शोध आलेख :- भाषा और व्याकरण क्षेत्र में रामचन्द्र वर्मा का योगदान / राज कुमार

भाषा और व्याकरण क्षेत्र में रामचन्द्र वर्मा का योगदान
- राज कुमार

शोध सार : रामचन्द्र वर्मा एक कोशकार के अतिरिक्त हिन्दी भाषा-व्याकरण के चिंतन,विविध विषयों के मौलिक लेखन, अनुवाद और सम्पादन, ऐतिहासिक एवं राजनीतिक अनुशीलन इत्यादि के विविध विषयक कार्य-पक्षों से भी जुड़े रहे हैं। यहाँ मुख्य रूप से हिन्दी भाषा और व्याकरण के क्षेत्र में रामचन्द्र वर्मा द्वारा दिए गए योगदान को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। जो कि मानकीकृत हिन्दी भाषा-व्याकरण की आरंभिक व्यवस्थित संरचना तथा उसके विवेचन से जुड़ा हुआ है। अतः ऐसे में यहाँ यह कहना ठीक होगा कि हिन्दी भाषामें होने वाली सभी प्रकार की भूलों और उनके सुधार का व्यवस्थित विवेचन करना,उसके भाषायी प्रयोगों का मानक स्वरूप स्थिर करना तथा हिन्दी का आरंभिक व्याकरण तैयार करना रामचन्द्र वर्मा की अच्छी हिन्दी, हिन्दी प्रयोग एवं मानक हिन्दी व्याकरण जैसी पुस्तकों का एकमात्र आदर्श है। इस शोध आलेख में रामचन्द्र वर्मा की इन्हीं उक्त तीन पुस्तकों के माध्यम से भाषा और व्याकरण क्षेत्र में उनका किस प्रकार का मौलिक योगदान रहा है, इस तथ्य के मूल्यांकन का एक छोटा-सा प्रयास किया गया है।

बीज शब्द : रामचन्द्र वर्मा, मानकीकृत भाषा-व्याकरण, अच्छी हिन्दी, हिन्दी प्रयोग, मानक हिन्दी व्याकरण इत्यादि।

मूल आलेख : उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के हिन्दी उन्नायकों में रामचन्द्र वर्मा (1889-1969) की स्वीकार्यता वस्तुतः एक कुशल कोशकार के रूप में रही है। अतः यह कहना ठीक ही है कि हिन्दी शब्दसागर और बाद में मानक हिन्दी कोश आदि के सम्पादन से जुड़े हुए रामचन्द्र वर्मा का मुख्य योगदान कोश-रचना के क्षेत्र में रहा है। किन्तु अपने युग संदर्भों से जुड़े हुए इस लेखक ने भाषा-व्याकरण के क्षेत्र में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, जो कि हिन्दी भाषा की कार्यसेवा के रूप में आज भी रामचन्द्र वर्मा की उपलब्धियों को महत्त्व प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी की आरंभिक भाषायी संरचना को स्थायित्व देने एवं उसके व्यावहारिक प्रयोगों को आकार देने में भाषा और व्याकरण से जुड़ी रामचन्द्र वर्मा की मुख्य रूप से तीन पुस्तकें मिलती हैं, जो इस प्रकार हैं –

  • अच्छी हिन्दी : साहित्य-रत्न-माला कार्यालय, 20 धर्मकूप, बनारस, प्रथम संस्करण - 1944 ई॰
  • हिन्दी प्रयोग : साहित्य-रत्न-माला कार्यालय, 20 धर्मकूप, बनारस, प्रथम संस्करण - 1946 ई॰
  • मनक हिन्दी व्याकरण : चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, प्रथम संस्करण - 1961 ई॰

रामचन्द्र वर्मा की अच्छी हिन्दी (1944 ई॰) और हिन्दी प्रयोग (1946 ई॰) जैसे भाषा परिष्कार के निमित्त लिखे गए ग्रन्थ वास्तव में, व्याकरण की परम्परागत व्यवस्थित प्रणाली पर न लिखे गए होने पर भी; हिन्दी भाषा के स्वरूप, उसकी प्रकृति एवं प्रवृत्ति के विवेचन की दृष्टि से अध्येताओं और विद्वानों के बीच मार्गदर्शन का कार्य करने में अधिक प्रामाणिक सिद्ध हुए। इस बारे में बदरीनाथ कपूर लिखते हैं कि सन् “1943 में वर्माजी की अत्यंत प्रसिद्ध कृति अच्छी हिन्दी प्रकाशित हुई। इसमें विभिन्न लेखकों की सैकड़ों प्रकार की भाषा-संबंधी भूलों की ओर हिन्दीवालों का ध्यान आकृष्ट किया गया था।”[1] चूँकि जो कुछ किसी अच्छी भाषा के लिए आवश्यक समझा जाता है उनमें से शुद्ध, कलात्मक, मधुर और प्रभावशाली गुणों को सँजोते हुए रामचन्द्र वर्मा ने अच्छी हिन्दी पुस्तक लिखी थी। अतः कहना न होगा कि वास्तव में हिन्दी-संबंधी बहुत-सी शंकाओं का अच्छी हिन्दी समाधान प्रस्तुत करती है, जिसमें भाषा के दोषपूर्ण प्रयोगों पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया है। बहरहाल,रामचन्द्र वर्मा अच्छी हिन्दी पुस्तक के विषय में लिखते हैं कि “जहाँ तक हो सका है, मैंने इस पुस्तक को व्याकरण के झगड़ों से बचाने का प्रयत्न किया है। उन्हीं अवसरों पर व्याकरण के नियमों का संकेत किया गया है, जिन अवसरों पर बिना ऐसा किए काम ही नहीं चल सकता था।”[2]इस तरह यह पुस्तक भाषा-व्याकरण के सभी तत्त्वों पर विचार करके हिन्दी की सामान्य अशुद्धियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए अच्छी हिन्दी के उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। ज्ञात हो कि इसके कुछ-एक वर्ष बाद ही सन् “1945 में आरंभिक विद्यार्थियों में शुद्ध भाषा लिखने का संस्कार जगाने के लिए वर्माजी ने हिन्दी प्रयोग की रचना की। अच्छी हिन्दी और हिन्दी प्रयोग में जो त्रुटियाँ और भूलें रह गई थीं उनकी ओर भी अनेक महानुभावों ने ध्यान आकृष्ट किया। उनमें से प्रमुख थे पं॰ किशोरीदास वाजपेयी, डॉ॰ अंबाप्रसाद सुमन, डॉ॰ ब्रजमोहन आदि। वर्माजी ने इन लोगों के सुझावों का आदर किया और अपनी पुस्तकों में संशोधन-परिवर्तन भी किया और साथ ही उन्हें धन्यवाद भी दिया।”[3] इस प्रकार हिन्दी भाषा को मानकीकृत रूप और उसके प्रयोग को एक मानक आदर्श प्रदान करने में जिन पुस्तकों का आरंभिक योगदान रहा है, उनमें अच्छी हिन्दी और हिन्दी प्रयोग का स्थान आज भी विशिष्ट बना हुआ है।

हिन्दी भाषा में होनेवाली कई प्रकार की भूलों और उनके सुधार का व्यवस्थित विवेचन करने वाली वर्मा जी की पुस्तक अच्छी हिन्दी (1944 ई॰) वस्तुतः हिन्दी भाषा का स्वरूप विशुद्ध, स्थिर और कमनीय करने के उद्देश्य से लिखी गई है। उस शुरुआती दौर में जो हिन्दी चल रही थी, उसमें बहुत कुछ परिमार्जन की आवश्यकता दिखाई दे रही थी। रामचन्द्र वर्मा अच्छी हिन्दी के माध्यम से वास्तव में भाषा के क्षेत्र में होने वाले उस भटकाव को दूर करने का प्रयत्न कर रहे थे, जो मानकीकृत भाषा के रूप में हिन्दी के क्षेत्र में सामने आने वाली थी। उनकी यह सतर्कता आज भी अच्छी हिन्दी के रूप में उपादेय है। ज्ञात हो कि सन् 1944 ई॰ में प्रकाशित इस पुस्तक की प्रस्तावना बाबूराव विष्णु पराड़कर ने लिखी थी, जहाँ उन्होंने अपनी उस प्रस्तावना में ही यह उल्लेख कर दिया था कि “अच्छी हिन्दी न व्याकरण है, न रचना-पद्धति। वह साहित्य की शिक्षा नहीं देती, लेखन-कला भी नहीं सिखाती। कैसे लिखना चाहिए, यह वह नहीं बताती। वह केवल उन गड्ढों को दिखा देती है जो नवीन लेखकों के मार्ग में प्रायः पड़ते हैं, और जिनसे उन्हें बचना चाहिए। अर्थात् वर्मा जी ने वह भूलें दिखा दी हैं जो नये और पुराने, पर असावधान लेखक प्रायः करते दिखाई देते हैं।”[4] इन्हीं भूलों का विश्लेषण करते हुए वर्मा जी ने उन्हें पूरी पुस्तक में भाषा की परिभाषा, भाषा की प्रकृति, उत्तम रचना, अर्थ, भाव और ध्वनि, शैली, वाक्य-विन्यास, संज्ञाएँ और सर्वनाम, विशेषण और क्रिया-विशेषण, क्रियाएँ और मुहावरें, विभक्तियाँ और अव्यय, लिंग और वचन, छाया-कलुषित भाषा, समाचार-पत्रों की हिन्दी, अनुवाद की भूलें, फुटकर बातें, हमारी आवश्यकताएँ और भाषा के नमूने (परिशिष्ट) जैसे कई भिन्न-भिन्न वर्गों में बाँट दिया है।

उल्लेखनीय है कि रामचन्द्र वर्मा वस्तुतः अच्छी हिन्दी के हिमायती थे; इसी कारण उन्हें जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक शुद्ध और परिमार्जित भाषा मिलनी चाहिए थी, उन्हीं क्षेत्रों में जब भद्दी और गलत भाषा मिलती थी, तब उनको बहुत अधिक दुःख और निराशा भी होती थी।[5]संभवतः इसीलिए वे चिंता प्रकट करते हुए लिखते हैं कि “भाषणों में हिन्दी के सभी अंगों की उन्नति के उपाय बतलाए जाते हैं। परन्तु भाषा की शुद्धता का कभी कोई प्रश्न ही किसी के सामने नहीं आया। स्वयं भाषा का स्वरूप विशुद्ध रखने के संबंध में कभी कोई एक शब्द भी नहीं कहता। शायद इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी जाती। और आवश्यकता समझी ही क्यों जाने लगी ? हिन्दी हमारी मातृभाषा जो ठहरी। उसे हम जिस रूप में लिखेंगे, वही रूप शुद्ध होगा !”[6] इस तरह हिन्दी को मातृभाषा मानने वाले लोगों द्वारा ही, किए जा रहे उसके अशुद्ध प्रयोगों से, भविष्य में जो भाषायी चुनौतियाँ सामने आने वाली थीं, उनके प्रति रामचन्द्र वर्मा पहले से ही लोगों को आगाह करना चाह रहे थे।

अच्छी हिन्दी के संबंध में तब कई महानुभावों ने वर्मा जी को अपनी सम्मतियाँ व्यक्त की थीं, उनमें से कुछ दो-एक का यहाँ उल्लेख करना उचित जान पड़ता है, जो इस प्रकार हैं – अयोध्यासिंह उपाध्याय की सम्मति है कि आपकी रचना उच्च कोटि की है, इसमें सन्देह नहीं। आपने ग्रन्थ का नाम अच्छी हिन्दी लिखा है। मैं तो उसका नाम आदर्श हिन्दी रखता हूँ। वहीं बाबूराम सक्सेना लिखते हैं कि इस पुस्तक में लेखक के दीर्घ-कालीन अनुभव और कठिन परिश्रम का फल इकट्ठा मिलता है। अच्छी हिन्दी पढ़कर बहुतेरे हिन्दी विद्वान भी अपनी हिन्दी अच्छी कर सकते हैं। नवयुवक हिन्दी लेखकों को तो इसे बार-बार पढ़ना चाहिए। पुस्तक बड़े काम की है। और पुस्तक के प्रति अपनी सम्मति में लक्ष्मणनारायण गर्दे लिखते हैं कि इसे हाथ में लेने पर अन्त तक पढ़े बिना रख देने को जी नहीं चाहता। इसका उद्देश्य बहुत अधिक गम्भीर है – विषय साधारण से बहुत अधिक महत्त्व का है। पुस्तक राष्ट्रभाषा का मंगल-गान है। अतः यह अकारण नहीं कि इन सम्मतियों से अवश्य ही रामचन्द्र वर्मा को अच्छी हिन्दी के पक्ष में खड़े होने का मनोबल मिला होगा। जिसने उन्हें भी एक समृद्ध भाषा के रूप में हिन्दी प्रयोगों को विशुद्ध रखने के प्रयासों की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया होगा।

इन्हीं उक्त कारणों से तब यह पुस्तक हिन्दी भाषा शिक्षण में विद्यार्थियों के स्वाध्याय के लिए अनिवार्य रूप से स्वीकृत मानी जाती थी। अच्छी हिन्दी को उस दौर के शिक्षा-क्रम से निम्नलिखित संस्थानों ने विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में शामिल किया हुआ था – इण्टरमीडिएट के स्तर पर यह पुस्तक मद्रास विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय, पूर्वी पंजाब विश्वविद्यालय, राजपूताना हाई स्कूल-इण्टर-बोर्ड और संयुक्त प्रान्त हाई स्कूल-इण्टर-बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल थी। बी॰ए॰ के स्तर पर यह पुस्तक लखनऊ विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, प्रयाग विश्वविद्यालय, ट्रावनकोर विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल थी। उत्तमा और मध्यमा के स्तर पर यह पुस्तक हिन्दी साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग के पाठ्यक्रम में शामिल थी। वहीं राष्ट्रभाषा-रत्न के स्तर पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के पाठ्यक्रम में; अधिकारी के स्तर पर गुरुकुल विश्वविद्यालय, काँगड़ी के पाठ्यक्रम में; विशारद के स्तर पर दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार सभा, मद्रास के पाठ्यक्रम में; उपाधि के स्तर पर हिन्दी विद्यापीठ, बम्बई के पाठ्यक्रम में तथा बी॰टी॰ के स्तर पर टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, बनारस और टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, प्रयाग के पाठ्यक्रम में शामिल थी। अतः कहना न होगा कि उस दौर में अच्छी हिन्दी पुस्तक अपने विषयवस्तु की उपादेयता की दृष्टि से बेहद प्रसिद्धि और लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी थी।

हिन्दी भाषा और व्याकरण क्षेत्र में रामचन्द्र वर्मा की दूसरी उल्लेखनीय पुस्तक ‘हिन्दी प्रयोग’ (1946 ई॰) थी; जो “ऐसे विद्यार्थियों के लिए लिखी गई है, जिन्हें व्याकरण का साधारण ज्ञान हो चुका हो; अर्थात् आजकल के स्कूलों के नवें-दसवें दरजों के विद्यार्थियों या उनके समान योग्यता रखने वाले अन्य विद्यार्थियों के हित के लिए यह पुस्तक लिखी गई है। पर इसका यह अर्थ नहीं है कि और लोग इससे लाभ नहीं उठा सकते। इसमें भाषा की शुद्धता से संबंध रखने वाली बहुत-सी ऐसी-ऐसी बातें बतलाई गई हैं, जो अच्छे-अच्छे लेखकों के लिए भी बहुत अधिक उपयोगी हो सकती हैं।”[7] अतः वर्मा जी के अनुसार इसका लाभ यह है कि जब इस प्रकार की पुस्तकों से भाषा परिष्कार संबंधी अधिकांश बातें विद्यार्थी लोग स्कूल छोड़ने से पहले सीख लेंगे, तब उनका एक ऐसा बहुत बड़ा दल अवश्य तैयार हो जाएगा, जो हिन्दी भाषा के सब दोषों का समूल नाश करके उसका मुख उज्ज्वल कर दिखलाएगा। यही कारण है कि उस दौर में हिन्दी प्रयोग पुस्तक को संयुक्त प्रान्त, बिहार और राजपूताने तथा मध्य भारत की हाई स्कूल परीक्षाओं एवं प्रयाग महिला विद्यापीठ की विद्या-विनोदिनी परीक्षा तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की प्रथमा परीक्षा के पाठ्यक्रम में स्थान मिल चुका था। बहरहाल, रामचन्द्र वर्मा ने हिन्दी प्रयोग पुस्तक में भाषा प्रयोग के जो आदर्श बतलाए हैं, उससे संबद्ध हिन्दी प्रयोगों में मुख्य रूप से यह पुस्तक शब्दों के प्रकार, शब्दों के रूप, शब्दों के अर्थ, शब्दों का चुनाव, शब्दों का स्थान, हिन्दी ढंग, वाक्यों की बनावट, संज्ञाएँ, सर्वनाम, विशेषण, क्रियाएँ, वचन, लिंग, परसर्ग, विभक्तियाँ और निबंध जैसी सभी शब्दानुशासनिक प्रवृतियों एवं उनके प्रयोगों पर व्यावहारिक उदाहरणों के साथ विचार-विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

उस दौर में साहित्य-रत्न-माला कार्यालय, 20 धर्मकूप, बनारस से प्रकाशित हिन्दी प्रयोग पुस्तक के संबंध में कुछ चुनी हुई सम्मतियाँ भी प्रकाशित हुई थीं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस दौरान इस पुस्तक पर शैक्षिक और अकादमिक जगत से जुड़े कई महानुभावों ने अपनी संस्तुति प्रदान की थी। ऐसे में तब निश्चित तौर पर यह कहा जाने लगा था कि हिन्दी का भविष्य ऐसी ही पुस्तकों पर अभिमान करेगा। ऐसे में आज भी रामचन्द्र वर्मा का लेखन,हिन्दी भाषा और व्याकरण परिष्कार की ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन से, हिन्दी पाठकों के लिए और अधिक उपयोगी बन पड़ा है।

यहाँ उपरोक्त तथ्यों की आवश्यकता और उसकी नितांत महत्ता को रेखांकित करने की दृष्टि से देखें तो ज्ञात होता है कि “अपने देश में बहुत से ऐसे विद्वान हैं, जिनमें विषय की योग्यता है किन्तु निष्पादन-क्षमता नहीं है। उन्हें विषय को सजाना-सँवारना नहीं आता। वर्माजी इस कला में भी सिद्धहस्त थे। किस लेख में कौन-सा प्रकरण पहले आए, कौन-सा बाद में – यह वे अच्छी तरह जानते थे।”[8] इस संदर्भ में इनका लेख अर्थ-विवेचन की कला जो शब्द और अर्थ पुस्तक में छपा है, एक प्रतिमान है। जो उक्त विषय के अनेकानेक पहलुओं को समाविष्ट करते हुए उन्हें स्पष्ट करता है।

मानक हिन्दी व्याकरण (1961 ई॰) वर्मा जी की एक अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक के बारे में वर्मा जी लिखते हैं कि “इस व्याकरण का उद्देश्य विद्यार्थियों को बहुत सहज में और नये मनोरंजक ढंग से व्याकरण की जटिल तथा शुष्क बातों से परिचित कराना है। इसमें अनेक शब्द-भेदों की बिलकुल नई प्रकार की व्याख्या दी गई है; और विषय-विभाजन भी बहुत कुछ नये ढंग से किया गया है।”[9] अतः यह मानक हिन्दी व्याकरण की ऐसी विशेषता है जो स्वयं लेखक में भी इस पुस्तक की उपयोगिता तथा उपादेयता के सिद्ध होने की आशा जगाता है। रामचन्द्र वर्मा व्याकरण के महत्त्व को समझते थे। इसलिए आधुनिक युग में व्याकरण के विस्तृत क्षेत्र से भाषा विज्ञान, अर्थ विज्ञान और अलंकार शास्त्र जैसे अंगों को अलग कर दिए जाने तथा उनके स्वतंत्र-शास्त्रों के रूप में माने जाने को रेखांकित करते हुए वर्मा जी आगे लिखते हैं कि “अब व्याकरण में बोलचाल तथा साहित्य में प्रयुक्त होनेवाली भाषा के स्वरूप, उसके अवयवों, उनके प्रकारों और पारस्परिक संबंधों तथा उनके रचना-विधान और रूप-परिवर्तन का विचार होता है।”[10] इस तरह व्याकरण को वस्तुतः भाषा संबंधी नियमों का संकलन कहना चाहिए। रामचन्द्र वर्मा ने मानक हिन्दी व्याकरण पुस्तक में हिन्दी भाषा और उसके व्याकरण संबंधी इन्हीं नियमों पर विचार किया है, जिसमें उन्होंने व्याकरण का महत्त्व, वर्ण-भेद, लिपि, शब्द-भेद, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया और क्रिया-विशेषण, अव्यय, शब्द-विकार, कारक और विभक्तियाँ, लिंग, वचन, क्रिया-पद, क्रिया-पदों की रचना, वाक्य-विचार, संधि और समास, पद-परिचय और विराम-चिह्न जैसे उन्नीस प्रकरणों का उल्लेख करते हुए हिन्दी व्याकरण का विस्तृत परिचय दिया है।

रामचन्द्र वर्मा की उक्त व्याकरण पुस्तक हिन्दी व्याकरण लेखन के आरंभिक कार्यों में से है, ऐसे में उसका मूल्यांकन व्याकरण के आधुनिक मानकों पर आधारित होना चाहिए। अतः ज्ञात हो कि हिन्दी व्याकरण का इतिहास के लेखक अनन्त चौधरी के अनुसार मानक हिन्दी व्याकरण किसी भी दृष्टि से हिन्दी-व्याकरण के मानक रूप को प्रस्तुत नहीं करता। उसमें प्रयुक्त मानकशब्द हिन्दी-व्याकरण का एक अर्थहीन विशेषण ही माना जाना चाहिए। इस ग्रन्थ का अधिकांश कामताप्रसाद गुरु और किशोरीदास वाजपेयी के व्याकरण ग्रन्थों के आधार पर लिखा गया है। जहाँ-कहीं इसमें कुछ-एक स्थानों पर मौलिकता-प्रदर्शन का थोड़ा बहुत प्रयास किया भी गया है, वहाँ सूक्ष्म चिन्तन के अभाव के कारण केवल असफलता ही लेखक के हाथ आई है। एकमात्र क्रियाविशेषण और अव्यय के प्रसंग में कुछ ऐसी बातें अवश्य कही गई हैं, जिनको विचारणीय कहा जा सकता है, अन्यथा पूरे ग्रन्थ में वर्माजी के उस विवेचक रूप का दर्शन कहीं नहीं होता, जिसने अच्छी हिन्दी जैसे अच्छे ग्रन्थ की रचना की थी।[11] बहरहाल,ऐसी स्थिति में भी येमानक हिन्दी व्याकरण के लेखक की कमियाँ न कहला कर उनके व्याकरण की सीमाएँ ही कहलाएँगी। जिसके बारे में स्वयं रामचन्द्र वर्मा का कथन था कि यह अन्यान्य अनेक व्याकरणों की तुलना में कहीं अधिक महत्त्व की दृष्टि से देखे जाने के योग्य है और इससे हिन्दी व्याकरण के अध्येता अपेक्षया अधिक लाभ उठा सकेंगे।[12] और जो कि हिन्दी व्याकरण लेखन के आरंभिक प्रयासों की श्रेणी में आज भी एक उल्लेखनीय कार्य सिद्ध होगा।

निष्कर्ष: अंततः निष्कर्ष रूप में यहाँ कह सकते हैं कि उक्त तीनों पुस्तकों के आधार पर ही हिन्दी भाषा और व्याकरण क्षेत्र में रामचन्द्र वर्मा के किए गए योगदान को रेखांकित किया जा सकता है। वे हिन्दी में इस क्षेत्र के निःस्वार्थ सेवकों में से एक थे। ऐसे तो रामचन्द्र वर्मा आजीवन हिन्दी के परिमार्जन एवं परिष्कार में लगे रहें, किन्तु जो सेवाभाव उन्होंने अच्छी हिन्दी, हिन्दी प्रयोग और मानक हिन्दी व्याकरण जैसी श्रमसाध्य पुस्तकों के माध्यम से प्रस्तुत किया, वह इस आधुनिक युग में उनके योगदान के महत्त्व को और अधिक बढ़ा देता है।

सन्दर्भ :
[1] बदरीनाथ कपूर, शब्दब्रह्म के महान उपासक आचार्य रामचन्द्र वर्मा, हरदेव बाहरी तथा अन्य (संपादक), कोश-विज्ञान : सिद्धान्त और प्रयोग, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, प्रथम संस्करण - 1989 ई॰,पृष्ठ - 167
[2]रामचन्द्र वर्मा, अच्छी हिन्दी, साहित्य-रत्न-माला कार्यालय, बनारस, पहला संस्करण - 1944 ई॰, भूमिका, पृष्ठ - 8
[3]बदरीनाथ कपूर, शब्दब्रह्म के महान उपासक आचार्य रामचन्द्र वर्मा,वही, पृष्ठ - 167
[4]रामचन्द्र वर्मा, अच्छी हिन्दी, वही, प्रस्तावना, पृष्ठ - 5
[5]वही,भूमिका, पृष्ठ - 4
[6]वही,भूमिका, पृष्ठ - 4
[7]रामचन्द्र वर्मा, हिन्दी प्रयोग, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, नवीन संशोधित संस्करण - 2009 ई॰, भूमिका, पृष्ठ -viii-ix
[8]ब्रजमोहन, शब्दर्षि श्री रामचन्द्र वर्मा, हरदेव बाहरी तथा अन्य (संपादक), कोश-विज्ञान : सिद्धान्त और प्रयोग, वही, पृष्ठ - 173
[9]रामचन्द्र वर्मा, मानक हिन्दी व्याकरण, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, प्रथम संस्करण - 1961 ई॰, निवेदन से उद्धृत
[10]वही,पृष्ठ - 1
[11]अनन्त चौधरी, हिन्दी व्याकरण का इतिहास, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना, द्वितीय संस्करण - 2013 ई॰, पृष्ठ - 552
[12]रामचन्द्र वर्मा, मानक हिन्दी व्याकरण, वही, निवेदन से उद्धृत
 
राज कुमार, शोधार्थी
भारतीय भाषा केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

 

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue

सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन सत्या सार्थ (पटना)

और नया पुराने