आलेख : शिक्षा में मीडिया की चुनौतियाँ / डॉ. मनीषा वाधवा

शिक्षा में मीडिया की चुनौतियाँ

- डॉ. मनीषा वाधवा


शिक्षा से अभिप्राय :

शिक्षा मानव-विकास की आधारशिला है। यह मनुष्य के जीवन को सार्थक  बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। भारत की तरह विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में शिक्षा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। अरस्तू ने कहा था- “शिक्षित व्यक्ति अशिक्षित व्यक्तियों से उतने ही श्रेष्ठ माने जाते हैं जितने जीवित मृतकों से शिक्षा मनुष्य के मस्तिष्क में अदृश्य रुप से विद्यमान संसार के सर्वमान्य विचारों को प्रकाश में लाती है। इससे बालक की आंतरिक शक्तियाँ प्रकट होती हैं। यह मानव का पूर्ण विकास करती है। यह मनुष्य का वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होती है। शिक्षा मनुष्य को वह सब सिखाती है जो उसे नहीं आता। पेस्टालाजी ने कहा है, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, संतुलित और प्रगतिशील विकास है जॉन डीवी ने लिखा है, “शिक्षा व्यक्ति की उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने वातावरण को नियंत्रित करने अपनी संभावनाओं को पूरा करने की योग्यता प्रदान करती हैं स्वामी विवेकानंद के अनुसार- “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही स्थित पूर्णता की अभिव्यक्ति है अरविन्द घोष के अनुसार- “शिक्षा का कार्य आत्मा का विकास करना है गांधी जी के अनुसार- “शिक्षा बालक या व्यक्ति के शरीर, बुद्धि और आत्मा की योग्यताओं का सर्वोत्तम विकास है उपर्युक्त विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा की प्रक्रिया, जन्म से मृत्युपर्यंत जारी रहती है। प्रस्तुत लेख में बालकों, किशोरों एवं युवाओं को विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा को ही आधार बनाया गया है। परंतु गत डेढ़ वर्षसे भी अधिक समय से कोरोना महामारी के कारण घर ही विद्यालय बने हुए हैं। अत: इस लेख में उनकी उपेक्षा करना भी असंभव-सा प्रतीत हो रहा है।

मीडिया और मास मीडिया :

मीडियाका अर्थ है- माध्यम, संचार का माध्यम; अर्थात् किसी सूचना या जानकारी को दूसरों तक पहुँचाना। लेकिन आजसंचारशब्द अंग्रेजी के कम्यूनिकेशनका हिंदी रूपांतरण है तथा यह एक तकनीकी शब्द बन गया है।   इसका प्रयोग विचारों को फैलाने, बढ़ाने तथा आदान-प्रदान करने के लिए किया जाता है। आज की स्थिति में इसके अंतर्गत अनुभवों, विचारों, संदेशों, धारणाओं, दृष्टिकोण, अभिमतों, सूचनाओं, ज्ञान आदि का आदान-प्रदान निहित है। विचार  मौखिक, लिखित सांकेतिक इत्यादि किसी भी रूप में क्यों हों; संदेश का अर्थपूर्ण होना इसकी अनिवार्यता है। यह प्रक्रिया देखने में जितनी सरल प्रतीत होती है उतनी सरल नहीं है। इसमें हमारे उच्चारण से लेकर अनेक मशीनों तक का प्रयोग किया जाता है। डॅा हरिमोहन ने कहा है– “संचार एक जटिल प्रक्रिया का परिणाम है जिससे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच अथवा एक व्यक्ति-समूह से दूसरे व्यक्ति-समूह के बीच अर्थपूर्ण संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता है। ये संदेश भेजने वालों और संदेश पाने वालों के बीच एक समझदारी साझेदारी बनाते हैं

संचार का क्षेत्र जब दो व्यक्तियों तक सीमित है तब उसे संचार माध्यम कहते हैं। किन्तु जैसे ही उसमें दो से अधिक व्यक्तियों की भागीदारी हो जाती है तब वह संचार माध्यम रहकरजनसंचार माध्यमअर्थात्मास मीडियाकहलाता है। मीडिया के माध्यम से दी जाने वाली सूचनाओं को वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, मनोरंजनात्मक इत्यादि रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

संचार ने हमारे जीवन को बहुत सुविधाजनक और तेज बना दिया है। हमें संसार में जहाँ-जहाँ भी बदलाव दिखाई पड़ता है, समझ लो कि वहाँ संचार विद्यमान है। अत: यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि संचार के बिना हमारे जीवन और समाज की कल्पना तक नहीं की जा सकती। हम सभी संचार करते हैं। कभी किसी महापुरुष के प्रवचन के दौरान वक्ता और श्रोता के रूप में हमारा संबंध बन जाता है तो कभी कक्षा में शिक्षक का लेक्चर सुनते समय भी हम संचार से जुड़ते हैं। पत्र, -मेल, समाचारपत्र आदि पढ़ते हुए, रेडियो आदि सुनते हुए तथा टी. वी. आदि देखते हुए हम व्यापक स्तर पर संचार प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। हम सड़क पार करते समय लाइट के संकेतों को देखते हैं, हॉर्न और लाउडस्पीकर आदि द्वारा प्रसारित सूचनाओं को सुनते हैं तब भी हम संचार से जुड़े होते हैं। अर्थात् संचार का क्षेत्र बहुत व्यापक है। हम इसकी परिधि से बाहर नहीं रह सकते। समाज का प्रत्येक सदस्य संचाररत है। हमारे आस-पास संचार का दृश्य/ प्रपंच चलता ही रहता है। सभी व्यक्ति सचेत या अचेत रूप से संचार में संलग्न रहते हैं; अर्थात् संचार संलग्नता हमारे सजीव होने का सबूत है।

शिक्षा और मीडिया एक दूसरे के साध्य एवं साधन के रूप में :

सम्प्रेषण में दो या दो से अधिक व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों को विचारों तथा भावों के आदान-प्रदान का अवसर मिलता है। इसमें शिक्षक और शिक्षार्थी की अंत:क्रिया से शिक्षार्थी के ज्ञान में वृद्धि होती है। इसमें संदेश-प्रेषक तथा संदेश प्राप्तकर्ता एक-दूसरे को भली-भाँति समझ समझा पाते हैं। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक एकस्रोतके रूप में कार्य करता है। पढ़ाया जाने वाला पाठ, विषय-वस्तु, तथ्य, सूचनाएँ आदिसम्प्रेषण सामग्रीहोती है। शिक्षक द्वारा अपनाई गई शिक्षण-विधियाँ, गतिविधियाँ, रणनीतियाँ, सहायक सामग्री, भाषा आदि शिक्षण का माध्यम (साधन) होते हैं। शिक्षार्थी प्राप्तकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। शिक्षार्थियों से प्राप्त अनुक्रिया से ही यह ज्ञात होता है कि शिक्षक का सम्प्रेषण कितना सफल रहा।

यहाँ इस बात का स्पष्टीकरण भी आवश्यक है कि किसी स्तर पर शिक्षा साधन और मीडिया उपकरण साध्य हो सकते हैं; उदाहरणार्थ- किसी इंजीनियारिंग संस्थान में कंप्यूटर की शिक्षा दी जा रही हो तो वहाँ कंप्यूटर का ज्ञान देना साध्य है तथा उस ज्ञान को देने के लिए प्रयुक्त हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषा साधन रूप हैं। लेकिन जब हम विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र आदि पढ़ाते है तो मीडिया-उपकरण साधन का काम करते हैं। इसके विपरीत, जब हम हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषा पढ़ाते हैं तो वहाँ भाषा साध्य है तथा रेडियो, कंप्यूटर आदि साधन हैं। भाषा के बहुत-से पाठों में उस पाठ की विषय-वस्तु भी साधन हो सकती है। उदाहरणार्थ- मान लो कि हम हिन्दी मेंनीमका पाठ पढ़ा रहे हैं तो वहाँ नीम का परिचय देना मुख्य उद्देश्य नहीं है। शब्दार्थ, व्याकरण पक्ष, भाषिक तत्त्वों का ज्ञान पाठ के मुख्य उद्देश्य हैं। इस स्थिति में पाठ की विषय-वस्तु भी साधन ही है।   

प्रस्तुत लेख में इस बात पर विचार किया गया है कि शिक्षा में संचार एवं जन-संचार माध्यम (मीडिया और मास मीडिया) किस प्रकार की चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है।

शिक्षा में जन-संचार माध्यम :

जब मीडिया नहीं था तब भी सूचनाओं का एकत्रीकरण तथा स्थानांतरण होता था। प्राचीन काल में मौखिक रूप में, मस्तिष्क में स्मृति के रूप में इनका एकत्रीकरण और उसके बाद स्थानांतरण किया जाता था। इसी कारण वेदों का  ‘श्रुतिनाम पड़ा। लेखनकला इस दिशा में सर्वप्रथम प्रयास था। कागज, स्याही और लेखनी का आविष्कार सम्प्रेषण एवं सूचना तकनीकी के विकास की दिशा में मील का पत्थर माना जाता है। जब 1438 ईस्वी में जर्मनी केगुटेनबर्गद्वारा प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार किया गया, इसके बाद आगे के अध्याय तब जुड़ने शुरु हुए जब एक-एक करके फोटोग्राफी, फोटोस्टेट, कंप्यूटर, लेजर प्रिंटिंग मोबाइल, इंटरनेट इत्यादि का अस्तित्व सामने आया।

कंप्यूटर, मोबाइल-फोन और इंटरनेट के युग से पहले शिक्षण में दृश्य-श्रव्य साधनों के उपयोग पर ही बल दिया जाता था। जिनमें पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, ग्रामोफोन, टेपरिकार्डर, टी. वी., चलचित्र, मॉडल, चार्ट आदि का उपयोग बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता था। इन साधनों के उपयोग से शिक्षण को रोचक बनाने, पाठ में छात्रों की सक्रियता बढ़ाने, छात्रों को सीखने के लिए प्रेरित करने, उनकी ग्रहणशीलता बढ़ाने तथा ज्ञान को स्थायी बनाने में शिक्षक को मदद मिलती थी। प्रो. पी. जे. रुलोन ने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग करके पढ़ाए गए पाठ से, शिक्षार्थी सामान्य प्रक्रिया से पढ़ाए गए पाठ की अपेक्षा 38 प्रतिशत अधिक याद रख सकता है। प्रो. डब्ल्यू. डब्ल्यू. चार्टर का कथन है कि चलचित्र आदि के प्रयोग से शिक्षार्थी छह सप्ताह तक भी 90 प्रतिशत बातें याद रख सकता है।

सामान्यत: सूचना को व्यापक स्तर पर समाज तक फैलाने अथवा कहें कि प्रसारित करने अथवा कक्षा को पढ़ाने की दृष्टि से संचार माध्यमों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है()शब्द संचार माध्यम अथवा मुद्रण माध्यम- समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें, पोस्टर, पम्फ्लैट आदि।

अपने विशाल दर्शक-वर्ग और तीव्र-गति के कारण रेडियो, दूरदर्शन कंप्यूटर की ताकत भले ही ज्यादा हो, लेकिन वाणी को शब्दों के रूप में रिकार्ड करने वाला आरंभिक माध्यम होने के कारण पत्र-पत्रिकाओं(प्रिंट मीडिया) का महत्त्व किसी भी स्थिति में कम नहीं आँका जा सकता। समाचारपत्र संसार का दर्पण है। यह देश-विदेश की घटनाओं की जानकारी देता है। इसे लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ माना जाता है। यह ज्ञानवर्धन का सबसे सस्ता, सरल और प्रमुख साधन है। दैनिक समाचार-पत्र नवीनतम दैनिक समाचारों का दस्तावेज हैं। प्रारंभिक दिनों में केवल पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाचारों का आदान-प्रदान होता था। स्वतंत्रता आंदोलन में इनका बड़ा योगदान रहा। इनके कारण ही समाज में जागृति आई।                                                             

पत्रिकाएँ साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक आदि के रूप में प्रकाशित होती हैं। ये विषय-विशेष के रूप को उजागर करती हैं। ये साहित्यिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि क्षेत्रों में विशिष्ट ज्ञानवर्धक सामग्री प्रस्तुत करती हैं। इसीलिए स्कूल-कालेजों के पुस्तकालयों में पत्र-पत्रिकाओं की व्यवस्था की जाती है। अत: किसी ने ठीक ही कहा है-      

इस अँधियारे विश्व में, दीपक हैं अखबार

सुपथ दिखावें आपको, आँखें करते हैं चार।।

वर्तमान शिक्षा पद्धति मेंपाठ्य-पुस्तकका महत्त्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा के क्षेत्र में यह सबसे पुराना तथा मितव्ययी उपकरण है। बहुत समय तक शिक्षक के पास केवल यही एकमात्र साधन था। पाठ्य-पुस्तक एक कक्षा विशेष के लिए बनी होती है। इसमें वे सभी बातें होती हैं जो उस कक्षा-विशेष के लिए आवश्यक होती हैं। शिक्षा का कोई भी स्तर ऐसा नहीं, जहाँ पाठ्य-पुस्तक का प्रचलन हो। कोई भी ऐसा विषय नहीं जिसमें पाठ्य-पुस्तक की आवश्यकता अनुभव की जाती हो। ये शिक्षा को सुबोध बनाने, अधिक संख्या में छात्रों को एक साथ पढ़ाने, उनका मार्गदर्शन करने तथा कुशल शिक्षण में सहायक होती हैं। शिक्षण का सशक्त साधन होने के साथ-साथ ये शिक्षण को रुचिकर भी बनाती हैं। ये मौलिक चिंतन के लिए प्रेरक का काम करती हैं। ये छात्रों के स्वाध्याय-विकास में सहायक होती हैं तथा छात्रों को स्वाध्याय के लिए प्रेरित भी करती हैं ये ज्ञान के साथ-साथ बच्चों के मनोरंजन का ध्यान भी रखती हैं तथा  विषय से संबंधित विभिन्न तत्त्वों में संतुलन बनाकर रखती हैं। इनमें विषय-वस्तु के स्पष्टीकरण हेतु यथास्थान चित्र-योजना, संदर्भों की व्याख्या तथा व्यापक अभ्यास भी होते हैं।

() इलेक्ट्रॉनिक माध्यम- केवल श्रव्य माध्यम- रेडियो, ऑडियो कैसेट - रेडियो एक श्रव्य उपकरण है। यह उपकरण रेडियो स्टेशन से प्रसारित ध्वनि तरंगों को, उसी समय, पकड़कर सभी स्थानों पर, एक ही साथ प्रतिध्वनित करने की क्षमता रखता है। रेडियो-कार्यक्रम छात्रों के पाठ्य-क्रम पर आधारित होते हैं। आकाशवाणी के कार्यक्रमों को विद्यालय की समयसारिणी में भी स्थान दिया जाता है। शिक्षक कार्यक्रमों की पूर्व जानकारी प्राप्त कर छात्रों को सुनने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

छात्रोपयोगी ऑडियो कैसेट लाकर भी छात्रों को सुनाए जाते हैं। इनके माध्यम से उच्चारण की शुद्धता आदि का अभ्यास भी कराया जा सकता है। शिक्षक छात्रों की ध्वनियों को रिकार्ड करके उन्हें उनकी अशुद्धियों के प्रति सचेत कर सकता है। 

श्रव्य-दृश्य माध्यम-टेलीविजन, फिल्म, वीडियो कैसेट, सी. डी. - दूरदर्शन एक दृश्य-श्रव्य साधन है। यह रेडियो का अत्यंत विकसित रूप है तथा उससे अधिक सशक्त और प्रभावशाली है। इसमें ध्वनि और प्रकाश की तरंगों को इस प्रकार नियंत्रित किया जाता है कि दोनों एक ही साथ सुनाई और दिखाई पड़ें। दूरदर्शन में रेडियो और चलचित्र दोनों की विशेषताएँ हैं। इससे विद्यार्थियों की कर्णेन्द्रिय और नेत्रेन्द्रिय दोनों सक्रिय रहती हैं। दूरदर्शन के द्वारा वक्ता के हाव-भाव, वार्तालाप और अभिनय करने का ढंग, भाषण की शैली, कविता पाठ आदि  की विधि को विद्यार्थी अपनी आँखों से देखते हैं। इसके द्वारा सर्वश्रेष्ठ अध्यापकों की सेवाएँ सभी छात्रों को मिल जाती हैं। विद्यार्थियों के लिए दूरदर्शन पर नियमित कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।

टेलीविजन द्वारा विभिन्न स्तरों पर कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है। स्वयम् प्रभा केभारतचैनल पर प्रतिदिन चौबीस घंटे शैक्षिक कार्यक्रम दिखाए जाते हैं।वागीशचैनल पर भाषा साहित्य, ‘संस्कृतिचैनल पर भारतीय इतिहास, संस्कृति और दर्शन के कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों से स्नातक स्तर के शिक्षार्थी लाभ उठा रहे हैं। इसी प्रकार के कार्यक्रमविद्यालयी शिक्षाके लिएराष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्औरशिक्षक शिक्षा हेतु’, ‘इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालयऔर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान (एन.आई..एस.) चला रहे हैं। इन सभी कार्यक्रमों केयूट्यूबलिंक भी उपलब्ध होते हैं जिससे विद्यार्थी समय और सुविधानुसार इन कार्यक्रमों को देख सकें। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार उच्च शिक्षा में 2018 में सकल नामांकन अनुपात(जी..आर.) 26.3 प्रतिशत था जिसे 2035 तक बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह तभी संभव है जब शिक्षा के प्रसार में मीडिया का इस्तेमाल किया जाए।        

दूरदर्शन की भाँति चलचित्र भी एक आधुनिक श्रव्य-दृश्य साधन है। यह  मूकचित्र का विकसित रूप है। यह वर्तमान युग का एक जनप्रिय आविष्कार है।  लेकिन आज इसका उद्देश्य शिक्षा की अपेक्षा धन कमाना अधिक हो गया है। वीडियो कैसेट तथा सी. डी., दूरदर्शन और चलचित्र दोनों के कार्य कर सकते हैँ। शिक्षा विभाग शिक्षण के उद्देश्यों को सम्मुख रखकर अच्छी लघु फिल्में तैयार करा सकता है। विभाग के द्वारा छात्रों को उपयोगी कार्यक्रम रिकार्ड करके दिखाए जा सकते हैं। फिल्म दिखाने के बाद उस पर छात्रों के साथ उचित विचार-विमर्श किया जा सकता है।

() नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम-श्रव्य एवं दृश्य माध्यम- कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट आदि -

आज शिक्षा-जगत में अनुदेशन प्रक्रिया को सशक्त और सार्थक बनाने के लिए कंप्यूटर अत्यधिक आधुनिक साधन है। कक्षा-शिक्षण की दृष्टि से कंप्यूटर में पाठ्य-सामग्री को छोटी-छोटी इकाइयों में फीड कर दिया जाता है और फिर की-बोर्ड की सहायता से यह सामग्री क्रमबद्ध रूप से कंप्यूटर से जुड़े मॉनिटर अथवा दूरदर्शन पर जाती हैं। विद्यार्थी, अपनी जगह बैठे-बैठे, उसे देखने समझने का प्रयास करते हैं। कंप्यूटर के द्वारा सुदूर क्षेत्रों में बैठे अध्यापकों और विद्यार्थियों में नेट-वर्किग द्वारा भली-भाँति सम्प्रेषण के तार जुड़ जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में, अनुदेशनात्मक सामग्री उपलब्ध कराने में, कंप्यूटर सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। शिक्षा के क्षेत्र में इसकी लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।

आज मोबाइल में भी वे सभी विशेषताएँ गई जो कंप्यूटर में हैं। यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि इसमें कंप्यूटर वाली सारी विशेषताएँ तो हैं ही बल्कि उसके अतिरिक्त कुछ अन्य विशेषताएँ भी हैं। यह सस्ता और सर्वसुलभ साधन है। कोरोना काल में शिक्षा की सभी गतिविधियों का माध्यम मोबाइल ही रहा है।

इंटरनेट - सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जिस नवीनतम साधन ने क्रांति ला दी है, वह है- इंटरनेट। यह इस शताब्दी का मानवता को दिया गया सर्वश्रेष्ठ उपहार है। यह सूचना-क्रांति का संवाहक है। सही अर्थों में पूरी दुनिया को एक गाँव में इसी ने बदला है। रोचक बात तो यह है कि इंटरनेट अपने-आप में स्वतंत्र रूप से कोई आविष्कार नहीं है अपितु यह कंप्यूटर और टेलीफोन के व्यवस्थित गठजोड़ से बना एकसंजालहै; बहुत-सी प्रौद्योगिकियों को मिलाकर किया गया एक अभिनव प्रयोग है। यह एक रोचक वैज्ञानिक ग्लोबलतंत्र जालहै जिसमें सूचना, संचार और तकनीक का साझा उपयोग किया गया है। आज पूरा विश्व इसका उपयोग कर रहा है।

सूचना, आँकड़े, दस्तावेज आदि के आदान-प्रदान के लिए एक ही जगह कुछ कंप्यूटरों को एक-दूसरे के साथ जोड़ना इंटरनेट कहलाता है। ये सभी कंप्यूटर एक सर्वर (मुख्य कंप्यूटर) द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते से पैसे निकलता है तो यह सूचना उस बैंक के सभी कंप्यूटरों में उसी समय दर्ज हो जाएगी क्योंकि उस बैंक के सभी कंप्यूटर आपस में जुड़े हुए हैं। यह स्थानीय नेटवर्क हुआ। इसी तरह अनेकानेक नेटवर्कों तथा कंप्यूटरों को उपग्रह के माध्यम से पूरे विश्व में आपस में जोड़ दिया जाता है तो उस स्थिति में उस बैंक के संसार भर के सभी कंप्यूटरों में वह सूचना उसी समय दर्ज हो जाएगी। इस तरह यह स्थानीय नेटवर्क और विश्वव्यापी जाल (वर्ल्ड वाइड वेब) कहा जाता है। इसी का संक्षिप्त नाम है- डब्ल्यू. डब्ल्यू. डब्ल्यू.

इस तरह हम कह सकते हैं कि इंटरनेट बहुत सारे स्थानीय नेटवर्कों का नेटवर्क है; अर्थात्जालों का जाल’- ‘महाजाल इससे जुड़ने के लिए आवश्यकता होती है, एक कंप्यूटर और टेलीफोन की अथवा एक मोबाइल की; जिसमें कंप्यूटर और फोन दोनों हैं। बस आपको यह करना है कि इंटरनेट की सुविधा प्रदान करने वाली किसी कंपनी में कुछ पैसे जमा करके इंटरनेट का कनेक्शन लेना है और अपना खाता खुलवाना है। ध्यान रहे, इसकी गोपनीयता बनी रहे अन्यथा हमारे इंटरनेट कनेक्शन का दूसरे के हाथों में पड़कर गलत उपयोग हो सकता है। इंटरनेट के उपयोग के मुख्य क्षेत्र हैं- 1- -मेल, 2- चैटिंग(बातचीत, गपशप), 3--बैंकिंग, 4- -कॉमर्स, 5- प्रशासन, 6- -लर्निंग, 7- -स्कूलिंग

() सामाजिक जन-संचार माध्यम ( सोशल मीडिया) -

व्हाट्सएप्प, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब इंटरनेट पर उपलब्ध निश्शुल्क सामाजिक नेटवर्किंग सेवाएँ हैं। कोरोनाकाल से पहले तक तो अध्यापक इनके माध्यम से छात्रों को गृहकार्य देने का कार्य करते थे परंतु कोरोनाकाल में तो ये शिक्षा का मुख्य आधार बन गए। इनके माध्यम से विद्यार्थी अपने चित्र, फ़ोटो या अन्य जानकारी सार्वजनिक तौर पर या निजी तौर पर साझा करते हैं।   

व्हाट्सएप्प(WhatsApp) का अर्थ है- ‘क्या चल रहा है।यह एप्प संदेश भेजने काल करने की मुफ़्त सुविधा प्रदान करता है। इसे एस.एम.एस. की तरह ही संदेश भेजने के लिए शुरू किया गया था। परंतु अब इसके माध्यम से कई तरह का मीडिया; जैसे- टेक्स्ट, फ़ोटो, वीडियो, डॉक्यूमेंट, लोकेशन आदि को भी (भेजा जा सकता है। इससे वोइस-कॉल और वीडियो-कॉल भी की जा सकती हैं। इसमें किसी अकाउंट को ब्लॉक करने की सुविधा भी है। यह कोरोनाकाल में शिक्षकों तथा छात्रों के परस्पर संवाद का माध्यम बना रहा।

फ़ेसबुक(Facebook)- इंटरनेट पर स्थित एक निश्शुल्क सामाजिक नेटवर्किंग सेवा है। जिसके माध्यम से इसके सदस्य अपने मित्रों, परिवार और परिचितों के साथ सम्पर्क रख सकते हैं। फ़ेसबुक से आप अपने मुताबिक न्यूज, ब्लॉग या अन्य किसी भी टॉपिक की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। यह एक छोटा तेज एप्प है और हर डिवाइस या नेटवर्क पर चलता है।

इंस्टाग्राम(Instagram)- एक सोशल मीडिया एप्प है। यह मोबाइल, डेस्कटॉप और इंटरनेट आधारित फोटो साझाकरण एप्लिकेशन है जो उपयोगकर्ताओं को फ़ोटो या वीडियो को सार्वजनिक रूप से या निजी तौर पर साझा करने की अनुमति देता है। 

यूट्यूब(YouTube)- यह वीडियो देखने का एक प्लेटफ़ॉर्म है। जिस पर पंजीकृत सदस्य वीडियो क्लिप देखने और अपने असीमित वीडियो अपलोड करने का अधिकार रखते हैं और वीडियो में टिप्पणी भी जोड़ सकते हैं। गैर-पंजीकृत सदस्य केवल वीडियो ही देख सकते हैं। इसकी आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन ही हैं। यूट्यूब ने विविध विषयों के साथ वीडियो साझेदारी को इंटरनेट कल्चर का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग बना दिया है। यूट्यूब की अपनी मोबाइल सेवा भी है तथा यह टी. वी. चैनल इन्फॉर्मेशन टी. वी.-2  एप्पल पर भी उपलब्ध है।

कोरोनाकाल का वीडियो संचार : गूगल मीट (Google Meet) तथा जूम वीडियो कॉंन्फ्रेंसिंग एप्प (ZoomVideoConferencingApp)

गूगल मीट सॉफ्टवेयर - यह गूगल द्वारा विकसित वीडियो संचार सेवा है। यह गूगल हैंगाउट और गूगल चैट नामक दोनों एप्प को मिलाकार काम करने वाला एक सॉफ्टवेयर है। नई मीटिंग निर्धारित करने, नई वीडियो मीटिंग शुरू करने के लिए अपने मौजूदा गूगल खाते से लॉग इन करें या मुफ़्त में साइन अप करें। हम  अपनी ऑन लाइन मीटिंग में किसी को भी बुला सकते हैं। हम जिसे बुलाना चाहते हैं, हमें उसे मीटिंग का कोड या लिंक भेजना होता है।

गूगल मीट क्लास रूम - यह गूगल द्वारा विकसित एक निश्शुल्क प्लेटफार्म है। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षकों तथा छात्रों के बीच फाइल्स को साझा करने की प्रक्रिया से शुरू हुआ था। इसमें अपने कैमरे और माइक्रोफोन का इस्तेमाल करते हुए अपने डिवाइस पर क्रोम ऍप्लिकेशन खोलें। यदि आप स्कूल में हों तो आपके नेटवर्क का एडमिन आपके लिए कैमरे और माइक्रोफोन की सैटिंग तय कर सकता है। उस स्थिति में आप उन्हें यहाँ नहीं बदल सकते।

जूम वीडियो कॉंन्फ्रेंसिंग एप्प- यह एप्प भी एक दूरवर्ती कान्फ्रेसिंग सेवा प्रदान करता है। यह मोबाइल और कंप्यूटर के सहयोग से वीडियो कान्फ्रेंसिंग, ऑन लाइन मीटिंग, चैट आदि की सुविधा देता है। यह उपभोग कर्ताओं को ज्वाइनिंग लिंक भेजने में सक्षम बनाता है जिसमें किसी व्यक्ति को कॉल में शामिल होने के लिए साइन-इन करने की आवश्यकता नहीं होती। यह एक ग्रुप कॉल में सौ से भी अधिक प्रतिभागियों को जोड़ने वाला वीडियो कान्फ्रेंसिंग एप्प है। कोरोनाकाल में इसका उपयोग करने वालों की संख्या बीस गुणा बढ़ गई है। ऑनलाइन कक्षाएँ तथा कार्यालयों केवर्क फ्रॉम होमके कारण भी उसके उपभोक्ता बढ़े हैं।

संचार-क्रांति की शिक्षा में चुनौतियाँ :

शिक्षा सदा से ही चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। यही कारण है कि शिक्षण का कार्य करने वाले व्यक्ति को, संसार की रचना करने वाले ब्रह्मा, संसार का पालन करने वाले विष्णु तथा संसार का संहार करने वाले महेश के समकक्ष रखते हुए कहा गया है-

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु:, गुरुर्देवो महेश्वर:

गुरु: साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नम:

सूचना-क्रांति के इस युग में शिक्षा एवं विकास के साथ ही मनोरंजन के नए  आयाम भी सामने आए हैं। इस काल में ज्ञान का अत्यधिक विस्तार हुआ। आज सारा संसार एक गाँव की भाँति प्रतीत होता है। आज ऐसा प्रतीत होता है कि हम सभी एक विश्वग्राम के निवासी हैं। ज्ञान के सभी अवरोध हट गए हैं। सार रूप में कहें तो सूचना प्रौद्योगिकी के रूप में हमें एक जादुई चिराग मिल गया है; जिससे हम बड़े से बड़े काम आसानी से कर सकते हैं। इसलिए अनेक लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि हम आज सूचना क्रांति के युग में रह रहे हैं।

कोई भी क्रांति समाज निरपेक्ष नहीं हुआ करती, अपितु वह समाज सापेक्ष ही होती है। उसके सामाजिक सरोकार हुआ करते हैं। वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन की वाहिका होती है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या अन्य क्रांतियों की भाँति सूचना-क्रांति भी समाज सापेक्ष है? इस संदर्भ में, विशेष रूप से भारत के संदर्भ में प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामचरण दूबे का यह निष्कर्ष ध्यान योग्य है- “सूचना के इस बौद्धिक तंत्र ने भारत-जैसे उपमहाद्वीप में संक्रमण और विस्फोट की स्थिति पैदा कर दी है तथा संचार के साधन आकाश से अपसंस्कृति की वर्षा कर रहे हैं। जिससे एक आत्मकेंद्रित और भोगवादी जीवन-दृष्टि विकसित हो रही है। जिसके कारण सामाजिक लक्ष्य और विकास के राष्ट्रीय संकल्प डगमगाने लगे हैं। सच तो यह है कि हम आज की स्थिति का सही आकलन नहीं कर पा रहे हैं और हमारे पास भविष्य के लिए कोई विश्वसनीय दिशा संकेत हैं।“(श्यामचरण दूबे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-17)

 “आज संदेश-विस्फोट का युग है। समसामयिक मानव पर अनेक धाराओं से अनेक प्रकार के संदेशों की बौछार हो रही है। उनकी व्यक्तिगत विचार प्रक्रिया पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? यह प्रश्न विचारणीय है। अब तक हुए अनुसंधानों के निष्कर्ष चिंताजनक हैं। आज का मानव बाह्य-निर्देशित होता जा रहा है। वह अपनी विचार-क्षमता पर कम भरोसा करता है, वह उन विचारों पर अधिक भरोसा करता है जो उसे जन-संचार के साधनों से मिलते हैं। दूसरे शब्दों में संदेश, विचार और चिंतन का स्थान ले रहे हैं (समय और संस्कृति, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-110)

सच तो यह है कि वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी विकास करते-करते संचार माध्यम के रूप एक चुनौती बनकर खड़ी हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी के प्रतिनिधि संचार माध्यमों, विशेष रूप से टेलीविजन और इंटरनेट का सारा कारोबार अर्थ-केंद्रित हो गया है। वहाँ पैसा ही सब कुछ है। इस स्थिति ने हमें दो स्तरों पर बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है- एक तो व्यक्ति के स्तर पर, छात्रों की  बौद्धिक क्षमता, मनोविज्ञान, चिंतन, दृष्टिकोण आदि के रूप में; दूसरे सामाजिक स्तर पर, सांस्कृतिक अवमूल्यन, नैतिक मूल्यों का ह्रास, भ्रष्टाचार और व्यभिचार के बढ़ावे के रूप में। इन दोनों स्तरों को मिलाकर हम अपने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को समझ सकते हैं। शिक्षार्थियों के जीवन में भोगवादी दृष्टि, अकेलापन, कुंठा एवं  निराशा आती चली जा रही है; जिसके फलस्वरूप उनमें मादक पदार्थों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। वे नैतिकता से विमुख हो रहे हैं, सारे मूल्य चरमरा गए हैं, मर्यादाएँ टूट रही हैं, सामाजिक सरोकार क्षीण हो रहे हैं। सर्वत्र अपसंस्कृति के फैलाव ने हमें चिंताजनक स्थिति में ला खड़ा किया है।

पहले जब जन-संचार माध्यम इतने अधिक विकसित नहीं थे, अर्थात् समाचार पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो और टेलीविजन का फैलाव कम था। तब हिंसा के समाचार पढ़कर या सुनकर सभी चौंक उठते थे। लेकिन आज छात्र ऐसे समाचारों के आदि हो गए हैं। दहेज हत्याओं के समाचार शुरू-शुरू में सभी का ध्यान खींचते थे और एक प्रतिक्रिया को जन्म देते थे। लेकिन अब किसी पर ऐसे समाचारों का विशेष प्रभाव नहीं होता। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घोटालों जैसे कांड पढ़-सुनकर या देखकर युवा भी उद्वेलित नहीं होते, बल्कि एक विशेष तरह के मनोरंजन का अनुभव करते हैं। कहने का अर्थ यह है कि हम ऐसी सूचनाओं के आदी होते चले जा रहे हैं, जिनसे शिक्षार्थियों में एक नकारात्मक सहनशीलता और तटस्थता घर करती चली जा रही है।

मोबाइल, कंप्यूटर आदि से हम जिन बच्चों को बचाने, दूर रखने का प्रयास करते थे उन्हीं के हाथ में अब ये उपकरण हमें सौंपने पड़ रहे हैं। इन विदेशी उपकरणों पर हमारा नियंत्रण तो दूर की बात है; कई बार तो इनके आगे सरकार भी लाचार दिखाई पड़ती है। जब ये उपकरण बच्चों के पास चले गए तो वे इनका मनमाने ढंग से प्रयोग करने में स्वतंत्र हो जाते हैं। मोबाइल, कंप्यूटर आदि में फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि कई एप्प ऐसे होते हैं जिन पर लिखा होता है किइसे बच्चे देखेंपरंतु बच्चों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे उन कार्यक्रमों को अवश्य देखेंगे।

इनके अतिरिक्त टेलीविजन, विशेष रूप से प्राइवेट चैनल, बहुत-से ऐसे कार्यक्रम प्रसारित करते हैं जो केवल बच्चों के लिए बल्कि सभी के लिए तथा राष्ट्र की सुरक्षा की दृष्टि से भी, उचित नहीं कहे जा सकते। कार्यक्रमों में हिंसा के दृश्य, कई बनियानों, अंडरवियरों के विज्ञापनों तथा परिवार नियोजन के कुछ उपकरणों के विज्ञापनों में अश्लीलता इस सीमा तक होती है कि पूरे परिवार के साथ देखने में सिर शर्म से झुक जाता है।

कुछ विज्ञापन मँहगे शृंगार-प्रसाधनों, यांत्रिक उपकरणों, मोहक वस्त्रों, दिल दहलाने वाली कल्पित बीमारियों का परिचय तो देते हैं परंतु यह नहीं बताते कि समाज उत्थान के लिए कैसा आचरण आवश्यक है, बच्चों, किशोरों और युवा-वर्ग में अच्छे संस्कार कैसे उत्पन्न किए जा सकते हैं। सेवा और सौहार्द्र की प्रवृत्ति को कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है। हिंसा, लूट, बलात्कार के जासूसी कार्यक्रम युवाओं में अपराध से दूर रहने की बजाय, उनके प्रति उत्सुकता अधिक जगाते हैं। बड़े-बड़े शहरों में स्वार्थ सिद्ध करने में जुटी संस्थाओं, व्यक्तियों के शानदार समारोहों को संचार माध्यमों में खूब जगह मिलती है। किसी हीरो-हीरोइन का शादी-समारोह हो या नशा करने के कारण उनकी गिरफ़्तारी हो, उसे सारे दिन दिखाया जाता है। 

फिल्मों की बात करें तो हम देखते हैं कि किसी फिल्म का हीरो इस बात को गाना गाकर बताता है किमेरा करैक्टर ढीला है कुछ बातें तो ऐसी हैं जिन्हें मैं कह नहीं पा रही हूँ, उसे सबके सामने फिल्माया जाता है। यदि फिल्म में एकाध बात अच्छी भी हो तो भी वह उनके बीच दबकर रह जाती है।

कुछ कार्यक्रम देश की सुरक्षा एकता की दृष्टि से भी अपराध की श्रेणी में पहुँच जाते हैं। उदाहरणार्थ- कुछ आतंकवादी किसी घर में छुपे हैं तथा उनके साथ सेना का एनकाउंटर चल रहा है। कई पत्थरबाज सेना पर पथराव कर रहे हैं। उसी समय कोई टी.वी. रिपोर्टर वहाँ पहुँचकर आँखों देखा हाल प्रसारित करना शुरू कर देता है। इससे आतंकवादियों को बाहर की स्थिति की जानकारी मिलती रहती है तथा उस समाचार को सुनकर बहुत-से और पत्थरबाज भी वहाँ पहुँच जाते हैं।

ऐसे ही मुम्बई में ताज होटल पर जब आतंकवादी हमला हुआ तो सभी चैनलों पर उसका सीधा प्रसारण हो रहा था जिससे आतंकवादियों को बाहर की सारी स्थितियों की जानकारी मिलती रही और वे बहुत देर तक पुलिस का सामना  करने में सफल हुए तथा आतंकवादी सैकड़ों नागरिकों की हत्या करने मैं कामयाब हुए। ऐसे ही जब भारतीय विमान का अपहरण करके कंधार ले जाया गया तो यात्रियों को छुड़ाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन के आखों देखे हाल के प्रसारण से अपहरणकर्ताओं को पता चलता रहा कि सरकार पर बहुत  दबाव बनाया जा रहा है। इतने दबाव के कारण सरकार अवश्य झुकेगी। इससे अपहरणकर्ताओं को सौदेबाजी करके आतंकवादियों को छुड़ाने सफलता मिली।

इसी तरह कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के अमरावती आदि तीन-चार शहरों में   सोशल मीडिया की वजह से दंगे भड़के। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा के अवसर पर दिल्ली-दंगे भी सोशल मीडिया के कारण ही हुए। इसी तरह यदि किसी एक शहर में किसान आंदोलनकारियों ने रेल यातायात को रोक दिया। टी. वी. पर इसका सीधा प्रसारण देखते ही थोड़ी ही देर बाद कई अन्य शहरों में भी रेल यातायात अवरुद्ध कर दिया गया। 

आज स्थिति यह है कि यदि कोई अपराधी भी जेल से कुछ समय के लिए जमानत पर छोड़ा जाता है तो उसके स्वागत के लिए, उसके काफिले में, सैकड़ों कारें तथा कई चैनलों के रिपोर्टर उपस्थित होते हैं। उदाहरणार्थ- एक अपराधी पंजाब की जेल से उत्तरप्रदेश की जेल में स्थानान्तरित किया जाता है, उसकी  यात्रा का पूरा आँखों-देखा हाल ऐसे प्रसारित किया जाता है; जैसे ये गणतंत्र दिवस की परेड हो। टी. वी. चैनलों की डिबेट में बैठकर राष्ट्र-विरोधी बातें कहना आज प्रसिद्ध होने का एक तरीका बन गया है। इस तरह की बहुत-सी बातें जब हम  बालकों को परोसेंगे तो हम उनसे अच्छा नागरिक बनने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?

 इस स्थिति से उबरने का उपाय क्या है? इसका उपाय यही है कि सूचना प्रौद्यौगिकी का इस्तेमाल सही उद्देश्यों के लिए हो। उनका व्यवस्थापन वैज्ञानिक ढंग से हो तथा नियंत्रण सही हाथों में हो। इनके प्रयोक्ताओं को अपने लिए एक आचार संहिता बनानी होगी। यह तभी संभव हो सकेगा जब हम शिक्षकों, छात्रों और पूरे मानव समाज को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बनाएँ।  

समाज की नींव बाल, किशोर और युवा हैं। हर दुर्व्यसन, कुरीति और अंधविश्वास का बीज इन्ही के अंत:करण में अंकुर बनकर फूटता है और विषवृक्ष के रूप में विकसित होता है। इनके कोमल मन में सत् संस्कारों के बीज बोने और उन्हें सद्विचारों के जल से सींचने की सबसे अधिक आवश्यकता है। इस दिशा में जन-संचार माध्यम ही सार्थक भूमिका निभा सकते हैं।

संदर्भ :

  • https://education.stateuniversity.com/pages/1821/Charters-W-W-1875-1952.html
  • https://www.britannica.com/technology/printing-press
  • चार्टर्स, डब्ल्यू.डब्ल्यू. (1933) मोशन पिक्चर्स एंड यूथ, न्यूयॉर्क: मैकमिलन कंपनी
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  • दूबे,श्यामचरण (2018) समय और संस्कृति, नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन        
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  • मिश्र रवीन्द्रनाथ (2010) मीडिया और लोकतंत्र
  • मैक्क्वेल डी. (2010) मैक्क्वेल मास कम्युनिकेशन थ्योरी, सेज पब्लिकेशन
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार
  • साइमा, एस. (2013) स्क्रीनिंग पब्लिक स्फेयर: मीडिया एंड डेमोक्रेसी इन इंडिया, रूटलेज, टेलर एंड फ्रांसिस ग्रुप

डॉ. मनीषा वाधवा

प्रोफेसर, शिक्षा विभाग, अदिति महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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