शोध आलेख : भारत का स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्य भारती का साहित्य -संजय दान


भारत का स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्य भारती का साहित्य

संजय दान


शोध सार : आधुनिक भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम है। भारतीय जनता ने एक स्वर में आपसी मतभेदों को किनारे करके औपनिवेशिक साम्राज्यवादिता को पराजित किया। इस चेतना के निर्माण में भारतीय साहित्य का अन्यतम योगदान रहा। तमिल साहित्य में आधुनिकता के भागीरथ सुब्रह्मण्य भारती का स्थान जातीय साहित्यिकों में सर्वोच्च है। भारती का साहित्य भारत तथा भारतीयता की अवधारणा का परिचायक साहित्य है। अपने संक्षिप्त जीवन काल में सुब्रह्मण्य भारती ने सक्रिय क्रांतिकारी तथा साहित्यिक के रूप में योगदान दिया। भारती पूर्ण स्वतंत्रता की उद्घोषणा करने वाले पहले क्रांतिकारी थी। भारती ने केवल स्वतंत्रता का स्वप्न ही नहीं देखा बल्कि आजाद भारत के सर्वांगीण विकास के लिए भी अपनी कविताओं में रूपरेखा प्रस्तुत की। एक ऐसा भारत जो औद्योगिक रूप से आत्मनिर्भर हो, विज्ञान तथा तकनीकी में अग्रगामी हो तथा जहाँ की जनता बुनियादी सुविधाओं से वंचित ना हो। कविताओं के माध्यम से भारती ने अखिल भारतीयता के निर्माण का सृजनात्मक प्रयास किया।

 

बीज शब्द : सुब्रह्मण्य भारती, राष्ट्रीय आन्दोलन, तमिल साहित्य, स्वंत्रता, जातीयता आदि।


मूल आलेख : सन् 1857 के गदर के पश्चात भारत की स्थिति ब्रिटिश ताज के उपनिवेश की हो गई। भारत पर ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वायसराय का शासन था। सन् सत्तावन जैसे विद्रोह की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तथा भारत पर शासन की सुगमता के लिए ब्रिटिश संसद ने भारत परिषद अधिनियम पारित किया, साथ ही शासन कार्यों में भारतीयों की भागीदारी को बढ़ावा दिया गया। अंग्रेज़ी शिक्षा तथा नौकरी के अवसरों ने कुछ समय के लिए भारतीय की स्वतंत्रता की चाह को ठंडा कर दिया था । वस्तुतः किसी भी क्रांति के सफल होने का कारण आम जनता की भागीदारी होती है, सन् सत्तावन के गदर में आम जनता की भागीदारी सीमित थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध  तक आम भारतीय जनता के लिए अंग्रेज़ों का आना एक राजा की जगह दूसरे राजा आने की घटना भर था।इस स्थिति में कुछ परिवर्तन कांग्रेस की स्थापना के बाद आया,परंतु आम जन अभी भी परिदृश्य में नहीं था|

 

 इस समय की मद्रास प्रेसीडेंसी की स्थिति भी इसी तरह की थी। मद्रास का प्रबुद्ध वर्ग जो नयी अंग्रेज़ी तालीम में दीक्षित था, राजपक्ष का समर्थक था। इसी स्थिति को लक्ष्य करते हुए अंग्रेज़ी इतिहासकार डेविड वाशब्रुक ने कहा कि मद्रास की गलियों में ब्रिटिश विरोधी एक कुत्ता तक नहीं भौंकता था।[1] आम जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने के लिए एक तेजोमय नाद की आवश्यकता थी जो निविड़ अंधकार को काट सके। इन्हीं परिस्थितियों के बीच सुब्रह्मण्य भारती का जन्म हुआ।

 

1.  सुब्रह्मण्य भारती: आरंभिक जीवन

 

सुब्रह्मण्य भारती का जन्म भारत के दक्षिण प्रान्त तमिलनाडु में हुआ। भारती का जन्म तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिल्ले के एट्टयापुरम में हुआ।एट्टयापुरम के राजदरबार में चिन्नास्वामी अय्यर तमिल व अंग्रेजी के जानकार के रूप में काम करते थे|इन्हीं चिन्नास्वामी अय्यर तथा लक्ष्मी अम्माल के घर दिसंबर 11,1882 को सुब्रह्मण्य भारती का जन्म हुआ।[2] भारती का बचपन का नाम सुब्बैया था। चिन्नास्वामी अय्यर वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति थे। वे नयी तकनीक और कल- कारखानों के महत्व को समझते थे। उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास के लिये एक कपड़ा-मिल भी खोली थी| पिता सुब्बैया को अंग्रेज़ी व गणित में पारंगत देखना चाहते थे, जिससे वह उनके व्यापारिक मंसूबों को पूरा कर सके। परंतु सुब्बैया का प्रवृत्ति स्वच्छंद साहित्यिक की थी, गणित के अंकों की जगह उसे कविता के तुक्तक नज़र आते थे।[3] वह प्रकृति की सुषमा को देखकर प्रभावित होता तथा पद्यमय पंक्तियाँ गुनगुनाने लगता।सन् 1893 में एट्टयापुरम महाराज की सभा में बालक सुब्बैया से विद्वान सभा ने तमिल साहित्य और व्याकरण पर अनेक प्रश्न पूछे जिसके उत्तर सुब्बैयाने अपनी विलक्षण प्रतिभा और तर्कणा से दिये। विद्वान सभा के अध्यक्ष 'विरुदैशिवज्ञान योगी' ने सुब्बैया की प्रतिभा से प्रसन्न होकर उसे 'भारती' की उपाधि प्रदान की। सुब्बैया की आयु इस समय मात्र ग्यारह साल थी। उस दिन से सुब्बैयासुब्रह्मण्य भारती के नाम से जाना जाने लगा।[4]

 सन 1898 में भारती के पिता को कपड़ा मिल में बेहद घाटा हुआ जिसका सदमा वे सहन नहीं कर पाये।भारती के सिर से पिता का साया भी उठ गया। सुब्रह्मण्य भारती ने इसका जिम्मेदार तत्कालीन सरकार की नीतियों का ठहराया|

 

2. राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश

 

सुब्रह्मण्य भारती को राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय करने का श्रेय अखबार 'स्वदेशमित्रन्' को जाता है। सुब्रह्मण्य भारती ने सन 1904 में उपसंपादक की हैसियत से अखबार में कार्य संभाला। भारती का कार्य अंग्रेज़ी खबरों को तमिल में अनुदित करना था। भारती जो अब तक काव्य में शास्त्रीय तमिल भाषा का प्रयोग कर रहे थे, अखबार की आवश्यकता का अनुरूप उन्हें सामान्य जन की भाषा में लिखना पड़ा। इसने भारती के काव्य को नयी शैली प्रदान की। भारती के अखबार से जुड़ने के कुछ समय पश्चात राष्ट्रीय महत्व की महत्वपूर्ण घटना घटी - बंगाल का विभाजन। चूँकि अखबार का कार्य करते हुए भारती लगातार राष्ट्रीय नेताओं के विचारों तथा शासन के प्रति उनकी प्रतिरोध प्रतिक्रियाओं से परिचित हो चुके थे। युवा  भारती अपने विद्रोही स्वभाव के अनुकूल तिलक से बेहद प्रभावित थे। भारती की प्रथम राष्ट्रीय कविता 'बंगमे वाळिय' शीर्षक से है। जैसा कि पूर्वोक्त है, भारती की राष्ट्रीय चेतना को भड़काने वाली घटना बंगाल का विभाजन थी। बंगाल के विभाजन के खिलाफ वहाँ पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, पहली बार भारतीय जन अपने भीतर एकदेशीयता का भाव महसूस कर रहे थे। भारत में पहले-पहल आधुनिक चेतना बंगाल में आयी थी। सुब्रह्मण्य भारती इसका कारण अंग्रेजी राज्य को न मानकर बंगाल की जनता की मेधा को मानते थे। भारती बंगाल की चेतनता को भारत के लिए गर्व का कारण मानते हैं -

 

"माता के मन को हितकारी यही प्रीतिकर

बनते गौरवगान पुत्र जब उसके यशधर

ऐसा तुमने दिया (बिगुल) मंगलमयकारी

इस भू तल पर छा जाए यश-कीर्ति तुम्हारी।।"[5]

 

राष्ट्रीय चेतनता के लिए भारती ने 'वंदे मातरम' को एक मंत्र के रूप में स्वीकार किया था। भारती ने 'वंदे मातरम' का तमिल में अनुवाद प्रस्तुत किया इसके अलावा वंदे मातरम नाम से अन्य कविताएँ भी लिखी। 'वंदे मातरम' क्रांतिकारी आंदोलन के लिए भावनात्मक महत्व रखता था। हालाँकि बाद में इसका सांप्रदायीकरण हो गया। परंतु भारती के लिए इस गीत का महत्व इस प्रकार था।

 

"आर्य भूमि विख्यात हमारी भारत - माता

उस पर प्रेम-लता को लखा तनिक कुम्हलाता

जीवन-दान उसे करने के लिए(निरंतर)

वर्षा-सम है यह 'वंदे मातरम' गीत - स्वर"[6]

 

भारती 'वंदे मातरम' की संज्ञा बालसूर्य से देते हैं जो कि तमाम तिमिर का नाशकारक है। भारती इस नारे का प्रभाव जानते थे, क्योंकि बीसवीं सदी के आरंभ में अंग्रेजों को तिलमिलाने के लिए यह नारा लगाना ही काफी था।

 

भारती अपनी कविता 'वंदे मादरम् - 1' भारती के संपूर्ण जनता से वंदे मातरम गाने का आह्वान करते हैं। भारती महसूस करते हैं कि भारतीय जनता की गुलामी का कारण उनकी आपसी फूट तथा ऊँच-नीच की भावना है। इसी का फायदा उठाकर अंग्रेज़ों ने अपना राज्य स्थापित किया है। भारती संपूर्ण जनता को आपसी भेद भुलाकर स्वतंत्रता की ओर बढ़ने की सलाह देते हैं। 'वंदे मादरम्-2' कविता में भारती भारतीय जनता के तेजस्वी गुणों को बखानते हुए उनसे 'वंदे मातरम' गाने को कहते हैं। वस्तुतः वंदे मातरम पर भारती का जोर इसलिए था कि इस गान में भारतीयों को आपस में जोड़ने की अद्भुत शक्ति थी, साथ ही अंग्रेजी हुकुमत को तिलमिलाने का गुण भी था। इसी कारण से भारती इसे जातीय गीत की संज्ञा देते हैं। भारती ने इसके दो तमिळ अनुवाद प्रस्तुत किए, जिनमें एक अहवल छंद में है। इस गीत के अनुवाद की आवश्यकता भारती को इस कारण प्रतीत हुई क्योंकि भारती का सरोकार सामान्य तमिळ जनता से था और वे वंदे मातरम का मूल समझ पाने में भाषाई कारणों से अक्षम थे। भारती ने इस कारण सरल तमिळ में गाए जा सकने योग्य छंदों में इसका अनुवाद प्रस्तुत किया।

 

 भारती की राष्ट्रीय  कविताओं की विषय - वस्तु भारत देश की पराधीन स्थिति, उसके पूर्व के गौरव तथा उसके आगामी भविष्य में पुनः श्रेष्ठ होने के भावों से युत हैं। इन कविताओं में भारत नाम मात्र को विभिन्न दुखों का भंजक तथा उत्साह प्रदान करने वाला कहा है। भारती 'बारद नाडु' कविता में कहते हैं -

 

"मंजु मुकुट मणि सब देशों में भारतवर्ष हमारा है

आन(बान) में ज्ञान-ध्यान में, मान में श्रेष्ठ यही

अन्न दान में, सुधा सरीखे काव्य, गान में श्रेष्ठ यही है।"[7]

 

भारती भारत की श्रेष्ठता प्रतिपादित कर रहे थे, क्योंकि भारत को गुलाम बनाने के लिए अंग्रेज़ों ने प्रथमतः भारतीयों के मन में हीन भावना भरी थी। भारत को सपेरों-लूटरों का देश कहा गया। भारती अंग्रेज़ों को उन्हीं के हथियार से मात देना चाहते थे। भारतीयों के मन में अपनी धरती, अपने लोगों की श्रेष्ठता के एहसास को जगाकर भारत जो कि अनेक रियासतों में बँटा था उसे एक देश के रूप में दिखाना चाहते थे। भारतीय राष्ट्रीय एकता में भारती का 'बारद देशम' गीत अनन्य हैं। भारती ने इस दावे को एक गीत से खारिज कर दिया जो कहता था कि अंग्रेज़ों के आने से पूर्व भारत में राष्ट्रीयता नहीं थी।भारती भारतीय जनों की एकता इस रूप में देखते हैं -

 

"(कलकल-छलछल बहती सुंदर) सिंधु नदी लहराती हो

(चारु चंद्र की चपल) चाँदनी (जल-थल) में मुस्काती हो

मलवारी तरुणी, नावों पर गीत तेलुगु गाती हों

बैठे नाव पर विचरें चौदिक् एक राष्ट्र छवि छा ती हो।"[8]

 

भारती की उपर्युक्त कल्पना आगामी भविष्य के लिए है। और भारती केवल यहीं नहीं रुकते बल्कि वे भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक एकता के लिए भी यत्न करते हैं।भारती के पिता चिन्नास्वामी अय्यर यथार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाले थे। वे चाहते थे कि भारती वैज्ञानिक बने। पिता की सख्ती भारती के उन्मुक्त व्यक्तित्व को नियंत्रित नहीं कर पायी बल्कि उसे और बढ़ा दिया।भारती के व्यक्तित्व में विकसित यह उन्मुक्तता उनकी स्वतंत्र दृष्टि और क्रांतिकारी समझ के रुप में परिणत हुई। हालाँकि पिता के यथार्थवादी दृष्टिकोण ने भारती को यह समझाया कि किसी भी देश का विकास बिना उद्योगों के नहीं हो सकता और उद्योगों के लिये मशीनों का ज्ञान होना आवश्यक है। भारती ने अपनी कविता में देश में औद्योगिक शालाओं के खुलने का स्वप्न देखा, भारत को उत्पादन के स्तर पर आत्मनिर्भर बनाने का स्वप्न देखा। यहाँ तक कि टेलिविज़न और चाँद पर जाने तक की कल्पना भी की। यह मात्र कोरी कल्पनायें नहीं थी बल्कि इसके पीछे पिता चिन्नास्वामी अय्यर द्वारा दी गयी समझ थी।भारती के प्रगतिशील व्यक्तित्व का यह अभिन्न हिस्सा बन गयी। उस समय तक उद्योगों की समझ रखने वाले तथा भारतीय स्वतंत्रता के लिये इसे आवश्यक समझने वाले राष्ट्रीय नेताओं की कमी थी।

 

इस क्रम में भारती द्वारा तमिळ प्रदेश, तमिळ भाषा आदि पर भी गीत लिखे गए। इन गीतों से यह धारणा नहीं बनानी चाहिए कि भारती क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे थे। बल्कि यह गीत भारती की राष्ट्रीय चेतना के अनुषंगी उत्पाद थे। व्यक्ति जब तक अपनी जन्मभूमि के लिए प्रेम का भाव विकसित नहीं कर लेता तब तक उसके लिए एक राष्ट्र का नागरिक होना असंभव है। भारती इस स्थिति को जानते थे। साथ ही वे इस तथ्य से भी परिचित थे कि एक बड़ी तस्वीर कई छोटी तस्वीरों से मिलकर पूरी होती है। भारतीयता की भावना के लिए तमिळ जनता में अपने क्षेत्र के प्रति भी आदर का भाव होना चाहिए।

 

सुब्रह्मण्य भारती ने 'शेन्दमिळ नाडु' कविता में तमिळ प्रदेश का सावयव रूप उपस्थित किया है। ऐसा प्रदेश जो प्राकृतिक - सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ स्थिति का हो। जिसका व्यापार चीन मिस्र आदि देशों तक फैला हो। उस प्रदेश का नाम लेते भारती का मन प्रमुदित हो जाता है।

  

"तमिलनाडु यह नाम घोलता सुधा हमारे कानों में

पितृ देश - यह नाम शक्ति भरता साँसों में।"[9]

 

परंतु भारती इस तमाम प्राचीन वैभव के बीच वर्तमान तमिळनाडु की स्थिति को भूलते नहीं है। समय की गति श्रेष्ठतमा वस्तु का भी क्षरण कर देती है भारती इस तथ्य से परिचित थे।

 

"यम अंधा है, भले-बुरे का भेद नहीं लख पाता है

कर देता है अंत सभी का(अंतक वह कहलाता है)

वन्यनदी की बाढ़ बहा ले जाती ज्यों पुर-वन-उपवन

उसी भाँति हर लेता यम भी जग के जन-जन का जीवन"[10]

 

भारती रूढ़ियों में बँधी भाषा को देखते हैं। वे 'तमिळ्त् ताय् ' के माध्यम से जनता से भावुक अपील करते हैं कि विश्व के संपूर्ण ज्ञान विज्ञान को इस भाषा में समो लो। क्योंकि इस भाषा के समान प्राचीन और मधुर अन्य कोई भी भाषा जीवित नहीं है।

भारती तमिळ जनों को उनके श्रेष्ठ पूर्वजों की याद दिलवाकर कर्म करने के लिए उत्तेजित करते हैं।

 

"अन्य देश के श्रेष्ठ ग्रंथ ले तामिळ में अनुवाद करो

नूतन श्रेष्ठ अमर ग्रंथों से तामिळ का भंडार भरो।

ज्ञान पुरातन औ नितनूतन, सब जिसका लोहा मानें

नत मस्तक हो"[11]

 

भारती इसी ढंग से सृजनात्मक प्रयासों द्वारा तमिळ भाषा तथा तमिळ जाति की जीवंतता लगातार करना चाहते हैं, क्योंकि भाषा और समाज अन्योन्याश्रित है। जब तक एक है दूसरे का भी अस्तित्व है। 'वाळिय शेन्दमिळ' कविता में भारती आशा करते हैं कि सबके प्रयास सफल हों और भारत में तमिळ उन्नति को प्राप्त करें।

 

सम्पूर्ण भारती साहित्य की विशिष्ट रचनाएँ भारती की स्वतंत्रता पर लिखी गयी कविताएँ हैं| इन कविताओं की रचना उस समय हुई थी जब भारत में स्वतंत्र होने की भावना का उदय भी नहीं हुआ था| तिलक ने जरूर स्वतंत्रता के आधिकार की बात कही थी , परंतु वह भी राजनैतिक स्वतंत्रता से ज्यादा नहीं थी| भारती ने स्वतन्त्रता को आधुनिक व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता के रूप निरूपित किया| स्वतंत्रता के बदले में किसी भी क्षुद्र भौतिक सुख को लेने को भारती सूर्य के बदलें में जुगनू लेने  जैसा मानते है| स्वतंत्रता की व्यक्ति जीवन में महत्व को भारती की निम्न पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं –

 

“पार्थिव सुख के बदले कोई स्वतंत्रता क्या दे देगा?

कौन मूर्ख , दृग बेच ,चित्र लेकर उपहास खरीदेगा?”[12]

 

इस कविता में वर्णित स्वतंत्रता को केवल राजनैतिक स्वतंत्रता तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए| यह मान की सर्वांगीण स्वातंत्र्य की उद्घोषक पंक्तियाँ हैं|

 

भारती की सामने उस समय बड़ा प्रश्न उपनिवेशी गुलामी को तोड़ना था क्योंकि उसके बाद ही व्यक्ति अन्य बन्धनों से मुक्ति पा सकता है| भारती इसीलिए मृत्यु से पहले स्वतंत्र देश में जीने की इच्छा रखते हैं|

 

“यदि है सच्चा धर्म ,आप भी सच्चे हैं(हे परमेश्वर)

तो मरने से पहले दे दें (स्वतंत्रता का सुन्दर) वर”[13]

 

स्वतंत्रता विषयक अन्य कविताओं में भारती की ‘स्वतंत्रता का पौधा’, ‘स्वतंत्रता की प्यास’, ‘स्वतंत्रता देवी की स्तुति’, ‘विदुडलै’ प्रमुख हैं|

 

इन राष्ट्रीय उद्बोधनों के अलावा भारती ने कई राष्ट्रीय नायकों से संबंधित कविताएँ भी लिखी जिनका भारतीय राष्ट्रीयता से सीधा संबंध रहा हो| इनमें तिलक, गोखले, गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी आदि पर लिखी कविताएँ प्रमुख हैं|इन कविताओं का महत्व राष्ट्रीय आन्दोलन के सापेक्ष ही है, क्योंकि भारती ने बिना किसी भेद के हर राष्ट्रीय नेता के अवदान को साहित्यिक पुरस्कार दिया है| इन कविताओं में विवेचना के योग्य भगिना निवेदिता पर लिखी कविता है| यह कविता मूल रूप से ‘सूयचरितै’ की भूमिका में थी, परंतु बाद में इसे ‘शानरोर’ में शामिल कर दिया गया|

 

भारती निवेदिता को गुरुमणि कहा करते थे,तथा  अपने आरंभिक चार ग्रन्थ भारती ने भगिनी निवेदिता को ही समर्पित किए|अपने प्रथम संग्रह के सर्पण में भारती लिखते है – “जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दरसाकर परमात्मस्वरूप को स्पष्ट किया था, उसी प्रकार मुझे भारत माता के सम्पूर्ण स्वरूप का दर्शन कराके  देशभक्ति ला प्रेरक उपदेश देकर अनुगृहित करनेवाले गुरूजी के चरण-कमलों में मैं अपने इस छोटे – से ग्रन्थ को समर्पित करता हूँ|”[14]

 

कविता में भारती ने निवेदिता के चरित्र को स्पष्ट किया है| भारती निवेदिता को प्रेम का मंदिर कहते हैं ,साथ ही अपने मन के अंधकार को नष्ट करने वाले सूर्य के समान मानते| मन में किस तरह का अंधकार था इसपर विचार किया जाये तो भारती की निवेदिता से भेंट का स्मरण करना मानत| भारती निवेदिता से मिलने तक राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रविष्ट तो हो गए थे परंतु अभी रूढ़ियों से उनका पीछा छोटा नहीं था| निवेदिता के उपदेश के बाद भारती के सामने लक्ष्य स्पष्ट हो गया| इन कारणों से इस कविता का अपना महत्व  है|भारती की कविताएँ राष्ट्रीय चेतना को मुख्य रूप से अभिव्यक्त करती दिखती हैं| उसी अनुरूप भाषा तथा काव्य युक्तियों का प्रयोग भी भारती करते हैं जिसे सामान्य व्यक्ति भी आसानी से समझ सके| भारती के इस काल के साहित्य का महत्तम उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता ही रहा|

 

मात्र उनतालीस वर्ष की उम्र में सुब्रह्मण्य भारती ने दिनांक सितंबर 12,1921 को महाप्रस्थान किया।[15] आज मृत्यु के सौ साल बाद भी उनका साहित्य भारती की कीर्ति चतुर्दिक फैला रहा है।


निष्कर्ष :

 

सुब्रह्मण्य भारती से पूर्व भारतीय साहित्य में स्वातंत्र्य चेतना का अभाव था, भारती ने अपनी आवेगमयी शैली तथा चतुर युक्तियों से अखिल भारतीयता के निर्माण में महती योगदान दिया। भारती के साहित्य में स्वातंत्र्य एक आदर्श के रूप में आया जिसको उन्होंने व्यक्ति की मूलभूत आवश्यक के रूप में प्रतिपादित किया। स्वतंत्रता संग्राम के लिए भारती का साहित्य ध्रुव नक्षत्र के समान था जिसने आम जन को स्वतंत्रता की राह हर अंधकार में इंगित की।सुब्रह्मण्य भारती के साहित्य का महतम अवदान उत्तर और दक्षिण के बीच के सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में है, जिससे बंग-भंग जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हुई।

 

संदर्भ :

 


[1]J.B.P More : SubramaniaBharathi In British And French India(2017), Palaniappa Brothers, Chennai Page- 140,

[2]रविन्द्र कुमार सेठ : सुब्रह्मण्य भारती, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पृ. – 01

[3]MathuramBhoothalingam : The Finger On The Lute (2012), NCERT ,Delhi, Page-09

[4]रा.अ.पद्मनाभन : सुब्रह्मण्यम् भारती(2012), नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया,दिल्ली पृ. - ,

[5]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ, पृ. -1087

[6]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ,पृ. -1087

[7]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ, पृ. – 46

[8]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ पृ. -43

[9]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ पृ. -66

[10]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट ,लखनऊ पृ. -103

[11]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ पृ. -104

[12]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ पृ. -119

[13]आचार्य ति. शेषाद्रि और आचार्य रामेश्वर प्रसाद पाण्डेय: भारदियार् कविदैहळ् (1985), भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ पृ. -121

[14]टी.एम.सी. रघुनाथन् : सुब्रह्मण्य भारती युग और चिंतन(1997), साहित्य अकादमी, नयीदिल्ली,पृ.-12

[15]रविन्द्र कुमार सेठ : सुब्रह्मण्य भारती, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पृ. –42

 

संजय दान

शोधार्थी हिंदी विभाग, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

sanjaydeval3@gmail.com, 8696235959


  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-38, अक्टूबर-दिसंबर 2021, चित्रांकन : गूगल

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