शोध आलेख : ‘लाल पान की बेगम’ : संघर्षशीलता और स्वप्नपूर्ति की गाथा - डॉ. आशुतोष शर्मा

लाल पान की बेगम’ : संघर्षशीलता और स्वप्नपूर्ति की गाथा
- डॉ. आशुतोष शर्मा

शोध सार : फणीश्वरनाथ रेणु का रचना संसार वह मील का पत्थर है जो सदैव हिन्दी साहित्य को गौरवान्वित करेगा और हिन्दी साहित्यकार को राह दिखाएगा। अपने कथा-कर्म के माध्यम से उन्होंने अनेक ऐसी घटनाओं को उठाया जो तत्कालीन समाज का आईना थी। उनकी प्रमुख कहानियों में से एक कहानी है, ‘लाल पान की बेगमजो स्त्री प्रधान कहानी है और एक स्त्री, बिरजू की माँ के अनेक रूपों को दर्शाती है। कहीं वह संघर्षशील पत्नी है तो कहीं, पति को दिशा दिखाती, शक्ति देती सहधर्मिणी है, कहीं झगडालु पड़ोसिन, तो कहीं ममतामयी माँ। अन्ततः सभी को साथ लेकर चलने वाली ऐसी शक्ति के प्रतीक रूप में सामने आती है जहाँ वह ताश की गड्डी की लाल पानी की बेगम बन जाती है। कहानी ज़मीदारी उन्मूलन में किए गए उसके संघर्ष को शब्दबद्ध करती हुई उसके स्वप्न नाच देखने जाने को पूरा होते हुए दर्शाती है जहां कितनी ही ग्रामीण छवियाँ, उनकी बोली, उसकी खुशबू शब्दों के माध्यम से सजीव हो उठी है। रेणु के द्वारा शब्दों के माध्यम से खींची ये रेखाएँ नई ऊर्जा का संचार कर पाठकों को गद्-गद् कर देती है।

बीज शब्द : संवेदनशील, मूर्त्त, सर्वे - सेटलमेण्ट, उन्मूलन, अन्तर्भेदी, निर्देशक, कलात्मक, ऊहापोह, संघर्षशील।

मूल आलेख : फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले उन कथाकारों में से एक हैं जिन्होनें अपने कथा साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति को जीवित रखा। उनके कथा साहित्य को मील का पत्थर साबित करने वाली कहानियों में से एक हैलाल पान की बेगम प्रस्तुत कहानी की मुख्य पात्र स्त्रियाँ हैं जो अपने जीवन में संघर्ष करते हुए भी, जीवन को रंगीन और उत्साही बनाने वालेनाचके प्रति संवेदनशील हैं। दूसरी  ओर है रेणु की कहानी कला जो इन स्त्री पात्रों को इनकी भाषा के साथ हमारे सामने मूर्त्त रूप में खड़ा कर देती है। रेणु ने स्त्री पात्रों के माध्यम से ग्रामीण जीवन को सजीव कर दिया है। इन स्त्री पात्रों में बिरजू की माँ, राधे के बेटी, मखनी फुआ, चम्पिया, सुनरी, जंगी की पुतोहू प्रमुख हैं। पुरूष पात्रों में बिरजू और बिरजू के बप्पा हैं और उनके द्वारा किए गए सभी क्रियाकलाप भी बिरजू की माँ के इर्द-गिर्द घूमते हैं। कहानी की शुरूआत ही बिरजू की माँ के गुस्से से होती है। जैसे ही मखनी फुआ, बिरजू की माँ से पूछती है- ‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जायेगी क्या?’’1 बस इतनी सी बात सुनते ही बिरजू की माँ का गुस्सा साँतवें आसमान पर और सारा गुस्सा उतरता है बच्चों पर। बिरजू की माँ के व्यक्तित्व में वे सभी रंग दिखाई देते है जो उसे कुछ खास बनाते हैं। 

    सर्वे-सेटलमेण्ट के तहत मिलने वाली भूमि के लिए किया गया उसका संघर्ष, पति का साथ देना, हर परिस्थिति में उसे अड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करना और गाँव के एकमात्र मनोरंजन के साधननाचदेखने के लिए भी उतना ही उत्साह, जिद्द उसके व्यक्तित्व को कुछ खास बना देती है। बिरजू की माँ की ही तरह और भी स्त्री पात्र हैं जो अपने विशेष अन्दाज़, अपने बोलने के तरीके, अपनी हंसी, आवाज़ से वातावरण को सजीव बनाए रखती हैं। मखनी फुआ के पूछने पर की नाच देखने नहीं जाएगी तो बिरजू की माँ भी गुस्से में भरी बैठी थी और नुकीली बात दे मारी मखनी फुआ पर, “बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया हो तब फुआ?’’ बस बिरजू की माँ का इतना कहना था कि फुआ भी पहुँच गई पानी भरकर लौटती पनभरनियों में बिरजू की माँ की कही गई बात का इंसाफ करवाने। बिल्कुल यथार्थ जीवन को रेणु ने साकार कर दिया। सर्वे-सेटलमेण्ट के तहत बिरजू की माँ और बाप को जमीन मिली। ज़मीदारी उन्मूलन के दौरान, किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने आन्दोलन किया जहाँ पिछड़े, भूमिहीन किसानों को ज़मीदारों के सामने खड़ा कर दिया गया कि इन्हें जमीन मिलनी चाहिए। बहुत से किसानों ने ज़मीदारों के सामने हथियार डाल दिए। उन्हें विश्वास नहीं था कि यह आन्दोलन उन्हें ज़मीदारों से भूमि दिलवा सकता है। रेणु ने कहानी में, ज़मीदारों ने इसके तहत जिन हथकण्डों को अपनाया उसका ज़िक्र किया है, “बिरजू के बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक-एक आदमी को समझा के कहा था - ज़िंदगी भर मजदूरी करते रह जाओगे। 

    सर्वे का समय रहा है। लाठी कड़ी करो तो दो-चार बीघे जमीन हासिल कर सकते हो। सो गांव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबू साहेब के खिलाफ खाँसा भी नहीं।... बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है। बाबू साहेब गुस्से से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गये। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।... आखिर बाबू साहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। बिरजू की माँ कोमौसीकहके पुकार - यह जमीन बाबूजी ने मेरे नाम से खरीदी थी। मेरी पढ़ाई - लिखाई इसी ज़मीन की उपज से चलती है। - “और भी कितनी बाते।2 लेकिन फिर भी बिरजू की माँ ज़मीन लेने के लिए अड़ी रही..., “बिरजू की माँ दिन-रात मंझा देती रहती तो ले चुके थे जमीन। रोज आकर माथा पकड़ के बैठ जायेँ - मुझे जमीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मंजूरी हीं अच्छी। जवाब देती थी बिरजू की माँ खूब सोच-समझ के - छोड़ दो, जब तुम्हारा कलेजा ही थिर नहीं होता है तो क्या होगा? जोरू ज़मीन जोर के, नहीं तो किसी और के।... ”3 रेणु ने ज़मीदारी उन्मूलन की उस घटना के तहत किसानों की ज़िन्दगी ने क्या-क्या मोड़ लिए, उन्हें किन संघर्षों के तहत दो-तीन बीघे ज़मीन मिली उसका यथार्थ चित्रण किया। इस आन्दोलन ने रंग दिखायाजमीन किसकी, जोते उसकीजैसे नारों ने किसानों में उत्साह भरा, और जो किसान मोर्चा लिए अड़े रहे, वे विजयी हुए और उन्हें ज़मीन मिली। बिरजू के बप्पा और उसकी माँ भी उन्हीं खुशकिस्मत किसानों में से थे जिन्हें तीन बीघे ज़मीन मिली और वे तीन बीघे ज़मीन के मालिक हो गए। ज़मीन में फसल हुई तो बैल भी खरीद लिए और उसी दिन से बिरजू की माँ की आँखों में एक सपना भी सजा दिया, “बिरजू की माँ इस बार बैल-गाड़ी पर चढ़कर जायेगी नाच देखने।4 अपनी बैलगाड़ी पर बैठकर नाच देखने जाने की चाह में कहीं--कहीं शक्ति प्रदर्शन भी दिखता है। सुरेन्द्र चौधरी लिखते हैं, “ज़मीन की बंदोबस्ती ने कुछ गरीब कृषिदासों को स्वतंत्र किसान की हैसियत दी है। इस हैसियत का प्रदर्शन चाहे विडम्बना हो, पर कहीं कहीं वर्ग-प्रभाव का एक अनिवार्य हिस्सा भी है।’’5 

    रेणु ने जहाँ सर्वे-सेटलमेण्ट के माध्यम से किसानी जीवन के संघर्ष को वाणी दी वहीं ग्रामीण लोगों के जीवन के उत्सव को भी वाणी दी वहीं, वहाँ नाच-गाने ही उनकी परम्परा और संस्कृति है, जिन्हें वे भरपूर उत्साह और मनोयोग के साथ मनाते हैं। नाच-रंग उनके जीवन की खुशी और उत्साह को दोगुना कर देता है और संघर्ष, दुःख को पीछे छोड़ खुशी को आंचल में समेटे, मिलकर एक-साथ आगे बढ़ा देता है। रेणु की कहानी के विषय में धनंजय वर्मा का कथन है, “ग्राम जीवन के प्रति आत्मीयता और तादात्म्य है। वे गहरे उतरकर उस जीवन की समस्याओं और उसके सम्पूर्ण और समग्र व्यक्तित्व हैं...  उनमें अनुभूति की वास्तविकता का ताप है, उनमें जीवन की वास्तविक प्रक्रिया की स्वर लिपियाँ हैं। उनकी कहानी में उद्दाम जिजीविषा और गहरी मानवीयता है - जन जीवन के गहरे आत्मीय संघर्ष और उस जीवन की व्याकुल अकुलाहट।’’6 ‘लाल पान की बेगममें भी बिरजू की माँ की एक ही इच्छा है कि किनारी वाली लाल साड़ी पहन, वह अपनी बैलगाड़ी में बैठ नाच देखने जाए और बिरजू का बप्पा अभी तक बैलगाड़ी लेकर नहीं आया, इसलिए वह बहुत गुस्से में है कि कल पानी भरने जाएगी तो सभी उसकी हँसी करेंगी। यहीं से कहानी की शुरूआत होती है जहाँ बिरजू की माँ की खीझ साफ दिखाई देती है। गाँव की सभी स्त्रियाँ बिरजू की माँ से जलती है, क्योंकि वही एक है जिसके पास अपनी ज़मीन है जिसका पति उसकी सुनता है और बातों ही बातों में वे ये भी तय कर लेती हैं कि किस प्रकार बिरजू की माँ ने ज़मीन हासिल की होगी, “चम्पिया की माँ आँगन में रात-रात भर बिजली-बत्ती भुकभुकाती थी। चम्पिया की माँ के आंगन में, नाकवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह! जलो! जलो! और जलो! चम्पिया की माँ के आँगन में चाँदी जैसे पाट सूखते देखकर जलने वाली सब औरतें।7 रेणु ने बड़ी ही सरलता के साथ एक-दूसरे को जली-कटी सुनाने वाली औरतों की सोच को शब्दबद्ध किया है। पात्रों के संवाद कहीं कहीं पात्र को आकार देने का काम करते हैं। विद्या सिन्हा कहती है, “इस कहानी की भाषा अपनी मुद्रा में तमाम अन्तर्विरोधों के साथ पात्रों और परिवेश के भीतरी - बाहरी संबंधों से बनी ज़िन्दगी और उसके भीतरी आशय को धारण करती है xxx जंगी की पुतोहू के वाक्य पात्र को भी आकार देने में सक्षम है।’’8 जंगी की पुतोहू जो तीन महीने पहले ही गौना होकर आई है। बिरजू की माँ से नहीं डरती। हमेशा देखने-सुनने में आता है कि महिलाओं के मण्डल में एक दिलेर महिला मुँहफट होती है जो सभी की बोलती बंद कर देती है। जंगी की पुतोहू नई-नई है, गर्म खून है, हम किसी से कम नहीं का साक्षात् रूप, सभी झगडालू सासों से मोर्चा लेने वाली। वह भी मन ही मन बिरजू की माँ से डाह रखती होगी, इसलिए गला खोलकर जवाब देती है, “फुआ - ! सरबे सित्तलमिंटी (सर्वे सेटलमेंट) के हाकिम के बासा पर फूलछाप किनारी वाली साड़ी पहन के यदि तू भी भेंटी की भेंट चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दू-तीन बीघा धनहर जमीन का पर्चा कट जाता। फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोना बंग पाट होता, जोड़ा बैल खरीदती। फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ो पगहियाँ झूलती।9 बिरजू की माँ के आंगन में जंगी की पतोहू की गला खोल बोली गुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आई xxx बिरजू के बाप पर बहुत तेजी से गुस्सा चढ़ता है। चढ़ता जाता है। ........... बिरजू की माँ का भाग ही खराब है जो ऐसा गोबर गनेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौख-मौज दिया है उसके मर्द ने।’’ विद्या सिन्हा लिखती हैं, “लगता है जैसे घटनाएँ किसी रंगमंच पर मुद्रा धारण किए हुए घटित हो रही हैं। पात्रों का आत्मचिंतन भी संवाद के रूप में सामने आता है।’’10 

    ईर्ष्या, डाह, जलन का सजीव वर्णन, जहाँ अपनापन भी है और समय पर एक-दूसरे को ज़हर भरे बाण मारने की पहल भी, जो स्त्रियोचित्त स्वभाव की सच्चाई है। लेकिन ग्रामीण अंचल की नोक-झोंक के बीच पनपता  प्रेम, स्नेह भी वहाँ दिखाई देता है। जब बिरजू का बाप बैलगाड़ी ले कर देर से पहुँचता है तो बिरजू की माँ का गुस्सा सातवें आसमान पर, किन्तु अपने खेत की धान की बालियों को देखते ही गुस्सा गायब और धानी रंग उसकी आंखों में उतर आता है। रेणु ने कितने करीब से किसानों की ज़िन्दगी को महसूस कर शब्दों का जामा पहनाया है। किसान के लिए सबसे सुकुन-भरा क्षण वही होता है जब वह अपनी मेहनत को खेत में लहलहाते देखता है, जब उन अनाज की बालियों को छूता है तो उसका रोम-रोम खिल उठता है, उसकी इसी खिलखिलाहट को बिरजू की माँ में देखा जा सकता है। किसानी जीवन की ईश्वर के प्रति आस्था और विश्वास कहानी में दिखाई देता है जब बिरजू द्वारा धान के मुंह मे डाल लेने पर उसे डांटती है, क्योंकि न्वान्न के पहले नए धान को मुँह में नहीं डालना। इसी तरह जब सर्वे सेटलमेण्ट की बात थी तो कितनी ही मनौतियाँ उसने मांगी थी ईश्वर से। ये सब बातें उस वातावरण को सजीव कर देती हैं जहाँ किसान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।  इस स्तर पर डॉ. सुवास कुमार से हम एकमत हो जाते हैं, “इस बात में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं कि प्रेमचंद के बाद गाँव का जैसा सहज, स्वाभाविक, यथार्थ और मार्मिक चित्रण रेणु ने किया, वैसा किसी दूसरे लेखक ने नहीं।’’11 

    कथा आगे बढ़ती है और बिरजू की माँ तैयार होने लगती है, नाच देखने जाने के लिए, लेकिन पीछे से कोई घर में भी तो होना चाहिए और वह मीठी रोटी पकाना भी नहीं जानती जो रास्ते के लिए ले जानी है। कहा-सुनी, कितनी भी हो लेकिन फुआ भी आवाज़ मारते ही आने के लिए तैयार बैठी है और बिरजू की माँ भी हाथ खोल-कर पूरी रात के लिए तंबाकू रख देती है कि फुआ रात-भर आराम से तंबाकू पीती रहे। जो आपस के प्रेम को दर्शाता है। बिरजू की माँ तैयार है नाच देखने जाने के लिए। आज उसका स्वप्न पूरा होने जा रहा है, उसने अपने जीवन मे बहुत संघर्ष किया है जीने के लिए। खेत में मजदूरी कि और अड़े रहे अपनी ज़मीन पाने के लिए। आज आँखों में बसे वो सपने पूरे होने जा रहे थे, जहाँ वो सजी-धजी अपनी बैलगाड़ी में बैठ नाच देखने जाने के लिए तैयार है। पति-पत्नी के बीच का प्रेम तब और ऊर्जा ग्रहण करता है जब बीते संघर्षों की कठोर ज़मीन सफलता की नमी में बदल जाती है, वैसी ही गुदगुदाहट आज गाड़ी में बैठकर बिरजू की माँ महसूस कर रही है। लेकिन अपनी साथियों को वह भूली नहीं है, चलते-चलते बिरजू से कहती है कि, “जरा जंगी से पूछो , उसकी पुतोहू नाच देखने चली गयी क्या?’’12 और जब पता चला कि अभी नहीं गई है तो उसे भी गाड़ी में बैठने का निमंत्रण देती है, बगल के झोपड़े से राधे की बेटी सुनरी और लरेना की बीवी सभी खुशी-खुशी बैलगाड़ी में बैठ चल पड़ते हैनाचदेखने के लिए। सभी के हृदय में उमंग है, खुशी है - सपनों के पूरे होने की और स्मृति में हो जाती हैं कुछ यादें, “जंगी की पुतोहू का गौना तीन ही मास पहले हुआ है। गौने की रंगीन साड़ी से कड़वे तेल और लठवा - सिंदूर की गंध रही है। बिरजू की माँ को अपने गौने की याद आयी।13 

    शायद बिरजू की माँ जानती है कि जब सपने पूरे नहीं होते तो कैसा लगता है, वह गुस्सा किस-किस को अपना शिकार बना सकता है। बड़े-छोटे का लिहाज़ छोड़ सब एक-ही लाठी से हांके जाते हैं, इसलिए वह किसी के सपनों को टूटने नहीं देना चाहती। जंगी की पुतोहू अभी बच्ची है। उसे आपसी प्रेम की समझ नहीं है। इसलिए मोर्चा लेने के लिए तैयार है, किंतु बिरजू की माँ में क्रोध है तो प्रेम का ठहराव भी जो समय आने पर सभी पर उडेलती है।गाड़ी की लीक धनखेतों के बीच होकर गयी है। चारों ओर गौने की साड़ी की खसखसाहट जैसी आवाज होती है।... बिरजू की माँ के माथे पर मंगटिक्के पर चांदनी छिटकती है।14 लठवा-सिंदूर की गंध, साड़ी की खसखसाहट, पहिएँ की चूँ-चूँ भरी घरघराहट ने नाच देखने जाने के चित्र को सजीव कर दिया है।  रेणु बड़े सफल कथाकार है जहाँ उनका सृजनात्मक रूप शब्दों के माध्यम से साफ रेखाएँ खींच देता है और पाठक भी उस लठवा-सिंदूर की गंध से सराबोर हो जाता है। ताश की गड्डी के 52 पत्तों में बिरजू की माँ लाल पानी की बेगम है। जंगी की पुतोहू ने व्यंग्य में कहा था, क्योंकि उसके पास ज़मीन है, उसकी अपनी। इसलिए शायद किसी को कुछ भी कहेगी, लेकिन आज लाल किनारी वाली साड़ी पहने माथे पर मँगटिक्का सजाए अपने स्वप्नों की पूर्ति होने की खुशी में चमकती आँखों ने उसे सचमुच लाल पानी की बेगम बना दिया था। वह सोचती है, “ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लाल पान की बेगम है। यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ, वह सचमुच लाल पानी की बेगम है। बिरजू की माँ ने अपनी नाक पर दोनों आँखों को केन्द्रित करने की चेष्टा करके अपने रूप की झाँकी ली, लाल साड़ी की झिलमिल किनारी, मँगटिक्का पर चांद।...’’ 15 गर्वित है वह अपनी अभिलाषा के पूर्ण होने पर।

    पति-पत्नी के संबंधों को रेणु ने बहुत सुंदर ढंग से संजोया है। कहानी के प्रारम्भ में बिरजू की माँ उसके बप्पा पर गुस्सा है, किंतु अंत में खुश है और बिरजू का बप्पा भी उसे किनारी वाली लाल साड़ी में देखकर बस देखता जा रहा है। डॉ. अंजलि तिवारी, “पति-पत्नी के संबंधों पर गौर किया जाए तो मालूम होगा कि लेखक ने इन संबंधों को एक विशेष दूरी के बीच उनकी जटिलता में रूपायित तो किया है, किन्तु उनका समापन एक कोमल बिंदु पर ही होता है - चाहे वह कोमलता समझौते की हो, चाहे मिलन के सुख की हो। जैसेलाल पान की बेगममें बिरजू की माँ को गाँव की औरतों की अनेक टिप्पणियों के द्वारा उभरने वाले विविध संदर्भों के बीच उपस्थित किया गया। बिरजू की माँ अपनी बैलगाड़ी में बैठकर नाच देखने जाने वाली है xxx पति के प्रति रूठी हुई बिरजू की माँ का मन खुलने लगता है xxx धीरे-धीरे एक अदभुत प्यार और प्रसन्नता के वातावरण की सृष्टि होती है।’’16

    रेणु ने यहाँ बिरजू की माँ के चरित्र को खोलकर रख दिया है। वह अपने स्त्रीत्व रूप में गर्व की अधिकारिणी है। कुशल निर्देशक है, ममतामयी माँ है, नरम हृदयी पड़ोसन, सभी का ध्यान रखने वाली। जिसके सभी रूप आकर्षक और शिक्षा देते हुए उस क्षेत्र विशेष को सजीव कर देते है, जहाँ भिन्न टोलों में बंटा जीवन भी कितना सुन्दर और प्रेरणादायक है। रेणु की अन्तर्भेदी दृष्टि ने सब कुछ देख लिया था और उसे एक कलात्मक रूप देकर हमें दिखा भी दिया।

निष्कर्ष :लाल पान की बेगममूलतः उस स्त्री शक्ति को दर्शाती है जहाँ वह संघर्ष से घबराती नहीं, ज़मीदारों की धमकी उसे पीछे नहीं धकेलती, बल्कि पति को कहावत का सहारा लेकरजोरू-जमीन जोर केनहीं तो किसी और केमोर्चे पर खड़े रहने के लिए ताकत देती है और उस संघर्ष में उसे सफलता भी मिलती है। केवल वह संघर्ष के लिए ही तत्पर नहीं है, बल्कि कुछ स्त्रियोंचित्त इच्छा को भी मन में पाले हुए है जहाँ वह अपनी बैलगाड़ी में बैठ नाच देखने जाना चाहती है। इसमें भी सौ अड़चनें है, बैल तो है लेकिन गाड़ी कहाँ? वह भी किसी दूसरे टोले से मांगनी है मिलेगी या नहीं, नहीं जा पाई तो कल सभी स्त्रि़यों के बीच मजाक का पात्र वही होगी। इसी ऊहापोह में बच्चों को पीटते जंगी को पुतोहू को सुनते-सुनाते दिन बीतता है और रात स्वप्न पूरा करती है, तब एक ममतामयी, सहृदया के रूप में बिरजू की माँ के दर्शन होते है। जहाँ वह केवल अपने नहीं, सभी स्त्रियों के स्वप्न को पूरा करती है। ईर्ष्या, डाह, क्रोध के मैल को धो चांद की चांदनी में धुली पवित्रा बिरजू की माँ लाल पान की बेगम की तरह खुबसूरत, गर्विता बनकर उस संघर्षशील दिन का अन्त मुस्कुराते हुए करती हैं।

सन्दर्भ :
1. भारत यायावर (सम्पा.) : फणीश्वरनाथ रेणु चुनी हुई रचनाएं, वाणी प्रकाशन,नयी दिल्ली,1990, पृ. 107
2. वही, पृ. 111
3. वही, पृ. 112
4. वही, पृ. 112
5. सुरेन्द्र चौधरी : भारतीय साहित्य के निर्माता : फणीश्वरनाथ रेणु, साहित्य अकादमी प्रकाशन,1987, पृ. 40
6. फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्य: डॉ अंजलि तिवारी, दिग्दर्शन चरण जैन प्रकाशन, नई दिल्ली ,1983, पृ. 108
7. भारत यायावर (सम्पा.) : फणीश्वरनाथ रेणु चुनी हुई रचनाएं, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,1990, पृ. 109
8. स्वातन्त्रयोतर कहानी का परिदृश्य और फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां: विद्या सिन्हा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2007, पृ. 65
9. भारत यायावर (सम्पा.) : फणीश्वरनाथ रेणु चुनी हुई रचनाएं, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,1990, पृ. 108
10. स्वातन्त्रयोतर कहानी का परिदृश्य और फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां: विद्या सिन्हा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,2007, पृ. 65
11. आंचलिक यथार्थवाद और फणीश्वरनाथ रेणु: डॉ सुवास कुमार, साहित्य संस्कार प्रकाशन, दिल्ली,1998, पृ. 86
12. भारत यायावर (सम्पा.) : फणीश्वरनाथ रेणु चुनी हुई रचनाएं, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,1998, पृ. 116
13. वही, पृ. 117
14. वही, पृ. 117
15. वही, पृ. 118
16. अंजलि तिवारी : फणीश्वरनाथ रेणु का साहित्य, दिग्दर्शन चरण जैन प्रकाशन, नई दिल्ली,1983, पृ. 108
 
डॉ. आशुतोष शर्मा
सहायक आचार्य, मोती लाल नेहरू महाविद्यालय (सांध्य), दिल्ली, दिल्ली विश्वविद्यालय
drashutoshsharma4409@gmail.com, 9953934409

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  फणीश्वरनाथ रेणु विशेषांकअंक-42, जून 2022, UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक : मनीष रंजन

सम्पादन सहयोग प्रवीण कुमार जोशी, मोहम्मद हुसैन डायर, मैना शर्मा और अभिनव सरोवा चित्रांकन मीनाक्षी झा बनर्जी(पटना)

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