समीक्षा : ‘हाथ तो उग ही आते हैं’ : जातीय उत्पीड़न और संघर्ष को बयां करती हुई कहानियाँ -शुभम यादव

समीक्षा : हाथ तो उग ही आते हैं’ : जातीय उत्पीड़न और संघर्ष को बयां करतीहुई कहानियाँ 

शुभम यादव           

           


    दलित विमर्श ने हिंदी साहित्य को सिर्फ समृद्ध ही नहीं किया है अपितु उसका लोकतांत्रिकीकरण भी किया है।     उसके केंद्र में यातना, पीड़ा और संघर्ष का दर्शन है, हाशिए पर पड़े उस व्यक्ति और समाज का सच है जिसे मानव मात्र होने से नकार दिया गया है। साहित्य में इस तरह के लेखन को यथार्थवाद के रूप में चिह्नित किया गया है। यथार्थवादी प्रवृति के इस उभार ने हमारी कुंद पड़ी चेतना में तोड़फोड़ की है और साहित्य को कल्पना लोक से निकालकर हमारे समय और सच से जोड़ा है। जाति, धर्म, लिंग, अर्थ आदि के आधार पर बढ़ता भेदभाव हमारे दौर की एक गंभीर समस्या है। श्यौराज सिहंबेचैनका प्रकाशित कथा संग्रह हाथ तो उग ही आते हैंइन समस्याओं से मुठभेड़ करता है। इस संग्रह में कुल नौं कहानियाँ संग्रहित हैं जो अलग अलग पृष्ठभूमि को अपने में समाहित किए हुए हैं। 

इस संग्रह की पहली कहानी घूंघट हटा था क्या?’दलित बालक बच्चू की गुलामी की कहानी तो है ही लेकिन यह सवर्ण स्त्री लाड़ो की भी कहानी है। बच्चू बालाधीन का नौकर है जो भोला सिंह की बेटी और बालाधीन की पहली पत्नी सावित्री के साथ दहेज में अतिरिक्त सामान के रूप में आया है क्योंकि बच्चू के पिता दयादास, भोला सिंह के कर्जदार हैं। सावित्री की मौत के बाद बालाधीन उसे वापस भेजने के बजाय उसे समयावधि पूरा करने का हवाला देकर लौटने नहीं देता है ताकि उसे बेगार मिलता रहे। कहना न होगा कि बेगार कराने की मानसिकता आज भी उच्चजातियों में उसी तरह बनी हुई है जैसे वर्षों पहले थी। वे आज भी राजाओं महाराजाओं की उसी समान्ती दुनिया में मग्न हैं। 

लाड़ो जो स्कूल में पढ़ने में अच्छी है और गुण युक्त सम्पन्न लड़की है का बेमेल विवाह बालाधीन से कर दिया जाता है। इसके पीछे भी पितृसत्ता की वही हेजमनी है जो पुरूष को सर्वाधिकार प्रदान करती है। इस बाल विवाह के पीछे का प्रमुख कारण गरीबी तो है ही लेकिन लाड़ों के पिता को यह पसंद नहीं कि उसकी बेटी की दोस्ती लड़कों से हो, इससे पहले कोई नौबत आए हाथ पीले कर देना उसे सबसे सुभीत लगता है। कम उम्र में लाड़ो चौधरानी तो बन जाती है लेकिन उसकी स्वतंत्रता उससे छिन जाती है। चौधरी की सख्त हिदायत है कि वह किसी से भी बात करने से पहले घूंघट जरूर डाले। चौधरानी बन कोठियों और रनिवासों के सुखभोग की व्याख्या तो कोई चौधरानी कर सकती है लेकिन चहारदीवारी के भीतर उनके जीवन की बंदिशें जग जाहिर हैं। इस संदर्भ में गांव की दलित स्त्रियों का एक संवाद ध्यातव्य है, 'चौधरानी बननों तो घूरे की कुतिया बनने जैसा होई जावे है, औरतुन की आजादी तो भंगी-चमारनु में होवे है, वे जाने हैं बहू बेटिन की कद्र करनों। सो उन्हें अछूत बनाइ रखो है। बेचारिनु की घर जमीनिनु पै जे विदेशी हमलावरनु की तरह कब्जा कर लेवे हैं। इनके यहां औरत से गैया-भैंसिया सौ गुना अच्छी हैं। ये औरत जात की कदर काहे करेंगे! मरिजाइ तौ दूसरी तीसरी और दान दहेज के नाम पर बाके मां-बाप के घर दिन दहाड़े डाको डारि लूट-खसोट लावें हैं।'

 

चौधरी की शंकालु प्रवृत्ति और घूंघट की सख्त हिदायत लाड़ों की मृत्यु का कारण बनती है। बालाधीन के घर पर न होने के कारण लाड़ों की प्रसव पीड़ा से मृत्यु हो जाती है। उसकी ननद लक्ष्मी सिर्फ इसलिए बच्चू को मालकिन के पास जाने और उसे हास्पिटल ले जाने के बजाय बालाधीन को बुलाने हरिद्वार भेज देती है कि कहीं भाभी घूंघट नहीं रख पायी तो क्या होगा। लाड़ो मरी प्रसव पीड़ा के साथ लेकिन मनुष्य के रूप में वह बहुत पहले ही मर गयी थी; जब बालाधीन ने सुहागरात के नाम पर उसके साथ जोर जबर्दस्ती की थी और मर्यादा के नाम पर एक कोठी में बंद कर दिया था। इस पूरी प्रक्रिया में वह महज एक खिलौना थी; जिसे पहले उसके बाप ने इज्जत के नाम पर महफूज रखने की चिंता में बालाधीन को सौप दिया और उसने सुख सुविधाओं और भोग के नाम पर उसकी स्वतन्त्रता को एक घूंघट में कैद कर दिया। यह कहानी जहां एक तरफ दलित बालक की दास्तां को व्यक्त करती है तो वहीं गांव की स्त्रियों की स्थिति को भी अभिव्यक्त करती है।

 

इस संग्रह की दूसरी कहानी 'हमशक्ल' है, यह अन्य कहानियों की अपेक्षाकृत लम्बी कहानी है। इस कहानी में लेखक ने शिक्षा, दलित उत्पीड़न, चुनावों की हकीकत, साम्प्रदायिकता और मार्क्सवादी पार्टियों के भीतर की जड़ता को अपना विषय बनाया है। कहानी की शुरूआत सलवी और भोरवती नाम की दो हमशक्ल लड़कियों से होती है, जो क्रमशः मालिक और नौकर की बेटी हैं। दोनों एक दूसरे के साथ रहती हैं लेकिन दोनों की स्कूलिंग में बहुत फर्क है। सलवी पढ़ने के लिए विदेश चली जाती है तो नौकर की बेटी वहीं गांव के स्कूल और कॉलेज में अपने पिता की हैसियत के अनुसार पढ़ाई करती है, जो गांव की उच्च जातियों के उत्पीड़न का शिकार होती है। कर्मादास का भोरवती के अपहरण की खबर पुलिस को न देकर प्रकेश के उपर आश्रित रहना एक तो उस समाज की अशिक्षा को दर्शाता है साथ ही उच्च जातियों के कारनामों को प्रदर्शित करता है। कर्मा को पता है कि यह वही हवेली है, 'यहाँ दलित और अति पिछड़ों के उत्पीड़न के बड़े से बड़े कांड दबकर दफन हो चुके थे। चाहे दीपू पासी की हत्या का कांड हो या रमिया तेलिन के शील भंग का मामला हो या राधा अहिरिन के इज्जत लूटने की साजिश हो अथवा मिट्ठो खटिकिन की बर्बादी का वाकया हो; चारदीवारी के बाहर उनके सामन्ती आतंक के सिवाय बदनामी की कोई परछाईं नहीं निकली थी।'

 

प्रकेश की पत्नी माधवी जो पार्टी की कार्यकर्ता है और महिला अधिकारों को लेकर जागरूक भी है। कर्मादास की बेटी की बात पार्टी में उठाती है लेकिन प्रकेश के द्वारा उसे शांत करा दिया जाता है। प्रकेश के चुनावी गणित को समझाए जाने के बाद पार्टी में भोरवती के मुद्दे को लेकर हुयी तनातनी पर वह बाद में अफसोस करते हुए कहती है कि, 'बेकार मेरे मन में एक नीची जाति की लड़की का सवाल आया। कहीं भाग गयी होगी। छोटी जातियों में किरदार और खुद्दारी जैसी चीजें होती ही कहां हैं? इनमें सेल्फ रेस्पैक्ट का तत्व मर गया होता है। ये तो गैर-कौम के मर्दों से जुड़ने में ही धन्य समझती हैं अपने आपको।' दरअसल यह समस्या माधवी की ही नहीं बल्कि आज स्त्री अधिकारों और शोषणों के खिलाफ चल रहे तमाम आंदोलनों की है। बौद्धिक विमर्शों में स्त्री को एक आइडेंटिटी के रूप में प्रस्तुत तो किया जाता है, सेमिनारों और बहसों की हर दूसरी लाइनें दुनिया भर के स्त्रियों के दुख साझा हैं जैसे वाक्यों पर खत्म होती हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। जाति भारत का सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य है और भारतीय स्त्रियां इस जाति सरंचना से बाहर नहीं हैं। हाथरस, कठुआ, उन्नाव जैसी घटनाओं पर एक गहन मौन, फडफडा़ती हुयी भुजाओं का शांत हो जाना और उद्वेलित न होने वाले हृदय के पीछे माधवी जैसी सोच एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

कहानी में कॉमरेड मदन के द्वारा दलित जातियों पर हो रहे अत्याचार, समाजिक भागीदारी, सरकारी संस्थाओं में उनके साथ हो रहे भेदभाव, और भोरवती के मामले को लेकर जब पार्टी के भीतर सवाल उठाता है तो कॉमरेड प्रकेश उसे अछूत समाज से आया हुआ और वर्ग संघर्ष की समझदारी की कमअक्ली का टैग लगाकर चुप करा देता है। मदन के सवालों के जवाब में प्रकेश ने कहा था कि, 'तुम सुनो कामरेड, तुम्हारा बैकग्राउंड अछूत-जाति का रहा है। तुम वहां वर्ग चेतना नहीं सीख पाए हो।' यह सीखना-सीखाना उच्च जातियों का ऐसा पेशा है कि वहां किसी और की उपस्थिति मात्र ही उन्हें नागवार गुजरती है। बौद्धिक आतंकवाद के़ ऐसे उदाहरण आपको यत्र तत्र बिखरे मिलेंगे। खुद कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर जाति की बहसें और उन्हें उच्च पदों पर न बिठाए जाने के तथ्य हमारे सामने मौजूद हैं। बौद्धिकता सवर्णों की खेती है कि इस मानसिकता से जनवादी होने का दम्भ भरने वाली पार्टियां भी उबर नहीं पायी हैं। 

 

भोरवती का संघर्षों के साथ गांव के कॉलेज से ही आगे तक की पढ़ाई कर लेना और हर चीज में अव्वल होना यह सिर्फ उच्च जातियों के लोगों को ही नहीं खटक रहा था बल्कि आस पास पड़ोस के कर्मादास के भाई बन्धुओं को भी खासी परेशानी थी। उनके लिए पढ़ते रहना महज पुरूषोचित गुण है, लेकिन कर्मादास के मालिक राय साहब जो आए दिन रूस, जापान और अमेरिका की यात्रा पर रहते हैं कि राय काबिले गौर है, ' मैं पहले ही कह चुका हूं कि लड़की अपनी इच्छा से कहीं भाग-भूग गयी होगी। दोष तो कर्मादास का ही है, मैं शुरू से कहता था चार पांच दर्जा से ज्यादा लडकी को मत पढ़ाना। पर अब इन्हें भी जमाने की हवा लग गयी है।' यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि राय साहब सरीखे लोग आपके इर्द गिर्द हमेशा मौजूद मिलेंगे। जो हाशिये के समाज में आ रहे परिवर्तनों से इर्ष्या करते हैं और उसे खतरनाक मानते हैं। यह बहुत शातिर किस्म के लोग हैं, जो समस्याओं के जड़ पर प्रहार करने के बजाय शोषित व्यक्ति को ही प्रश्नांकित करते हैं।

 

लेखक ने कहानी का पूरा वितान पार्टियों के भीतर के जनतंत्र, चुनावी एजेंडे, दलितों की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति और पार्टियों के चुनाव विजय अभियान में साम्प्रदायिक दंगों की भूमिका को लेकर रचा है। लेखक दलितों की इस स्थिति के लिए सिर्फ दूसरों पर ठीकरा नहीं फोड़ता है बल्कि खुद के लिए भी आलोचनात्मक रूख अख्तियार किये हुए है। 

 

हाथ तो उग ही आते हैं इस संग्रह की केन्द्रीय कहानी है। यह हाथ उगने के बजाय हाशिए के लोगों के हाथ काटे जाने की कहानी बयां करती है। हाथों के काटे जाने की इन घटनाओं पर लेखक ने भूमिका में लिखा है कि, 'इतिहास में कामगार हाथ के साथ बहुत कुछ बुरा होता रहा है। अद्भुत इमारतें बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा लेने की कहानियां हम बचपन से सुनते आए हैं। चकित करने वाली कलाकृतियां देने वाले अपनी तीरंदाजी से भौचक्का करने वाले (एकलव्य) जैसे कितनों के हाथ असमर्थ बनाए गए हैं।' हाथ काटने की ऐसी घटनाएँ मिथकों में भरी पड़ी हैं;आज वर्तमान समय में भी हाथ का काटा जाना बदस्तूर जारी है और नयी नयी नीतियों के द्वारा इसे अंजाम दिया जा रहा है। दलितों पिछड़ों के प्रतिनिधित्व के सवालों पर सार्वजानिक क्षेत्रों का निजीकरण हाशिए के लोगों के हाथ काटने का आधुनिक तरीका है।वर्ण और जाति के आधार पर हो रही यह हिंसा और भेदभाव लेखक के लिए चिंता का विषय है, जिसे इस कहानी में प्रमुखता से रेखांकित किया गया है।

 

कहानी की मुख्य पात्र दलित महिला रुक्खो है। जो हिंदू मुस्लिम दंगे में अपने पति को खो देने के बाद गांव से शहर में पलायन करने पर मजबूर हुई है। वह शहर में सूतो चौधरानी के यहां झाडू-बर्तन और एक टाइम खाना बनाने का काम पा जाती है। सूतो चौधरानी जो शहर में आ तो गयी है और पहनावे में आधुनिक भी लगने लगी है लेकिन अंदर से उतनी ही पिछड़ी और दकियानूस है। जो जाति जानने की तरह तरह की युक्ति का प्रयोग करती है। जाति सिर्फ सूतो का मामला नहीं है बल्कि सुसभ्य कहे जाने वाले शहरी लोगों में यह ज्यादा संकीर्ण रूप से अपनी पैठ बना रही है। आखिर तभी तो शहर में कामवालियों को अपनी जाति छुपा कर काम करना पड़ता है।  कहना गलत न होगा कि सुसभ्य लगने वाले इन शहरों में जाति का अपने नए कलेवर में मौजूद रहना हिन्दुस्तान में आयी अधकचरी आधुनिकता का ही प्रतिफल है जो विचारों के बजाय पोशाकों में ज्यादा फलित हुयी है। रुक्खो शहर में जिस चाचा जान के यहां रहती है ईद में वह अपने गांव चला जाता है जिसके चलते उसे काम पर अपने दूध मुंहे बच्चे को लेकर आना पड़ता है। खेलते हुए बच्चे के हाथ पर सूतो का सपूत बाइक चढ़ाकर नौ दो ग्यारह हो जाता है। समय‌ से इलाज के अभाव में रुक्खो के बच्चे का हाथ काटना पड़ता है। जिसे वह अपने बच्चे और स्वयं को हाथ उग आने का दिलासा देती है।हाथ काटने का यह पहलू बहुत विस्तृत है क्योंकि अब इनके नए संस्करण हमारे सामने मौजूद हैं। विकास के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण, महंगी होती शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं हाथ काटने के नए हथकंडे हैं। यह कहानी इन नए संस्करणों का एक पाठ है, जो समाज में घट रही इन घटनाओं को अपने में समेटे हुए है।

 

'आग और फूस' कहानी यथार्थ की भाव भूमी पर उपजी हुयी है। इस कहानी में दो मुख्य पात्र हैं दाताराम और उसकी बहू सरवती। सरवती एक संघर्षशील महिला है, जो कम उम्र में विधवा हो जाती है। एक दिन अपने ससुर को खेत में कलेवा ले जाते समय गांव के कुछ मवालियों और गुंड़ों द्वारा उसका बलात्कार कर दिया जाता है लेकिन वह इससे टूटती नहीं बल्कि संघर्ष करती है और अपना पूरा जीवन गरीब और अछूत बालकों को समर्पित कर देती है। बलात्कार के बाद वह और उसके ससुर दाताराम गांव को छोडकर दूसरे जगह बस जाते हैं और वहां अछूत बालकों के लिए सरवती शिक्षा देने का काम करती है। निजी संस्थानों के द्वारा उसके इस कार्य का विरोध करने पर वह मुंह तोड़ जवाब देती है, " मैं तुम्हारे बे सिर-पैर की सलाह नहीं मान पाऊंगी। मैं जानती हूं कि देश की सेवा जहां तुलसी ने की है वहीं कबीर, रैदास ने भी की है, चोखा मेला और नंदनार ने भी की है, रसखान और रहमान ने भी की है। आजादी की रक्षा पंडित नेहरू ने, गांधी ने की है तो डॉक्टर अंबेडकर ने भी की है। देश सबका है। गरीबों, अछूतों को भी अपने देश की सेवा करने का पूरा हक है। हमारा फर्ज है कि हम इन बच्चों को तालीम के संस्कार दें और अपना कर्तव्य पूरा करें।" आग और फूस कहानी विषम परिस्थितियों में भी मशाल को जलाए रखने की प्रेरणा देती है, जाति आधारित हिंसा और शिक्षा के व्यवसायिकरण को लेकर कहानी मुख्य रूप से सामने आती है।

 

वह अम्मा जैसी थी', ‘सिस्टर’, ‘अस्थियों के अक्षर’,‘छोटू और 'कार्ड संख्या 2118' छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियां समाज की स्थिति से अवगत कराती ही हैं, वहीं लेखक की रचना प्रक्रिया को भी समझने में मदद प्रदान करती हैं। वह अम्मा जैसी थी कहानी में जहां वह एक बूढ़ी औरत को देखकर अपने मां के साथ ट्रेन में हुई घटना की याद करता है तो वहीं सिस्टर कहानी में पाल चाचा के शादी की कहानी कहता है। अस्थियों के अक्षर आत्मकथांश है, वह लेखक की अपनी संघर्ष गाथा है। जो घटना प्रधान होने के कारण बहुतायत लोगों के जीवन से जुड़ जाती है। कहानी में लेखक अपने साथ हुए उस हादसे को याद करता है, जब वह पढ़ने की ललक के चलते अपने चाचा के पैंट से एक आना चुरा लेता है, जिसकी सजा उसके मां को मिलती है। दलित जातियों के विकास में गैर दलित जातियों के द्वारा पैदा की गयी समस्याएं तो सामने हैं ही लेकिन इसके अतिरिक्त अशिक्षा और ईर्ष्या के कारण कैसे खुद के संबंधी और दलित जातियों के लोग भी रास्ते में रोड़ा बनकर खड़े हो जाते हैं इस कहानी में देखा जा सकता है।छोटू भारत में हो रहे विकास की हकीकत को बयां करती है, जहां सड़कों पर घूमने वाले पशुओं के स्वास्थ्य लिए एनजीओ सक्रिय हैं लेकिन मनुष्यों की हालत खस्ता है, रोड़ किनारे रहने वाले कालू के लिए डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। यही विकास का नया मॉडल है। श्यौराज सिंह बेचैन कहानियों में दोष का सारा ठिकरा सिर्फ दूसरों पर नहीं फोड़ते हैं बल्कि अपने समाज और भाई-बंधुओं की भी कठोर आलोचना प्रस्तुत करते हैं।

 

श्यौराज सिंह बेचैनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ गहरे रूप में दिखाई देता है, कहानी में यातनाओं का चित्रण हताशा और निराशा उत्पन्न नहीं करता बल्कि समाज को बारीकी से समझने की दिशा और संघर्ष की प्रेरणा देता है। यह कहानियाँ सभ्यता के आवरण में लिपटे हुए आधुनिक समाज के वर्णाश्रमी चेहरे को बेपर्दा करती हैं। कहानियों में बार-बार शिक्षा की तरफ इशारा सामाजिक यातनाओं से मुक्ति की तरफ इशारा है। संघर्षश्यौराज सिंह बेचैनकी कहानियों का मोटो हैं। इनके पात्र टकटकी लगाए हुए देखते नहीं बल्कि आमूलचूल परिवर्तन के लिए संघर्ष करते हैं।आग और फूँस कहानी की सरवती,‘छोटू का कालू  औरकार्ड संख्या 2118का अशोक इसके सशक्त उदाहरण हैं। इन कहानियों में आंबेडकर के प्रसिद्ध कथन शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो की अनगूँज सुनायी देती है।

 

संदर्भ :

  • श्यौराज सिहं 'बेचैन', हाथ तो उग ही आते हैं, वाणी प्रकाशन,दिल्ली

 

शुभम यादव

शोध छात्र, हिन्दी विभागदिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

9473930135, shubhamyadavbhu2@gmail.com


                    अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-38, अक्टूबर-दिसंबर 2021

चित्रांकन : All Students of MA Fine Arts, MLSU UDAIPUR
UGC Care Listed Issue  'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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