शोध आलेख : बुनकर समुदाय पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव : एक अध्ययन -मोहम्मद नदीम एवं डॉ. रूपेश कुमार सिंह

शोध आलेख

बुनकर समुदाय पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव : एक अध्ययन

(उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले के विशेष सन्दर्भ में)

 मोहम्मद नदीम एवं डॉ. रूपेश कुमार सिंह

 

शोध सार :

    भारत में भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया आर्थिक सुधारों से प्रारम्भ हुई और जिसने देश में तीव्र विकास के मार्ग को प्रशस्त किया है। लेकिन इस प्रक्रिया ने जहां देश में तेजी से परिवर्तन एवं विकास प्रारम्भ किया तो वहीं दूसरी तरफ समाज के दलित एवं कमजोर वर्गों के समक्ष नई चुनौतियों को जन्म दिया। साथ ही भूमण्डलीकरण ने देश में दो प्रकार के समाज को भी जन्म दिया है, एक भारत दूसरा इण्डिया। भारत के ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाला एक ऐसा समुदाय जिनकी परंपरागत आजीविका का मुख्य स्रोत बुनाई व्यवसाय है और वह पीढ़ियों से हथकरघा के माध्यम से यह कार्य सम्पादित कर रहे थे। लेकिन भूमण्डलीकरण के दौर में हथकरघा का स्थान पावरलूम ने ग्रहण कर लिया है, जिसके पश्चात बुनकर समुदाय को विभिन्न प्रकार की समस्याओं एवं चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रस्तुत शोध पत्र में अम्बेडकरनगर जनपद के बुनकरों पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव का अध्ययन किया गया है। उक्त अध्ययन की प्रकृति वर्णनात्मक सह विश्लेषणात्मक है। 

बीज शब्द : औद्योगीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, भूमण्डलीकरण, बुनकर, बुनाई व्यवसाय, हथकरघा, पावरलूम, आजीविका, परंपरागत उत्पाद, अर्द्ध-शहरी।

मूल आलेखभारत में प्राचीनकाल से ही बुनाई उद्योग का एक अद्वितीय स्थान रहा है। यह व्यवसाय आम तौर पर भारत के ग्रामीण एवं अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में निवासरत लोगों की एक बड़ी जनसंख्या का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका का साधन रहा है। इस व्यवसाय में विशेष रूप से अनुसूचित जाति और समाज के अन्य पिछड़े समुदाय के लोग ही संलग्न हैं जो बुनकर कहलाते हैं। हथकरघा उद्योग कृषि के बाद सबसे महत्वपूर्ण असंगठित आर्थिक क्षेत्र है जो ग्रामीण भारत के एक बड़े हिस्से को आच्छादित करता है। यह पर्यावरण के अनुकूल, श्रमप्रधान कुटीर उद्योग है, जिसमें बुनकर समुदाय अपनी आजीविका के रूप में कार्य करता है। हथकरघा उद्योग भारत की एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है एवं पारंपरिक हथकरघा बुनकरों की राजसी बुनाई की उत्कृष्टता दुनिया भर में प्रसिद्ध है।1 हथकरघा उद्योग अत्यधिक मानवीय श्रम प्रधान कार्य है और यह उद्योग उत्पादन, मजदूरी, शिल्प कौशल, डिजाइन, परंपराओं आदि में भिन्नता के साथ देश भर में फैला हुआ है। अत्यधिक श्रम प्रधान लघु उद्योग होने के कारण यह क्षेत्र विशेष रूप से महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर ग्रामीण रोजगार सृजित करता है। हथकरघा एवं पावरलूम उद्योग ने तेजी से प्रगति की है और आज यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक के रूप में खड़ा है। यह उद्योग निम्न सामाजिक-आर्थिक जीवन स्तर के लोगों की बुनियादी आवश्यकता को पूरा करने के साथ-साथ आय और रोजगार के व्यापक अवसर प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हमारे देश में उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण (एल.पी.जी.) की शुरूआत 90 के दशक में हुई। देश में भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया को प्रारम्भ करने से पहले देश की आर्थिक नीतियों विशेषकर आयात-निर्यात सम्बन्धी नियमों, विनियमों एवं कानूनों को उदार बनाने तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। उक्त दोनों प्रक्रियाओं के साथ-साथ हमारे देश के सुदूरवर्ती, पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्रों के लोगों को विश्व के अन्य भागों से जुड़ने, सम्बन्ध बनाने एवं अपनी समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से विश्व पटल पर रखने का अवसर भी प्राप्त हुआ।

वैश्वीकरण या भूमण्डलीकरण एक खुली सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से विश्व बाजार का एकीकरण हुआ है और विश्व में केवल आर्थिक रूप से आदान-प्रदान बढ़ा है बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी वृद्धि हुई है। विश्व बाजार के खुले होने के कारण जहां एक ओर विश्व स्तर के उत्पादों का आयात हुआ है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण स्तर के परंपरागत भारतीय उत्पादों को भी विश्व बाजार में निर्यात करने का अवसर प्राप्त हुआ है।

 भूमण्डलीकरण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि स्वचालित मशीनों के बाजार में पदार्पण के कारण उत्पादन की मात्रा बढ़ी तथा हथकरघा के स्थान पर पावरलूम ने बाजार में कम कीमत, उत्कृष्ट गुणवत्ता के विविध उत्पादों के उत्पादन के कारण अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की और धीरे-धीरे पावरलूम जनित उत्पादों ने भारत के शहरी क्षेत्रों के साथ ही ग्रामीण बाजार पर भी कब्जा कर लिया।

भूमण्डलीकरण की एक अन्य विशेषता यह भी रही है कि इसके कारण भारतीय बाजार में विदेशी ब्रांडों के आगमन की शुरूआत हुई, क्योंकि उदारीकरण का मुख्य उद्देश्य निर्यात की बाधाओं को दूर करना तथा ग्रामीण उद्योग को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है। यद्यपि आधुनिक युग के अनुसार वैश्वीकरण के उद्देश्य वास्तव में बहुत समकालीन हैं, लेकिन हथकरघा उद्योग आज वैश्वीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति और आधुनिक कपड़ा उद्योग द्वारा उत्पन्न कड़ी प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर संकट की स्थिति से गुजर रहा है और साथ ही आधुनिक कपड़ा उद्योग ने पारंपरिक हथकरघा उद्योग के लिए गंभीर खतरा भी पैदा कर दिया है। आधुनिक कपड़ा उद्योग में तेजी से तकनीकी उन्नयन स्वचालन ने हथकरघा उत्पादों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है जिससे पारंपरिक ग्रामीण उद्योग जैसे हथकरघा बुनाई और इस व्यवसाय में कार्यरत बुनकरों के बड़े समुदाय को उचित तकनीकी की कमी के कारण प्रतिस्पर्धी आर्थिक वातावरण की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।2

भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने भारत के विभिन्न राज्यों तलिमनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड एवं उत्तर प्रदेश के हथकरघा उद्योग एवं इस कार्य में संलग्न बुनकरों को संयुक्त रूप से प्रभावित किया है क्योंकि पारंपरिक वस्त्र उत्पादन जैसे हथकरघा, हस्तशिल्प एवं बिजली-करघा जैसी छोटी इकाइयां ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों के लाखों लोगों के लिए रोजगार का एक बड़ा स्रोत है। कपड़ा मंत्रालय-भारत सरकार की रिपोर्ट, 2019-203 के अनुसार देश में वस्त्र उत्पादन का यह परम्परागत क्षेत्र देश के कुल कपड़ा उत्पादन में 75 प्रतिशत से अधिक का योगदान करता है और जिसमें उत्तर प्रदेश की भागीदारी 12 प्रतिशत है।4

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जिसमें देश की सर्वाधिक जनसंख्या निवास करती है और प्रदेश की अर्थव्यस्था में बुनाई व्यवसाय से सम्बन्धित हथकरघा एवं पावरलूम की एक महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि प्रदेश के विभिन्न जनपदों गाजियाबाद, मेरठ, हापुड़, अलीगढ़, ज्योतिबाफुले नगर, बिजनौर, इटावा, फर्रूखाबाद, सीतापुर, बाराबंकी, आजमगढ़, मऊ, वाराणसी, गोरखपुर एवं अम्बेडकरनगर जिलों के ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में बुनकरों द्वारा बड़ी संख्या में बुनाई का कार्य सम्पादित किया जाता है। उक्त जनपदों में हथकरघा एवं पावरलूम द्वारा जनता की वस़्त्र सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ण श्रृंखला तैयार की जाती है और प्रदेश का अम्बेडकरनगर जनपद देश के साथ-साथ विश्व में भी अपने हथकरघा एवं पावरलूम उत्पादों के लिए जाना जाता है क्योंकि जिले के ग्रामीण एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में बुनाई व्यवसाय बुनकरों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है जिस पर वह पीढ़ियों से निर्भर है, लेकिन 90 के दशक में प्रारम्भ हुई भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने जिले की अधिकांश बुनकर आबादी को प्रभावित किया है। यह ज्ञात करने के लिए कि भूमण्डलीकरण ने बुनाई व्यवसाय एवं बुनकर समुदाय को किस प्रकार प्रभावित किया है, इसके लिए आवश्यक है कि पूर्व शोध अध्ययनों एवं साहित्य की समीक्षा की जाए।


सम्बन्धित साहित्य का पुनरावलोकन :

बुनकर समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति एवं भूमण्डलीकरण से सम्बन्धित पूर्व शोध अध्ययनों एवं सम्बन्धित साहित्य की समीक्षा निम्नवत है

राय (2002)5 ने अपने अध्ययन में हथकरघा उद्योग की उत्पादकता और प्रतियोगिता की समस्याओं के विश्लेषण में पाया कि हथकरघा उद्योग परम्परागत वस्तुओं की सतत् माँग और हथकरघा विकास की सरकारी योजनाओं की सफलता पर ही निर्भर है। घोष एवं अख्तर (2005)6 नेहैण्डलूम इण्डस्ट्री आन दि वे आफ एक्सटिंक्शनके बांग्लादेश के अध्ययन में पाया कि कार्यशील पूँजी की कमी, कच्चे माल की उच्च दर पर खरीद, आयोजन क्षमता में कमी, अपर्याप्त तकनीक एवं दक्षता तथा नीति में सहयोग की कमी आदि प्रमुख कारक हैं जिन्होंने बांग्लादेश में हथकरघा उद्योग को गहरा आघात पहुँचाया है। अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह सुझाव दिया है कि ग़रीब बुनकरों के विकास के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए सरकारी एवं गै़र सरकारी संस्थाओं को सहायता के लिए आगे आना होगा।  

त्रिपाठी (2009)7 ने उड़ीसा के हथकरघा उद्योग की समस्याओं एवं सम्भावनाओं का विश्लेषण किया है तथा इस उद्योग के ह्रास के लिए बुनकरों की अशिक्षा, अपर्याप्त वित्त व्यवस्था, कच्चे माल की अनुपलब्धता तथा निर्मित उत्पादों में विविधीकरण, पर्याप्त गुणवत्ता, मानकीकरण, लागत नियन्त्रण और मूल्य स्थिरता में कमी या मूल्य का स्थिर होना आदि कारकों को जिम्मेदार बताया है। सिंह एवं नायक (2009)8 ने बनारस जनपद के रेशमी वस्त्रों के निर्माण कार्य में संलग्न बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा कार्यशील पूँजी की व्यवस्था और निर्मित माल के विपणन में आने वाली समस्याओं के सर्वेक्षण में पाया कि बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय है, जिसके लिए बुनकरों की निम्न आय तथा साहूकारों/महाजनों की ऋणग्रस्तता जिम्मेदार है। साथ ही उनका निम्न शैक्षिक स्तर, अपर्याप्त कार्यशील पूँजी, ऋण की अनुपलब्धता, सरकारी योजनाओं से अनभिज्ञता तथा विपणन में अकुशलता आदि कारक भी इसके लिए उत्तरदायी हैं।


मिश्रा (2011)9 ने चंदेरी के साड़ी बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अध्ययन में पाया कि अधिकांश बुनकर महाजन या मास्टर बुनकर के अंतर्गत काम करते हैं, जबकि सहकारी समितियों के अन्तर्गत या स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाले बुनकरों का प्रतिशत मात्र क्रमशः 14 और 10 है। अध्ययन में सम्मिलित अधिकांश बुनकरों ने बुनाई का कार्य अपने पूर्वजों से सीखा है। लगभग सभी बुनकर कार्य से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उन्हें पूरे समय काम नहीं मिलता है और यदि मिलता भी है तो उसकी मज़दूरी दर काफी निम्न होती है। बुनकरों की नई पीढ़ी बुनाई व्यवसाय अपनाने के लिए कतई इच्छुक नहीं है। सिंह (2011)10 ने वाराणसी जिले में बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के अध्ययन में पाया कि बुनकरों की दयनीय स्थिति के प्रमुख कारक आधुनिक मशीनें, बनारसी साड़ी का महंगा होना, ग्राहकों की कमी, मुनाफे की कमी, सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता का अभाव तथा बुनकरों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों का सही ढंग से क्रियान्वयन आदि का होना है।


हजारिका (2012)11 ने आसाम में हथकरघा उद्योग पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव का अध्ययन करने का प्रयास विभिन्न सरकारी संगठनों की रिपोर्टों के माध्यम से किया है। अध्ययन में पाया गया कि आसाम में हथकरघा उद्योग भूमण्डलीकरण से पूरी तरह से अछूता नहीं है। आसाम के हथकरघा उत्पाद की विश्व बाजार में बहुत मांग है। ऐसा लगता है कि आसाम के लोग भूमण्डलीकरण के बारे में जानते नहीं हैं या तो इन पर भूमण्डलीकरण का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है। वेंकेट (2012)12 ने आंध्र प्रदेश के कुड़प्पा जिले के हथकरघा बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अध्ययन से प्राप्त आँकड़ों के विश्लेषण में पाया कि नई पीढ़ी के लोग हथकरघा उद्योग में कम हैं। सामाजिक संरचना की दृष्टि से कुल बुनकरों में अधिकांश बुनकर पिछड़े वर्ग के पदमासली, देवंगा, पुट्टूसली आदि समुदायों से सम्बन्धित हैं।

सदानन्दम (2016)13 ने अपने शोध में तेलांगाना के वारंगल जिले के बुनकरों के जीवन पर सहकारी समितियों का प्रभाव एवं उनके कार्यकलापों के अध्ययन में पाया कि 68 प्रतिशत लोगों पर सहकारी समितियों से जुड़ने के बाद उनकी आय में कोई वृद्धि नहीं हुई है, क्योंकि सहकारी समितियों द्वारा हथकरघा बुनकरों को कच्चे माल की आपूर्ति, क्रय एवं संचालन हेतु वित्त की व्यवस्था तथा निर्मित वस्त्रों के विपणन के सम्बन्ध में उचित कार्य नहीं किया जा रहा है, जिससे बुनकरों को बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। इस उद्यम से प्राप्त होने वाली निम्न मासिक आय और अत्यधिक कठिनाईयों के कारण बुनकर इस व्यवसाय से असंतुष्ट थे। मुखोपाध्याय एवं स्यानी (2019)14 ने पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के हथकरघा उद्योग पर वैश्वीकरण के प्रभाव के अध्ययन में पाया कि हथकरघा उद्योग में बुनकरों की कुछ अंतर्निहित समस्याओं जैसे कम उत्पादकता, उत्पाद विविधीकरण की कमी और कच्चे माल की खरीद से संबंधित समस्याओं से पीड़ित हैं। सहकारी क्षेत्र भी अपने बाजार क्षेत्र के विस्तार के प्रति उदासीन है। हालांकि बुनाई के इस परंपरागत उद्योग में कुशल बुनकर बहुत हैं जो बुनाई का अपना पारंपरिक कार्य कर रहे हैं परन्तु आधुनिक तकनीकों को नहीं अपनाया है। इसलिए नई पीढ़ी उद्योग की अनिश्चितता के कारण बुनाई को अपना मुख्य व्यवसाय मानने को पूरी तरह से तैयार नहीं है।

उपरोक्त शोध अध्ययनों एवं साहित्य समीक्षा के विश्लेषण से स्पष्ट है कि बुनाई व्यवसाय, हथकरघा उद्योग बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से सम्बन्धित विभिन्न अध्ययन सम्पादित किये गये हैं साथ ही साथ बुनकर समुदाय के समक्ष आने वाली विभिन्न प्रकार की समस्याओं एवं चुनौतियों से सम्बंधित अध्ययन हुए हैं तथा सरकार द्वारा संचालित बुनकरों से सम्बंधित विभिन्न योजनाओं कार्यक्रमों के प्रभाव एवं सहकारी समितियों की भूमिका आदि से सम्बन्धित शोध अध्ययन भी देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं बांग्लादेश में सम्पादित किये गये हैं। परन्तु बुनकर समुदाय पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव से सम्बन्धित उपलब्ध साहित्य समीक्षा से प्रतीत होता है कि देश के कुछ राज्यों में इससे सम्बन्धित बहुत ही कम अध्ययन सम्पादित किये गये हैं, इसलिए यह नितांत आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले में निवासरत बुनकरों पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव का विश्लेषण किया जाए और विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर राज्य एवं जिले स्तर पर बुनकर समुदाय के कल्याण हेतु प्रभावी कदम उठाया जा सके।

अध्ययन के उद्देश्य :

1.         बुनकर समुदाय की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करना।

2.         बुनकर समुदाय पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव का विश्लेषण करना।


अध्ययन क्षेत्र एवं शोध प्रविधि :

प्रस्तुत अध्ययन उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जिले के विकासखण्ड जलालपुर के बुनकर बाहुल्य न्याय पंचायत नगपुर में सम्पादित किया गया है। इस अध्ययन में वर्णनात्मक सह विश्लेषणात्मक शोध प्रविधि का प्रयोग किया गया है। अध्ययन हेतु 50 बुनकरों का चयन उद्देश्यपूर्ण निदर्शन के माध्यम से नगपुर न्याय पंचायत में निवासरत बुनकर समुदाय को अध्ययन का समग्र मानते हुए किया गया है। तत्पश्चात चयनित बुनकरों से साक्षात्कार अनुसूची, अवलोकन समूह चर्चा के माध्यम से प्राथमिक आंकड़ों का संकलन किया गया है साथ ही प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों से एकत्रित गुणात्मक एवं गणनात्मक आंकड़ों का विश्लेषण एवं निर्वचन करते हुए बुनकर समुदाय पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।

 आंकड़ों का विश्लेषण एवं निर्वचन :  प्रस्तुत अध्ययन में चयनित बुनकरों से प्राप्त प्राथमिक आंकड़ों के विश्लेषण एवं निर्वचन को दो भागों में किया गया है जो निम्नवत है-

I. चयनित बुनकरो की सामाजिक-आर्थिक स्थिति - अध्ययन क्षेत्र के चयनित बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के अध्ययन हेतु लिंग, आयु, धर्म, जाति, वैवाहिक स्थिति, परिवार का स्वरूप, शैक्षिक स्थिति, व्यवसाय एवं आय का विश्लेषण किया गया है।

अध्ययन में पाया गया कि अध्ययन क्षेत्र में सर्वाधिक (76.00 प्रतिशत) पुरूष उत्तरदाता बुनाई के कार्य में लिप्त है, केवल (24.00 प्रतिशत) महिला उत्तरदाता ही इस कार्य में संलग्न हैं तथा उत्तरदाताओं की आयु के विश्लेषण से पता चलता है कि अधिकांश (46.00 प्रतिशत) उत्तरदाता 41-50 आयु वर्ग के हैं जो वर्तमान में बुनाई का कार्य कर रहे हैं, 22.00 प्रतिशत 31-40 वर्ष के, 18.00 प्रतिशत 20-30 वर्ष के तथा केवल (14.00 प्रतिशत) उत्तरदाता ऐसे पाये गये जो 51-60 आयु वर्ग के हैं।

अध्ययन क्षेत्र में बुनाई के कार्य में सर्वाधिक (72.00 प्रतिशत) उत्तरदाता मुस्लिम धर्म से सम्बंधित हैं तथा केवल (28.00 प्रतिशत) उत्तरदाता ही हिन्दू धर्म के हैं तथा जातियों के विश्लेषण में पाया गया कि सर्वाधिक (72.00 प्रतिशत) उत्तरदाता अन्य पिछड़ा वर्ग जो अंसारी, मंसूरी, इदरीसी समुदाय से आते हैं और यह समुदाय बुनाई के इस परंपरागत कार्य को बानी स्वतन्त्र बुनकर के रूप में कर रहे हैं, 24.00 प्रतिशत उत्तरदाता अनुसूचित जाति के अन्तर्गत कोरी एवं गौतम जाति से सम्बन्धित हैं और सामान्यतः ये वर्ग मजदूर बुनकर की श्रेणी में आते हैं तथा केवल (4.00 प्रतिशत) उत्तरदाता ही सामान्य वर्ग से हैं जो बुनाई व्यवसाय को स्वतन्त्र बुनकर के रूप में कर रहे हैं।

अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाताओं की वैवाहिक स्थिति के अध्ययन में पाया गया कि बुनाई के कार्य में संलग्न अधिकांश (68.00 प्रतिशत) उत्तरदाता विवाहित हैं, 18.00 प्रतिशत अविवाहित, 8.00 प्रतिशत विधवा तथा 6.00 प्रतिशत उत्तरदाता विधुर हैं। अध्ययन में बुनकरों की शैक्षिक स्थिति के विश्लेषण में पाया गया कि बुनाई व्यवसाय मे कार्यरत सर्वाधिक (24.00 प्रतिशत) उत्तरदाताओं ने प्राथमिक स्तर की शिक्षा ग्रहण की है, 18.00 प्रतिशत निरक्षर, 16.00 प्रतिशत हाई स्कूल 12.00 प्रतिशत उत्तरदाता इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा पूर्ण की है और बुनाई के कार्य को अपने प्राथमिक व्यवसाय के रूप में सम्पादित कर रहे हैं।

सर्वेक्षित परिवारों में सर्वाधिक (76.00 प्रतिशत) उत्तरदाता संयुक्त परिवार के हैं तथा केवल (24.00 प्रतिशत) उत्तरदाता ही एकाकी परिवार के हैं जो वर्तमान में बुनाई के कार्य को कर रहे हैं।

अध्ययन क्षेत्र के चयनित समस्त उत्तरदाता प्राथमिक व्यवसाय के रूप में बुनाई के कार्य को कर रहे हैं तथा इनमें सर्वाधिक (30.00 प्रतिशत) उत्तरदाताओं की वार्षिक आय 60,001-80,000 रूपये के मध्य है, 24.00 प्रतिशत की 80,001-100,000 के मध्य, 20.00 प्रतिशत की 20,001-40,000 के मध्य तथा 16.00 प्रतिशत की 100,001 रूपये से अधिक है जबकि केवल (10.00 प्रतिशत) की वार्षिक आय 20,000 रूपये से कम है जो बुनाई के कार्य में संलग्न हैं।


II.    चयनित बुनकरों पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव- अध्ययन क्षेत्र के चयनित बुनकरों के व्यवसाय में मन्दी तथा बुनाई के व्यवसाय में उत्पन्न होने वाली समस्याओं में भूमण्डलीकरण की भूमिका एवं प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।

अध्ययन क्षेत्र के 58.00 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि भूमण्डलीकरण के कारण बुनाई व्यवसाय में मन्दी आयी है। 24.00 प्रतिशत ने व्यवसाय में मन्दी के लिए भूमण्डलीकरण की भूमिका को नहीं माना है तथा 18.00 प्रतिशत उत्तरदाता कुछ भी कहने में असमर्थ रहे हैं। अध्ययन क्षेत्र में भूमण्डलीकरण के कारण उत्पन्न समस्याओं को भी जानने का प्रयास किया गया है, जिसमें यह पाया गया कि 38.00 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उत्पादित माल के विक्रय में कमी, 12.00  प्रतिशत ने नवाचार की कमी, परम्परागत उत्पाद उत्पाद की गुणवत्ता को जबकि 8.00 प्रतिशत ने बाजार में उत्पाद की मांग में कमी के लिए भूमण्डलीकरण को उत्तरदायी माना है। अध्ययन क्षेत्र में यह भी पाया गया कि उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण के कारण अन्य देशों जिसमें विशेषकर बांग्लादेश से आने वाले हथकरघा एवं पावरलूम उत्पाद यहां की तुलना में सस्ते होने के कारण इन उत्पादों के प्रति स्थानीय लोगों का झुकाव अधिक होता है। साथ ही अध्ययन में यह पाया गया कि अध्ययन क्षेत्र में हथकरघा एवं पावरलूम के उत्पादों को देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शनी आदि के माध्यम से अच्छा बाजार उपलब्ध हुआ है और बुनकरों के उत्पाद विशेष रूप से अरबी रूमाल की मांग खाड़ी देशों मे अधिक है। इस प्रकार विश्लेषण से स्पष्ट है कि भूमण्डलीकरण ने बुनकर समुदाय के जीवन को सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार से प्रभावित किया है।

निष्कर्ष एवं सुझाव :

अध्ययन क्षेत्र से संकलित प्राथमिक आंकड़ों एवं द्वितीयक स्रोतों के विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष में यह पाया गया कि उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जनपद के विकासखण्ड जलालपुर के अधिकांश बुनकर निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के हैं और जो मुस्लिम धर्म के अंसारी, मंसूरी इदरीसी समुदाय से आते हैं जिनका परम्परागत व्यवसाय बुनाई रहा है इसीलिए यह समुदाय कई पीढ़ियों से अपनी आजीविका के साधन के रूप में इस परम्परागत कार्य को सम्पादित करता चला रहा है। लेकिन भूमण्डलीकरण के कारण इस समुदाय के शिक्षित युवा उक्त परंपरागत कार्य से विमुख हो रहे हैं और इस तथ्य की पुष्टि वर्तमान तथा पूर्व के शोध अध्ययनों (मिश्रा 2011) से भी होती है।

बुनाई का कार्य एक गहन मानवीय श्रम का कार्य है जिसके लिए बुनकरों को बुनाई कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व एवं पश्चात दोनों स्थितियों के लिए मानवीय सहयोग की आवश्यकता होती है। अध्ययन क्षेत्र में यह पाया गया है कि अधिकांश बुनकर पुरूष वर्ग के हैं तथा जो संयुक्त परिवार से भी सम्बन्धित हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बुनकरों को उक्त कार्य के सम्पादन में संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता है जिसमें प्रमुख रूप से परिवार की महिलाएं बिना किसी भुगतान के सहयोग प्रदान करती हैं। इसीलिए उक्त व्यवसाय में महिलाओं की भागीदारी प्रत्यक्ष रूप से तो कम है किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से अधिक है, ऐसा अध्ययन क्षेत्र के सर्वेक्षण में भी पाया गया है।

वर्तमान समय में चयनित समस्त बुनकरों का प्राथमिक व्यवसाय बुनाई है जो हथकरघा एवं पावरलूम के माध्यम से करते हैं और उक्त कार्य में समय एवं कार्यशील पूंजी अधिक लगती है इसलिए यह वर्ग बुनाई के अतिरिक्त किसी अन्य द्वितीयक व्यवसाय से नहीं जुड़ पाता है क्योंकि निम्न आर्थिक स्थिति के कारण इनके पास कार्यशील पूंजी का अभाव होता है और सामान्यतः महाजन से बुनाई से सम्बन्धित कच्चा माल इस शर्त के साथ लेते हैं कि उनके द्वारा उत्पादित माल केवल उन्हीं महाजनों को विक्रय करेंगे। ऐसी स्थिति में बुनकरों को अपने श्रम एवं उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है और इसके कारण बुनकर समुदाय की आय निम्न होती है जिससे यह वर्ग केवल अपने परिवार का भरण-पोषण मात्र ही कर पाते हैं।

देश में औपचारिक रूप से 90 के दशक से उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और उक्त तीनों प्रक्रियाएं मूल रूप से देश में आर्थिक सुधारों से सम्बंधित थीं लेकिन इन प्रक्रियाओं ने देश के सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्षों को भी प्रभावित करना प्रारम्भ किया है, जिससे बुनकर समुदाय भी अछूता नहीं है। वर्तमान समय में भूमण्डलीकरण ने बुनकर समुदाय की आजीविका के मुख्य साधन बुनाई के कार्य को सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार से प्रभावित किया है। बुनकरों को भूमण्डलीकरण के कारण बाजार में मंदी का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि बाजार में उत्पादित माल के विक्रय में कमी उत्पाद में नवाचार का अभाव एवं कच्चे माल का महंगा होना आदि उत्तरदायी कारक हैं। भूमण्डलीकरण के कारण बुनकरों को स्थानीय बाजारों में अपने परंपरागत उत्पाद की आधुनिक मशीनों एवं आयातित सस्ते उत्पादों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है जिसके कारण इनके परंपरागत उत्पाद बाजारों में स्थान नहीं बना पा रहे हैं ऐसी स्थिति में बुनकर समुदाय अपनी आजीविका के परंपरागत स्वरूप को त्यागने के लिए विवश हैं और किसी अन्य क्षेत्र में अपनी आजीविका के साधन को तलाश रहे हैं।

भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने जहां एक ओर बुनकर समुदाय के समक्ष विभिन्न प्रकार की समस्याएं एवं नई-नई चुनौतियां खड़ी की हैं तो वहीं दूसरी ओर इनके लिए अपार सम्भावनाओं के मार्ग भी प्रस्तुत किये हैं जिसमें प्रमुख रूप से करघा के क्षेत्र में नई मशीनों का प्रादुर्भाव, विश्व पटल पर बुनकरों के उत्पाद के विक्रय हेतु नये बाजार के अवसर हैं। उक्त अवसरों के उपलब्ध होने के बाद भी बुनकर समुदाय इन अवसरों का लाभ नहीं ले पा रहा है क्योंकि यह समुदाय निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है जिसके कारण इनमें जागरूकता का अभाव, कार्यशील पूंजी की कमी, उत्पादों में नवाचार का अभाव, उत्पादों के विपणन सम्बन्धी कुशलताओं प्रबन्धन का अभाव आदि है।

वर्तमान समय में भूमण्डलीकरण के कारण हथकरघा एवं पावरलूम क्षेत्र में कार्यरत बुनकरों की स्थिति काफी दयनीय है अतः बुनकरों के कल्याण के लिए सरकार को सस्ते कच्चे माल, बिजली दर में छूट, निम्न दर पर कार्यशील पूंजी हेतु ऋण प्रदान करने के साथ ही साथ नई मशीनों की खरीद पर सब्सिडी तथा वैश्विक स्तर पर विपणन हेतु अवसर उपलब्ध कराने चाहिए एवं बुनकरों की क्षमता या कौशल संवर्धन हेतु नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होनी चाहिए जिससे बुनकर समुदाय भुमण्डलीकरण के इस दौर में इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना कर सके तथा उचित अवसरों एवं सम्भावनाओं का सार्थक उपयोग अपने व्यवसाय के उन्नयन एवं गुणवत्तापूर्ण जीवन-यापन हेतु कर सके। 

सन्दर्भ : 

1.         सरकार, शर्मिस्ठा एवं मखोपाध्याय, स्यानी, ‘‘इम्पैक्ट ऑफ ग्लोबलाइजेशन आन हैण्डलूम इण्डस्ट्री- केस स्टडी ऑफ हुगली डिस्ट्रिक्ट ऑफ वेस्ट बंगाल, इनवायर्नमेण्टल एण्ड सोशियोंनॉमिक स्टडीज, (वा.-7), 2019, पृ.-39.

2.         वही पृ.-41.

3.         वार्षिक रिपोर्ट, कपड़ा मंत्रालय- भारत सरकार, 2019-20, पृ.-1

4.         अमान, आरिफा, ‘‘नीड फार सर्वाइवल आफ हैण्डलूम इण्डस्ट्री एण्ड इट्स वर्कर्सः स्पेशल रिफ्रेन्स टू केस आफ उत्तर प्रदेश, इण्टरनेशनल जर्नल आफ इकोनॉमिक्स एण्ड मैनेजमेण्ट स्टडीज, (वाल्युम-4, इश्यु-5,) मई, 2017, पृ.-38

5.         राय, टी., ‘‘एक्सेप्टेंस ऑफ इन्नोवेशंस इन अर्ली ट्वन्थीएथ सेन्च्युरी इण्डियन वीविंगइकोनॉमिक हिस्ट्री रिव्यू,  (वा.-55, इश्यू-3), 2002, पृ. 507-532.

6.         घोष, एस.के. एवं अख्तर, मो. शहरयार, ‘‘हैण्डलूम इण्डस्ट्री आन दि वे एक्सटिंक्शन: ऐन इम्पीरिकल स्टडी ओवर दि प्री-डामिनेन्ट फैक्टर, बी.आर..सी. यूनीवर्सिटी जर्नल, (वा.-2, .-2), 2005 पृ. 1-12.

7.         त्रिपाठी, एस.जी., ‘‘ओडिशा हैंडलूम: प्राब्लम्स एण्ड पर्सपेक्टिव्स, ओडिशा रिव्यू, 2009, पृ. 54-56.

8.         सिंह, अमृता एण्ड नायक, शैलजा डी., ‘‘स्टेटस ऑफ बनारस वेवर्स: प्रोफाइल, कर्नाटका जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर साइंस, (वा.-22, नं.-2), 2009, पृ. 08-11.

9.         मिश्रा, रश्मि, ‘‘चंदेरी के साड़ी बुनकर एक समाज वैज्ञानिक अध्ययन”, (पी-एच.डी. शोध उपाधि के लिए प्रस्तुत अप्रकाशित शोध प्रबन्ध), 2011, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर.

10.       सिंह, ममता, ‘‘बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक समस्याएं: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन”, (पी-एच.डी. शोध उपाधि के लिए प्रस्तुत अप्रकाशित शोध प्रबन्ध), 2011, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, .प्र..

11.       हजारिका, संघमि़त्रा, ‘‘ग्लोबलाइजेशन एण्ड इट्स इम्पैक्ट आन दि हैण्डलूम इण्डस्ट्री ऑफ आसामः पर्सपेक्टिव”, जर्नल ऑफ फ्रन्टलाइन रिसर्च इन आर्ट्स एण्ड साइंस, (वा.-2), 2012, पृ. 17-22.

12.       वेंकेट, एस.के., ‘‘सोशियो इकोनॉमिक कंडीशंस ऑफ हैंडलूम वेवर्स इन कुडप्पा डिस्ट्रिक्ट ऑफ आन्ध्र प्रदेश, (पी-एच.डी. शोध उपाधि के लिए प्रस्तुत अप्रकाशित शोध प्रबन्ध), 2012, श्री कृष्णदेवराय विश्वविद्यालय, अनन्तपुर, आंध्र प्रदेश.

13.       सदानन्दम, बी, ‘‘सोशियो-इकोनॉमिक एनालिसिस ऑफ हैण्डलूम इण्डस्ट्री इन तेलांगाना- स्टडी ऑफ वारन्गल डिस्ट्रिक्ट”, इण्टरनेशनल जर्नल इन मैनेजमेण्ट एण्ड सोशल साइंस(वा.-4, इश्यु-2), फरवरी, 2016, पृ. 392-402.

14.       सरकार, शर्मिस्ठा एवं मखोपाध्याय, स्यानी (2019), ‘‘इम्पैक्ट ऑफ ग्लोबलाइजेशन आन हैण्डलूम इण्डस्ट्री- केस स्टडी ऑफ हुगली डिस्ट्रिक्ट ऑफ वेस्ट बंगाल”, इनवायर्नमेण्टल एण्ड सोशियोंनॉमिक स्टडीज, वा.-7, 2, पृ. 39-48.

 

मोहम्मद नदीम

शोधार्थी (समाज कार्य), समाजशास्त्र, सामाजिक विज्ञान एवं समाज कार्य विभाग,

डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ-226017

mohd.nadeem.nic@gmail.com


डॉ.. रूपेश कुमार सिंह

 सहायक आचार्य, समाजशास्त्र, सामाजिकविज्ञान एवं समाज कार्य विभाग,

डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ-22601

                         rupeshlucknow@rediffmail.com              


                                  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-38, अक्टूबर-दिसंबर 2021

चित्रांकन : दीपशिखा चौधरी, All Students of MA Fine Arts, MLSU UDAIPUR
UGC Care Listed Issue  'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 
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