शोध आलेख : मध्यकालीन स्त्री-कविता के आईने में रानी रूपमती और उनका काव्य / विनोद मिश्र

मध्यकालीन स्त्री-कविता के आईने में रानी रूपमती और उनका काव्य 
- विनोद मिश्र


शोध-सार : हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल-विभाजन और नामकरण कुछ इस तरीके का हुआ है कि उसमें स्त्री-कविता के लिये बहुत कम जगह बचती है। हिन्दी में स्त्री-लेखन के इतिहास को आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल जैसा विभाजित नहीं किया जा सकता। इसका प्रमुख कारण है कि स्त्री-लेखन में कई तरह की प्रवृत्तियाँ एक दूसरे के समानांतर लंबे समय तक चली हैं। स्त्री-कविता पर बात करते हुए भक्तिकाल और रीतिकाल की बाइनरी नहीं खड़ी की जा सकती, क्योंकि स्त्री-कविता में रीतिकाल की प्रवृत्तियाँ क्षीण ही हैं। इसलिए सुविधा की दृष्टि से इस काल को मध्यकाल कहना ज्यादा ठीक रहेगा। रानी रूपमती मालवा के अंतिम सुल्तान बाज़बहादुर की पत्नी थीं और गीत-संगीत के अलावा वो कविता लिखने में भी दक्ष थीं। उनकी कविताएं ‘भक्ति’ और ‘रीति’ से मुक्त हैं। उनका साहित्येतिहास में उल्लेख न करने का स्त्री होने के अलावा शायद ये भी एक कारण रहा होगा। उनकी कविताओं में प्रेम और विरह के विभिन्न आयाम देखने को मिलते हैं।   

बीज शब्द : मध्यकाल, भक्तिकाल, भक्ति-आंदोलन, स्त्री-कविता, रानी रूपमती, बाज़बहादुर, हिन्दी साहित्य का इतिहास, हिन्दी कविता, रीतिकाल, प्रेम-काव्य।

मूल आलेख : रानी रूपमती और उनकी कविताओं पर लगभग नहीं लिखा गया है। इसलिए उनसे और उनकी कविताओं से परिचय के लिये यह आलेख तीन भागों में विभक्त है – 1. मध्यकालीन स्त्री-कविता, 2. रानी रूपमती, 3. रानी रूपमती की कविता।

1.मध्यकालीन स्त्री-कविता

हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल और रीतिकाल को मध्यकाल के अंतर्गत माना जाता रहा है। यहाँ प्रयुक्त ‘मध्यकालीन स्त्री-कविता’ पदबंध का आशय इसी दौर में रचित स्त्री-कविता से है। सुमन राजे इस समय को ‘मध्ययुग’ कहती हैं और भक्ति-आंदोलन के दौर को ‘तृतीय नवजागरण’[1] मानती हैं।  डॉ. सावित्री सिन्हा ने अपने शोध-ग्रंथ ‘मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ’ में मध्यकालीन स्त्री-कविता को डिंगल की कवयित्रियाँ, निर्गुण धारा की कवयित्रियाँ, कृष्ण काव्य धारा की कवयित्रियाँ, राम काव्य धारा की कवयित्रियाँ, शृंगार काव्य की लेखिकाएँ तथा स्फुट काव्य की लेखिकाएँ – में विभक्त किया है। इन सबको मिलाकर पूरे मध्यकाल में 46 स्त्री-कवियों का उल्लेख किया गया है एवं उनके जीवन और उनकी कविताओं पर टिप्पणी भी की गयी है। सावित्री सिन्हा ने अपने शोध-ग्रंथ में ये दिखाया है कि इन 46 कवयित्रियों में से अधिकांश की एक, दो या तीन कविताएँ ही उपलब्ध हैं। किसी-किसी की तो एक भी नहीं। इनमें से बहुत कम ही ऐसी हैं, जिनका अलग से कोई कविता संकलन भी है। मध्यकाल में स्त्री-कविता का व्यापक रूप से न उपलब्ध होने का कारण उसका संरक्षण न होना है। जिन स्त्रियों की कविताएँ प्राप्त हुई हैं, वे या तो लोक में निरंतर गाये जाने के कारण या मठ एवं दरबारी सरंक्षण के कारण। डिंगल की कवयित्री हरीजी रानी चावड़ी जोधपुर के राजा मानसिंह की दूसरी पत्नी थीं। उनके रचे गीत एवं टप्पे महाराज मानसिंह के बनाये गानों के संग्रह में पाये जाते हैं। वहीं संत काव्यधारा में सहजोबाई और दयाबाई के ग्रंथ मठ के माध्यम से संरक्षित होते हुए आज प्राप्त हो सके हैं। मीरां और चंद्रसखी के पद विभिन्न संप्रदायों के साथ अपनी लोकप्रियता के चलते मौजूद हैं तो प्रवीण राय राज्य-संरक्षण और केशवदास की कृति के साथ। रानी रूपमती की कविता मालवा में प्रचलित लोकमान्यताओं और लोकगीतों के माध्यम से कंठहार बनी हुई हैं। शेख की कविताएँ ‘आलमकेलि’ में आलम के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशित होने के कारण बची रही। वहीं ताज की कविताएँ कृष्ण-भक्त की अनुयायी होने के कारण संरक्षित कर ली गयीं। 

सुमन राजे ने लिखा है - “भक्तिकालीन महिला-लेखन एक बहुत बड़ा मिथक तोड़ता है। इस साहित्य का बड़ा भाग विधिवत दीक्षा लेकर मंदिरों और मठों में नहीं लिखा गया। ...यह अधिकांशतः राजघरानों में लिखा गया है, घरों में रहते हुए लिखा गया है।”[2] इतना ही नहीं अगर इस युग की स्त्री-कविता पर गौर किया जाये तो ये बात और खुलकर सामने आती है कि इस समय की जो सर्वश्रेष्ठ स्त्री-कविता है उसमें निजी अनुभूति की प्रमुखता दिखाई देती है। अगर इन कविताओं में भक्ति कहीं आयी भी है तो स्व को उल्लेखित करने के आवरण के रूप में। इस आधार पर मीरां और ताज की कविताएँ देखी जा सकती हैं। रानी रूपमती की कविता तो बिलकुल भौतिक धरातल पर लिखी गयी हैं-

“और धन जोड़ता है री मेरे तो धन प्यारे की प्रीत पूँजी।

कहू त्रिया की न लागे दृष्टि अपने कर राखूँगी कूँजी।।

दिन-दिन बढ़े सवायो डेवढ़ो घटे न एको गूँजी।

बाज़ बहादुर के स्नेह ऊपर निछावर करूँगी धन और जी।।”[3] (ⅩⅩⅤⅠ)

इस तरह मध्यकालीन स्त्री-कविता का पाठ ‘भक्ति’ और ‘रीति’ दोनों के हिसाब से करना एक भयानक भूल सिद्ध होगी। 

2. रानी रूपमती

रानी रूपमती का समय 1540-1561 ई. के बीच रहा है। वह कहाँ की थी और उनके पिता कौन थे, इस विषय को लेकर काफ़ी मतभेद है। रूपमती की मृत्यु के 38 साल बाद 1599 में उन पर लिखी पहली जीवनी के लेखक अहमद-उल-उमरी ने उन्हें सारंगपुर के एक ब्राह्मण जादू राय की बेटी बताया है।[4] मेजर सी. ई. लुआर्ड ने मालवा में प्रचलित लोककथाओं और लोकगीतों के आधार पर एक जगह उन्हें सारंगपुर की एक राजपूत कन्या कहा है।[5] एक इतिहास की किताब में रूपमती को धर्मपुरी के ठाकुर या प्रधान की संतान बताया गया है।[6] एल. एम. क्रम्प रानी रूपमती को धर्मपुरी के थान सिंह की बेटी मानते हैं, जो राजपूत या राठौर थे।[7] सावित्री सिन्हा ने अपनी किताब ‘मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ’ में उन्हें सारंगपुर की वैश्या बताया है।[8] प्रियदर्शी ठाकुर ‘खयाल’ ने अपने उपन्यास ‘रानी रूपमती की आत्मकथा’ में इन सभी तथ्यों को समेटकर एक नाटकीय मोड़ देते हुए रानी रूपमती के पिता का नाम राव यदुवीर सिंह परमार और माता का नाम रुक्मिणी, जो बाद में वैश्या बनने के बाद रुकैय्या हो गयी, लिखा है।[9] नलिनी दास ने उन्हें एक आदिवासी-कन्या बताया है।[10] उनके जन्म और जन्मस्थान आदि पर इतने मतभेदों के बावजूद इतना तो सर्वविदित है कि रानी रूपमती एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं, जिनका उल्लेख मुगलकालीन इतिहासकारों ने स्वयं किया है। इस बात पर प्रत्येक इतिहासकारों की सम्मति है कि रानी रूपमती मालवा के अंतिम शासक बाज़बहादुर की प्रेमिका/पत्नी थी और अकबर द्वारा भेजे गये अधम खान ने जब बाज़बहादुर को युद्ध में हरा दिया तो अधम खान के चंगुल से बचने के लिये उन्होंने आत्महत्या कर ली थी।

जिस तरह से हीर-राँझा, लैला-मजनू आदि की प्रेम कहानियाँ आम जनमानस में प्रचलित हैं, उसी तरह मालवा में रानी रूपमती और बाज़बहादुर की प्रेम कहानी कही और गाती जाती रही हैं। बाज़बहादुर मालवा का अंतिम शासक था। उसके पिता शुजाअत खान को शेरशाह सूरी ने 1540 में मालवा का सूबेदार नियुक्त किया था। शेरशाह सूरी के मृत्यु के बाद शुजात खान ने अपने को मालवा का सुल्तान घोषित कर दिया और अपनी राजधानी शुजावलपुर को बनाया। 1555 में उसकी मृत्यु के बाद उसके तीन बेटों में से बायज़ीद खान (जो बाद में बाज़बहादुर खान के नाम से जाना गया) ने अपने भाइयों से संघर्ष करके मालवा को अपने अधीन कर लिया और अपनी राजधानी मांडू को बनाया। एक दिन शिकार करने के दौरान वह रूपमती के गायन और उसके सौन्दर्य से इतना प्रभावित हुआ कि उसको अपनी रानी बना लिया। रानी रूपमती की सुंदरता की प्रशंसा करते हुए इतिहासकारों ने उन्हें ‘पद्मिनी’ या ‘The lady of the Lotus’ कहा है। रूपमती कविता के अतिरक्त संगीत में भी दखल रखती थी। उन्होंने ‘भूप कल्याण रागिनी’ की खोज भी की थी। “रूपमती ध्रुपद आदि रागों के गायन के अलावा वीणा, सितार और दिलरुबा की अच्छी वादक भी थी।”[11] रानी रूपमती और बाज़बहादुर की कविताएं और गीत मालवा में बहुत प्रसिद्ध है। ये दोनों कुशल संगीतकार और गीतकार भी थे।‘आईने- अकबरी’ में अकबर के दरबार में शाही संगीतज्ञों की जो लिस्ट है, उसमें तानसेन आदि के साथ बाज़बहादुर का भी नाम है और उसमें बताया गया है कि उसका इस क्षेत्र में कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है।[12] ‘तबकाते-अकबरी’ में बाज़बहादुर को संगीत और विभिन्न हिन्दी रागों के मामले में अपने समय का अद्वितीय व्यक्ति कहा गया है।[13]

बाज़बहादुर के शासनकाल (1555-1561) के अंतर्गत मालवा में गीतकारों और संगीतकारों का जमावड़ा लगा रहता था। इसका प्रमुख कारण था कि रानी रूपमती और बाज़बहादुर दोनों स्वयं इसमें रुचि रखते थे। चंद्रकांत तिवारी का कहना है कि बाज़बहादुर के दरबार में 400 संगीतज्ञ थे। उसने रागों के वर्गीकरण और उसके सही गायन को लेकर संगीतज्ञों की एक कांफ्रेस (सभा) भी आयोजित की थी, जिसमें देश के हर हिस्से के संगीतकार (स्त्री और पुरुष दोनों) शामिल हुए थे।[14] गीत एवं संगीत में गहरी दिलचस्पी लेने के कारण मालवा की शासन-व्यवस्था कमजोर हो गयी, क्योंकि बाज़बहादुर उस पर ध्यान नहीं दे पाया। अकबर ने अपने सिपहसालार अधम खान और पीर मुहम्मद को मालवा पर चढ़ाई करने के लिये भेजा। 29 मार्च 1561 को अधम खान के नेतृत्व में मालवा पर आक्रमण किया गया। जिसमें बाज़बहादुर की हार हुई और वह मालवा छोड़ कर भाग गया। रानी रूपमती समेत अन्य स्त्रियाँ, जो उसकी सेना के जघन्य जनसंहार से बच गयी थीं, उस पर अधम खान ने कब्ज़ा कर लिया। मुग़ल दरबार में भी रानी रूपमती के सौन्दर्य और उसके गीत-संगीत के चर्चे होने लगे थे, इसलिए अधम खान ने रानी रूपमती के तथाकथित प्यार में पड़कर उससे शादी की पेशकश की। अधम खान के चंगुल से छूटने का कोई उपाय न देखकर रानी रूपमती ने हाँ कर दी। तय समय पर जब अधम खान रानी रूपमती के कक्ष में पहुँचा, तो देखा कि वो बाज़बहादुर द्वारा दी गयी सुहाग की साड़ी पहने और सोलह-शृंगार किये सोयी हुई हैं। जब उसने उनका स्पर्श किया तो पाया कि उनकी देह में जान नहीं है। रानी रूपमती ने हीरे का चूर्ण खाकर आत्महत्या कर ली थी। कहा जाता है कि उन्होंने अपना जीवन समाप्त करने से पहले ये दोहा लिखा था –

“रूपमती दुखिया भई बिना बहादुर बाज।

सो अब जियरा तजत है यहाँ नहीं कुछ काज।।”[15]

बाज़बहादुर को एक लंबे अंतराल के बाद अकबर के दरबार में शामिल कर लिया गया और उसकी ख्याति अकबर के  प्रमुख संगीतकारों में होने लगी। मरणोपरांत रानी रूपमती के कब्र के पास ही बाज़बहादुर को भी दफ़ना दिया गया। 

इस तरह इतिहास और लोकमानस दोनों में रानी रूपमती की छवि एक सच्ची प्रेमिका की है। जो साहित्य, संगीत आदि कलाओं में निपुण थी। जिसके सौन्दर्य की चर्चा पूरे हिंदुस्तान में थी और जिसने अपने प्रेम की विश्वसनीयता के लिये खुद ही अपनी जान दे दी।   

रानी रूपमती की कविता

रानी रूपमती की कविता का अभी तक कोई प्रामाणिक पाठ उपलब्ध नहीं है। उस समय लिखी उनकी कविताओं की कोई पाण्डुलिपि आज मौजूद नहीं है। शायद यही कारण है कि उनकी कविताओं पर लगभग न के बराबर बात की गयी है। पर ऐसा भी नहीं है कि उनकी कविताएँ हिन्दी के लोकवृत्त से एकदम गायब हैं। विभिन्न स्रोतों से उनकी 50 से अधिक कविताएँ प्राप्त हुई हैं। रानी रूपमती और उनकी कविताओं को सामने लाने का सबसे महत्वपूर्ण काम एल. एम. क्रम्प ने किया है। क्रम्प ने 1599 में फारसी भाषा में लिखित अहमद-उल-उमरी की किताब का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद 1926 में किया एवं मालवा में मौखिक रूप से प्रचलित रानी रूपमती की कुछ कविताओं और एक जगह से प्राप्त 200 साल पुरानी पाण्डुलिपि को एकत्रित करके ‘The Lady of the Lotus : Rupmati Queen of Mandu, A strange Tale of Faithfulness’ नाम से एक किताब प्रकाशित की। इस किताब में क्रम्प ने एक विस्तृत भूमिका के साथ अहमद-उल उमरी की किताब का अनुवाद तथा रानी रूपमती की 50 से अधिक कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद भी शामिल किया है। रानी रूपमती की कविताएँ उस समय की प्रचलित हिन्दी में लिखी गयी थीं। एल. एम. क्रम्प ने जिन कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है, उसमें से अधिकांश अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं। क्रम्प चाहते तो अपने अनुवाद के साथ उसका मूल (हिन्दी) रूप भी दे देते तो आज रानी रूपमती का काव्य-संकलन तैयार हो सकता था। इतना सब होने के बावजूद उनकी कुछ कविताएँ अपने मूल रूप में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती हैं। किसी अज्ञात लेखक की किताब ‘History of Mandu : The Ancient Capital of Malwa’ में रानी रूपमती का सबसे प्रचलित एक दोहा मिलता है-

“तन में जियरा रहत है, माँगत है सुख साज।

रूपमती दुखिया भई बिना बहादुर बाज।।”[16]

मेजर सी. ई. लुआर्ड ने अपनी किताब ‘Dhar And Mandu : A Sketch for the Sight-seer’ में रानी रूपमती की एक कविता (और धन जोड़ता है री मेरे तो धन प्यारे की प्रीत पूँजी...) का उल्लेख किया है। इसी कविता के साथ इसका सर ए. कनिंघम द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद भी छपा है।[17]

गंगाप्रसाद सिंह विशारद ने लगभग 150 मुस्लिम कवियों को लेकर ‘हिन्दी के मुसलमान कवि’ नाम से एक किताब प्रकाशित की है। इसमें उन्होंने रानी रूपमती को मुसलमान मानते हुए उनका नाम रूपमती बेग़म दिया है और उनकी एक कविता/दोहा (रूपमती दुखिया भई बिना बहादुर बाज...) देते हुए कहा है कि इसके अतिरिक्त उनकी कोई और कविता अभी उपलब्ध नहीं है।[18]

पोद्दार अभिनंदन ग्रंथ में रानी रूपमती के राग विहाग, राग देवगंधार और राग ढोडी में रचित तीन पद मिलते हैं। हालाँकि इसे ‘रूपमती (बाज़बहादुर) के पद’ नाम से दिया गया है, पर ये रानी रूपमती के ही प्रतीत होते हैं।[19]

डॉ. सावित्री सिन्हा ने अपने महत्वपूर्ण शोध-प्रबंध ‘मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ’ में रानी रूपमती के दो दोहे और एक सवैया का उल्लेख किया है।[20]  सुमन राजे ने ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’ में रानी रूपमती के एक दोहे और एक पद का जिक्र किया है।[21] भोलाभाई पटेल ने अपनी यात्रा-वृत्तांत की किताब ‘विदिशा’ में रानी रूपमती के 6 दोहों को उद्धृत किया है।[22]

इन सबके अतिरिक्त प्रियदर्शी ठाकुर ‘खयाल’ ने अपने उपन्यास ‘रानी रूपमती की आत्मकथा’ में रानी रूपमती की 15 कविताओं को बीच-बीच में उद्धृत किया है। ये कविताएँ क्रम्प की किताब में संकलित रूपमती की कविताओं का हिन्दी अनुवाद हैं।[23] इसके अलावा इन्होंने क्रम्प की किताब में संकलित रानी रूपमती की सभी कविताओं का हिन्दी अनुवाद ‘रानी रूपमती की कविताएँ’[24] किताब में की है। क्रम्प की किताब का अनुवाद अखिलेश ने भी किया है, जिसमें रानी रूपमती की कविता भी शामिल है।[25]

अब अगर रानी रूपमती की कविताओं के विषयवस्तु पर बात की जाये तो उनकी कविताएँ भक्तिकाल के समय में लिखी जाने के बावजूद ‘भक्ति’ से अछूती हैं। ये भी आश्चर्य का विषय है कि रीतिकाल से पहले ही इसमें प्रेम या शृंगार का वह स्वरूप दिखाई देने लगता है, जो भक्ति का आवरण लिये हुए नहीं है। भक्तिकाल की महत्वपूर्ण रचना ‘रामचरितमानस’ के लिखे जाने के 15 वर्ष पहले ही रानी रूपमती की मृत्यु हो गयी रहती है। इसलिए रूपमती की ये कविताएँ भक्तिकाल के मध्य में ही उससे लगभग अप्रभावित हुए अपना एक अलग वितान रचती हैं। हालाँकि इनकी कविताओं का मूल्यांकन करते हुए चंद्रकांत तिवारी ने प्रवीण राय पातुर और तीन तरंग के साथ रानी रूपमती को ‘रीति-स्कूल’ से जोड़ा है।[26]  लेकिन यहाँ ये भी ध्यान रखने की जरूरत है कि रूपमती की कविता का समय ‘रीति-स्कूल’ के बनने एवं केशवदास आदि रीतिकारों से पहले का ठहरता है। ये हो सकता है कि हिन्दी में रीतिकाल स्थापित होने से पहले कुछ राजघरानों में इसका प्रचलन रहा हो। भक्तिकाल के तूफान में इनकी कविताएँ या तो दाब दी गयी हों या बाद के इतिहासकारों ने साहित्य की बनी-बनायी धारणा पर प्रश्नचिन्ह न लगे, इस विचार से इस परंपरा को फुटकल खाते में भी डालने की जुर्रत ना की हो।

कबीर के यहाँ प्रेम जिस पवित्रता के साथ आता है, रानी रूपमती के दोहे उसी परंपरा के लगते हैं –

“प्रीतम हम तुम एक हैं, कहत सुनन को दोय।

मन से मन को तौलिये, दो मन कभी न होय।।

कठिन चढ़िबो प्रेम तरु, डाली बीन (बिन) खजूर।

चढ़े तो पावे मिष्ठ फल, पड़ै तो चकनाचूर।।”[27] 

यही नहीं रूपमती की कविता में प्रेम की कई तरह की अभिव्यक्तियाँ देखने को मिलती हैं। उनकी कविता में प्रेम के कई शेड्स हैं। प्रेम एक-दूसरे के प्रति बराबर का भाव होने पर ही आगे बढ़ता है और इसके लिये सामंतवादी समाज में बहुत ही कम स्पेस रहता है। लेकिन रानी रूपमती की कविता प्रेम के उस मुकाम को छूती है जहाँ बड़े-छोटे, ऊँच-नीच का भेद खत्म करके ही मिला जा सकता है –

“ज्यों चकोर तरसे चन्दा को,

जैसे चातक बाट निहारे

बादल का आकाश में;

बिलकुल वैसा ही है

नियम यह रहस्यमय

अनुराग का

दो हृदयों के बीच –

जिसके आगे कोई न होता है ऊँचा

और न कोई नीच ”[28] ()

हालाँकि ये कविता दोहे में है, लेकिन इसका मूल पाठ उपलब्ध न होने के कारण यह क्रम्प द्वारा किये गये अनुवाद का अनुवाद है। इसी तरीके से प्रेम की पाती लिखने या भेजने का चलन पारंपरिक प्रेम-कविताओं की एक विशिष्ट पहचान है। रूपमती की कई कविताएँ इस विषय को लिये हुए हैं, लेकिन अपनी विशिष्टता के साथ। एक कविता में वो लिखती हैं कि मेरा मन एक ऐसा प्रेम-पत्र लिखना चाहता है, जिसे सिर्फ़ तुम ही पढ़ पाओ और वही पढ़ो जो मेरे हृदय में है। दूसरी कविता में प्रेम-पत्र न लिख पाने की विफलता का चित्रण है क्योंकि जब भी लिखने बैठी, एक लंबी आह के कुछ लिखा न गया। एक अन्य कविता में यही प्रेम-पत्र मिलन का उम्मीद जगाता हृदय से निकला एक चुंबन है। एक दूसरी कविता का उदाहरण देखिए –

“पलक झपकते ही भर जाता है

इतना कम है काग़ज़ मेरा-

मूर्ख! एक ही प्याले में

किस तरह समाये

प्रेम का पूरा सागर तेरा।” [29](22)

इतना ही नहीं कुछ कविताओं में प्रेम-पत्र लिखने का नकार भी है, क्योंकि जो स्वयं हृदय में स्थित है, जिससे हमेशा मानसिक वार्तालाप होता रहता है उसे बाहरी प्रदर्शन की क्या जरूरत? एक कविता में लिखती हैं कि प्रेमी-जन दूसरे देश में बसकर व्यर्थ ही अपनी प्रेमिकाओं को प्रेम-पत्र लिखते हैं। मैं तो उसे प्रेम-पत्र कदापि नहीं लिखूँगी क्योंकि मैंने उसे अपने हृदय में बाँधकर रखा है। दूसरी कविता में वो लिखती हैं –

“मेरे हृदय ने मुझसे कभी

यह नहीं कहा –

‘कलम उठा,

लिख प्रेम की पाती’

मैं तुमको क्यों पत्र लिखूँ

जब तुम बसते हो

मोरी ही छाती!”[30] (13)

प्रेम के बारे में पाब्लो नेरुदा की एक प्रसिद्ध पंक्ति है –‘Love is so short, forgetting is so long.’ जिये गये प्रेम को भूलना वाकई तकलीफ़देह होता है। इसलिए मानव मन की उत्कृष्ट भावनाएँ विरह के रूप में साहित्य में हमेशा दर्ज़ होती रही हैं। साहित्य में मिलन से ज्यादा आवेग विरह के काव्य में देखने को मिलता है। कबीर ने तो बिरह को ‘सुल्तान’ कहा है। मध्यकाल में ही नागमती और गोपियों का विरह वर्णन अद्भुत है। रानी रूपमती की अनेक कविताएँ इस भाव को दर्शाती हुई दिखती हैं। उनकी एक कविता प्रेम को ही उलाहना देती है –

“जो मैं जानती

एक ज़रा भी

इतनी पीड़ा लेकर आएगा प्रेम

तो नक्कारों पर

करके मुनादी

देती मैं उसको देस-निकाल

जो मैं जानती ... एक ज़रा भी”[31] ()

प्रेम की एकनिष्ठता और सघनता का सवाल हमेशा से साहित्य में उपलब्ध रहा है। लोक में प्रचलित प्रेम-कहानियों में से एक रानी रूपमती और बाज़बहादुर की प्रेम कहानी में भी ये देखने को मिल जाता है। रूपमती का बाज़बहादुर से प्रेम करने का आधार सिर्फ़ देह नहीं है। दोनों में प्रेम की उपज उनके साहित्य और संगीत-प्रेमी होने के कारण होती है। पूरे मध्यकालीन वातावरण में ये एक क्रांतिकारी घटना है। उनकी प्रेम-कहानी का अंत भी एक ट्रेजेडी ही है, जब वो अधम खान के चंगुल से बचने के लिए आत्महत्या कर लेती हैं। एक सामंती समाज में स्त्रियों पर एकनिष्ठ प्रेम करने का दबाव देखने को मिलता है, जबकि पुरुष इससे छूट लिये हुए है। उनकी कुछ कविताएँ प्रेम की इसी भावभूमि पर केंद्रित हैं। मसलन ये कविता –

“कमलन को रवि एक है, रवि को कमल अनेक।

हमसे तुमको बहुत है, तुमसे तुम मोहि एक।।”[32] ()

एक दूसरी कविता में उन्होंने प्रेमी को कमल और प्रेमिकाओं को भँवरियाँ कहा है और ये विनती की है कि कमल हमेशा खिला रहे, जिससे वो भी जिंदा रह सकें। एक अन्य कविता में एकनिष्ठता को लेकर प्रेमिका कहती है कि जैसे सिंहनी को एक ही बच्चा होता है, जैसे सच्चा आदमी अपने एक वचन पर ही अटल रहता है और जैसे कदली का वृक्ष एक ही बार फलता है उसी तरह मेरे हृदय में बस एक ही प्रेमी निवास करता है।

इसके अतिरिक्त रूपमती की कविता का एक पक्ष नीतिपरक भी है, जिसमें वो जीवन से जुड़ी हुई कुछ सच्चाईयों को पारंपरिक तरीके से अभिव्यक्त करती हैं। एक कविता में उन मित्रों की बात है जो सुख में साथ रहते हैं और दुःख में साथ छोड़कर चले जाते हैं। दूसरी कविता धन के सदुपयोग पर है कि कैसे कुछ लोग धनी होते ही मदांध हो जाते हैं तो कुछ उसी धन से नेक कार्य करने लगते हैं। रूपमती की कुछ कविताएँ भर्तृहरि के नीतिशतक में आयी उन कविताओं की तरह हैं, जिसमें कहा गया है कि मूर्ख को कभी मित्र न बनाइए या मूर्ख को कदापि समझाया नहीं जा सकता। इनकी एक-दो कविताएँ देह और संसार की निस्सारता लिये हुए भी हैं।

रानी रूपमती की अब तक प्राप्त कविताएँ दोहा, कवित्त, सवैया और पद शैली में लिखी मिलती हैं। यद्यपि इनकी कविताओं का अधिकांश हिस्सा एल. एम. क्रम्प द्वारा किये गये अंग्रेजी अनुवाद के रूप में हैं, जिनका मूल रूप प्राप्त नहीं है। इसलिए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर बात करनी थोड़ी मुश्किल है। फिर भी इन अनूदित कविताओं और अन्य स्रोतों से मिली हिन्दी कविताओं को देखने पर ये बात तो स्पष्ट हो जाती है कि रानी रूपमती की कविताओं की मुख्य प्रकृति प्रेम है। यह प्रेम विरह के रूप में भी है और कहीं-कहीं उपदेश के रूप में भी। इस लेख में आये , ... ये चिन्ह क्रम्प द्वारा संकलित कविताओं की क्रम संख्या है।

निष्कर्ष : मध्यकालीन स्त्री-कविता पर बात करते हुए रानी रूपमती की कविता हिन्दी साहित्येतिहास लेखन पर भी प्रश्न-चिन्ह उठाती है। रूपमती की कविताओं का मुख्य विषय प्रेम है, और इस प्रेम को मध्ययुग की ‘भक्ति’ और ‘रीति’ के खाँचों में नहीं रखा जा सकता। समूचे स्त्री-लेखन के बीच भक्तिकाल और रीतिकाल की बाइनरी नहीं खड़ी की जा सकती। इसलिए स्त्री-लेखन का अलग से पाठ करना जरूरी हो जाता है। रानी रूपमती की कविताओं का मूल पाठ या प्रामाणिक पाठ वैसे तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त उनकी कविताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अगर मालवा पर मुग़ल सल्तनत का आक्रमण न होता और रानी रूपमती का असमय और अकस्मात मृत्यु न हुई होती तो संभव है कि उनकी रचनाएँ आज सुरक्षित मिलतीं। आज प्राप्त उनकी रचनाओं का आधार लोक-स्मृति है। हो सकता है कि लोक में उनके नाम से और लोगों की कविताएँ प्रचलित हो गयी हों। ये सब देखते हुए उनकी रचनाओं का पाठ करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, पर हमें ये नहीं भूलना है कि रानी रूपमती का कविता और संगीत में काफ़ी नाम रहा है। उनकी लोकगाथाएं, उनके गीत और उनकी कविताएँ अब भी मालवा में प्रचलित हैं। मध्यकाल के सामंती वातावरण में जो भी स्त्री-लेखन हुआ और पर्याप्त संरक्षण न  मिलने के बावजूद जिन तक हमारी पहुँच है, उसके प्रमुख रूप से तीन माध्यम रहे हैं – धर्माश्रय, राज्याश्रय और लोकाश्रय[33]।   स्त्री-लेखन का सबसे बड़ा हिस्सा लोक में व्याप्त है, जिसका अभी पाठ किया जाना शेष है। रानी रूपमती और उनकी कविता का उल्लेख इसी दृष्टिकोण से किया गया है।

संदर्भ 
[1] सुमन राजे स्त्री-कविता के इतिहास में चार नवजागरण का जिक्र करती हैं। पहला नवजागरण थेरी गाथाओं से होता है, दूसरा संस्कृत और प्राकृत की स्त्री-कविता के आने से। तीसरा नवजागरण भक्ति-आंदोलन से उपजा और चौथा आधुनिक काल में आधुनिकता के आगमन से।
[2]सुमन राजे, हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, छठा संस्करण 2017, पृ. 146
[3] डॉ. सावित्री सिन्हा, मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1953, पृ. 250
[4] अहमद-उल-उमरी, द लेडी ऑफ द लोटस : रूपमती क्वीन ऑफ मांडू, ए स्ट्रेन्ज टेल ऑफ फैथफुलनेस, अनु. एल. एम. क्रम्प, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन, 1926, पृ. 38
[5]मेजर सी. ई. लुआर्ड, धार एण्ड मांडू : ए स्केच फॉर द साइट-सीर, स्टैंडर्ड प्रेस, इलाहाबाद, 1912, पृ. 21
[6]हिस्ट्री ऑफ मांडू : द एन्सियन्ट कैपिटल ऑफ मालवा, ए बॉम्बे सबाल्टर्न (1875), पृ. 109-110
[7] अहमद-उल-उमरी, द लेडी ऑफ द लोटस : रूपमती क्वीन ऑफ मांडू, ए स्ट्रेन्ज टेल ऑफ फैथफुलनेस, अनु. एल. एम. क्रम्प, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन, 1926, पृ. 9
[8] डॉ. सावित्री सिन्हा, मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1953, पृ. 248
[9] प्रियदर्शी ठाकुर ‘खयाल’, रानी रूपमती की आत्मकथा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2020
[10] नलिनी दास, द लु क्वार्टेट : सुपर स्लूथ्स एण्ड अदर स्टोरीज, अनु. स्वप्ना दत्त, हश्शेट बुक पब्लिशिंग इंडिया प्रा. लि, 2012
[11] रूपमती : द मेलोडी क्वीन ऑफ मालवा, चंद्र कांत तिवारी, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, 1977, भाग 38, पृ. 246
[12] अबुल फजल, द आईने अकबरी, भाग-1, अनु. एच. ब्लूचमैन, द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, कलकत्ता, 1873, पृ. 612 
[13] ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद, द तबकाते अकबरी, भाग-2, अनु. ब्रजेन्द्रनाथ डे, द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल, कलकत्ता, 1936, पृ. 252
[14]रूपमती : द मेलोडी क्वीन ऑफ मालवा, चंद्र कांत तिवारी, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, 1977, भाग 38, पृ. 224-249
[15] डॉ. सावित्री सिन्हा, मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1953, पृ. 248
[16]हिस्ट्री ऑफ मांडू : द एन्सियन्ट कैपिटल ऑफ मालवा, ए बॉम्बे सबाल्टर्न (1875), पृ. 109
[17] मेजर सी. ई. लुआर्ड, धार एण्ड मांडू : ए स्केच फॉर द साइट-सीर, स्टैंडर्ड प्रेस, इलाहाबाद, 1912, पृ. 22-23 
[18] गंगाप्रसाद सिंह विशारद, हिन्दी के मुसलमान कवि, लहरी प्रेस काशी, 1926, पृ. 123-124
[19] प्रधान संपादक वासुदेवशरण अग्रवाल, साहित्य वाचस्पति सेठ कन्हैयालाल पोद्दार अभिनंदन ग्रंथ, अखिल भारतीय ब्रज साहित्यिक मण्डल, मथुरा, वि. सं. 2010, पृ. 356 
[20] डॉ. सावित्री सिन्हा, मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1953, पृ. 248-250
[21] सुमन राजे, हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, छठा संस्करण 2017, पृ. 159
[22] भोलाभाई पटेल, विदिशा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1994, पृ. 41-53
[23] प्रियदर्शी ठाकुर ‘खयाल’, रानी रूपमती की आत्मकथा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2020
[24] प्रियदर्शी ठाकुर ‘खयाल’, रानी रूपमती की कविताएँ, श्रुति बुक्स, गाजियाबाद, 2018
[25] अहमद-उल-उमरी, वफ़ा की अजीब दास्ताँ : बाजबहादुर और रूपमती की कालजयी प्रेम कथा, अनु. अखिलेश, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, 2018
[26]रूपमती : द मेलोडी क्वीन ऑफ मालवा, चंद्र कांत तिवारी, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, 1977, भाग 38, पृ. 246 
[27] भोलाभाई पटेल, विदिशा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1994, पृ. 46 और 48
[28] प्रियदर्शी ठाकुर ‘खयाल’, रानी रूपमती की कविताएँ, श्रुति बुक्स, गाजियाबाद, 2018, पृ. 21-22 
[29]वही, पृ. 18
[30]वही, पृ. 15
[31]वही, पृ. 24
[32] भोलाभाई पटेल, विदिशा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1994, पृ. 42
[33] “जो कुछ भी महिला लेखन आज हम उपलब्ध कर सकें हैं वह या तो धर्माश्रय के माध्यम से है या राज्याश्रय के माध्यम से। तीसरा और सबसे सशक्त माध्यम है लोकाश्रय। ये तीन आश्रय मात्र नहीं हैं, तीन वर्गों के प्रतीक हैं, इसलिए यदि स्त्री-साहित्य का इतिहास लिखना है तो बिना लोकसाहित्य का आश्रय लिये, लिखा जा ही नहीं सकता, ऐसा मेरा मानना है।” – सुमन राजे, हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, ‘प्रस्थान’ नामक भूमिका से।

 

विनोद मिश्र
शोधार्थी, हिन्दी-विभागहैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद


चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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