शोध आलेख : स्त्री-चेतना की अलख जगाती प्राचीन एवं मध्यकालीन स्त्रियाँ / निम्मी सलोमी किन्डो

स्त्री-चेतना की अलख जगाती प्राचीन एवं मध्यकालीन स्त्रियाँ
- निम्मी सलोमी किन्डो

शोध सार : प्रारंभ से ही स्त्री-चेतना के निर्माण में सामाजिक और साहित्यिक आंदोलनों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है भारत में स्त्री-चेतना का प्रश्न  प्रारंभ से ही विमर्श का विषय रहा है। विभिन्न साहसी,विदुषी,कवयित्रियों लेखिकाओं ने इस काल में स्त्री-चेतना को अभिव्यक्त किया. इस तरह प्रचीन युग से ही स्त्री-चेतना की शुरुआत हुई। भारतीय साहित्य में स्त्री-विमर्श की शुरुआत के साथ स्त्री-अभिव्यक्ति को नया स्वर और नई दिशा मिली। स्त्रियों ने अपने ऊपर होने वाले सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से मानसिक एवं शारीरिक दबाव डालने वाली पारंपरिक  रूढ़ियों और मान्यताओं का विरोध किस प्रकार किया? प्राचीन से लेकर भक्तिकाल तक अपने को किस प्रकार प्रतिष्ठित करते हुए अपनी उपस्थिति  दर्ज की? उस समय उनकी दशा और दिशा क्या थी? उन्होंने अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की पहचान किस प्रकार करायाइस शोध आलेख में इन्हीं प्रश्नों की पड़ताल की गई है।

बीज शब्द : प्राचीन काल,स्त्री, वैदिक, मनुस्मृति, भारतीय समाज,ऋग्वेद, पर्दा प्रथा,सती प्रथा।

मूल आलेख : प्राचीन काल से पूर्व स्त्री का इतिहास पाषाण युग से प्रारंभ होते  हुए देखा जा सकता है।  पाषाण युग में मनुष्य आदिमानव की तरह जीवन यापन करता था। पाषाण युग के बाद सिंधु घाटी सभ्यता आयी, इस युग में  स्त्री  का अपना महत्व था, क्योंकि उस समय का समाज मातृसत्तात्मक  था। वंश को माँ के नाम से चलाया जाता था।

 शुरुआत से ही भारतीय साहित्य में  स्त्री भारतीय सभ्यता और साहित्य का केन्द्र बिन्दु रहीं हैं, भारतीय समाज एवं साहित्य में स्त्री की स्थिति हमेशा से बदलती रही है। उतार-चढ़ाव के दौर हमेशा से देखने को मिले हैं।

प्राचीन भारत में मौर्य साम्राज्य, मगध साम्राज्य, महाजन दशक, कुषाण आदि का समय रहा है वैदिक और उत्तर वैदिक युग में स्त्री जीवन का नया स्वरूप दिखाई देने लगा।

वृहदारण्यकोपनिषद में याज्ञवल्क्य की दोनों पत्नियों मैत्रेयी और कात्यायनी में मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। उसने तर्क द्वारा ऋषि को ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने को बाध्य किया। इन्हीं ऋषि की शिष्या गार्गी भी तत्त्ववेत्ता तथा परम तार्किक थी। गार्गी वृहदारण्यक के अष्ठम ब्राह्मण में अपने दो प्रश्नों द्वारा याज्ञवल्क्य को चरम सत्य के अन्वेषण में फंसा देती हैं। अन्त में स्वयं उसका प्रतिपादन कर श्रोताओं को चकित करती हैं। गार्गी द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर याज्ञवल्क्य के पुरुषत्व पर ठेस लग जाती है वे गार्गी को चेतावनी देते हुए कहते हैं- "गार्गी, मातिप्राक्षीर्मा ते मूर्द्धा न्यपतत्…(री गार्गी मुझसे बहुत सवाल पूछेगी, तो तेरा सिर नीचे गिर जायेगा)"1

भास्काराचार्य की कन्या लीलावती को आज पूरा संसार जानता है, जिसको गणित शास्त्र पर इतना अधिकार प्राप्त था कि गणना के आधार पर वृक्ष की पत्तियां तक गिन कर सामने रख देती थी। कालिदास की पत्नी प्रियंगुमंजरी ने कालिदास को आज संसार के सामने कवि के रूप में प्रदर्शित कर दिया।

विक्रमकालीन भारत में भारतीय स्त्रियां 14 विधाओं और 64 कलाओं में पूर्ण दक्ष होती थीं।2

जिस  ऐतिहासिक काल में वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों और आरण्यकों की रचना हुई उस समय भारतीय प्रागैतिहासिक काल में महिलाएँ मंत्रों की रचना कर रही थीं उनमें से कुछ की तो, वैदिक संहिताओं में सम्मिलित होने की भी संभावना है। "रुढ़िवादी परम्पराओं के अनुसार श्रवणक्रमणिका सिद्धांत में ये संगृहीत है कि ऋग्वेद के रचयिताओं में बीस महिलाएँ भी सम्मिलित थीं। आंतरिक प्रमाण दर्शाते  हैं कि ऋग्वेद के I.179, V.28, VII-I 91, IX 81, II-20 एवं 40 आदि की रचयिता लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिकता, निवावरी एवं घोषा वास्तविक रूप में हिन्दू समाज का हिस्सा थीं। X. 145,  159 तथा 150 निर्विवाद रूप से महिलाओं द्वारा रचित है, हालाँकि इस बात में सन्देह हो सकता है कि उनका वास्तविक नाम इन्द्राणी अथवा शची था। ब्राह्मण काल में विद्वानों एवं रचयिताओं के अतिरिक्त कुछ महिलाएं, यथा-सुलभा, मैत्रेयी, वाक् एवं गार्गी आदि सम्मान प्रदान करने को बाध्य करती हैं।" 3

सामाजिक व्यवस्था आर्यों द्वारा प्रारंभ की गई थी, उसका मूल ढाँचा पितृसत्तात्मक था। इस दौर में पितृसत्तात्मक परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुसार पुरुष ही परिवार का मुखिया बन गया।

             युगों-युगों से  स्त्रियाँ  भारतीय समाज में व्याप्त धार्मिक विषमताओं, अंधविश्वासों और निरक्षरता के कारण उपेक्षित होती रहीं हैं। वैदिक युग में देखा जाए तो,स्त्री को पूजा करने, यज्ञ करने और शिक्षा ग्रहण करने जैसे अनेक अधिकार प्राप्त थे। आदिकाल तक आते-आते स्त्री पुरुष की सम्पत्ति बनकर रह गई आदिकालीन काव्य से ज्ञात होता है कि आदिकाल में स्त्री को स्वयंवर चुनने का अधिकार तो दे दिया गया था परन्तु समाज में स्त्री की स्थिति कठपुतली की तरह रह गयी थी। पुरुष जैसे चाहे स्त्री का शोषण कर सकता था। एक ओर नाथों ने  स्त्री को निन्दा का पात्र बनाया तो दूसरी ओर सिद्धों ने उसे सिर्फ वासनात्मक दृष्टि से देखा। भक्तिकालीन कवियों ने स्त्री की निन्दा और प्रशंसा दोनों की है। संयमशील और मर्यादित स्त्री को ईश्वरीय अवतार मानते हुए उसको पूजनीय बताया है तो वहीं भक्ति में बाधा उत्पन्न करने वाली और वासना से लिप्त स्त्री को संसार के लिए त्याज्य माना है। स्त्री की पराधीनता का प्रारंभ 'मनुस्मृति' के कारण हुआ है। 'मनुस्मृति' और अन्य धार्मिक ग्रंथों में स्त्रियों के लिए कई नियम बना दिए गये जैसे अविवाहित स्त्री का कुंवारापन, विवाहित स्त्री के शील की शुद्धता, और स्त्री को पुरुष के अधीन रहने और उनकी सेवा करते रहने  की मानसिकता आदि। 'मनुस्मृति' में विवाह का धार्मिक महत्व इस तरह रखा गया है कि स्त्री को एक आदर्श के रूप में बताया जाता है। इस आदर्श के तहत पति को परमेश्वर की उपाधि देकर पत्नी को पति की पूजा करने का पाठ पढ़ाया जाता है। विधवाओं के लिए सती प्रथा का नियम बना दिया गया है। एक तरह से स्त्रियों को पुरुषों पर पूरी तरह से निर्भर बना दिया गया है। पति की मृत्यु के बाद पत्नी का जीवन निरर्थक मानने वाले समाज के विचारकों ने अपनी मान्यताओं और रिवाजों आदि को अपनी सुविधानुसार परिवर्तित किया है। जिस समाज में सतीत्व को  सम्मान दिया जाता था वहाँ पुनर्विवाह पर विचार करने का सवाल ही नहीं उठता है। मनु ने विधवाओ का विरोध करते हुए लिखा था - 'पुनर्विवाह करने वाली स्त्री मरने के बाद परलोक में पतिलोक को नही पाती।विधवाओं के लिए जो नियम बने वे अति कठोर और संवेदनहीन थे।

 

प्राचीन काल में महिलाएं इस समय से अधिक स्वतंत्रतापूर्वक अपना व्यक्तित्व विकसित कर सकती थीं, अपनी शक्ति का सम्पूर्ण परिचय दे सकती थीं तथा भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्ध होती थीं। प्राचीनकालीन भारतीय समाज में कन्या अथवा पुत्री को काफी स्नेह, सम्मान आदर की दृष्टि से देखा जाता था। प्राचीनकाल में पुत्री को परिवार में सभी अधिकार प्राप्त थे परन्तु पुत्र के समान सम्पति में बराबरी का अधिकार उसे प्राप्त नहीं था। प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान एवं स्थान रहा है। स्त्री एक पत्नी के रूप में, माता के रूप में और पुत्री के रूप में अपने आप को पुरातन काल से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे अपनी श्रेष्ठता एवं विशिष्टता को सिद्ध करती रही हैं। उदाहरण स्वरूपकैकेयी ने पति राजा  दशरथ के प्राणों की रक्षा की, सावित्री ने पति सत्यवान को यमराज के मृत्युपाश से मुक्त कराया, द्रौपदी ने अपने पतियों पंच पाण्डवों का दुर्दिन में साथ दिया। गांधारी, सीता एवं अनुसुइया जैसी स्त्रियों ने  पातिव्रत्य धर्म निभाया। माँ के रूप में कैकेयीकौशल्या, यशोदा, सीता, द्रौपदी, शकुन्तला,महामाया,सुनीति अशिज बनकर , राम, कृष्ण, लव-कुश, अभिमन्यु, भरत,महात्मा बुद्ध, ध्रुव कक्षिवान जैसे सुसंस्कारित वीर योद्धाओं को अपनी कोख से जन्म दिया। पुत्री रूप में गार्गी, मैत्रेयी, विश्ववारा, घोषा, लोपामुद्रा, उर्वशी, अपाला, सिकता निवावरी बनकर भारतीय वेदान्तों को सुशोभित किया है। वैदिककालीन भारत में भी स्त्रियों को घर में प्रतिष्ठित -स्थान प्राप्त था वे पतियों की गुलाम नहीं थी। घर के किसी  महत्वपूर्ण कार्यों में उनसे  भी सलाह मशविरा लिये  जाते थे।

प्राचीन भारत में स्त्री लेखिकाओं कवयित्रियों की कई रचनाएँ मिलती है। स्त्री-साहित्य सृजन की लम्बी परंपरा रही है, वैदिक युग में पुरुष-शिक्षा की तरह ही स्त्री-शिक्षा अपनी उच्च अवस्था में थी। वे बुद्धि समेत, ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी तथा सह शिक्षा के जरिये वेद-वेदान्त, ज्योतिष, दर्शन साहित्य में पारंगत हो गयी थीं। स्त्रियाँ केवल सभाओं गोष्ठियों में ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं का गान करती थीं, बल्कि कई विदुषी स्त्रियों ने ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं के प्रणयन में भी काफी सहयोग योगदान किया था। ऋग्वेद में ब्रह्मवादिनी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। इनमें अदिति, इन्द्राणी, उर्वशी, सरमा, रात्री, सूर्या दैवीय, श्री, मेधा, दक्षिणा, श्रद्धा, विश्ववारा, अपाला, घोषा, गोधा, लोपामुद्रासाश्वती, रोमशा और वाक् प्रमुख हैं। सूर्या ने ऋग्वेद के दशम मंडल के 85 वें सूक्त की रचना की थी। इसने 47 ऋचाएँ लिखी थीं, ऐसा प्रमाण मिलता है। संस्कृत काव्यधारा में सूर्या का रचनाकाल ईसा पूर्व 1000 वर्ष माना गया है। घोषा ने दशम मंडल के 39 वें और 40 वें सूक्त की रचना की थी। विश्ववारा ने ऋग्वेद के पाँचवें मंडल के द्वितीयक अनुवाक के अट्ठाईसवें  सूत्र षटऋकों की रचना की थी। अपाला ने ऋग्वेद के अष्टम मंडल के 91 वें सूक्त की एक से लेकर सात तक की ऋचाएँ लिखी हैं। साश्वती ने ऋग्वेद के अष्टम मंडल के प्रथम सूक्त की  34 वीं ऋचा की रचना की थी। दीर्घतमा ऋषि की पत्नी उशिज ने ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 116 से 121 तक के सूक्त की रचना की थी। प्राचीन भारत के संस्कृत कवयित्रियों लेखिका में से एक  वाक् ने ऋग्वेद संहिता के दशम मंडल के 125 वें सूक्त में देवी के नाम से आठ मंत्रों की रचना  की है। रोमशा, जिन्हें स्त्री चेतना का विकास करने वाली प्रथम स्त्रीवादी ब्रह्मवादिनी कहा जाता है उन्होंने भी ऋगवेद संहिता के प्रथम  मंडल के 126 वें सूक्त की सात ऋचाओं को लिखा था। सुप्रसिद्ध कवयित्री विज्जा सन् 610 . अर्थात् 7वीं शताब्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री थी। शीला भट्टारिका नवीं शताब्दी (670 .) मुख्यतः श्रृंगार रस लेखिका थी। मरुला 12 वीं शताब्दी (1150 .) संस्कृत की सुविख्यात श्रृंगार रस की कवयित्री थी। इनकी कविता कल्हण द्वारा संपादित संकलित 'सुभाषित मुक्तावली'   'शार्ङ्गधर पद्धति' में 13 वीं शताब्दी (1247 .) में उद्धृत है | कवि धनददेव ने कवयित्री लेखिका मरुला  के लिए प्रशंसात्मक  पंक्तियाँ उद्धृत किया है -

"शीला- विज्जा- मरुला-मोरिकाद्या: काव्यं कर्तु सन्तु  विज्ञाः।
स्त्रियोपि विद्या वेतु वादिनी निर्विजेतुं दातुं वक्तु यः प्रावीणः वन्द्यः ।।"4

 

चिनम्मा की कविताएँ कवि भोजदेव रचित 'सरस्वती कंठाभरणम्' में संकलित है, जो 10वीं शताब्दी में 'उद्धृत की गयी थी। चिनम्मा रचित कविताएँ दामोदर पुत्र शार्ङ्गधर द्वारा लिखित 'शार्ङ्गधर पद्धति' में भी संकलित है जो 14वीं शताब्दी (1363 .) में लिखा गया था। इसमें कुल 4689 पद्य हैं जिनका वर्गीकरण 163 खण्डों में किया गया है। चिनम्मा स्मृति पुराणों की भी ज्ञाता थी, ऐसा उनकी रचनाओं से  ज्ञात होता है।

 "चांडाल विद्या महानतम् कवि कालिदास की समकालीन थी। इनका रचना काल चौथी शताब्दी माना जाता है। इन्होंने सुप्रसिद्ध कवि विक्रमादित्य समेत कालिदास के साथ भी इनकी संयुक्त रचनाएँ देखने को मिलती है। कालिदास विक्रमादित्य जैसे महान् कवियों के साथ चांडाल विद्या का संयुक्त लेखन इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि चांडाल विद्या इन दोनों के समकालीन श्रेष्ठ लेखिका कवयित्री थी।"5

 

             राजनीति में भाग लेने वाली अनेक योग्य महिलाएं भी उस काल में हो चुकी हैं। वे आज की बहनों की तरह पर्दा नहीं करती थीं। वे पुरुषों के साथ बातचीत में भाग लेती थीं। उनमें कार्य कुशलता थी, हिम्मत थी, अपने आदर्श के साथ ही पुरुषों की प्रेरणा भी उन्हें मिलती थी। कैकेयी (वैदिक कालभारतीय जनमानस में राम के वनवास भरत को राजगद्दी के कारण एक कलंकिनी स्त्री के रूप में चित्रित की गयी है परन्तु पौराणिक महाकाव्यों से ज्ञात होता है कि कैकेयी आध्यात्मिक, दार्शनिक, साहसी एवं वीर होने के साथ राष्ट्रप्रेमी भी थी - "चक्रवर्ती राजा दशरथ दिग्विजय पर निकलने वाले हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य भारत की पश्चिमोत्तर सीमा को जीतना है तथा अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चक्रवर्ती महाराज दशरथ अपनी विशाल सैन्य वाहिनी को लेकर कुरुक्षेत्र के निकट पहुँची हुई है तो वह सिंहगर्जना कर उठी- "केकय देश की आन-बान की रक्षा के लिए हम अपने प्राणों की आहुति देने के लिए कृतसंकल्प हैं। हमारा यह दृढ़ संकल्प है कि चाहे चक्रवर्ती कोशलाधीश हों या फिर देवाधिदेव इन्द्र हम अपने देश की मिट्टी के कण-कण की रक्षा के लिए अपने शरीर का एक-एक कतरा लहू बहा देंगे। हमें अपने देश की सुरक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित होकर प्राण हथेली पर रखकर शत्रुओं से मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा। हम अपनी धरती की एक इंच जमीन भी शत्रु के हवाले नहीं करेंगे और ही शत्रु सेना को एक पग भी अपनी सीमा के अन्दर प्रवेश करने देंगे।" कैकेयी का यह वीरतापरक संकल्पित