राघव से मिलने वाली दिशाएँ आशा की किरण है और वह एक दिन जरूर प्राप्त होगी। लेकिन वह राघव की तरह किसी आंदोलन या उसके विचार की ओर जाते हुए दिखाई नहीं देता है। अंत में भी वह राघव की तलाश कर रहा होता है। उपन्यास का अंतिम अंश ‘दिशाएँ कहती है, वह मिलेगा जरूर’ यह वाक्य सकारात्मक दिशा की ओर आशा की किरणें जगाती है। फिर उसके बाद यह कहना कि, ‘मैं उसे खोज रहा हूँ’ इससे युवक की वैचारिकता स्पष्ट नहीं हो पाती है। हो सकता है इन दोनों वाक्यों से वह इस ओर भी इंगित कर रहा है कि आशा और संघर्ष दोनों जारी है। या फिर जैसे प्रसिद्ध अर्थनीतिज्ञ ‘कार्लमार्क्स’ कहते हैं कि - ‘दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ’ उसी तरह लेखक भी बेरोजगारों को एकजुट करके संघर्ष का आंदोलन लड़ने के लिए अपने लेखन के माध्यम से प्रेरित कर रहा है।

        

    इस उपन्यास की सीमा के बारे में चर्चा करते हुए लेखक ‘रेणु व्यास’ ने अपने लेख ‘बेरोज़गार युवा में मानस-प्रवेश’ में लिखा है कि - “अन्वेषण जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, युवा बेरोज़गार के अंतर्जगत के भावों का अन्वेषण है। इसे उपन्यास की सीमा कहें या विशेषता, मगर बहिर्जगत की उपस्थिति भी यहाँ मात्र नायक के मानस पर पड़े प्रतिबिम्ब के रूप में ही है। क्या यह बाह्य जटिल परिस्थितियों के उलझाव से रचना को बचाने के लिए है? उन बाह्य परिस्थितियों से उपन्यास को दूर क्यों रखा जाना चाहिए जो नायक मैं की वर्तमान दशा के लिए जिम्मेदार हैं और अंतत: उसके आक्रोश का लक्ष्य भी होनी चाहिए? अगर लेखक बाहरी परिस्थितियों के आलोक में नायक के अंतर्जगत को रखते तो यह रचना और अधिक प्रभावशाली हो सकती थी, हालाँकि यह बहुत ही श्रमसाध्य प्रयास होता। अच्छे शैक्षिक रिकॉर्ड के बावजूद बेरोज़गार बनाए रखने वाली व्यवस्था और राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक नीतियों पर बहस के बिना यह उपन्यास अधूरा है। कवि और बुद्धिजीवी होते हुए भी नायक भी उपन्यास में इस पर कुछ विचार नहीं करता? यह आश्चर्यजनक है।”[xx] अर्थात् इस उपन्यास में बाहरी जगत की प्रत्यक्ष उपस्थिति नहीं हुई है, बहिर्रजगत की उपस्थिति केवल युवक के मानसपटल पर हो रहे असर तथा इसके प्रतिबिम्ब के रूप में है। हो सकता है कि लेखक ने ऐसा इसलिए किया हो कि इससे उपन्यास को बाह्य जगत की जटिल परिस्थितियों के उलझाव से बचाया जा सके। युवक की बेरोजगारी तथा उसकी वर्तमान दशा के लिए कौन उत्तरदायी है इस पर भी बाहरी परिस्थितियों का कोई सक्रिय रूप उपस्थित नहीं है। अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि उपन्यास को उस युवक के एकांगी दृष्टिकोण से रखा गया है। इसमें बाहरी समाज के अन्य लोगों के दृष्टिकोण को नहीं रखा गया है। प्रतिभा तथा क्षमता रखने वाला एक उच्च शिक्षित युवा क्यों और किस कारण से बेरोजगार बना हुआ है इस पर भी प्रत्यक्ष बहस की एक कमी उपन्यास में मौजूद है। हालाँकि युवक के द्वारा सांकेतिक रूप में इस ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करवाया गया है। लेखक उस युवा के मनोजगत पर हो रहे क्रियाओं के माध्यम से बेरोजगारी की भयावहता पर हमारा ध्यान आकर्षित करवाना चाहते हैं। यह भयावहता ही हमारे मन में बेरोजगारी को लेकर अनेकों सवाल खड़ा कर देती हैं। 

 

संदर्भ


[i] हरे प्रकाश उपाध्याय (बेरोजगारी का मार्मिक आख्यान), राजीव कुमार (सम्पादक) : कथाकार अखिलेश : सृजन के आयाम, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2017, पृ. 185

[ii] हरे प्रकाश उपाध्याय (बेरोजगारी का मार्मिक आख्यान), राजीव कुमार (सम्पादक) : कथाकार अखिलेश : सृजन के आयाम, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2017, पृ. 186

[iii] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 8

[iv] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 7

[v] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 8

[vi] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 9

[vii] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 10

[viii] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 13

[ix] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 13

[x] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 14

[xi] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 46

[xii] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 30

[xiii] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 12

[xiv] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 18

[xv] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 39

[xvi] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 67

[xvii] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 111

[xviii] प्रियम अंकित (लहूलुहान होती संभावनाओं की गरिमा का अन्वेषण), राजीव कुमार (सम्पादक) : कथाकार अखिलेश : सृजन के आयाम, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2017, पृ. 182

[xix] अखिलेश : अन्वेषण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992, पृ. 127

[xx]  रेणु व्यास (बेरोज़गार युवा में मानस-प्रवेश), राजीव कुमार (सम्पादक) : कथाकार अखिलेश : सृजन के आयाम, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2017, पृ. 198

 

बर्नाली नाथ

शोधार्थीहिंदी विभाग

अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालयहैदराबाद

barnalinath001@gmail.com7002218601

           अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue

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